शुक्रवार, जनवरी 18, 2013

कवितायें- तू, शीशमहल, सूखे पत्ते - डॉ. रश्मि

सूखे पत्ते

हरे-हरे पत्ते
जिनसे सजती है टहनियाँ
फिर ये ही पत्ते
सूखकर टूटकर बिखर जाते हैं
टूटे पत्तों का गिरना धरा पर
है मात्र एक प्रक्रिया
या षडयंत्र रचती हैं टहनियां
इन सूखे निर्जीव पत्तों से
नहीं चाहती दिखना वे बेजान
फिर ये तोड़े जाते हैं ,अलग किये जाते है
या किंचित
लाचार पत्ते स्वयं ही अलग हो जाते हैं
क्योंकि अब ये कोमल नहीं
सूखने लगे हैं इनके किनारे
और ये मुरझाए से वृद्ध पत्ते
बोझ बन गए है युवा टहनियों पर
बदरंग कर रहे है इन टहनियों को
टहनियां भी कहाँ कभी मानतीं हैं अपना दोष
वे भी कब तक झेलती इन्हें
मौसम की तरह उन्हें भी बदलना है
टहनियों की ही तरह शक्ति-संपन्न लोग
नकार देते है उन्हें जो नि:शक्त है, विपन्न हैं
सूखे पत्तों की तरह......

तू

तेरी निगाहों में मैं क्या-क्या ढूंढती हूं,
अपनी ही ज़मी अपना आसमां ढूंढती हूं।
जब तू मेरे पास होता है तो यह एहसास होता है,
मैं तुझमें समा रही हूं तुझसे ही आ रही हूं।
फिर न कुछ पल बाकी होता है, न याद बाकी होती है,
न कोई ख्याल बाकी होता है, न बात बाकी होती है।
बस तू ही साथ होता है एक तू ही पास होता है,
बंद आंखों में भी तेरा ही दीदार होता है।
बंद आंखों से तुझे मैं घंटों निहारती हूं,
तेरी हर आहट-हर आवाज़ को दिल में उतारती हूं।
आंख खुलते ही तू दूर चला जाता है,
पर तेरी सूरत, हर बात साथ होती है।
तेरे साथ बीती हर याद साथ होती है,
तू अब भी मेरे पास है अब भी मेरे साथ है, ऐसा गुमान होता है।
फिर खुद को भूलकर तेरी यादों में खो जाती हूं,
आंख मूंद कर तेरी निगाहों में सो जाती हूं, उनमें ही खो जाती हूं।
न जाने फिर तेरी निगाहों में मैं क्या-क्या ढूंढती हूं,
अपनी ही ज़मीं अपना आसमान ढूंढती हूं।


शीशमहल

मेरे रिश्ते
पारदर्शी थे
काँच की तरह
बहुत चमकीले
सब कुछ साफ़, बेदाग़
सब उजला नज़र आता था उनमें
नाज़ था उन चमकीले रिश्तों पर मुझे भी
बाहर से देखने वालों को भी
वह शीशमहल नज़र आता था
हर रिश्ता आईना था
सभी के सीने में
एक दूसरे का अक्स था
पर भूल बैठी मैं
वह मेरा
शीशे का एक घरौंदा था
एक तूफ़ान और धराशाई वो शीशमहल था
जिसके सामने आते ही
मुझे मेरा अक्स नज़र आता था
वह चटक चुका था
और मुझे ही
'बहुरूपिया' दिखा रहा था
कल तक जो शीशमहल था
आज कांच का नश्तर था
मैं भूल गई थी कि
कांच के रिश्ते टूटने पर
नश्तर बन जाते हैं
हँसें तो, आईना
टूटें तो,चुभन बन जाते हैं
मेरा वो शीशमहल बिखर गया था
हर रिश्ता
एक टुकड़े में बँट गया था
क्योंकि
मेरा घर काँच का था
उसमें भी कभी
सब चमकीला और साफ़-साफ़ था



डॉ . रश्मि  | शिक्षा - 'कबीर काव्य का भाषा शास्त्रीय अध्ययन' विषय में पी-एच .डी . |कार्य - लेखन व शिक्षण | अमर उजाला, दैनिक भास्कर, कादम्बिनी, पाखी, हंस, दैनिक ट्रिब्यून आदि सभी के साथ लघुकथाओं, कविताओं व पुस्तक्समीक्षा के लिए संबद्ध ... 







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