बादल की घुड़की और बारिश की नादानियाँ - डॉ. सुनीता

1- टूटता पुल


सफर के साथी ने
संघर्ष में साथ छोड़ दिया
बेरहम दर्द के बिस्तर पर लेटे-लेटे
एक नादां मुहब्बत ने दम तोड़ दिया
यह गुमा था खुद पर
जिंदगी के थपेड़े में
हर कदम मिला के चलेंगे
दिल का पुल टूटने लगा
एक चीख के साथ-साथ छूटने लगा
दिया दिखाया है
उस अजनबी ने जो अभी आया नहीं
हमारे बीच के बाँध को ढीला कर दिया
खिलौने के कथायात्रा में
कब भूल गए ...
हम एक हैं
उस एक ने क्यों राह बदला
वक्त के साथ बर्बादी के धुन रचे
रचना के आगोश में बैठकर
कल्पना के महल बनाते रहे
खुद के तन्हा पल में
नोच-नोच के किसी
भुड़की में छिपा दिया
किसी अनचीन्हें दिन में
निकाल कर देखूंगी
क्या पाया...
क्या खोया...
के जद्दोजहद के उलझन में...!

       2- लहू का हिस्सा


       
       कसमसाहट सी कब्जीयत
       दिमाग की नन्ही दीवारों में
       द्वन्द के कई अनचीन्हें
       लकीर खींचें खड़ें हैं
       खुले आसमानों में कलरव करते
       नाना प्रकार के पंक्षी
       अपनी सुमधुर ध्वनियों से
       धरोहरों के मानिंद दिल के गुत्थम-गुत्था
       को हल्का किये हुए हैं

       जरूरत के सारे उपादान
       दुःख, दर्द, पीड़ा और कसक के
       सानिध्य में बोझिल जीवन के
       संघर्ष को एक नये दिशा की ओर
       उन्मुख किया है

       कुदरत के रचे कानून में
       उलझे लेजुर की तरह इच्छाओं
       के गर्जन करते मेघदूती दुनिया में
       एक-एक निवाला लहू का हिस्सा बना
       बरअक्स सिसकते
       सांसों को वायु ने जीवंत किया है

3- बादल की घुड़की और बारिश की नादानियाँ


नेत्रों ने चुने
चलचित्री समाज में कई चरित्र हैं
कसक, आंसू, पीड़ा और पहाड़
जिनके करारों में सागर की लहरें
बादल की घुड़की और बारिश की नादानियाँ
सड़क की आहें, गलियों की बाहें
नीम के कसिले दरख्त और मीठे कोयले के बोल
ढ़ोल पिटते पपीहे की पीहू
चहक मचाते चुन-मून चिड़ियों के धुन से कंगन
पायल, बिछुआ, चूड़ी और भी तमाम चीजें
सब एक साथ सुनाई-दिखाई देते हैं
चट्टानों की ऊँची-ऊँची शिला पर
बैठे मोर, शेर और सूअर के भी रंग मिलते
सब होता जीवन की हरियाली
बन बसंत में गाते अपने में मस्त
अगर कुछ रह गया तो
ज्ञान के सागर से निकले कुछ सीप
जिनके न होने से अँधेरे का राज
दीपक को काला किये हुए
कई तंज देते कहते क्या कर लिया
कुहुंक बचा कर
मासूम बचपन रौंद दिया
रोजगार के चक्की में पीसकर चटनी सरीखे जिंदगी दिया
शिकवे-गिले के भूगोल में फसे हुए
फांसी के फंदे नसीब हुए
उस दिन के इन्तजार में जो कभी
इन नेत्रों ने चुने थे

4- जिन्हें भ्रम है



एक चिड़िया
फुदकती हुई एक चिड़िया
पगडंडियों के रास्ते निकल पड़ी
यात्रा के अनोखे भ्रमण में
उसके थिरकते मन पर पहरा न था
दुनिया की किसी बंदिश से वास्ता क्या
खुला आस्मां बिछौना
शहर के सारे वितान उसके थे
फर्गुदिया खेलते, उछलते, कूदते, और लुढकते
अपने अंतर के ख्यालों से
सूरज, चाँद के आंचल को नाप आई
हंसी-ठिठोली उसकी अपनी बोली
उसके इस क्रीड़ा से
चहकते तारे सब शर्माए
कभी-कभी सोचने लगती
क्या चढ़े यौवन की बहार ने उसे छला
उसकी मासूमियत ने
हैवानियत को नहीं परखा
छिछोरे ! बला की अदा कह खिल्ली उड़ाते
तमाम कंकरीट से भरे पूर्वानुमान के शिकार मानव मन
मदिरा में मदहोश लूट लिया
कोमल पंखुड़ियों के रेशे-रेशे को
पवित्र, शीतल, ज्वरजनित झूठ के कुंठा और अहम में
हौले-हौले उसके कसक ने महसूस किया
मुख लालिमा पीड़ा के खाई में डूबने लगा
शहर की ऊँची-ऊँची अट्टालिकाएं चुनती हुई
चार मीनार संस्कारों से टकराकर चूर-चूर
चरम अवस्था में चमक-धमक के आगे अँधेरे
चुभने लगे उसकी भोली चंचल आँखें
अन्याय के आंसुओं में भीगते हुए
सागर से खारे संवेदना हो गए
सदा के लिए खामोश होते हुए
अंतरात्मा चीखी चिल्लाई
फिर शांत लहरों की तरह
लेकिन, वह कब हारने वाली थी
कुलबुलाते, कराहते हुए
उठी, बोली !
सिंहनी सा दहाड़ते हुए
बहुत हो चुका फर्क-फर्क का खेल
जिस्म और जादू का तिलिस्म
अब टूटेंगी सारी वर्जनाएं
यातना की समस्त आकांक्षाएं
हम खिलौना नहीं हैं...
जो तिरस्कार के तीर बार-बार सहें
भ्रम तोड़ो तरुणाई के ज्वालामुखी हैं
एक थप्प से जलजला मचा देंगे
कभी दरकेंगे नहीं
धरणी हैं !
धरा के अंग-प्रत्यंग में भूचाल मचाएंगे
दरार बाती दीवार की तरह नहीं
दरख्तों के अटूट जड़ों के मानिंद
जड़वत हृदय के हिम पिघलाते हुए
नैनों में पश्चाताप के रक्त से धुँआ भर देंगे
जो देवदार सरीखे अहंकार के अंधकार हैं
उनके पुर्जे-पुर्जे हवाओं में उड़ा देंगे
जिन्हें भ्रम है
धरती आसमान को एक किये रहने का
हम चले हैं छिछले रास्ते से भले
लेकिन लम्बी सड़कों,चौराहों और चौहद्दियों पर
अनमिट नाम उकेरेंगे
फुदकना काम मेरा भले हो
फरहर मन से परचम फहराएंगे
अतीत के खिड़कियों पर लोरी नहीं गायेंगे
मौजूदा माहौल में इतिहास रचते हुए अमर हो जायेंगे


5- अरमानों के दिन


कुहासे के धुंधलके सफर में
उबड़-खाबड़ मोड़ से गुजरे दिन

वक्त के काफिले में यों हीं बहे
बरबस अश्कों के माला लिए

विराम चिन्हों से होड़ लगाती मृत्यु
संध्या के संग कानाफूसी करती रात-रानी

चाँदनी के दूधिया रंगों में खोये तारे
उजले दिन में गायब अल्पविराम

ऐसे में उत्कट प्रतीक्षा पूर्णविराम की
उच्छल लहरों में लहराए

लघु स्वरुप धारण किये अनोखे सपने
उड़ान भरतीं बहरुपिए किरणें

योजक चिन्हों से क्षण में कौंधते
विचारों के वीथिका में संधि के वर्ण

दूसरे ही पहर सीमट जाते
शबनमी दूब की नोकों पर

गिरते-उठाते ढेकी के धूं में रमें
भावों की अदभुत ज्वाला

छंद, लय, तुक और रस का विस्तार करते
अश्रुपूर्ण अरमानों के दिन

       6- कविता क्या है


       
       कविता क्या है
       उथल-पुथल शब्दों की लड़ियाँ
       कौंधते भावों की कड़ियाँ 

       अंत:पुर में छिड़े द्वंद की खिड़कियाँ
       आसमान में चमकते चाँद, सूरज या तारों की सखियाँ
       सुंदर यौवन से सुसज्जित प्रकृति की वेड़ियाँ

       खुद्बुदते बचपन की अटखेलियाँ
       जबान जनमानस की तुकबन्दियाँ
       तरकश में छिपे अंत:कलह की निशानियाँ

       जीवन, जीविका के सघन में घुले रंगरलियाँ
       उजाले की रानी, रात की मल्लिका मौलियाँ
       मुखड़े-दुखड़े और टुकड़े की गलबहियां
       बावले मौसम की बगल निरेखती बावलियाँ
       ड्योढ़ी पर ऊपर हवाओं की सहेलियाँ
       सौजन्य-सौंदर्य, सुमन-पुण्य की पुतलियाँ

       पंख बिखेरे पवन-झकोरें की झुमरियाँ

7- मुखिया


वह देखो एक मुखिया
घूँघट में घुटती एक दुखिया
आज भी अंगूठा लगाती
क्योंकि निरक्षता की शिकार
समाज की अन्धता ने पढ़ने न दिया
अंगूठे के पोरों से एक ठगिया
मर्दाने मर्म की शिकार
सिसकती शर्म की गुड़िया है
हया के आड़ में घुटती
दर्द सहती समय के साथ छलिया सी
सोचती है लेकिन समझ के पहरे
बर्फ से लगे हैं
छलिया ने छल लिया छदम आवरण ओढ़ के
मुखालफत करती कभी लगी ही नहीं
बस कठपुतली सी घुमती रही
अच्छे-बुरे हादसों से अनजान
स्याही स्पर्श में सहमति के सारे
रंग घोल देती है
मंथन के मुद्दे पर माथा नहीं भिड़ाती
बल्कि कोरे पन्नों पर अपने
काविलियत के झूठे कथा कहती है
व्यथा से अनभिज्ञ अनसुने सवालों से
जूझती है...
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  •  12 जुलाई 1982 को चंदौली जिले के छोटे से कस्‍बे चकियाँ के पास दिरेहूँ में जन्मीं डॉक्‍टर सुनीता ने ‘स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी पत्रकारिता : स्वरूप एवं प्रतिमान’ विषय पर बी.एच.यू.से पी-एच.डी.,नेट,बी.एड.की है.
  • अब तक अमर उजाला, मीडिया-विमर्श, मेट्रो उजाला,विंध्य प्रभा, मीडिया खबर, आजमगढ़ लाइव, समभाष्य, हिंदोस्थान, मनमीत, परमीता, काशिका, अनुकृति,  अनुशीलन, शीतलवाणी, लोकजंग, नव्या आदि में रचनाएँ, लेख–कहानी, कवितायें  प्रकाशित हो चुके हैं.
  • तनिष्क प्रकाशन से निकली पुस्तक विकास और मुद्दे में शोधपत्र प्रकाशित हुआ.
  • राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय सेमिनार/संगोष्ठी में शोधपत्र प्रेषित .
  • आकाशवाणी  वाराणसी में  काव्य वाचन.समय-समय पर अकादमिक शिक्षण के दौरान  पुरस्कृत.
  • तमाम पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशनाधीन हैं.
  • पेशे से हिंदी में सहायक प्रवक्ता,नई दिल्ली
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