कहानी- कभी हम भी तुम भी थे आशना - मणिका मोहिनी

यादें ज़रूर जिंदा रहती हैं पर चेहरे पहचान में नहीं आते क्योंकि उन पर उम्र की लकीरें चढ़ जाती हैं और वो पहचाने न जाने की हद तक बदल जाते हैं।
तुम्हें आज देखा। मैं पहचान नहीं पाई। यदि तुम्हारा ठहाका न बजता तो सचमुच तुम मेरे आगे से गुज़र जाते और मैं अनजान रहती। तुम्हारी आँखों पर चश्मा लग गया था और कानों के पास कलमों पर सफेदी उग आई थी। बीच में भी बाल छुटपुट सफ़ेद थे। मैं कैसे पहचानती ? इतने सालों के बाद जो देख रही थी। शक्ल बदल गई थी लेकिन तुम्हारे ठहाके की आवाज़ वही थी। बालों की उस सफेदी ने ही मुझे सोचने पर विवश किया कि आखिर कितने साल हो गए होंगे हमें मिले हुए ? यानि एक-दूसरे से बिछड़े हुए ? उम्र के तीसरे चरण में पहुँच चुके थे हम। आखिरी बार हम उम्र के पहले चरण के अंतिम पड़ाव पर मिले थे। बीच में पच्चीस-तीस सालों का अंतर था। इतना वक़्त बहुत होता है स्मृतियों से किसी की छवि मिटने के लिए। यादें ज़रूर जिंदा रहती हैं पर चेहरे पहचान में नहीं आते क्योंकि उन पर उम्र की लकीरें चढ़ जाती हैं और वो पहचाने न जाने की हद तक बदल जाते हैं।
याद है, तुम्हारी रूठने की आदत थी ? तुम बात-बात पर रूठ जाया करते थे। पर एक आदत तुममें अच्छी थी। तुम नाराज़गी के दिनों में चुप्पी साध लिया करते थे। जैसे यह कहावत सुनी हो, एक चुप सौ को हराए। फिर जब तुम्हारा गुस्सा थोड़ा शांत होता तो तुम बोलते थे। पुरानी कोई बात नहीं उठाते थे। जैसे नए सिरे से ज़िन्दगी शुरू।
यह महिला कौन है तुम्हारे साथ ? मैंने इसे पहले कभी नहीं देखा। स्वाभाविक है, कैसे देखती। ओह, इसकी मांग में सिन्दूर है और माथे पर बड़ी सी गोल बिंदी। तुम्हारा हाथ इसके कंधे पर है। ज़ाहिर है, तुम्हारी पत्नी होगी। मेरे मन में यह दर्द सा क्यों उठा ? नहीं, नहीं, इतने वर्षों के बाद अब कैसी ईर्ष्या ? पर तुमने अलग होते हुए कहा था कि तुम कभी विवाह नहीं करोगे ? और अगर करोगे भी तो मुझ से ही करोगे। देखो मैं तुम्हारे इंतज़ार में अब तक बैठी हूँ, क्वारी। मैंने निभाया अपना वचन। कसक सिर्फ इस बात की है।

हमने कितने वर्ष साथ बिताए, आज गिनती क्या करूँ ? लगता है, जैसे हम बचपन से साथ ही पले-बढे थे। वह बचपन नहीं तो और क्या था। इतने बड़े तो नहीं थे हम। पढ़ रहे थे, न जाने कौन सी क्लास में। पता होता कि तुम इतने साल बाद इस तरह कभी दिखोगे तो याद भी रखती। अब मेरी भी तो उम्र हो रही है। भूलने लगी हूँ चीज़ें। वैसे याद है, भूलने की एक कला तुमने भी सिखाई थी, कि जो बातें हमारे काम की नहीं, उसी समय दिमाग को कह दो कि हमें इन्हें याद नहीं रखना, इस तरह वो बातें अपने आप दिमाग से मिट जाती हैं। यह बड़ा नायाब तरीका था और हम इसे पढ़ाई के दौरान आजमाया करते थे और इस तरह पढ़ाई से इतर काफी बातें हम भूलने की कोशिश किया करते थे। भूल भी जाते थे। मेरे लिए भी अब उन पुराने दिनों को याद रखना क्या मायने रखता था, तो चला गया होगा दिमाग को स्वतः सन्देश। आज तुम दिखे हो तो फिर से ध्यान आये वो मस्ती भरे दिन, वह खेल-खिलाड़े, वह एक-दूसरे को चिढाना-खिजाना।

याद है, तुम्हारी रूठने की आदत थी ? तुम बात-बात पर रूठ जाया करते थे। पर एक आदत तुममें अच्छी थी। तुम नाराज़गी के दिनों में चुप्पी साध लिया करते थे। जैसे यह कहावत सुनी हो, एक चुप सौ को हराए। फिर जब तुम्हारा गुस्सा थोड़ा शांत होता तो तुम बोलते थे। पुरानी कोई बात नहीं उठाते थे। जैसे नए सिरे से ज़िन्दगी शुरू।
वह कौन सी किताब थी ? याद नहीं। शायद तुम्हारी थी। शायद कोई उपन्यास था। तुम भी पढना चाहते थे और मैं भी। एक ही समय में। छीना-झपटी में वह किताब फट गई थी और तुम्हारा गुस्सा सातवें आसमान पर था लेकिन तुम मुझे वहीँ किताब के फटे हुए पन्नों के साथ अकेला छोड़ कर चले गए थे और फिर पूरा हफ्ता नहीं मिले थे। मैंने कई बार कोशिश की थी कि तुमसे मिलूँ, तुम्हें मनाऊँ, लेकिन क्या मजाल, जब तुम गुस्से में हों तो तुम्हारे दर्शन भी हो जाएं। इस समय सोच रही हूँ, यह एक आदत तुममें शायद अच्छी ही थी। तुम्हारे वैवाहिक जीवन में तुम्हारे कितने काम आ रही होगी। इस प्रकार की समझौता प्रवृत्ति वाकई कितनी आवश्यक है, सुखी जीवन जीने के लिए, खासकर वैवाहिक।

तुम्हें भी यह याद होगा, उस समय हम इतने भी बच्चे नहीं थे। कॉलेज में पढ़ रहे थे। पर हम कितनी फालतू की बातें किया करते थे। बस बोलना, बोलना और सिर्फ बोलना। बोलने का कितना शौक था तुम्हें और मुझे दोनों को। बोलने की लत हो जैसे हमें। आज देखो, मैं कितनी चुप्पा गई हूँ। मुझे बोलना अच्छा ही नहीं लगता, किसी से भी। तुम्हारा पता नहीं। तब हम कितने फालतू थे सच। हमारे पास वक़्त ही वक़्त होता था। याद है, एक बार तुमने कहा, आओ, घर-घर खेलते हैं। और हम बच्चों की तरह घर-घर खेले। पूरा दिन घर-घर खेलते रहे। मैंने कहा था, ' हम प्यार से घर में रहां करेंगे।'

तुमनें कहा था, ' ज़रूर।'

मैंने कहा था, ' हम कभी लड़ाई नहीं किया करेंगे।'

तुमनें कहा था, ' ज़रूर।'

मैंने कहा था, ' देखो, हम घर का काम मिल-जुल कर किया करेंगे।'

तुमने पूछा था, ' जैसे ? '

मैंने कहा था, ' तुम रसोई के काम में मेरी मदद किया करोगे।'

तुमनें पूछा था, ' जैसे ? '

मैंने कहा था, ' तुम सब्जी काटोगे, मैं सब्जी बनाऊँगी।'

तुमने कहा था, ' ऐसी मदद ? '

मैंने कहा था, ' हाँ, तुम आटा गूंदोगे, मैं रोटी बनाऊँगी।'

तुम जैसे चीख पड़े थे, ' क्या ? तुम मुझसे यह काम करवाओगी ? मैं ऑफिस जाया करूंगा या यह काम करूंगा ? '

मैंने भी चीख कर कहा था, ' मैं भी तो ऑफिस जाया करूंगी।'

तुमनें उतनी ही कर्कश आवाज़ में कहा था, ' यह लड़कियों के काम हैं। तुम्हें करने होंगे।'

मैंने कहा था, ' आजकल लड़के लडकी सब बराबर हैं। तुम्हें भी घर के सारे कामों में मेरा सहयोग करना पड़ेगा।'

बस तुम फिर रूठ गए थे। और फिर हफ्ते भर की छुट्टी हो गई थी। पता नहीं, तुम इसके साथ क्या सहयोग करते होंगे ? करते होंगे भी या नहीं ? यह नौकरी करती होगी या नहीं ? कौन जाने ?

पर आज अचानक यह बात याद आई तो मुझे हंसी आ गई है। इस रूठने-मनने के बीच हमारा प्यार गहरा होता गया था। यूं नो, फस्ट लव इज द लास्ट लव। हम लगाव के उस धरातल पर पहुँच गए थे, जहां कसमों-वादों की शुरुआत हो गई थी। मुझे लगने लगा था, मैं तुम्हारे बिना जी नहीं पाऊंगी। तुम्हें भी ऐसा ही कुछ। और हमने पूरे होशोहवास में वादा किया था कि हम शादी करेंगे तो एक-दूसरे से ही, अन्य किसी से नहीं।

हमारी पढ़ाई ख़त्म हो चुकी थी। अब हमें अपना-अपना कैरियर बनाने की चिंता थी। हम अलग-अलग नौकरी की संभावनाएं तलाश कर रहे थे। तुम्हें अमेरिका से एक अच्छा ऑफर आया था। तुम अमेरिका चले गए थे। मुझे अपने ही शहर में एक पत्रिका में सहायक की नौकरी मिल गई थी। तुमनें जाते हुए कहा था, ' हम फिर मिलेंगे।' मैंने भी सोचा था, हम फिर मिलेंगे। लेकिन उसके बाद हम कभी नहीं मिले। मिलते भी कैसे ?
तुम वहाँ जाकर ऐसे व्यस्त हुए कि सालों तुम्हारा अपने देश आना ही नहीं हुआ। कुछ अरसा खतोकिताबत चली लेकिन धीरे-धीरे तुम अपने काम में व्यस्त होते गए और मैं अपने। सच पूछो तो हमारी प्राथमिकताएं भी बदलने लगी थीं। तुम अमेरिका में अपने पाँव जमाने की कोशिश में लगे थे। तुम्हारे विचार में अमेरिका में बसना उन्नत होने की एकमात्र निशानी थी। मैं पत्रकारिता में अपना कैरियर बनाना चाहती थी। अखबार, पत्रिकाएँ, लिखे हुए शब्द मेरे मस्तिष्क में घूमते रहते, मेरा पीछा करते रहते। हमारे बीच का सम्मोहन धीरे-धीरे टूटने लगा था। हमारा कभी खेला हुआ ' घर-घर ' खेल भी मुझे यह समझाने के लिए पर्याप्त था कि तुम्हें एक कन्धे से कन्धा मिला कर चलने वाली पत्नी की नहीं बल्कि घर के रख-रखाव के लिए, घर की साज-संवार के लिए एक ऐसी औरत की ज़रुरत थी जो पत्नी का दर्ज़ा हासिल तो करे लेकिन तुमसे उस अधिकार से कोई डिमांड न करे। जो जितना तुम उसे दो, वह उतने में ही खुश रहे। आजकल के ज़माने में तुम जैसे पति कहाँ चल पाते हैं ?

सच जानो, मैंने मुश्किलों से अपने मन को सम्भाला था और तुम्हारा इंतज़ार करना छोड़ दिया था। जिस गाँव नहीं जाना, उस के कोस क्या गिनने ? लेकिन यह भी सच जानो कि मन से तुम्हे छोड़ देने के बाद भी मन तुममें ही अनुरक्त था। बहुत मुश्किल होता है, किसी को पहले मन में बसा कर उसे मन से निकालना। मन किसी को दिखता नहीं और मन की बातें किसी को समझ में भी नहीं आतीं। बड़ी अबूझ पहेली है यह मन। मन के बहकावे में कोई न आए।

मैं एक सर्जनात्मक लेखन की पत्रिका से जुडी थी। सोचती थी, कभी मैं भी कोई कहानी लिखूंगी, अपने प्यार पर, तुम पर। लेकिन कहानी लिखना हरेक के बस की बात तो नहीं। कई कहानियाँ मन में जन्म लेती रहीं और मरती रहीं परन्तु कागज़ पर नहीं उतरीं। आज तुम्हें देखा तो फिर से यह ख्याल आया है कि मन में भावनाएं आज भी जीवित हैं, एक खूबसूरत कहानी तो लिखी ही जा सकती है। लिखनी ही चाहिए मुझे। मानसिक धरातल पर जिया हुआ पूरा एक संसार था मेरे पास, जिसमें मिलन था, प्यार था, बिछड़न थी, बिछोह का अकेलापन था, पीड़ा थी, आंसू थे, सबकुछ था। पर फिर ख्याल आया, हम पुराने हो चले हैं। हम यानि मैं और तुम। हम दोनों अब पुराने हो गए हैं। यानि बूढ़े..... बुजुर्ग..... वरिष्ठ..... अब हमारी कहानी क्या ? जब जीने में ही कोई मज़ा नहीं रहा तो कहानी में क्या मज़ा ? यूं जीने में मज़ा तो जब युवा थे, तब ही ख़त्म होने लगा था। लेकिन फिर भी मज़े की खोज थी। आनंद की तलाश थी। परम आनंद और चरम आनंद को ढूंढ रहे थे हम कि कहीं मिल जाए तो मज़े से जीएं। हमारी खोज में वक़्त निकलता गया। हम आगे बढ़ते गए। साथ-साथ हमारी उम्र भी आगे बढती गई, पर वह आनंद नहीं मिला। उसे खोजते-खोजते हम इतना थक गए कि चूर-चूर हो गए और हमारे बीच एक मज़बूत दीवार खड़ी हो गई। मुझे तो अब कुछ याद भी नहीं। मैं यह भी नहीं जानती थी कि तुम्हे भी कुछ याद है या नहीं। ऐसी बातें कभी भूलती तो नहीं। तुमने भी अगर भुलाया होगा तो कितनी तकलीफ से भुलाया होगा। शायद तुम्हारे मन में भी यह आया हो कि मुझ जैसी कैरियरिस्ट लड़की के साथ ज़िन्दगी आराम से नहीं जी जा सकती। मुख्य है, ज़िन्दगी जीना, भविष्य सुरक्षित करना। दिल को तो आदमी कैसे न कैसे संभाल ही लेता है। दिल के दुखों की यही तो खासियत है कि चेहरे पर एक हल्का सा नकाब और पूरी पर्दादारी।

तुम्हें नहीं मालूम था कि मैं तुम्हें कितनी देर से देख रही थी। तुम्हें उम्मीद भी नहीं होगी कि मैं वहाँ हो सकती हूँ। अचानक तुमने पीछे मुड़ कर देखा था। एक क्षण को ठिठके हों जैसे। जैसे एक पहचान सी तुम्हारी आँखों में उभरी थी। तुम्हें भी तो वक़्त लगेगा मुझे पहचानने में। उम्र की लकीरें मेरे चेहरे पर भी तो घनीभूत थीं। तुम्हारा हाथ अभी भी उस औरत के कंधे पर था। मेरे मुरझाए हुए दिल में एक आखिरी कसक उठी थी। कभी हममें तुममें भी राह थी, कभी हममें तुममें भी चाह थी, कभी हम भी तुम भी थे आशना, तुम्हें याद हो कि न याद हो। तुमने फिर मुड़ कर देखा था। जैसे सचमुच मुझे पहचान गए हों। तुम्हारा हाथ ठिठक कर उस औरत के कंधे से हट गया था। जैसे मेरे तुम्हारे बीच अभी भी कोई रिश्ता हो और उस रिश्ते का तुम्हारे दिल में सम्मान हो। ओह, तुम्हें अभी भी कितना ख्याल था मेरा। मैं बिना किसी रिश्ते के भी उस एक पल में तुम्हारे साथ जीवन का सबसे बड़ा रिश्ता जी गई थी, प्यार का रिश्ता। दिल का रिश्ता।

मणिका मोहिनी एक प्रसिद्ध कहानीकार और कवयित्री है । कविता-कहानी की 15 पुस्तकें प्रकाशित, कुछ वर्षों तक 'वैचारिकी संकलन' हिन्दी मासिक का सम्पादन-प्रकाशन, लगभग 12-13 वर्षों के अन्तराल के बाद अब पुनः लेखन।


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