सोमवार, फ़रवरी 11, 2013

दो कवितायेँ - अनुपमा तिवाड़ी

अनुपमा तिवाड़ी 

युवा कवियित्री व सामाजिक कार्यकर्ता, जयपुर ( राजस्थान)
एम ए ( हिन्दी व समाजशास्त्र ) तथा पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नातक ।
पिछले 24 वर्षों से शिक्षा व सामाजिक मुद्दों पर काम करने वाली संस्थाओं में कार्य रही हैं। वर्तमान में अज़ीम प्रेमजी फ़ाउंडेशन राजस्थान में संदर्भ व्यक्ति के रूप में कार्यरत ।
देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में अनेक कवितायें व कहानियाँ प्रकाशित। प्रथम कविता संग्रह "आईना भीगता है" बोधि प्रकाशन जयपुर से 2011 में प्रकाशित ।

बहुत हुआ अब


बस करो !!
बहुत हुआ अब
खत्म नहीं होती क्रूरता,
आदम की।
कहते हैं, मृत्यु के बाद सब खत्म।
पर यह खत्म कब होगा ?
सिर काट कर ले जाना भी किसी देशभक्त का
अपने को देशभक्त कहलवाने के लिए क्रूर हँसी जैसा है।
विजय पताका फहराने के समान है।
वो आदम, सिर काट कर ले जा सकता है
पर, मृत्यु के बाद भी
एक माँ को सिर चाहिए अपने बेटे का
एक पत्नि को अपने पति का
एक बच्चे को अपने बाप का।
आदम, बलात्कार कर फेंक सकता है
किसी स्त्री देह के टुकड़े, जंगल में
जो मृत्यु के बाद भी शिनाख्त न कर पाए उसकी
ओह ! इंसान तुम धरती पर आओ
तुम्हारे चोले बिक रहे हैं,
यहां बाजार में
कुछ सस्ते, कुछ महंगे।
चोले के अंदर का आदमी मार सकता है, हिस्सा
बच्चों, दलितों, आदिवासियों, गरीबों और स्त्रियों का
चमकाता है वो हर दिन चेहरा
खून पी - पीकर
पर दिल की कालिमा उसके चेहरे पर आती जाती है
तुम देखना
ज़रा गौर से उसका चेहरा ।

लिखो फिर से नई इबारत


लिखो फिर से
नई इबारत,
अपने होने की।
जांचते रहना उसे,
जो लिखा
तुमने अभी तक।
क्योंकि कहीं - कहीं जो तुमने बोला
उसे लिखा नहीं
लिखना होता है
सदैव बाद में
लिखा, प्रमाण होता है।
यह जिंदगी भी कुछ ऐसी ही है
तुम बोलते हो
यह लिखती है
दिन - दिन
दर, पन्ना - पन्ना
जिंदगी के पन्नों को लोग बाँचते हैं।
इसलिए अपने बोलने से ज्यादा
इसे लिखने देना
चिंता मत करना
यह तुम्हारे संकेत भर को समझ लेगी
वह गलत कभी नहीं लिखेगी
वह जिंदगीनामा लिखती है।
चुप रहती है
पर, बहुत बोलती है।

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