कहानी : रेप मार्किट (अगला भाग)- गुलज़ार #Gulzar Story final part

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पहला भाग

दूसरा भाग

        वो स्टेशन पर उतरते ही ऐसे उठा ली गई जैसे कोई फुटपाथ पर पड़ा सिक्का उठा ले!       ट्रेन रुकी ही थी कि एक आदमी ने बिना जान-पहचान के आगे बढ़कर ट्रंकी हाथ से ले ली. प्लेटफार्म पर रखी और बोला:
      “रजि़या की बहन हो?”
“हूं!” उसे कुछ ठीक नहीं लगा फिर भी गर्दन हिला दी. “हां”
      “छोटू बीमार है, अबुल. इस लिए नहीं आ सकी.”
      “और भाईजान...?”
      आदमी ने एक लंबी आह ली और बोला: “घर चल कर देख लेना.”
      ये कह के उसने ट्रंकी उठा ली. एक पोटली ज़किया के हाथ में दी और खुद आगे-आगे चल दिया. उसने फिर पूछा–
      “क्या हुआ है भाईजान को?”
      “उन्हें तो चार महीने हुए रजि़या को छोड़े. एक दूसरी के साथ रह रहे हैं. वो भी उसी चाली में! चल...”और पता नहीं किस बरते पर उसने हाथ से पकड़ के टैक्सी में बिठाया और उड़ गया. गुम हो गया बंबई शहर में
      उसकी रिपोर्ट इंस्पेक्टर चितले (रघुवंश चितले) के पास आई थी तो उसने तस्वीर देखते ही कह दिया था:
      “इसे तो मैं ढूंढ़ लूंगा. ये माल बड़ी जल्दी मार्किट में बिक जाने वाला है– कहां बिकेगा ये भी जानता हूं.”
      “कैसे मालूम?”...उसके जूनियर ने पूछा था.
      “अरे भाई पूरे महाराष्ट्र में दिन के दो सौ साठ रेप होते हैं. एवरेज है हर पांच मिनट में दो और कभी-कभी ढाई.” वो हंसा, “कम से कम डेढ़ सौ की रिपोर्ट मेरी नज़रों से रोज़ गुज़रती है. ‘रेप मार्किट’ हम से अच्छा कौन समझेगा?”
      फिर जोर से हंसा–”ज़रा पता लगवाओ, ये तस्वीर छपवाई किसने है?”
      ये बात सिर्फ़ ड्राइवर और कंडेक्टर को मालूम थी कि पीछे से चैथी सीट पर बैठी अकेली सवारी एक महिला थी, जो सबसे आखि़र में उतरेगी. उसे शिवड़ी पहुंचना था. और वो ‘धानू रोड’ से चलने के बाद दिन में कई बार पूछ चुकी थी कि बस शाम को कितने बजे ‘दहेसर’ पहुंचेगी. क्योंकि वहां से बस बदल कर शहर बंबई में जाना था. उसका बेटा और शौहर वहीं बंबई की किसी फैक्ट्री में काम करते थे. रात
को देर हो गई तो कहां भटकेगी टैक्सी लेकर. उधर तो आटो भी नहीं चलता. “और भाई मेरे पास इतने पैसे नहीं है...टैक्सी के!”
      चौथी बार जब महिला ने ये बात दोहराई तो शाम हो चुकी थी. अंधेरा उगने लग गया
      गाड़ी अभी अपनी मंजि़ल से बहुत दूर थी. सिर्फ़ एक पसेंजर और था, और वो भी अपनी खिड़की में सर दिए ऊंघ रहा था.
      कंडेक्टर महिला के पास ही बैठ गया और बोला:
      “तू क्यों फि़क्र करती है बाई, बंबई तो सारी रात जगमगाती रहती है. तू खोएगी नहीं!...और बंबई तो अजीब बस्ती है, कोई खो जाए तो बंबई ख़ुद उसे ढूंढ़ के मंजि़ल पर पहुंचा देती है.”
बाई की कुछ समझ में नहीं आया. ज़रा-सी मुस्करा दी...बस!
      ड्राइवर ने आंख मारी. कंडेक्टर पास आया तो बोला:
      “बाई में नमक है...!”
      “हाथ-पांव टाइट हैं अभी तक.”
      “वो दूसरा कुंभकरण कहां उतरेगा?”
      अचानक खिड़की में सोया मुसाफि़र जाग गया.
      “विरार निकल गया क्या?”
      “हां...कब का...!”
      “अरे-अरे...रोको!”
      ड्राइवर ने फिर आंख मारी और गाड़ी रोक दी. जल्दी-जल्दी मुसाफि़र ने अपने थैले-बैग संभाले और उतर गया. इस बार कंडेक्टर ने आंख मारी.
      “साले को विरार से पहले ही उतार दिया.”
      एक ख़ामोश से हाथ पे हाथ मारा दोनों ने. आंखें कुछ और ही कह रही थीं. बाई अब अकेली थी बस में और वो भी कुछ-कुछ ऊंघ रही थी. अंधेरा बढ़ गया था. ड्राइवर ने ऊपर का आईना घुमा कर बाई के हाथ-पांव देखे, और ‘दहेसर’ से पहले ही एक वीरान-सी सड़क पर बस उतार दी.
      “मैडम-मैडम...मेम साहब!” इफ़ती ने उचक-उचक के उस जर्मन लड़की को अपनी तरफ़ रागि़ब कर लिया. वो होटल से निकली ही थी, इफ़ती फ़ौरन अपनी टैक्सी घुमा के पहुंच गया.
“इफ़टी!” मुस्करा के वो लड़की टैक्सी में घुस गई, और गर्दन उसके कान के पास लाकर बोली,
      “आई वांट टु वेयर बेंगल्ज़.”
      “व्हाट? व्हाट?” इफ़ती को थोड़े ही से अंगे्रज़ी के लफ़्ज़ आते थे. वो भी उसने इसी होटल से टूरिस्ट पकड़-पकड़ के सीख लिए थे. उस जर्मन लड़की ने अपनी बांहें दिखा कर समझाया, चूडि़यां! वो चूडि़यां पहनना चाहती थी. इफ़ती ख़ुश हो गया. कोलाबा से भिंडी बाज़ार! अच्छा भाड़ा बनेगा और तक़रीबन आधे दिन की सवारी तो पक्की हुई.
      “यस-यस...यस-यस.”
      उसके बाद पता नहीं वो गोरी कलाइयां घुमा के क्या-क्या कहती रही. साइज़ की बात कर रही थी या रंग की–लेकिन वो “यस-यस!” ही कहता रहा.
      “फ़ार!...वैरी फ़ार... !” उसने बांह झुला कर उंगलियों से तर्जुमा कर दिया. लड़की की मुस्कराहट और गर्दन ने रज़ामंदी दे दी. कई जगह पर वो इशारों से कुछ-कुछ पूछ लेती थी, और अगर यस-नो से काम नहीं चलता तो वो किसी भी बि¯ल्डग की तरफ़ इशारा करके नाम ले देता.
      “हाईकोर्ट...हाईकोर्ट...ब्लैक होरस, काला घोड़ा...काला घोड़ा वैरी फ़ेमस! मशहूर है! बहुत!” कहते हुए हाथ सर से ऊपर तक उठा देता.
      एक बात बड़ी ख़राब थी उस लड़की में, एक तो सिगरेट बहुत पीती थी, दूसरे हंसती बहुत थी और बात-बात पर ताली बजाने लगती थी. “गुड-गुड!”–बस इतना ही समझ आता था उसे. कभी-कभी आगे आकर उसके कंधों पर हाथ रखके जब कुछ पूछती तो होंठ उसके कानों को छू जाते थे. हटाना मुश्किल हो जाता.
      “अरे लोग देख रहे हैं यार. पीछे हट कर बात कर ना.”
      “व्हाट?” वो पूछती.
      “सिटडाउन...माई व्हील...बैलेंस नहीं रहता यार.”
      वो स्टैरिंग व्हील दाएं-बाएं झुला कर बताता.
      “यस...यस...!” वो कहती. चूडि़यां पहन कर वो लड़की बहुत खुश हुई. बार-बार उसकी आंखों के सामने बजाती और खिलखिला के हंस पड़ती. मुश्किल हो गई जब टैक्सी तक जाते-जाते उसने इफ़ती की बांह में हाथ डाल लिया था. सब देख रहे थे. फुटपाथ पर भीड़ थी, दूकानें थीं, और टैक्सी काफ़ी दूर खड़ा करके आना पड़ा था. उस पर एक और आफ़त आन पड़ी. एक बुकऱ्ापोश औरत नक़ाब उलटे, कुछ ख़रीद रही थी, उसके हाथ पकड़ लिए उसने.
      “इफ़टी...व्हाट इज़ दिस?...आई वांट दिस.”
      घबरा के औरत ने हाथ अंदर कर लिए. और वो उसके हाथ पकड़ के बाहर निकालने की जि़द करने लगी.
“शो मी...शो मी...प्लीज़.”
      “मैडम...दैट इज़ मेहंदी...मेहंदी...अब यहां से चलो, मैं लगवा दूंगा. कम...कम नाव!”
      अब इफ़ती की बारी थी. उसे हाथ से, कमर से, बांह से खींच के लाना पड़ा. सारा रास्ता वो रूठी रही.
      उसके बाद इफ़ती का भी मन ही नहीं किया कि टैक्सी निकाले. होटल के सामने ही गाड़ी लगा के सो गया...वो भी शाम को बाहर नहीं निकली. इफ़ती भी कहीं नहीं गया.
      अगली सुबह चार या पांच बजे का वक़्त होगा. आसमान अभी खुला नहीं था. इफ़ती की आंख खुल गई. वो जर्मन लड़की होटल से निकल रही थी. वो भी शायद रात भर जागी थी, या नाचती रही थी. हमेशा की तरह रात देर तक होटल में बैंड बजता रहा था. ज़्यादातर फि़रंगी रात को पी के नाचते रहते हैं. फिर देर तक सोते हैं. लेकिन हैलेन पता नहीं क्यों जल्दी उठ गई थी. उसने ख़ुद ही एक नाम दे दिया था उस जर्मन लड़की को.
      गेट पर खड़े हो के हैलेन ने इधर-उधर देखा तो इफ़ती ने हाथ हिला दिया. वो चिल्लाई, “हाये ए...”
      जब तक इफ़ती टैक्सी स्टार्ट करता वो आकर सामने की सीट पर उसके साथ ही बैठ गई.
      “लेट अस गो.”
      “किधर?...व्हैर...? मेहंदी के लिए बहुत जल्दी है.”
      “उसने घड़ी दिखाई और हथेली का इशारा किया.
      “ओह नो...सिली! चलो...मार्निग वाक इन टैक्सी.” फिर वही हंसी और ताली बजा कर बोली. “गेट वे इंडिया... चलो.”
      बहुत दूर नहीं था. वो कोलाबा में ही थे. इफ़ती चल तो दिया लेकिन वो ऐसी सट के बैठी थी उसके साथ–और स्कर्ट भी इतनी पतली कि बार-बार नज़र हटानी पड़ती थी.
      ‘गेटवे’ पर इतनी सुबह कोई था नहीं, लेकिन दो-तीन मोटरबोट वाले जाग रहे थे. ऐलीफें़टा की सवारी अक्सर पौ फटे मिल जाती थी. और अब रात भी हल्की होने लगी थी. उन लोगों ने इफ़ती को पहुंचते देखा था. एक ने दूर से आवाज़ भी दी थी–
      “ऐलीफेंटा–मैडम?”
      “नहीं-नहीं–यूंही घूमने आए हैं.”

अगला भाग

इफ़ती ने जवाब दिया था. हैलेन उतर के टहलती हुई समंदर के किनारे तक चली गई थी...और दीवार पे बैठ के सिगरेट जला दिया. इफ़ती ने झाड़न निकाला और गाड़ी साफ़ करने लगा. ज़रा देर में मोटरबोट वालों में से एक लड़का टहलता हुआ लड़की के पास से गुज़रा और सिगरेट मांगी. ‘‘सिगरेट...मैडम–गिव मी वन सिगरेट.’’
     ‘‘आफ़कोर्स!’’ मुस्करा के उसने एक सिगरेट निकाला. इफ़ती को हैलेन गै़र महफूज़ लगी तो वो अपनी गाड़ी से बाहर निकला. पर उसे दूसरे ने धकेल के वापस बिठा दिया.
     ‘‘बैठ नां श्याने! तेरा क्या ले रहा है? एक सिगरेट ही तो मांगा है. ये सब फि़रंगी साले गंजेड़ी होते हैं.’’
     ‘‘लेकिन वो गांजा-वांजा कुछ नहीं लेती.’’
     ‘‘तुझे क्या मालूम?’’ वो ऐसे खड़ा हो गया था उसके सामने कि इफ़ती उधर न देख सके.
     ‘‘सफ़ेदा पीते हैं सब. हशिश कहते हैं ये लोग...और गोविंदा तो चाल देखकर सूंघ लेता है.’’
     ‘‘गोविंदा कौन?’’ ‘‘वही, जो सिगरेट ले रहा है. चुटकी में भर देगा. पीती होगी तो मान जाएगी. नहीं पीती तो ना सही. घूमने निकली है, ना, मोटरबोट पे घुमा के ले आएगा.’’
     ‘‘वो जाएगी तब ना...कोई ज़बरदस्ती है?’’
     उसने बड़ी सख़्ती से इफ़ती का चेहरा अपनी उंगलियों में दबाया, ‘‘ज़बरदस्ती तो तू कर रहा है साले. शादी बनाने चला है क्या?’’
     इफ़ती ने हाथ छुड़ाने की कोशिश की. आंखों से पानी निकल आया. लेकिन वो ज़्यादा तगड़ा था. उसी वक़्त गोविंदा की आवाज़ आई:
     ‘‘अबे पट गई बे हरी. चलेगा मोटरबोट में?’’
     ‘‘हरी ने धक्का दिया उसे और भाग गया. इफ़ती खड़ा हुआ तो देखा वो मोटरबोट में जाने के लिए सीढि़यां उतर रही थी. वहीं से आवाज़ दी–
     ‘‘इफ़टी... वेट फार मी...कमिंग.’’
     गोविंदा ने हाथ पकड़ के उसे मोटरबोट में ले लिया. हरी कूद के दाखिल हो गया, और फटफटाती हुई मोटरबोट बीच समंदर की तरफ चल दी. इफ़ती अपनी आंखें पोंछता हुआ देर तक उसकी तरफ देखता रहा. अंधेरे में मोटरबोट की आवाज़ दूर जा रही थी.
  
     सात सालों में छह औलादों ने निचोड़ के रख दिया जमीला को. और ज़हूर मियां की शहवत किसी तरह कम न हुई थी... .इत्ती भी शर्म न करते थे.
     ‘‘अल्लाह मियां की बरकत है. वो दे तो हम ना कहने वाले कौन?’’
     दोस्त-यार आस-पड़ोस वाले ताने देते थे, ‘‘बस करो मियां तुमने तो मशीन लगा रखी है. अरे इस बेचारी का भी ख्याल करो...!’’
     बड़ी शैतानी नज़र आती उनकी हंसी में जब कहते, ‘‘कोई बात नहीं, थक जाएगी तो दूसरी ले आएंगे.’’
     बस इसी बात से डरती थी जमीला! कहीं किसी दिन ये मसखरी सच न साबित हो जाए. पुरानी सी बस्ती में पुराने दिनों के किरायेदार थे. तीन मंजिला बिल्डिंग की तीसरी मंजिल पर तीन कमरों का घर था. ...और नौ जने रहते थे. छह औलादें, एक जमीला की बूढ़ी मां और दो वो खुद मियां बीवी!
     ज़हूर मियां जिस्म के तगड़े थे, और मेहनत कश भी. सारा दिन हाथगाड़ी में सामान ढोते थे. दूकान से गोदाम तक और गोदाम से दूकान तक. सेठ खुश था. अच्छा खासा कमा लेते थे. बच्चों के कपड़े लत्ते के लिए तो थान के थान ही ले आया करते थे. गली में खेलते अपने बच्चों को उनके कपड़ों ही से पहचान लेते थे. नाम याद थे. उंगलियों पर गिन सकते थे. उन्हें देख के नाम नहीं बता सकते थे. सब एक ही फैक्ट्री से निकले लगते थे. और जमीला से कह भी रखा था, ‘‘एक वक्त में एक ही थान के कपड़े पहनाया करो. वरना कोई भी लौंडा साला अब्बा-अब्बा कह के जेब में हाथ डालता है और पैसे ले जाता है.’’
     अम्मी के मना करने पर भी उनके लिए महीने दो महीने में कोई न कोई जोड़ा ले आया करते थे. और जमीला के लिए तो हमेशा इफरात ही रही. किसी तरह की कमी न होने दी. बहुत मुहब्बत करते थे बीवी से. इस मुहब्बत ही का नतीजा था कि सात सालों में छह औलादें पैदा कर दीं.
     मर्दों की निस्बत औरतें आपस में ज्यादा बेबाकी से बात कर लेती हैं. जमीला को भी आसपड़ोस वालियां समझाती थीं, ‘‘बीवी, उसकी नसबंदी कराओ या अपनी कोख निकलवा दो. वो तो बाज़ नहीं आने वाले.’’
     ‘‘पिंड छुड़ाना भी तो सीखो. दूसरी लाना है तो ले आए. कुछ दिन उसे भी ये पेट गाड़ी खींचने दो.’’
     औरतें हंस देतीं. लेकिन जमीला का मुंह सूख जाता. एक ने भली राय दी, ‘‘बच्चों में सोया करो. पास आए तो चुटकी काट के जगा दिया करो. अपने आप झाग बैठ जाएगी...’’ और फुसफुसा के हंस दी. जमीला से कुछ भी न हुआ.
     उस रोज जब वो देर तक नहीं आया तो अम्मा को शक हो गया. वो लक्षण समझती थी. इशारे से बेटी को तंबिह कर दी.
      ‘‘दोस्तों यारों में कहीं पीने पिलाने बैठ गया होगा. तू बच्चों में जाकर सो जाना.’’
      ‘‘और भूखे लौटे तो?’’
      ‘‘भूखा तो आएगा, पर तुझे खाएगा आके. उल्टा तेरा पेट भर देगा.’’
     जमीला समझ तो गई पर मां के सामने ये कह के अंदर चली गई:
     ‘‘खाना भर के रख देती हूं चूल्हे के पास. गर्म रहेगा.’’
     और वही हुआ. ज़हूर मियां कि़माम भरा पान चबाते हुए घर में दाखिल हुए. हलकी-सी लग़जि़श थी कदमों में. जूते उतार के दबे पांव कमरे में दाखिल हुए तो जमीला को दो बच्चों के बीच सोता पाया. गला दबा के आवाज़ दी–‘‘जमीला...’’
     वो हिली नहीं. ज़हूर मियां ने एक बगल के बच्चे को उठा कर पलंग वाले बच्चों में डाल दिया और जमीला के पास आकर लेट गए. मुंह अपनी तरफ किया तो वो उठ के बैठ गई.
     ‘‘क्या करते हो?...खाना रखा है जाके खालो ना.’’ वो इतने ज़ोर से बोली थी कि ज़हूर मियां ने उसके मुंह पर हाथ रख दिया.
     ‘‘आहिस्ता बोलो–बच्चे जाग जाएंगे.’’
     अम्मा पहले ही से जाग रही थी. एक बार जी चाहा कि उठकर चली जाए कमरे में और कह दे कि बे-मौत मत मार जमीला को. लेकिन उसे याद था कि एक बार नसीहतन कुछ कहा था तो ज़हूर मियां ने मुंहतोड़ सुना दी थी, ‘‘बीच में मत बोला करो अम्मां. भूलो मत तुमने ग्यारह औलादें जनी थीं और ये नवीं थी–जमीला!’’
     अम्मां बिस्तर पे उठके बैठ गई. कुछ देर तक सरगोशियों की आवाज़ें आती रहीं और फिर एक थप्पड़ की आवाज आई. डरते-डरते अम्मां उठके दरवाज़े तक गई तो देखा ज़हूर मियां जमीला के मुंह में कपड़ा ठूंसे उसे सीढि़यों से छत की तरफ घसीटता हुआ ले जा रहा था.
  
     इंस्पेक्टर वागले सोच रहा था लड़की बड़ी चिकनी है. आंसू बहते चले जा रहे हैं और गालों पे रुकते भी नहीं. बीच-बीच में वो पोंछती तो उसे डर लगता कहीं गाल का तिल भी न धुल जाए. जो कह रही थी उसकी तरफ वागले का कोई ध्यान नहीं था. रोज़मर्रा का किस्सा है. स्कूल से भाग के एक दोस्त के साथ नेशनल पार्क में घूमने गई थी. वहां तीन-चार गुंडों ने चाकू दिखा के धर लिया. लड़के को पीट घसीट के दूर ले गए और एक ने उसकी...क्या कहते हैं....इज्ज़त उतारने की कोशिश की. लड़की थी कम उम्र की, लेकिन लगती नहीं थी. पक चुकी थी. वरना स्कूल से भाग के नेशनल पार्क में घूमने क्यूं गई थी. वो भी दोपहर में!
     ‘‘क्या उम्र है तुम्हारी....?’’ उसने अचानक पूछ लिया.
     ‘‘फ़ोरटीन...!’’ ‘‘फ़ोरटीन क्या...?’’ उसकी आवाज़ में धमक थी.
      ‘‘चैदह साल.’’ ‘‘नेशनल पार्क में क्या करने गई थी?’’ ‘‘यूंही...घूमने...ज्येन्ती के साथ...मेरा दोस्त...’’
     ‘‘स्कूल से भाग के?’’
     वो चुप रही. ‘‘मां-बाप को मालूम है?’’
     ‘‘नहीं!’’
     ‘‘ख़बर करूं...? नंबर क्या है घर का?...’’
     आंसू अभी-अभी पोंछे थे–फिर बहने लगे. लड़की ने सहम के हाथ जोड़ लिए.
     ‘‘उन्हें मत बताइए–प्लीज़!...ज्येन्ती को बचाइए.
     वो लोग मार डालने की धमकी दे रहे थे.’’
     इस बार वागले उठके उसके साथ वाली कुर्सी पर आकर बैठ गया और अपने हाथ से गाल का तिल पोंछ के देखा–वो मिटा नहीं.
     लड़की को हाथ से पकड़ के थाने के पीछे एक खोली में ले गया. ‘‘तू बैठ यहीं. मैं राउंड मार के आता हूं. मिला तो उसे भी लेकर आता हूं. और किसी हवलदार से बात नहीं करने का–क्या?’’
     जाते हुए बाहर से कुंडी मार दी. हवलदार से कह दिया, ‘‘देखना शोर नहीं करे!’’
     मोटरसाइकिल पर पार्क का राउंड मारते हुए वागले ने कोई चेहरा नहीं देखा. सिर्फ़ उसी चिकनी का चेहरा नज़र में घूमता रहा. ज़्यादा देर करना भी ठीक नहीं था और बहुत जल्दी लौटने में भी बात बिगड़ जाती. रानों में मोटरसाइकिल दबाए वो दो राउंड मार गया. घंटे भर के बाद लौटा तो सीधा दफ़्तर में गया. रजिस्टर उठाया और हवलदार से कहा:
     ‘‘ख़्याल रखना मैं लड़की का स्टेटमेंट लेने जा रहा हूं.’’
     हवलदार ने खड़े-खड़े करवट ली. ‘‘उधर मत जाइए साहब, बड़े साहब आए हैं.’’
     ‘‘कौन?...चितले?...’’
     ‘‘जी! वहीं खोली में हैं.’’ वागले ने मां की गाली दी.
     ‘‘वहां क्या कर रहा है?’’
     हवलदार के होंठों तले एक डरी-सी मुस्कराहट कसमसा रही थी:
     ‘‘स्टेटमेंट ले रहे हैं. आधा घंटा हो गया. दरवाज़ा अंदर से बंद है.’’
     
साभार हंस फरवरी २०१३
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1 comments :


  1. झुकी झुकी सी नज़र ...
    कोई बदहवास सा ख्याल आया ...
    मजलूम दर्द को ज़माने ने अफ़साना बनाया ..... ~ प्रदीप यादव ~

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