गोल्डी साहब के साथ होली - दिलीप तेतरवे


दिलीप तेतरवे
४२३, नई नगराटोली
रांची (झारखण्ड)
ईमेल: diliptetarbe2009@gmail.com

गोल्डी साहब के साथ होली- व्यंग्य कथा


    होली अब क्या खेलें, कैसे खेलें, क्यों खेलें...क्या मैं अकेले होली खेल सकता हूं? होली खेलने के लिए मित्र चाहिए, सुन्दर पड़ोसन चाहिए...मैं जब गाऊँ-रंग...बरसे भीगे चुनरवारी रंग बरसे...तो साथ में ठुमकने के लिए कोई अल्हड़ हो...कोई कुल्हड़ हो...वह अपनी भीगी चुनर मेरे साथ साझा करने के लिए राजी हो...पर यह सब तो साहब, ख़्वाब सा है...

    साहब, किसी को मेरे बारे में कोई ग़लतफ़हमी ने हो इस लिए मैं यह बता देना जरूरी समझता हूं कि लंबे समय तक साहबों के अंडर काम करने के कारण ‘साहब’ मेरा तकिया कलाम हो गया है...और एक साहब हैं, गोल्डी साहब, जिनके कारण ही मेरी होली एक विशेष तरह के कंप्लेक्स में ही गुजरती रही है...

    साहब, अब एक बात और बता दूं कि गोल्डी साहब के अलावा मेरे जितने भी पड़ोसी हैं, वे भी सच्चे और पक्के साहब हो गए हैं. कोई किसी से कम नहीं हैं. सब के सब अपने रंग में नहाए-धोए हैं. अपने आप में सिमटे हैं. कसे और तने हैं. सबके सब एक से बढ़ कर एक रंगदार हैं. रंगे सियार हैं. उनको होली के रंग में रंगा नहीं जा सकता या उनको लगता है कि होली के रंग में रंगना, थर्ड ग्रेड या फोर्थ ग्रेड के कर्मचारियों की गिरी हुई मानसिकता का रिजल्ट है...

    साहब, कल मुझे मिल गए गोबर्धन जी जो मेरे स्कूल के ज़माने के बैकबेंचर दोस्त थे...थे इस लिए कि वे दोस्त से आगे बढ़ कर, अब वे साहब बन गए हैं...और फिर भी गाते नहीं हैं-साला मैं तो साहब बन गया...बस, सामने पड़ते ही वे मुझे ऐसे देखते हैं, जैसे किसी अनचाहे कीड़े या मकोड़े को देख लिया हो...और ऐसे अवसरों पर अपने बंगले के अन्दर जाते ही, वे अपनी आखें जरूर मिनरल वाटर से धोते होंगे, अपनी आखों की पवित्रता बचाने के लिए...

    साहब, अब मेरे वह दोस्त, अपना शॉर्ट नेम गोबरवा सुनना पसंद नहीं करते हैं...उनकी मेम साहिबा ने उनका नया नामकरण कर दिया है-गोल्डी साहब...और भाभी जी स्वयं लक्ष्मी से लूसी मैम हो गई हैं...उनका बेटा पल्टुआ अब प्लेटो बाबा कहलाता है, उनकी बेटी कलिया मिस किट्टी बन गई है...अब ...उनके आउट रूम से ब्रह्मा, विष्णु और महेश की तस्वीरें हट गईं हैं और उनकी जगह कई सुन्दर मॉडलों की तस्वीरें सज गईं हैं...

    साहब, गोल्डी साहब और लूसी मैम के बंगले में या उनके बेड रूम में, कोई बिना परमिशन के अन्दर जा सकता है तो वह खुशनसीब है, उनका प्यारा डूजो, एक जर्मन नश्ल का हिटलरी कुत्ता. पिछली होली में मैंने सोचा कि अपने कंप्लेक्स से उबरते हुए गोल्डी साहब से मिल ही लूं, लेकिन न तो उनके गेट पर खड़े गार्ड ने और न डूजो ने मुझे गेट के अन्दर जाने की परमिशन दी...डूजो ने तो इतना शोर मचाया जैसे, कूड़े के ढेर पर चुनने वाले बच्चों को देख कर लोकल कुत्ते आसमान सिर पर उठाते हुए अपने क्षेत्र और अधिकार के लिए भौंकते हैं, गुर्राते हैं, नुकीले दांत दिखलाते हैं और हड़काने वाली दौड़ लगाते हैं और झपट्टा मरने का पोज दिखाते हैं...

    साहब, मैंने गोल्डी साहब की प्राइवेट सेक्रेटरी मिस लवली से कई बार फोन पर बात की और अपना लंबा परिचय दे कर मैंने उसे बताया कि गोल्डी साहब मेरे लंगोटिया दोस्त हैं, मेरा उनसे मिलने का टाइम फिक्स कर दो...लेकिन, उसको मेरे एक शब्द ने ज्वालामुखी बना दिया. वह टॉप पिच पर बोली-“आपको बात करने की जरा भी मैनर नहीं है...आप एक लड़की से पहली बार ही बात करते हुए, लंगोटी की बात करने लग गए...यू आर वेरी फ़ास्ट स्टूपिड...” साहब, अब यह मेरी समझ के बाहर है कि मैं कितनी बार फोन पर मिस लवली से कितनी बार बात करने के बाद, कहता कि गोल्डी साहब मेरे लंगोटिया यार हैं...खैर, पिछली होली मैं गोल्डी साहब से मिल नहीं पाया...और स्टूपिड की उपाधि से भी विभूषित हो गया...

    साहब, एक दिन मैंने एक लुटेरे का इतिहास पढ़ा. उसने बीस बार भारत पर हमले किए और हर बार हारा, लेकिन उसने बिना हिम्मत हारे इक्कीसवीं बार भारत पर हमला किया और उसने जीत हासिल की. मैंने ‘मकड़े की ऊंचाई पर विजय’ नामक कहानी भी पढ़ी और मैंने प्रण कर लिया कि होली-2013 मैं गोल्डी साहब के साथ ही खेलूंगा...नहीं तो, अन्ना की कसम, मैं गोल्डी साहब के साथ होली खेलने की मांग को लेकर, अनशन करूंगा और अन्ना के उपवास रखने के रिकार्ड को तोड़ दूंगा...

    साहब, अब अन्ना का नाम मेरी जुबान पर आया तो मुझे याद आया कि उनके साथ भी तो एक साहब थे, कजरिवाल साहब, जो समाजसेवा करते-करते साहब से भी एक ग्रेड आगे बढ़ कर, नेता हो गए और उन्होंने फाइनली आदमी की नस्ल से नाता ही तोड़ लिया था...

    खैर, मैंने सबसे पहले तय किया कि मैं रामलीला मैदान में अनशन कर, मांग करूंगा कि सरकार संसद में प्रस्ताव पारित कर, मुझे अपने दोस्त गोल्डी साहब से मिलने और उसके साथ होली खेलने का जन्मसिद्ध मौलिक अधिकार देने हेतु, कानून बनाने का वादा करे और वह कानून बहुत सख्त और मेरे मनोनुकूल हो...मेरे रंग से रंगा होना चाहिए वह कानून...वन्देमातरम!!!!

    साहब, मैंने अनशन की बात दिमाग में डालने के बाद, अपने एक गरीब दोस्त, मुंशी अमीर दास से कहा कि वह एक इस्टीमेट बना दें कि अगर मैं रामलीला मैदान में बारह दिन अनशन करूं तो क्या खर्च पड़ेगा...साहब, मुंशी अमीर दास एक सेठ जी का अनुभवी मुनीम था...उसने सात दिनों तक परिश्रम कर बताया कि मुझे करीब पचास लाख रुपए खर्च करने पड़ेंगे...मैं तो एकदम से सदमे में चला गया...मैं सोचने लगा कि भूखे रहने के लिए, वह भी खुले मैदान में, मैं अकल्पनीय राशि पचास लाख, पास में रहने पर भी, खर्च क्यों करूंगा...सिमटा रहे अपनी खोली में गोल्डी साहब...वह अपनी पत्नी लूसी मैम, प्लेटो बाबा, मिस किट्टी और कुत्ते डूजो के साथ सुखपूर्वक रहे...

    साहब, मैंने अपने आप को तुरत कहा-कूल डाउन, कूल डाउन...कंट्रोल...कंट्रोल...और साहब मैंने जीवन में पहली बार अपने प्रयास से, अपने क्रोध पर कंट्रोल कर लिया...वैसे, उस दिन के पहले तक मेरा अनुभव है कि जब भी मुझे उन्मादी क्रोध चढ़ा है, वह तुरत डाउन भी हुआ है, बस अपनी पत्नी जी की आखों को देख कर...

    मैं बहुत द्विविधा में था, परेशानी में था कि मैं अपने प्रण को कैसे पूरा करूं...मैं गोल्डी साहब से मिल भी लूं और होली-2013 उनके साथ खेल भी लूं . लेकिन, तभी मैंने एक भयानक तस्वीर देखी. मेरे अधबने घर के सामने गोल्डी साहब की चमचमती क्रूजर कार रुकी. ड्राइवर ने कार का पिछ्ला दरवाजा खोला और उससे अवतरित हुए गोल्डी साहब...मैंने अपने गाल पर कस कर चिकोटी काटी...और पाया कि मैं नींद में नहीं हूं...सपना नहीं देख रहा हूं...साहब, महाभारत की स्टोरी के विपरीत, लॉर्ड गोल्डी साहब मुझ सुदामा के घर, स्वयं अवतरित हो रहे थे. अब मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि मैं उनकी वंदना करूं या मैं उनको नमस्कार करूं...तभी थोड़ा सिर झुकाए गोल्डी साहब ने मुझसे कहा- कैसे हो, भुसगोल जी?
    “ हां, हां, हां...” और न जाने किस भय से मेरा तो गला ही बैठ गया. साहब, सच कह रहा हूं, मेरे इस घर के निर्माण के बाद, गुजरे तीस वर्ष के इतिहास में, यह पहला अवसर था कि कोई साहब मेरे घर सदेह अवतरित हुए थे...
    “बैठने के लिए नहीं कगोगे”
    “हां, हां, यहां बैठिए, यह कुर्सी थोड़ी ठीक-ठाक है...”
    “देखो भुसगोल, तुम्हारा बेटा है ज्ञानी गुनवंत यानी जीजी...वह मेरी बेटी किट्टी के साथ पढ़ता था...”
    “हां, हां, यह तो बात तो है...वह ऐसी बहुत सी गलतियां करता रहा है...लेकिन...लेकिन वह भी दो महीने पहले आगरा में साहब बन गया है...और तब से घर आया नहीं है...”
    “सुनो भुसगोल, जीजी और किट्टी का लव पॉइंट ऑफ नो रिटर्न पर है...अब मेरी प्रेस्टीज तुम्हारे हाथ है...”
    साहब, मैं गोल्डी साहब कि बात सुन कर भौंचक रह गया...मैं बिलकुल शब्दहीन हो गया था...मूक हो गया था...मेरी आखों की पुतलियां विस्तारित अवस्था में स्थिर हो गईं थीं...मुझे लग रहा था कि मेरा कमजोर नींववाला घर, हाई स्केल के भूकंप के झटके झेल रहा हो...मुझे लगा कि अब गोल्डी साहब मुझे होली-2013 पर मुझे तिहार जेल बेटे के साथ भेज देंगे...
    “भुसगोल जी!”
holi greetings shabdankan 2013 २०१३ होली की शुभकामनायें शब्दांकन     “जी...जी..”
    “भुसगोल जी, मैं चाहता हूं कि आप उन दोनों की शादी के लिए हामी भर दो...”
    साहब, अचानक मुझे मेरा प्रण याद आ गया. न जाने कहां से मुझमें इतनी हिम्मत का संचार हो गया कि मैं बोल पड़ा-
    “मेरी कुछ शर्तें हैं...”
    थोड़ा हकलाते हुए गोल्डी साहब ने पूछा, “क्या, क्या शर्तें हैं? मैं सभी शर्तों को पूरा करूंगा...मैं अपनी बेटी के लिए कुछ भी कर सकता हूं...लेकिन, शर्तें वैसी ही रखना, जिन्हें मैं पूरा कर सकूं...मुझ पर और मेरी बेटी पर रहम करो...मैं तुम्हारे आगे हाथ जोड़ कर यह प्रार्थना कर रहा हूं, जैसे कोई मंदिर में भगवान् की प्रार्थना करता है...”
    मैं अपने लेटेस्ट साहब की तरह बोला, “मेरी सारी शर्तें कान खोल कर सुन लो...जिनपर मैं कोई पुनर्विचार नहीं करूंगा...”
    इतना कहने के बाद, मैंने देखा कि गोल्डी साहब भय से एक दम पीले पड़ गए थे...वे ऊपर से नीचे तक कांप रहे थे... जैसे वे साहब न हो कर फोर्थ ग्रेड के कर्मचारी हों और अचानक किसी बड़े साहब के सामने, चार-पांच झूठे आरोप के साथ पेश कर दिए गए हों...
    “हां, हां, हां...कहिए...भुसगोल जी...सौरी जी, सौरी जी, मेरे कहने का मतलब हैं, मेरे बचपन के मित्र फर्स्ट बेंचर ज्ञान मंडल जी...”
    “मेरी शर्त है कि मैं तुमको पहले की तरह ही गोबरधनवा बोलूंगा और तुम होली-2013 मेरे साथ मनाओगे और साथ में लक्ष्मी भाभी, पल्टुआ, कलिया और मेरा बेटा जीजी भी रहेंगे रंगों के साथ, मिठाई के साथ...मस्ती के साथ...”
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