डॉ सरस्वती माथुर की कवितायेँ

डॉ सरस्वती माथुर

डॉ सरस्वती माथुर

प्राचार्य - पी .जी. कॉलेज
एम. एस. सी. (प्राणिशास्त्र) पीएच.डी , पी. जी .डिप्लोमा इन जर्नालिस्म (गोल्ड मेडलिस्ट)

... विस्तृत परिचय 







नारी भी होती है एक गुलाब सी !


dr_saraswati_mathur_jaipur_kavitayen_shabdankan डॉ सरस्वती माथुर जयपुर कवितायेँ शब्दांकन
नारी भी होती है
एक गुलाब सी
अलग अलग रंगों में
आभा बिखेरती है
सुगंध बांटती है
प्रकृति महकाती है
गुलाब-जल सी ठंडक देती है
गुलाब का सौन्दर्य
सभी को लुभाता है
लाल, पीले, सफ़ेद, रंग
एक नयी अनुभूति की
भाषा गढ़ते हैं
प्रकृति की धारा में
बुलबुले सी उठती गिरती
रंगीन गुलाब की
पतियों का भी
एक अलग ही रस होता है
सच गुलाब
मन को कितना मोहता है ?
अलग अलग रूपों में
रंगों में, महक में
तभी तो कहते हैं हम कि
नारी भी होती है
एक गुलाब सी
जो अलग अलग रंगों में
रूपों में,
माँ बेटी पत्नी बहिन सी
प्रकृति में महकती हैं और
पक्षियों की मीठी बोली सी
हमारे घर आँगन में
चह्कती है और
गुलाब की पत्तियों सी
वह भी जब झरती है तो
सुगंध की पुरवा हमारे
इर्द गिर्द बिखेर कर
वातावरण को
सुवासित कर
स्वर्गीय आनंद से
हमें भर देती है
तो आओ इसकी महक को
महसूस करें और
जीवन में भर कर
इस सुवास को
फैलने दें, फैलने दें,
बस फैलने दें !


पिता के ख़त !


dr_saraswati_mathur_jaipur_kavitayen_shabdankan डॉ सरस्वती माथुर जयपुर कवितायेँ शब्दांकन
पिता तुम्हारे ख़त
खिले गुलाब से
मेरे मन आँगन में
आज भी महक रहे हैं
जब भी उदासी की बारिश में
भीगती हूँ
छतरी से तन जाते हैं
सपना देखती हूँ तो
उड़न तश्तरी बन
मेरे संगउड़ जाते हैं
जादुई चिराग से
मेरी सारी बातें
समझ जाते हैं
पिता तुम्हारे ख़त
मेरी उर्जा का स्त्रोत हैं
संवादों का पुल हैं
कभी भी मेरी उंगली थाम
लम्बी सैर पर निकल जातें हैं
पिता तुम्हारे ख़त
पीले पड़ कर भी
कितने उजले हैं
रातरानी से
आज भी महकते हैं
पिता तुम्हारे ख़त
अनमोल
रातरानी के
फूलों से
खतों के शब्द
ठंडी काली रातों में
एक ताजा अखबार से हैं
पिता तुम्हारे ख़त
ख़त समाचार भरें हैं
उसमे परिवार ,समाज ,देश
एक कहानी से बन गए हैं
इतिहास से रहते हैं
उनके भाव
हमेशा मेरे पास/ जिन्हें
सर्दी में रजाई सा ओढ़ती हूँ
गर्मी में पंखा झलते हैं
पिता तुम्हारे ख़त
बारिश में टपटप
वीणा तार से बजते हैं
इसके संगीत की ध्वनित तरंगें
मेरा जीवन रथ है
इसके शब्दों को पकडे
तुम सारथी से मुझे
सही राह दिखाते हो
इन्हें सहेज कर रखा है
आज भी मैंने
कह दिया है
अपने बच्चों से कि यह
मेरी धरोहर हैं
जो आज भी मेरा
विश्वास है /कि
मेरे पिता मेरे जीवन का
सारांश हैं
बहुत खास है
पिता तुम्हारे ख़त


एक अजन्मी बेटी का निवेदन !


dr_saraswati_mathur_jaipur_kavitayen_shabdankan डॉ सरस्वती माथुर जयपुर कवितायेँ शब्दांकन
माँ
वक्त आ गया है
अब तुम्हारी परीक्षा का
मेरी सुरक्षा का
अजन्मे व्यक्तित्व को अब
गरिमा देनी होगी क्यूंकि
मैं भी तो हूँ/ ब्रह्म का अंश
बेटे जन कर देती हूँ वंश
फिर बेटे बेटी की कसौटी पर
क्यों करता है समाज
मेरा मूल्यांकन/ क्यूँ नहीं करता
मेरी क्षमताओं का आकलन
माँ तेरे आँचल में तो
ममता है
फिर इस परिवेश में
क्यूँ नहीं समता है ?
मेरा निवेदन बस
इतना भर है
तेरी कोख अभी
मेरा घर है
तू मेरी पैदाइश कर दे
मेरे जन्म को अपनी
ख्याइश कर दे
इतनी बस समझाइश कर दे
चुनौतियों की इस डगर पर
नई शुरुआत कर सकूँ
सरस्वती ,लक्ष्मी और दुर्गा का
साक्षात् रूप धर सकूँ इसलिए
अब वक्त आ गया है कि
सीपी बन कर तुम
संपुट की आभा दे दो
फिर मोती बन कर निकलूंगी
सूरज सी चमकूंगी
,माँ, मुझ पर तुम्हारा
कर्ज रहेगा पर
तुम्हारे विश्वास की
किश्तें चुकाना
मेरा फ़र्ज़ रहेगा
फ़र्ज़ रहेगा
फ़र्ज़ रहेगा !


स्वप्न सृष्टि !


dr_saraswati_mathur_jaipur_kavitayen_shabdankan डॉ सरस्वती माथुर जयपुर कवितायेँ शब्दांकन
आसमान पर मंडराती
चिड़िया मुझे
कभी कभी बहुत लुभाती है
सपनो में आकर
अपने पंख दे जाती है
मैं तब उड़ने लगती हूँ
गगनचुम्बी इमारतों पर
निरंतर शहर में
विस्तरित होते गाँवों
,खेतों ,खलिहानों पर
हवाओं की लहरों संग
बतियाते फूलों पर
आकाशी समुन्द्र की
बूंदों से अठखेलियाँ करती
आत्मस्थ होकर
उड़ते उड़ते मेरी
मनचाही उड़ान
मुझमें विशवास की
एक रौशनी भर देती है /और
मैं उड़ जाती हूँ
अनंत आकाश में
धरती से दूर वहां
जिन्दगी को
गतिमान रखने को
सपने पलते हैं और
मैं उतर कर उड़ान से
एक नीड ढूँढती हूँ
जहाँ सुरक्षित रहें
जंगलों का नम हरापन
बरसाती चश्मा
ऊँचें पहाड़
गहरी ठंडी वादियाँ
पेड़ ,नदी ,समुन्द्र और
पेड़ों पर चह्चहाते -
गीत गाते रंग बिरंगे परिंदे
नित्य और निरंतर
गतिशील लय की
अनंतता में बस
अनंतता में !


आओ बेटी !


dr_saraswati_mathur_jaipur_kavitayen_shabdankan डॉ सरस्वती माथुर जयपुर कवितायेँ शब्दांकन
मन के झुरमुट के
उस पार से
एक अनुगूँज है आती कि
बेटी होती है
गुलाब की पंखुड़ियों सी
घर आँगन है महकाती
तभी तो दुर्गा रूप कहलाती
आओ बेटी सच
झरना ही तो हो तुम
मीठे पानी का
कलकल बहती जाओ
मरुस्थल के जल सी
सबकी प्यास बुझाओ
पाखी सी दूर गगन तक
पंख पसार कर
उन्मुक्त उडो तुम और
आच्छादित कर लो
सतरंगी आभा से
अपने जीवन का
सुंदर आसमान
भर कर वहां
तने इन्द्रधनुष के रंग
अपने जीवन में भर लो
याद रखना बेटी
मैं माँ हूँ पर एक
दोस्त की तरह हमेशा
तुम्हारे साथ रहूंगी
एक परछाई सी
संग चलूंगी
तुम मेरे जीवन नभ का
झिलमिलाता एक चाँद हो
तुम्हारी चांदनी से आओ
मैं अपना घर भी
रोशन कर लूं
जब सुबह हो तब तुम
भोर किरण सी
मेरे आँगन में
धूप सी फ़ैल जाना
और नीम डाली पर बैठ कर
मुझे आशा का
नवगान सुनाना
प्यारी बेटी
राजरानी हो तुम मेरी
एक मौसम हो तुम
बसंत का, देखना तुम
महसूस करोगी कि
हवा के ठंडे झोंके सी
इर्द गिर्द फैली हूँ
मैं तुम्हारे
एक पारदर्शी आवरण सी !
सृज़न के उन्माद में
सकपकाई सी
एक चिड़िया आई
ताकती रह देर तक
पतझड़ के झड़े
भूरे पतों को
हवा बुहार रही थी
तब सन्नाटा
अटक गये थे चिड़िया के
सुर भी कंठ में पर
मौसम के गलियारों में
महक थी सूखे पत्तों क़ी
उम्मीद थी जल्दी ही
फिर फूल आयेंगे
तितलियों उनमे
ताजगी तलाशती मंडराएगी
कोयलें कूकती
हरियाली पी लेंगी
सृज़न के उन्माद में
फिर फूटेंगे अंकुर
फुलवारी में उगेगा
इन्द्रधनुष
रंग - बिरंगी तितलियों का
चिड़िया ने भी
अपने से संवाद किया कि
अब आ गया है वक्त
घरोंदा बनाने का
इस विश्वास के साथ
उल्लासित हो
वो उड़ गयी
बसंत के बारे में
सोचेते हुये !


सच !


dr_saraswati_mathur_jaipur_kavitayen_shabdankan डॉ सरस्वती माथुर जयपुर कवितायेँ शब्दांकन
सच की रंग बिरंगी चिड़ियां
मुझे बहुत भाती है
सच मुझे बहुत प्रेय.है
उसकी महक मुझे
फूल सी महकाती है
सच अपने आप में
एक इश्वर है
जो पत्थर की अहल्या को
मानवी बना देता है
सच का ओज अग्नि तत्व
स्वयं एक शक्ति है
श्रेय है
केवल समिधा नहीं
पूर्ण महायज्ञ है !


साथ निभाना !


dr_saraswati_mathur_jaipur_kavitayen_shabdankan डॉ सरस्वती माथुर जयपुर कवितायेँ शब्दांकन
दिन ढलते ह़ी
ड्योढ़ी पर सांकल
खटखटाती रही हवा
घर पर सुस्ताते
थके मांदे लोगों से
जाने क्या क्या
बतियाती रही हवा
दूर खड़ा था कोलाहल
मनुहार करता सन्नाटे से कि
अब तुम करो पहरेदारी
मैं समेटे आवाज़ों को सोता हूँ
शहर -गाँव थके पसरे से
नींद की तारों वाली
बंधेज ओढा इन्हें
छवांता हूँ आँगन में
चाँद की कंदील टांग
तब तक जागना दोस्त
जब तक कि भोर की
पंखुडियां बरसा कर
फिरकनी सी चिड़ियाँ
चहक कर फिर से
मुझे न जगा दें
तब तक साथ निभाना दोस्त !


रिश्तों के पन्ने पलटते हुए !


dr_saraswati_mathur_jaipur_kavitayen_shabdankan डॉ सरस्वती माथुर जयपुर कवितायेँ शब्दांकन
हस्ताक्षर न बन पाए हम तो
अंगूठे बन कर रह गये
सत्य ने इतनी चुराई आँखे कि
झूठें बन कर रह गये
बेबसी के इस आलम को क्या कहें
बांध नहीं सके जब किसी को
तो खुद खूंटे बन कर रह गये
रिश्तों के पन्ने पलटते हुए
दर्द कि तलवारों के हम
बस मूढे बन कर रह गये
सत्य ने चुराई इतनी आँखें
कि बस झूठें बन कर रह गये
कांच की दीवारें खींच कर
रिश्तों के पन्ने पलटते रहे
अपनों ने मारे जब पत्थर
तो किरचों के साथ
टूटे फूटे बनकर रह गये
लहुलुहान भावनाओं से
ज्वारभाटे उठने लगे
हम शांत समुंदर
बन कर रह गये
सत्य ने चुराई इतनी आँखें
बस झूठे बन कर रह गये !


नन्ही चिड़िया !


dr_saraswati_mathur_jaipur_kavitayen_shabdankan डॉ सरस्वती माथुर जयपुर कवितायेँ शब्दांकन
वह नन्ही चिड़िया थी
धूप का स्पर्श ढूँढती
फुदक रही थी
अपने अंग प्रत्यंग समेटे
सर्दी में ठिठुर रही थी
रात भर अँधेरे में
सिकोड़ती रही अपने पंख
पर रही
प्रफुल्लित, निडर और तेजस्वी
जैसे ह़ी सूरज ने फेंकी
स्नेह की आंच
पंख झटक कर
किरणों से कर अठखेलियाँ
उड़ गयी फुर्र से
चह्चहाते हुए
नई दिशा की तलाश में !


तुम मौसम बुला लो


dr_saraswati_mathur_jaipur_kavitayen_shabdankan डॉ सरस्वती माथुर जयपुर कवितायेँ शब्दांकन
तुम मौसम बुला लो
में बादल ले आऊं
थोड़ी सी भीगी शाम में
फूलों से रंग चुराऊं
तुम देर तक गुँजाओ
सन्नाटे में नाम मेरा
मैं पहाड़ पर धुआं बन
साये सी लहराऊं
वक्त रुकता नहीं
किसी के लिये
यह सोच कर
मैं जीवन का काफिला बढ़ाऊं
तुम लहरों की तरह बनो बिगडो
मैं चिराग बन आंधी को आजमाऊं
तुम मौसम बुला लो
मैं बादल ले आऊं
तुम परात में भरो पानी
मैं चाँद ले आऊं!'
तुम मौसम बुला लो
मैं बादल ले आऊं !


नव स्पर्श से !


dr_saraswati_mathur_jaipur_kavitayen_shabdankan डॉ सरस्वती माथुर जयपुर कवितायेँ शब्दांकन
मेरे सपनों के जंगल में
मैं लगातार देख रही थी
झुण्ड के झुण्ड झरे पत्ते
यूँ लग रहे थे
मानों हार गये हों युद्ध
अपनी चरमराती आवाज में
उड़ जाने को तैयार
पार्श्व में दिख रहा था`
अभिलाषाओं से भरा जीवन
और तभी नींद टूट गयी
अपने नव स्पर्श से
छू रही थी मुझे भोर
और फिर एकाएक
मेरे सपने पृथ्वी हो गये
चक्कर काटने लगे
अभिलाषाओं के उदित होते
सूर्य के चारों ओर !


गीत गोविन्द लिखे !


dr_saraswati_mathur_jaipur_kavitayen_shabdankan डॉ सरस्वती माथुर जयपुर कवितायेँ शब्दांकन
बसंत के कोरे पृष्ठों पर
फागुन पीले गीत लिखे
मौसम में फूल खिला कर
बगिया के अनुकूल
हर पल नया संगीत लिखे
कूके कोयल डाली डाली
शब्दों को बांध कर सुर में
हरी भरी धरती पर
हतप्रभ मौसम को निहारती
चिड़ियां पंख फड़फड़ा कर
शस्य डाल पर
खुशबू की तरह
नववर्ष का नव सृजन का
मंगलदीप जला कर
गये साल की विदाई पर
अभिनन्दन शुभागमन का
फिर फागुनी गीत गोविन्द लिखे !


बसंत - बसंत !


dr_saraswati_mathur_jaipur_kavitayen_shabdankan डॉ सरस्वती माथुर जयपुर कवितायेँ शब्दांकन
मैं बसंत हूँ
बसंत- जो तितली की तरह
उडता है
आम अमरूदों के
दरख्तों पर
फागुनी दोपहर में
एक चित्र बनाता है
धूप की कलम से
गुनगुन संगीत का
सृजन करता है
सुबह की पहली किरण सा
जाग कर चहचहाता है
पक्षियों सा
कभी फूलचुही सा
मंडराता है फिजां में
महकता है गुलाब सा
और फिर कभी सूरज सा
चढ़ते हुए आसमान पर
बिखर जाता है
धूप के टुकड़े सा
फैला कर फूलों पर
इन्द्रधनुषी रंग
दस्तक देकर
फागुनी मौसम की
दूर कहीं कोयल भी
गा उठती है
मधुर स्वर में
बसंत... बसंत...!


स्वागत सर्दी का !


dr_saraswati_mathur_jaipur_kavitayen_shabdankan डॉ सरस्वती माथुर जयपुर कवितायेँ शब्दांकन
गुनगुनी धूप में
धुआँ धुआँ सी
घूम रही है
मुखरित सी पुरवाई
नववर्ष के द्वारे देखो
मनभावन सी
सर्दी आई
अलाव की लहरों पर
पिघलती कोहरे की परछाई
तितली तितली मौसम पर
गीत सुनाती
शरद ऋतु की शहनाई
नववर्ष के द्वारे देखो
मनभावन सी सर्दी आई
प्रकृति की नीरवता में
आसमान है जमा जमा सा
पुष्पित वृक्षों पर सोया है
सुबह का कोहरा घना घना सा
उनींदे सूर्य से गिरती ओस की
बूंदों से लिपटा
सुरमई सा थमा थमा सा
जाग उठा मुक्त भाव से
मौसम ने कसमसा कर
अमराई में ली अंगडाई
नववर्ष के द्वारे देखो
मनभावन सी सर्दी आई !


मन की किताब में !


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कुछ मौसम मैंने संभाल रखें हैं
मन की बगिया में उतार रखें हैं
जो रंगीन तितलियों से उड़ते हैं
टिटियाती चिड़ियों के सुरों में
मधुर गीत भी बुन के रखें हैं
जो दिन भर मंजीरों से बजते हैं
रंगीन रिश्तो के आइनों के भी
रंग किर्चों से निकाल रखें हैं
बिखरे पंख यादों के पाखी के
मन - किताबों में संभाल रखें हैं !


नदी हूँ मैं मिठास भरी !


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मैं भी हूँ एक नाव सी
तेज हवा में चलती हूँ
शाम का सूरज हूँ मैं
सागर में जा ढलती हूँ
सावन की भीगी रात में
चंचल पुरवा सी बहती मैं
तरुओं से बातें करती हूँ
जीवन की बरसती बरखा में
सीली सीली सी रहती हूँ
दीवार पे टंगा कैलेंडर हूँ मैं
तारीख सी रोज बदलती हूँ
आसमा को मुट्ठी में बाँध सकूँ
तो पैरों को ऊँचा करती हूँ
दूर मंजिल तक जाना हो तो
विश्वास के डग मै भरती हूँ
आँधियों में भी मैं हरदम
एक लौ बन करके जलती हूँ
नदी हूँ मै मिठास से भरी
खारे सागर जा घुलती हूँ!


एक बुजुर्ग !


dr_saraswati_mathur_jaipur_kavitayen_shabdankan डॉ सरस्वती माथुर जयपुर कवितायेँ शब्दांकन
अकेलेपन के सूरज को
रुक कर देखता
एक बुजुर्ग
क्षण और घंटे गुजरते जाते हैं
समय की आराम कुर्सी पर
किताबों को पलटते हुए
रुक कर देखता है
एक बुजुर्ग
उस दरवाजे की ओर
जहाँ से शायद आये
उसका बेटा या बहू ,
बेटी या पोता और
हाथ में हो चश्मा
जिसकी डंडी
बदलवाने के लिए
पिछले महीने वो
जब आये थे तो
यह कह कर ले गए थे कि
कल पहुंचा देंगे
हर आहट पर
चौंकता है एक बुजुर्ग
दरवाजा तो दीखता है पर
बिना चश्मे किताब के अक्षर
देख नहीं पाता
हाँ "ओल्ड होम" की निर्धारित
समय सारिणी के बीच
समय निकाल कर
पास बैठे दूसरे बुजुर्ग का
हाथ पकड कर
उस इंतज़ार का
हिस्सा जरुर बनता है!


उनकी मुस्कान !


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और अब वे अपने
अंतिम चरण में थी
,बुजुर्ग जो थीं
उन्हें मालूम था कि
यह नियति है और
वे इंतज़ार में थी
अब देर तक बगीचे में
काम करती हैं
स्कूल से लौटे
पोते पोतियाँ के जूतों से
मिटटी हटा कर खुश होती हैं
उनके धन्यवाद को पूरे दिन
साथ लिए, मुड़े शरीर के साथ
लंगडाते हुए, इधर- उधर घूमती हैं
याद करती हैं ,तालियों की
उन गूंजों को
जो समारोह में उनकी
कविताओं के बाद
देर तक बजती थीं
अपने हमउम्र दोस्तों के साथ
सत्संग में बैठ कर
भजन सुनते हुए सोचती थीं
उन दिनों को
जब घडी की सुइयां
तेज दौडती थीं और
वे उसे रोक लेना चाहती थीं
अब वे अपने कमरे की
खिड़की से दिखते
समुन्द्र को देर तक
निहारते सोचतीं थीं कि
वक्त कहाँ बाढ़ की तरह
बह गया और
यह सूरज भी
कितना कर्मठ है
रोज थक कर
डूबता है और
तरोताजा होकर
उगता है
यह सोचते ही
उनके पूरे शरीर में
सूरज की प्रथम
किरणों की तरह
जीने की उमंग
कसमसाने लगती है और
पूरे दिन एक
मुस्कान की तरह
उनके होंठों पर
तैरती रहतीं है !


जीना इसी का नाम है !


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वो इतने बूढ़े थे कि
उनकी हड्डियाँ
उनकी त्वचा में
तैरती थीं
मैं उनमे अपने आपको
डूबता सा महसूस करती थी
वो इतने कमजोर थे
जितने नवजात शिशु के पैर
पर उनकी मुस्कान
इतनी गहरी थी कि
उसमे मैं नदी की सी
कलकल सुनती थी
जो उनके होठों के चारों तरफ
सांसों से गुजरती थी और
वो इतने तैयार थे कि
मुझे समुन्द्र से भी गहरे
गंभीर और अथाह दिखते थे,
सच- मुझे लगता था कि
जीना इसी का नाम है !


चिड़िया सा मन !


dr_saraswati_mathur_jaipur_kavitayen_shabdankan डॉ सरस्वती माथुर जयपुर कवितायेँ शब्दांकन
सुरमई मौसम
भीगी हवाएं
चिड़िया सा मन
उड़ उड़ जाये
नदी की कलकल
गीत बुने तो
सागर सा मन
झर झर जाये
प्रीत रिश्ते
लगाव के क्षण
तेरी याद तो
हर पल आये
रेत आँचल में
सांझ भीगी सी
डूबते सूरज से
घुल मिल जाए


सपने सजाना है !


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जीवन नदी
मन मंदिर
बजते हैं जिसमे
घंटे यादों के
एक चहकती
श्याम गौरैया से
फूल पे महकती
हवा जुगनू से
मन रोशन हैं
मुरादों के
लेकिन कुछ पाना है
सब भूल जाना है
मासूम नींद में
सपने सजाना है
कुछ बन दिखाना है
साथ वादों के
शीशे से जीवन को
पत्थर करना है
समय हाशियों पे
संग इरादों के


श्रम का अभिमन्यु !


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घर उदास
रिश्ते मलंग
देर तक लड़ी
समय की जंग
चक्रव्यूह धन
श्रम का अभिमन्यु
राह ढूंढता
बाहर आने की
मिल गयी सुरंग
अनुभव की किताब
पढने से पहले
पढना होगा
प्राक्कथन
मन हुआ दबंग
जीवन में
जो भी पाया
मन में भरा रंग

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2 comments :

  1. एक से बढ़कर एक रचनाये .निशब्द हूँ

    ReplyDelete
  2. बहुत बहुत शुक्रिया नीलिमा जी

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osr5366