आप बहुत याद आए प्रसन्न दा - मज़कूर आलम

Mazkoor Alam Hindustan Reporter Shabdankan     आज मैं अपनी बात छह अंधे और एक हाथी की कहानी से शुरू करूंगा। तो कहानी यूं है- किसी गांव में 6 अंधे आदमी रहते थे। एक दिन उन्हें पता चला कि गांव में हाथी आया है। उन्होंने आज तक बस हाथियों के बारे में सुना था, कभी छू कर महसूस नहीं किया था। सो, उन्होंने ने तय किया कि हम हाथी नहीं देख सकते तो क्या, छू कर तो उसे महसूस कर सकते हैं। और वे चल पड़े हाथी की तरफ। उन सभी ने हाथी को छूना शुरू किया।

मैं समझ गया, समझ गया, हाथी एक खम्भे की तरह होता है। पहले व्यक्ति ने हाथ में हाथी का पैर था।
अरे नहीं, हाथी तो रस्सी की तरह होता है। दूसरे ने पूंछ पकड़ रखी थी।
तुम सब गलत हो, मैं बताता हूं। हाथी तो पेड़ के तने की तरह होता है। तीसरा आदमी हाथी की सूंढ़ सहला रहा था।
     कमाल है, तुम्हें इतना भी नहीं पता कि हाथी सूप (जिससे चावल वगैरह फटकने का काम लिया जाता है) की तरह होता है। चौथा व्यक्ति हाथी के कानों को सहला रहा था।
     नहीं-नहीं, ये तो एक दीवार की तरह है। पांचवे की हाथ उसके पेट पर थी।
     ऐसा नहीं है, हाथी तो एक कठोर नली की तरह होता है। छठे व्यक्ति हाथी की हाथ में हाथी का दांत था।
और फिर सभी आपस में बहस करने लगे और खुद को सही साबित करने में लग गए। उनकी बहस तेज होती गयी और ऐसा लगने लगा मानो वो आपस में लड़ ही पड़ेंगे। तभी वहां से एक आदमी गुजर रहा था। उसने उनसे पूछा- क्या बात है आप सब आपस में झगड़ क्यों रहे हैं?
     हम यह नहीं तय कर पा रहे हैं कि आखिर हाथी दिखता कैसा होगा। अंधों में से एक ने उत्तर दिया।
उस आदमी ने छहों की बात बड़ी धैर्य से सुनी और उसके बाद कहा- आप सभी अपनी-अपनी जगह सही हैं। आपके वर्णन में अंतर इसलिए है, क्योंकि आप सब अलग-अलग जगह खड़े हैं और आप सबके हाथ, हाथी के अलग-अलग अंग आए हैं। आप सब लोगों ने हाथी का वर्णन तो सही किया, लेकिन इस तरह अलग-अलग किसी भी चीज को देखने पर कोई मुकम्मल तस्वीर नहीं बनती, बल्कि वह उस मूल से इतनी अलग होती है कि बात हास्यास्पद हो जाती है।
     इस कहानी की जरूरत इसलिए भी पड़ी, क्योंकि जो बात मैं कहना चाहता हूं, वह भी इससे ताल्लुक रखती है। एक बार मेरे गुरुतुल्य समाजशास्त्री प्रसन्न कुमार चौधरी से मेरी बात हो रही थी। साल 2003 या 04 रहा होगा। मैं किसी बात पर बड़े आवेश में था और पुरजोर शब्दों में अपनी बात की वकालत में उन्हें कह रहा था। यह एकदम सच्ची बात है। बात क्या थी, वह मैं भूल चुका हूं।
     अपनी बात आगे बढ़ाने से पहले मैं प्रसन्न दा के बारे में आप सब को कुछ बताता चलूं। वह एक ऐसे आदमी हैं, जिन्हें आप चलता-फिरता इन्साइक्लोपीडिया कह सकते हैं। उन्हें देश-दुनिया के छोटे से छोटे गांव की भी अहम बात की जानकारी रहती है। वह आपसे एक साथ होनोलुलु की भी बात कर सकते हैं और मध्यप्रदेश की किसी गांव की भी। कमाल यह भी है कि वह आपको कभी आवेश में नहीं दिखेंगे। हां, आप उनकी इस भाव-भंगिमा से डर सकते हैं कि अचानक बात करते-करते वह आपके पास चले आएंगे। उठ जाएंगे... चहलकदमी करने लगेंगे। जोर से बोलने लगेंगे और बात-बात पर ठहाका लगाएंगे... इतना तेज की आप यह सोच सकते हैं कि अरे इतने जोर से हंसने वाली कौन-सी बात हो गई। उनका एक तकिया कलाम भी है। अगर याददाश्त ठीक है तो शायद यही है, ‘समझ रहे हैं न।’ क्योंकि उनसे मिले लगभग 10 साल बीत गए, लेकिन जब भी किसी बात पर विचार करने बैठता हूं, आज भी सबसे पहले वही याद आते हैं। हां, साहित्यकारों को उनकी यह बात काबिले ऐतराज हो सकती है कि उनके लिए हर शब्द पुल्लिंग ही होता है और दो साल के बच्चे को भी आप ही कहते हैं।
     तो उन्होंने बात आगे बढ़ाई- ‘आप ठीक कह रहे हैं। आप ठीक कह रहे हैं। मैं भी मानता हूं कि आपकी बात सही है। लेकिन यह बताइए एक ऐसे कमरे में बैठा आदमी, जिसमें सूराख ही नहीं हो उसे आप लाख कहिएगा कि दिन के बारह बजे हैं। बहुत तेज रोशनी है, तो वह मानेगा। किसी आदमी को आप पीछे से देखिए और आगे से उसमें फर्क नहीं होगा। जो आदमी पीछे से देख रहा है, उसे आप गलत कहेंग या जो जो आगे से देख रहा है उसे। जाहिर है दोनों सच बोल रहे हैं, लेकिन दोनों का सच अलग है। अगर कोई चलती ट्रेन में है, तो उसे सबकुछ भागता लगेगा और ट्रेन ठहरी है तो ठहरा-ठहरा। जाहिर है उन दोनों में से झूठा कोई नहीं। इसलिए एक ही मुद्दे पर, किसान का सच अलग होगा। बिजनेस मैन का अलग और राजनेता का अलग। हर आदमी अलग जगह पर खड़ा है। उसकी पोजिशन अलग है, तो जाहिर है कि उसका सच अलग होगा। इसलिए हड़बड़ी में कोई राय कायम मत कीजिए। आप तो पत्रकार हैं। आपको हर पहलू देखना चाहिए और यह भी देखना चाहिए, जो यह बात कह रहा है, वह कहां खड़ा है।’
     जैसे आपके मन में यह पढ़ते वक्त कौंध रहा होगा, ठीक वैसे ही उस वक्त मेरे मन में भी कौंधा और मैंने अपनी कौतुहल उनके सामने जाहिर कर दी। उन्होंने कहा कि सच हमेशा समय और परिस्थिति के सापेक्ष होता है। साथ ही वह आपके पोजिशन पर भी निर्भर करता है। कई बार सच स्थापित भी किया जाता है। तीन लोग और तीन स्थितियां लीजिए- पहला जो किसी क्षेत्र में स्थापित है, दूसरा जो तेजी से आगे बढ़ रहा है और तीसरा वह, जिसकी अभी कोई पहचान नहीं बनी। पहला अपनी स्थिति बनाए रखने के लिए अलग तरह का सच पैदा करेगा। दूसरा पहले से वह स्थान हासिल करने के लिए अलग तरह के सच से गुजरेगा और तीसरा वह होगा, जो इनके बीच अपनी जगह बनाने के लिए जद्दोजहद कर रहा है, तो उसका सच इन दोनों से अलग होगा। ऐसे में इन तीनों के हर्बे-हथियार अलग होंगे। लेकिन यहीं पर मैं यह कहना चाहता हूं कि आदमी को किसी हालत में संयम नहीं खोना चाहिए। उसे अपनी जगह और पोजिशन के आधार पर सच नहीं गढ़ना चाहिए। क्योंकि तब वह अपनी प्रतिभा का नुकसान कर रहा होता है। और यह भी मत मानिएगा कि ऐसी धारणा विद्वान नहीं बनाते, वह भी खूब बनाते हैं, बल्कि वे तो इस बात पर ज्यादा मजबूती से कायम रहते हैं, क्योंकि वे यह मानने के लिए तैयार ही नहीं होते कि वह गलत भी हो सकते हैं। वह अपने अनुभव और चिंतन को समग्र समझ कर ऐसी भूलें करते रहते हैं और वे जब ऐसा करते हैं, तो कइयों का बुरा कर जाते हैं, क्योंकि वे अपने पक्ष में बड़े मजबूत तर्क लेकर आते हैं।
     फिर उसके बाद उन्होंने छह अंधों और हाथी वाली कहानी सुनाई... और मुझसे पूछा कि बताइए इन छह में कौन गलत है। उसके बाद उन्होंने मुझे कहा कि एक सजग बुद्धिमान आदमी को एक साथ उन छहों पोजिशन पर खुद को खड़ा करता है, उसके बाद निर्णय करता है। सुनी-सुनाई बात पर तो हरगिज नहीं, क्योंकि जिसने आपसे जो कुछ भी कहा है, वह उसका सच है। आपका नहीं! और कोई जरूरी नहीं कि जो सच आपके सामने आया है, वह समग्र चेतना से आया है, क्योंकि सच संबंधों के आधार पर भी तय होते हैं। एक बेटे के लिए बाप हमेशा अच्छा ही आदमी होता है और यह संबंधों की बात नहीं, सच में पिता पुत्र का आदर्श होता है। और हर बेटा उनकी ही तरह बनना चाहता है। है तो यह संबंधों का सच, लेकिन बाप और बेटा दोनों सच में एक-दूसरे के लिए यही मानते हैं। संबंध नेपथ्य में अपनी भूमिका अदा कर खत्म हो चुका होता है।
     उसके बाद जब मैं देवघर स्थित उनके बम्पास टाउन वाले घर से निकला तो मेरे मन में किसी के लिए आक्रोश नहीं था। इसलिए भी मैं यह जान गया था कि हर आदमी में इतना सामथ्र्य नहीं होता कि वह किसी भी बात के हर पहलू को समझ सके, बस उसे प्रतिक्रिया व्यक्त करनी होती है, क्योंकि उसे खुद को बुद्धिमान साबित करना होता है। इसलिए वह कर देता है। प्रसन्न दा को याद करते हुए मैं बस इतना ही कहूंगा कि शायद मैं भी उसी हड़बड़ी वाले जमात में हूं। हालांकि मेरी लगातार चेष्टा होती है कि कोई भी राय कायम करने से पहले प्रसन्न दा को स्मरण कर लूं।

नोट : कभी मौका मिला तो किसी व्यक्ति की छवि कैसे बनती है इस पर प्रसन्न दा की राय को आप सबसे शेयर करूंगा, क्योंकि जिस दौर में हम हैं, उसमें मुझे लगता है कि उनके वह विचार भी बड़े काम की है।

बक्सर में जन्मे मज़कूर आलम पेशे से पत्रकार हैं और दिल्ली में हिंदुस्तान दैनिक में कार्यरत हैं

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