पुरुषोत्तम अग्रवाल - कहानी: पैरघंटी

पैरघंटी

पुरुषोत्तम अग्रवाल

     सत्यजितजी का स्वरूप बड़ी तेजी से बदल रहा था। अधीनस्थों, खासकर निचले तबकों से संबंधित अधीनस्थों की चमड़ी कोड़े की तरह उधेड़ने वाली उनकी जबान पुचकार पाने को व्याकुल, लप-लप करती जीभ में बदलती जा रही थी। जिस कंठ-स्वर को सिंह-गर्जना का मानव-संस्करण मान, वे अपनी वंशावली पर गर्व करते थे, वह स्वर कूं-कूं की निरीहता पहले ही ओढ़ चुका था। देह दो पैरों की मुद्रा त्याग कर चारों पैरों पर आ चुकी थी। शरीर के पार्श्व भाग में, बढ़िया कपड़े के पैंट में से दुम धीरे-धीरे निकल रही थी, और तेज-तेज हिल रही थी।

     उच्चकुलोद्भव, उच्चाधिकारी श्री सत्यजित इस समय मंत्रीजी के गुस्से को पुचकार में बदलने की साधना कर रहे थे। इस गुह्य साधना का साक्षी कोई नहीं था, सिवा साधक और साध्य के। हाँ, गगनविहारी देवता अवश्य यह दृश्य देख रहे थे। देख रहे थे, और बोर हो रहे थे। वे ऐसे दृश्य अनादि काल से देखते आ रहे थे, और चट चले थे। जिन्हें देवयोनि प्राप्त किये बहुत समय हो गया था, ऐसे देवताओं की बोरियत तो अब फटीग में बदलती जा रही थी। वे सब कुछ दिखाने वाली दिव्य-दृष्टि को कोसने लगे थे, मनुष्यों से ईर्षा करने लगे थे जो दिव्य-दृष्टि से वंचित होने के कारण, सब कुछ देखने से तो बचे ही रहते हैं, और जो देख सकते हैं, वह भी आम तौर से या तो देखते ही नहीं, या देख कर भी अनदेखा कर देते हैं।

     इस समय श्वान-आसन साध रहे सत्यजितजी को उनके वैकुंठवासी पिताश्री प्यार से ‘राजन’ कहा करते थे। सत्यजितजी से जिनका वास्ता पड़ता था, वे सब जानते थे कि उनकी कृपा-दृष्टि उपलब्ध कराने वाला जंतर यही संबोधन था- ‘राजन’। उधर, मंत्रीजी के कैलासवासी पिताश्री उन कोई साढ़े-पाँच सौ श्रेष्ठ जनों में से थे, जिन्हें हर मैजेस्टी की कृपावंत हुकूमत ने ‘आलीजाह-बहादुर’, ‘दरबार’, ‘श्रीमंत’ आदि बनाए रखा था, और जिन्हें अपने जीवन-काल में कलि-काल का यह पातक देखना पड़ा कि देखते-देखते ही वे सल्तनते-बरतानिया के फर्जन्द-ए-खवास से भारत माता की संतान बनने को बाध्य हुए।

     मंत्रीजी के स्वर्गवासी पिताश्री उनकी कुर्सी के ठीक सामने एक शानदार तस्वीर में मौजूद रहते थे। आबनूस के रोबीले फ्रेम में मढ़ी इस तस्वीर में स्वर्गवासी महाराजा के साथ स्वयं हिज एक्सीलेंसी वायसराय मौजूद थे। कुछ दरबारी मौजूद थे, पृष्ठभूमि में चंद जी-हजूरे भी मौजूद थे, हिज एक्सीलेंसी, महाराजा और दरबारियों के हाथों में राइफलें मौजूद थीं, जी-हजूरों के हाथों में तोड़ेदार बंदूकें मौजूद थीं, और नीचे की तरफ...

     नीचे की तरफ वह शेर मौजूद था, जिसे सौ-पचास हाँके वालों की मेहनत के जरिए, पेशेवर शिकारियों की दक्षता के जरिए मारकर हिज एक्सीलेंसी और महाराजा ने ‘लाजबाव’ बहादुरी से शिकार करने का गौरव प्राप्त किया था। अपनी मौत में भी रोबीले दिख रहे शेर के सिरहाने हिज एक्सीलेंसी दि वायसराय खड़े थे, पाँव उसके सर पर और राइफल जमीन पर टिकाए। सल्तनत-ए-बर्तानिया के फर्जन्द-ए-खास महाराजा की भी राइफल जमीन पर टिकी थी, लेकिन पाँव शेर के सर पर नहीं दुम पर था।

     कहाँ वह ज़माना कहाँ यह गया-गुजरा वक्त कि एक दिन तो यह शानदार तस्वीर कुछ देर के लिए ही सही, दीवार से हटानी पड़ गयी थी। मंत्रीजी नोट करते थे कि उनके कमरे में आने वालों में से कई लोगों को यह तस्वीर विभिन्न कारणों से खटकती थी...खटकती रहे...ब्लू ब्लड जिनकी शिराओं में बह रहा था, रायल खानदान के रोशन चिराग़ वे मंत्रीजी नसों में लाल खून लिए घूमने वाले ऐं-वें टाइप्स की परवाह क्यों करें? बल्कि इन लाल खून वाले हकीर इंसानों में से कुछ का तो खून लाल से सफेद हो गया था, इतने गुस्ताख़ हो गये थे ये बेहूदे कि मंत्री जी को ‘महाराजा’, ‘श्रीमंत’ जैसे उचित संबोधनों की बजाय बस श्री या जी लगा कर या सर या महोदय कह कर संबोधित करते थे...ब्लडी इडियट्स, डर्टी फिल्द...

     ऐसे मूर्खों की तो उपेक्षा ही उचित थी, लेकिन जब वर्ल्ड वाइल्ड-लाइफ फंड का एक शिष्ट-मंडल प्रोजेक्ट टाइगर की फंडिंग डिसकस करने के लिए आया था, तो इसी सत्यजित ने जान हथेली पर रख कर श्रीमंत को सलाह दी थी कि कुछ देर के लिए शेर के शानदार शिकार की यह जानदार तस्वीर कमरे से हटा दी जाए। सलाह सही थी, यह तब जाहिर हो गया जबकि शिष्ट-मंडल के एक सदस्य ने यह सुझाव दे डाला कि निजी संग्रहों से नहीं, तो कम से कम सरकारी और अर्द्ध-सरकारी संग्रहालयों से ऐसी सभी ‘ऑब्सीन’ तस्वीरें, पेंटिंग्स आदि हटा दी जाएं जिनमें अंग्रेज अफसर और उनके ‘नेटिव’ चापलूस शिकार किये हुए शेरों के साथ ‘वल्गर’ पोज दे रहे हैं। सुझाव देने वाला गोरी चमड़ी में न मढ़ा होता, तो अपने स्वर्गीय पिताश्री का अप्रत्यक्ष ही सही, इस गये गुजरे जमाने की वजह से ऐसा घोर अपमान करने वाले की चमड़ी खींच कर उसमें, भुस भले न भर पाएं, श्रीमंत किसी और ढंग से हरामजादे को ठीक तो कर ही देते। लेकिन, एक तो गोरा, ऊपर से फंड का मामला, मंत्रीजी अपने ब्लू बल्ड का घूँट पी कर रह गये थे। मन ही मन सत्यजित की दूरंदेशी की तारीफ भी की।

     उस दिन के बाद से,मंत्रीजी सत्यजित को अपना खास मुसाहिब मानने लगे थे, इस मान्यता के कारण सत्यजितजी का आलम सातों दिन चौबीसों घंटे यह रहने लगा कि ‘आजकल पाँव जमीं पर नहीं पड़ते मेरे...’

     यह तस्वीर मंत्रीजी की मेज के ठीक सामने थी, और उसी मेज के नीचे थी वह पैरघंटी—फुटबेल—जिसके कारण सत्यजितजी इस समय श्वान-नृत्य कर मंत्रीजी को रिझाने की साधना कर रहे थे।

     बात यह थी कि मंत्रीजी चपरासी को बुलाने के लिए हाथघंटी और पीए को बुलाने के लिए इंटरकाम का उपयोग नहीं करते थे। उन्हें अपनी मेज पर घंटी रखना सुहाता नहीं था, और इंटरकाम पर वे केवल अपने जूनियर मिनिस्टर से बात करते थे, सो भी बेमन से। घंटियों को मंत्रीजी मेज के ऊपर नहीं, मेज के नीचे, पाँव की पहुँच में रखते थे, एक चपरासी के लिए, एक पीए के लिए...

     यहाँ तक तो सत्यजितजी के हिसाब से भी बात ठीक ही थी। चपरासी हो या क्लर्क ग्रेड का पीए, ये सब इसी लायक हैं कि इन्हें हाथ के इशारे पर नहीं, पैर की ठोकर पर रखा जाए...लेकिन अब यह तो ठीक नहीं ना कि...क्या कहें, कैसे कहें...

     मंत्रीजी अपने पीए को ही नहीं, पीएस याने श्री सत्यजित आईएएस को भी पैरघंटी से ही बुलाते थे। चपरासी और आईएएस को बुलाने का ढंग एक ही हो, यह तो प्रथम दृष्ट्या ही गलत था, ऊपर से घंटी भी हाथ से बजने वाली नहीं, पैरघंटी...इजंट इट टू मच, यार...

     सत्यजितजी को बेहद बुरा लगता था मंत्री महाराजा का यह अविवेक; लेकिन आईएएस ट्रेनिंग की औपचारिक शिक्षा याद रही हो न रही हो, सार की बात अन्य बंधु-बांधवों की तरह उन्होंने भी मन में गोया फेविकोल से चिपका ली थी- निचले पायदान वाले के सर पर पाँव, और उपरले पायदान वाले के पाँव पर सर रखे रहना ही तरक्की की सीढ़ियाँ चढ़ते चले जाने का असली मंतर है। सो, पैरघंटी से बुलाए जाने को लेकर अपनी असुविधा उन्होंने मंत्रीजी के सामने जाहिर कभी नहीं होने दी थी। फायदा क्या था? कितनी भी खिसिया ले, बिल्ली खंभे का नोच क्या सकती है, उखाड़ क्या सकती है?

     गुस्सा तो आता ही था, सो उसे झेलने के लिए थे ना बहुतेरे तुच्छ प्राणी, जिनके अस्तित्व पर सत्यजित की जबान गुलामों के मालिक के हंटर की तरह चलती थी, जिनके कानों की तरफ सत्यजित के शब्द ताजा फटे ज्वालामुखी के खौलते लावे की तरह लपकते थे। इन्हीं तुच्छ प्राणियों में से एक इस वक्त सूली चढ़ी बैठी थी सत्यजितजी के कमरे में जबकि पैरघंटी की बुलाहट सुन कर उन्हें मंत्रीजी के चैंबर की ओर लपकना पड़ा था, उस हरामजादी काली-कलूटी ओबीसी को वार्न करके ही निकले थे सत्यजितजी कि जब तक वापस ना आएं, खबरदार, हिलना मत, यहाँ से। मंत्रीजी के कमरे की ओर लपकते हुए सत्यजित की भुनभुनाहट जारी थी...’सर ही चढ़ते चले जा रहे हैं, यार ये लोग तो, इस को तो यह गुमान भी है ना कि बिना रिजर्वेशन के सर्विस में आई है, आई होगी, रहेगी तो ओबीसी ही ना, रिजर्वेशन नो रिजर्वेशन....खानदान थोड़े ही बदल जाएगा, औकात थोड़े ही बदल जाएगी...बैठी रहना, अभी वापस आकर बताता हूँ तेरी औकात, बेहूदी चिरकुट, जबसे दफ्तर में आई है, मेरे बनाए नोट में गलतियाँ निकालती रही...और अब चली है स्टडी लीव माँगने...’

     खिसियाहट इस वजह से कई गुनी हो गयी थी कि पैरघंटी उस कलूटी के सामने ही बज उठी और सत्यजितजी का तन-मन बेकाबू होकर रिफ्लेक्स एक्शन करने लगा था। घंटी बजते ही वे उछले, दरवाजे की ओर लपके, हड़बड़ाए शरीर का धक्का खा कर कुछ फाइलें मेज से धराशायी हुईं, संभलने के चक्कर में खुद गिरते-गिरते बचे। अपने आपको बचपन में सुने मुहावरे-लजवन पचाने- पर अमल करते पाया, कलूटी को सुनाते हुए बोले, “काम करना पड़ता है, इंपोर्टेंट पोजीशन पर...आपकी तरह नहीं....”

     हिम्मत...हिम्मत देखो नालायक की, चट से बोली, ‘काम सब करते हैं...’

     दरवाजे तक पहुँच चुके सत्यजित पलटे थे, ‘ सब पता है, सूरत देख कर ही जान गया था कि जिन्दगी भर हराम की खाई है, कभी काम नहीं किया है...मस्ती की है बस...और अब मस्ती के लिए ही यह स्टडी लीव का नाटक...’

      ‘भगवान से डरिए, सर...’

     हद है, यार कितनी चलती है जबान इस हेहर की। ठीक है कि इस ऑफिस में नयी आई है, मेरे रोब-दाब से वाकिफ नहीं, लेकिन यह तो हद ही है, ऐसी की तैसी इसकी...

      ‘स्टडी लीव तो आप भूल ही जाइए, मैडम...और अगर किसी तरह ले भी ली, तो लौट कर तो यहीं आना है, देखना कैरियर की ऐसी-तैसी न कर दी तो मैं भी राजन...आई मीन सत्यजित नहीं...’

     उठ खड़ी हुई थी , वह,सो भी लुंज-पुंज नहीं, आँखों में आँसू भर कर नहीं। सीधी रीढ़ के साथ, सचाई भरी, सहज ही चमकती आँखों के साथ...इसे तो ठीक करके ही रहूँगा...एकाएक सत्यजितजी ने मन ही मन अरसा पहले वैकुंठवासी हुए पिताश्री के साथ-साथ कुछ ही महीने पहले ब्रह्मलीन हुए मुखियाजी की भी कसम खाई, और साथ ही वे अपनी धरती से भी जुड़ गये, यह बदतमीज औरत भी तो उसी धरती की थी... ‘चलतानी कहुँवा, बइठल रहीं, रउआ से त अभी ठीक से बात करि के बा.., रिमैन सीटेड, मिनिस्टर साहब से मिल कर आता हूँ फिर बताता हूँ तुम्हें कि कैसे बात की जाती है, सीनियर अफसर से...भगवान से डरिए...यू ऐंड यौर भगवान...माई फुट...’

     कहते कहते सत्यजितजी अपने भगवान के मंदिर की ओर लपक लिए थे। प्रवेश करते ही पाया कि उनके भगवान इस समय वरदहस्त मुद्रा में नहीं, खड्गहस्त मुद्रा में थे। छूटते ही बोले ‘सुना है आपको पैरघंटी से कुछ परेशानी है, यू आर वेरी अपसेट विद दि फुटबेल एरैंजमेंट..’

     फुटबेल का जिक्र अपने भगवान के मुख से इस प्रकार सुनते ही, तुच्छ प्राणियों के वे ही भगवान जिनकी शान में अभी-अभी ‘माई फुट’ की घोषणा करके आए थे, सत्यजितजी को याद आने लगे।

      ‘नो सर, नो सर...आई मीन...’ मन ही मन बूझ रहे थे कि चुगलखोर कौन है, चुगलखोर भी क्या साला आदत से मजबूर...यह सिंह कमीना...खाने में तो हरामजादा पत्थर भी पचा जाए लेकिन बात जरा सी नहीं पचा सकता...मैं भी तो चूतिया हूँ, उसके सामने मुँह से निकल कैसे गयी इस साली फुटबेल की बात...

     मंत्री भगवान जारी थे, ‘ सुना है कि आपको इतनी बुरी लगती है हमारी फुट-बेल कि केब-सेक से बात करने जा रहे हैं...सीधे पीएम से ही मिल लीजिए ना...हमीं एपाइंटमेंट फिक्स करवा देते हैं आपका, फिर आराम से शिकायत कीजिएगा, हमारी नौकरी ही ले लेंगे आप तो, भई हम लोग तो वैसे ही आने-जाने, कौन सा चुनाव हार जाएं क्या पता, आप ठहरे परमानेंट सरकार, गवर्नमेंट के स्टील-फ्रेम... चुनाव हार गये तो आप लोगों की इस बिल्डिंग में हम तो घुस भी न पाएं...’

     मंत्रीजी की आवाज जरा भी ऊंची नहीं थी, एकदम संतुलित स्वर में बात कर रहे थे।

     सत्यजित के पाँवों तले चिकना वुडेन फ्लोर नहीं था, हड्डियों से भरी ऊबड़-खाबड़ जमीन थी। दीवारों पर उम्दा लकड़ी की चमकीली मढ़ावट नहीं थी, जंगल की पहाड़िया का चितकबरापन था। आँखों की पुतलियों पर खुद निगाहों से ओझल रह कर, दूधिया रोशनी फैलातीं बत्तियों की चमक नहीं थी, घनघोर अंधेरा था। उनके आस-पास रूम-फ्रेशनर की भीनी-भीनी सुगंध नहीं थी, मृत देहों की आदिम दुर्गंध थी...

     शिकार वाली तस्वीर का शेर जैसे जिन्दा हो गया था... सत्यजित को इतमीनान से निहार रहा था, खिला-खिला कर चबाने के मूड में लग रहा था।

      ‘ जाहिर है कि...’ मंत्रीजी जारी थे, ‘ आपके जैसे कंपीटेंट ऑफिसर की जरूरत तो आपके होम-काडर को भी होगी ही...’

     हे भगवान, अब दिल्ली से रवानगी...वापस महाराष्ट्र...चलो ग़नीमत है...

     लेकिन शेर ने अभी तो अंगड़ाई ही ली थी... ‘ हम खास रिक्वेस्ट करेंगे सीएम से कि आपकी कंपीटेंस और तजुर्बे का, आपकी इंटिग्रिटी का सही इस्तेमाल करें, गड़चिरोली में नक्सल चैलेंज के सामने आपके जैसा बहादुर और खानदानी अफसर ही टिक सकता है...’

     पहली बार शेर हल्के से दहाड़ा, पहली बार मंत्रीजी के मुँह से आप की जगह तुम निकला ‘ आई विल पर्सनली एन्स्योर कि तुम्हें गडचिरोली में ही पोस्ट किया जाए...’

     आवाज में फिर वही स्थिरता... ‘ऑफ कोर्स सीनियरिटी तो कंसीडर होगी ही, देयरफोर यू ऑट बी देयर इन ए सुपरवाइजरी कैपेसिटी, स्पेशल पोस्टिंग पर...बट गडचिरोली टु बी श्योर...’

     इस भयानक दशा में भी सत्यजित को वह चुटकुला याद आ गया, ‘पिताजी शेर के सामने पड़ गये थे...अच्छा तो फिर क्या किया उन्होंने...उन्हें क्या करना था...जो कुछ किया शेर ने ही किया...’

     लेकिन यहाँ तो कुछ करना ही पड़ेगा...वरना गड़चिरोली...नक्सल...

     लेकिन, कैसे? क्या?

     शेर खिलकौटी के मूड में ही बना हुआ था, ‘होम-काडर वापस भेज रहे हैं आपको...थैंक्यू सर भी नहीं कहेंगे क्या आप मिस्टर सत्यजित आईएएस?’

     मिल गया, डूबते को जिस तिनके की तलाश थी, मिल गया, चुटकुले वाले पिताजी की नियति से निकलने का जरिया मिल गया...

      ‘गलती तो सेवक से हुई है, श्रीमंत, लेकिन इतना अनसिविल तो आपका यह सर्वेट सपने में भी नहीं हो सकता कि महाराज को सर कहे, आप जो कहें मंजूर है, लेकिन यह गुस्ताखी तो मुझसे मरते दम तक नहीं होगी कि श्रीमंत या महाराज के अलावा कोई संबोधन दूँ, आपके पीठ-पीछे भी ध्यान रहता है मुझे...’

     मंत्रीजी जरा सा मुस्कराए, सेवक की हिम्मत बढ़ी, ‘मैं तो सपने में भी आपको हिज हाइनेस कह कर ही याद करता हूँ, यौर हाइनेस...’

     मंत्रीजी की मुस्कान थोड़ी और चौड़ी हुई, सर्वेंट की सिविलिटी कुछ और मुखर हुई, ‘ प्लीज पनिश मी इन वाटएवर वे...लेकिन श्रीमंत अपने श्रीचरणों से दूर न करें मुझे...गुस्ताखी तो हुई है, लेकिन बस एक लास्ट चांस...’

     मंत्रीजी के मुस्कराते मौन के संकेत ग्रहण कर, सत्यजितजी का स्वरूप परिवर्तित हो रहा था। उनकी जबान पुचकार पाने को व्याकुल, लप-लप करती जीभ में बदलती जा रही थी, कंठ-स्वर कूं-कूं की निरीहता ओढ़ चुका था। देह दो पैरों की मुद्रा त्याग कर चारों पैरों पर आ चुकी थी। शरीर के पार्श्व भाग में, बढ़िया कपड़े के पैंट में से दुम धीरे-धीरे निकल रही थी, और तेज-तेज हिल रही थी।

     अब उनके पाँवों के नीचे हड्डियों से भरी ऊबड़-खाबड़ जमीन नहीं, चिकना वुडेन फ्लोर था। जंगल की पहाड़िया के चितकबरेपन की जगह दीवारों पर उम्दा लकड़ी की चमकीली मढ़ावट थी । आँखों की पुतलियों पर घनघोर अंधेरे की जगह, खुद निगाहों से ओझल रह कर, दूधिया रोशनी फैलातीं बत्तियों की चमक थी। आस-पास मृत देहों की आदिम दुर्गंध की जगह रूम-फ्रेशनर की भीनी-भीनी सुगंध थी।

     मंत्रीजी देख रहे थे, सुन रहे थे। सत्यजित दुम हिलाते हुए अगली दोनों टाँगें उठाए, नृत्य कर उन्हें रिझा रहे थे, उनकी वंश-विरुदावली गाने में पेशेवर चारणों को पीछे छोड़ रहे थे। स्वयं मंत्रीजी का ऐसा गुणानुवाद कर रहे थे कि उनका क्रोध लाड़ में बदलता जा रहा था, वे मन ही मन कुछ अनौपचारिक भी हो रहे थे, उसी अनौपचारिक मुद्रा में उनके मुँह से लाड़ भरे शब्द निकले, ‘ क्यों ऐसी चापलूसी कर रहे हो, यार कि मेरे पेशाब की गंध को मलयानिल बनाए दे रहे हो, और कुछ नहीं तो अपने नाम का ही लिहाज करो...सत्यजित...’

     इन लाड़ भरे शब्दों ने सत्यजितजी को आश्वस्त भी कर दिया और प्रगल्भ भी। कूं-कूं करते आए और श्रीमंत के श्रीचरणों में थूथन रगड़ने लगे। आश्वस्त प्रगल्भता की तरंग में उनके मुँह से जो शब्द निकल रहे थे, उन्हें सुन कर यह दृश्य, बोरियत या दिलचस्पी से देख रहे देवता उलझन में थे कि सत्यजित की स्पष्टोक्ति पर पुष्प-वर्षा करें या उनकी निर्लज्जता पर प्रस्तर-वर्षा। देवताओं की उलझन से बेखबर सत्यजित कुंकुंआए जा रहे थे--- ‘ नाम के इन एकार्डेस ही तो चल रहा हूँ, यौर हाइनेस! मेरा नाम न तो सत्यकाम है कि सत्य की कामना करूँ, न सत्यप्रिय कि इसे प्यार करूँ। मैं तो सत्यजित हूँ। जीत लिया है मैंने सत्य को, ऐसा जीता है कि इसका जो चाहूँ मैं, यार करूँ, प्राण ले लूँ या बलात्कार करूँ... आपका पेशाब क्या, शिट भी साफ करवाऊं...मजाल है सत्य की कि चूँ भी कर जाए...सत्य को जीत लेना काम है मेरा, सत्यजित नाम है मेरा...सत्यजित रा...’

     वक्त रहते सँभल गये, सत्यजित। ‘राजन’ कहने वाले स्वर्गीय पिताश्री का लाड़ इस पल याद करना अभी-अभी, मुश्किल से कमाए गये महाराजश्री के लाड़ का कबाड़ कर सकता था। बात फौरन पटरी पर लाए, ‘सत्यजित...रा...मतलब, आप का, राजकुलदीपक आपश्री का चाकर...आपका सदा वफादार सेवक हूँ मैं श्रीमंत, सत्यजित हूँ मैं...विजेता सत्य का, अब इसका जो चाहे मैं यार करूँ, प्राण ले लूँ या बलात्कार करूँ...’

     मंत्री-महाराज का लाड़ और उमड़ा, पैरों पड़े सत्यजित का सर सहलाया, बोले, ‘उठो, ठीक है, बहुत हुआ, दुम अंदर करो, आगे से ख्याल रखना, जाओ अब...’

      ‘जो हुकुम दरबार का..’ कहते कहते सत्यजितजी ने दुम पैंट के अंदर की, और लटकती जीभ मुँह के अंदर...कमरे से निकले, और जंगल में टहलते शेर की अदा से अपनी गुफा की ओर चले, जहाँ उस हेहर औरत को छोड़ आए थे। ऊपर वाले के पांव पर सर रगड़ आने के बाद, अब ट्रेनिंग-सार के दूसरे हिस्से पर अमल करने का समय था। अब नीचे वाले के सर पर पांव रगड़ने का समय था। अपने असली भगवान को तुष्ट कर चुकने के बाद ‘भगवान से डरिए’ कहने वाली इस हेहर को और उसके भगवान को ठीक कर देने का समय था। अब कुकुरावतार से शेरावतार में संतरण का समय था। अब इस कुतिया को चींथ कर फेंक देने का समय था।

      ‘ऐसा सबक सिखाऊंगा, कुतिया को कि सारी हैन-तैन सदा के लिए भूल जाएगी...’ कमरे में घुसते ही गुर्राए, ‘ यस, वेल...मैडम सिंसियर...’

     लेकिन कुर्सी तो खाली थी, गुर्राहट मन ही मन दहाड़ में बदल गयी, यह मजाल, यह गुस्ताखी...अब तो साली को सस्पेंड करके ही दम लूंगा, ऐसा इनसबार्डिनेशन....यह हुकुम-उदूली...कह कर गया था कि यहीं मरी रहना...और उठ कर चल दी...’

     अपनी कुर्सी पर बैठ, पीए को बुलाने के लिए इंटर-काम उठाया सत्यजितजी ने कि सस्पेंशन लेटर डिक्टेट करें कि सामने रखे कागज पर निगाह गयी...अरे यह तो वही है...इस कागज में मुँह चिढ़ाती, नाक पर अंगूठा रख कर लिल्ली-टिल्ली करती...यह तो मेरी मेज पर, बल्कि मुँह पर इस्तीफा मार कर चल दी...चल कहाँ दी... इस्तीफे के इस सड़े से कागज में से झाँक तो रही है...उन्हीं चमकीली, साफ आँखों से...टिल्ली-लिल्ली कर रही है, उसी काली-कलूटी रंगत में चमक रही है, चिढ़ा रही है मुझे...लिल्लली—टिल्लली...

     गगनविहारी देवताओं को मजा आ गया। ऐसे दृश्य कहाँ रोज-रोज देखने को मिलते थे। ऊब और फटीग के शिकार बुजुर्ग देवता पुष्प-वर्षा की तैयारी में लग गये। युवतर देवगण तो उस कलूटी की जय-जयकार करते हुए उसकी चिढ़ोक्ति में अपना भी योगदान करने लगे...लिल्लली-टिल्लली..

     शिकार जिसके पंजे से निकल गया, उस शेर की दहाड़ से गूंज उठा कमरा...लेकिन जिसे सत्यजित दहाड़ समझ रहे थे, वह देवताओं को भौं-भौं सुनाई दे रही थी...बेबस भौं-भौं जो बीच-बीच में तो कूँ-कूँ की तरफ भी बढ़ उठती थी...

     सत्यजित मन भर कर दहाड़ या भौंक भी नहीं पाए थे कि एकाएक मेज पर रखी पैरघंटी बज उठी और अभी-अभी सबक सीख कर आए श्री सत्यजित तेजी से स्वरूपांतरण की प्रक्रिया में लग गये... भौं-भौं को उन्होंने तुरंत ही उचित स्वर-ताल वाली कूं-कूं में बदला। कुछ ही देर पहले जो अंदर की थी, वह दुम फिर से पैंट के बाहर धीरे-धीरे निकलने और तेज-तेज हिलने लगी।

     सत्यजितजी श्रीमंत के कमरे की ओर लपक लिये।

प्रो० पुरुषोत्तम अग्रवाल


जन्म २५ अगस्त, १९५५ को ग्वालियर, मध्य प्रदेश
महारानी लक्ष्मी बाई कॉलेज, ग्वालियर से स्नातक
जीवाजी विश्वविद्यालय, ग्वालियर से राजनीति विज्ञान में स्नातकोत्तर
भारतीय भाषा केंद्र, भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अध्ययन संस्थान, जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय, नई दिल्ली से हिंदी में एम.ए., और एम.फिल
१९८५ में जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय, नयी दिल्ली से हिंदी के प्रसिद्द आलोचक नामवर सिंह के निर्देशन में 'कबीर की भक्ति का सामाजिक अर्थ' विषय पर पीएच.डी
दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कॉलेज में अध्यापन के बाद पुरुषोत्तम अग्रवाल की नियुक्ति उसी भारतीय भाषा केंद्र में एसोशिएट प्रोफ़ेसर के रूप में हुई  २००३ में ये यहीं पर प्रोफेसर और केंद्र के अध्यक्ष बने.
२००५ से २००७ तक राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसन्धान परिषद् (एनसीईआरटी) की हिंदी पाठ्यक्रम निर्माण समिति (छठवीं कक्षा से लेकर बारहवीं कक्षा तक के लिए) के प्रमुख सलाहकार
कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय, यूनाइटेड किंगडम के फैकल्टी ऑफ ओरिएंटल स्टडीज में ब्रिटिश अकैडमी विजिटिंग प्रोफेसर
२००२ में कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के वोल्फसन कॉलेज के फेलो के रूप में कार्य किया.
मई से जुलाई, २००२ के बीच वे नेशनल कॉलेज ऑफ मैक्सिको, मैक्सिको सिटी में विजिटिंग प्रोफ़ेसर रहे.
२ जुलाई, २००७ को भारत सरकार ने पुरुषोत्तम अग्रवाल को संघ लोक सेवा आयोग का सदस्य मनोनीत किया. तब से लेकर अब तक वे इस पद पर बने हुए हैं.
संपर्क: purushottam53@gmail.com
 ‘नया ज्ञानोदय’ जून २०१३ में प्रकाशित...
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1 comments :

  1. कहानी का मेसेज स्पष्ट है। दब्बू ,कायर ,चापलूस ब्यूरोक्रेसी...।राजनीति की छत्रछाया की अनिवार्यता।शासन-प्रशासन का गठजोड़। और भी बहुत कुछ। अच्छी आधुनिक कहानी है। पैरघंटी।

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