कहानी: इति कृतम - अशोक गुप्ता

अशोक गुप्ता

305 हिमालय टॉवर
अहिंसा खंड 2
इन्द्रापुरम
गाज़ियाबाद 201010
मोबाईल 09871187875
ईमेल : ashok267@gmail.com



       ठंढ तो खैर थी ही, धुंध उस से कहीं ज्यादा थी, जिसकी वजह से हद से हद पचास मीटर की दूरी तक देखा जा सकता था. सुबह के छः बज कर सोलह मिनट हो रहे थे. पद्मशंकर की कार मेन रोड पर बस बीस किलोमीटर प्रति घंटे की रफ़्तार से चल पा रही थी. वह नए शहर में थे और पिछले डेढ़ घंटे से लगातार ड्राइव कर रहे थे. गाड़ी में अकेले थे. ऐसे में यह ज़रूरी था कि पूरी सावधानी के साथ चलें. अभी आधे घंटे से एक और मुश्किल ने उन्हें घेर लिया था. रह रह कर पेट में मरोड़ उठ रही थी जो ठहरती तो बस मिनट भर थी लेकिन उतनी ही देर में जान निकाल लेती थी.पद्मशंकर के अंदाज से उन्हें अभी करीब तीस किलोमीटर का और रास्ता तय करना था. धुंध के कारण पता नहीं चल रहा था कि वह अभी बाहरी इलाके में हैं या शहर की हद में दाखिल हो चुके हैं. उनकी कार की हेड लाईट हाई बीम पर ऑन थी और वह बीच बीच में हॉर्न बजा कर कोहरे में छिपे किसी अनदेखे को सावधान कर दे रहे थे. लगभग रेंगते रेंगते, घूमती सड़क पर उनकी हेड लाईट से एक बड़ा बोर्ड चमका,

      ‘शुभकामना अपार्टमेंट’

      मतलब शहर की सीमा शुरू हो चुकी है. पद्मशंकर ने कार धीमी की और बोर्ड के पास ठहर गए. बोर्ड पर सोसायटी के पदाधिकारियों के नाम लिखे थे... उनमें तीसरा नाम पद्मशंकर ने देखा,

      डा. शैलजा मेहंदीरत्ता बी ४११

      पल भर उन्होंने सोचा और गाड़ी सोसायटी के फाटक की ओर बढ़ा दी. अंदर अँधेरा पसरा पड़ा था और कहीं भी बी ब्लॉक पढ़ पाना आसान नहीं था. कार अंदाज से पार्क कर के पद्मशंकर पैदल आगे बढ़ ही रहे थे कि स्कूल जाते दो बच्चों के साथ उनकी आया को उन्होंने देखा.

      ;बी ब्लॉक ?’

      आया ने हाथ उठा कर अगला ब्लॉक दिखा दिया. ब्लॉक के नीम अँधेरे में उन्हें लिफ्ट दिख गयी और वह उधर ही बढ़ लिए. ऊपर जा कर उनकी लिफ्ट फ़्लैट ४०१ के सामने लिफ्ट रुकी. आगे के नंबर टटोलते पद्मशंकर बढ़ने लगे. दो बार दाहिने घूमने के बाद फ़्लैट नंबर ४११ ठीक उनके सामने था जिसकी नंबर प्लेट के ऊपर एक हल्की रौशनी वाला बल्ब जल रहा था. अँधेरे में छिपी एक नेम प्लेट भी थी जिसे देखने की जरूरत पद्मशंकर ने नहीं महसूस की और दरवाज़े की घंटी बजा दी.

      एक लडकी ने दरवाजा खोला. शायद मेड थी.

      ‘डा. शैलजा’

      ‘आइये.’ लडकी ने उन्हें भीतर आने का इशारा किया. दरवाज़े और कमरे के बीच एक कॉरीडोर था जिसे पार करने के लिए पद्मशंकर को करीब दस कदम चलना पड़ा. कॉरिडोर में लगभग अँधेरा था लेकिन कमरे में बाकायदा सुखद रौशनी थी. कमरे की सज्जा वैसी ही थी जैसी किसी ड्राइंग रूम कहे जाने वाले कमरे की होती है. पद्मशंकर के बैठने के दो-तीन मिनट बाद सुन्दर से गाउन में लिपटी एक संभ्रांत सी करीब पैंतालीस वर्ष की महिला वहां आ खड़ी हुई.

      ‘कहिये’

      ;मैडम, मैं दूसरे शहर से ड्राइव करता हुआ आ रहा हूं. इस शहर में एकदम नया हूं. पिछले आधे घंटे से पेट में रह रह कर मरोड़ उठ रही है, जब कि मुझे अंदाज नहीं है कि मुझे अभी कितनी दूर और जाना है. धुंध..’

      ‘ओह...’ उस महिला ने पद्मशंकर की आगे की बात को वहीँ रोक दिया.

      ‘ मैं मेडिकल डॉक्टर नहीं हूं भाई साहब. यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर हूं और डॉक्टर मेरी डिग्री है... ठीक है, मैं देखती हूं, कुछ न कुछ दवा मेरे पास निकल सकती है. लगता है, आपको ठंढ लगी है.’

      ‘हाँ, रात को होटल में रुका था. हम लोग वेजीटेरियन है इसलिए वहां कुछ खाने का मन नहीं किया, बस कॉफी पी कर सो गया.’

      ‘..मतलब खाली पेट है, तभी. दवा मैं निकलती हूं. लेकिन पहले आप एक टोस्ट ले लीजिए.

      ‘बच्ची’ उस महिला ने पुकारा और मेड आकर खड़ी हो गयी. संवाद हुआ और फिर मेड एक टोस्ट और एक कप चाय लेकर आ गयी. तभी डा. शैलजा भी दो टैबलेट ले कर पहुँच गईं. इस परिवेश में पद्मशंकर को कुछ राहत महसूस हुई और सहज संवाद की स्थिति बन गयी.

      ‘इस शहर में बेटे के एडमीशन के लिए आया हूं. कल भी एक दूसरी जगह फ़ार्म जमा किया है.’

      ‘किस क्लास में एडमीशन ..?’

      ‘ नाइंथ में मैडम. आगे मैथ्स के साथ कॉमर्स पढना चाहता है.’

      ‘यहाँ किस स्कूल में ...?’

      पद्मशंकर ने स्कूल का नाम बताया, उस दोस्त की कॉलोनी का नाम बताया, जहाँ वह अभी परिवार के साथ ठहरा हुआ है. इसी रौ में पद्मशंकर यह भी बता गया कि यहाँ अभी साढ़े ग्यारह बजे लड़के का इंटरव्यू है, शायद मां बाप का भी इंटरव्यू हो, उसी के आधार पर कुछ फाइनल होगा.’

      यह बातें सुन कर बच्ची किचिन से बाहर आई.

      ‘अरे, वह जगह जहाँ आप ठहरे हैं, यहाँ से बस चार पांच किलोमीटर दूर है. स्कूल भी वहीँ पास में है.’

      हंसी डा. शैलजा. ‘लीजिए, आपका काम आसान हो गया. अभी पौने आठ बज रहे हैं. चाय के बाद एक टैबलेट ले कर आप घंटा भर आराम कर लीजिए.’

      फिर डा. शैलजा ने बच्ची को पुकारा.

      ‘राहुल का कमरा ठीक कर दो’

      पद्मशंकर के चेहरे पर किंचित एक असमंजस उभरा.

      ‘राहुल मेरा बेटा है. सुबह सात बजे जिम के लिए निकल जाता है, फिर टेनिस. करीब दस बजे लौटेगा.’

      ‘खिलाड़ी है ?’

      ‘हाँ, खेलता है. ग्यारहवीं में पढ़ रहा है. साइंस का स्टूडेंट है. कहता है कि एयर फ़ोर्स में जाना है.’

      ‘फौज..?’ आपको डर नहीं लगता ?’

      ‘न नहीं. मेरे दो भाई एयर फ़ोर्स में हैं.’

      ‘.. और राहुल के पापा...?’

      ‘ मेहंदीरत्ता साहब तो पढाकू हैं, स्कॉलर. प्राचीन इतिहास के एक्सपर्ट हैं. उनके साल के तीन चार महीने विदेश में बीतते हैं, लेकिन डरते वह भी नहीं हैं. बाप-बेटे में बहुत पटती है. दोनों टेनिस के शौकीन हैं.’

      चाय पी कर, टेबलेट ले कर, करीब पौन घंटे आराम कर के पद्मशंकर चलने को तैयार हुए. इस बीच डा. शैलजा भी कॉलेज जाने को तैयार थीं. चलते चलते बच्ची नें पद्मशंकर को रास्ता बताया. धुंध काफी छंट चुकी थी और उजाला फ़ैल आया था.

      ‘पहुँच कर एक रिंग मार दीजियेगा. बेस्ट ऑफ लक.’

      धन्यवाद कहा पद्मशंकर नें और बाहर की ओर चल दिए. बच्ची डा. शैलजा का टिफिन पैक करने में लग गयी. बाहर आ कर पद्मशंकर नें फ्लोर के उस फ़्लैट को उजाले में नए सिरे से देखा. वहां से उन्हें नीचे अपनी कार खड़ी दिखाई दी. लिफ्ट की तरफ बढ़ते हुए उनकी नज़र डा. शैलजा की नेम प्लेट पर गयी और वह बुरी तरह चौंक पड़े. एक झटका जैसा लगा उन्हें. लिखा था,

      डा. शैलजा मेहंदीरत्ता
      एच. आई. वी. पॉजिटिव

      ऐसा तो पहले कहीं नहीं देखा था कि कोई अपनी नेमप्लेट पर ऐसा कुछ लिखे.लोग पदनाम और डिग्री वगैरह तो लिखते हैं, लेकिन...

      शॉक के बावजूद पद्मशंकर रुके नहीं और नीचे उतर कर तेज़ी से कार की ओर बढ़ चले. बेटे के इंटरव्यू का दबाव उन पर स्थायी भाव की तरह छाया हुआ था.

*************

      दोस्त के घर पहुँच कर पद्मशंकर नें डा. शैलजा को अपने पहुँच जाने की एक संक्षिप्त सी सूचना दी और बेटे को लेकर स्कूल जाने की तैयारी करने लगे. दवा और आराम के असर से अब वह बहुत स्वस्थ महसूस कर रहे थे.

      पद्मशंकर के बेटे का इंटरव्यू हुआ. उसको कामयाबी मिली. हॉस्टल भी मिल गया. यह भी पता चला कि हॉस्टल में अलग वेजिटेरियन मेस भी है. सब संतोषप्रद रहा तो पद्मशंकर ने फिर डा. शैलजा को फोन पर यह सूचना दी. पद्मशंकर के मन में बेटे का मनचाहे स्कूल में इच्छित विषय के साथ एडमीशन मिल जाने का गहरा उत्साह था, तो उस नेमप्लेट पर लिखी विचित्र इबारत की हलचल भी कम नहीं थी. पद्मशंकर एक संकोची व्यक्ति थे. डा. शैलजा उनसे उम्र में बहुत बड़ी थीं, ऊपर से उनके प्रोफ़ेसर होने के रुतबे का वज़न था, इसलिए तमाम उत्सुकता के बावजूद पद्मशंकर डा. शैलजा से उनकी नेमप्लेट का ज़िक्र नहीं कर पाए और फोन बंद कर दिया.

      पद्मशंकर खुद कभी हॉस्टल में नहीं रहे. पढ़ाई और नौकरी के दौरान उन्हें कभी अपना शहर नहीं छोडना पड़ा. जो अपने शहर में मिला वही पढ़ लिया. वहीँ बिजली बोर्ड में नौकरी मिल गयी, तो जैसी भी थी, पकड़ ली. बुआ जी की मां को बताई लड़की से व्याह कर लिया. उनका ससुराल भी उन्हें कहीं दूर, नए शहर का मौका नहीं दे पाया. इसलिए, बेटे के भविष्य का एकदम नया रास्ता उन्हें बहुत आनंद और अचम्भे से ओत-प्रोत कर रहा था, इसके बावजूद डा. शैलजा की नेमप्लेट की हलचल उनके भीतर ठहर नहीं रही थी... गहरा अचरज था और थी भौचक जिज्ञासा, लेकिन पद्मशंकर कोई शब्द नहीं जुटा पा रहे थे जो वह डा. शैलजा से इस बारे में बात खोल सकें.

      पद्मशंकर अपने बिजली बोर्ड के दफ्तर में अपनी एसोसियेशन के सेक्रेटरी थे और अच्छे वक्ता माने जाते थे, लेकिन बस सार्वजानिक वक्ता. दोस्तों के परिवारों तक में उनका संकोच उन्हें बांधे रखता था. सोच विचार से गुजरते हुए पद्मशंकर को एक युक्ति सूझी और उन्होंने डा. शैलजा को फोन मिला दिया. फोन डा. शैलजा के बेटे राहुल ने उठाया. कुछ सकपकाए पद्मशंकर, लेकिन खुद को साध कर उन्होंने अपना नाम बताया. राहुल उन्हें पहचान गया. उसने उत्साहित हो कर पद्मशंकर को बधाई दी और उनके बेटे का रूम नंबर वगैरह पूछा, हालांकि उसका सत्र शुरू होने में अभी देर थी. इस से कुछ सहज हुए पद्मशंकर और उन्होंने अपना प्रश्न सामने रख ही दिया.

      ‘ डा. शैलजा फेसबुक पर हैं क्या..?’

      ‘ हैं अंकल. राहुल ने चहक कर जवाब दिया. ‘ मम्मी फेस बुक पर भी हैं और गूगल पर नाम से खोजिये तो उनके और भी कई लिंक्स मिल जाएंगे. जियो-फिजिक्स सोसायटी पर तो हैं ही, उनके एक्सपर्ट्स पैनल में हैं.’

      ‘ठीक है.’ पद्मशंकर ने कहा और धन्यवाद देकर फोन रख दिया.

      पद्मशंकर की हलचल को फेसबुक के जरिये एक राह तो मिली, लेकिन फिर भी वह तय नहीं कर पा रहे थे कि वह अपनी बात कैसे शुरू करेंगे.

*************

      अपने शहर में, घर पहुँच कर पद्मशंकर गूगल के जरिये डा. शैलजा के लिंक्स तक पहुंचे. डा. शैलजा का परिचय कई रास्तों से चल कर पद्मशंकर तक आया था. यूनिवर्सिटी के माध्यम से, जियो-फिजिक्स सोसायटी के माध्यम से और फेसबुक पर स्वतंत्र माध्यम से, जहाँ उन्होंने अपने परिचय में खुद अपना एच. आई. वी. पॉजिटिव होना लिखा है. डा. शैलजा एक एन. जी. ओ. से भी जुड़ी थीं जो देश-विदेश में प्राकृतिक आपदा प्रबंधन पर काम करती है, जिनमें भूस्खलन और भूचाल जैसी आपदाएं विशेष रूप से उल्लेखित हैं. इसी क्रम में पद्मशंकर को डा. शैलजा का ई मेल का पता भी मिला और हिम्मत साध कर उन्होंने शुरुआत उसी के जरिये की.

      औपचारिक संवाद के पूर्वाभ्यास के बाद पद्मशंकर ने अपनी मूल जिज्ञासा को स्वरूप दिया. सबसे पहले उन्हें यह जानना था कि आखिर किस तर्क के आधार पर डा. शैलजा को अपना एच. आई. वी पॉजिटिव होना सार्वजानिक करना ठीक लगा ? फिर यह, कि यह जानकारी सार्वजनिक हो जाने के पर उनकी जिंदगी पर क्या असर पड़ा..? तीसरे स्तर की जिज्ञासा में बहुत सारे सवाल थे, लेकिन सबसे पहले कठिन प्रश्न यह था कि वह इस विषय में डा. शैलजा से बात शुरू कैसे करें.

      अपने भीतर बहुत जूझने के बाद पद्मशंकर नें तय किया कि वह ई मेल पर डा. शैलजा से चैट का प्रस्ताव रखेंगे. आखिर दूर लाइन पर होने से कुछ तो हिम्मत वह रख पाएंगे.

      प्रस्ताव रखा गया. डा. शैलजा ने उसे माना. और तय हुआ कि एक रविवार को शुरुआत की जाय. उस दिन डा. शैलजा का बेटा जिम गया हुआ था. बच्ची घर की साप्ताहिक साफ़-सफाई में लगी हुई थी और डा. शैलजा अपनी स्टडी में अपना लैपटॉप ले कर बैठी थीं.

      पद्मशंकर - मैं उसी दिन से शुरू करता हूं जिस दिन मैं पहले-पहल आपको बीमारों का डाक्टर समझ कर आपके फ़्लैट में भटक आया था.

      डा. शैलजा - ठीक है.

      पद्मशंकर - आपने एक अजनबी इंसान की जिस आत्मीयता से मुश्किल हल की वह आपका बहुत बड़प्पन है.

      डा. शैलजा - अरे नहीं..

      पद्मशंकर - ....और वापस लौटते समय मेरी नज़र आपकी नेमप्लेट पर पड़ी थी. उस पर आपका नाम लिखा था साथ ही..

      यहाँ पहुँच कर पद्मशंकर हिचक गए, लेकिन अपनी जिज्ञासा का संकेत वह दे चुके थे. डा. शैलजा शायद इस प्रसंग के लिए तैयार थीं और उनके मन में इसके प्रति कोई दुविधा नहीं थी. पद्मशंकर के इस ठहराव को उन्होंने ने ही तोड़ा.

      डा. शैलजा - ठीक है, आगे कहिये, मैं लाइन पर हूं.

      पद्मशंकर - जी...आप...एच. आई. वी. पॉजिटिव हैं, यह दुर्भाग्यपूर्ण है, लेकिन यह जानकारी नेमप्लेट पर क्यों है?

      डा. शैलजा - सिर्फ नाम होना चाहिए था क्या ?

      पद्मशंकर - हाँ...या चाहे आपकी डिग्रियां.

      डा. शैलजा - मैं पिछले कई बरसों से प्रोफ़ेसर हूं. मेरे साथ के सभी जानते हैं. और दूसरों को मेरी डिग्री से क्या मतलब ?

      पद्मशंकर-  ...लेकिन डिग्री या पदनाम लिखने का चलन तो है.

      डा. शैलजा - इस चलन से किसी को क्या फायदा..? लोग तो यह भी नहीं जानते होंगे कि जियो-फिजिक्स क्या बला है.

      पद्मशंकर की ओर से कुछ देर खामोशी है.

      डा. शैलजा - मिस्टर शंकर, आप ऑन लाइन हैं ?

      पद्मशंकर - यस मैडम हूं, और कोई जवाब नहीं है मेरे पास. लेकिन परेशान अब भी हूं क्यों लगा आपको कि यह बात सब लोग जानें ?

      डा. शैलजा - इंटरेस्टिंग... अच्छा बताइये कि हमारे परिवारों की शादीशुदा औरतें मांग क्यों भरती हैं ?

      पद्मशंकर - बस, यह एक संकेत है कि वह शादीशुदा हैं.

      डा. शैलजा - उस से दूसरों या देखने वालों को क्या फर्क पड़ता है ? शादी के बाद तो औरतों के शरीर और पहनावे पर ऐसा बदलाव आने ही लगता है जो वह क्वांरी से अलग दिखें, तो फिर मांग भरने का क्या मतलब

      पद्मशंकर - आपने तो चक्कर में डाल दिया.एक तो यह रस्म है, शायद इसलिए, दूसरे शादीशुदा होना उनका गौरव है, इसलिए भी...

      डा. शैलजा - क्या आपको पता है मिस्टर शंकर कि तीस से पचास साल की औरतों की मृत्युदर जितनी शादीशुदा औरतों में है, अविवाहितों में उस से कहीं कम है.

      पद्मशंकर - ऐसा क्या..?

      डा. शैलजा - जी हाँ. और आत्महत्या की दर में तो इन दोनों के बीच कोई तुलना ही नहीं है. तो फिर यह गौरव कैसे हुआ ? कोई और कारण सोचिये.

      पद्मशंकर - एक और कारण हो सकता है. औरतें हमेशा सुन्दर होती हैं और उन पर पुरुषों की नज़र रहती है. मांग भरी होना इस बात का इशारा है कि उन पर डोरे डालना बेकार है.

      डा. शैलजा - ओ. के. लेकिन औरतें क्या यह पसंद नहीं करतीं कि कोई उन पर नज़र डाले, चाहे यह क्वांरी हों या विवाहिता ?

      पद्मशंकर - सवाल औरतों की पसंद का नहीं है. पुरुष इसे बर्दाश्त नहीं करते कि उनकी बीबियों पर कोई डोरे डाले. इसलिए मांग भरना इस बात का इशारा है कि इन पर नज़र डालना जोखिम भरा है. मर्द ऐसी स्थिति में मरने मारने पर उतर आते हैं.

      डा. शैलजा - फाइन...तो यह मर्दों का इंतज़ाम है कि उनकी बीबियाँ मांग भरें. इसीलिए यह परंपरा भी बना दी गयी है.

      पद्मशंकर - जी हाँ, यही लगता है.

      डा. शैलजा - तो फिर अब यह बताइये, कि क्या ऐसा ही कोई तर्क इसमें भी सोच सकते हैं आप, जो मैंने अपनी नेमप्लेट पर अपना एच. आई. वी. पॉजिटिव होना ज़ाहिर कर दिया है ?

      पद्मशंकर - ओह यस.. यह एक सुरक्षा घेरा खींचा आपने इस तरह.. एक दूसरी देहलीज़ बनाई. क्या यह भी मैडम, मेहंदीरत्ता साहब की व्यवस्था है ?

      डा. शैलजा - अरे नहीं. वह तो इसके लिए तैयार नहीं थे... और उनकी भूमिका कि तो लंबी कहानी है.

      पद्मशंकर - तो बताइये न..

      डा. शैलजा -  नो, अब आज और नहीं. बेटा आज स्पेशल ब्रेकफास्ट माग कर गया है. देखूँ, बच्ची ने क्या किया है.    

      पद्मशंकर चैट से उठे तो उनकी उलझन बढ़ गयी थी. कुछ सवालों के जवाब मिले, तो कुछ नए सवाल मन में आकर बैठ गए. डा. शैलजा को यह संक्रमण कैसे हुआ, यह जानने में पद्मशंकर को कोई रूचि नहीं थी. उन्हें पता था कि कारण कोई भी रहा हो, वह त्रासद ही होगा. लेकिन उनकी जिज्ञासा यहाँ प्रबल हो आई थी कि इस हादसे का पता चलने पर इसे परिवार ने कैसे लिया और कैसे खुद को इतना तैयार किया कि वह अपने समाज के सामने खुद को बचाए रख सकें. पद्मशंकर के भीतर फिर चैट पर बैठने की अकुलाहट ज़रूर थी, लेकिन उसके पहले यह ज़रूरत भी वह महसूस कर रहे थे कि वह सोच की गहरी प्रक्रिया से गुजरें और अनावश्यक, अप्रासंगिक तथा उलझे हुए अस्पष्ट सवालों के साथ पेश न हों. इस चैट के पहले पद्मशंकर इस चैट वैट को नौजवानों का, टाइम बर्बाद करने वाला शगल मानते थे और इस सब को बकवास समझते थे. लेकिन अब, उनके भीतर इसकी उपयोगिता एक नया ही आकार ले रही थी.

      इस चैट ने उन्हें एक होमवर्क सौंपा था कि वह उन सवालों के अपने जवाबों पर फिर से मनन करें, जो उन्होंने फौरी तौर पर डा. शैलजा को दे दिए थे. ज़ाहिर है कि पद्मशंकर डा. शैलजा के उन प्रश्नों का सामना करने के लिए तैयार नहीं थे. न ही उनकी खुद की जिज्ञासा इतनी साफ़ थी जो वह अपने दो टूक सवालों को डा. शैलजा के सामने रख सकते. इस तरह एक सतही कोशिश के बाद पद्मशंकर खुद को एक बेहतर जिज्ञासु की तरह तैयार करने में लग गए थे.

      जैसा कि ज़रूरी था, पद्मशंकर अपनी नियमित जिंदगी में लौट आये लेकिन यह प्रसंग उनके भीतर पकता रहा. जैसे हवा में उड़ते बादल आसमान में अपनी आकृति बदलते चलते हैं, वैसे ही प्रश्न, पद्मशंकर के मन में उमड़ते, उलझते, साफ़ होते और फिर कहीं जा कर ठहर जाते. पद्मशंकर इस बात को समझने लगे थे कि आतुर प्रश्नों की एक गठरी है उनके भीतर जो भारी होती जा रही है.

      पद्मशंकर उस गठरी के भार के असह्य हो जाने की प्रतीक्षा कर रहे थे.

      ***

      जनवरी के पहले हफ्ते में पद्मशंकर उस नए शहर में थे, जहाँ उनके बेटे का एडमीशन हुआ था. अब बेटे का नया सत्र मार्च के दूसरे सप्ताह में शुरू होना था. इस बीच पद्मशंकर अपने नियमित जीवन के साथ उस प्रश्न चक्रवात को भी झेल रहे थे जो उनके भीतर चल रहा था. डा. शैलजा से उनकी केवल एक भेंट हुई थी और केवल एक बार वह उनके सामने चैट पर बैठे थे, चैट हुए भी करीब दो महीनें बीत गए थे. पद्मशंकर महसूस कर रहे थे कि इस प्रश्न संधान ने उन्हें बदल दिया है. वह ऐसे प्रसंगों को अब ठहर कर सोचने लगे हैं जो अब तक उनकी नज़र को बस सरसरी तौर पर छू कर गुजर जाते थे.

      अक्सर मन ही मन उनकी डा. शैलजा से चैट चलती रहती थी. वह खुद ही डा. शैलजा की तरफ से सवाल पूछते और निरुत्तर रह जाने पर उनके जवाब खोजने में लग जाते. उनके खुद के भी प्रश्न होते जो वह डा. शैलजा से पूछने के लिए उठाते और अब उनके उत्तर खोजना भी उन्हीं का ही काम हो जाता.

      - कैसा लगता है डा. शैलजा, आप एक एक कदम, एक तयशुदा मौत की तरफ बढ़ रही हैं ?.

      - क्या मौत का कारण पता चल जाने भर से मौत के सच का मतलब बदल जाता है मिस्टर शंकर ?

      ऐसे प्रश्न पद्मशंकर को निरुत्तर कर देते थे या प्रतिप्रश्न बन कर बूमरेंग की तरह उन तक लौटते थे.

      - सब लोग अपनी अपनी अनदेखी अनजानी मौत की तरफ तयशुदा ढंग से बेआवाज़ बढते चलें, यह एक बात है. लेकिन बहुत सारे लोग एक ऐसे व्यक्ति के पीछे उसके साथ साथ चलने लगें जिसकी मौत अपने स्पष्ट आकार में दिख रही है, यह दोनों स्थितियां एक सी हैं क्या डा. शैलजा ?

      - डा. शैलजा, प्लीज़ बताएं, क्या मौत के स्लो मोशन आक्रमण से घबरा कर आपके मन में ख़ुदकुशी करने का विचार नहीं आता, कि जो तयशुदा अंजाम अंततः होना ही है, एक झटके में हो कर खत्म हो जाय.

      इस अंतर्संवाद के बीच पद्मशंकर कई बार डा. शैलजा का हँसी जैसा स्वर सुनते जो पद्मशंकर के बौने सवालों को उड़ा देता.

      - आपने कभी इन्टरनेट पर अलग अलग लिंक्स के जरिये मेरा हाल का किया जा रहा काम देखा है?

      - क्या आपने देखा है कि मेरे कामों पर अंतर्राष्ट्रीय स्वीकृति की मोहर भी लगी है ?

      - मैं और मेहंदीरत्ता साहब हरियाणा और पंजाब के छोटे शहरों से आये हैं, लेकिन मैं साउथ इन्डियन और इंटरकॉनटिनेंटल दोनों ही तरह की डिशेज बहुत बढ़िया बनाती हूं, यह आप मेरे बेटे से पूछिए.

      - जब बाहर भी होते हैं मेहंदीरत्ता साहब और हम चैट पर बैठते हैं, तो वह मेरा गाना सुनते हैं. यस, मैं गाती हूं.

      यह सारी सूचनाएं पद्मशंकर तक इन्टरनेट और फेसबुक के जरिये पहुंची हुईं थीं. इस साइबर दुनिया में पद्मशंकर का झांकना बस इसी दौर में शुरू हुआ था और उन्हें इस बात पर बहुत हैरत हुई थी कि कोई अपने भीतर की दुनिया को इतना पारदर्शी हो कर कैसे दिखा सकता है.? पारदर्शी होना सार्वजनिक होना है, और जब पारदर्शी होने की लत आपमें जाग जाय तो मन में कलुष कहाँ उपज ठहर सकता है ?

      पद्मशंकर इस दुनिया के बारे में भी हैरत से सोचते थे. फेसबुक पर एक प्रसंग पढ़ा था उन्होंने...

      एक युवक भोर के पहले पहर अपनी फेसबुक पर लिख रहा था.. एक पश्चाताप था उसके मन में, जिसे वह साझा कर रहा था. उसने साफ़ लिखा था कि उसी रात उसने अपनी पत्नी के साथ उसकी अनिच्छा के बावजूद सहवास किया और फिर उपसंहार में अपनी पत्नी के चेहरे पर उसे जो दिखा, वह रात भर उसे पछतावे से भरता रहा.

      यह प्रसंग पढ़ना पद्मशंकर के लिए ठीक वैसा ही था जैसा उस दिन यकायक डा. शैलजा की नेमप्लेट पर उनका एच. आई. वी. पॉजिटिव पढ़ लेना...और यह साक्ष्य पद्मशंकर के लिए प्रश्नों के तूफान जैसे थे, जिनके बीच उसके मन में डा. शैलजा की आवाज़ गूँजती थी.

      “ मैं अपने परिवार और अपने काम में अपनी भरपूर जिंदगी जी रही हूं मिस्टर शंकर. अपनी निजी अंतरंगता में मेरा संक्रमित होना मेरे भीतर कुछ भी बदरंग नहीं करता, भले ही वह पूरी तरह से विस्मृत भी नहीं होता. इस सच नें मेरी जीवन शैली में अपनी थोड़ी सी जगह बना ली है, बस.“

      “ ... लेकिन कैसे डा. शैलजा ? कैसे ?”

      “ यह खोज मैं नहीं करती मिस्टर शंकर. अगर यह आपकी प्रॉब्लम है तो आप करें ?”

      हर बार अचकचा कर उठ बैठते पद्मशंकर. गेंद उन्हीं के पाले में आ कर ठहर जाती, और शुरू हो जाती उनकी खोजी दौड़. यह एक ऐसी खोजी दौड़ थी पद्मशंकर के लिए जिसने उन्हें संकोची अंतर्मुखी व्यक्ति से उदार, पारदर्शी जिज्ञासु बना दिया था. यह एक सार्थक बदलाव था लेकिन इसने पद्मशंकर को बहुत बेचैन कर रखा था.

      ***

      नए स्कूल में बेटे के सत्र के शुरुआत के दिन ने पद्मशंकर को फिर उस शहर में बुला लिया था जिसे उन्होंने घने कोहरे के बीच जनवरी के पहले सप्ताह में छोड़ा था. इस बार लेकिन मंज़र बहुत फर्क था. एक अजीब सा नशीला गुनगुनापन हवा में बसा हुआ था. भरपूर उजाला था, और चारों ओर खुश्बू थी जो पता नहीं धूप की थी या हवा की. जिसकी भी थी, यह खुश्बू कहीं से चुरा कर लायी हुई थी, क्यों कि फूल वहां नहीं थे. खुश्बू में फूलों की हाजिरी थी, भौरों का गुंजन और तितलियों का रंगीलापन था. पद्मशंकर के भीतर बाहर इस मौसम में सब कुछ पारदर्शी था. इसलिए जो काफी समय तक उन्होंने अपनी पत्नी से नहीं साझा किया था, वह अब साझा किया जा चुका था. साझा न करने का अर्थ छिपाना नहीं होता, यह पद्मशंकर जानते थे और अक्सर व्यवहार में भी लाते थे, लेकिन साझा करने में क्या सुख आयाम है, यह उन्होंने अभी हाल में ही जाना था और अपना भी लिया था. इस नाते पद्मशंकर की पत्नी अनुभा भी डा. शैलजा के आतुर प्रसंग से अवगत थी और अपने पति और बेटे के साथ आई भी थी.

      अपने बेटे को हॉस्टल में व्यवस्थित कर के पद्मशंकर ने जब डा. शैलजा को फोन किया तो वहां उस घर में बहुत फर्क ही माहौल था. फोन डा. शैलजा ने ही उठाया और बताया कि आज उनके बेटे राहुल का जन्मदिन है. और मेहंदीरत्ता साहब भी आये हुए हैं. पता चला कि अपनी पार्टी तो राहुल अपने दोस्तों के साथ ही बाहर करेगा और हवन –पूजा सुबह हो ही चुकी है, इसलिए पद्मशंकर और अनुभा का आना मेहंदीरत्ता परिवार को बहुत अच्छा लगेगा. बस, फिर क्या था... इन चारों की मीटिंग उसी दिन शाम के लिए तय हो गयी.

      ***

      यह बैठक राहुल के जन्मदिन के कारण उत्सव धर्मी भी थी और इसं अर्थ में विशिष्ट भी कि इसमें जिज्ञासा समाधान की अनेक संभावनाएं थीं. राहुल के पिता विवेक मेहंदीरत्ता का भी घर पर होना इस दिन को और भी महत्वपूर्ण बना गया था. डा. शैलजा अब तक उनसे पद्मशंकर का प्रसंग साझा कर चुकीं थीं. इसलिए इस बैठक में विवेक मेहंदीरत्ता की भी सक्रिय भागीदारी अपेक्षित थी.

      शैलजा, विवेक, पद्मशंकर और अनुभा चारों डा. शैलजा की स्टडी में ही जमे थे. बच्ची बाहर टी वी चला कर बैठ गयी थी कि जब उसे बुलाया जाय, वह जा पहुंचे.

      बात विवेक ने ही शुरू की.

      ‘ ... तो पद्म जी, बेटे को हॉस्टल में ठीक से सेट कर दिया न. कोई दिक्कत हो तो बताइये. आप चाहें तो हमें बेटे का लोकल गार्जियन भी बना सकते हैं. “

      “ हाँ. बच्चा पहली बार घर से निकल रहा है..”

      “ आप चिंता न करें अनुभा जी..हम लोग हैं.” डा. शैलजा ने समझाया.

      “ ... और पद्मशंकर जी, पता चला है कि आप इनकी नेमप्लेट देख कर बहुत परेशान हो गए हैं.. “ विवेक ने बात की नई राह खोली.

      “ हाँ. अब तक कुँए का मेढक रहा हूं. बहुत कुछ अनजाना रहा या अगर सामने आया भी तो उस पर गौर नहीं किया. इसलिए सचमुच मैं बहुत हिल गया. एक तो जानलेवा संक्रमण, उस पर से उसे बिना छिपाव-दुराव के सबके सामने ले आना. ऐसा संक्रमण होता भी ऐसे तरीके से है जो पूरी तरह मन से भी तोड़ देता है और नाते-रिश्तेदारों से भी. स्थिति भयंकर तो होती ही होगी.”

      हँसे विवेक.

      “ नहीं पद्मशंकर जी. हमेशा ऐसा नहीं होता.”

      “ तो ?”

      “ सुनाता हूं.

      अपना राहुल करीब दो बरस का था उस समय. शैलजा को अपने एन. जी. ओ. के एक प्रोजेक्ट के लिए उत्तराँचल जाना था. मैं भी तीन हफ्ते के एक सेमीनार के बाद मिस्त्र से लौटा था और इस मूड में था कि इस पर एक किताब पूरी कर ली जाय. पहाड़ों पर गर्मियों का खुशनुमा वक्त गुज़ारने का हमारे पास एक मौका आया तो हम सब चल दिए. अच्छा समय गुजार रहा था. हमारे पास एक बहुत खूबसूरत जगह पर एक कॉटेज था जहाँ से सूर्योदय का नज़ारा बेहद मनमोहक दिखता था. एक सुबह मुझसे मिलने कुछ लोग आये हुए थे और शैलजा इस मूड में थी कि सारा नज़ारा कैमरे में समेट ले. हमें वहां राहुल के लिए एक भरोसेमंद आया भी मिल गयी थी, जिसने शैलजा को जरा आज़ादी दे दी थी. हम सब कॉटेज में ही थे और शैलजा कैमरा लिए घूम घूम कर तस्वीरें ले रही थी. पता नहीं कैसे यह एक पहाड़ी पर चढ़ कर एक अदा से झुकते हुए पेड़ को फोकस करने लगीं कि डगमगा गईं, इतना, कि करीब बीस फिट नीचे किसी चट्टान से टकरा कर ही रुकीं. लहुलुहान और बुरीतरह घायल. चीख सुन कर हम सब भागे. सुबह का समय था तो तुरंत मदद मिल गयी और हम उस छोटी सी जगह के एकमात्र नर्सिंग होम जा पहुंचे. हालत गंभीर थी. तुरंत ऑपरेशन की ज़रूरत थी. डाक्टर, साजो-सामान जैसा भी था उसी में ऑपरेशन होना था. ऑपरेशन हुआ. जैसा तैसा खून चढाया गया. तीसरे दिन इन्हें होश आया और पता चला प्राण बच गए.

      पांच हफ्ते उसी नर्सिंग होम में रहना पड़ा. उसके बाद घर आ कर बड़े मेडिकल सेंटर पहुंचे. यह जान कर तसल्ली हुई कि ऑपरेशन ठीक हुआ है. वहां फिर सारे टेस्ट हुए, और इसी क्रम में पता चला कि उस नर्सिंग होम में चढाए गए खून के साथ जिंदगी भर की बदनसीबी भी इन तक पहुँच चुकी है. जिस दिन टेस्ट में इनका एच. आई. वी. पॉजिटिव होना सामने आया पद्मशंकर जी, मैं एकदम पागल हो गया, इतना कि बौखलाहट में सीधा उसी नर्सिंग होम जा पहुंचा कि उस पर मुकदमा ठोक दूँगा.

      उस नर्सिंग होम में मुझे वह डॉक्टर मिला जिसने ऑपरेशन किया था. साथ ही नर्सिंग होम का मालिक सुभाष चतरथ भी मिला. पहले तो मैं उस पर खूब चीखा चिल्लाया लेकिन जब उसकी बात सुनी मैंने तो मैं एकदम सन्न रह गया.

      डॉक्टर ने बताया कि बहुत जोखिम भरे इंतज़ाम के बीच ऑपरेशन किया गया था. न पूरी सुविधा, न ठीक-ठाक भरोसेमंद ब्लडबैंक. बस खून बेचने वालों के सहारे ऑपरेशन होते रहे हैं यहाँ और शैलजा का भी ऑपरेशन इस स्थिति में ही हुआ. डॉक्टर ने दो टूक बात कही.

      “मेहंदीरत्ता साहब, अगर ऑपरेशन न होता तो हद से हद दस घंटे की जिंदगी थी आपकी वाइफ के पास. ऐसे में हमें यही ज़रूरी लगा कि ऑपरेशन जल्द से जल्द किया जाय. दूसरे खतरे थे ज़रूर. पांच परसेंट भर खून का संक्रमण भी उनमें शामिल था जो दस घंटे की जिंदगी की मियाद को बढ़ा कर दस बीस साल कर सकता है, और हमने अपना कदम बढ़ा दिया..”

      आगे जो चतरथ ने कहा वह और परेशान कर देने वाला था.

      “ प्रोफ़ेसर, यह सैलानियों की मनपसंद जगह है, लेकिन यहाँ इस जगह के खास वाशिंदे भी हैं जो पीढ़ी दर पीढ़ी यहीं रह रहे हैं. उनके लिए यहाँ पहाड़ों पर क्या सुविधा है..? डाक, चिट्ठी, बिजली, आने-जाने का इंतज़ाम, मोटर बस तो क्या, राशन पानी, फल-सब्जी इस सबके लिए तक यहाँ के वाशिंदे मोहताज़ हैं. डॉक्टर, इलाज दवा-दारु तो बहुत बड़ी बात है.

      और सैलानियों का हाल... यह किसने रूल बनाया है कि घूमने के लिए आने पर लोकल सेक्स चखना ज़रूरी है ? लेकिन यह रूल लागू है और सरकारें भी इसमें पीछे नहीं हैं. सुना है कि कॉमन वेल्थ खेलों में विदेशियों के लिए यह डिश भी उपलब्ध कराई गयी थी. मुल्क भर में सैलानी जहाँ जाता है, वहां के लोकल सेक्स को ज़रूर टटोलना चाहता है. क्यों भला..? पहाड़ तो पहाड़ साहब, काशी बनारस और उडीसा का जगन्नाथ पुरी तो पूजा पाठ की जगह है, मगर वहां भी हाल फर्क नहीं है. गरीबी का इलाका है तो लोकल सेक्स का बाज़ार है और उसमें पेट की मारी लोकल औरतें भी चार पैसे के लालच में आ जाती हैं. “

      सुभाष चतरथ भावावेश में बोल रहा था.

      “ और सुनो मेहंदीरत्ता साहब. पहाड़ का नौजवान मरद सब काम की तलाश में, घर परिवार छोड़ कर साल के पांच महीने नीचे कहीं चला जाता है. बताओ साहब, क्या वह वहां सुतली बाँध कर रहेगा ? और क्या वहां उसे साफ़-सुथरा जनानी मिलेगा ? उसे पता भी नहीं चलता और जब वह लौटता है तो निगेटिव पॉजिटिव साथ बाँध कर लाता है, और फिर यहाँ अपनी घरवाली को बाँट देता है. और एक बात, जब मरद आधा बरस पास नहीं रहेगा तो क्या यहाँ गर्मी सर्दी उसकी घरवाली बुझी बैठी रहेगी ? नो सर. वह आगे यहाँ के बेरोजगारों को प्रसाद बांटेगी, साथ में बीमारी फ्री. वह बेरोजगार, यहाँ पड़े निठल्ले हमें खून बेच कर पेट पालेंगे. यहाँ की गौरमेंट को यह कथा समझ में नहीं आती क्या.. क्या गौरमेंट अंधी है..?

      किसका खून, कैसा खून हम यह देख कर ऑपरेशन करेंगे तो मरीज को टेबल पर ही मार देंगे. हमारे पास बिना इमरजेंसी के कौन सा केस आता है..? तो चलो ठीक है , रामभरोसे मरीज को दस पांच घंटे में मरने से बचाओ, बाकी उसकी किस्मत..”

      बोलते बोलते चतरथ यकायक उठ खड़ा हुआ.

      “ लो प्रोफ़ेसर, डाल दो मेरे हाथ में हथकड़ी..लेकिन इस से क्या कुछ सुधरेगा ? चेतेगा कोई कि यहाँ भी रोजगार व्यापार का कुछ जरिया बने... असली संक्रमण तो उन सालों के खून में है जो गद्दी पर बैठे हैं और पूरे मुल्क को एड्स दे रहे हैं. न होती आपकी वाइफ को यह प्रॉब्लेम तो क्या आते आप यहाँ पलट कर..बताइये ?”

      विवेक ने अपनी बात जारी राखी,

      “मैंने बिलखते हुए चतरथ की पीठ थपथपाई और वैसे ही वापस लौट आया. वापस आ कर मैंने शैलजा को उसके संक्रमण की खबर दी. सुन कर पत्थर हो गई वह और मैं प्रेत हो गया जो दिनरात इंटरनेट से, इस उस से, इस संक्रमण के बारे में जानकारी जुटाने लगा, कि हम क्या करें जो यह टाइम बम हमें ज्यादा से ज्यादा समय दे सके. “

      “ उफ़..” पद्मशंकर ने सिर थाम लिया, और अनुभा की सिसकियाँ बिखर गईं.

      शैलजा ने बच्ची को पुकारा कि वह एक गिलास पानी लेकर आये. इसी के साथ एक इंटरवल आ कर इस चर्चा प्रसंग के बीच बैठ गया. पानी के साथ बच्ची ट्रे भर कर सामन साथ लाई थी और फ्लास्क भर के कॉफी.

      इसके बाद डा. शैलजा ने बात कहनी शुरू की,

      “ फिर हमने कुछ ऐसे कारण खोजे जो हमें राहत दे सकें, और वह हमें मिले भी.

      - हमें संक्रमण का पता बहुत जल्दी लग गया था. इस से इसके फैलाव के रोकथाम की व्यवस्था एकदम शुरू हो गयी. यह ईश्वर की बहुत मेहरबानी रही.

      - भगवान का धन्यवाद, कि राहुल हमें मिल चुका था, जो हमारे जिंदा रहने की वज़ह बन गया.

      बीच में विवेक ने भी एक प्वाइंट जोड़ा,

      - यह संक्रमण शैलजा की दुर्घटना के समय हुआ था और उसके स्वस्थ होने के पहले ही हमें इसका पता चल गया. इस तरह पता चलने से पहले मेरे लिए शैलजा के साथ अंतरंग होने की संभावना ही नहीं बनी, वर्ना...

      यकायक उठ खड़ा हुआ पद्मशंकर.

      “ ग्रेट... एक भयंकर दुर्भाग्यपूर्ण पॉजिटिव ने आपको सचमुच पॉजिटिव बना दिया.. सकारात्मक दृष्टि वाली जोड़ी. आपका भगवान में विश्वास बचा रहा. एक दूसरे के प्रति जुड़ाव भाव बचा रहा. बहुत बड़ी बात है. “

      हंस पड़ी डा. शैलजा.

      “ इसके बीज तो थे हमारे भीतर. लेकिन इनके अंकुरित होने के पहले तक हम बहुत छटपटाहट से गुजरे. संक्रमित होने के बावजूद जितना हो सके उतना स्वस्थ जीवन और विलंबित मौत के प्रबंधन ने हमने हर तरफ खोजबीन की. इसके लिए यह असंभव था कि हम इसे छिपा ले जाएँ. तब हमने तय किया कि हम इसे पूरी तरह उजागर हो जाने दें.

      दुनिया भर में कितने ही लोग इस दैत्य की गिरफ्त में हैं, और उनमें सब के सब अपने यौनाचार के कारण इसका शिकार नहीं हुए हैं, जैसे मैं खुद. कुल संक्रमित आबादी में ज्यादातर स्त्रियां हैं. साथ ही दुनिया में बहुत सी संस्थाएं हैं जो इस रोग के मरीजों को स्वास्थ्य तथा मनोबल जानकारी देती हैं. लोगों के मन में न जाने कितने तरह के वहम इस बीमारी को लेकर भरे हैं, यह संस्थाएं उनको दूर करती हैं. इस रोग के साथ बदहाली से बच कर मौत को दूर किये रहना असंभव नहीं है लेकिन महंगा ज़रूर है, तो बहुत सी देशी-विदेशी संस्थाएं रुपये पैसे से मदद करती है. संक्रमित लोगों की अपनी सोसायटियां हैं जो इन्हें अकेला नहीं महसूस होने देतीं. इन्टरनेट और फेसबुक के जरिये सब एक दूसरे से जुड़े हुए हैं. लेकिन सब लोगों तक तो इन्टरनेट वगैरह नहीं है न, इसलिए जिनके पास सुविधा है उनके जरिये जानकारी सब तक पहुंचे, इसके लिए ज़रूरी है के इसके रोगी सामने आएं, और एक दूसरे से जुड़ें. क्या यह इस सब रोग को छिपा कर रखने से मुमकिन है ? बताइए पद्मशंकर जी. “

      “आपका कहना ठीक है” पद्मशंकर ने सहमति जताई.

      “मैंने भी इन्टरनेट पर इस बारे में बहुत कुछ देखा है. आप किसी भी हालत में अपने ‘स्व’ को न गवाएं. खुद को अपने परिवार का ज़रूरी हिस्सा बनाए रखें, और ईश्वर पर भरोसा न खोएं..”

      “ ओह, तो इन तीन ‘वर्जित त्यागों’ की साईट तक आप भी पहुंचे पद्मशंकर.. तो आप भी जुटे रहे हमारी तरह...” विवेक ने अचरज ज़ाहिर किया.

      “ हाँ.” अभिभूत हो उठा पद्म.

      “ ठीक है. एक दुर्भाग्यपूर्ण पॉजिटिव के आक्रमण से दूसरे उपकारी पॉजिटिव बचे रहें, हमारा जीने का ढंग ऐसा ही होना चाहिए. अगर यह संक्रमण हमें एक महायुद्ध में ला खड़ा करता है, तो कुछ न कुछ तो क्षति होगी ही, लेकिन भरसक बहुत कुछ बचा रहे इस का जतन तो मिलजुल कर और आँख खोल कर ही करना पड़ेगा. यह लुकाछिपी का खेल कतई नहीं है, यह मेरे सामने अब साफ़ हो गया.

      मैं आपको प्रणाम करता हूं डा. शैलजा. कि आप दोनों ने मिल कर यह संकल्प न सिर्फ खुद साधा बल्कि मुझ को भी एकदम बदल दिया... ग्रेट.”

      “ ... तो, अब तो आप कुँए के मेढक नहीं हैं न..?” विवेक ने ठठ्ठा किया.

      इस ठठ्ठे में कुछ खास आवेग था जो सारे के सारे एक साथ हंस पड़े, इतनी जोर से कि तन के खड़ा हुआ असंभव अपनी जगह सहम कर जरा झुक गया... और यही अभीष्ट था.
     
'नया ज्ञानोदय' जून 2013 में प्रकाशित
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