कहानी: हव्वा की बेटी - जयश्री रॉय

Joyshree Roy Joy shree joyashree जयश्री रॉय जय श्री "लो जान, हम तुमको पकाने फिर से आ गये..." कहते हुये राहिला की कत्थई आंखें हमेशा की तरह शरीर कौंध से भरी हुई थी. मैं सुबह की चाय लेकर बाल्कनी में आकर बैठी ही थी कि न जाने कहां से वह किसी जिन्न की तरह अचानक सामने आ खड़ी हुई थी. हरदम से ऐसी ही है वह - मुंडेर की गौरैया की तरह एक पल में हाजिर और दूसरे ही पल फुर्र...

      राहिला मेरी बचपन की सहेली है. कॉलेज जाने से पहले ही उसकी शादी कर दी गई थी. हालांकि उसका आगे पढ़ने का बहुत मन था. जैसा कि अक़्सर होता है, शादी के बाद हमारी दुनिया बदल गई थी और हम चाहकर भी एक-दूसरे के सम्पर्क में नहीं रह पाये थे. शादी के बाद शायद हम एक-दो बार ही मिल पाये थे. आज न जाने कितने वर्षों के बाद फिर भेंट हो रही थी.

      लड़की क्या थी वह, आग का गोला थी! - तेज़ और अत्मविश्वास से दमकती हुई! उसकी इन्हीं बातों पर मैं फिदा थी. मैं जितनी दब्बू वह उतनी ही दबंग. मैं उसे गुरु मैया कहकर संबोधित करती थी.

      स्कूल के दिनों में एकबार उसने मुझे टीचर से पिटने से बचाया था. टिफिन के दौरान मै उसे इमली तोड़कर लाने के लिये अपने साथ लेकर गई और पकड़ी गई थी. बगान के मालिक ने स्कूल में आकर हमारे नाम में शिकायत दर्ज़ करा दी थी. डर के मारे मेरी तो हालत ख़राब हो रही थी, मगर राहिला ने अपने ऊपर सारा इल्ज़ाम ले लिया था. हेड मिस्ट्रेस ने ऑफिस रूम में बुलाकर अपनी रुलर उसकी हथेली पर तोड़ दी थी.

      उसदिन उसका हाथ पकड़कर मै बहुत रोई थी - ‘तूने मेरे लिये झूठ क्यों कहा राहिला?’ वह दर्द में भी मुस्कराती रही थी- 'किसी अच्छे काम के लिये बोला गया झूठ, झूठ नहीं होता पगली! और अगर ये गुनाह है तो मुझे तेरे लिये ये गुनाह भी कबूल है!'

      ...अचानक से उसे सामने पाकर मैं खुशी से रो ही पड़ी थी. भगवान ने ही जैसे उसे इस समय मेरे पास भेज दिया था. मुझे उसकी इनदिनोँ सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी. खुद को बहुत अकेली महसूस कर रही थी. परितोष से मेरा इनदिनों गहरा तनाव चल रहा था. बात लगभग तलाक तक आ पहुंची थी.

      "और बता, इतने दिन कहां रही?" उससे अलग होकर मैंने अपने आंसू पोंछे थे.

      "पाकिस्तान... वहीं से आ रही हूं." वह भी खुद को समेट रही थी.

      "पाकिस्तान! अब वहां क्या लेने गई थी?" सुनकर मुझे सचमुच आश्चर्य हुआ था.

      "वहां मेरी शादी हुई थी... मेरा मतलब दूसरी शादी."

      "दूसरी शादी! कब?" सुनकर मेरा मुंह हैरत से खुल गया था.

      "पहली में तलाक हो गया था...." वह रुक-रुक कर बोली थी - "तुझे बता नहीं सकी थी, मेरा पहला सौहर नामर्द था, मगर इल्ज़ाम मुझपर ही आया. चूंकि उसके साथ मैँ कभी हमबिस्तर नहीं हुयी थी, इसलिये मेहर का आधा हिस्सा देकर मुझे तलाक दे दिया गया."

      "ओह! क्या यह काफी था?"
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      "काफी तो क्या होता, मगर हमारे में तलाक के बाद औरत को पति से देखभाल के पैसे नहीं मिलते. हां, तलाक के बाद तीन महीने तक इद्दात के दौरान मेरी ज़िम्मेदारी उठाई गई थी, यह देखने के लिये कि मैं कहीँ हामिला तो नहीं हूं. मगर मै हो भी कैसे सकती थी. तो मुझे छुट्टी दे दी गई."

      "अच्छा!" मैं इस विषय में कुछ नहीं जानती थी - "फिर औरतें क्या करें, ख़ासकर हमारे जैसे समाज की औरतें जो अधिकतर अनपढ़ या कम पढ़ी-लिखी होती हैं और अपने पति पर आर्थिक रूप से निर्भर करती है.?"

      "देख, कुछ न कुछ तो उसे मेहर का मिलता ही है, कमसे कम दस दीनार तो तय है ही. इससे कम मेहर की रकम नहीं हो सकती."

      "दस दीनार! किस जमाने की बात कर रही है तू? अरे, इससे क्या होगा?" मुझे उसकी बात सुनकर यकीन नहीं आया था.

      “हाँ, पुराने दिनोँ की ही बात है... नियम-कानून जब समय के साथ नहीँ बदलते तब बेमतलब हो जाते हैँ! और शायद यही हमारे समाज की सबसे बडी त्रासदी है- वक़्त से पीछे रह जाना!” राहिला ने लम्बी साँस ली थी!

      "तू अदालत क्यों नहीं गई? पहले तो खूब कानून झाड़ती थी?"

      "कौन-सी अदालत यार! इन सब मामले में हमारा मुस्लिम पर्सनल लॉ ही चलता है. भूल गई, शाहबानो का केस?... कठमुल्लों को खुश करने के लिये हमारे सियासतदानों ने पार्लियामेंट में अपने बहुमत के बल पर कानून तक बदल डाला था."

      "ऐसा!" मैं फिर सन्न. याद आ रहा है, ऐसा कुछ हुआ तो था सालों पहले.

      "मज़हब में कोई बंदोबस्त इस मामले में नहीं है. एक वाकया सुन, पुराने जमाने में किसी फातिमा बिंत कैस को अपने पति से तलाक मिला था, वह भी तब जब उसका सौहर अपने घर से दूर था. वह पैगम्बर के पास इंसाफ मांगने गई थी. पैगम्बर ने भी यह कहकर उसे मदद करने से अपनी मज़बूरी जताई थी कि एक तलाकशुदा औरत के रहने-खाने की ज़िम्मेदारी उसके पति पर नहीं होती. मगर हां, उसकी दूसरी निकाह करवाकर पैगम्बर ने उसकी मदद ज़रूर की थी. अब तू बता मैं इंसाफ के लिये कहां जाती?"... एक पल रुककर उसने फिर कहा था - "जानवी मोहतरमा! औरत की इज्ज़त की एक क़ीमत होती है, हर समाज में, कहीं ज़्यादा, कहीं कम... मगर होती ज़रूर है. औरत आजतक अपने जिस्म की ही कमाई खाती आई है, हर जगह, चाहे वह उसके सौहर का घर हो चाहे कोई कोठा! फर्क सिर्फ क्या है जानती है? एक शादीशुदा औरत एक मर्द यानी अपने सौहर को अपना जिस्म देकर रोटी, कपड़ा छत की सुरक्षा पाती है और कोठे की औरतें सैकड़ों मर्दों के बीच खुद को बेचकर इन चीज़ों का जुगाड़ करती हैं. बात तो एक ही है."

      "तेरा दिमाग़ ख़राब हो गया है, हमेशा उल्टी बातें करती है." उसकी बातें सुनकर मुझे सचमुच गुस्सा आने लगा था. भला एक घर की औरत और एक बाज़ारु औरत में कोई तुलना हो सकती है?

      "बस लफ्ज़ों का खेल है जान, वर्ना मतलब तो एक ही है..."

      कमरे में आकर वह अपना दुपट्टा फेंककर बिस्तर पर लेट गई थी - "आग़ लगे इस हिज़ाब को. यहां के मौसम में इसमें इतनी गर्मी होती है, सोचो ज़रा खाड़ी के देशों की औरतों का हाल... कितनी गर्मी पड़ती है वहां... गलकर मक्खन हो जाती होंगी भीतर ही भीतर. पूरा अजाब है!"

      "अरे वह सब अमीर देश हैं, लोग ए. सी. में रहते हैं."
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      मेरी बात सुनकर वह हंस पड़ी थी - "मेरी भोली बन्नो! अबतक उतनी ही बेवकूफ़... ये हिज़ाब तब से इस्तेमाल में है जब वहां के कबीलाई लोग तपते रेगिस्तान में तंबुओं में रहा करते थे और थोड़ा पानी, नखलिस्तान की तलाश में मीलों ऊंटों के काफिले लिये भटकते रहते थे." मैं चुप हो गई थी. उससे कौन बहस करे. फिर उसकी बातों में सच्चाई भी तो थी. शादी के बाद सास-ससुर के सामने घूंघट कर-करके क्या मै कम परेशान होती रही थी! रसोई में चूल्हे के सामने बैठकर खाना पकाते हुये खुद भी आधा सीझ जाती थी.

      स्कूल के दिनों में भी मौका मिलते ही वह अपना बुर्का उतार फेंकती थी - "आह! धूप, हवा, आसमान..."... एक गहरी सांस लेकर कहती - "अच्छा जानवी, हम चिड़िया होतीं तो?"

      मैं पूछती - "तो?"

      "तो हम हवा में उड़ते फिरते. डाल-डाल चहकते, गाते... ये बुर्के का पिंजरा तो नहीं होता!"

      "पिंजरे में तो पंछी भी होते हैं."

      "हर पंछी की किस्मत में पिंजरा नहीं होता, मगर औरत की तो पैदाइश ही पिंजरे में होती है - मां की कोख से कब्र तक... एक पिंजरे से दूसरे पिंजरे तक का सफर!"

      "पिंजरा क्यों कहती है! शर्म और हया ही तो औरत का गहना है..." मै उसे समझाने की कोशिश करती... "जो बदल नहीं सकता उसे मान लेने में ही समझदारी है."

      मगर उसके पास हर बात का जवाब होता था- "हूं... इन्ही खूबसूरत लफ्ज़ों के गहनों से तो औरतों को बहलाया जाता है! ये पायल, कंगन ज़ेबर नहीं, जंजीर और हथकड़ियां हैं हम औरतों की... अच्छा जानवी, यदि ऊपरवाले की यही मर्ज़ी होती कि औरत हमेशा छिपी रहे तो वह उसे दुनिया में जल्वागर करता ही क्यों? ज़रा सोचो, हमें क्यों कोढ़ या गुनाह की तरह छिपाया जाता है! कपड़े तो हम इंसानों ने ईज़ाद किये है न. क़ुदरत तो इंसानो को इस दुनिया में नंगा ही भेजती है, औरतें भी नंगी पैदा होती हैं..."

      "तू कहना क्या चाहती है! " मैं झल्ला उठती उसकी इन बेसिर-पैरों की बातों से.

      "यही कि अगर कुदरत की यही मर्ज़ी होती कि औरत हमेशा हिज़ाब में रहे तो वह उसे खुद नंगी नहीं रहने देती, बुर्के में लपेटकर पैदा करती." सुनकर मैं उसकी पीठ पर कई धमोके जड़ देती और वह हंसती हुई भाग खड़ी होती.

      मेरी मां उससे बहुत प्यार करती थी, मगर उन्हें उसके लिये चिंता भी होती थी - ‘ये लड़की ऐसी मुंहफट है, किसी दिन बहुत बड़ी मुसीबत में पड़ जायेगी.’ मुझे भी यही डर सताता था. उसकी बातों से सहमत होते हुये भी मै उसका साथ नहीं दे पाती थी. अपनी ज़िद्द और मिजाज़ की वजह से वह रोज़ ही किसी न किसी से पिटकर आती थी. कभी जिस्म पर नीली धारियां पड़ी रहतीं तो कभी माथे पर पटटी बंधी होती. मेरे समझाने पर हंसकर टाल जाती- "यार, ये पचास-साठ साल की ज़िंदगी के लिये इतने समझौते क्यों? इंसान हैं, नसों में गर्म लहू दौड़ता है, एकदम केंचुआ बनकर कैसे ज़मीन पर रेंगने लगें, रीढ़ की हड्डी गल गई है क्या? तुझे जो समझना है समझ, लेकिन एक बात जो मैने समझी है वह यह कि ऊपरवाले ने मुझे किसी से कमतर नहीं बनाया है. मर्दों को यह बात पता है, तभी तो औरतों को दबाये रखने के लिये हज़ार साजिशें रचते हैं. उन्हें मालूम है, जिस दिन औरत को बराबरी का हक़ और मौका मिल जायेगा उसदिन उनका तख़्त-ओ-ताज़ छिन जायेगा... जिसे वे अपनी मर्दानगी कहते हैं उसे मै उनकी कायरता समझती हूं." उसका भाषाण सुन-सुनकर मेरा सर घूमने लगता.

      ... गर्मी की छुट्टियों मे मै सिलाई-कढाई सीखती, मां के साथ अचार, मुरब्बा बनाती और वह गुलेल से पडोसियों की खिड़कियों के कांच तोड़ती फिरती या मुहल्ले के बच्चों की बानर सेना बनाकर बाग से आम के टिकोरे चुराती फिरती. रोज़ उसकी शिकायत और रोज़ उसकी पिटाई. मुहल्ले के मौलवी साहब को तो वह फुटी आँख नहीँ सुहाती थी. रोज़ उसके अब्बा हुज़ूर के पास शिकायत लेकर पहुँच जाते. वह घर से पिटकर आती और मेरे सामने अपना भडास निकालती कि बुड्ढा सबके सामने तो मुझपर आँखेँ गर्म करता है और अकेले मेँ लार टपकाता है! मै हाथ जोड़कर उसके निहोरे करती - बाज आ मेरी लक्ष्मी बाई. मगर वह अपने अदृश्य घोड़े पर सवार होकर यह जा, वह जा...

Joyshree Roy Joy shree joyashree जयश्री रॉय जय श्री       वह स्वभाव से जितनी चंचल थी, पढ़ाई के मामले में उतनी ही गंभीर और ज़हीन! जाने कहां से कैसी-कैसी क़िताबें उठा लाती थी - ‘वुमन इन ईस्लाम’, ‘औरतों के हक़’, ‘कुरान में औरत’ आदि-आदि... कहती, सब इस क़िताब, उस क़िताब का हवाला देते रहते हैं. फलां क़िताब में औरतों के बारे में यह लिखा है, वह लिखा है. मै खुद पढ़कर जानना चाहती हूं कि इन बातों में कितनी सच्चाई है... उत्तेजना में बोलते हुये उसके गाल दहक उठते- औरतों की जाहिली का सब फायदा उठाते हैं! जानवी, इल्म ताक़त है, जेहनी गुलामी से आज़ाद होना है तो इल्म हासिल करना ही पड़ेगा, ख़ासकर औरतों को!

      रोज़ एक नयी क़िताब पढ़कर मेरे पास आ बैठती- "जानती है, इस्लाम पर इस्लाम से पहले के अरब समाज का बहुत गहरा प्रभाव है. पुराने ज़माने में वहां के लोग मिस्र तथा हिब्रू तहज़ीब को फॉलो करते थे. ओल्ड टेस्टामेन तथा कुरान में दहेज के लिये एक ही लफ्ज़ मेहर का इस्तेमाल हुआ है."

      "अच्छा!" मै आश्चर्य से सुनती रहती.

      "तबके ज़माने में दहेज का सीधा मतलब वह क़ीमत होती थी जो एक औरत को उसके जिस्म के इस्तेमाल के एवज में अदा की जाती थी. इस बात का उदाहरण कुरान के सुरा 4 के आयत 33.50 और 24.25 में देखे जा सकते हैं." मैं बिना कुछ कहे उसकी बातें सुनती जाती थी. मेरे पल्ले कुछ भी नहीं पड़ता था. ना जाने इस लड़की के दिमाग़ मे क्या-क्या भरा हुआ था!

      "बाइबल के भी 22.29 सफे में लिखा है कि यदि कोई मर्द किसी औरत से ताल्लुकात बनाता है तो उसे इस औरत के बाप को चांदी के 50 सिक्के देकर उससे शादी करनी पड़ेगी. "

      "बाइबल!" मैं मूर्ख की तरह सिर हिलाती. वह जानती थी मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा है. फिर भी अपना सरमन झाड़ती रहती - "कुरान में भी दहेज के लिये कई जगह उजूर लफ्ज़ का इस्तेमाल हुआ है. हिन्दुस्तान में इसी से मिलता-जुलता लफ्ज़ उजरत का इस्तेमाल होता है."

      "मतलब?"

      "मतलब, तनख्वाह या भाड़ा."

      "मगर किस चीज़ का भाड़ा?" मै हमेशा की तरह अपने सवालों से उसे चिढ़ा देती.

      "अरे और किसका... बूज़ का! औरत के जिस्म का! शादी में सेक्स के एवज़ में औरत को मेहर का हक़ मिलता है. सो इफ देयर इज़ नो सेक्स, नो मेहर. इट्स दैट सिम्पल." अपने पैर हिलाते हुये वह बड़े इत्मीनान से छत की धूप में रखे मर्तबान से अचार निकालकर चटकारे लेते हुये कहती जाती और सुन-सुनकर मेरी जान धुकधुकाती रहती.

      ...इतने सालों के बाद उसे देखकर आज बार-बार मन अतीत की ओर भटक रहा था. वे बेफ़िक्री के दिन किस तरह से पलक झपकते गुज़र गये... मुझे अनमनी देख थोड़ी देर बाद राहिला उठ बैठी थी. पहली बार मैंने गौर किया था, उसके खूबसूरत चेहरे पर कितनी थकान है, पारदर्शी त्वचा के नीचे उदासी की हल्की नीली छाया... वह ऐसी तो कभी नहीं थी! अचानक गंभीर होकर उसने धीरे-धीरे कहना शुरु किया था- "पहली शादी टूटने के बाद मैं पढ़ना चाहती थी. मगर अब्बू अम्मी के बाद रमजान भाई ही रह गये थे. तू तो जानती है उन्हें, कैसे जाहिल हैं. मेरे लाख रोने-चिल्लाने के बावज़ूद सबने मिलकर मेरी शादी पाकिस्तान के सौकत अली से कर दी - आधा बूढ़ा, दो बच्चों का बाप.. मगर पैसेवाला, ऊंची जाति का भी."

      "इतनी जल्दी क्या थी उन्हें तुझे नर्क में ढकेलने की! फिर शादी में एक औरत की मर्ज़ी तो ज़रूरी है न!"

      "शादी में मर्ज़ी ज़रूरी है, मगर औरत खुद अपनी शादी तय कहां कर सकती है! करना तो परिवारवालों को ही होता है. जो अपनी मर्ज़ी से शादी करती है उसे अच्छी औरत नहीं समझा जाता. बुजुर्गों के बिना हुये निकाह को माना नहीं जा सकता. फिर कोई औरत दूसरी औरत को शादी में दे नहीं सकती. उसे यह हक़ नहीं होता. वह गार्जियन नहीं मानी जाती. हालांकि शियाओं में यह चलन देखने को मिलता है."

      "मगर जाति की क्या बात करती है? तेरे मज़हब में तो यह सब नहीं." मैंने चाय की प्याली उसके सामने रखी थी. कुछ खाने से उसने मना कर दिया था.

      राहिला को देख मेरी सास आशंकित हो उठी थीं और पर्दे के पीछे से छिपकर लगातार हमारी बातें सुन रही थीं. उनके साथ मेरा संबंध कभी अच्छा नहीं रहा था. बेहद संकुचित विचारों और शक्की स्वभाव की थीं. जात-पात, छुआ-छूत की बीमारी से आक्रांत. राहिला को अपने घर में देख उनका धर्म संकट में पड़ गया था. मै मन ही मन प्रार्थना कर रही थी कि कुछ अनहोनी न घट जाये.

      चाय की चुस्की लेते हुये राहिला मुस्करायी थी- "यह सब कहने की बातें हैं. पहली बात तो यह कि निकाह ऊपरवाले का हुक़्म होता है. एक सेहतमंद, शादी के लायक इंसान जब शादी नहीं करता तो वह शैतान का भाई कहलाता है, दर असल एक मुसलमान शादी करके आधा और जेहाद करके आधा अपने मज़हब को निभाता है... और रही बात जाति की तो यह भी कहने सुनने की ही बात है. ईस्लाम में सब बराबर हैं, मगर हक़ीकत में क्या होता है? हिदायह में किससे किसकी शादी हो सकती है का साफ ज़िक्र है. मसलन एक कुरैश एक कुरैश के बराबर है. हाशमी, निफली, तयमी, अदवी एक समान हैं. पैगम्बर की बेटी बीवी फातिमा के सैय्यद खानदान के लोग ऊंचे माने जाते हैं. इनकी शादी छोटी जाति के मुसलमानों से नहीं होती. दूसरे नंबर पर अरब लोग होते हैं. इसके बाद अजामी - इनकी शादी अरब औरतों से नहीं हो सकती."

      "अरे यार बस." सुनकर मेरा सर चकराने लगा था. वह शुरु हो जाती थी तो बस.

      "अरी सुन तो..." राहिला अपनी रौ में थी - " हिन्दुस्तान में तो मामला और भी उलझा हुआ है. जो बाहर से आये उनकी नस्ल ऊंची मानी जाती है जैसे अशरफ लोग - इनमें फिर सैय्यद, शेख, मुगल, पठान होते हैं. इनकी भी उपजातियां होती हैं."

      "इतना! ये तो हिन्दुओं के भी बाप निकले! मैं सुनते हुये उसके पास बैठ गई थी."
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      "नीची जाति में वे मुसलमान आते हैं जो यहां बनाये गये. इन्हें अरबी में अजलाफ और अज़राल कहते हैं. यानी कमीने, नीच लोग! इनकी भी उपजातियां हैं, जिनमें अधिकतर हिन्दुस्तान के मुसलमान होते हैं. सबसे नीचे मोमिन या अंसारी, दर्जी, नाई, कसाई आदि होते हैं."

      "अच्छा अब तू चुप हो जा. मुझे और नहीं सुनना!" मैंने राहिला के मुंह पर हाथ रख दिया था. राहिला आंखों ही आंखों में मुस्कुराती रही थी, मगर उसकी आंखों की गीली चमक में एक आंच थी जिसकी हरारत मैं महसूस कर सकती थी.

      दोपहर को राहिला ने खाया नहीं था. बस एक कप चाय और मांगी थी. नाटकीय अंदाज़ में कहा था - ग़म खा-खाकर भूख मर गई है... मेरी सास उसके लिये कांच के बर्तन निकाल रही थीं. इन्हीं बर्तनों में बाहरवालों को खाने दिया जाता था. मेरी सहेली के प्रति उनके व्यवहार देख मै दुखी हो गई थी. मगर मेरा इस घर में चलता ही कितना था जो ऐतराज़ करती!

      थोड़ी देर लेटने के बाद मैंने उससे पूछा था - "पाकिस्तान से क्यों लौट आई?"

      "लौट कहां आई, निकाल दी गई!" कहते हुये राहिला की आंखें अचानक से बुझ-सी गई थीं.

      "क्यों?" मुझे सुनकर गहरा धक्का पहुंचा था.

      "वही, मेरी अकेली ख़़ता - औरत होना! औरत हूं और इज्ज़त के साथ जीना चाहती हूं... यह माफ़ी के काबिल नहीं. "

      "कुछ बता भी." मैंने उसका हाथ पकड़ लिया था. उसकी बातें सुनते हुये मै अपना दुख भूल गयी थी. कितना झेला था उसने! राहिला धीरे-धीरे खुली थी-

      "किसी तरह जी रही थी वहां, बूढ़े सौहर की बीवी, हमेशा शक़ के घेरे में. बुरी औरत को सज़ा देने का हक़ सौहर को होता है, सो अक़्सर मुझे मार-पीटकर यह नेक फर्ज़ पूरा किया जाता था. मर्द कोइ नेक काम करे तो सारा ज़माना उसका साथ देता है. सब देते भी थे. मै झेल भी रही थी मगर... जब उनलोगों ने मेरी बेटी को स्कूल जाने से रोका, मैं बर्दाश्त नहीं कर पाई. बग़ावत में उठ खड़ी हुई!"

      "तेरी बेटी है!"

      "हूं. " कहते हुये राहिला की आंखें पिघल उठी थीं - "बारह साल की - माहीं - माहिरा... उस छोटी-सी बच्ची को सात पर्दों में ढंक कर रखा.. यह मत करो, वह मत करो. मैं देख रही थी, मेरी बच्ची की आंखों की बुझती हुई चमक, ज़र्द पड़ती मुस्कराहट... वह आसमान में लहराती पतंगों को अपलक देखती, कोयल की कूक से कूक मिलाती... जब वह मेमनों के पीछे कुलांचे भरते हुये हिरणी की तरह भागती, उसके बाल हवा में सुनहरे बादल बनकर लहराते... उसे देख-देख मै निहाल हो उठती!" कहते हुये राहिला की आंखें जैसे सपनों से भर गई थी- "मैंने उसे हर तरह बचाने की क़ोशिश की, उसके सपनों को सहेजा, संभाला. मै चाहती थी, उसे उसके हिस्से की धूप, हवा और ज़िंदगी मिले... शायद बहुत बड़ा गुनाह था मेरा ऐसा चाहना, सो मुझे मेरी औकात में लाने का पूरा बंदोबस्त कर दिया गया..." कहते हुये वह हिचकियों में टूटकर रो पड़ी थी... "कठमुल्ले, कुंद जेहन तालिबानी... सभी हमे धमका रहे थे, ख़तरनाक अंज़ाम की बात कर रहे थे. मगर मै और मेरी बेटी ने किसी की परवाह नहीं की. और फिर वही हुआ जो वे कायर बेहतर कर सकते थे, मुझे सबक सिखाने के लिये मेरे साथ बलात्कार किया गया, सामूहिक बलात्कार! एक औरत को सज़ा देने का उनकी नज़र में सबसे नायाब तरीका..."

      "ओफ!" यह सुनकर मैं कांप उठी थी, यह क्या कह रही है!

      "हां जानवी, मगर मैं कुछ नहीं कर पाई... सौहर तो था ही मेरे खिलाफ, साथ मेँ पूरा ज़माना भी था. उन दरिन्दोँ को सज़ा दिलवाने के लिये चार गवाह कहां से लाती! कोई ये नहीं सोचता कि अगर चार चश्मदीद गवाह होते तो बलात्कार होता ही क्यों? क्या कोई गवाह खड़ा करके जीना करता या करवाता है! फिर अगर इल्ज़ाम साबित नहीं कर पाती तो उल्टे मुझे ही सब मिलकर संगसार कर देते. अधिकतर औरतें इसी डर से चुप रह जाती हैं."

      "यह कैसा नियम है!... एकदम वहसी!"
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      "हज़ार साल पहले के कबीलाई कानून... यह मर्दों की दुनिया है और उन्हीं के बनाये कानून है." राहिला के आंसू थम नहीं रहे थे - "हर ज़ुर्म, फिरकापरस्ती का शिकार औरत को ही होना पड़ता है, जानवी. औरत के जिस्म पर हर हैवानियत और वहशियत का क़हर हर ज़माने में टूटा है. क्या यहां, क्या वहां... वह कहीं भी चली जाये उसे अपने जिस्म से छूटने तक जिल्लतों से निज़ात नहीं मिलती."

      एक लंबी चुप्पी के बाद उसने रुक-रुककर कहा था -"हम हव्वा की बेटियां उनके किये गुनाहों की सज़ा आजतक भुगतती चली आ रही हैं."

      गुनाह! सज़ा!... मुझे उसकी कोई बात समझ नहीं आ रही थी. लेकिन एक साझे के अनाम दुख में मैं अनायास हो आई थी. बात करते हुये कमरे का माहौल बेहद संजीदा और बोझिल हो उठा था. हवा में तैरते दो स्त्रियों के साझे दर्द से मिलकर दालान में धूप का रंग कासनी हो आया था. दीवारों के साये गली में लंबे हो गये थे. घर के पीछे सहजन के फूले पेड़ पर सांझ का धूसर घोंसला पड़ चुका था. सर्दी के शुरुआत के दिन छोटे होने लगे थे, ठिठुरे, फीके-फीके, कुहरीले... राहिला अपने घुटनों में सर डाले बोल रही थी. तेज़ी से उतरती रात का अंधेरा मानो उसके शब्दों पर भी पसर आया था. उसकी आवाज़ में गहरी मायूसी थी, जैसे किसी खंडहर से बोल रही हो. किसी खोई हुई टिटहरी की-सी आवाज़, लेकिन बहुत ही जानी-पहचानी और अपनी-सी - "हव्वा के गुनाह के लिये उसपर अताब-ए-ईलाही टूटा था, इसलिये तो हम औरतें बददुआ की शिकार और सज़ा की हक़दार हैं - बकौल अलगज़ाली, जो इस्लाम के एक जाने-माने स्कॉलर हैं - माहवारी, हामिला होना, अपने मां-बाप से बिछड़ना, एक अजनबी से निकाह होना, दूसरों की मर्ज़ी पर जीना, तलाक मिलना, तलाक न दे सकना, मर्दों को चार शादी का हक़, औरतों को नहीं, गवाही में दो औरतों को एक मर्द के बराबर मानना आदि अट्ठारह सज़ायें हैं जो ऊपरवाले ने औरत को दी है. औरतें ख़ता की पुतली हैं. एक हज़ार ख़ासिअतों में से सिर्फ एक औरत में होती है, बाकी सब मर्दों में."

      सुनकर मै हैरान थी- "मां होना सज़ा है! मै तो सोचती थी मां होना दुनिया की सबसे बड़ी नियामत है..."

      "हर औरत यह बात जानती है जानवी! और तो और, कहते हैं पैगम्बर ने खुद देखा है कि औरतें दोज़ख में ज़्यादा जाती हैं जबकि मर्द जन्नत में. वैसे भी ऊपरवाला मर्द है, ये दुनिया मर्दों की है. औरत तो आदम की एक पसली भर है, उसकी औकात और क्या होगी."

      "ख़ैर, बता अब तू क्या करेगी?" मुझे उसकी बहुत चिंता हो रही थी.

      "क्या करूंगी!" अब बस लड़ूंगी! अपने लिये, अपनी बेटी के लिये. हम औरतों के पास खोने के लिये है भी क्या जो डरें. मरना तो है ही, तो लड़कर मरूंगी. तय कर लिया है, अब मरने से पहले और नहीं मरूंगी. खुद के लिये इंसाफ नहीं जुटा पाई, मगर अपनी बच्ची के साथ नाइंसाफी कतई नहीं होने दूंगी. उसे उन जल्लादों के चंगुल से छुड़ाकर ले आऊंगी, पढाऊंगी, लिखाऊंगी, इंसान बनाऊंगी. वह जियेगी, खुलकर सांस लेगी, उसके पंखों को सारा आकाश मिलेगा..." कहते हुये वह आवेश में थरथरा रही थी.

      "कुछ दिन पहले तूने टी वी पर देखा होगा न, पाकिस्तान में तालिबानों ने एक बच्ची को बीच बाज़ार स्कूल जाने, घर से अकेली निकलने के ज़ुर्म में कोड़े लगाये थे? और वह बच्ची चीखकर सबको ललकार रही थी कि वह ज़रूर तालीम लेगी, इल्म उसका पैदाइशी हक़ है!

      "हां!" मन ही मन आमीन करते हुये मैंने कहा था.

      "वह मेरी माही थी, मेरी बेटी...!" राहिला के चेहरे पर यह ऐलान करते हुये गज़ब की चमक थी. अपनी बेटी के लिये वह नाज़ और गुमान से से भरी हुई थी, उसकी बात सुनकर मेरा मन भी भर आया था. वर्षों से सूनी पड़ी मेरी गोद ने जैसे अनायास राहिला की बेटी को अपने में समेट लिया था.

      वह उस रात हमारे यहां ठहरना चहती थी, मगर मेरी सास इसके लिये कैसे भी राजी नहीं हुई थीं. परितोष ने घर लौटकर उससे ठीक से बात तक नहीं की थी. वह मुझसे भी कहां आजकल सीधे मुंह बात करता था. अपमान और अवहेलना ही मेरे जीवन का हासिल था. हारकर मुझे उससे झूठ बोलना पड़ा था कि हमें किसी की शादी में बाहर जाना है. राहिला ने कुछ नहीं पूछा था. वह बहुत संवेदनशील थी, ज़रुर मेरे झूठ को पकड़ लिया होगा. बस इतना ही कहा था, समझती हूं जानवी, तू भी तो एक औरत है... मुझसे कुछ कहा नहीं गया था. उससे लिपटकर फूट-फूटकर रोती रही थी. पहली बार अपनी विवशता की ऐसी तीव्र अनुभूति हुई थी. अपनी मर्ज़ी का एक निर्णय लेना भी मेरे लिये आज कितना कठिन था! पराधीनता से बढ़कर शायद कोई दुख नहीं!

      उस दिन देर शाम वह मेरे घर से निकली थी. चलते हुये उसके चेहरे पर आत्मविश्वास और निश्चय था. मैंने उस दिन बहुत दिनों बाद डूबकर प्रार्थना की थी, उसके और उसकी बेटी के लिये . इसके सिवा मै कर भी क्या सकती थी!

      दूसरे दिन सुबह अपनी बाल्कनी में बैठकर चाय पीते हुये मैंने अख़बार खोला था और देखा था - पाकिस्तान में एक बारह साल की बच्ची की तालिबानियों के द्वारा उसके तालीम लेने के ज़ुर्म में गोली मारकर हत्या तथा दिल्ली की एक गली में देर शाम कुछ अज्ञात लोगों के द्वारा एक औरत की गला काटकर नृशंस हत्या...

      मैं पत्थर बन गई आंखों से अख़बार के फड़फड़ाते पन्ने पर माही और राहिला के खून-आलूदा चेहरों की ओर देखती रही थी. एकबार फिर मासूम सपनों की, खुशियों की, अच्छाइयों की हत्या, एकबार फिर कायरों की मर्दानगी कमज़ोर और मजलूमों पर... बेक़़स और मासूमों की आंहों और लाशों पर से गुज़रता हुआ उनका धर्म युद्ध और गगन भेदी नारा- अल जेहाद! अल जेहाद! अल जेहाद!

      मुझे राहिला के शब्द याद आ रहे थे - "तय कर लिया है, अब मरने से पहले नहीं मरूंगी...."

      मै फूट-फूटकर रोते हुये बड़बड़ाती रही थी- नहीं! तुम नहीं मर सकती सखि!... क्योंकि माहीं, राहिलायें कभी मरती नहीं, ज़िंदा रहती हैं हव्वा की बदनसीब बेटियों के सीने में हमेशा आग़ और आँसू बनकर... हर बददुआ, ज़ुर्म, नाइंसाफी से लड़ने के लिये... हर ज़माने में, हर कहीं! वह ज़मीन से भी लड़ेगी और आसमान से भी. ज़िन्दगी से, खुशियों से और आज़ादी से अब अपना जायज़ हिस्सा लेगी और लेकर रहेगी. वह अपनी हर बददुआ को वरदान में बदलकर रख देगी. धर्म युद्ध तो अब होना है! जेहाद तो अब होना है, असली जेहाद! जीना-मरना तो राहिला जैसियों का है, हमारा तो ये रेंग-रेंगकर जीना भी मौत से बदतर! मगर अब नहीं, और नहीं... ये कुर्बानी जाया नहीं होगी!

      ... मुझे लगा था, मेरी नसों में अर्से से सर्द पड़े लहू में उबाल आ गया है. राहिला की ठंडी आंखें मेरे भीतर जैसे आग़ का दरिया बनकर उतर गई थीं. मुझे प्रतीत हुआ था, मै अबतक मुर्दा थी, यकायक जिंदा हो गई हूं, राहिला ने मरकर मुझे जिंदा कर दिया था....

      मै अपनी बाल्कनी में अकेली बैठी उस अखबार को सीने से लगाये फूट-फूटकर रो रही थी, एक गहरे दुख और एक गहरी अनाम खुशी में. सुख-दुख की एक अद्भुत परस्पर विरोधी प्रतीति ने मुझे एक ही साथ आपादमस्तक ढंक लिया था. दुख में मैं हमेशा रोती रही थी, मगर खुशी में इस तरह रोने का मेरा शायद यह पहला अनुभव था. ऊपर छत की मुंडेर पर एक गौरैया दूर पीपला पर उसपर नज़र गढाये बैठे एक बाज से लापरवाह अपने नन्हे पंखों में परवाज़ और आंखों में सारा आकाश लिये रह-रहकर चहक रही थी. सुबह की ठंड़ी धूप में दिन के चढ़ने के साथ-साथ हरारत आ गई थी. कोहरा छंटने लगा था एकदम से....
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जयश्री रॉय

जन्म : 18 मई, हजारीबाग (बिहार)
शिक्षा : एम. ए. हिन्दी (गोल्ड मेडलिस्ट), गोवा विश्वविद्यालय
प्रकाशन : अनकही, ...तुम्हें छू लूं जरा, खारा पानी (कहानी संग्रह),
औरत जो नदी है, साथ चलते हुये (उपन्यास),
इक़बाल (उपन्यास) शीघ्र प्रकाश्य
तुम्हारे लिये (कविता संग्रह)
प्रसारण : आकाशवाणी से रचनाओं का नियमित प्रसारण
सम्मान : युवा कथा सम्मान (सोनभद्र), 2012
संपर्क : तीन माड, मायना, शिवोली, गोवा - 403 517
ई-मेल : jaishreeroykathakar@rediffmail.com

      
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