राष्ट्र भक्त “पंडित श्याम कृष्ण वर्मा” - सुनील दत्ता

पंडित श्याम कृष्ण वर्मा दरअसल पंडित जवाहर लाल नेहरु या महापंडित राहुल साकृत्यायन की तरह जाति की तरह से ब्राह्मण नही थे। उन्हें पंडित की उपाधि उनके संस्कृत भाषा, धर्म और वेड के प्रचंड ज्ञान और उसके प्रभावपूर्ण अभिव्यक्ति के आधार पर काशी के विद्वत समाज द्वारा प्रदान किया गया था। सम्भवत: पंडित की उपाधि पाने वाले वह पहले गैर ब्राह्मण थे। साधारण परिवार में जन्मे श्याम जी कृष्ण वर्मा अपनी मेहनत लग्न और विद्वता के बलबूते पद .. प्रतिष्ठा धन दौलत सब कुछ हासिल किये। लेकिन उसके पीछे भागने की जगह उन्होंने ब्रिटिश दासता से राष्ट्र की स्वतंत्रता राष्ट्र एकता और समाज सुधार को अपने जीवन का लक्ष्य बनाया। इस लक्ष्य को अपना कर वे न केवल देश के लोगो को बल्कि विदेशो में बसे हिन्दुस्तानियों को भी जगाने उठाने का निरंतर प्रयास करते रहे। यह कार्य करते हुए उन्होंने कम से कम दो पीढ़ी के लोगो की हर संभव मदद के साथ उन्हें तैयार किया। इसमें लाला हरदयाल विनायक, दामोदर सावरकर मदनलाल धीगरा और मादाम भीखाजी कामा का नाम सबसे आगे है। पंडित श्याम कृष्ण वर्मा को याद करना न केवल याद करना न केवल राष्ट्र स्वतंत्रता के लक्ष्य से उनके त्याग व बलिदान को जान्ने समझने के लिए आवश्यक है बल्कि पद प्रतिष्ठा धन सत्ता पर चढने में लगे हुए देश के उन तमाम माध्यम वर्गीय के लिए भी शिक्षाप्रद है जिन्होंने राष्ट्र व समाज को उपेक्षित कर स्वंय अपनी निजी चढत को ही अपना जीवन मान लिया है। श्याम जी कृष्ण वर्मा का जन्म 4 अक्तूबर 1857 को उस समय के कच्छ प्रांत ( आज के गुजरात प्रांत में ) के मांडवी नगर के निकट बलायल गाँव में हुआ था। इनके पिता का नाम करसन नाखुला भंसाली और माँ का नाम गोमती बाई था। इनके पिता काटन प्रेस कम्पनी में मजदूर थे। 11वर्ष की आयु में इनकी माँ का देहान्त के पश्चात इनका पालन .. पोषण इनकी दादी ने किया। भुज में प्रारम्भिक शिक्षा ग्रहण करने के पश्चात उन्होंने आगे की पढ़ाई के लिए मुम्बई के विल्सन हाईस्कूल में दाखिला लिया यही पर उन्होंने संस्कृत भाषा के अध्ययन के साथ उसमे प्रवीणता प्राप्त किया। फलस्वरूप बहुत कम उम्र में ही उन्होंने संस्कृत में धारा प्रवाह बोलने और अपने विचारों को अभिव्यक्त करने में विद्वता प्राप्त कर लिया। साधारण परिवार में जन्मे श्याम जी कृष्ण वर्मा की इस विद्वता से प्रभावित होकर में एक धनी व्यापारी भाटिया परिवार ने अपनी पुत्री भानमती के साथ इनका विवाह कर दिया। विवाह के पश्चात अपने निजी जीवन की सीढियों पर चढने का रास्ता छोड़कर श्याम जी कृष्ण वर्मा सामाजिक गतिविधियों की तरफ मुड़ने लग गये। इस दौरान वे आर्य समाज के प्रवर्तक तथा धर्मवादी .. राष्ट्रवादी चिन्तक व हिन्दू समाज सुधारक स्वामी दयानंद सरस्वती के विचारों एवं क्रिया कलापों से सर्वाधिक प्रभावित हुए ।इनके सानिध्य में रहकर उन्होंने वैदिक दर्शन, धर्म, राष्ट्र व समाज पर अपने शिक्षा ज्ञान को और विकसित किया। तत्पश्चात वे उस शिक्षा ज्ञान प्रसार के लिए देशव्यापी भ्रमण पर निकल पड़े। विशेष कर संस्कृत भाषा में वैदिक दर्शन एवं धर्म पर उनके व्याखानो ने हिन्दू धर्म के विद्वत समाज को बहुत प्रभावित किया। इसी के फलस्वरूप 1877 में उन्हें ब्राह्मण समाज का सदस्य न होने के वावजूद काशी में “ पंडित “ की उपाधि प्रदान की गयी। कहा जाता है कि पंडित की उपाधि पाने वाले वह पहले गैर ब्राह्मण थे। उनकी विद्वता तथा संस्कृत भाषा के ज्ञान व अभिव्यक्ति से प्रभावित होकर उस समय भारत भ्रमण पर आये इंग्लैण्ड के आक्सफोर्ड विश्व विद्यालय में संस्कृत के प्रोफ़ेसर मोनियर विलियम्स ने उन्हें अपने सहायक के रूप में इंग्लैण्ड चलने का निमंत्रण दिया। इसे श्याम जी कृष्ण वर्मा ने स्वीकार कर लिया। कुछ समय बाद लन्दन पहुचकर श्याम जी कृष्ण वर्मा ने प्रोफ़ेसर विल्सन की सहायता से आक्सफोर्ड के वैलिआल कालेज में दाखिला लिया। 1883 में वहा से बी ए करने के पश्चात आक्सफोर्ड विश्व विद्यालय ने उन्हें वही पर संस्कृत .. मराठी और गुजराती भाषाओं के अध्यापक नियुक्त कर दिये गये। उस समय उनकी आयु 23 वर्ष की थी। एक साल बाद उन्हें बर्लिन और हालैंड के ओरियंटल कांफ्रेंस में हिन्दुस्तान के प्रतिनिधि के रूप में चुना गया। 1884 में उन्होंने आक्सफोर्ड विश्व विद्यालय से बैरिस्टरी पास की। 1885 में वे भारत लौटे और वकालत शुरू कर दी। उनकी बौद्दिकता और क्रियाशीलता से प्रभावित होकर रतलाम स्टेट के राजा ने उनको अपना दीवान यानी मुख्य मंत्री बना लिया। वहा उन्होंने कई सुधार कार्य किया। बाद में स्वास्थ्य खराब होने के कारण उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। कुछ समय तक मुंबई में रहने के पश्चात वे अजमेर चले आये। उस समय आर्य समाज का हेड आफिस अजमेर में ही था। वहा रहकर वे ब्रिटिश कोर्ट में वकालत भी करने लगे। रतलाम के दीवान के रूप में और बैरिस्टर के रूप में हुई आमदनियो से उनके पास जीविका के लिए पर्याप्त धन इकठ्ठा हो गया था। बाद में उन्होंने महाराजा उदयपुर के सलाहकार समिति के सदस्य के रूप में और अंत में जूनागढ़ रियासत के दीवान के रूप में कार्य किया। जूनागढ़ रियासत के दीवान के रूप में ही उनका वहा के ब्रिटिश सरकार के रेजिडेन्ट से विरोध शुरू हो गया। यह विरोध राज्य के काम में रेजिडेन्ट के अवाक्षनीय हस्तक्षेप को लेकर शुरू हुआ था। विरोध बढने के साथ इनके भीतर भारत में ब्रिटिश राज और उसकी न्याय प्रियता के प्रति बचे रहे थोड़े बहुत विश्वास को भी चकनाचूर कर दिया और अंग्रेजी राज के प्रति राष्ट्र वादी विरोध की भावना प्रज्ज्वलित कर दिया। आर्य समाज में काम करते ही राष्ट्रवाद की मिली शिक्षा अब इस व्यवहारिक राष्ट्रवादी शिक्षा के साथ उनके दिलो दिमाग पर गहरा प्रभाव डालने लगा था। ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध राष्ट्रवाद का ठोस स्वरूप ग्रहण करने लगा था। हालाकि इस घटना से पहले से ही वे लोकमान्य तिलक के राष्ट्रवाद के पक्षधर हो चुके थे। 1890 के बाद से ही वे उस समय की कांग्रेस पार्टी द्वारा ब्रिटिश शासन से प्रार्थना .. याचना के साथ चलाई जा रही सहयोग नीति के विरोधी बन गये थे। कांग्रेस के जलसों में ब्रिटिश .. महराज व महारानी की जय जयकार को वे हिन्दुस्तानियों के राष्ट्रीय स्वाभिमान एवं गरिमा के विरुद्ध मानते थे। 1899 में पूना में चापेकर बन्धुओ द्वारा वहा के आततायी पुलिस कमिश्नर रैंड की हत्या के बाद तिलक पर चले मुकदमे और कई अन्य लोगो पर कारवाई किये जाने के पश्चात वे इस बात के प्रति और दृढ हो गये थे कि ब्रिटिश भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता वैयक्तिक .. स्वतंत्रता और राष्ट्रीय स्वतंत्रता का कोई मूल्य नही है। इसी के बाद वे हिन्दुस्तान छोड़कर इंग्लैण्ड चले आये ताकि अपनी गतिविधियों को स्वतंत्रता पूर्वक संचालित कर सके। लन्दन में उन्होंने पहला बसेरा “ इनर-टेम्पल “ नामक स्थान बनाया। यही पर उन्होंने खाली समय में यूरोप के राष्ट्र वादी क्रान्तिकारियो तथा दार्शनिको की रचनाओं का पूरे मनोयोग से अध्ययन किया। 1900 में उन्होंने लन्दन के हैगेट में एक बड़ा मकान खरीदा और इसका नाम इंडिया हाउस रखा। यही मकान बाद में हिन्दुस्तानियों की आजादी के लिए चलाई जाने वाली गतिविधियों का केन्द्र बना। इंडिया हाउस में राष्ट्रवादी नेताओं के अलावा अन्तराष्ट्रीय समाजवादी एवं स्वतंत्रता के पक्षधर नेताओं का आना .. जाना हमेशा ही लगा रहता था। श्याम जी कृष्ण वर्मा वैज्ञानिक .. दार्शनिक हावर्ट स्पेन्सर के विचारों से बहुत प्रभावित थे। 1905 में स्पेन्सर की मृत्यु के पश्चात आक्सफोर्ड में आयोजित सभा के लिए उन्होंने अपनी तरफ से 1000 पौंड का योगदान दिया था। साथ ही उन्होंने हिन्दुस्तानियों को इंग्लैण्ड आकर उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए 2000। रूपये की घोषणा की थी हावर्ट स्पेन्सर इन्डियन फेलोशिप की घोषणा भी की। इसी तरह उन्होंने स्वामी दयानन्द सरस्वती की स्मृति में भी हिन्दुस्तानी छात्रो की इंग्लैण्ड में शिक्षा के लिए फेलोशिप की घोषणा की। चुकि हिन्दुस्तानी छात्रो की इंग्लैण्ड में रहते हुए नस्ली भेदभाव का सामना करना पड़ता था इसीलिए उन्होंने इंडिया हाउस में हिन्दुस्तानी छात्रो के रहने के लिए हास्टल भी बनवा दिया। बताने की जरूरत नही कि इंडिया हाउस में रहने वाले अन्य लोगो के साथ वह के छात्र भी ब्रिटिश राज से हिन्दुस्तानियों की स्वतंत्रता की गतिविधियों में कमोवेश लगे रहते थे। इंडिया हाउस के इस हास्टल के उदघाटन के समय दादा भाई नौरोजी लाला लाजपत राय मादाम भीखाजी कामा सोशल डेमोक्रेटिक फेडरेशन के सदस्य हेनरी हाईनडमैंने जैसे लोग उपस्थित थे। हेनरी हाईनडमैंने ने इस उदघाटन के अवसर पर कहा कि “ वर्तमान स्थितियों में ब्रिटेन के प्रति वफादारी का मतलब है, हिन्दुस्तान के प्रति गद्दारी। इंडिया हाउस में रह रहे लोगो की खासकर हिन्दुस्तानी छात्रो की हर तरह से सहायता करते हुए श्याम जी कृष्ण वर्मा समर्पित राष्ट्रवादियों एवं क्रान्तिकारियो की एक पीढ़ी तैयार करते रहे। वस्तुत: यह उनका राष्ट्र के स्वतंत्रता आन्दोलन में सबसे बड़ा योगदान था और है। इसी के फलस्वरूप मदाम भीखाजी कामा, एस आर राना, विनायक दामोदर सावरकर वीरेंद्र चटोपाध्याय, लाल हरदयाल जैसे लोग इंग्लैण्ड में रहकर राष्ट्र की स्वतंत्रता के अथक प्रयास में लगे रह सके। श्याम जी कृष्ण वर्मा ने राष्ट्र की स्वतंत्रता के उद्देश्य को आगे बढ़ते हुए 1905 में दो प्रमुख वैचारिक एवं व्यवहारिक काम को स्वंय आगे बढाया। ध्यान रहे कि अभी देश के भीतर राष्ट्र स्वतंत्रता आन्दोलन, जन आन्दोलन का रूप नही ले पाया था। वस्तुत: वह आन्दोलन 1905 में कर्जन द्वारा बंगाल के विभाजन के पश्चात 1906 .. 07 में ही तेज हुआ। लेकिन श्याम जी कृष्ण ने इस आन्दोलन को ब्रिटेन व अन्य यूरोपीय देशो में संगठित करने के वैचारिक उद्देश्य से 1905 में ही इन्डियन सोशिलिस्ट नाम की मासिक अंग्रेजी पत्रिका निकालना आरम्भ किया। यह हिन्दुस्तान की स्वतंत्रता के साथ इस देश में राजनैतिक सामाजिक और धार्मिक सुधारों की अभिव्यक्ति का मुखपत्र था। इसकी प्रतिया ब्रिटेन और अन्य देशो में बसे हिन्दुस्तानियों से लेकर इस देश के प्रबुद्द राष्ट्र भक्त लोगो तक पहुचाई जाती रही और इन्हें राष्ट्र स्वतंत्रता तथा जनतांत्रिक सुधार के लिए निर्देशित भी करती रही। वैचारिक आन्दोलन को व्यवहारत: आगे बढाने के लिए उन्होंने 18 फरवरी 1905 को इन्डियन होमरूल सोसायटी नाम के संगठन का भी शुभारम्भ किया। इस सोसायटी के तीन प्रमुख लक्ष्य थे। 1 देश में स्वराज स्थापित करना 2 इस लक्ष्य के लिए इंग्लैण्ड में भी हर संभव तरीके से इसका प्रचार प्रसार करना ताकि न्यायप्रिय आम व ख़ास ब्रिटिश जनता में भारत के स्वतंत्रता के प्रति समर्थन जुटाया जा सके। 3 हिन्दुस्तानी जनता में राष्ट्र स्वतंत्रता और राष्ट्रीय एकता के उद्देश्य को वैचारिक एवं व्यवहारिक रूप में आगे बढाया जाय। श्याम जी कृष्ण वर्मा को इन वैचारिक एवं व्यवहारिक गतिविधियों से तथा हिन्दुस्तानी क्रान्तिकारियो को अपना घर मकान देने के साथ हर तरह की सहायता देने के क्रियाकलापों से अब इंग्लैण्ड की ब्रिटिश हुकूमत उनके पीछे पड़ गयी। “ इन्डियन सोशिलिस्ट में उनके द्वारा भारत व इंग्लैण्ड के ब्रिटिश हुकूमत के विरुद्द लगातार लिखे जा रहे आलोचनाओं को लेकर वहा के कई स्थानीय ब्रिटिश संस्थाओं से श्याम जी कृष्ण वर्मा की सदस्यता को समाप्त कर दिया गया। अब ब्रिटिश समाचार पत्र भी श्याम जी के विरोध में खुलकर सामने आ गये। प्रसिद्द ब्रिटिश समाचार पत्र ने अपनी आलोचना में उन्हें नटोरियस कृष्ण वर्मा की उपाधि प्रदान की। ब्रिटिश समाचार पत्रों में उन प्रगतिशील अंग्रेजो की भी घोर आलोचना की गयी जो श्याम जी कृष्ण वर्मा के विचारों का समर्थन करते थे। “ ब्रिटिश सीक्रेट सेवा नाम की सरकारी गुप्तचर सेवा इनकी गतिविधियों पर हर समय नजर रखने लगी थी। इन्डियन सोशियोलोजिस्ट पर और खुद श्याम जी की अपनी निजी आजादी पर ब्रिटिश हुकूमत का शिकंजा कसता जा रहा था। इन स्थितियों में उन्होंने अपना हेड आफिस इंग्लैण्ड से हटाकर फ्रांस में ले जाने का निश्चय किया इससे पहले कि ब्रिटिश सरकार उन्हें गिरफ्तार करती वे 1907 में इंडिया हाउस को विनायक दामोदर के जिम्मे सौपकर चुपचाप पेरिस निकल गये। वहा पहुचकर उन्होंने इन्डियन सोशीयोलिस्ट और इन्डियन होमरूल सोसायटी का काम विधिवत जारे रखा। इस संदर्भ में दिलचस्प बात यह है कि इन्डियन सोशीयोलिस्ट का प्रकाशन 1909 तक लन्दन से तब तक होता रहा जब तक कि उसके मुद्रक को इसके लिए सजा नही दे दी गयी। उसके पश्चात वह पेरिस से निकलने लगा। इस दमनकारी कारवाइयो से अप्राभावित रहकर वे यूरोप के अन्य देशो में बसे हिन्दुस्तानियों के माध्यम से हिन्दुस्तान के भीतर लोगो को राष्ट्र स्वतंत्रता एक जुटता और आधुनिक युग के अनुसार समाज सुधार के लिए भी अपने वैचारिक व् व्यवहारिक प्रयासों को निरंतर आगे जारी रखे। ब्रिटिश सरकार ने फ्रांस की सरकार से श्याम जी को उसे सौपने के लिए दबाव भी डाला पर वैसा हो न सका। क्योकि उच्च स्तरीय फ्रांसीसी राजनयिकों में श्याम जी कृष्ण वर्मा की खुद भी पहुच कम नही थी ।, वहा रहकर उन्होंने ब्रिटिश सकार द्वारा सावरकर की गिरफ्तारी के विरोध और फिर उनकी रिहाई के लिए भी भरपूर प्रयास किये। लेकिन 1914 आते .. आते प्रथम विश्व युद्द के शुरुआत की परिस्थितियों में इंग्लैण्ड और फ्रांस में एक जुटता बढने लगी। फलस्वरूप फ्रांस में रहकर ब्रिटिश विरोधी गतिविधियों का संचालन अब कठिन ही नही बल्कि असम्भव सा हो गया था। ऐसी परिस्थियों में श्याम जी कृष्ण वर्मा अपना हेड आफिस फ्रांस से हटाकर जेनेवा ले गये। वह पर भी स्विट्जरलैंड सरकार ने प्रथम विश्व युद्द के पूरे काल में इनकी राजनैतिक गतिविधियों पर प्रतिबन्ध लगा दिया। इस समय भी वे दूसरे देशो के अपने सहयोगियों समर्थको के साथ सम्पर्क बनाये हुए थे। हालाकि इन सम्पर्को को बनाने में उन्होंने धोखा भी खाया। डाक्टर बरीस नाम का उनका एक सम्पर्क सूत्र तो ब्रिटिश के द्वारा नियुक्त भाड़े का जासूस निकला। युद्द के पश्चात श्याम जी ने नई बनी अन्तराष्ट्रीय संस्था “ लीग आफ नेशन्स “ से भारत जैसे राष्ट्रों की स्वतंत्रता पर और दूसरे देशो में शरण लिए हुए राजनीतिक शर्णार्थियो की स्वतंत्रता पर विचार के लिए अन्तराष्ट्रीय स्तर की संगोष्ठी बुलाने का प्रस्ताव किया। इसके लिए उन्होंने स्वंय अपनी तरफ से 10. 000 फ्रांक देने का प्रस्ताव भी भेजा पर ब्रिटेन के दबाव के चलते उनका प्रस्ताव स्वीकार नही किया गया। स्विट्जरलैंड की सरकार ने भी उनका प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया। तत्पश्चात उन्होंने जेनेवा में प्रेस एसोशियन जेनेवा के माध्यम से पत्रकारों संपादको और अन्य उच्च प्रबुद्ध तबको की मीटिंग बुलाई। इसमें स्विट्जरलैंड संघ के राष्ट्रपति और लीग आफ नेशन्स के अध्यक्ष को भी निमंत्रित किया गया। सभी ने औपनिवेशिक राष्ट्रों की स्वतंत्रता के उनके प्रस्ताव व विचारों का जोर शोर से समर्थन भी किया गया। लेकिन केवल वही पर और फिर उसे वही छोड़कर चलते बने। श्याम जी कृष्ण को इससे गहरी निराशा हुई। इस बीच विश्व युद्ध के दौरान स्विट्जरलैंड के प्रतिबंधो के चलते “ इन्डियन सोसियलिस्ट का प्रकाशन बंद रहा। इस मीटिंग की असफलता के बाद उन्होंने अपने उद्देश्य और उसके लिए किये गये प्रयासों और फिर उसकी असफलताओं पर लगभग 6 वर्ष बाद इन्डियन सोशिलिस्ट दिसम्बर 1920 का अंक प्रकाशित किया। लेकिन इसके बाद अपने गिरते स्वास्थ्य और टूटते सहयोगियों की स्थिति में वे अकेले पड़ते गये। श्याम जी कृष्ण ने इन्डियन सोशिलिस्ट के दो अंक अगस्त, सितम्बर 1922 में प्रकाशित करके उसे हमेशा के लिए अलविदा कह दिया। गिरते स्वास्थ्य और टूटी आशा के साथ जीवन के अंतिम वर्ष गुजारते हुए 30 मार्च 1930 को उनका देहान्त हो गया। श्याम जी वर्मा की मृत्यु का समाचार देश में आते ही उनकी श्रद्दांजली देने और उनके उद्देश्यों कामो को याद करने का सिलसिला तेज हो गया। भगत सिंह और उनके साथियो ने लाहौर जेल में ही उन्हें श्रद्धांजली दी। लोकमान्य तिलक द्वारा शुरू किये गये दैनिक समाचार पत्र मराठी ने उन्हें महान एवं धुन के पक्के देशभक्त के रूप में अत्यंत संवेदनशील श्रद्धांजली अर्पित किया। लोकमान्य तिलक द्वारा शुरू किये गये दैनिक समाचार पत्र “ मराठी “ ने उन्हें महान एवं धुन के पक्के देशभक्त के रूप में अत्यंत सम्वेदनशील श्रद्धांजली अर्पित किया। ब्रिटिश हुकूमत के प्रतिबंधो के चलते श्याम जी कृष्ण वर्मा जी जीते जी हिन्दुस्तान नही लौट पाए लेकिन मृत्यु प्रांत अपनी और अपनी पत्नी के अस्थि कलश को स्वतंत्रत भारत में भेजे जाने का पूर्ण प्रबंध वे स्वंय कर गये थे। इसके वावजूद 1947 में बनी भारत सरकार ने उसे देश में लाने की कोई रूचि नही ली। 1980 के बाद श्री मंगल लक्ष्मी भंसाली के नेतृत्व में बनी श्याम जी कृष्ण वर्मा स्मारक समिति द्वारा नित्रंतर किये गये प्रयासों तथा पेरिस में बसे इतिहासकार श्री पृथ्वींन्द्र मुखर्जी द्वारा निरंतर किये गये प्रयासों के फलस्वरूप तथा अन्य कई गणमान्य लोगो के सहयोग से गुजरात के मुख्य मंत्री नरेंद्र मोदी के जरिये वह अस्थि कलश 22 अगस्त 2003 में देश पहुच गया। उसके पहले 1970 में उनके जन्म स्थान कच्छ क्षेत्र में एक नये नगर का निर्माण जरुर किया और उसे श्याम जी कृष्ण वर्मा नगर का नाम दिया गया।

सुनील दत्ता 
स्वतंत्र पत्रकार एवं समीक्षक
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