शनिवार, अगस्त 10, 2013

ख़त आ ख़त - संजीव कुमार : अविद्या (कुलपति के नाम प्रार्थनापत्र)

दिल्ली विश्व.अविद्यालय के कुलपति के नाम प्रार्थनापत्र

(कुलपति के नाम दूसरी चिटठी)
अविद्या भारतीय दर्शन का एक शब्द है। यह अभावात्मक नहीं, भावात्मक है। यह उस शक्ति का नाम है जिसका काम चीज़ों के असली स्वभाव और स्वरूप को छुपा कर नकली को सामने रखना है। मार्क्स की इबारत में ‘आइडियॉलजी’ का मतलब इसी से मिलता.जुलता है, ज़ाहिर है, आत्मा.परमात्मा से अलग संदर्भ में।.. सं.कु.

     सेवा में
     कुलपति
     दिल्ली विश्व.अविद्यालय
     दिल्ली
     महामहिम,

     साल भर से ज़्यादा समय हो गया जब मैंने आपको पहली चिट्ठी लिखी थी। बीच में कुछ नहीं लिखा, क्योंकि लोग बातों के ग़लत मानी लगा कर हंसी.ठट्ठा करने लगते हैं। जिस सार्वजनिक सभा में आपका सिक्का जमा देने के इरादे से मैंने वह चिट्ठी पढ़ कर सुनाई थी, वहां लोग, जाने क्यों, हंस.हंस कर दुहरे होने लगे थे! बताइए, इरादा क्या था और नतीजा क्या निकला! वही चिट्ठी जब मोहल्ला लाइव नामक एक वेब पोर्टल पर छपी, तो किसी शरारती तत्व ने मेरी तारीफ़ का उल्टा मतलब लगाते हुए लिख मारा, ‘भैंस के आगे बीन बजाने से क्या होगा?’ और तो और, इसमें कोई शक न रह जाए कि लिखने वाला आपको ही भैंस कह रहा है, इसके लिए उसने भैंस लिखने के बाद ब्रैकेट में चांसलर भी लिख दिया। अब ये तो हद है! आप किस मायने में भैंस हैं? एक गोरा.नारा इंसान, जो चारा नहीं खाता, पागुर नहीं करता, जिसकी सींगें नहीं हैं, जिसे बदन को ठंडक पहुंचाने के लिए कीचड़ में लोटने की ज़रूरत नहीं, जो दूध नहीं देता, उसे भैंस आखि़र किस दृष्टि से कहा जा सकता है! और बदमाशी की इंतहा देखिए; मैं जिसे बजा रहा था, क्या उसे बीन कहते हैं? मैं तो आपकी तारीफ़ का ढोल बजा रहा था। बुरा हो, भाषा.साहित्य के उन विद्वानों का जिन्होंने ‘विपरीत लक्षणा’ नाम की एक चीज़ बना रखी है। किसी का ढोल बजाओ तो लोग उसे विपरीत लक्षणा मान कर बैंड बजाना या सिर्फ़ ‘बजाना’ समझ लेते हैं। इधर किसी फ़िल्मी गाने में एक और बजाई जानेवाली चीज़..पुंगी..की भी चर्चा सुनी है। असल में, जिन लोगों ने आपके खि़लाफ़ नफ़रत की पुंगी बजा रखी है, वे ही इस तरह बजने.बजाने की बातें करते हैं।

     बहरहाल, इस सवा साल की अवधि में आपने मेरी सलाहों पर जिस तरह मुस्तैदी से अमल किया है, उसे देख कर जी जुड़ा गया। ध्यान दें, मैं अमल कह रहा हूं। कहीं ऐसा न हो कि मेरे दुश्मन जब आप तक यह ख़त पहुंचाएं तो अमल का ‘अ’ डिलीट कर दें। तौबा.तौबा! ये शिक्षक संघ वाले जो न करें। अच्छा हुआ कि आपने इनसे मिलने से ही तौबा कर ली है और इन्हें ग़ैरक़ानूनी क़रार देते हुए एक तरह से अपने ओहदे को उन राष्ट्रपति महोदय से भी ऊपर उठा लिया है जिन्होंने शिक्षक संघ को क़ानूनी मानते हुए उसे मिलने का समय दे दिया। निस्संदेह, ‘महामहिम’ का जो संबोधन अंग्रेज़ों की विरासत के रूप में राष्ट्रपति भवन से बेदख़ल होकर इन दिनों मारा.मारा फिर रहा है, उसके सही हक़दार आप ही हैं।

     महामहिम, इन सवा सालों में आपने बतौर कुलपति परंपरानिष्ठ भारतीय पति का जो किरदार अदा किया है और डंडे के ज़ोर पर विश्वविद्यालय समुदाय को पतिव्रता बना लेने की जो पहल दिखाई है, वह क़ाबिले.तारीफ़ है। यह पहल अभी पूरी तरह कामयाब भले न हुई हो, वह दिन दूर नहीं जब पूरे विश्वविद्यालय समुदाय को पतिव्रता भारतीय नारी की तरह बिना चूं.चपड़ किए आपकी हर बात माननी होगी। न मानने वालों की एक दिन की तनख्वाह काट कर आपने ज़बर्दस्त मिसाल क़ायम की है। दुखद है कि उस दिन की मेरी भी तनख्वाह कट गई जबकि मैं तो आपकी ओर से जासूसी करने हड़तालियों के बीच गया था। पर चलिए, जितना खोया, उससे कई गुना ज़्यादा आपकी भक्ति का फल होगा, यही विश्वास मुझे बेफ़िक्र किए हुए है। थोड़ा अचरज यह देख कर होता है कि मुझ जैसे भक्त को तो छोड़िए, दूसरे आंदोलनधर्मी शिक्षकों को भी इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा। पता नहीं, पैसे.कौड़ी को लेकर ये इतने लापरवाह क्यों हुए जा रहे हैं? आप ग़ौर करें तो पिछले तीन सालों से जिन मुद्दों पर ये आंदोलनरत हैं, उनका पैसे.कौड़ी से कोई लेना.देना नहीं। ये तो शिक्षा की गुणवत्ता और विद्यार्थियों का हित और शिक्षकों की बहाली और उच्च शिक्षा में ग़रीबों की एंट्री और निर्णयों में भागीदारी और नवउदारवादी हमला और पता नहीं क्या.क्या मुद्दे लेकर खुराफ़ात करने में लगे हैं। दिमाग़ चक्कर खा जाता है इन नामुरादों की बातें सुन कर। अरे, सीधा तनख्वाह का मामला हो तो बात समझ में आती है। और चीज़ों से इन्हें क्या मतलब! उन चीज़ों के लिए आप और आपकी टीम है ना! पर ये कहते हैं कि आप और आपकी टीम नवउदारवादी ताक़तों की एजेंट बन गई है। बताइए भला, आपके पास पैसा.कौड़ी कमाने के लिए पहले से ही इतने सारे उपाय हैं, आपको भला बीमा एजेंट, ट्रैवेल एजेंट जैसा कोई एजेंट बनने की क्या दरकार?

     ख़ैर, तनख्वाह कटौती के रूप में जो मिसाल आपने क़ायम की है, उसके बाद भी ये अपनी हरकतों से बाज़ नहीं आ रहे और रिले हंगर स्ट्राइक पर बैठ गए हैं, तो निश्चित रूप से आपको कोई दूसरा तरीक़ा अपनाना होगा। नहीं तो आपकी छवि कुलपति की बजाय व्याकुल पति की बन जाएगी। दूसरा तरीक़ा क्या हो सकता है? मैं दो तीन सुझाव दे रहा हूं। उनमें से अपनी महीन बुद्धि से आप कोई भी एक चुन लें:

  1. जिस जगह पर इन मास्टरों.मास्टरानियों का रिले हंगर स्ट्राइक चल रहा है, वहीं दस मीटर के फ़ासले पर बड़े.बड़े तंदूर और चूल्हे लगवाएं और देश के नामी बावर्चियों को बुलवा कर खानों की वो खुशबू फैलाएं कि इन नामुरादों की हड़ताल हराम हो जाए। टुकड़े दिखा के काबू में कर लेना तो हाक़िमों का पुराना आज़माया हुआ तरीक़ा ठहरा।

  2. अगर आपको लगता है कि लाभ.लोभ जैसे मानवीय गुणों से पीछा छुड़ा कर ये सारे शिक्षक अमानवीय हो गए हैं और मेरा बताया पहला उपाय इन पर काम नहीं करेगा, तो दूसरा तरीक़ा भी है। वह यह कि सारे प्राचार्यों और विभागाध्यक्षों को ताक़ीद कर दें कि जो भी शिक्षक, आंदोलन में शरीक हो उसके खि़लाफ़ सख़्त आनुशासनिक कार्रवाई की जाए। जो प्राचार्य और विभागाध्यक्ष ऐसा करने में नाकाम रहें उनका पद उनसे अविलंब छीन लें। प्रेरणा ग्रहण करने के लिए मैं आपको ‘दे ग्रेट डिक्टेटर’ फ़िल्म देखने की सलाह देता हूं जिसमें टूमानिया का शासक हैंकेल यानी हिटलर बना हुआ चार्ली चैप्लिन जब भी नाराज़ होता है, अपने सेनाध्यक्ष के सीने पर टंके सारे मेडल एक.एक कर नोच फेंकता है। और महामहिम, खुदा ख़ैर करे, एक बार तो वह उस जैकेट को भी नोंच फेंकता है, जिस पर तमगे टंगे हैं... और जैकेट जिस शर्ट के ऊपर है, उस शर्ट को भी नोंच फेंकता है... और शर्ट जिस बनियान के ऊपर है, उस बनियान को भी नोंच फेंकता है।... आप इस प्रसंग से जितनी भी प्रेरणा ले सकें, कम है।

  3. अगर आप थोड़ा अधिक दुस्साहिक क़दम उठाने को तैयार हों, जो कि मेरा विश्वास है आप होंगे, तो तीसरा तरीक़ा अपनाएं। वीडियोग्राफ़ी में जहां जो भी शिक्षक नारेबाज़ी करता दिखाई दे जाए, उसे अपने दफ़्तर में बुला कर उसकी ज़बान काट लें और प्रेस.कांफ्रेंस कर यह घोषणा करें कि विद्यार्थियों के हित में यह आवश्यक था, क्योंकि नारेबाज़ी से अध्ययन.अध्यापन में बाधा पड़ती है। बाद में इस आधार पर इन शिक्षकों को नौकरी से बर्खास्त कर दें कि चूंकि इनके पास ज़बान नहीं है, इसलिए ये पढ़ा नहीं सकते; लिहाज़ा इन्हें नौकरी में रहने का कोई अधिकार नहीं है।

     महामहिम, ये मशवरे छोटा मुंह बड़ी बात की तरह हैं। आपकी टीम में तो बड़े मुंह से बड़ी बात कहने वाले लोग भरे पड़े हैं। पर कहा गया है ना कि जहां सुई का काम हो, वहां तलवार क्या करेगी। यही सोच कर ये मशवरे दे रहा हूं। आशा है, आप इसे गुस्ताख़ी नहीं समझेंगे और जिस तरह पिछली चिट्ठी के मशवरों पर अमल किया था, वैसे ही इस पर भी अमल करेंगे।

     धन्यवाद सहित,

     भवदीय,

     संजीव कुमार
     स्वदेशबंधु महा.अविद्यालय।
     14. 10. 2012

     

1 टिप्पणी:

  1. वाह !
    हर जगह होती ही है होती है एक टीम
    जो नहीं बना सकता है उसमें जगह
    उसको थमा देनी चाहिये एक बीन
    वैसे भी सारे देश में एक ही
    व्यवस्था लागू की जानी चाहिये
    कुलपति जी के हाथ में
    एक ऎ के 47 भी
    अब तो कम से कम
    थमा ही देनी चाहिये !

    जय हो !

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