कहानी: पेंशन का रिश्ता - अमिय ‘बिन्दु’

पेंशन का रिश्ता 

                 -अमिय बिन्दु

दीपू की चीख सुनकर किरन की अचानक नींद खुल गई। समझ नहीं पाई, यह कोई सपना था या हकीकत। अधखुली आँखों से बिस्तर को टटोला, दीपू नहीं मिला! सहसा कुछ यादकर वह उछली और बिस्तर से नीचे आन खड़ी हुई। एक-एक कदम में न जाने कितनी सीढ़ियाँ पार करती हुई वह नीचे उतर आई।

       गेट खुला हुआ था। बाहर वाले कमरे में दीपू फर्श पर पड़ा था और सावित्री वहीं गाल पर दोनों हाथ धरे खड़ी काँप रही थी। आँखों में लाल-लाल डोरे! भय की सिहरन! कुछ अचानक घट जाने का आश्चर्य! रामलाल झकझोर रहे थे “यह क्या किया तूने? दीपू ने क्या बिगाड़ा था तुम्हारा?”

       दीपू को उठाने ही जा रहे थे कि किरन की चीख सुनकर ठिठक गए। चीखती हुई कमरे में दाखिल हुई, “क्या हुआ मेरे दीपू को? हाय! बेटा! क्या हो गया? मार डाला इस बुढ़िया ने?”

       दीपू से लिपटकर रोने लगी। अभी सावित्री वैसे ही खड़ी थी। बिल्कुल निश्चल! निश्कंप! पत्थर की मूरत! एकाएक किरन ने उसे जोर से धक्का दिया “हत्यारिन, खा गई तू! मेरे बेटे को?” फिर दीपू को पकड़ दहाड़ें मारकर रोने लगी।

       दीपू, किरन और राघव का इकलौता बेटा है। मना करने के बावजूद वह अक्सर दादा-दादी के पास चला जाता है, उनके साथ खेलना उसे अच्छा लगता है। वे उसे किसी बात के लिए रोकते टोकते नहीं, सोने के लिए नहीं कहते, कुछ मना नहीं करते और उसके साथ खेलते रहते हैं। रामलाल कभी उसके लिए घोड़ा बन जाते हैं, कभी शेर तो कभी हाथी और दीपू उनकी पीठ पर बैठकर सवारी करता है। दादी भी हमेशा उसके पीछे भागती रहती है। उसे कुछ न कुछ बनाकर खिलाती है, उसके साथ छुपम-छुपाई खेलती है, जब थककर बैठ जाता है तो दुनिया भर की कहानियाँ सुनाती है।

       राघव भी अपने माँ-बाप का इकलौता बेटा है। वह परिवार के साथ ऊपरी मंजिल पर रहता है और माँ-बाप नीचे रहते हैं। छः बरस का दीपू दोनों परिवारों के बीच पुल की तरह है।

       जल्द ही खबर मुहल्ले में फैल गई, राघव को भी ऑफिस में सूचना पहुँच गई। दीपू को अस्पताल ले जाया गया, पन्द्रह मिनट के भीतर उसे होश आ गया, बेहोश भर हुआ था। आसपास भीड़ देखकर उसे कुछ समझ नहीं आया, किरन से लिपट गया। चुपचाप शून्य में खोए हुए वह कुछ देर पहले की घटनाएँ याद करने लगा।
स्कूल से आने के बाद मम्मी ने जबरदस्ती बिस्तर पर लिटा दिया था मगर आँखों में दूर-दूर तक नींद नहीं थी। लेटकर इन्तजार करता रहा, जैसे ही मम्मी की खर्राटे सुनाई पड़ीं, चुपके से दादा-दादी के पास नीचे चला गया। दोनों जग रहे थे, उसे देखते ही खुश हो गए। दादा घोड़ा बनकर तैयार हो गए और दादी किचन में कुछ बनाने चली गई।

       दादा की आँख और मुँह पर पट्टी बँधी थी। “क्या हुआ दादाजी?”, “चोट कैसे लग गई?” “खून कैसे आ गया?”, “ज्यादा लग गया क्या?” दीपू पट्टी खोलने की कोशिश करने लगा। उन्होंने मना किया लेकिन वह जिद्द करता रहा कि चोट देखनी है। गोद में बिठाकर प्यार करने लगे, पर उसका दिमाग पट्टियों पर अटका रहा। पट्टी खींचकर खोलने लगा, मना करने पर हाथ-पैर चलाने लगा।

       किचन से सावित्री दोनों की लड़ाई देख रही थीं। दीपू संभल नहीं रहा था, किचन से आकर उन्होंने खींचकर उसे अलग कर दिया, “चल हट यहाँ से, बदमाश कहीं का! बाप चोट लगाकर झाँकने नहीं आता, यह नालायक उसे नासूर बनाना चाहता है।”

       दीपू गुस्से में था, सावित्री से भी नहीं सम्भला। एक पैर बड़ी जोर से रामलाल के चेहरे पर लगा, अभी संभले भी नहीं थे कि दो घूँसे आँखो के बीच जा लगे, वे चीख उठे। सावित्री दीपू को पूरा जोर लगाकर खींचने लगी। खींचते हुए बुरी तरह काँप रही थी, होंठ भिंचे हुए थे, आँखों से अंगारे निकल रहे थे। चेहरा देखकर दीपू सहम गया, शान्त हो गया पर सावित्री उसे खींचती रही। उसका गला और चेहरा उसकी हाथों में था, पकड़ कसती जा रही थी, साथ ही वह चिल्लाती जा रही थी “तू भी पूरा नालायक है”, “मेरे बेटे को मारेगा? राघव को मारेगा? राघव को मारेगा?”

       जल्द ही राघव भी घर पहुँच गए। लोग आपस में खुसर-फुसर कर रहे थे। सभी स्तब्ध थे कि सावित्री ने बहू-बेटे से बदला लेने के लिए पोते का गला घोंटा! माँ-बाप से अलग रहने के लिए लोग राघव को गालियाँ दिया करते थे, कोसते थे। पर आज सब सहमे हुए थे, बदला लेने के लिए बुढ़िया इतनी गिर जाएगी, इसी बात पर चर्चा हो रही थी। किरन से लोगों को पता चला था कि सुबह राघव की पापा से कहासुनी हुई थी, पैसे माँग रहे थे रामलाल। बस इतनी सी बात को लेकर बुढ़िया ने यह कर डाला!

       किरन घर में घुसने को तैयार नहीं थी, जब तक बुढ़िया जेल या पागलखाने नहीं भेज दी जाती, वह घर में कदम नहीं रखेगी, ऐसी घोषणा कर रखी थी। पड़ोस में वह दीपू को लेकर बैठी थी। दीपू अब भी गुमसुम था, उसे समझ नहीं आ रहा था कि क्या हो रहा है? जो भी आता, किरन दिन भर की कहानी सुनाती, अंत में जोड़ना न भूलती, “हम लोगों ने कभी किसी का बुरा नहीं किया, बुरा सोचा तक नहीं, नहीं तो पता नहीं क्या हो जाता दीपू को? बुढ़िया तो उसे मार देना ही चाहती थी।”

       सभी सावित्री को पागल साबित करने में जुटे थे। रामलाल और सावित्री घर के अन्दर ही थे। लोगबाग झाँक-झाँक कर कुछ देखने की कोशिश कर रहे थे। हत्यारिन दादी का चेहरा कैसा होता है? वह चुड़ैल जैसी है? पागल जैसी है? या राक्षसिन जैसी? जैसे पूतना!

       सावित्री घण्टे भर से बदहवास सी फर्श पर बैठी थी! यह सब क्या हो गया? कैसे हो गया? गैस पर रखा बादाम का हलवा जलकर खाक हो चुका था। गेट खोलकर राघव आया था मिलने। आज ही सुबह पिताजी पर हाथ उठाया था उसने। चाय समेत कप उनके चेहरे पर दे मारा था। पर उस “छोटी-सी” बात के लिए इतना बड़ा बदला! उसे हजम नहीं हो रहा था। सावित्री ने दौड़कर उसका हाथ पकड़ा, उसने हाथ झटक दिया।

       वह राघव के पैरों को पकड़कर बैठ गई, “बेटा! दीपू अपना बच्चा है, मैं उसे मारने की भला सोचूँगी भी क्यों? तेरे पापा के मुँह पर हाथ-पैर चला रहा था, उसे खींच रही थी, पता नहीं यह सब कैसे हो गया? मुझे माफ कर दे, बेटा, जो चाहे सजा दे। कुछ तो बोल! क्या तुझे भी लगता है, मैंने ऐसा जानबूझकर किया है?”

       राघव की मुठ्ठिया भिंची हुई थीं, नथुने फूले हुए थे, गर्म साँस ऐसे बाहर निकल रही थी कि किसी को भी जलाकर खाक कर दे। आँखों में ऐसी घृणा सावित्री बर्दाश्त नहीं कर पा रही थी। वह बिल्कुल चुप था, मुँह बिचकाए हुए जैसे कोई घृणित चीज पैरों से लगी हुई हो! दो कदम हटकर दूर खड़ा हो गया। सावित्री औंधे मुँह पड़ी रोती रही “बेटा, ऐसा मत कर। तू तो मेरा बेटा है, हमें ऐसे मत छोड़। शुकर है दीपू को कुछ हुआ नहीं, नहीं तो मैं अपना मुँह कहाँ दिखाती? मुझे मार बेटा, मार डाल मुझे। अब ऐसा जीवन नहीं काटा जाएगा। तू भी मुँह मोड़ लेगा, उससे अच्छा है मार डाल!”

       “तुम्हारी तरह गिरा हुआ नहीं हूँ कि छोटी सी बात के लिए किसी की जान ले लूँ”, कहता हुआ राघव बाहर चला आया। सावित्री दहाड़ मारकर रोती रही, आवाज बाहर तक आ रही थी, लोग उसके पूरा पागल हो जाने की घोषणा करने लगे।

       पुलिस आ चुकी थी। उसके पीछे लोगों का हुजुम उमड़ पड़ा। लोग देखना चाहते थे कि पागल हुई सावित्री कैसी लग रही होगी? उसके दाँत कितने बाहर निकले होंगे? नाखून कितने बड़े-बड़े होंगे? चेहरा कितना डरावना होगा?

       पुलिस को कुछ ‘खास सुबूत’ नहीं मिला घर में। एक बिस्तर, बगल में नीचे बिछी हुई चटाई, टेबल पर रखी कुछ दवाईयाँ, एक छोटी सी आलमारी और सामने खुला हुआ किचन! इंस्पेक्टर ने नजर रामलाल के चेहरे पर गड़ाई, जैसे कुछ हाथ लगा हो, “बेटे से लड़ाई हुई थी, आज?” सावित्री कुछ बोलने के लिए मुँह खोलती उसके पहले रामलाल सामने आ गए “हाँ साहब! सुबह रग्घू (राघव) से थोड़ी बहस हो गई थी।”

       उसने नज़र चेहरे पर ही गड़ाए रखी। रामलाल बोलते रहे “ उस समय चाय पी रहा था, कप उछलकर मेरे चेहरे पर लग गई, उसी का चोट है।”

       इंस्पेक्टर ने अगला दांव फेंका, “पुलिस को नहीं बताया? रिपोर्ट नहीं की?”

       अब सावित्री आगे आ गई, “साब! घर में तो ई सब होता रहता है, हर बात के लिए पुलिस के पास थोड़ी जाते हैं। आपसी मामला है, घर की बात है, सुलझा लेंगे।”

       “लेकिन अब मामला आपसी नहीं रहा न! हमें कुछ तो करना ही पड़ेगा। किरनजी ने रिपोर्ट लिखाई है, वे जैसा चाहेंगी वैसा ही होगा।” इंस्पेक्टर ने अपना पल्ला झाड़ा कि मानो वह कर्तव्य बोध से दबा हुआ है।
धीरे-धीरे सुबह की पूरी बात पता चली कि रामलाल पेंशन से पाँच हजार रुपया हर महीने लेते थे, बाकी पैसा दीपू के नाम जमा हो जाता था, उसकी आगे की पढ़ाई के लिए। रामलाल ने खुद ऐसा कहा था। इधर कई महीनों से उनका खर्च नहीं चल पा रहा था, कमरतोड़ मँहगाई थी, हर चीज के दाम आसमान पर थे, बुढ़ापे में दवाईयों का भी खर्च बढ़ गया था। इन बरसों में पेंशन भी बढ़कर चौदह हजार हो चुकी थी। रामलाल ने राघव को बात करने के लिए बुलाया था कि अब वह आठ हजार ले लिया करें और बाकी दीपू के खाते में जाए। इसी बात पर नाराज होकर राघव ने चाय सहित कप उनके मुँह पर दे मारा था और भुनभुनाते हुए चला गया, “पता नहीं कौन सी लत है? बुढ़ापे में ऐय्याशी करनी है इन्हें, पाँच हजार में खर्च नहीं चलता!”

       इंस्पेक्टर ने सावित्री को कुरेदा, “बस इतनी सी बात के लिए दीपू को मार डालना चाहते थे तुम लोग?” सावित्री फफक कर रोने लगी, “ऐसा मत कहिए साब! ऐसा कलंक मत लगाइए। उस समय पता नहीं क्या हो गया था मुझे? दिमाग सुन्न हो गया था! मुझे लगा जैसे दीपू बड़ा होकर राघव को मार रहा है! राघव को बचाने के लिए मैं उसे खींचती रही, इतना भी होश नहीं था कि दीपू अभी छोटा है, कि सामने उसके दादा हैं, कि उसका गला मेरे हाथ में है! मैं खींचती ही गई!”

       “राघव के पापा की कसम साब! मैं बिल्कुल होश में नहीं थी। मैं पगला गई थी। पता नहीं क्या हो गया था मुझे?” सावित्री लगभग गिड़गिड़ाती हुई बोली। इंस्पेक्टर कुछ नहीं बोला, महिला कांस्टेबल को इशारा कर दिया।

       सावित्री दहाड़ें मारकर रोने लगी। आखिरी उम्मीद में वह राघव के पैरों पर झुकी, वह ऐसे पीछे हट गया जैसे उसकी परछाई से भी दूर रहना चाहता हो, वह रोती रही, “बेटा ऐसे मुँह मत मोड़! मैंने गलती की है, लेकिन बापू की सोच उनका क्या होगा? उन्हें कौन खिलाएगा? कौन पानी देगा? मुझे मार डाल बेटा, इस तरह अलग मत कर हमें, इस उमर में।” राघव पर कोई असर नहीं हुआ, दीपू को गोद में लिए, निनिश्चल खड़ा रहा। किरन भी मुँह फेरकर खड़ी थी, वह तो उस डायन का मुँह तक नहीं देखना चाहती थी।

       कन्धे पर लेटा दीपू दादी की ओर लपका। राघव ने दोनों हाथों से उसे खींच लिया। दीपू चीख रहा था, “तुम सब गन्दे हो! सब गन्दे हो! दादी को रोको। दादी! दादी! मुझे दादी के पास जाना है!” वह चिल्ला रहा था और राघव उसका मुँह दबाए उसे खींचे हुए था।

       भारी कदमों से चलते हुए सावित्री मुड़-मुड़कर दीपू को देखे जा रही थी। रामलाल के गले लगकर रोने लगी। काँपती आवाज में समझाते जा रहे थे, “अब क्या करें हम? तुम राघव को बचा रही थी! इस पर कौन भरोसा करेगा? कौन सुनेगा तुम्हारी बात? कौन मानेगा?”

       “सुबह पुलिस को फोन करने जा रहा था तो तुमने रोक लिया। डॉक्टर के यहाँ भी झूठ बोला कि चाय की केतली गिर गई है चेहरे पर, फिर दोपहर में उसी के मोह में तुम बिचारे दीपू पर टूट पड़ी, सब तुम्हारा ही करमभोग है!”

       सावित्री के जाते ही धम्म से गेट पर बैठ गए, आँसुओं का रेला थमने का नाम नहीं ले रहा था, कुछ-कुछ बुदबुदाते जा रहे थे, “जिन्दगी भर जिसे जिलाने, बचाने का जतन किया, अब उसी से बदला लेने के लिए थाने जा रही है। वाह रे! करमभोग!”

       सावित्री बार-बार पलटकर दीपू को देखे जा रही थी, वह अब भी दादी! दादी! चीख रहा था। सावित्री के चेहरे पर संतुष्टि की एक रेखा उभर आई! जिसके पीछे सारे दुख, सारे दर्द छिप गए, जैसे डूबते को तिनके का सहारा मिला हो! सबकी नजरें सावित्री पर थीं, उन्हें बस इतना दिखा कि इतनी जल्दी बुढ़िया की आँखों से आँसू सूख गए! खुसर-फुसर जारी थी कि जरूर इसने दीपू को मार दिया होता, कितनी देर से ड्रामा कर रही है!

       उनके थाने की ओर जाते ही भीड़ छंटने लगी। कड़ा फैसला लेने के लिए सभी किरन की मजबूती की दाद दिए जा रहे थे। सभी खुश थे कि बच्चों की सुरक्षा के लिए ऐसा कदम जरूरी था! खतरा टल जाने के बाद का सुकून लिए, धीरे-धीरे लोग अपने घर लौट गए, जहाँ उनके बच्चों को किसी पगली बुढ़िया से कोई खतरा नहीं था।

अमिय ‘बिन्दु’
जन्मः 22 जुलाई सन् 1979 को, उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले के नेवादा गाँव में। प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा वहीं।
शिक्षाः
स्नातक और परास्नातक पूर्वांचल विश्वविद्यालय से।
पूर्वांचल विश्वविद्यालय से ही ‘प्राचीन भारतीय ग्राम प्रशासन में ग्राम सभाओं की भूमिका’  विषय पर पी-एच. डी.।
रुचियाँ एवं गतिविधियाँ:
अनेक राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं (आज समाज, नेशनल दुनिया, असुविधा ब्लॉग, नया ज्ञानोदय, लमही, पाठ, अक्षर पर्व, अक्सर, संवदिया, प्रेरणा, प्रसंग, आधुनिक साहित्य) में रचनाएँ (अनुवाद, वार्ता, समीक्षा, कहानी, कविता, लेख) प्रकाशित।
प्रांजल धर के साथ ‘अनभै’ पत्रिका के पुस्तक-संस्कृति विशेषांक का सम्पादन।
अनेक काव्य-पाठ कार्यक्रमों एवं साहित्यिक-गोष्ठियों में भागीदारी।
साहित्यिक, सांस्कृतिक और वैज्ञानिक विषयों से जुड़े अनेक राष्ट्रीय-अन्तरराष्ट्रीय सेमिनारों में सक्रिय सहभागिता।
साहित्य और ब्लॉग लेखन में विशेष रुचि।
संप्रतिः  स्वतंत्र लेखन तथा विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय में कार्यरत
सम्पर्कः 8बी-2, एनपीएल कॉलोनी, न्यू राजेन्द्र नगर, नई दिल्ली-110060,
09311841337
amiyabindug@gmail.com

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