हूं मैं जैसा तुमने कर डाला - प्रेम भारद्वाज | Prem Bhardwaj on Rajendra Yadav

'पाखी' के राजेंद्र यादव पर केंद्रित सितंबर-2011 अंक के संपादकीय का किंचित संशोधित प्रारूप।
29 अक्टूबर 2013 को राजेंद्र यादव के देहावसान पर श्रद्धांजलि स्वरूप। - प्रेम भारद्वाज 

इकतीस जुलाई को ‘हंस’ का ऐतिहासिक समारोह। एवान-ए-गालिब का खचाखच भरा सभागार। राजेंद्र यादव का ‘शो’। उनके चाहने वाले, प्रशंसक, प्रिय, सब पहुंचे थे। वे भी जिन्होंने संकट में उनका साथ दिया। ढाला। कुछ अजीज अनुपस्थित भी रहे। भावुकता भरा क्षण। सबके लिए राजेंद्र जी की उखड़ी सांसें। मुड़-मुड़कर देखना। साथियों का सम्मान। इत्तिफाकन ‘शो’ में तमाशा भी हुआ। यह सब कुछ देखकर मुझे ‘मेरा नाम जोकर’ का अंतिम दृश्य याद आता है। लगभग 23 साल पहले जब राजेंद्र जी 60 साल के हुए थे तो उनके सम्मान में उनके ही नगर आगरा में एक समारोह हुआ था। तब अपनों के बीच उनको ‘मेरा नाम जोकर’ का अंतिम दृश्य याद आया था। आखिर कोई तो बात है जो उन्हें अपना दर्द और संवेदना ‘मेरा नाम जोकर’ वाले राजू के बेहद करीब लगते हैं। क्यों न राजेंद्र जी को समझने के वास्ते ‘राजू’ के मन को ही टटोला जाए।
नामवर सिंह को सुधीश पचौरी ने साहित्य का अमिताभ बच्चन बताया है। उनसे क्षमा याचना सहित कहना चाहूंगा कि क्या राजेंद्र  यादव साहित्य के ‘दि ग्रेट शोमैन’ यानी राज कपूर नहीं हो सकते। दोनों में क्या कुछ समानता है, इसे जरा देखा-समझा जाए। तो सबसे पहले हम आते हैं राज कपूर की सबसे महत्वाकांक्षी फिल्म ‘मेरा नाम जोकर’ और उसके अंतिम दृश्य पर। लेकिन एक गुजारिश। पाठक अपनी सुविधा और विवेकानुसार आगे की पंक्तियों में ‘दि ग्रेट शोमैन’, मेरा नाम जोकर का राजू, राज कपूर (राजू) और राजेंद्र यादव (यह भी राजू) को खोज सकते हैं... जोड़कर देख सकते हैं। यहां तीनों का कोलाज-कॉकटेल... कोलाज हो या कॉकटेल दोनों ही ज्यादा असर करता है। वैसे भी कुछ लोगों का जीवन सरल नहीं बेहद जटिल होता है... एकरेखीय नहीं, एक रंग नहीं... एक नशा नहीं... एक चेहरा नहीं... सब कुछ गड्मड्... आड़ा-तिरछा... एक चेहरे को काटता दूसरा चेहरा... ऐसा ही तो है राजेंद्र यादव का व्यक्तित्व। तो अब पेश हैं तीनों राजू एक साथ... कोलाज के रूप में।

       ‘मेरा नाम जोकर’ का अंतिम दृश्य। जोकर का आखिरी तमाशा जो अंतिम नहीं भी हो सकता है। यह जीवन है। यहां सब कुछ हमारे हिसाब से नहीं चलता... ‘बार-बार रोना और गाना यहां पड़ता है...’ नसीहत के बाद भी संभलकर नहीं चलना हमारी आदत में शुमार है। महत्वाकांक्षी शो... जिंदगी में आए तमाम अहम लोगों को न्यौता। जिन्होंने उसे बनाया-बिगाड़ा... साथ दिया, साथ छोड़ा... सब आए... उनके अजीज जोकर का तमाशा जो था... देश-दुनिया की तमाम जगहों से उसके चाहने वाले पहुंचते हैं... तमाशा शुरू होता है... कई ऐसे हैं जो उसे एक जमाने बाद देख रहे हैं... उनके देखने में वह देखना भी शामिल है जो अदृश्य है, लेकिन जो अतीत की कब्र में दफन हो गया... पुराना दौर... पुराने रिश्ते... पुरानी गर्मजोशी... मिलना-बिछुड़ना... कई पड़ाव... ठिकाने... रिश्तों की पगडंडियां... सपनों का आकाश... सच्चाइयों की सुरंगें... भीड़ में भी आज कितना अकेला पड़ गया है वह... जो कभी पिजड़े में शेर के साथ खड़ा मुस्कराता था, वक्त ने उसको इतना तोड़ दिया है कि अपने चाहने वालों को संबोधित करते हुए उसकी सांसें उखड़ने लगीं... ऐसा भावावेग के कारण भी हो सकता है... सबकी आंखें नम... कतरा-कतरा पिघलता वह ‘दिल’ जिसने जोकर को ताउम्र बहुत छकाया... कभी इस गली, कभी उस गली... तमाशा जारी... चेहरों पर बीते लमहों के निशान... तब और अब में फर्क... जोकर के भीतर भले ही बड़े पैमाने पर तोड़-फोड़ हुई हो... ऊपरी तौर पर जरा भी तो नहीं बदला है, वही मसखरापन, वही अदाएं, वही ठहाके... जो दिखता है, सच नहीं होता... कभी किसी ने कहां देखा है कि उसके मसखरेपन में भी दर्द छिपा होता है... टूटन, व्यथा, विछोह, ईष्या, बेचैनी, अपमान का जहर भी... सब कुछ भीतर-भीतर पी लेने के लिए अभिशप्त है। वह तो तमाशाई है। जोकर अपना दर्द कैसे व्यक्त कर सकता है। अगर दर्द के कभी संकेत भी देता है तो ‘हंसी-मजाक’ में घोलकर। होंगे भीष्म पितामाह सबसे बड़े अभिशप्त पुरुष। मुझे यह कहने की अनुमति दीजिए कि ‘जोकर’ उनसे बड़ा अभिशप्त है। वह अपनी मां की मौत पर भी रो नहीं पाता, जोकर रोता नहीं... किसी से बिछुड़कर... अपमानित होने... अपना सब कुछ खो जाने... दिल टूट जाने पर भी नहीं... है कोई माई का लाल जिसने उसकी आंखों में आंसू देखें हों। उसे तो नियति ने इस हाल से बचने के लिए काला चश्मा दिया है इस हिदायत के साथ-जोकर की आंखों में आंसू अच्छे नहीं लगते। इसे लगा लो, जमाने को तुम्हारे आंसू नहीं दिखेंगे।

वह देवता नहीं है। किसी का आदर्श-आइकॉन... रोल मॉडल भी नहीं। वह अच्छा आदमी नहीं है, बहुत बुरा भी नहीं। जोकर जो दिखता है वह है नहीं। चेहरे पर मुखौटा। न उसका असली चेहरा दिखता है, न भाव। जोकर जब अकेला... घर के बिस्तर... किसी उदास कोने में होता है, तो क्या सोचता होगा...किनके बारे में... क्या वह गीत नहीं गुनगुनाता होगा-- ‘जाने कहां गए वो दिन...’
       वह धर्मग्रंथ की नैतिकता से परे है। मर्यादा, पवित्रता, शुद्धतावाद, अश्लीलता उसकी चौखट पर आते ही दम तोड़ देती हैं... खुदकुशी कर लेती हैं... उसमें बेहिसाब कमजोरियां हैं... वह अपराधी भी है प्रेम करने का। उसके प्रेम की रेल देह की पटरी से होकर गुजरती है-- ‘तुम किसी रेल सी गुजरती हो, मैं किसी पुल सा थरथराता हूं।’ उम्र का कोई बंधन नहीं। वह अपनी टीचर के प्रति भी आकर्षित होता है और अपने से बहुत कम उम्र...। कुछ लोग भले ही उसकी कुंठा (यौन) कह लें मगर उसे स्त्रियां बहुत अच्छी लगती हैं... वह उनके करीब जाता है... प्रेम करता है। बार-बार करता है, थोड़ी बहुत बेईमानी, चालाकियां भी। वह नहीं मानता कि प्रेम एक से ही और एक ही बार किया जा सकता है। उसको रेणु बहुत प्रिय हैं... हीरामन की भूमिका निभाता है-- हीरामन की तरह हिस्स करते हुए इश्क भी करता है... मगर हीराबाई से बिछड़ जाने पर हीरामन की तरह ‘तीसरी कसम’ नहीं खाता-- ‘खा तीसरी कसम कि आज के बाद किसी जनाना को गाड़ी में नहीं बैठाएगा। वह राजू है। जोकर। दि ग्रेट शोमैन। आदर्शवाद की बैलगाड़ी हांकने वाला हीरामन नहीं। यह सोचकर कि यह जमाना आदर्श की बैलगाड़ी में सवारी करने का नहीं, यथार्थ के जेट विमान में बैठने का है। आप यहां यथार्थ को स्वार्थ कह सकते हैं। कोई दिक्कत नहीं। आदर्श रेंगता है, स्वार्थ छलांगें मारता है। अब वह पुराने जमाने का शे'र भी दिलासा नहीं देता-- ‘जहां तुम पहुंचे छलांगें लगाकर, वहां हम भी पहुंचे मगर धीरे-धीरे।’

चार्ली चैपलिन ने भी अपनी आत्मकथा में लिखा है-- ‘हर दूसरे व्यक्ति की तरह मेरे जीवन में भी सेक्स के दौर आते जाते रहे... जो परिस्थितियां आपको सेक्स की तरफ ले जाती हैं, वे मुझे ज्यादा रोमांचक लगती हैं।’ स्त्रियां उसे मोहती हैं। वह वासना में डूबा नहीं, फिर भी उसे स्त्रियां चाहिए। भोग के लिए नहीं, आधार के लिए। जड़ें न हों तो हवाएं बरगद को भी बहा ले जाएं। 
       उजली कल्पनाओं के पीछे यथार्थ का घटाटोप अंधेरा। एक यक्ष प्रश्न-- आदर्श व्यवस्था वही है जिसमें एक साधारण आदमी को जिंदा रहने के लिए किसी की फिजूल बातें सहते हुए नौकरी न बजानी पड़े। वह नौकरी नहीं करता। न राजू, न चैपलिन, न राजेंद्र। वह अपनी चालाकियों से लोगों को पीटता है, चालाकियों से प्यार करता है और चालाकियों के कारण ही पेट भरता है।

       राज कपूर की पहली निर्देशित फिल्म ‘आग’ की शुरुआत 6 जुलाई 1947 को होती है। राजेंद्र यादव की पहली कहानी ‘प्रतिहिंसा’ भी इसी साल 'कर्मयोगी' में प्रकाशित होती है। आग दोनों में है-- रचनात्मकता की। प्रतिहिंसा में भी आग होती है। 'आग' का नायक जीवन  में कुछ असाधारण कर गुजरना चाहता था। जलती हुई सी महत्वाकांक्षा उसका ईंधन बनी। क्या यही सच राजेंद्र यादव का नहीं है? 'आग' का ही विस्तार है ‘मेरा नाम जोकर।’ जोकर महज एक कलाकार ही नहीं, दार्शनिक भी होता है। यह जोकर नए जमाने का ‘कबीर’ भी हो जाता है कभी-कभी। खरी-खरी कहने वाला। किसी की परवाह किए बगैर-- ‘तरह-तरह नाच के दिखाना यहां पड़ता है, बार-बार रोना और गाना यहां पड़ता है।’

       राजू को स्त्री की देह (अनावृत स्त्री) पसंद है जिसे चलती भाषा में नंगापन कहा जाता है। बेशक यह नंगापन धूमिल के शब्दों में ‘दुनिया के व्याकरण के खिलाफ है।’ नंगेपन को वह रचनाओं में दिखाता है... थोड़ा ज्यादा उम्र बढ़ने पर स्त्री सौंदर्य के प्रति उसका नजरिया मांसल हो जाता है--‘सत्यम शिवम सुंदरम’ और ‘राम तेरी गंगा मैली’... ‘हासिल’ और ‘होना सोना एक खूबसूरत दुश्मन साथ’ ऐसी ही रचनाएं हैं। वह ‘आवारा’, ‘छलिया’, ‘श्री 420’ है। ऐसा कहलाना उसे पसंद है-- वह इन शब्दों को नया अर्थ देता है। एक नया दर्शन। नया पाठ खुलता है। लोग उसे दि ग्रेट शोमैन या इस शताब्दी का खलनायक क्यों न मान लें, उसकी शैली पर कोई फर्क नहीं। माथे पर कोई शिकन नहीं।

       अच्छे लोगों की दुनिया कई बार बुरी भी होती है। प्रेम की अधिकता एक किस्म की बीमारी में बदल जाती है। और अधिकता का भाव जीवन में बहुत कष्ट देता है-- क्या पता राजू के साथ ऐसा ही हो। कलाकार और व्यक्ति आपस में विरोधी हो सकते हैं। इस नजरिए से भी राजू को देखने की जरूरत है। चेखोव कहा करते थे-- ‘कुछ लोग जीवन में बहुत दुःख भोगते रहते हैं, ऐसे आदमी ऊपरी तौर पर बहुत हल्के और हंसमुख दिखाई देते हैं।’ खुद राजेंद्र यादव ने अपनी 60वीं वर्षगांठ पर स्वीकारा था-- ‘जोकरत्व के पीछे छिपी है अराजकता और हताशाओं की भयंकर ट्रेजेडी... मैं अपनी स्थिति उतनी ट्रेजिक तो नहीं पाता। मगर ओढ़े हुए व्यक्तित्व का एहसास तो बना ही है। शायद मैं वह नहीं हूं जो दिखाई देता हूं... क्या हूं... मैं खुद भी नहीं जानता। बस यही एक भावना शिद्दत से छटपटाती है कि अभी ये सारे लबादे उतारकर बहुरूपिए की तरह अपनी असलियत को धमाके से प्रकट कर डालूं, मगर कौन सा असलीपन?’ इस असलियत की कई अटकले हैं? हर कोई इसे जानने को उत्सुक है। मगर हाल अंधों के हाथी के बारे में जानने की कहावत वाला। थोड़ा-थोड़ा हिस्सा ही कोई भी जान पाया, पूरी असलियत शायद ही कोई जान पाए, क्या राजेंद्र जी हमारे समय के ऐसे अकेले हैं जिनकी असलियत कई तहों में दबी-छिपी है, क्या एकमात्र वही बहुरूपिए हैं, क्या यह देश और समाज बहुरूपियों से भरा नहीं है। यह बहुरूपियों का युग है। सारे बहुरूपिए अपने मूल चेहरे को कहीं सुरक्षित जगहों पर छोड़ आए हैं सिर्फ सामने जो दिखता है वह मुखौटा है, मुखौटों के सहारे कटती जिंदगी... मेरी, तेरी, उसकी, सबकी। निर्मला जैन ने लिखा है, ‘राजेंद्र जी ने बड़े यत्न से एक सार्वजनिक मुखौटा गढ़ा है। वे बराबर अपने इस बिंब की क्षति के खतरे से भयभीत रहते हैं।’

       क्या है राजेंद्र यादव का रूप। कितना हकीकत और कितना फसाना। क्या आधी हकीकत, आधा फसाना। क्या मुखौटा भय का सूचक है या उनका अपना विस्तार। क्या जो है मूल प्रति की कीमती कागज किसी तिजोरी या लॉकर या संदूक से बंद है, और क्यों। असल में उन्होंने लेखन से परे जीवन का एक घेरा खींचा है। उस घेरे में जितना उनका जीवन है, उस घेरे के बाहर उससे कहीं अधिक जीवन है। दिखता नहीं। मगर उनका जीवन भटकाव के कोहरे में कैद है। लोगों से तो बहुत मिलते हैं, खुद से नहीं। भागते हैं। भागना आज भी जारी है। कहते भी हैं, 'मन्नू आरोप लगाती है कि मैं जिम्मेदारियों और जिंदगी से भागता हूं-- मुझे लगता है मैं जिंदगी से नहीं जिंदगी में भागता हूं... इसलिए मुझे भीड़-भाड़, रंग-बिरंगी जिंदगी पसंद है।'

       वर्तमान को देखने-समझने के लिए अतीत के झरोखे पर कुछ देर खड़ा होना पड़ेगा। मारक्वेज की बात मानकर कि ‘क्या हुआ, इससे जरूरी यह है कि जो हुआ या उसे हम किस तरह याद करते हैं।’ राजेंद्र जी के तीन पहलू हैं मेरे हिसाब से। पहला उनके लेखन के जरिए जो छवि बनती है। दूसरी उनका संपादक रूप जो हंस पर बैठकर उन्होंने सवारी की। तीसरा उनका तिलिस्मी व्यक्तित्व जिस पर कहानी लिखने के लिए देवकी नंदन खत्री को दोबारा जन्म लेना पड़ेगा। बारी बारी से सिंहावलोकन। लेकिन सबसे पहले लेखन।

       ‘मेरे लिए लिखना सिर्फ एक यातना है, एक सजा है’-- इस उद्घोषणा के बावजूद राजेंद्र जी ने बहुत लिखा। बेहद यातना झेली। लंबी सजा भुगती। अब भी भुगत रहे हैं। लेखन में विषय बनाया उस मध्यवर्ग को जो अपनी गज से पूरी दुनिया को नापता है। स्त्री-पुरुष संबंध को लेकर आगे बढ़े और स्त्री- विमर्श को नया आयाम दिया। लेकिन जीवन में स्त्रियों की परिधि में उलझकर रह गए। इनके प्रिय लेखक काफ्का खुद के बारे में लिखते हैं, 'मेरी तो जिंदगी ही मेरा साहित्य है।’ उनकी जिंदगी का हर पन्ना उलटते चले जाइए-- हर में एक नई कहानी नई बात मिलेगी। उनके जीवन का हर पन्ना एक बड़े उपन्यास की मांग करता है।

       क्या इसे महज इत्तफाक माना जाए कि रचना ‘सारा आकाश’ का सच उनके जीवन में उतर आता है। उपन्यास में पति-पत्नी के दरमियान शादी के साथ ही टकराव प्रारंभ हो जाता है। एक अजीब सी टकराहट। राजेंद्र जी के जीवन में यह स्थिति अंतिम पड़ाव में आती है। वहां तो महज सात साल का अबोला था। जिंदगी में तो उन्हें वनवास मिले करीब 20  साल हो गए। यह वनवास कभी खत्म भी होगा, कहना मुश्किल है। राजेंद्र जी नई कहानी आंदोलन के नायक बने-- कमलेश्वर और मोहन राकेश के साथ। उस आंदोलन के वैचारिक पक्ष को सबसे ज्यादा मजबूती प्रदान की। एक ऐसा आभामंडल रचा जिसकी चकाचौंध में कुछ महत्वपूर्ण लेखक हाशिए पर खड़े नायकों का नायकत्व देखते रहे। कहानियां अच्छी लिखीं। उपन्यास भी बेहतर लिखे। लेकिन 80 के दशक तक आते-आते कहानियों में नया कहने के लिए कुछ बचा नहीं। जिस स्त्री-पुरुष संबंध को लेकर वे कहानियां लिख रहे थे, उसकी प्रासंगिकता नई नैतिकता और तेजी से बदल रहे हालात समाज में खत्म होने लगी। कटेंट बदलना संभव नहीं था। न कैरेक्टर में आमूलचूल परिवर्तन किया जा सकता था। ऐसे में उन्होंने नई पारी खेली-- संपादन की पारी। उनसे पहले उनके बाकी दो मित्र मोहन राकेश और कमलेश्वर संपादकी कर चुके थे। अब बारी राजेंद्र की थी।

       तमाम असहमतियों, नापसंदगियों, अगर-मगर, किंतु-परंतु के बावजूद उनकी दूसरी पारी धुंआधार रही-- उस जमाने के कपिल देव की बैटिंग सरीखी। राजेंद्र जी की कहानियों में समाज उस तरह से धड़कता नहीं है। वह स्त्री-पुरुष संबंध की चौहद्दी पार नहीं कर पाता। मगर उनके संपादकीय में समाज है। पूरी मुखरता और धमक के साथ है। उनके संपादकीय पढ़कर आप आज तो क्या 50-100 साल तक भी यह अंदाजा लगा सकते हैं कि वह किस कालखंड या दौर में अपने समय से मुठभेड़ करते हुए लिखे गए हैं। कोई कुछ भी कहे दलित और स्त्री-विमर्श को साहित्य में पूरी मजबूती के साथ स्थापित करने का श्रेय उन्हें जाता है। युवाओं या नए लेखकों की जमात पैदा की। 'हंस' के जरिए दर्जन भर से ज्यादा कालजयी कहानियां और लेखक दिए। जो काम राजनीति में वीपी सिंह ने किया, कमोबेश वही काम साहित्य में राजेंद्र यादव ने किया। बदनामी दोनों को झेलनी पड़ी। लेकिन इतिहास तो रच ही गए। जमाने की परवाह किए बगैर ‘कबीर’ के अंदाज में सच कहा। सवाल खड़ा किया। सच और सवाल सत्ताएं बर्दाश्त नहीं कर पातीं, चाहे वे किसी भी किस्म की धार्मिक, जातिगत, सामाजिक या राजनीतिक सत्ताएं क्यों न हो? सवाल और संशय के कारण ही नचिकेता को यम के हवाले उनके अपने ही पिता वाजश्रवा ने किया था।

       धारा के विपरीत बहने का साहस बहुत कम लोगों में होता है। लेकिन साथ ही यह भी सच है कि धारा के विपरीत तैरने के प्रयास में डूबते-छटपटाते हाथ ही इतिहास लिखने-रचने में कामयाब होते हैं। आज की तारीख में भले बहुत से लोगों को समझ में नहीं आए मगर कुछ समय बाद जब राजेंद्र यादव नाम का शख्स दैहिक रूप से हमारे बीच मौजूद नहीं रहेगा तब शायद उनकी अहमियत का अंदाजा बेहतर ढंग से लगेगा। उनमें साहित्य का नेतृत्व करने का कला-कौशल है जो नए लोगों में नहीं दिखता। गए 28 सालों से सिर्फ अपने संपादकीय की बदौलत साहित्य में एक ‘पावर सेंटर’ के रूप में बने रहना और खुद की प्रासंगिकता को बनाए रखना कोई सरल काम नहीं है। लेकिन इसी के साथ दूसरा पहलू भी जुड़ा है। कुछ ऐसी बातें जो नकारात्मक या उनकी खामियों-कमजोरियों की परिधि में आती हैं। इस कारण उनके संगी-साथी तो क्या खुद वे भी अपना बचाव नहीं कर पाएंगे-- थेथरई की बात अलग है। मजाक में टाल दें तो वह भी दूसरी बात होगी।

       राजू के जीवन में स्वप्न-दृश्य की बड़ी अहमियत है। राज कूपर ने कई फिल्मों में स्वप्न-दृश्य रचे हैं। इन पंक्तियों को लिखते-लिखते नींद आती है। नींद में स्वप्न। और स्वप्न...

       स्वप्न में बातचीत--

       अदालत का कोई कक्ष। सामने जज का चेहरा साफ नहीं। कठघरे में खड़े राजेंद्र यादव का चेहरा स्पष्ट है। काला चश्मा। सिगार होंठों पर नहीं, जेब में। अदालत में सिगार जलाने की इजाजत नहीं मिली। ठहाके-- ‘अरे कहीं लिखा तो नहीं है धूम्रपान निषेध।’ फिर सिगार सुलगाते हैं। चेहरे पर वही रौब-दाब। कोई पछतावा नहीं। कठघरे में कोई आरोपी या अपराधी ऐसी मुद्रा में खड़ा होता है क्या?

       उस कक्ष में उनके कुछ करीबी, मित्र, परिवार, पत्नी मन्नू भंडारी भी हैं। दोस्त-दुश्मन सभी। आरंभ होता है सवाल और आरोप दागने का सिलसिला बिल्कुल ही एके 47 की स्टाइल में तड़ातड़... तड़ातड़…

       ‘आप सिगार क्यों पीते हैं?’

       ‘पीता ही नहीं, सुलगाता हूं क्योंकि जिंदगी धुंआ-धुंआ है।’

       ‘क्या जो चेहरा आपका दिख रहा है, वह असली है, या आपने नकाब चढ़ा रखा है।’

       ‘जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन वैसी।’

       ‘आप वितंडावादी हैं?’

       ‘हूं जैसा तुमने कर डाला।’

       ‘क्या यह सच नहीं है कि आपने 'हंस' के जरिये ‘क्लास स्ट्रगल’ को पृष्ठभूमि में धकेल दिया और जातीय संघर्ष को बढ़ावा दिया।’

       ‘मैंने जातीय चेतना को जगाने की कोशिश की, इसमें बुराई क्या है?

       ‘आपका ‘मैं’ हमेशा हावी रहा- बिल्कुल सामंतवादी तरीके से। नयी कहानी के दौर में भी आप ‘जगत मिथ्या ब्रह्म सत्यम, अहं ब्रह्म अस्मि’ की ठसक रही, न मोहन, न कमलेश्वर या कोई और नहीं... मैं ही मैं... संपादक बने तो हर संपादकीय में वही फतवेबाजी... दलित या स्त्री के पक्ष को मजबूती के साथ रख रहे हैं तो यह भाव कि ‘देखो, इसे मैं कह रहा हूं।’

       ‘अगर इसके जवाब के तौर पर ‘मैं’ कुछ भी बोलूंगा तो कहा जाएगा, ‘देखा, यहां भी इसका ‘मैं’ बोल रहा है।’ अपनी बात मैं नहीं तो कोई दूसरा कैसे कहेगा पार्टनर।’

       ‘आप सवर्ण विरोधी हैं?’

       ‘नहीं मैं वर्ण-व्यवस्था का विरोधी हूं।’

       ‘आपने कविता लिखी है, एक संग्रह भी है, फिर कविता का विरोध क्यों?

       ‘क्योंकि कविता में ठहराव आ गया है, वह चुकने लगी है।’

       ‘आपकी कथनी-करनी में अंतर क्यों? चौके की बात कुछ, चौकी की बात और। आपने कोई भी पुरस्कार न लेने का ऐलान किया था लेकिन...’

       ‘मैंने हंसाक्षर ट्रस्ट के लिए पुरस्कार लिया है, हंस को चलाने की खातिर।’

       ‘यह ट्रस्ट भी तो आपका ही है, एक गरीब लेखक को ट्रस्ट बनाने की क्या जरूरत आ पड़ी... यह तो बड़े लोगों का खेल है... ब्लैकमनी.. व्हाइट मनी।’

       ‘ट्रस्ट पर ट्रस्ट करना सीखो।’

       ‘आपने गाली को ग्लोराफाई किया।’

       ‘गाली बेजुबानों की जुबान है... समाज का हिस्सा है।’

       ‘25 साल पहले आपके साथ लेखकों की जमात थी, जब ‘हंस’ का आगाज हुआ मगर धीरे-धीरे कई लोगों ने आपका साथ छोड़ दिया।’

       ‘अपने-अपने स्वार्थ थे, अलग-अलग वजहें किसी के लिखे पर टिप्पणी की... किसी का कॉलम बंद हुआ... कोई ‘हंस’ पर कब्जा करना चाहता था...।’

       ‘आप पर आरोप है कि आपने लेखिकाओं को प्रमोट किया, उनकी कमजोर रचनाएं भी छापीं।’

       ‘किसी ऐसी पत्रिका का नाम बताओ जहां स्त्रियां नहीं छपतीं।’

       ‘आपका लोकतांत्रिकता एक छद्म है।’

       ‘लेकिन वह इस देश के लोकतंत्र से तो हर हाल में बेहतर है।’

       ‘आप 'हंस' किन अदृश्य धन्नासेठों के बल पर चलाते हैं।’

       ‘पत्रिका निकालोगे तो खुद जान जाओगे... वैसे भी अदृश्य चीजों के बारे में सिर्फ अनुमान लगाया जाता है, वे दिखाई नहीं देती।’

       ‘आप दुनिया में किसी को प्यार नहीं करते...सिर्फ और सिर्फ खुद से ही प्यार है आपको।’

       ‘इस खुद में ही बेखुदी है, और बेखुदी में कई चेहरे हैं आस-पास।’

       ‘न आप सफल प्रेमी हैं, न पति, न पिता, न कथाकार, न आलोचक... संपादक के रूप में जरूर कामयाब हैं... इतनी असफलताओं में एक सफलता...।’

       ‘एक साधे सब सधे, सब साधे सब जाए।’

       ‘आप झूठ बहुत बोलते हैं...।’

       ‘कृष्ण कौन से सच्चे थे जिनकी पूजा होती है?’

       ‘आप एक साइकी केस हैं... शारीरिक अक्षमता ने आपको यौन रोगी बना दिया।’

       ‘हर आदमी को अपनी कमजोरियों-खूबियों के साथ जीने का अधिकार है। मेरे मित्र मोहन राकेश ने तो लिख ही दिया है हम सब आधे-अधूरे हैं।’

       ‘चेखोव के नाटक ‘तीन बहनें’ की कहानी की तर्ज पर आगे कदम बढ़ाते हुए अगर आपको सचमुच ही जिंदगी के रफ ड्राफ्ट को दोबारा जीने का मौका मिले तो एक सुधार क्या करेंगे?’

       ‘शादी को डिलीट मार दूंगा... बोहेमियन जिंदगी जिऊंगा...।’

       ‘मीता कौन है?’

       ‘मीत।’

       ‘मतलब?’

       ‘नगीना, मेरे जीवन की अनमोल रत्न।’

       ‘आप भावुक नहीं होते... हर बात पर अट्टहास’

       ‘मैं तब 21 वर्ष का था, वह 17 की। हमने प्रेम में साथ निभाने की कसमें खाई थीं। उसी ने कहा, तुम शादी कर लो। मैंने शादी कर ली और उससे कहा, ‘अब तुम कर लो। उसने यह कहकर नहीं की-- 'तुम विवाहित हो गए हो। मेरे पर अधिकार नहीं रहा। अब मेरी मर्जी।’ उसने शादी नहीं की। बावजूद इसके पिछले 60 सालों में वह संबंध कायम है-- क्या बिना भावुकता के इतने लंबे समय तक वे संबंध चलते हैं जो सिर्फ दिल से जुड़े हों।’
‘वह तीसरी औरत कौन थी जिसके साथ भी आपने न्याय नहीं किया... और जो मन्नू भंडारी से आपके अलगाव की सबब बनी।’

       ‘अब बस भी करो, सवालों-आरोपों की भी कोई सीमा होती है...।’

       ...झुंझलाहट के साथ वे उठ खड़े होते हैं। कुछ परेशान से। सपना टूटता है। सहसा नींद से जागता हूं। सामने विशेषांक की सामग्रियां पड़ी हैं । उसको फाइनल टच देना है। विशेषांक की तैयारी में सचमुच राजेंद्रमयी हो गया हूं। सपने में सवाल-जवाब। इसे कहां तक सच मानूं। भोर का सपना। लोग कहते हैं भोर का सपना सच होता है। होता है क्या?’



Share on Google +
    Facebook Commment
    Blogger Comment

0 comments :

Post a Comment

osr5366