युवा कथाकार हितेन्द्र पटेल के उपन्यास ‘चिरकुट’ पर चर्चा : पुखराज जाँगिड़ | Hitendra Patel's Novel 'Chirkut'

देर से ही सही पर अब हिन्दी में भी नये समय की चुनौतियों का सामना करने के लिए नये तरीके से सोचने और काम करने का समय आ गया है। अब हिन्दी में भी अनुवाद से इतर मौलिक ढंग से समाजविज्ञान की सैद्धान्तिकी तैयार करने की जरूरतों को शिद्दत से महसूस किया जा रहा है। इसलिए नयी सैद्धान्तिकी के निर्माण में समकालीन हिन्दी साहित्य की भूमिका अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि इनके माध्यम से हम अपने समय के समाज को ज्यादा बेहतर ढंग से पहचान सकते है। इसके अलावा हमें अपने काम, अपनी राजनीति और अपनी सेक्सुअलिटी को भी अलग-अलग न करके उन्हें एक साथ जोड़कर देखना चाहिए क्योंकि इसे समझे बगैर हम आज के दौर के समाज को, सामाजिक सम्बन्धों को, विशेषकर स्त्री-पुरूष सम्बन्धों को समग्रता में नहीं समझ सकते।” यह बात प्रखर समाजविज्ञानी मणीन्द्रनाथ ठाकुर ने 31 अगस्त 2013 को जे.एन.यू. (नयी दिल्ली) के संकाय केन्द्र में युवा कथाकार हितेन्द्र पटेल के नये उपन्यास ‘चिरकुट’ पर आयोजित एक विचार गोष्ठी के अध्यक्ष के रूप में कही।

‘नयी किताब’ (नयी दिल्ली) द्वारा प्रकाशित उपन्यास ‘चिरकुट’ पर आयोजित इस विचार गोष्ठी में युवा आलोचक संजीव कुमार, विभास वर्मा, अल्पना मिश्र और अकबर रिजवी के मुख्य वक्ता थे। गोष्ठी की अध्यक्षता प्रखर समाजशास्त्री मणीन्द्रनाथ ठाकुर ने तथा संचालन ‘संवेद’ व ‘सबलोग’ के सम्पादक किशन कालजयी ने किया।

       गोष्ठी की शुरूआत युवा पत्रकार अकबर रिजवी के वक्तव्य से हुई, जिसमें उन्होंने कहा कि ‘चिरकुट’ उपन्यास की भूमिका डराने वाली है क्योंकि यह आलोचक को चुनौती देते हुए उनकी सीमा निर्देशित करने की कोशिश करती है। जब कोई गम्भीर से गम्भीर बात सामान्य लहजे में, सामान्य भाषा में कही जाए तो ज्यादा समझ में आती है लेकिन हमेशा यहाँ आलोचना की संस्कृति इससे भिन्न रही है। उपन्यास की साधारणता/सामान्यता यह है कि फॉर्म औक शैली के मामले में यह उपन्यास नया नहीं है। ‘चिरकुट’ का शिल्प कमोबेश वैसा ही है जैसा कि पाओलो कोहेलो के उपन्यास ‘मेन फाउण्ड द थिएट्रा’, अलका सरावगी के ‘कलिकथा बाया बाईपास’, महुआ पाजी के ‘मैं बोरीशाला’ और खालिद जावेद के उर्दू उपन्यास ‘मौत की किताब’ का। ‘चिरकुट’ सहित इन पाँचों उपन्यासों के लेखकों का दावा यह है कि ये उनकी अपनी रचना नहीं है। इनमें लेखक एक मिडिएटर के रूप में आता है। असल में जब तक चीजें बदलती नहीं है तब तक उन चीजों को दोहराया जाना जरूरी हो जाता है और यही इस उपन्यास का उद्देश्य भी है। ‘चिरकुट’ शब्द सिर्फ और उपन्यास के शीर्षकीय प्रतियुत्तर में है, इसके अन्दर वह कहीं नहीं है। स्वतन्त्रता से पहले जिस स्थिति में हम थे, आम जनता आज भी उन्हीं परिस्थितियों से जूझ रही है, उनके लिए रोटी, कपड़ा और मकान आज भी परेशान करने वाली समस्याएँ हैं और इसका एक सिरा भाषा से भी जुड़ा है। यू.पी.एस.सी. और आई.आई.टी. के भाषायी प्रारूप को बदलने के पीछे यही रणनीति काम कर रही है। हमारे यहाँ का एक विशिष्ट मध्यवर्ग जो आजादी से पहले अँग्रेजों का सिपाहसालार हुआ करता था, आजादी के बाद वास्तविक रूप मे उसके हाथ में सत्ता आ गयी और आज भी वह उन्हीं के हाथ में हैं। अँग्रेजी को लेकर थोड़े-बहुत आग्रही हम भी रहे हैं। हिन्दी आलोचना में आप तब तक स्वीकृत नहीं होते जब तक आपका अँग्रेजी ज्ञान अच्छा न हो। उपन्यासकार ने इस बात को बहुत ही हल्के से उठाया है लेकिन बात इतनी हल्की है नहीं।

       लम्बे समय से हमारे भीतर गुलामी का भाव इस तरह से पैठा हुआ है कि हमलोग हमेशा से एक कमतरी के भाव में जीते रहे हैं। हमारे यहाँ भारतीय भाषाओं को लेकर जो एक हेयदृष्टि बोध रहा है, वह कोई नया नहीं है, जैसा कि उपन्यास के विभूति मित्र कहते है कि बिहारी बंगाली से दबेगा ही और बंगाली अँग्रेजी से दबेगा ही। उपन्यास को पढते हुए कई बार लगता है कि जब एक इतिहासकार उपन्यास की रचना करता है तो कई ऐसी नयी बातें हमारे सामने आता है जो न तो इतिहास में दर्ज हुई और न साहित्य में। अँग्रेजों के जमाने में भी अँग्रेजी उनकी जरूरत थी, न कि हमारी लेकिन इसके बावजूद अँग्रेज और अँग्रेजी श्रेष्ठता बोध की भाषा बन गयी। आजादी के बाद भी अँग्रेजी सत्ता की भाषा बनी रही है तो इसकी जिम्मेदार हमारी अपनी मानसिकता है। यह एक मनोवैज्ञानिक बात है कि लगातार अधीनस्थ रहते हुए अधीनस्थ वर्ग वर्चस्वशाली वर्ग को मानसिक रूप से अनुकरणीय मान लें और सीधे-सीधे उनके नियन्त्रण में न होकर भी अनुकरणीय लगते रहें और इसीलिए अनुकरण की प्रवृत्ति हमसे छूट नहीं रही। जब तक हम अनुकरण छोड़ अपनी मौलिक सोच सामने नहीं लाते, तब तक इस गुलामी से निजात नहीं मिल सकती। सबसे पहले हमें अपनी मानसिकता दुरूस्त करनी होगी क्योंकि व्यवस्था कभी हमारी नहीं होती, वह तो प्रभुवर्ग के हित में होता है, प्रभुवर्ग के लिए होता है। जैसा कि माजिद साहब लिखते हैं कि “ये जो मेरे वतन के दुश्मन हैं, काश! बर्बाद हो तो बात बने। मुल्क आजाद हो गया, लेकिन जेहन आजाद नहीं हुआ।” ‘चिरकुट’ की एक शासित इसमें आए अध्यात्म बनाम सामाजिकता के द्वन्द्व में भी निहित हैं। उपन्यास में उन आध्यात्मिक गुरूओं (या नेताओं) के सम्मोहन के बारे में समाज में प्रचलित धारणाओं का अच्छा विश्लेषण किया गया है जिन्होंने एक ऐसे युटोपिक समाज का निर्माण किया है, जिसमें रहने वाले लोग हमारे अपने समाज, गाँव, शहर में रहकर भी हमारे समाज के अंग नहीं लगते। जबकि हमारे यहाँ के सामाजिक सन्त समाज में बदलाव के लिए, किसी भी तरह के भेदभाव से रहित समरस समाज के निर्माण के लिए काम करते रहे हैं लेकिन आज के सन्त इसके उलट है। ‘चिरकुट’ समाज के इस दोहरे रूख को बेनकाब करता है। जीवन का शायद ही कोई ऐसा क्षेत्र हो जो इसमें न आया हो। इस तरह उपन्यास का कथाविन्यास उतना ही उच्छृंखल है जिनता कि मनुष्य और उसका जीवन और उतना ही सुनियोजित है जिनती की व्यवस्था।

       गोष्ठी की दूसरी वक्ता कवि-कथाकार अल्पना मिश्रा ने अपने वक्तव्य में कहा कि ‘चिरकुट’ उपन्यास के शीर्षक का शब्दकोशीय अर्थ फटा हुआ चिथड़ा होता है। ‘चिरकुटपना’ में वह भाववाचक संज्ञा बन जाता है जो कहीं न कहीं तुच्छता से जुड़ा है। यही कारण है कि निम्न प्रवृत्तियों (ओछापन, उथलापन) वाले व्यक्ति को भी चिरकुट कहा जाता रहा है। पूरे उपन्यास में समय ही चिरकुट है और उपन्यास क सभी पात्र किसी न किसी रूप में समय से टकरा रहे हैं। इस तरह अन्तर्जगत की बाह्यजगत के साथ जो टकराहट है, वह अन्त तक बनी हुई है। हर जगह एक सम्भावना दिखाई देती है कि अब सब ठीक हो जाएगा, लेकिन ऐसा होता नहीं है। जो भीतर के सत्य और आकांक्षाएं है, वो बाह्य जगत में आकर छूट-छूट जाते है और इस तरह लगातार एक द्वन्द्व की स्थिति उपन्यास में बनी रहती है। इनके चित्रण में उपन्यासकार ने प्रभावशाली प्रयोग किए है। आम आदमी के दुखों को प्रकट करने के लिए उपन्यासकार सिनेमाई चरित्रों (आमिर खान और प्रिति जिण्टा) बढिया इस्तेमाल किया है। सखुद उपन्यासकार एक इतिहासकार भी है इसलिए उपन्यास में कई ऐतिहासिक और राजनैतिक तथ्यों के रचनात्मक प्रयोग में सफल रहे हैं। ‘चिरकुट’ में महानगर का वर्णन प्रभावशाली रूप में सामने आता है। उपन्यासकार बहुत ही सहजता से कम शब्दों में कलकत्ते का नक्शा खींच देते है। कलकत्ते का परिवेश उन्हें खींचता है। जो प्रवृत्ति कोलकाता शहर की है, वह दिल्ली और मुम्बई की भी है। जहाँ लोग अपने-अपने तरीके से मस्त, व्यस्त और त्रस्त है। वे चाहे जितनी बातें करे, रहेंगे अपनी ही तरह के चक्रव्यूह में। वे उपन्यास के नायक दिलीप को कभी निराश या परेशान नहीं करते। हिन्दी की जिस तरह की सभा-सोसाइटियों में वह जाता था, वहाँ उसे कुछ भी ऐसा सुनने को नहीं मिलता, जो उसे समाज से जुड़ा लगे। यह हमारे साहित्य समाज पर बहुत बड़ी टिप्पणी है। इस तरह उपन्यासकार साहित्य के समाज से खत्म होते जुड़ाव को रेखांकित करते हुए कहते हैं कि एक वायवीय किस्म की बौद्धिकता का चारों ओर चलन था।

       यह जो वायवीय किस्म की बौद्धिकता है, वह समाज से इतनी कटी हुई है कि उसका कहीं ओर-छोर ही नहीं है। महानगरों में बौद्धिक ठसक के साथ चलने वाले ऐसे बौद्धिकों की संख्या में लगातार इजाफा ही हो रहा है। जिस बारीकी के साथ उपन्यासकार ने हमारे समय के सच को पकड़ा है, वह बहुत महत्त्वपूर्ण है। यह सच दिल्ली का भी उतना ही बड़ा सच है जितना की कलकत्ते का। सभी महानगरों की विशेषता है कि कोई भी अपना जीवन बगैर इस अहसास के गुजार सकता है कि वह मर चुका है। व्यक्ति इतना संवेदनहीन हो चुका होता है कि उसे इसका अहसास तक नहीं होता। इस पूरे उपन्यास में समय इतना बदहाल और फटेहाल है कि वह विचित्र और तुच्छ हो चुका है। वह बार-बार आम आदमी से टकराता है और उसे लहूलुहान करता है, उसके साथ चल नहीं सकता। उसकी संवेदना को इस हाल तक पहुँचा देता है कि वह कब का मर चुका है और इस बात का उसे अहसास ही नहीं है। उपन्यासकार ने उपन्यास में एन.जी.ओ. की पूरी व्यवस्था को अनावृत्त करने की सार्थक कोशिश की है, जिसमें हमारा पूरा परिवेश आ जाता है कि कैसे सरकारी अनुदान मिल रहे हैं और उन सरकारी के पीछे सिर्फ पैसा ही नहीं बल्कि उनकी पसन्द-नापन्द भी काम करती है। अगर उन्हें पसन्द है तो चलेगा, नहीं तो नहीं लगेगा। सरकार भी इससे अपना मन्तव्य साध रही है। उनकी मेहनत से उन्होंने जो आँकड़े जुटाए है, वह किस रूप में और किसके काम आ रहा है। ये जानकारीयाँ या तो गलत तरीके से उपयोग में लाई जा रही है या फिर उन पर इसके लिए दबाव बनाये जा रहे है। एन.जी.ओ. पर इतना स्पष्ट और सटीक प्रहार हिन्दी में अब तक नहीं किया गया है। इससे इतर ‘चिरकुट’ में सारे के सारे स्त्री पात्र इतनो कुण्ठित, लुण्ठित, बदहाल, स्वार्थी और व्यक्तित्वहीन है कि उसे देखकर घोर निराशा होती है। क्या सब महानगरों में लड़कियाँ ऐसी ही होती है? कहीं तो कोई तो उम्मीद बनी रहती! निश्चित रूप से समय जिस तरह की स्थितियाँ हमारे सामने रख रहा है और मनुष्य को जैसा बना रहा है, उसमें मनुष्यता की खोज बेमानी है। तमाम बदहाली और विभिषिकाओं के बावजूद उपन्यास में जहाँ-जहाँ स्त्रियाँ आती है, वहाँ-वहाँ लगता है, बहुत न्यायपरक बात नहीं बन पायी। डर लगता है कि क्या अब हमें ऐसी ही स्त्रियों के दर्शन होंगे? निश्चित रूप से उपन्यास का सकारात्मक पक्ष उसकी भाषा और एक बड़े फलक को चुनने की उसकी कोशिश है।

गोष्ठी के तीसरे वक्ता विभाष वर्मा ने अपने वक्तव्य में कहा कि हितेन्द्र पटेल के ‘चिरकुट’ उपन्यास के नाम में गहरी व्यंजना छिपी है। चिरकुट समय की यह कहानी किसी और के कहे गये को प्रस्तुत कर देने वाली शैली में लिखी गयी है। यह उपन्यास के फॉर्म का वह तरीका है जिसमें अगर आप बहुत सारी चीजें एक खास योजना के साथ नहीं लिख रहे हैं तो बाद में भूमिका कुछ इस तरह से लिखी जाती है कि आप उसे एक खास तरह की योजना में रख सकें। आदर्श पाठक की तलाश करती भूमिका से ही पाठक की कण्डीशनिंग हो जाती है कि कृपया इसे अपने पूर्वाग्रहों या तमाम बौद्धिक आतंक को छाँटकर पढें, लेकिन अगर वो आपके भीतर गहरी बैठी हुई है तो बैठी ही रहती है, छँट नहीं पाती। शायद आदर्श पाठक लेखक के मन में ही एक्जिस्ट करता है, कहीं और नहीं। उपन्यास हमारी देखी-अनदेखी सच्चाईयों को कुछ इस तरह से रखता है कि हम उसे देखकर अपने जीवन की उन सच्चाईयों को फिर से जाँचने लगते हैं। उपन्यास में एक किशोर के व्यस्क होने के दौरान आए तमाम ब्यौरे बहुत ही यथार्थपरक और विश्वसनीय हैं। दरअसल हमारे समय में लोगों के मानसिक विकास में और अनुभव के विकास में या उसे गढने में सिनेमा और पॉपुलर कल्चर की बड़ी भूमिका रही है, उसके सहारे नायक पहले तो अपने सपनों की एक दुनिया बनाता है और फिर उससे उबरने की कोशिश करता है। सिनेमा का ऐसा इस्तेमाल मनोहर श्याम जोशी के ‘कसप’ के बाद इस ‘चिरकुट' में दिखता है। इसमें हिट फिल्मों की अपेक्षा उन फिल्मों की बात की गयी है, जो किसी जमाने में छोटे कस्बों में खूब दिखायी जाती थी। इससे उपन्यास में प्रामाणिकता और विश्वसनीयता दोनों आ जाते हैं। उपन्यास का एक स्तर वह है जिसमें बहुत सारी छोटी-छोटी घटनाओं से लेकर पश्चिम बंगाल में हुए परिवर्तन तक की घटनाएँ शामिल है, जिसमें एक आशा दिखाई देती है। हालांकि उपन्यासकार ने आशा के इस स्त्रोत के बुझने के संकेत भी इसमें डाल दिए गये है कि किस तरह सत्ता जीवन के हरेक क्षेत्र में प्रवेश कर उसे संचालित करने की कोशिश कर रही है। इस तरह सत्ता के विरोध में एक आन्दोलन खड़ा होता है लेकिन बाद में पता चलता है कि उसे खड़ा करने वाला उसी पार्टी का ही एक आदमी एन.जी.ओ. को उसी तरह से फोन करता है, जिस तरह राजसत्ता उन्हें संचालित करने के लिए कर रही थी। उपन्यास में ऐसे बहुत से प्रसंग हैं जो पूरी तरह खुलकर हमारे सामने नहीं आते बल्कि पाठक को उकसाकर छोड़ जाते हैं। कई ऐतिहासिक घटनाएँ और बौद्धिक बहसें पाठक के दिमाग में अपनी तरह से चलती रहती है। जैसे – जे.पी. के सम्पूर्ण क्रान्ति आन्दोलन के लोग एक खास तरह के लोकतान्त्रिक समाज और संस्कृति के निर्माण के लिए आगे बढ रहे थे, तो फिर ये इन्दिरा गाँधी के पूतले को जूते-चप्पलों से क्यों फूँक रहे हैं? ऐसे कई सवाल उपन्यास में अनुत्तरित छोड़ दिए गये हैं। एक किशोर के मन पर इन सब बातों का असर बहुत गहरा होता है।

       उपन्यास का ढाँचा जितना बिखरा हुआ लगता है, असल में वह इतना बिखरा हुआ है नहीं। उपन्यास की शुरूआत जिस जे.पी. की खोज से होती है, वह उसके लिए जीवन में हो रहे श्रेष्ठतम के प्रतीक हैं। जे.पी. की तलाश अन्ततः एक गुरु की तलाश है। अपनी ही पार्टी के लिए अप्रासंगिक हो चुके सी.पी.एम. के एक पूराने कॉमरेड से मिलकर उसे लगता है कि जे.पी. ऐसे ही होंगे। पर जे.पी. की तलाश मुख्य मुद्दा नहीं है। मुख्य मुद्दा यह है कि आज हमारे जीवन में जो भी महान है, उसका निर्वासन हो चुका है। हमारे यहाँ पचास-साठ के दशक में लघुमानव की बात कही गयी थी, अब लघु की नहीं, चिरकुट और शुद्रता की बात की जा रही है। जो महान समय था, वह लघु के बाद अब क्षुद्र समय हो गया है। इस उपन्यास के पात्र अपनी तरफ से कोई महान काम नहीं करते हैं। शुरू से अन्त तक वह जैसे है वैसे ही बने रहते है। सामाजिक जीवन से सम्बद्धता और समझ के बावजूद वह खुद को उनसे अन्तर्सम्बन्धित नहीं कर पाता। वह एक ऐसे एन.जी.ओ. में काम करता है, जो न.रे.गा. जैसी कई योजनाओं पर रिपोर्ट तैयार करता है। भूमण्डलीकरण और उदारीकृत अर्थव्यवस्था पर बड़े-बड़े लेख लिखता है। दरअसल इसका कारण महान विचार/आदर्श/उद्देश्य की अनुपस्थिति। वह अपने जीवन में महान को फिर से पुनर्वासित नहीं करना चाहता, इसीलिए जे.पी. की खोज उसके अवचेतन में है। उद्देश्यहीनता उसके लिए सम्बन्धहीनता में बदल जाती है, नतीजतन जिस अन्तर्सम्बद्धता की उसे तलाश है वह उसे नहीं मिल पाती। इसका कारण एक खास तरह का पराएपन या अजनबियत है लेकिन यह अजनबीयत जीवन के तमाम रूपों से जुड़ने से नहीं आती। इतनी सारी चीजों को, सेक्सुअलिटी से लेकर राजनीति तक को इसमें समेटा गया है। छोटे से उपन्यास में ढेरों प्रसंगों को छुआ गया है और सभी एक-दूसरे से चिपके लगते हैं। एक एपिसोड खत्म हुआ नहीं कि उसी के भीतर से दूसरा, तीसरा, चौथा... एपिसोड शुरू। और इसीलिए कई बार उपन्यास विच्छृंखल लगने लगता है। इस तरह उपन्यास हमें हमारे समय की एक बड़ी कमी, सम्बन्धों का न होना बताता है। उपन्यास में कहा भी गया है कि ‘वह कहाँ से चला था और कहाँ तक आ पहुँचा। दिलीप अतीतजीवी नहीं था। वह पूरानी बातों को ज्यादा याद भी नहीं करता था।’ दरअसल यही सम्बन्धहीनता हमें दरअसल स्मृतिहीनता की ओर ले जाती है। जब हम अपने जीवन में सम्बन्धों को देखना बन्द कर देते है तो हम काल की सम्बन्धता को भी देखना बन्द कर देते है और इसीलिए हम स्मृतिहीन भी हो जाते हैं। ‘गाँव, मुंगेर, बनारस, एण्ड्रयुज, गुरुजी का आश्रम आदि उसे अपने जीवन के वे हिस्से लगते, जिससे उसका कोई सीधा जोड़ नहीं। भीतर, कहीं भीतर, उसे लगता है कि कहीं कुछ खो गया है, जिसे वो पाना चाहता है। वह चीज क्या है समझ नहीं पाता था। उसके जीवन का कोई उद्देश्य है या हो सकता है, यह वह कभी ठहरकर सोच नहीं पाता था। लेकिन, वह कभी भी चैन से, आनन्द से विभोर हो उठा हो, उसे जान नहीं पड़ता। वह जीवन के ईर्द-गिर्द की सभी वस्तुओं, लोगों को समझना चाहता था, उससे अपने को रिलेट करना चाहता था पर उसे हमेशा लगता था कि उसके पास अपने ईर्ग-गिर्द से जुड़ने की भाषा नहीं है। वह जिस भाषा में जीता था, वहाँ से सबकुछ असम्बद्ध-सा दिखता था। कभी-कभी उसे लगता था कि वह एक ऐसे व्यक्ति में परिणत हो गया है, जिसके पास अपनी स्मृति भी नहीं है।’ यहाँ ‘भाषा’ हिन्दी या अँग्रेजी वाली भाषा नहीं है बल्कि यह जीने के तरीके की भाषा है। असल में भाषा की यह विचारधारा की तलाश है, जो उसके जीवन को एक दिशा दे सके, चीजों से सम्बद्ध हो सके। सरसरी निगाह से पढने पर यह उपन्यास मामूली लग सकता है (जैसा कि भूमिका में संकेत किया गया है) पर अगर आप इसे ठहरकर देखेंगे तो आपके मन में कई सारे सवाल पैदा होंगे। ऐसा सिर्फ उपन्यास के स्त्री पात्रों के साथ ही नहीं है। हर कहीं हम अधूरी जानकारी पाते हैं। चूँकि वह जिन्दगी में अपने आपको किसी के साथ रिलेट ही नहीं कर पाया, जीवन में कुछ भी सही ढंग से अनुभव नहीं कर पाया। तमाम उसके दिल टूटते है पर उसको बहुत ज्यादा परेशानी नहीं होती। जीवन के अनुभवों की क्षमता की कमतरी के बावजूद वह आगे बढ जाता है और इसी अर्थ में वह चिरकुट हो जाता है।

     गोष्ठी के तीसरे वक्ता संजीव कुमार ने अपने वक्तव्य में कहा कि हितेन्द्र पटेल के ‘चिरकुट’ उपन्यास का शीर्षक अपने आप में एक पहेली है और इसी पहेली के कारण मैंने यह मान लिया था कि मैं इस ‘चिरकुट’ शब्द को नैरेटर और लेखक की एक टिप्पणी के रूप में न मानूं। बल्कि यह मानूं कि यह एक सामान्य रास्ते से भटके हुए एक आदमी के बारे में है जिसके बारे में हम कहते हैं कि बड़ा चिरकुट आदमी है। एक सामान्य व्यक्ति जो सरकारी नौकरी नहीं करना चाहता, जो एक बाबाजी की खोज में कहीं भी जा सकता है, वह चिरकुट के अलावा और क्या हो सकता है। उपन्यास को देखने की यह भी एक समझ हो सकती है। जहाँ इतिहास नहीं पहुँच पाता वहाँ साहित्य पहुँचता है और इसीलिए साहित्य में भी उपन्यास विधा इतिहास के सबसे करीब होता है। इतिहास की सीमाओं का अतिक्रमण करने में शायद उसकी सबसे ज्यादा काबिलियत होती है। यह होता इस तरह है कि किसी भी वैचारिक विधा में लिखने वाला व्यक्ति एक निश्चित विचार लेकर लिखता है। अपनी समझ को लेकर वो स्पष्ट होता है। अपनी समझ की स्पष्टता को वो लेख, निबन्ध, सम्पादकीय, फीचर आदि में या इतिहास या समाजशास्त्र की पुस्तक में भी लिख सकता है। जहाँ ये स्पष्टता नहीं होती या जहाँ कई सत्य एक-दूसरे से टकराते हुए नजर आते है, वहाँ कथा का माध्यम चुनने की मजबूरी आती है, इसलिए उपन्यासकार वही होता है जिसके सामने उपन्यासकार होने की मजबूरी होती है। अगर किसी किताब को पढते हुए आपको यह लगता है कि बड़े आराम से इसकी बातों को एक निबन्ध या एक लम्बे प्रबन्ध में कहा जा सकता है तो कथा का माध्यम इसके लिए अपरिहार्य नहीं है। अगर उपन्यास में आपको फीचर या सम्पादकीय नजर आने लगे तो फिर उपन्यास लिखने की जरूरत क्या थी! इस अर्थ में ‘चिरकुट’ सचमुच एक बेहतर उपन्यास है। इसमें आपको उस तरह का कोई एक निश्चित सत्य या मानक तस्वीर नहीं मिलती है। उसमें कई ऐसी आवाजें भी है जो किसी एक आवाज की माध्यति में नहीं है। उदाहरण के लिए, पश्चिम बंगाल में कम्युनिस्ट शासन के प्रयोग के समग्र विश्लेषण को लेकर उतनी दूर तक जाने की या तो लेखक महत्त्वाकांक्षा नहीं पालता या अगर है भी तो उसमें अपने को अक्षम पाता है और चीजों को बीच में छोड़ देता है। इसी सन्दर्भ में मीडियॉकर को परिभाषित करते हुए उपन्यासकार लिखते हैं - ‘वह पर्वतारोही जो आधे रास्ते तक छोड़ दे’ यानी वह पर्वतारोही जो शिखर तक न पहुँच पाए। इस अर्थ में यह उपन्यास जितने बड़े सवालों को सम्बोधित करने से शुरू होता है, उससे यह लगता है कि इसको बहुत आगे तक जाना चाहिए। उसे 300-400 पृष्ठों का महाकाव्यात्मक उपन्यास बनना चाहिए था लेकिन उपन्यास जैसे एकाएक अपने आपको चुका देता है। लेखक वह धैर्य नहीं रख पाता कि वह और आगे तक ले जाए।

       आलोचना की जटिलता को लेकर अक्सर जो सवाल किये जाते हैं, उस पर मुझे ‘दी हिन्दु’ में छपा होमी. के. भाभा का एक साक्षात्कार याद आता है। साक्षात्कारकर्ता के यह पूछने पर कि ‘आप समझ में नहीं आते, बहुत मुश्किल हैं’ इस पर भाभा ने बहुत ही सटीक जवाब देते हुए कहा – ‘किसी विज्ञान के आदमी को आज तक यह नहीं कहा गया कि उसकी कही हुई बात समझ में नहीं आती। लोग मानकर चलते है कि वह समझ में नहीं आएगी लेकिन समाजविज्ञान और साहित्यिक आलोचना से जुड़े हुए आदमी के बारे में ये हमेशा कहा जाता है।’ साहित्यालोचना की हमारी 2500 साल लम्बी परम्परा में विकसित हुए वे पारिभाषिक शब्द जिन्होंने अपना एक अर्थ ग्रहण किया है और जिनकी अभिव्यक्ति बहुत ही सान्द्र किस्म की है। ऐसे शब्दों को मैं क्यों अपनी आलाचना में नहीं लाऊँ। मैं यह क्यों मानकर चलूँ कि मेरी आलोचना बिलकुल सड़क का भाषण ही होगी। आलोचना के सन्दर्भ में इस बात को ध्यान में रखना चाहिए। ‘चिरकुट’ उपन्यास का ढाँचा के लिए जो पारिभाषिक शब्दावली है, वह है - ‘थर्ड पर्सन रिस्ट्रक्टेड वैण्टेज पोइण्ट सीन’ यानी यह सर्वज्ञ-सर्वव्यापक वाचक की दृष्टि से लिखा वैसा उपन्यास नहीं है जिसमें वाचक के सामने सारी चीजें स्पष्ट है और वो हर जगह उपस्थित है और किसी के भी मन में झाँक सकता है या एक ही समय में दो अलग-अलग स्पेस में होनी वाली घटनाओं के बारे में बता सकता है। यह उपन्यास आत्मकथात्मक उपन्यास उस शर्त में नहीं है कि उसका नैरेटर ‘मैं’ जैसे सर्वनाम के साथ उपन्यास में शामिल है। इसलिए आप मानकर चलते है कि ‘मैं’ की जानकारी की जितनी सीमाएँ है, एक पाठक के रूप में वह हमारी भी सीमाएँ बन जाती है। तृतीय पुरूष शैली में चल रहे इस उपन्यास का नायक दिलीप है। लेकिन तृतीय पुरूष का वैण्टेज पोइण्ट उसी तरह से रिस्ट्रक्टेड है, जैसे प्रथम पुरूष का वैण्टेज पोइण्ट रिस्ट्रक्टेड होता है। इसलिए पूरे उपन्यास में चीजों के बारे में जितना दिलीप जानता है, चीजें उसी हद हमें पता चलती हैं। उपन्यास के स्त्री पात्रों या अन्य पात्रों के बारें में हमें ज्यादा जानकारी इसलिए भी नहीं हो पाती क्योंकि यह उपन्यास रिस्ट्रक्टेड वैण्टेज पोइण्ट से लिखा उपन्यास है। लेखक इस वैण्टेज वोइण्ट का अपना चुनाव इसलिए भी करता है कि वह कई तरह से सम्बन्धों की जटिलताओं से बचना चाहता है। जिस स्त्री के साथ उसका शारीरिक सम्बन्ध है, उस स्त्री के मनोरोग में उतरने से वह बचना चाहता है, इसलिए उसने रिस्ट्रक्टेड वैण्टेज पोइण्ट चुना। जिस हद तक उसकी उस स्त्री से बात होगी, उपन्यास में भी उसी हद तक का वर्णन मिलता है। शायद इसीलिए उपन्यासकार को भूमिका लिखकर एक तरह की मौर्चाबन्दी करनी पड़ी कि ये एक ऐसे व्यक्ति का उपन्यास है जो मुझे पुस्तकालय में मिला था और उसने मुझे यह उपन्यास दिया। पूरा उपन्यास मैं शैली में था और मैंने इसके ‘मैं’ को बदलकर दिलीप बनाया। इसका निर्वाह उपन्यास में बहुत अच्छी तरह से किया गया है। निर्वाह ऐसे किया गया है कि आप पाएँगे कि थर्ड पर्सन के रूप में दिलीप की चर्चा चलते-चलते अचानक बीच में कहीं ‘मैं’ आ जाता है। ताकि आप यह समझें कि ये उपन्यास सचमुच किसी और का था जिसे बदला गया है और इसे बदलने में कुछ चीजें छूट गयी हैं। उपन्यासकार की ये हिम्मत वाली युक्ति हजारीप्रसाद द्विवेदी के उपन्यासों ‘अनामदास का पोथा’ और ‘बाणभट्ट की आत्मकथा’ में खूब मिलती है। ‘बाणभट्ट की आत्मकथा’ में कुछ हद तक आलोचक के लिए सूत्र छोड़ने और ऐसी पेशबन्दी करने का काम भी किया गया है जिसमें आलोचक की ओर से जो आलोचना आ सकती है उसका जवाब दे सके। यही तरीका ‘चिककुट’ में भी मिलता है। औपन्यासिक फॉर्म की दृष्टि से इसमें इस्तेमाल किया गया है जिसमें कथा के भीतर कथा और उसके भीतर भी कथा चलती रहती है। भूमिका खुद उपन्यास का ही एक भाग है जिसका इस्तेमाल विश्वसनीयता लाने के लिए किया गया है।

       उपन्यास के गुरु प्रसंग में एक सवाल आता है कि सारे हिन्दुस्तानी सरकारी नौकरी के पीछे क्यों भागते है? अगर दिलीप सरकारी नौकरी के पीछे नहीं भागा तो इसका क्या कारण है? दिलीप वैसा बना तो क्यों बना? उसकी तलाश में दिलीप खुद अपनी वह डायरी खोजता है जिसमें उसके बचपन की चीजें लिखी हुई है। उनको भी दिलीप एक उपन्यास की शक्ल देता है। दिलीपत्वाभिमांशु नाम से जो तीसरा अध्याय शुरू होता है, दरअसल में वह उपन्यास है और फिर वह उपन्यास दिलीप की युवावस्था पर आकर खत्म होता है और तब आप लौटकर वापस उसी उपन्यास पर आते है जिसे आप पढ रहे हैं। कथा के भीतर कथा वाली इस शैली से लेखक के पास देशकाल के मेनुपुलेशन का एक औजार (मेनुपुलेशन ऑफ स्पेस एण्ड टाइम) तो हाथ आता ही है, वह 30 साल में बिखरे समय को 160 पेज में घेरने में भी सफल रहता है। छोटे से कलेवर में इतने ज्यादा प्रसंगों से गुजरते हुए इस बात की जरूरत महसूस होती है कि थोड़ा और ठहरा जाता। जो शैली ज्यादातर सूचनात्मक हो गयी हैं, वे सूचनात्मक न होकर नाटकीय होती तो शायद हम उसे ज्यादा अच्छे से पहचान पाते और उस पूरे हालात को महसूस कर पाना हमारे लिए सम्भव होता। पहली बात तो यह कि हिन्दुस्तान में ऐसे साधुओं की एक परम्परा रही है, सधुक्कड़ी के अलावा जिनका एक सामाजिक सरोकार भी था। स्वामी सहजानन्द सरस्वती इसके बड़े और स्थापित उदाहरण हैं। हिन्दुस्तान में ऐसे साधुओं की एक पूरी रवायत है जो खुद को सामाजिक परिवर्तनकारी शक्ति के रूप में देखते है। उनका साधुपन जीवन से संन्यास नहीं बल्कि जीवन को बेहतर बनाने के लिए धारण की हुई एक मुद्रा है। उसे ढूँढने की एक कोशिश उपन्यास की शुरूआत में दिखाई पड़ती है। दूसरी बात यह कि दिलीप जैसा बना, वैसा क्यों बना? वह एक आम भारतीय की तरह सरकारी नौकरी के पीछे क्यों नहीं भागा? इस सन्दर्भ में उपन्यास काफी आगे तक जाता है लेकिन पहले सवाल को वो बीच में डम्प कर देता है। पहला सवाल इतना महत्त्वपूर्ण है कि लेखक भले ही इसके आगे न ले जाए, मैं इस सवाल उठाए जाने पर ही वारी जाता हूँ। इस उपन्यास के शुरू को जो दस-बारह पृष्ठ है, वो इतने प्रॉमिसिंग लगते है, अपने कहने के तरीके में भी, सूचना देने के तरीके से भी और जितने बुनियादी तरीके से वे सवाल उठा रहे हैं, उस सवाल उठाने के अन्दाज में आपको लगता है कि आप एक अद्भुत चीज के साथ मुखामुखम होने जा रहे हैं।

       गोष्ठी के तीसरे वक्ता देवेन्द्र चौबे ने अपने वक्तव्य में कहा कि एक इतिहासकार के पास मनुष्य की अन्तर्यात्रा (चाहे वह आन्तरिक हो या बाह्य) को समझने के लिए उसके पास बहुत से टूल्स होते है। ऐसे में एक इतिहासकार के लिए ‘चिककुट’ जैसा उपन्यास लिखना क्यों जरूरी हो गया? जाहिर सी बात है कि जो बात वे इतिहास में नहीं कह पाते, वह बात में उपन्यास में आसानी कह देते हैं। इस तरह उपन्यास का ढांचा इतिहासकर को अपनी बात कहने का स्पेस देता है। एक पाठक की दृष्टि से हितेन्द्र पटेल के ‘चिरकुट’ उपन्यास मुझे बेहद अच्छा लगा लेकिन एक आलोचक की दृष्टि से यह उपन्यास मुझे अच्छा नहीं लगा। सामान्य पाठक कहानी में किस्सागोई और कथारस चाहते हैं। इस लिहाज से यह रोचक और पठनीय उपन्यास है। एक आलोचक के तौर पर मुझे लगता है कि ‘चिरकुट’ उपन्यास है ही नहीं। उपन्यास का जो ढाँचा होता है, यह उसमें फिट नहीं बैठता। कई बार उपन्यास अपने बने-बनाये साँचों को भी तोड़ता है। अमृतलाल नागर का ‘सेठ बाँकेमल’ उपन्यास के ढाँचे से बाहर की चीज है जिसमें आगरा का पूरा समय, समाज और अर्थव्यवस्था समाहित है। उपन्यास कहीं न कहीं अपने पूरे फॉर्म में अपने समय को प्रतिबिम्बित करता है। मनुष्य कौनसी भाषा बोलता है और उस भाषा में जीवन के कितने पक्ष आते है फिर स्त्री-पुरूष सम्बन्धों को समझना हमेशा से दुष्कर रहा है। इसमें पूरा का पूरा कम्युनिस्ट आन्दोलन और नक्लबाड़ी आन्दोलन गायब है और अगर कहीं आया भी है तो सिर्फ सूचनात्मक रूप में। आजादी के बाद का पूरा सामाजिक और राजनीतिक परिदृश्य इस उपन्यास में नहीं दिखाई पड़ता। एक औपन्यासिक रचना अपने शिल्प के साथ-साथ अपने समय को भी प्रतिबिम्बित करती है, लेकिन इस उपन्यास में ऐसा नहीं हो पाता परन्तु जब हम इसे एक समाजविज्ञानी की दृष्टि से पढते है तो यह महत्त्वपूर्ण हो जाता है। इस तरह इसे पढने के तीन तरीके हो सकते है, पहला पाठक, दूसरा आलोचक और तीसरा समाजविज्ञानी की तरह। आम आदमी प्रत्येक चीज को उसके व्यावहारिक रूप में देखता है जबकि एक आलोचक, समाजशास्त्री या इतिहासकार उसके सैद्धान्तिकीकरण पर अधिक जोर देता है, जो आम आदमी के दर्शन या उसके सोचने की प्रक्रिया से बिल्कुल भिन्न होता है। अगर हम एक आदमी के दर्शन की कल्पना करें तो वह दर्शन कैसा होगा, क्या वह दर्शन ‘चिरकुट दर्शन’ होगा?

       युवा कथाकार हितेन्द्र पटेल ने अपनी बात रखते हुए कहा कि अक्सर मुझसे उपन्यास के नामकरण (चिरकुट) और इसके मुख्य पात्र दिलीप (कौन है?) के बारे में पूछा जाता है। इन दोनों सवालों को जवाब देना मेरे लिए बहुत कठिन है। एक तो कई कारणों से दिलीप मेरा सबसे पसंदीदा नाम है तो दूसरे बलराज साहनी मेरे प्रिय अभिनेता। मैं आज तक यह फैसला नहीं कर पाया कि दिलीप और बलराज में से मुझे कौन अधिक प्रिय है, इसलिए मैंने को जोड़ दिया – दिलीप बलराज। मुझे लगता है कि हिन्दी में वह समय आ गया है कि हम मॉडर्न सैल्फ को परिभाषित करें। इसके लिए सबसे पहली जरूरत आत्मसाक्षात्कार की होती है। वैसे तो हम सब आलोचनात्मक होना चाहते हैं पर अपने आत्म को बचाकर जबकि नयी शुरूआत खुद हम से होती है। दूसरे को एक्सपोज करने से पहले खुद को एक्सपोज करना बहुत जरूरी है। यह समय हिन्दी में मॉडर्न सेफ्फ को एक्सपोज करने का समय है। मैं इस उपन्यास में जाति का प्रश्न भी उठाना चाहता था और वह प्रसंग आया भी है। उपन्यास का नायक जब ओबीसी होने के कारण हॉस्टल में प्रताड़ित होता। यह प्रताड़ना कितनी गहरी और कष्टदायक हो सकती है, इसके संकेत वहाँ दिए गये है। मेरा प्रधान उद्देश्य पाठक तक ये बात पहुँचाना है, उन्हें समझाना है। अक्सर कहा जाता था कि हिन्दी में उपन्यास पढने वाले पाठक नहीं है जबकि मैं देखता हूँ कि हर कोई रानू, प्रेम वाजपेयी और गुलशन नन्दा जैसे लेखकों को खूब मजे से पढ रहे है! जब ये लोग उन उपन्यासों को पढ सकते हैं तो फिर ये लोग वे उपन्यास क्यों नहीं पढ सकते जिसे हमलोग पढाना चाहते हैं! मैं सोचता हूँ कि क्यों न उपन्यास के स्वरूप में कुछ ऐसा बदलाव किय जाए कि लोग उसे पढे। मेरा पहला उपन्यास ‘हारिल’ बहुत पढा गया। लगभग सबने यही कहा कि बहुत मजा आया, एक बैठक में ही पढ गया। सिर्फ इसलिए कि इसमें भाषा को इस तरह से रखा गया कि लोग इसे पढे और वहाँ तक पहुँचे, जहाँ मैं उन्हें पहुँचाना चाह रहा था और लोग वहाँ तक पहुँच भी रहे थे। जब भी कोई लिखता है और ये भाव लेकर लिखता है कि मैं लोगों को गाइड कर रहा हूँ तो वह गलती कर रहा है। सारी गड़बड़ियाँ वहीं से शुरू होती है। हम एक संवाद की स्थिति बनाना चाहते हैं और संवाद की स्थिति तभी बनती है, जब हम यह मानकर चलें कि शुरूआत भले ही हमसे हो रही हो लेकिन हम बहुत सारे लोगों से संवाद करते हुए आगे बढ रहे हैं। मेरी पत्नी रूपा, अक्सर कहती हैं कि स्त्रियों को लेकर तुम इतने क्रिटिकल क्यों हो जाते हो? तुम स्त्रियों को कभी नहीं समझ सकते! जितनी दूर तक ये देख सकते थे, उतनी दूर तक ही ये गये हैं। प्रसिद्ध वैज्ञानिक बर्नार्ड ने कहा है कि मेरी जीवनी लिखने के लिए तीन रंगों का होना बहुत जरूरी है, पहला – लाल, दूसरा – नीला और तीसरा – गुलाबी। लाल रंग मेरी राजनीति को समझने के लिए, नीला मेरी विज्ञान में मेरे योगदान को समझने के लिए और गुलाबी मेरी सेक्सुअलिटी को समझने के लिए। हमारा जीवन इन तीन रंगों के साथ है और अगर कोई इन तीनों के साथ आ रहा है तो आप उसे समझने की कोशिश कीजिए। हमारी राजनीति, हमारी सेकिसुअलिटी और हमारा काम ये तीनों चीजें एक-दूसरे से अन्तर्गुम्फित है और तीनों एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए है। हिन्दी में लोग सेक्सुअलिटी का प्रसंग आते ही बहुत ही सावधान और कोशंस और कोन्सटिकेटिड हो जाते हैं। जिस दौर से हम गुजर रहे हैं, वहाँ इसी जगह सबसे बड़ा परिवर्तन हो रहा है और ये परिवर्तन हमें समाज से अलग नहीं कर रहा है बल्कि वह हमें समाज से जोड़ रहा है।

       जब मैंने उपन्यास की शुरूआत की थी तो यही सोचा था कि मैं इसमें सामाजिक रूप से प्रासंगिक साधुओं पर ही लिखूँ। इतिहास विलियम बिंच (जिन्होंने ऐसे सामाजिक रूप से प्रासंगिक साधुओं पर शोधपरक लिखा) ने लिखा है कि हमारे यहाँ के साधु कमण्डलधारी ही नहीं थे बल्कि वे शस्त्रधारी थे और सामाजिक लड़ाइयाँ वे लड़ा करते थे। जो लोग 1857 के घटनाक्रम से परिचित है, वे लोग इसके बारे में अच्छी तरह जानते है। इसके अलावा और भी बहुत से आन्दोलन थे जिसमें इन्होंने शिरकत की। हमारे देश में आजकल कुकुरमुत्ते की तरह प्रकट होते बाबालोग उत्तर-उपनिवेशवादी विकास की देन है। मेरे कई मित्र हैरान है कि मैं इतिहास लिखते-पढते अचानक उपन्यास क्यों लिखने लगा! मैं पूरे यकीन के साथ कह रहा हूँ उपन्यास लिखना मेरे इतिहास के काम को ही आगे बढाना है। मैंने साम्प्रदायिकता पर लम्बे समय तक काम किया और काम अँग्रेजी में छपा और उसकी काफी तारीफ भी हुई। उसे बहुत ही गम्भीर पाठकों ने पढा। मैं जिनके साथ जुड़ना चाहता था, उन्होंने उसे नहीं पढा। लेकिन अब, जब मैं उपन्यास लिखता हूँ तो एक बड़ा पाठक वर्ग अनायास ही मुझसे जुड़ जाता है। इससे हम यह सोचने पर मजबूर हुए कि हमें किस भाषा में लिखें? कैसे अपनी बात अधिकधिक लोगों तक पहुँचाएँ? अपनी भाषा में समाजविज्ञान एक सम्भावना नहीं हकीकत है और इसी में उसका भविष्य है। हिन्दी में भी समाजविज्ञान की कोशिशें होनी चाहिए। जब आप ऐसा माहौल पैदा करेंगे, जहाँ आपके लिए अपनी बात को कहना और संवाद स्थापित करना ज्यादा महत्त्वपूर्ण होगा, तब भाषा की अपनी सम्भावनाएँ पैदा होगी। बंगाली मेधा के बीच रहकर मैंने यह सीखा है कि वे लोग बाँग्ला में जो लिख रहे है और उन्हें जिस तरह से लिया जा रहा है, हमें उनसे सबक लेना चाहिए। अगर हिन्दी में समाजविज्ञान सम्भव नहीं हो पा रहा है तो इसकी वजह यह नहीं है कि पाठक उनके हिन्दी में लिखे को पढते नहीं है बल्कि दोष लेखकों का भी है। हिन्दी में जो समाजविज्ञान लिखा जा रहा है उसमें हिन्दी के अनुरूप जो भाषा बननी चाहिए थी, वह नहीं बन रही हैं। जब आप हिन्दी में इतिहास या अन्य समाजविज्ञान लिख रहे होते है तो ठीक वैसे ही नहीं लिखा जाता जैसा कि अँग्रेजी में लिखा जाता है। भाषा के इस पहलू की ओर अत्यधिक ध्यान देने की बहुत अधिक जरूरत है।


पुखराज जाँगिड़
म.सं.- 001, ब्लॉक – एल, पॉकेट – सी, डी.डी.ए. एल.आई.जी. फलैट,
आयुष अस्पताल के पास,
मोलड़बन्ध (गौतमपुरी), नयी दिल्ली – 110076,
ईमेल – pukhraj.jnu@gmail.com

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