आज मैं बिलख-बिलख कर क्यों रोती हूं - मैत्रेयी पुष्पा | Maitreyi Pushpa on #RajendraYadav

मैंने अपना मोबाइल उठाया है, राजेंद्र जी और फोनबुक में आपके नाम तक पहुंची हूं। वह चमक रहा है, लग रहा है अभी उस नंबर से घंटी बजेगी और आप बोल पड़ेंगे। झूठ नहीं बोलूंगी आपसे, फोन उठाया था आपका नंबर डिलीट करने के लिए लेकिन यह क्या, ऐसा लग रहा है कि यह नंबर ही मुझे चुनौती दे रहा है, मानो कह रहा हो, ‘मिटा सकोगी?’ हमेशा उस तरफ से आने वाली आपकी आवाज का अहसास अभी तक गया नहीं है, राजेंद्र जी। ऐसा लग रहा है कि अभी दूसरी ओर से आपकी जिंदादिल आवाज गूंजेगी- ‘हां कहो, मैत्रेयी, क्या-क्या कर डाला’।

       मुझे याद है, यह क्या-क्या कर डालने की चुनौती आप मेरे सामने तब से रखते आए जब से आपकी दृष्टि मेरे ग्रामीण लेखकीय विषयों पर पड़ी। और यही चुनौती मेरे अब तक के लेखकीय जीवन का आधार रही है। ऐसा क्या खोज लिया था आपने मेरे लेखन में... या आप ऐसे ही बीहड़ गंवई स्त्री लेखन की खोज में थे?

आज मैं बिलख-बिलख कर क्यों रोती हूं - मैत्रेयी पुष्पा | Maitreyi Pushpa on Rajendra Yadav        प हमेशा विस्मित करते थे, राजेंद्र जी। धुन के कितने पक्के थे आप। कितना कुछ छोड़ दिया अपनी धुन में, कितना कुछ गंवा दिया। अपने रचनात्मक लेखन को विराम देकर आपने हंस पर ध्यान केंद्रित करना शुरू किया। आपका एक नया ही स्वरूप लोगों के सामने आया। जिस समय आपके समकालीन पुरस्कृत होते रहे, साहित्यिक पुरस्कारों से नवाजे जाते रहे, आप खोजते रहे उन आवाजों को, धूल झाड़ते रहे उन मूरतों की जिन पर दशकों क्या सदियों से किसी की नजर नहीं गई थी। और फिर दुनिया ने देखा हां, इस साहित्यिक जगत ने एक बार फिर विस्मय से देखा और कहा कि वह देखो राजेंद्र किन लोगों से लिखवा रहे हैं, उनसे जिन्हें कलम पकड़ने की तमीज नहीं। स्त्रियों, दलितों, अल्पसंख्यकों को वह लेखक बना रहे हैं। लेखन के सौंदर्यशास्त्रियों ने इसे साहित्य को कुरूप करने की साजिश बता दिया। लेकिन आपको न किसी की सुननी थी न आपने सुनी। बस अपनी धुन में लगे रहे।

       र फिर दुनिया ने देखा कि ओह! इन अनगढ़ आवाजों में वो दर्द, वो सच्चाई दबी हुई थी, जिसे राजेंद्र यादव के अलावा भला और कौन सामने ला पाता। आपके इस योगदान को भला कौन नकार सकेगा?

       ज मुझे आपका हंस में लिखा वह संपादकीय याद आ रहा है जिसमें आपने कहा था, कि मैत्रेयी ड्रॉइंग रूम के लेखन को बाहर निकाल कर खेत-खलियानों में ले आयी। मैत्रेयी फणीश्वर नाथ रेणु और रांगेय राघव के बाद वह तीसरा नाम है जो धूमकेतु कि तरह साहित्य के आकाश पर छा गया। और मैं समझ जाती की रेणु और रांगेय राघव के साथ जोड़कर आप मेरे लिए कौन-से आदर्श तय कर रहे हैं। इन नामों से जोड़कर आप मुझे उन भयानक दृश्यों से भरी दुनिया में बार बार प्रवेश करने के लिए मजबूर कर देते जिनकी कल्पना शहरी मध्य वर्ग की स्त्रियां तो कम से कम नहीं कर सकतीं।

       ब ठहरकर सोचती हूं कि क्या यह सब कुछ मैं आपके सामने खुद को प्रमाणित करने के लिए कर रही थी? हां उस समय तो यही स्थिति थी मेरी, जैसे किसी छोटे बच्चे की अपने अध्यापक के सामने होती है, बेहतर से बेहतर करके दिखाना कि उसके टीचर की बात झूठी न पड़े।

       प कहते थे, ‘हिंदी की लेखिकाएं आत्मकथा नहीं लिखतीं। लिखती हैं तो परिवार की पसंद पर खरी उतरने वाली लिखती हैं, पति परायणा स्त्रियों की कथाएं तो आदिकाल से चली आ रही हैं जिनमें दुख दर्द झेलना और चुप रहना सद्गुण की कसौटी है। अब मैं आपका इशारा ही समझने लगी थी और अपनी समझ से भी लगा कि वह वक्त आ गया है जब मुझे अपने निजी जीवन का खुलासा कर देना चाहिए कि क्यों मैं चाक और अल्मा कबूतरी लिखती हूं? क्यों मैंने इदन्नमम लिखा?

       राजेंद्र जी, लेखन की दुनिया में आप मेरे साथ थे और जो मैंने आपकी छवि देखी या अनुकूल स्त्री होने के नाते बनाई, उसी का रूप ‘गुड़िया भीतर गुड़िया’ में है। मैं यह मानती हूं कि कोई पुरुष बलिष्ठ होने के कारण बलात्कार तो कर सकता है संबंध नहीं बना सकता क्योंकि संबंध स्त्री की रजामंदी से बनता है। माना कि पुरुष प्रलोभन देकर स्त्री को राजी करता है तो मैं प्रलोभन को औरत का लालच जैसा दुर्गुण समझती हूं। हमारा हक यह भी तो है कि हम उस वस्तु का मोह छोड़ दें जिसकी कीमत हमारी अस्मत है और हम इसे लुटाना नहीं चाहते। मेहनत का रास्ता मुश्किलों भरा होता है, तो साहित्य का रास्ता तपस्या का और इंतजार का भी। राजेंद्र यादव ने शुरुआत में लगातार मेरी पांच कहानियां लौटा दीं कहिए कि परिश्रम के साथ प्रतिभा का उपयोग करने के लिए ललकारा और मैंने उनकी चुनौती सहर्ष स्वीकार की। कोई शॉर्टकट नहीं, कोई रियायत नहीं... उनका कहना मेरे लिए सिर्फ इतना था- ‘मैत्रेयी, मैं साहित्य के मामले में बहुत कठोर टीचर हूं।’

       पने जीवन में मैं जब-जब दुखी हुई मैंने राजेंद्र जी को पुकारा। मेरे एक वक्तव्य को लेकर, उसे गलत भाषा का रूप देकर लोगों ने उनके व मेरे वे संबंध बताने चाहे, जिनकी मैंने कभी कल्पना नहीं की थी। इस तरह के पर्चे पूरे देश के हिंदी समाज में पहुंचाए गए। तब मैं बहुत विचलित हो गई थी।


मैंने राजेंद्र जी से पूछा था - आपके जीवन में बहुत सी स्त्रियां आई हैं , मेरा और आपका संबंध कैसा है? वे थोड़ा हंसे और कहा - मैत्रेयी हमारा संबंध पूछ रही है! थोड़ी देर बाद बोले, ‘सोचने पर यही लगा कि मेरा और तुम्हारा संबंध द्रौपदी और कृष्ण जैसा है। है न?’ - मैंने मन ही मन कहा हां, राजेंद्र जी, हां ऐसा ही है!

       राजेंद्र जी ने हंस का संपादन तो अपने उत्तरकाल में ही संभाला उसके पहले तो वे रचनात्मक लेखन ही करते थे। लेकिन मुझे उनके रचनात्मक लेखन की तुलना में उनका वैचारिक लेखन ही भाता है, प्रेरित करता है। मुझे हमेशा इस बात का खेद रहेगा कि राजेंद्र जी जिस वैचारिक धरातल पर खड़े होकर लिखते थे, उस धरातल पर जाकर उसे समझने वाले लोग कम ही हुए। नतीजा, उनके लिखे पर विवाद खड़े किए गए। अनावश्यक विवाद। बार-बार यह कहा गया कि राजेंद्र जी ने स्त्री विमर्श के नाम पर देह विमर्श छेड़ा। काश ऐसा कहने वालों ने उनकी बातों को ठीक से समझा होता। उन्होंने हमेशा यही कहा कि स्त्री का शरीर ही उसका बंधन है। उसका मन तो आजाद है, उसके सहारे उन्मुक्त पंछी सी वह कहीं भी जा सकती है।

       क्या-क्या याद करूं... स्मृतियों का भरा पूरा खजाना है, ऐसे कम वक्त में दर्ज हो पाएगा क्या? मेरे बाबा (पितामह) गठिया के रोगी थे, वे लाठी के सहारे ऐसे ही चलते थे, जैसे राजेंद्र जी बैसाखी के साथ चलते थे धीरे-धीरे। मैंने कहा था, ‘राजेंद्र जी, आपको देखकर मुझे ऐसा लगता है जैसे मैं अपने बाबा के साथ चल रही हूं, बार-बार आगे निकल जाती हूं, फिर रुक जाती हूं बचपन में। राजेंद्र यादव का उत्तर था, ‘तेरा सत्यानाश डॉक्टरनी, तुझे मैं अपना बाबा लगता हूं !’ वे मुझे डॉक्टरनी भी कहते थे - डॉक्टर की पत्नी डॉक्टरनी! 

       बाबा नहीं रहे थे तो अपने बचपन में मैं बच्चे की तरह बहुत रोई थी मगर मैं अब तो बच्ची नहीं हूं, फिर आज मैं बिलख-बिलख कर क्यों रोती हूं... आपकी चुनौतियों के लिए, आपके साहित्यिक अनुशासन के लिए या किसी आप जैसे अपने के लिए...

       फिर भी मैं इस दुख की घड़ी में संकल्प लेती हूं कि आपकी हिदायतें मेरे साथ रहेंगी कि अच्छे से अच्छा रच सकूं। मेरी श्रद्धांजलि यही है।

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2 comments :

  1. सच में एक युगपुरुष थे वे ! श्रद्धांजलि !

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  2. राजेन्द्र यादव ने मेरी चार कहानियाँ हंस में छापीं...वे कहा करते कि ऐसी बात लिखें जिसे आप ही लिख पायें...और मेरा परिवेश, मेरे लोग धडाधड कहानियों में बदलते गए...हंस और राजेन्द्र यादव को गरियाने वालों, अगर हंस न होती, राजेन्द्र न होते तो बहुत सा लेखन हिंदी में न आ पाता...हम कथाकार ऋणी हैं राजेन्द्र यादव के...

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