इस्माइल चुनारा और नाटक लैला-मजनूं से जुड़ी अजित राय की यादें | Ajit Rai on Ismail Choonara in Drishyantar December 2013

काश! 'शकुंतला' का मंचन हो और हम इस्माइल चुनारा के साथ उसे देखें

अजित राय

इस्माइल चुनारा से पहली बार मैं नेहरू सेंटर लंदन में दिव्या माथुर के ऑफिस में मिला था । यह सन् 2007 की गर्मियों की बात है । वे अपने नए नाटक ‘लैला मजनूं’ को लेकर काफी उत्साहित थे । सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन, न्यूयॉर्क से लौटता हुआ लंदन में अपने बड़े भाई तेजेंद्र शर्मा के यहां ठहरा हुआ था । ‘हंस’ के जून 2007 अंक में दिव्या माथुर की कहानी ‘बचाव’ छपी थी । ‘हंस’ की प्रति देने मैं नेहरू सेंटर गया था । इत्तेफाकन वहां इस्माइल चुनारा से मुलाकात हो गई । मैं उनके बारे में असगर वजाहत से बहुत कुछ सुन चुका था । यह वहीं समय था जब मेरे जीवन में ‘विदेश’ का प्रवेश हुआ था । कई चीजें पहली–पहली बार घटित हो रही थी । आज भी मुझे अच्छी तरह याद है कि वे मोबाइल फोन नहीं रखते थे-(आज भी नहीं रखते) उन्होंने अपने घर आने का न्योता दिया । (दरअसल असगर भाई मुझे बता चुके थे कि उनके घर के पास लंदन की मशहूर ‘फिश एंड चिप्स’ की दुकान है) हमने तय किया कि ‘लैला मजनूं’ को सुनेंगे । वह मेरी पहली लंदन यात्रा थी और रास्तों का मुझे बिल्कुल ज्ञान न था । दूसरा संकट यह कि चुनारा जी मोबाइल फोन नहीं रखते थे । सुबह–सुबह लैंडलाइन फोन पर दिन भर की मुलाकातों की जगहें और समय तय हो जाते थे । एक बार जो तय हो गया सो हो गया । वे मुझे लेने के लिए बी.बी.सी. मुख्यालय बुश हाउस आ जाएंगे जहां मैं राजेश जोशी से मिलने अक्सर जाया करता था । वहां से हमने डबल डेकर बस ली और ऊपरी मंजिल पर सबसे आगे की सीट पर बैठ गए । बस चलती जा रही थी, चलती जा रही थी । हम बातों में मशगूल थे । उन्होंने ब्रिटेन में बसे एशियाई लोगों के बारे में कई दिल दहला देने वाली सूचनाएं दी । भारत–पाकिस्तान के लोग बेहतर जीवन और आजादी की उम्मीद में यहां आते हैं, लेकिन अपने–अपने समाज की कट्टरता, सामंतवाद और स्त्री–विरोधी मानसिकता साथ लिए चलते हैं । मुझे कई फिल्में याद आर्इं । ‘ईस्ट इज इस्ट’, ‘प्रोवोक्ड’, ‘माइ सन इज फैनेटिक’ आदि–आदि । पता चला कि एक बार साउथ हॉल में भारतीय पंजाबी और पाकिस्तानी मुस्लिम समुदाय के युवकों के बीच मार–पीट होते–होते बची । पंजाबी युवकों का कहना था कि जब पाकिस्तानी लोग अपने परिवार की लड़कियों को घर से बाहर नहीं निकलने देते, दूसरे समुदाय के लड़कों से दोस्ती नहीं करने देते तो उन्हें भी कोई हक नहीं कि वे भारतीय मूल की हिंदू–पंजाबी लड़कियों से दोस्ती करें । ‘नैतिकता और शुचिता’ एक पक्षीय नहीं हो सकती है । उसी समय एक रिपोर्ट आई थी कि पाकिस्तानी मूल के ब्रिटिश नागरिकों के बच्चों के लिए लोकल काउंसिल की आर्थिक मदद से चलने वाले स्कूलों से अचानक लड़कियां गायब होने लगी । पता चला कि उनके अभिभावक उन्हें जबरन पाकिस्तान ले जाकर कम उम्र में ही उनकी शादियां कर देते हैं । लेकिन यह बात पाकिस्तान मूल के ब्रिटिश युवकों पर नहीं लागू होती थी । सच या झूठ, चर्चा तो यह भी थी कि बड़े पैमाने पर ‘आनर कीलिंग’ हो रही है । तेजेंद्र शर्मा ने इसी विषय पर कहानी भी लिखी है ‘तरकीब’ और पिछले साल लंदन के अवतार भोगल ने ‘ऑनर कीलिंग’ नाम से ही एक फिल्म बनाई थी । भावना तलवार की फिल्म ‘धर्म’ में एक हिंदू युवती के अंग्रेज पति को दंगाई मार देते हैं । हम शोएब मंसूर की पाकिस्तानी फिल्म ‘खुदा के लिए’ को भी याद करें जिसमें पाकिस्तानी मूल की एक ब्रिटिश युवती को उसके परिवार वाले धोखे से पाकिस्तान लाकर जबरन शादी कर देते हैं जबकि वह एक ब्रिटिश युवक से प्यार करती है । उसे सुधारने के लिए उसका पति जबरन उसे गर्भवती बनाता है । ब्रिटेन जैसे मानवाधिकार संपन्न राष्ट्र में भी सोमालिया से विस्थापित कुछ समुदायों के बारे में खबरें छपी थी कि वे योनिशुचिता के लिए अपनी बच्चियों के गुप्तांगों की सिलाई कर देते हैं । स्त्रीत्व का इससे बड़ा अपमान और क्या हो सकता है । ऐसे समय में चुनारा स्त्रियों की निगाह से ‘लैला मजनूं’ लिख रहे थे । दरअसल इस पूरे अफसाने के केंद्र में ‘मजनूं’ (कैस) नहीं ‘लैला’ है ।

       हमारा बस स्टॉप आ गया था । उतरते ही चुनारा बोले-‘‘अजित जी, अच्छा मौसम है, यहां से पैदल चलते हैं । आप कहें तो दूसरी बस भी ले सकते हैं ।’’ मैंने पैदल चलने का उनका सुझाव मान लिया । ‘फिश और चिप्स’ और कुछ फल खरीदकर पैदल चल पड़े । उनके घर पहुंचते ही मैं दंग रह गया । उनकी पत्नी पोलैंड की थीं और हिटलर के नाजी नरसंहारों के दौर में जैसे–तैसे भागकर ब्रिटेन में शरण लिया था । (उनकी कहानी फिर कभी) पता चला कि एक बेटी ओपेरा सिंगर है । घर के पिछवाड़े में छोटा सा ग्लास हाउस और उसके बाद खूबसूरत बागीचा । इस उम्र में भी इस बूढ़े दंपति ने घर और बागीचे का इतना सुंदर रख–रखाव किया है कि दिल खुश हो जाता है । मुझे ग्लास हाउस में बैठाकर वे पत्नी के साथ रसोई में चले गए । उन्हें अपना सारा काम खुद करते देखना मेरे लिए हैरतअंगेज अनुभव था । उन्होंने खुद खाना लगाया । खाने के बाद ‘लैला मजनूं’ पर बातें शुरू हुई । उनका मानना था कि यह अफसाना प्रेम और रोमांस से अधिक स्त्रियों की यातना और संघर्ष के कारण अविस्मरणीय है । लेकिन नौटंकी या पारसी शैली में नाच–गाने के शोर में आलेख की मूल आत्मा धुंधला जाती है । उन्होंने कहा-‘‘मैंने इसीलिए इसे ‘ग्रीक ट्रेजेडी’ शैली में लिखने का निश्चय किया । इसे सूफी परंपरा से जोड़ा जो इस्लाम की तुलना में थोड़ा उदार है । मुझे भरोसा है कि राम गोपाल बजाज इसकी मूल भावना को समझेंगे ।’’

        कुछ संयोग ऐसा हुआ कि जब गुवाहाटी के कलाक्षेत्र में 10 अप्रैल 2008 को इस नाटक का प्रीमियर हुआ तो राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की निर्देशक अनुराधा कपूर ने मुझे विशेषज्ञ के रूप में नाटक देखने के लिए कलाक्षेत्र भेजा । उस अहिंदी भाषी इलाके में दर्शकों की इतनी भीड़ जुटी कि सभागार के बाहर विडियो स्क्रीन लगानी पड़ी । जितना अच्छा इस नाटक का आलेख है उससे कहीं अधिक उम्दा इसकी मंच प्रस्तुति थी । राम गोपाल बजाज ने कोई कसर नहीं छोड़ी । उस वर्ष ‘महिंद्रा एक्सेलेंस इन थियेटर अवार्ड्स’ (अप्रैल 2009) में सबसे अधिक पुरस्कार ‘लैला मजनूं’ को मिले । होटल ताजमान सिंह के लॉन में अवार्ड्स नाइट में मुझे संजय राय के अलावा बज्जूभाई ने खासतौर पर आमंत्रित किया था । लैला की भूमिका के लिए लक्ष्मी रावत को सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री, मंजनू के पिता के रूप में बनवारी तनेजा को सर्वश्रेष्ठ सह अभिनेता, वस्त्रसज्जा के लिए अंबा सान्याल, संगीत के लिए राजेश सिंह और सर्वश्रेष्ठ मौलिक नाट्यालेख के लिए इस्माइल चुनारा को पुरस्कृत किया गया । चुनारा बीमार थे, इसलिए पुरस्कार लेने दिल्ली नहीं आ सके । इससे पहले जब राम गोपाल बजाज ने राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के अभिमंच में जुलाई 2008 में ‘लैला मजनूं’ के दो प्रदर्शन किए थे तो इस्माइल चुनारा खासतौर से अपना नाटक देखने आए थे । नाटक देखने के बाद उनकी आंखों में खुशी के आंसू थे । वे भावुकता में बोल नहीं पा रहे थे । असगर वजाहत ने जामिया मिलिया इस्लामिया के गेस्ट हाउस में उनके रहने का इंतजाम किया था । वहां हर शाम हमारी बैठकें होती थी । चुनारा को मलाल था कि राम गोपाल बजाज और उनकी मंडली ने उन्हें उतना महत्व नहीं दिया जितना उन्हें मिलना चाहिए था । कोई प्रेस कांफ्रेस भी नहीं की गई । नाटक के एक–दो कलाकारों ने बताया कि प्रोडक्शन के लिए चुनारा ने अपनी वृद्धावस्था पेंशन से पैसे दिए थे । वे अपने पैसे से लंदन से दिल्ली आए थे । उन्हें बताया गया था कि मैं यात्राएं खूब करता हूं और भारत में अक्सर बिजली चली जाती है । वे मेरे लिए इलेक्ट्रॉनिक टार्च लाए थे जो आज भी मेरी हर यात्रा में मेरे साथ होती है ।

        मैं आज भी ‘लैला मजनूं’ का वह दृश्य नहीं भूल पाता जो नाटक का मर्म है । किसी अज्ञात कारण से लैला के पति की मौत हो जाती है । लैला को बताया जाता है कि इस्लामी कानून के मुताबिक अब वह आजाद है । अब वह अपनी मर्जी से अपना पति चुन सकती है । वह पागलों की तरह मजनूं को खोजने निकलती है । उधर मजनूं लैला के इश्क में पागल होकर भटक रहा है । उसे दीन–दुनिया का कोई इल्म नहीं । उसका प्रेम सांसारिक भौतिक सीमाओं से परे आध्यात्मिकता में बदल चुका है । उसने लैला की छवि को ही असली मान लिया है । लैला भागती हुई उसके पास जाती है और कहती है-‘‘कैस, मैं आ गई ।’’ वह क्षणभर को उसे देखता है और अपनी धुन में आगे बढ़ जाता है । लैला पीछे से उसे रोकती है । वह अजनबी आवाज में कहता है-‘‘तुम कौन हो ? क्या चाहती हो ?’’ लैला लगभग रोते हुए चिल्लाती है-‘‘मैं तुम्हारी लैला हूं, देखो, मैं तुम्हारे पास आ गई हूं ।’’ वह टका–सा जवाब देता है-‘‘तुम मेरी लैला नहीं हो, मेरी लैला तो मेरी रूह में समाई हुई है ।’’ वह आगे बढ़ जाता है । लैला अवसाद से पीली पड़ जाती है । घुटनों के बल बैठकर दोनों बाहें आसमान की ओर उठा खुदा से पूछती है-‘‘ऐ खुदा, मैंने नियम से रोजे रखे, कुरान का पाठ किया, फिर भी मेरी किस्मत में जुदाई क्यों ?’’ अब इस टिप्पणी की जरूरत नहीं कि धर्म और ईश्वर भी औरत के पक्ष में नहीं हैं । यह प्रेमकथा आधुनिक संदर्भ में प्रेम, सत्ता, राजनीति और स्त्री मुक्ति के प्रश्नों को नए सिरे से जांच–पड़ताल की मांग करती है ।
 असगर वजाहत के चर्चित नाटक ‘जिस लाहौर नइ बेख्यां, वो जन्माई नई’ के बीस साल पूरे होने पर सन् 2009 में दुनिया भर में जश्न मनाया गया । उन्होंने मुझे इसका अंतर्राष्ट्रीय संयोजक बनवाया था । मई–जून में जब मैं यूरोप में गर्मियां बिताकर मैं भारत लौटा तो उन्होंने बताया कि अगस्त–सितंबर में हमें फिर यूरोप जाना है । राम गोपाल बजाज ने मुझसे कहा कि मैं लंदन जा रहा हूं तो चुनारा के घर जाकर महिंद्रा अवार्ड उन्हें भेंट करूं । वह एक अविस्मरणीय और गरिमामय शाम थी । चुनारा ने अपने मित्रों को रात्रिभोज पर घर बुलाया । मैं और असगर वजाहत पहुंचे । मुझसे ‘लैला मजनूं’ के आलेख और प्रस्तुति पर बोलने के लिए कहा गया । वहां आमंत्रित लोगों में ईरानी और इतालवी (इटली) मूल के भी लोग थे । चुनारा ने कहा कि वे मेरे हाथों पुरस्कार लेंगे । यह उनकी विनम्रता की पराकाष्ठा थी ।

        इस्माइल चुनारा से मेरी आखिरी मुलाकात 2011 की गर्मियों में हुई थी जब उन्होंने अपना नया नाटक ‘शकुंतला’ सुनाया था । उनका मानना था कि आज यदि शकुंतला होती और राजा दुष्यंत वहीं सब करते जो कालिदास ने लिखा है तो शकुंतला के पिता का व्यवहार वहीं नहीं होगा जो उनके पिता कण्व ऋषि ने किया था । इस नाटक में और भी कई नई स्थापनाएं हैं लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि पूरा नाटक शकुंतला की दृष्टि से लिखा गया है । चुनारा इस बात को लेकर आश्वस्त नहीं थे कि उनका यह नाटक मंचित हो पाएगा । उन्हें यह भी डर था कि कहीं हिंदू समुदाय के कुछ लोग आपत्ति न कर बैठें । अब वे 82 साल के हैं । दो साल पहले ही उन्होंने अपने जवान बेटे को खोया है । दिव्या माथुर ने जब फोन पर इसकी सूचना दी थी तो मैं अंदर से दहल गया था । मुझे आज भी लंदन की सुदूर इलाके स्ट्रेथम के 214 लेहम कोर्ट रोड के उनके घर की कई शामें याद हैं । मैं कामना करता हूं कि उनके जीते जी ‘शकुंतला’ का भारत में मंचन हो और वे उस प्रस्तुति को हमारे साथ बैठ कर देख सकें । ‘दृश्यांतर’ में हम उनके इस कालजयी नाटक को छापकर गौरव और खुशी का अनुभव साझा कर रहे हैं । स्त्री–पुरुष के संबंधों के बदलते भारतीय समीकरण के दौर में ‘लैला मजनू’ नाटक हमें सोचने की नई दृष्टि देता है ।

'दृश्यांतर' के दिसंबर 2013 में 'अजित राय' की सम्पादकीय से

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