शुक्रवार, दिसंबर 27, 2013

... जब कि ज़रूरत इसी बात की है - अशोक गुप्ता | Ashok Gupta on Article 370

...जब कि ज़रूरत इसी बात की है

अशोक गुप्ता 

Article 370 अनुच्छेद 370 जम्मू कश्मीर में लागू अनुच्छेद 370 एक बार फिर चर्चा में है और इस बार इसको हटाने का प्रस्ताव नरेंद्र मोदी के द्वारा सामने आया है. मैं पिछले कई सालों से अपने विविध लेखों और वक्तव्यों के जरिये यह कह चुका हूँ कि इस अनुच्छेद का हटना कश्मीर समस्या को हल करने की ओर पहला और ज़रूरी कदम है. मैं निश्चित रूप से सांप्रदायिक प्रदूषण से रचे बसे, तानाशाही प्रवृत्ति वाले संकीर्णमना व्यक्ति नरेन्द्र मोदी के पक्ष में नहीं हूँ लेकिन मेरा विवेक यह भी नहीं कहता कि वह अगर कोई नीति संगत बात कहते हैं तो मैं उसका विरोध सिर्फ इस लिये करूँ कि मैं नरेन्द्र मोदी का पक्षधर नहीं हूँ.

       मैं शुरु से कहता रहा हूँ कि यह राग अलापना कि कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है तब तक बेमानी है जब तक कश्मीर को भारत की मुख्यधारा में मिला नहीं लिया जाता. यह काम बिना अनुच्छेद 370 को खत्म किये संभव नहीं है. मुझे ’87 से ’90 तक श्रीनगर कश्मीर में रहने का मौका मिला है और वहां की दशा मैंने देखी है. बेरोजगारी है. पर्यटन की बेमिसाल जगह होते हुए भी विकास और सुविधाएं लगभग नहीं है. कितने ही लोग ऐसे हैं जिन्होंने आधी उमर पार हो चुकने के बावज़ूद बनिहाल के पार की दुनिया नहीं देखी है. अपीजिंग पॉलिसी कहें या और कोई मुहावरा इस्तेमाल करें, लेकिन भारत सरकार का अथाह पैसा यहाँ आता है और गिनी चुनी जेबों में जा कर गुम हो जाता है. मुख्यधारा से जुड कर वहां के रोजगार व्यापार को एक नई अवधारणा मिलेगी. शिक्षा और जानकारी का विस्तार होगा. लोगों में आत्मविश्वास बढ़ेगा. अन्यथा, वहां तो मूलतः ‘बख्शीश संस्कृति’ का बोलबाला है. सरकारी दफ्तारों में भी बिजली का बिल जमा करने के बाद काउंटर पर बैठा बाबू ‘चाय’ मांगता है. व्यापार में मंदी है इसलिए आलस और अराजकता है, भले ही वहां के लोगों की काम की दक्षता देखते बनती है. शारीरिक फुर्ती और बुद्धिलब्ध की दृष्टि से कश्मीर बहुत उर्वर है, लेकिन इस अनुच्छेद 370 ने इस संपदा को बाधित कर दिया है.

       मेरा यह मानना है कि अखंड भारत में आद्योपांत, कानून और नीतियों की समरूपता होनी चाहिये. चाहे पूर्वोत्तर के राज्य हों या जम्मू-कश्मीर. धर्म और जातिगत अंतर भी समाप्त होना चाहिये. हिंदुओं और मुसलामानों के लिये अलग अलग कानून क्यों हों..? दोनों सामाजिक सांस्कृतिक और धार्मिक स्तर पर अपनी अपनी परिपाटी का निर्वाह करें लेकिन वैधानिक प्रारूप में कोई अंतर क्यों हो...? इसी तरह, जातिगत आधार पर आरक्षण भी एक जड़तामूलक अलगाव पैदा करने वाली परिपाटी है. इसे भी हटाये जाने की जरूरत है. जिनको वांछित गुणात्मक स्तर पर लाने के लिये विशेष व्यवस्था की ज़रूरत हो वह उन्हें दी जाय लेकिन गुणात्मकता से स्तर सबके लिये एक से हों. वैश्विक स्पर्धा के इस भूमंडलीय परिवेश में कमतर दक्षता वाले नागरिकों को कैसे समकक्ष मान कर कार्यक्षेत्र में उतारा जा सकता है, यह बात समझ से परे है.

       आज ज़रूरत इस बात की है कि देश आतंरिक और स्थानीय दबावों से मुक्त हो कर अंतरराष्ट्रीय मानकों को अपना लक्ष्य मान कर खुद को तैयार करे. अभी तो अनेक ऐसे राजनैतिक अवरोध सामने हैं जिनका आधार वोट बैंक है और एक तिहाई सदी में देश की जनता ने इसी विषमतावादी संस्कृति को अपने भीतर उतार लिया है. वह उससे मिलने वाले तात्कालिक लाभ को ही ‘बोनस’ मान कर खुश होती रही है. यह सुख वैसे ही हैं जैसा लाइन तोड़ कर मेट्रो में घुस जाना, महिलाओं की सीट पर बेशर्मी से बैठे रहना, नकल कर के इम्तेहान पास कर लेना और घूस के जरिये नौकरी पा लेना.

       क्या मात्र इन सुखों की पूंजी के सहारे देश के नागरिक अपने भीतर राष्ट्रीय भावना की जगह बना पाएंगे, असंभव है, जब कि ज़रूरत इसी बात की है.
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अशोक गुप्ता
305 हिमालय टॉवर.
अहिंसा खंड 2.
इंदिरापुरम.
गाज़ियाबाद 201014
मो० 09871187875
ई० ashok267@gmail.com

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