शब्‍दांकन की विशेष प्रस्‍तुति - प्रसंगत: अशोक वाजपेयी | Interview of Ashok Vajpayi by Om Nischal

शब्‍दांकन की विशेष प्रस्‍तुति
प्रसंगत: अशोक वाजपेयी
पिछले दिनों सुप्रसिद्ध कवि अशोक वाजपेयी से कवि-आलोचक ओम निश्‍चल ने एक बहसतलब बातचीत की है जो आर्य स्‍मृति समारोह 2013 में जारी किये जाने वाले किताबघर प्रकाशन के समकालीन साहित्‍य समाचार के विशेष अंक '' रचना  का  लोकतंत्र '' में प्रकाशित की गयी है। 
विदित हो कि किताबघर प्रकाशन कल यानी 16 दिसंबर 2014 को सांय 5 बजे त्रिवेणी सभागार, तानसेन मार्ग मंडी हाउस, नई दिल्‍ली में आर्य स्‍मृति समारोह: 2013 तथा ''रचना का लोकतंत्र'' विषय पर गहन चर्चा का आयोजन  कर रहा है 
जिसकी अध्‍यक्षता विश्‍वनाथ त्रिपाठी करेंगे तथा अशोक वाजपेयी, निर्मला जैन, विश्‍वनाथप्रसाद तिवारी विशिष्‍ट वक्‍ता होंगे। संचालन करेंगे अमरनाथ अमर।

शब्‍दांकन के पाठकों व हितैषियों के लिए यह बातचीत ।

।। बैठकी ।।

कविता लिखना भूलने के विरुद्ध
याद करने की कार्रवाई है

अशोक वाजपेयी से ओम निश्‍चल की बातचीत


हिंदी साहित्‍य की सार्वजनिक दुनिया में कम ही लेखक ऐसे हैं जिनकी चिंता में साहित्‍य जीने-मरने की तरह हो और जो साहित्‍य की सेवा-टहल में ऐसे लगा रहता हो जैसे हम चाकर रघुनाथ के। अपने छात्र और प्रशासनिक जीवन से ही साहित्‍य और साहित्‍यिक गतिविधियों में रमा रहने वाला ऐसा शख्‍स कदाचित ही मिले जिसने अपनी पूरी ज़िंदगी कला, संगीत और साहित्‍य के आश्रय में बिताई हो। अपने जीवन के अनेक पड़ावों भारत भवन, कालिदास अकादेमी, मध्‍यप्रदेश कला परिषद, मगांअं विश्‍वविद्यालय वर्धा, ललित कला अकादेमी और कला, संगीत, साहित्‍य के अनेकानेक निकायों, संस्‍थाओं, प्रसंगों, गतिविधियों और सार्वजनिक जीवन के विवादों के बीच लगातार सुर्खियॉं बटोरने वाले अशोक वाजपेयी के दरवाज़े से दुर्भाग्‍य भी उन्‍हें अक्‍सर मुस्‍कराता देख लौट जाता है। प्रशासनिक अफसर होकर बेशक लोगों ने कोठियॉं भरी हों, फार्म हाउसेस और बंगलें बनाए हों, अशोक वाजपेयी ने सारी संभावनाओं पर पानी फेर कर साहित्‍य से जो अथक यारी की वह अब तक अप्रतिहत बरकरार है। वसुंधरा एन्‍क्‍लेव स्‍थित अपने छोटे से तीन कमरे के फ्लैट में कठिनाई और जतन से पुस्‍तकों की अपार दुनिया समेटे और हर वक्‍त सौ-पचास नई किताबों से घिरे अशोक वाजपेयी पूछने पर यही कहते हुए मिलेंगे कि 'अगर फिर से जन्‍म लेने का वरदान मिले तो मैं फिर से कवि और कला प्रेमी होना ही चाहूँगा और हिंदी में ही।'

       केवल सुबह की तनिक सैर और नियमित रस-रंजन भर से रक्‍तचाप और मधुमेहमुक्‍त, सतत हँसमुख वाजपेयी के पास निंदकों की एक बड़ी कतार बेशक है पर उनके रसिक पाठक भी कम नहीं हैं। यह निरा उल्‍लेखभर नही है कि हाल ही आए उनके कविता संग्रह 'कहीं कोई दरवाज़ा' ने विजय कुमार सरीखे आलोचक और नरेश सक्‍सेना जैसे विरल कवि को दूर तक छुआ है। किसी भी मामले में मुखर और प्रखर वक्‍ता अशोक वाजपेयी को किसी भी सत्‍ता से ज्‍यादा अपनी शब्‍दशक्‍तियों पर भरोसा रहा है और उसी भरोसे वे कलाविमुख और साहित्‍यविमुख होते समाज में अब तक डटे हैं। अशोक वाजपेयी से उनके घर पर संपन्‍न एक बातचीत।

       ओम निश्‍चल: अशोक जी लंबे अरसे बाद हम फिर एक बार बातचीत के लिए रूबरू हैं। इस बीच साहित्‍य और समाज के बीच बहुत कुछ घटा। इधर मीडिया जितना सयाना हुआ है, इलेक्‍ट्रानिक उपकरणों और आधुनिकता का प्रभुत्‍व बढ़ा है उतनी ही हमारी सांस्‍कृतिक समझ संकरी हुई है। इसके क्‍या निहितार्थ हो सकते हैं ?

       अशोक वाजपेयी : मुझे लगता है, यह समय तेज रफ्तार से बदल रहा है। देर सबेर कुछ स्‍थिर होगा या हम ही शायद इस तेजी से समंजस हो जाएंगे। तब फिर एक नए किस्‍म का सांस्‍कृतिक बोध आकार लेगा जो कि अभी लगभग अपरिभाषित-सा है। पर चूंकि मनुष्‍य प्रकृति ओर संस्कृति के बिना रह नही सकता; ऐसे बोध के बिना उसकी मानवीयता आगे चल नहीं पाएगी। भले तेजी का कितना भी आकर्षण या आतंक क्‍यों न हो।

       ओम निश्‍चल: क्‍या आप मानते हैं कि भारतीयता और भारतीय संस्‍कृति की हमारी परंपरागत अवधारणा आज उदारतावाद और पाश्‍चात्‍य जीवनशैली की जुगलबंदी के चलते ख़तरे में है?

       अशोक वाजपेयी : देखिए अव्‍वल तो ये अवधारणाएं स्‍थिर या विजड़ित नहीं रही हैं सौभाग्‍य से और एक मायने में हमेशा ही ख़तरे में रहीं। दूसरी ओर, उनमें एक कड़ियल किस्‍म का आत्‍मविश्‍वास भी रहा। वे परिवर्तन के प्रति खुली और ग्रहणशील रही हैं और अब भी हैं। इसलिए यथोचित परिवर्तन के बाद वे बनी रहेंगी और हमेशा की तरह ख़तरे में भी रहेंगी।

       ओम निश्‍चल: आज सोशल साइट्स ने लोगों की गोपनीयता के वसन उघाड़ दिए हैं। जहॉं अपने बारे में छिपाने की आदत लोगों में रही है, आज वे खुद आगे बढ़ कर आत्‍मप्रचार की हदों को लॉंघ रहे हैं। सब कुछ अहसास के बदले प्रदर्शनप्रियता में घटित हो रहा है। यद्यपि आप सोशल साइट्स पर प्रत्‍यक्षत: नहीं हैं तथापि, विश्‍वव्‍यापी सोशल साइट्स की भूमिका और उन पर लोगों के अप्रत्‍याशित एक्‍सपोज़र,वाद-विवाद-संवाद आदि को किस रूप में देखते हैं?

       अशोक वाजपेयी : देखिए यह संभवत: एक नए किस्‍म की आत्‍महीन नैतिकता आकार ले रही है। उसमें एक तरफ निर्भीकता भी है तो दूसरी तरफ आत्‍मप्रदर्शन आदि भी। पर इसके बावजूद उन्‍हें सामाजिक संवाद का एक नया रूप और मंच मानना चाहिए। दुर्भाग्‍य से मुझे उन पर जाने की इच्‍छा अब तक नहीं हुई है, न ही इतना गाली गलौज करना मुझे सुहाता है। अपने को मैं ही कहॉं जान पाया हूँ जो इसका बोझ लगातार दूसरों पर लादता चलूँ।

       ओम निश्‍चल: आप बुनियादी रूप से सौंदर्य और प्रेम के कवि हैं--देह और गेह की अपनी बनाई परंपरा के कवि। सौंदर्य को आप साहित्‍य में किस तरह लक्षित करते हैं। हिंदी साहित्‍य के मौजूदा सौंदर्यशास्‍त्र में क्‍या साहित्‍य में परिवर्तित होती सौंदर्यवादी दृष्‍टियों की समाहिति है?

       अशोक वाजपेयी : मैं अव्‍वल तो केवल सौदर्य और प्रेम का कवि नही हूँ। मेरी कविता के भूगोल में और भी तत्‍व सक्रिय हैं।जाहिर है कोई भी सौंदर्य दृष्‍टि अपने समय से अप्रभावित नहीं रह सकती। पर वह अपने समय तक ही महदूद हो, यह भी जरूरी नहीं। आज की कविता में सौंदर्य बोध और संघर्ष बोध अक्‍सर एकाकार हैं। यानी यह कहा जा सकता है कि बहुत सारी कविता संघर्ष के सौंदर्य की कविता है। तो शायद हमारी जैसी कविता सौंदर्य के संघर्ष की कविता है। हो सकता है हमारी जगह कम हो, पर है तो।

       ओम निश्‍चल: आज हर रचने वाला यह समझता है कि वह कुछ कालजयी रच रहा है जबकि हम देखते हैं कि आज बड़ी से बड़ी रचना काल के गाल में जाकर बिला जा रही है। आज की तरुण पीढ़ी तथाकथित कालजयी कृतियों की ओर से बेहद उदासीन दिखती है। क्‍या साहित्‍यिक पठन पाठन या लेखन में भी फास्‍ट फूड कल्‍चर का उदय तो नहीं हो रहा है?

       अशोक वाजपेयी : यों तो संभवत: कोई समय साहित्‍य के लिए शायद ही कभी सौभाग्‍य का रहा हो। दुर्भाग्य साहित्‍य का अनिवार्य संदर्भ है। पर हमारे समय में यह दुर्भाग्‍य कुछ ज्‍यादा ही गहरा है। अव्‍वल तो अधिकांश लेखक नितांत समसामयिकता के बाड़े में बंद हैं और ज्‍यादातर कविताएं खबर की तरह लिखी जा रही हैं। दूसरी ओर व्‍यवस्‍थित शिक्षा और पारिवारिक शिक्षा--दोनों जगहों पर भाषा और साहित्‍य के प्रति गहरी अवज्ञा का भाव है। इस कामचलाऊपन ने साहित्‍य का जो अहित किया है किया है उसमें तरूण पीढ़ियों का कितना सांस्‍कृतिक और सामाजिक अहित और क्षय हो रहा है, इसकी चिंता तक दुर्भाग्‍य से समाज में नहीं उभर रही है।

       ओम निश्‍चल: कुछ दिनों पहले साहित्‍य के भविष्‍य को लेकर बहुत बातें हुईं। क्‍या साहित्‍य बचेगा, किताबें बचेंगी, शब्‍द बचेंगे आदि आदि। विचारधारा, इतिहास, कल्‍पना और कविता आदि के अंत और अभ्‍युदय की तमाम बहसों के बीच आज भी वही सवाल बचा है कि क्‍या साहित्‍य बचेगा?

       अशोक वाजपेयी : साहित्‍य बचेगा कि नहीं इस सवाल का एक दूसरे सवाल से गहरा रिश्‍ता है कि मनुष्‍य बचेगा या नहीं। आदि मानव की बात छोड़ दें तो उसके बाद ऐसा शायद ही कोई समाज रहा हो जिसमें भाषा और साहित्‍य न रहे हों। इसलिए साहित्‍य तो बचेगा लेकिन उसका इतना कायाकल्‍प हो जाएगा कि हम लोगों का साहित्‍य प्रागैतिहासिक लगने लगे। इसमें संतोष की बात यही होगी कि जिनका इतिहासबोध बहुत प्रबल है और जो इसका दम भर कर दूसरों के साथ अन्‍याय करते रहे हैं उनका साहित्‍य भी दुर्भाग्‍य से प्रागैतिहासिक ही हो जाएगा।

       ओम निश्‍चल: सुना है, आज विश्‍व के तमाम देशों में भी साहित्‍य को लेकर उदासीनता का आलम है। पुस्‍तकें भी बड़े से बड़े मेलों ठेलों में भी बस फैशन परेड का हिस्‍सा भर हैं। मनोरंजन, पठन-पाठन के नए तौर तरीकों ने पुस्‍तकों को नेपथ्‍य में ढकेल दिया है। आप तो तमाम देशों के अतिथि यायावर हैं। आना-जाना लगा रहता है। क्‍या महसूस करते हैं साहित्‍य के प्रति इस विश्‍वव्‍यापी मंदी और सन्‍नाटे के बारे में। क्‍या यह भी उदारतावाद या बाजारवाद का कुपरिणाम तो नहीं है?

       अशोक वाजपेयी : अव्‍वल तो यह सामान्‍यीकरण उचित नही है कि सारे संसार भर में साहित्‍य और पुस्‍तकों को लेकर वैसी ही उदासीनता है जैसी कि हिंदी में। बल्‍कि भारत  में ही मलयालम, बांग्‍ला, असमिया, मराठी आदि भाषाओं में साहित्य के प्रति ऐसी उदासीनता नहीं है। पुस्‍तकें संसार-भर में नया रूप ले रही हैं लेकिन वे फिर भी पुस्‍तकें हैं और उनकी संख्‍या में, प्रकाशकों की बिरादरी में और दूकानों में बढोतरी ही हो रही है। पुस्‍तकों पर समीक्षा और चर्चा करने वाली अनेक लोकप्रिय पत्रिकाएं हैं और स्‍वयं लोकप्रिय माध्‍यमों में कम से कम पश्‍चिम में, काफी जगह है। इस मामले में भारतीय मीडिया खासकर अंग्रेजी और हिंदी का मीडिया अलबत्‍ता बहुत पिछड़ा हुआ और प्रतिक्रियावादी है।

       ओम निश्‍चल: उदारतावाद या बाजारवाद आखिर कोई आसमान से टपकी चीज नहीं हैं। हम विश्‍व के तमाम देशों से कट कर तो नहीं रह सकते। पर हमारे यहां उदारतावाद या बाजारवाद का क ख ग न समझने वाले लोग भी मंचों पर जिस तरह इसकी व्‍याधियों का रोना रोते हैं और समाधान या चुनौतियों से निपटने के नाम पर किंकर्तव्‍यविमूढ-से नज़र आते हैं,ऐसे लोगों के बारे में आप क्‍या कहेंगे?

       अशोक वाजपेयी : यह सही है कि बाजार और उदार आर्थिकी हमने खुली आंखों अपनाई है और हम दुनिया में जो हो रहा है उससे न तो अलग हैं, न चाहें तो भी हो सकते हैं। लेकिन इन दोनों को थोड़ी गहरी आलोचना दृष्‍टि से देखना जरूरी है। बाजार ने साहित्‍य के प्रकाशन, प्रचार-प्रसार इत्‍यादि को कई अर्थों में सुगम बनाया है। संसार भर में साहित्‍य अनेक भाषाओं के आरपार बहुत तेजी से संचरण करता है। ये दोनों विधेयात्‍मक पहलू हैं। हम ये न भूलें कि इस नई अर्थ व्‍यवस्‍था में जो अनेक विकृतियॉं हैं, उनके बावजूद देश में गरीबी का भूगोल सिकुड़ रहा है। गरीबी और समाजिक अन्‍याय के शिकार लोग आज अपनी आवाज जितनी बुलंदी से उठा सकते हैं ऐसा पहले न था। लेकिन ये भी सही है कि असमानता और विषमताएं बढ रही हैं। जिन पर अगर ध्‍यान न दिया तो नई आर्थिकी और उदारतावाद दोनो ही ध्‍वस्‍त हो जाएंगे।

       ओम निश्‍चलकविता को लेकर आप क्‍या किसी तरह का संकट महसूस करते हैं। मसलन आज प्रबंधकाव्‍य लिखे जाने की परंपरा खत्‍म सी होती जा रही है। छंदों का वैभव उतार पर है। देखते ही देखते कविता की दुनिया बदल गयी है। कविता के नाम पर विष्‍णु खरे के शब्‍दों मे कहूँ तो चुसे हुए शब्‍दों का विराट मलवा बेशक हमारे सामने है। अच्‍छी और याद रह जाने वाली कविता कम लोग लिख रहे हैं। इसकी क्‍या वजह है?

       अशोक वाजपेयी : अच्‍छी और स्‍मरणीय कविता हमेशा ही एक दुर्लभ प्रजाति रही है। काव्‍य-कौशल का क्षरण हुआ है इसमें शक नहीं है। कोई भी कवि हो सकता है यह लोकतांत्रिकता नहीं, कौशल का ही क्षरण और अवमानना है। फिर भी ऐसे समय में जो लगभग स्‍मृतिहीन समय हो गया है, कविता लिखना भूलने के विरुद्ध याद करने की कार्रवाई है और यह पर्याप्‍त मात्रा में हो रही है।

       ओम निश्‍चल: कविता हमारे अंत:करण के आयतन की कसौटी है। उसमें समाज के साथ साथ निज के सुखों दुखों की भी एक जगह होती है। पर यदि कविता निज के सुख-दुख का ही प्रवर्तन बन जाए तो?

       अशोक वाजपेयी : हमारा अंत:करण, चाहे निजी चाहे सामाजिक, बिना एक-दूसरे के गढ़ा नहीं जा सकता। निज को और समाज को दोनों को ही अंत:करण के लिए दूसरा चाहिए। इसलिए सोचने की बात यह है कि कविता और कला जैसी विधाओं में जो अंत:करण आकार लेता है वह अनिवार्यत: एक साथ निजी और सामाजिक होता है। किसी कवि के यहां हो सकता है निजता पर बल हो, किसी और के यहां सामाजिकता पर । लेकिन अगर अच्‍छी कविता है तो वह दोनों को मिला कर ही होगी। यह भी जरूरी है कि हम निजी और सामाजिक को थोड़ा बारीकी से पढ़ने समझने की चेष्‍टा किया करें जिसका व्‍यापक अभाव दुर्भाग्‍य से है।

       ओम निश्‍चल: आज के समय में सुकवि की मुश्‍किलें क्‍या हैं?

       अशोक वाजपेयी : पहली तो यही कि कविता के प्रति घोर उदासीनता के समय में कविता लिखने का मनोबल आत्‍मविश्‍वास और कौशल बनाए रखे और उसका भूगोल बढ़ाता चले। दूसरी मुश्‍किल यह है कि सामाजिक चकाचौंध का आकर्षण इतना है कि कवि अपनी निजता की बलि दे सकता है या उसे भूल सकता है। बिना निजता के अच्‍छी कविता संभव नहीं है। तीसरा यह कि आलोचना और विचारधारा के सिपहसालारों, समवयसियों की निष्‍क्रियता और युवतरों की आक्रामकता सबको नज़रंदाज कर अपनी इस राह पर डटा रहे कि उसे जैसे भी हो, कविता लिखना है।

       ओम निश्‍चल: कविता में समाज को बदलने के बड़े बड़े स्‍वप्‍न देखे गए। पर बदलाव की यह चेतना समाज में लक्षित नही होती?

       अशोक वाजपेयी : समाज को बदलना एक बहुत कठिन दीर्घकालीन काम है जो धीरे-धीरे अनेक शक्‍तियों के संयोजन से संभव होता है, जिनमें साहित्‍य भी एक है। साहित्य से यह उम्‍मीद करना या उसका अपने से यह अपेक्षा रखना कि उससे समाज बदल जाएगा, एक भोला आदर्शवाद-भर है। लेकिन यह जानते हुए भी कि साहित्‍य अब उन शक्‍तियों मे से एक नहीं है जो कि मानवीय स्‍थिति को बदल सकते हैं, हम ऐसे लिखते हैं मानो कि हमारे लिखने से कुछ बदलता है।

       ओम निश्‍चल: कभी फेसबुक पर उफनाते कविता के फेनिल झाग का जायज़ा लिया है। यहां जैसे हर कोई कविता लिख रहा है, पर समाज में कविता का कोई नामलेवा नहीं है। यथार्थ के इस विपर्यय पर क्‍या कहेंगे?

       अशोक वाजपेयी : इस दुनिया से मेरा संपर्क बहुत क्षीण है कभी कभी कोई मित्र मुझ पर किए जा रहे किसी प्रहार का जिक्र कर देता है और कभी कभी कोई तथ्‍यात्‍मक भूल सुधारना होता है तो ऐसे ही किसी मित्र की सहायता लेकर वह कर देता हूँ। यह विडंबना हमारे साहित्‍य समाज में अब अधसदी से अधिक पुरानी हो चुकी कि जो लोग बहुत यथार्थ और समाज का नाम जपते हैं उनके साहित्‍य की भी समाज और यथार्थ मे कोई खास जगह नहीं बनती रही है। यथार्थ और समाज दोनों पर साहित्‍य किसी अतिरिक्‍त अधिकार का दावा नहीं कर सकता। उन्‍हें समझने, बूझने, उनमें हिस्‍सा लेने की साहित्‍य एक विधि है; पर ऐसी विधियां बहुत हैं और अक्‍सर उनमें साहित्‍य की प्रमुखता भी नहीं है। हम हाशिए पर हैं केंद्र में होने का दुस्‍वप्‍न पालते हुए।

       ओम निश्‍चल: आज वैचारिक आग्रहों के चलते लेखक छोटे छोटे समूहों में बँट गए हैं और केवल आत्‍मप्रचार में तल्‍लीन दिखते हैं। तमाम निर्गुट लेखकों के यहॉं क्‍या कुछ अच्‍छा लिखा जा रहा है उनकी तरफ लोगों का ध्‍यान नहीं होता। क्‍या साहित्‍य की दुनिया हमें इतनी छोटी बना लेनी चाहिए जिसमें अपने या अपने समूह से इतर श्रेष्‍ठतर को पढ़ने सराहने की गुंजाइश ही न हो?

       अशोक वाजपेयी : दुर्भाग्‍य से यह सही है लेकिन उतना सही यह भी है कि सारी कटुताओं, शत्रुताओं, भेदभाव और अन्‍याय के बावजूद अच्‍छे लेखक अच्‍छा लिख रहे हैं। साहित्‍य समाज की संकीर्णताओं से बाहर आने का कुछ प्रयत्‍न और कुछ आह्वान मैं भी करता रहा हूँ। मैं स्‍वयं ऐसी संकीर्णता और टुच्‍चेपन से बचा रहूँ इसके बारे में बहुत सजग रहता हूँ।

       ओम निश्‍चल: हिंदी की बौद्धिक दुनिया केवल कविता, कहानी या उपन्‍यासों तक सिमटी हुई रहती है; वह देश दुनिया के तमाम मौजूँ मुद्दों, वैचारिक प्रत्‍ययों और अनुशासनों से कटी हुई लगती है। इसकी क्‍या वजह है?

       अशोक वाजपेयी : हिंदी साहित्‍य इस समय अन्‍य भाषाभाषी साहित्यों के मुकाबले अधिक विचारविपन्‍न अधिक संस्‍कृति-दरिद्र हुआ है। स्‍वयं अपनी आधुनिक परंपरा से विपथ होकर। विचार की जितनी अवमानना हिंदी में है उतनी शायद ही कहीं होगी। विचारधारा का बड़ा आतंक है पर उसमें विचार बहुत कम, धारा बहुत अधिक है।

       ओम निश्‍चल: हाल में हिंदी के कई लेखक गुज़रे। पर इनमें केवल राजेंद्र यादव को पब्‍लिक इन्‍टेलेक्‍चुअल (यानी सार्वजनिक बुद्धिजीवी) माना गया। आखिर, क्‍या वजह है कि हिंदी में लेखक तो बहुतेरे हैं पर पब्‍लिक इन्‍टेलेक्‍चुअल्‍स बहुत कम?

       अशोक वाजपेयी : इसकी एक वजह तो यह है कि हिदी के अधिकांश लेखकों की सार्वजनिक मुद्दों पर अपने विचार व्‍यक्‍त करने की कोई परंपरा नहीं है। बहुत ही कम लेखक हैं जो साहित्य के अलावा जो बड़े मुददे हैं उन पर निर्भीकता से और बौद्धिक तेज के साथ कुछ कहते हों।

       ओम निश्‍चल: आप संस्‍कृति मंत्रालय से संबद्ध रहे हैं। हिंदी की साहित्‍यिक सांस्‍कृतिक गतिविधियों के लिए भारत सरकार कितने फीसदी बजट व्‍यय करती है और क्‍या यह समुचित व संतुलित तरीके से उन लोगों तक पहुंच रहा है जो सच्‍चे अर्थों  में  साहित्‍य और संस्‍कृति के पहरुवे हैं या यह इमदाद कुछ कुलीनों के बीच ही बँट जाती है?

       अशोक वाजपेयी : भारत सरकार का संस्‍कृति का बजट उसके पूरे बजट का बहुत नगण्‍य हिस्‍सा है। हिंदी के नाम पर जो खर्च होता है वह अधिकांशत: राजभाषा के खाते में जाता है जो कि सर्वथा प्रभावहीन अपव्‍यय की लगभग एक विधा ही बन गयी है। भारत सरकार के आचरण से यह स्‍पष्‍ट है कि न हिंदी राजभाषा है, न कभी बनेगी।

       ओम निश्‍चल: आपने तो कई संस्‍थाएं बनाईं, कइयों के सर्वेसर्वा रहे, देश भर में तमाम गतिविधियों के आप नियामक रहे हैं। गैर सरकारी संस्‍था होने के बावजूद रज़ा फाउंडेशन को आपने इतना क्रियाशील किया है कि उससे कला संस्‍कृति व साहित्‍य की गतिविधियों को निश्‍चय ही लाभ मिला है। जैसी कि पिछले दिनों एक विवादवश आपकी ओर से जारी फाउंडेशन द्वारा प्रदत्‍त निधियों की सूची से पता चलता है कि लाभान्‍वितों में सभी तरह के लोग व संस्‍थाऍं शामिल हैं। इसकी भावी योजनाऍं और लक्ष्‍य क्‍या हैं?

       अशोक वाजपेयी : रज़ा फाउंडेशन एक महान कलाकार द्वारा स्‍थापित और वित्‍तपोषित संस्‍था है जिसका मैं रजा़ साहब का अभिन्‍न और विश्‍वासपात्र मित्र होने के कारण कार्यकारी न्‍यासी हूँ। हम बिना किसी वैचारिक आग्रह के साहित्य और कलाओं की विभिन्‍न प्रवृत्तियों के पोषण-प्रोत्‍सान के लिए मदद देने और जब तब कोई कारगर हस्‍तक्षेप करने के लिए उत्‍सुक और सक्रिय रहते हैं। तीन पत्रिकाएँ हिंदी में समास(साहित्य और सभ्यता को समर्पित), स्‍वरमुद्रा(शास्‍त्रीय संगीत और शास्‍त्रीय नृत्‍य की गंभीर वैचारिकी के लिए प्रतिबद्ध), और अंगेजी में अरूप(कलाओं, कविता और विचार में अमूर्तन को संबोधित)निकाल रहे हैं। हम युवा कला आलोचकों और इतिहासकारों की एक द्वैवार्षिकी भी अगले वर्ष से आयोजित करने जा रहे हैं। हम कई संस्‍थाओं को थोडी बहुत सहायता भी देते हैं, जिनका जिक्र आपने ऊपर किया ही है।


       ओम निश्‍चल: एक वक्‍त था कविता और कहानी के तूफानी आंदोलनों का। साठ-सत्‍तर का दौर। लोग कविता-कहानी से नहीं, आंदोलनों से ही पहचाने जाते थे। आज सारे आंदोलन धराशायी हैं। अब कहीं कुछ नहीं। क्‍या हुआ इस बीच । क्‍या मुद्दे खत्‍म हो गए या जीवन और समाज में अब इतनी आसानियॉं हैं कि आंदोलनों की जरूरत नहीं रही?

       अशोक वाजपेयी : देखिए, साहित्‍य में आंदोलनों का लेखा-जोखा करें तो वह लाभ-हानि का विवरण होगा। आंदोलनों से नई प्रतिभा, नया साहित्‍यबोध, नई प्रयोगशीलता और निर्भीकता आदि प्रोत्‍साहित हुए तो उनकी झोंक में बहुत सारा महत्‍वपूर्ण और मूल्यवान दब भी गया। इसलिए अगर इस समय आंदोलन नही हैं तो एक तरह से यह अच्‍छा ही है और संभवत: यह हिंदी साहित्‍य की वयस्‍कता का ही साक्ष्‍य है। एक तरह से अब लेखक को अपनी प्रतिभा और अपने मनोबल पर ही टिकना होगा, आंदोलन की बैसाखी सुलभ नही है।

       ओम निश्‍चल: कभी मिथक को लेकर काम करने का मन हुआ जैसे कुंवर जी ने किया आत्‍मजयी और वाजश्रवा के बहाने लिख कर?

       अशोक वाजपेयी : असल में तो नहीं। एक जमाने में यह सपना देखता था कि एक ऐसा काव्‍यनाटक लिखूँ जो मिथक पुराण या इतिहास आदि का सहारा न लेता हो। पर वह हुआ नहीं। सच तो यह हे कि मैंने इसके लिए बैठकर, जम कर कोई कोशिश ही नहीं की।

       ओम निश्‍चल: कविता पर समय के भूगोल का क्‍या कोई प्रभाव पड़ता है जैसे ऐसे ही एक सवाल के जवाब में आक्‍तेवियो पाज ने कहा था कि यदि मैं भारत में न रहा होता तो ब्‍लैंको या ईस्‍टर्न स्‍लोप की ज्‍यादातर कविताएं न लिख पाता। अपनी कविता के समय और भूगोल को लेकर आप क्‍या कहना चाहेंगे?

       अशोक वाजपेयी : कविता तो देश-काल दोनो से बंधी होती है लेकिन उसकी जो सार्वभौमता या सार्वकालिकता है वह उसकी स्‍थानीयता और समयबद्धता से ही उपजती है। मुझे दो बार फ्रांस में काफी समय बिताने का मौका मिला है और मेरा एक कविता संग्रह आविन्‍यों पूरा उसी शहर में लिखा गया और दूसरा कहीं कोई दरवाजा़ ज्‍यादातर नान्‍त में लिखा गया । ये दोनों ही संग्रह न लिखे जाते यदि मैं वहां न होता। इसी तरह से इबारत से गिरी मात्राएं संग्रह की बहुत सारी कविताएं पेालैंड में रहते हुए लिखी गयीं और उन पर पोलिश काव्‍य, समय और स्‍थान का बहुत गहरा प्रभाव है।

       ओम निश्‍चल: प्रसव पीड़ा चाहे बच्‍चे की हो या रचना की---शायद एक जैसी ही होती है जैसा कि कवियों ने कहा भी है। आह से उपजा होगा गान। शायद यही कारण है कि पॉज ने भी कहा है, 'लिखना एक अभिशाप है'। रचना की प्रक्रिया में क्‍या किसी तनाव से गुज़रते हैं या आनंद के क्षणों से?

      अशोक वाजपेयी : देखिए, यह रचना-रचना पर निर्भर करता है। यह किसी एक किस्‍म की पीड़ा या एक किस्‍म के आनंद में सामान्‍यीकृत नही किया जा सकता। मां, पिता, कुमार गंधर्व की मृत्‍यु पर शोकगीत, आश्‍विट्ज पर लिखी गयी कविताऍं गहरी पीड़ा से उपजी हैं और दूसरे किस्‍म की कविताएं आनंद से भी निकली हें। हर कवि की मुश्‍किल यह है कि उसे दुख में भी कुछ सुख मिलता है और सुख में भी कुछ दुख किरकराता रहता है। कम से कम मेरी जे़हनियत तो यह है।

       ओम निश्‍चल: वैसे लिखना जीवन शैली का ही एक अंग है। पर आप लेखन और जीवन में किसे वरीयता देंगे। वे जो नहीं लिखते पढते, क्‍या वे लेखकों से कोई कमतर प्रभावशाली जीवन जीते हैं?

       अशोक वाजपेयी : नहीं नहीं ,बिल्‍कुल नहीं। जीना अगर साहित्‍य के साथ हो तो शायद अधिक संपन्‍न और सहनीय लग सकता है। कम से कम लेखक और साहित्‍यप्रेमियों को। लेकिन जो लोग बिना साहित्‍य के भी जीवन जीते हैं और निश्‍चय संसार भर में बहुसंख्‍यक होंगे उनका जीवन कुछ कम संपन्‍न या सार्थक होता होगा ऐसा मानने का कोई कारण नहीं है। जीवन अपने आप में वरदान है या अभिशाप---साहित्‍य के साथ भी और उसके बिना भी।

       ओम निश्‍चल: कभी कभी प्रकृत्‍या ऐसी कोई अनूठी बात निकल आती है जो बाद में प्रयत्‍न करने पर भी संभव नहीं होती।ऐसा कभी महसूस किया है आपने?

       अशोक वाजपेयी : हां ऐसा तो कई बार होता है। लिखते समय कई बार निजी बातचीत में, या सार्वजनिक वक्‍तव्‍य देते हुए ऐसी कई बातें अप्रत्‍याशित ढंग से सूझती हैं जो वह अवसर न होता तो शायद  न सूझतीं। कविता में अप्रत्‍याशित पंक्‍तियां एकाएक आ गए बिम्‍ब और रूपक, कई बार विचारोक्‍तियां, कई बार कटूक्‍तियां...ये सब आकस्‍मिक ही होती हैं पर उनके लिए अपनी जिम्‍मेदारी से आप बच नहीं सकते।

       ओम निश्‍चल: सुसान सोंटैग एक बातचीत में कहती हैं, वे इसलिए नहीं लिखतीं कि उसका एक पाठक समुदाय है बल्‍कि इसलिए कि उनके समक्ष साहित्‍य की एक दुनिया है। आप किसलिए लिखते हैं?

       अशोक वाजपेयी : मैं इससे सहमत हूँ। मुझे पता है कि मेरे पाठक हैं पर मै उनको ध्‍यान में रख कर कभी नहीं लिखता। मेरा संबोध्‍य अपना साहित्‍य समाज ही है और कई बार तो कोई विशेष व्‍यक्‍ति ही।

       ओम निश्‍चल: गद्य और कविता के बीच किसमें आप ज्‍यादा सुभीता महसूस करते हैं?

       अशोक वाजपेयी : हर हफ्ते तीन पृष्‍ठ का गद्य पिछले सोलह वर्षों से लिखने वाला कवि यह नहीं कह सकता कि वह गद्य के मुकाबले कविता में अधिक सुभीता महसूस करता है। दोनों ही सधते हैं या कि नहीं सधते हैं।

       ओम निश्‍चलकभी लंबी कविताऍं क्‍यों नहीं आजमाईं जबकि मुक्‍तिबोध की कविताओं का कुछ न कुछ इम्‍पैक्‍ट तो आप पर पड़ना ही चाहिए था?

       अशोक वाजपेयी : यह कहना सही नही है कि मैंने लंबी कविताएं नहीं लिखी हैं। बेशक, उनका रूपाकार कुछ छोटी कविताओ के समुच्‍चयवाला है। उनका एक संचयन दीर्घयामा नाम से प्रकाशित भी है। पर यह सही है कि मैं आम तौर पर छोटी कविताओं का कवि हूँ: छोटी प्रतिभा  छोटा आकार।

       ओम निश्‍चल: आपकी कविताओं के सार्वजनिक निंदक हैं तो बहुतेरे प्रशंसक भी। आपके सुकोमल शब्‍द उनके मन के तार को झंकृत करते रहते हैं। पिछले दिनों विजय कुमार ने कहीं कोई दरवाज़ा को काफी महत्‍व देकर आंका; नरेश सक्‍सेना जी से यह पूछने पर इधर किस कृति ने आपको करीब से छुआ तो उन्‍होंने भी कहीं कोई दरवाज़ा का ही नाम लिया। दोनों लोग ऐसे हैं कि बिना किसी ठोस आधार के ऐसा न कहेंगे। हालांकि मुझे इससे पूर्व आया संग्रह 'दुख चिट्ठीरसा है' का संवेदनात्‍मक आधार अपेक्षाकृत काफी तरल लगता है।

       अशोक वाजपेयी : मैं इस पर क्‍या कहूँ ! कुछ लोग पढ कर नापंसद करते हैं, ज्‍यादातर बिना पढ़े। जो पढ कर पसंद करते हैं उनके प्रति गहरी कृतज्ञता है। जो पढते ही नही हैं उनकी निंदा से विचलित होने का कोई कारण नहीं है। पर मुझे ऐसी खुशफहमी होने लगी है जो कि हो सकता है गलतफहमी ही हो कि मेरे रसिक पाठकों की संख्‍या कुछ बढ़ रही है।

       ओम निश्‍चल: आज के राजनीतिक समय को पिछले राजनीतिक समय के सापेक्ष रखकर देखें तो मन में क्‍या उठता है?

       अशोक वाजपेयी : मेरे हिसाब से राजनीति इतनी विचारशून्‍य, मूल्‍यविपन्‍न जितनी आज है उतनी पहले कभी नही थी। इस समय जो सबसे बड़े नेता है वे वैचारिक दृष्‍टि से इतने बौने लगते हैं कि यह सोचकर दहशत होती है कि ये इस देश के देर सबेर नियामक होंगे। राजनीति में प्रबंध जरूरी है जैसा कि किसी भी अन्‍य सामाजिक अनुशासन में; लेकिन इस समय तो सारी राजनीति निरा प्रबंधन बन कर रह गयी है। असल में राजनीति में इस समय कोई प्रतिपक्ष नहीं है। सब एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं। साहित्‍य ही इस समय सच्‍चा प्रतिपक्ष है। जहां मूल्यों और विचारों की चिंता बरकरार है। कम से कम हिंदी समाज में तो।

       ओम निश्‍चल: पहले के राजनीतिज्ञों में साहित्‍य के प्रति एक सद्भभावना होती थी, वे इसे समाज के लिए अच्‍छा मानते थे। आज क्‍या हालत है, कभी सोचा है इस मुद्दे पर?

       अशोक वाजपेयी : आप किसी भी राजनेता पर, विशेषत: उत्तर भारत के राजनेताओं पर यह आरोप नहीं लगा सकते कि उन्‍हें इस समय हिंदी साहित्‍य में क्या लिखा जा रहा है इसकी कोई खबर भी है। बांगला में, मलयालम में, कन्‍नड़ में, मराठी में लेखक होने का राजनैतिक मतलब भी है। हिंदी में उन तक का कोई राजनैतिक मतलब नही है। जो अपने को स्‍पष्‍ट रूप से राजनीति से जोड़ने का दम भरते रहे हैं उन लेखकों के जो तीन वामपंथी संगठन हैं उनसे जुड़े जो वामपंथी दल हैं वे किसी भी मामले पर इन संगठनों की कोई राय लेते हों या सलाह करते हों ऐसा होता नहीं लगता।

       ओम निश्‍चल: आपको लेकर कोई कुछ भी कहे, पर आप जिस समारोह में भी होते हैं, उसे निर्विकल्‍प रूप से सफल बना देते हैं। अच्‍छे और ध्‍यानाकर्षी वक्‍ताओं की आज कमी है। जो हैं भी वे उम्र की ढलान पर हैं। इस वैशिष्‍ट्य को आपने कैसे अर्जित किया है?

       अशोक वाजपेयी : पता नही, यह वैशिष्‍टय है या नहीं। करत-करत अभ्‍यास ते जड़मति होत सुजान। क्योंकि मैं लंबे समय से एक सार्वजनिक व्‍यक्‍ति भी रहा हूँ और अनेक संस्‍थाओं के संचालन और उसके आयोजनों में बोलने की जरूरत पड़ती रही है-- मैने यह अभ्‍यास कर लिया है कि जहां भी रहूँ, थोडे़ में सटीक ढंग से बात करूँ, श्रोताओं के धैर्य की परीक्षा न लूँ । अपने को गंभीरता से न लूँ, अपने विचार को लूँ और दूसरों से संवाद की स्‍थिति को बनाए रखूँ।

इस बारे में मैं अपने स्‍कूल के दिनों के गुरू स्‍व. लक्ष्‍मीधर आचार्य को याद करता हूँ उन्‍होंने मुझे सार्वजनिक संभाषण के लिए तीन हिदायतें दी थीं। पहली यह कि शरू में ही थोडा अपना मजाक बनाओ ताकि श्रोता तुम्‍हें दूसरों का मजाक बनाने का हक आसानी से दे सकें। दूसरा, गंभीर से गंभीर बात हँसमुख चेहरे से संक्षेप में कही जा सकती है। तीसरी बात, पूरी बाल्‍टी मत उड़ेलो,लोटा भर ही दो ताकि श्रोता कुछ प्‍यासे रह जाऍं।

       ओम निश्‍चल: आप अक्‍सर यह कहते पाए जाते हैं कि हिंदी समाज अपने लेखकों के प्रति बेहद अकृतज्ञ हैं । मुझे तो लगता है हिंदी का हर आदमी अपनी महानता ग्रंथि से पीड़ित है। उसमें श्रद्धा, कृतज्ञता, सार्वजनिक और तटस्‍थ सराहना-भाव का लोप होता जा रहा है। ऐसा क्‍योंकर है?

       अशोक वाजपेयी : इसके कारण तो संभवत: हिंदी भाषा और हिंदी समाज के इतिहास में ही अंतर्निहित होंगे। मुझे लगता है कि जो विचारधारात्‍मक संकीर्णताएं, कट्टरताएं और शत्रुताएं विकसित हुईं उन्‍होंने इस मामले में एक निंदनीय भूमिका निभाई है। हिंदी समाज सोचता है कि जब ये लेखक ही आपस में इस क़दर एक दूसरे के शत्रु हैं तो इनकी क्या परवाह करना?

       ओम निश्‍चल: इन दिनों क्‍या लिख-पढ रहे हैं?

       अशोक वाजपेयी : पढने की सूची तो बहुत लंबी है । उसका ब्‍यौरे में जिक्र करना जरूरी नहीं । मैं तो पुस्‍तकों को अपना दूसरा जीवन मानता हूँ ।उनको पढ़ने में ही जीवन-रस मिलता है। अपने लंबे जीवन के कुछ साहित्‍यिक सांस्‍कृतिक संस्‍मरण लिखने का इरादा है। कई हितैषी मित्र इसका आग्रह कई वर्षों से कर रहे हैं और मुझे लगता है कि इसके पहले कि स्‍मृति और शिथिल हो जाए, यह काम कर लेना चाहिए। कबीर और गा़लिब पर अपनी बहुघोषित पुस्‍तक को भी उबारने का उपक्रम है। अब देखिए, कब क्‍या होता है।

       ओम निश्‍चल: शारीरिक या मानसिक रूप से बुढ़ापे के कुछ लक्षण दीख पड़ते हैं क्‍या?

       अशोक वाजपेयी : अभी तक तो नहीं, मैं कोई व्‍यायाम नहीं करता, सिर्फ सुबह सैर करता हूँ। कोई दवाई नहीं लेता। रस रंजन नियमित है और रक्‍तचाप आदि की कोई शिकायत नहीं है। मधुमेह का कोई प्रहार नही हुआ है इसलिए मिठाइयां बहुत चाव से खाता हूँ। बाकी जैसा गालिब ने कहा है:

       हो चुकीं ग़ालिब बलाऍं सब तमाम, एक मर्गे नागहानी और है।

       और कबीर को भी याद किया जा सकता है: हम न मरै मरिहैं संसारा/ हमका मिला जियावनहाराहमारा जियावनहारा तो साहित्य और कलाएं हैं। वही ईश्‍वर हैं अगर ईश्‍वर होना जरूरी हो।

       ओम निश्‍चल: उम्र की इस ढलान पर आकर पीछे के समय को कैसे देखते हैं?

       अशोक वाजपेयी : बहुत कृतज्ञता से, कुछ उल्‍लास से, कुछ पछतावे से... पर अगर फिर से जन्‍म लेने का वरदान मिले तो मैं फिर से कवि और कला प्रेमी होना ही चाहूँगा और हिंदी में ही।

       ओम निश्‍चल: अब तक क्‍या किया, जीवन क्‍या जिया? कभी आपके अंत:करण ने आपसे ऐसा सवाल पूछने की जुर्रत की?

       अशोक वाजपेयी : हां, मुझे लगता है मैंने जो कुछ किया-धरा वह मेरी अपनी अपेक्षा से बहुत कम है और उसके कम होने के कारण बहुतेरे हैं लेकिन उनसे उसका औचित्‍य नहीं बनता। मुझे बहुत कुछ  और कर सकना चाहिए था। जैसा शमशेर ने कहा है:  जो नही है उसका ग़म क्‍या ? वह नही है।

       ओम निश्‍चल: अपने किसी लिखे का कोई पछतावा कभी हुआ?

       अशोक वाजपेयी : शायद मुझे अज्ञेय के कविता संग्रह की समीक्षा करते हुए उसका शीर्षक बूढा गिद्ध पंख क्यों फैलाए.. नहीं देना चाहिए था। अज्ञेय बड़े लेखक थे और उन पर ऐसा प्रहार युवोचित तो था लेकिन उसका शीर्षक उचित नहीं था। दूसरा, मैने नागार्जुन और धर्मवीर भारती इन दो लेखकों को उतना ध्‍यान में नही लिया जितना शायद मुझे लेना चाहिए था। तीसरा मुझे इधर की कविता के बारे में सिलसिले में थोड़ा अधिक सक्रिय होना चाहिए था जो मैं नहीं हुआ।

       ओम निश्‍चल: किसी अन्‍य कवि को लेकर कभी ईर्ष्‍यादग्‍ध हुए?

       अशोक वाजपेयी : नहीं, मुझे कभी किसी कवि से ईर्ष्‍या नहीं हुई। मुझे लगता है कि हर कवि की अपनी राह होती है, अपनी जिद, अपने पूर्वग्रह और अपना शिल्‍प। उससे ईर्ष्‍या करने का कोई कारण नहीं।

       ओम निश्‍चल: जब-तब आप अपनी विफलता का गान करते रहे हैं। रचनाकार के लिए सफलता का क्‍या अर्थ है। आपके पास पद है, कद है, पैसा है, रचनाऍं हैं, मित्रमंडली है, जो जी चाहे, करने का कौशल है, एकाधिक फाउंडेशन और संस्‍थान भी हैं। .....और जीने को क्‍या चाहिए?

       अशोक वाजपेयी : एक लेखक की सबसे बड़ी आकांक्षा अपने समय में ध्‍यान से पढे जाने, जतन से खारिज़ किए जाने और सूक्ष्‍मता से समझे जाने की है। इन तीनों में मेरा खाता थोड़ा ऋणात्‍मक ही है। दूसरे, मैने जो अनेक संस्‍थाएं बनाई चलाई उनमें से अधिकांश मेरे बाद ध्‍वस्‍त, विकृत, दिग्भ्रमित इत्यादि हो गयीं। यह मेरे क्‍लेश का बड़ा कारण है। यह नहीं कि मैं कोई जादू था; मुझे लगा कि हिंदी में, हिंदी समाज में संस्‍थाओं को, उनमें सक्षम उत्‍तराधिकार को सुनिश्‍चित करनेऔर अगर ऐसी संस्‍थाएं विफल या विकृत हो रही हों तो उसके खिलाफ जोरदार आवाज़ बुलंद करने की वृत्‍ति नहीं है। हिंदी समाज हाथ पर हाथ धरे इन संस्‍थाओं को नष्‍ट, ध्‍वस्‍त और विकृत होते देखता रहता है।

       ओम निश्‍चल: ऐसा कोई सपना जिसे साकार करने की इच्‍छा मन में हो?

       अशोक वाजपेयी : सपने तो बहुत हैं। एक सपना यह है कि हिंदी कविता को पढ़ाने की जो रूढ विधियां हैं स्‍कूल से लेकर विश्‍वविद्यालय तक उनको बदला जाए।

       ओम निश्‍चल: हर व्‍यक्‍ति में कोई न कोई धुन होती है, एक जिद्दी धुन। कुछ कर गुजरने की। इसी धुन ने आपको अशोक वाजपेयी के रूप में ढाला, आपमें कला और साहित्‍य के प्रति प्रेम उपजाया। पूछना चाहता हूँ कि आपके शौक की हदें क्‍या हैं?

       अशोक वाजपेयी : देखिए मेरे शौक की हदें ये हैं कि बहुत सारी जो नई कला है, नया संगीत है, नया मनोरंजन है, नया फैशन है, नया मीडिया है, मैं उससे हमकदम नहीं हो पाता। वह मेरी सुरुचि या कुरुचि के भूगोल से बाहर है। ये एक बड़ी सीमा है, पर है।

       ओम निश्‍चल: आपने अपने पोते पर लिखा है, पोती पर भी। और पोती पर तो क्‍या ही अद्भुत लिखा है। उसकी चाल में ब्रह्मांड की डगमगाहट दर्ज़ की है आपने। कभी बच्‍चों के लिए सचमुच का भी बाल साहित्‍य लिखा है क्‍या?

       अशोक वाजपेयी : नहीं, ये मेरी एक दुखती रग है। मेरे कई समवयसियों जैसे प्रयाग शुक्‍ल, रमेशचंद्र शाह ने लिखा है और अभी पता चला है कि विनोदकुमार शुक्‍ल भी बच्‍चों लिए लिखना चाहते हैं।  पर मुझसे नहीं हुआ।

       ओम निश्‍चल: इतना कुछ पढते-गुनते हैं। आज भी देश-विदेश से किताबें ढो-लाद कर लाते रहते हैं। आपकी अगली पीढ़ी में पुस्‍तकों और लिखने पढने का शौक किसे सबसे ज्‍यादा है जो आपकी संजोई पुस्‍तकों और रचनाओं के बीच आपकी उपस्‍थिति को महसूस कर सके?

मुझे पता नहीं, मैं तो सिर्फ भवभूति की तरह यह आकांक्षा कर सकता हूँ कि होगा कोई समानधर्मा। क्‍योंकि काल निरवधि है और पृथ्‍वी विपुल है। दृश्‍य पर कोई नज़र तो नहीं आता, पर दृश्‍य सचाई को पूरी तरह से व्‍यक्‍त नहीं भी करता।

       ओम निश्‍चल: बहुत दिनों से आपका कोई अनुवाद सामने नहीं आया। इसकी वजह ?

आया तो है। मैने एक अनुवाद अर्जेंटीना के कवि अंतोनियो पोर्किया की कविताओं का किया है जो 'हम छाया तक नहीं' नाम से यात्रा बुक्‍स द्वारा प्रकाशित है।

       ओम निश्‍चल: अब जब नए इलेक्‍ट्रानिक गजेट्स आ गए हैं, कम्‍प्‍यूटर पर टाइपिंग भी आसान हो गयी है, तो क्‍या आपकी उंगलियॉं इन पर सध गयी हैं या वही पुराना ऐतिहासिक टाइपराइटर है, जिसकी अब रिबन भी शायद ही बाज़ार में मिलती हो?

       अशोक वाजपेयी : रिबन तो मुश्‍किल से मिलती है लेकिन मैं अभी उसी टाइपराइटर पर रूढ़ हूँ। पिछड़ा हुआ आदमी हूँ सो हूँ क्योंकि आदमी तो हूँ।

       ओम निश्‍चल: यह जो आपके चेहरे से सतत् मुस्‍कान झरती रहती है, बेशक कुछ लोगों को आहत भी करती रहती है। इसका रहस्‍य क्‍या है?

       अशोक वाजपेयी : इसका रहस्‍य बहुत ही सीधा सादा है । मैं हर दिन लगातार इतनी मूर्खताएँ करता हूँ कि मुझे उन्‍हें सोच कर अपने पर ही हंसी आती रहती है और एक पुरानी यहूदी कहावत है:  ईश्‍वर के सामने रोओ, आदमी के सामने हँसो। अब क्‍योंकि मुझे आस्‍था का वरदान नहीं मिला है तो मैं आदमियों के सामने हंसता रहता हूँ । विलाप की जगह कविता ही है।

       ओम निश्‍चल: समकालीनों से तो आपकी मुठभेड़ चलती ही रहती है। वे शेर तो आप सवा शेर। वैसे भी उन्‍नाव के कनौजिया। पर जब अपने ही शिष्‍यों-सेवकों से आहत होते हैं तो कैसा लगता है?

       अशोक वाजपेयी : देखिए, ऐेसे अवसर बहुत कम आए हैं लेकिन आए तो जरूर हैं। पर मैं किसी हद तक सम्‍यक बुद्धि रखने की चेष्‍टा करता हूँ। किसी ने मेरे साथ क्या किया या मेरे बारे में क्‍या सोचा या कहा उससे मेरा उसका आकलन प्रभावित न हो इसका जतन करता हूँ। जीवन में और साहित्‍य दोनों में।

       ओम निश्‍चल: अपने और अपनी रचना के सुस्‍वास्‍थ्‍य के लिए क्‍या योगक्षेम करते हैं और युवा लेखकों को इसके लिए क्‍या करना चाहिए?

       अशोक वाजपेयी : युवा लेखकों को अक्‍सर किसी सलाह की जरूरत नहीं होती और कम से कम मेरी सलाह की जरूरत तो कतई न होगी। मैं अपनी राह पर जिद कर चलता रहा हूँ। कहीं नहीं पहुँचा, यह सही है । पर मुझे अपनी राह पर चलने का और अपनी जिद को लेकर कोई पछतावा नही है।




ओम निश्‍चल, जी-1/506 ए,
उत्‍तम नगर,
नई दिल्‍ली-110059

फोन: 08447289976





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1 comments :

  1. interview acha he. ashok ji ke vicharo ko samajhne ka moka mila. dhanyvad. Manisha jain

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