उपन्यास अंश : कस्बाई सिमोन - शरद सिंह Novel excerpts - Kusbai Simon - Sharad Singh

It is vain to expect virtue from women till they are in some degree independent of men - Mary Wollstonecraft

पुरुषों से कुछ हद्द तक स्वतंत्रता  ना मिलने तक महिलाओं से सदाचार की उम्मीद करना अर्थपूर्ण नहीं है - मेरी वोलस्टोनक्राफ्ट

युवा उपन्यासकार शरद सिंह ने अपनी विशिष्ट कथा-शैली और अछूते विषयों के चुनाव के कारण पाठकों का ध्यान आकर्षित किया है। उनकी सद्य प्रकाशित कृति ‘कस्बाई सिमोन’ में भी उनकी यह विशेषता देखी जा सकती है। यह उपन्यास ‘लिव इन रिलेशनशिप’ जैसे विषय को लेकर है, जो खासकर भारतीय समाज के लिए अपेक्षाकृत नया है। जिस समाज में प्रेम करने को अक्षम्य अपराध की तरह देखने का आम चलन हो, वहां ऐसे विषय पर कलम चलाना साहस की बात कही जाएगी। वस्तुत: हिंदी साहित्य के स्त्री विमर्श के क्षेत्र में यह उपन्यास एक अहम हस्तक्षेप है, जिसमें न सिर्फ स्त्री की सदियों पुरानी परतंत्रता का प्रतिकार किया गया है, बल्कि उसे मुक्ति का विकल्प भी दिखाया गया है।         (दैनिक हिंदुस्तान 29/09/2012

कस्बाई सिमोन (उपन्यास अंश)

- शरद सिंह


 रखैल बना कर औरत को रखा जाए तो कल्चर के विरुद्ध नहीं है और यदि औरत अपने पूरे अधिकार के साथ, स्वेच्छा से किसी पुरुष के साथ रहने लगे तो वह कल्चर के विरुद्ध हो गया, उफ! कितना दोहरापन!...
समाज और रिश्तेदार अगर चुप बैठ जाएं तो बहुत सारी समस्याएं पैदा ही न हों। रितिक के साथ मेरे रहने की खबर मेरी मां तक भी पहुंची। वह भी एक दिन बिना सूचित किए मेरे सामने आ खड़ी हुई।

       ‘यह तुम क्या कर रही हो, सुगंधा? क्या कहीं ऐसे भी जीवन जिया जाता है?’ मां ने आड़े हाथों लिया। मां का यह कहना पता नहीं क्यों मुझे बुरा लगा। क्या उन्होंने अपना जीवन अपने बनाए सांचे में नहीं ढाला है? फिर मुझे क्यों सिखावन दे रही हैं? यूं भी मैं माँ को सब कुछ बता देने का उचित अवसर ढूंढ रही थी। मैं तय नहीं कर पाई थी कि उन्हें रितिक के बारे में कैसे बताऊं या उन्हें रितिक से कैसे मिलवाऊं। इससे भी बड़ी उलझन कि मैं उनसे कैसे कहूं कि मैं रितिक के साथ रहने लगी हूं बिना किसी रिश्ते के ‘सहजीवन’ में। मैं उनसे कुछ भी छिपाना नहीं चाहती थी। छिपाती भी कैसे, देर-सवेर उन्हें मेरे साथ ही तो रहना था, सेवानिवृत्त होने पर। निःसंदेह उनकी सेवानिवृत्ति में अभी कई साल थे।

‘मां मेरे जीवन को कुछ नहीं हुआ है, मैं बिलकुल ठीक हूं, मजे में रह रही हूं।’मैंने मां से कहा।

‘कोई बता रहा था कि तुम किसी लड़के के साथ रहने लगी हो। क्या ये सच है?’ मां ने पूछा।

‘है...लेकिन पूरा सच नहीं। मैं उसके साथ नहीं रह रही हूं बल्कि वो मेरे साथ रह रहा है...या यूं कहिए कि हम दोनों एक-दूसरे के साथ रह रहे हैं।’

‘वह क्या करता है?’

‘मल्टीनेशनल कंपनी में एरिया मैनेजर है...अच्छा खाता-कमाता है।’

‘तुम उसे बहुत चाहती हो?’

‘हां!’

‘तो उससे शादी क्यों नहीं कर लेतीं?’

‘यह जरूरी नहीं है!’ क्या जरूरी नहीं है?’ मां ने चौंक कर पूछा।

‘शादी करना।’

‘पागल तो नहीं हो गई? बिना शादी किए भी कोई किसी के साथ यूं खुलेआम रहता है?’

‘अब आप यह मत कहना कि मैंने आपकी दी हुई आजादी का गलत फायदा उठाया। बड़ा दकियानूसी लगेंगी, यदि आप मुझसे यह कहेंगी।’ मैंने भी मां की आधुनिकता को चुनौती देते हुए कहा।

‘बात तो सच है....दकियानूसी ही सही, लेकिन मैं कहूंगी जरूर....।’ मां अपना प्रयास नहीं छोड़ना चाहती थीं।

‘प्लीज मां! फॉर गॉड सेक.....मैं अपनी जिन्दगी अपने ढंग से जीना चाहती हूं....आपकी तरह!’ मैंने मां को उनकी स्वतंत्रता की याद दिलाई। विवाह के बंधन में बंध कर अनेक वर्षों तक पति-पत्नी के रूप में साथ-साथ रहने ....मुझे और मेरे भाई को जन्म देने के बावजूद.... मां ने भी तो मेरे पिता से अलगाव का रास्ता चुना था। विवाहित हो कर भी वैचारिक धरातल पर मां सदैव अपनी स्वतंत्रता के लिए जूझती रहीं ....और अब मुझे शिक्षा दे रही हैं, मुझे यह स्वीकार नहीं था।

अपने अलगाव की चर्चा आते ही मां का चेहरा उतर गया।

‘वह बात दूसरी थी बेटा! उससे अपनी जि़न्दगी को आंकने का प्रयास मत कर!’ मां का स्वर नरम पड़ गया।

‘अलग कैसे मां? आपने पापा को छोड़ा और दूसरों को अपनाने का प्रयास किया जो आपके कभी नहीं हो सके...मैं इस सबको इतना पेंचीदा नहीं बनाना चाहती हूं। इस तरह मैं स्वतंत्र रहूंगी किसी को भी छोड़ने और दूसरे को पाने के लिए।’ मैंने अपनी बात को तार्किक बनाते हुए कहा। यही सच भी था मेरा। परोक्ष रूप से मैंने मां को सेलट अंकल की याद दिला दी थी।

‘यह ठीक नहीं है सुगंधा!’ मां ने थके हुए स्वर में कहा, ‘एक बार मुझे उस लड़के से मिलने दे।’

‘उस लड़के का नाम रितिक शर्मा है...और मां, उसके पापा भी आए थे हमारी शादी की बात करने लेकिन हमने उनकी बात भी ठुकरा दी।’

मुझे इस बात का भी अहसास हुआ कि माता-पिता के लिए बच्चे सदा बच्चे ही रहते हैं, चाहे वे किसी भी आयुवर्ग को प्राप्त कर लें, किन्तु बच्चों के लिए माता-पिता उतने बड़े नहीं रह जाते हैं कि बच्चे उनके निर्णयों को आंख मूंद कर आत्मसात कर लें।

‘उसके पापा भी आए थे? वे तुम दोनों की शादी के लिए तैयार थे?... और तुम ने उनकी बात ठुकरा दी? हे ईश्वर!’ मां ने आश्चर्य से पूछा।

‘हां मां ! यह हमारा जीवन है और हमारा निर्णय है...विशेष रूप से मेरा...मैं किसी बंधन में नहीं बंधना चाहती हूं।’ मैंने अंतिम निर्णय सुनाने की मुद्रा में कहा।

‘ठीक है, तुम जैसा चाहो....फिर भी यह याद रखना कि हमारा समाज अभी भी पुरानी परम्पराओं का कट्टर पोषक है, वह तुम्हें चैन से जीने नहीं देगा।’ मां ने कहा था।

‘क्रोध में आ कर बद्दुआ दे रही हैं या आगाह कर रही हैं?’ मैंने उद्दण्डतापूर्वक कहा। मुझे मां से इस तरह बात नहीं करनी चाहिए थी लेकिन मैंने की। उस समय मेरे भीतर छिपी विद्रोह की भावना उबल-उबल कर बाहर आ रही थी और मैं उसी के ताप में बोले चली जा रही थी। मुझे मां से बैर नहीं था और न उनके प्रति विद्रोह वाली कोई बात थी लेकिन बैठे-ठाले वे निशाना बन गईं।

मैंने तुझे बद्दुआ देने के बारे में तो कभी सपने में भी नहीं सोचा...न सोच सकती हूं ....मैं तो तुझे दुनिया का चलन समझाना चाहती थी...तू अगर ऐसे ही खुश है तो खुश रह...तू जैसी भी रहेगी, सदा मेरी बेटी ही रहेगी।’ अब उनके स्वर में चेतावनी नहीं, ममत्वजनित सूचना का भाव था। यह सूचना उस समय मेरे लिए कोई अर्थ नहीं रखती थी।

तलाक के बदले सामाजिक अलगाव स्वीकार करने के बाद भी मां परितक्त्या कहलाईं। समाज ने उन्हें पति द्वारा छोड़ी हुई औरत माना। स्त्री और पुरुष के बीच का मामला हो तो दोषी स्त्री को ही माना जाता है, विशेष रूप से चरित्र के प्रश्न पर...

इस बार मां मेरी उंगली पकड़ कर मुझे चला नहीं पाईं। उंगली पकड़ कर चलने के लिए मैं बहुत बड़ी हो चुकी थी। अट्ठाईस की आयु कम नहीं होती है। मैं प्रौढ़ावस्था की ओर बढ़ रही थी लिहाजा मुझे लगता था कि मैं अपने जीवन के बारे में स्वयं निर्णय लेने का अधिकार रखती थी। उस समय मुझे इस बात का भी अहसास हुआ कि माता-पिता के लिए बच्चे सदा बच्चे ही रहते हैं, चाहे वे किसी भी आयुवर्ग को प्राप्त कर लें, किन्तु बच्चों के लिए माता-पिता उतने बड़े नहीं रह जाते हैं कि बच्चे उनके निर्णयों को आंख मूंद कर आत्मसात कर लें।

मुझे मां की बातों का मर्म समझने में कई सप्ताह लगे। दरअसल मां अपने सामाजिक अनुभवों के आधार पर मुझे रोक रही थीं। वे स्वेच्छा से अलगाव ले चुकी थीं। पापा का व्यवहार उनके प्रति कभी ठीक नहीं रहा। मार-पीट, लांछन, परस्त्रीगमन पापा के लिए सामान्य बात थी। मां पढ़ी-लिखी स्त्री थीं। वे घुट-घुट कर जीना नहीं चाहती थीं। पापा के साथ जीवन बिता पाना उन्हें असंभव लगा तब उन्होंने विधिवत अलगाव का कदम उठाया। अदालत में मां नहीं पापा ही ‘बदचलन’ सि़द्ध हुए। लेकिन तलाक के बदले सामाजिक अलगाव स्वीकार करने के बाद भी मां परितक्त्या कहलाईं। समाज ने उन्हें पति द्वारा छोड़ी हुई औरत माना। स्त्री और पुरुष के बीच का मामला हो तो दोषी स्त्री को ही माना जाता है, विशेष रूप से चरित्र के प्रश्न पर। पुरुष ‘छोड़ दिए जाने’ पर भी छोड़ा गया नहीं कहलाता। परितक्त्य पुरुष पर अनेक मां-बाप की आंखें टिक जाती हैं, अपनी सच्चरित्र बेटियां ब्याहने के लिए, जबकि परितक्त्या स्त्री को लोग भोगी जा चुकी स्त्री का दर्जा दे कर महज उपभोग की वस्तु के रूप में देखने लगते हैं। ... और जो उस भोगी जा चुकी परितक्त्या स्त्री को अपनाता है, उस पर ‘दया’ अथवा ‘अहसान’ करता है।

समाज को पुरानी परम्पराओं का कट्टर पोषक निरूपित करने वाली मां की बात मुझे पहली बार उस दिन याद आई जब हमारी नई मकानमालकिन ने मुझसे कहा था।

‘सुगंधा जी, आप शादी क्यों नहीं कर लेतीं रितिक जी से?’

‘मैं शादी करूं या न करूं, आप क्यों परेशान हो रही हैं आपको तो किराया समय पर दे दिया जाता है।’ मैंने भरसक अपने स्वर को सहज बनाते हुए कहा था।

‘वो बात नहीं है...मुझे तो कोई दिक्क्त नहीं है लेकिन आस-पड़ोस वाले कानाफूसी करते हैं।’ मकानमालकिन ने बताया था।

‘तो आप उनकी परवाह मत करिए।’

‘करनी तो पड़ेगी! उन्हीं लोगों के बीच रहना है।’ मकानमालकिन स्वयं बुरी सिद्ध नहीं होना चाहती थी। वह पढ़ी-लिखी थी। दिल्ली जैसे शहर में रहती थी और स्वयं को अत्याधुनिका प्रकट करती थी। मेरे पड़ोसियों और उसके अन्य किरायदारों के संदेश भेजने पर वह दिल्ली से आई थी। विशेष रूप से हमें शिक्षा देने अथवा शिक्षा का पालन न करने पर घर से निकालने।

‘ठीक है, हम कोई दूसरा मकान ढूंढ लेंगे।’ मैंने मकान-मालकिन को चोट देनी चाही लेकिन वह मेरी आशा के विपरीत बोली, ठीक है, जैसा आप ठीक समझें।’

मुझे उसके इस उत्तर से ठेस पहुंची। ठेस इस बात से नहीं कि वह हमें अपने मकान से जाने को कह रही थी, इस बात की भी नहीं हमारे पड़ोसी हमारे बारे में कानफूसी करते हैं, ठेस इस बात की थी कि मकानमालकिन, जो कि स्वयं एक पढ़ी-लिखी स्त्री थी दिल्ली जैसे महानगर में निवास कर रही थी....घुमाफिरा कर अपने मन की बात मुझसे कह रही थी। यानी एक स्त्री जो विवाहित थी और विवाहित जीवन के उतार-चढ़ावों से बखूबी परिचित थी। मुझे ‘लिव इन रिलेशन’ को जीते हुए नहीं देख पा रही थी।

रात खाने के बाद मैंने रितिक को मकान-मालकिन का मंतव्य बताया था और साथ ही आग्रह किया था कि अब कोई दूसरा मकान ढूंढो।

‘इतना आसान नहीं है। कुछ दिन और निभाओ।’ रितिक ने कहा था।

दूसरे दिन से मैंने ही दूसरा मकान ढूंढना शुरू कर दिया था। मेरे दफ़्तर के कुछ लोगों ने एक बार फिर मकान ढूंढने में मेरी मदद की। उस समय उन्हें विश्वास था कि मैं जल्दी ही रितिक से शादी कर लूंगी। अपने इस विश्वास को उन्होंने मेरे सामने प्रकट भी होने दिया। मैंने हंस कर टाल दिया। मुझे उनसे मदद की आवश्यकता थी नया घर ढूंढने में। दूसरा मकान हम दोनों के दफ़्तरों से बहुत दूर जबलपुर शहर के दूसरे छोर पर पन्ना-नाका पर था। इस दूरी को ले कर रितिक झुंझलाया था।

‘पछता तो नहीं रहे हो, मेरे साथ रह कर?’ मैंने पूछा था।

‘नहीं तो!’ रितिक का उत्तर नकारात्मक था लेकिन पता नहीं क्यों मुझे भीतर तक निरुत्साहित कर गया। पता नहीं क्यों मुझे ऐसा लगा कि रितिक कहना कुछ और चाहता है, कह कुछ और रहा है। मैंने इसे अपने मन का भ्रम माना और सिर झटक कर अपनी उदासी को झटकने का प्रयास किया।

उस दिल्लीवाली मकान-मालकिन ने कुछ अकड़ के साथ कहा था, दिल्ली में भी आप लोगों जैसे बिना शादी किए लोग रहने लगे हैं लेकिन कम ही हैं...वहां भी हमारे घर में एक जोड़ा मकान ढूंढता हुआ आया था। उनका कहना था कि वे साथ-साथ रह कर पैसे बचाना चाहते हैं...वाह, यह भी कोई बात हुई कि पैसे बचाने के लिए बिना शादी किए साथ रहो, साथ में सोओ और फिर जब चाहो अलग-अलग रास्ते पर चल दो...‘मेरे इनको’ तो यह कल्चर बिलकुल पसंद नहीं है...आप लोगों को यहां कैसे घर दे दिया इन्होंने, पता नहीं!’

कल्चर? क्या है हमारा कल्चर रखैल बना कर औरत को रखा जाए तो कल्चर के विरुद्ध नहीं है और यदि औरत अपने पूरे अधिकार के साथ, स्वेच्छा से किसी पुरुष के साथ रहने लगे तो वह कल्चर के विरुद्ध हो गया, उफ! कितना दोहरापन!

मुझे याद आने लगी थी अपनी बैंगलोर यात्रा। मैं विभागीय सेमिनार में जा रही थी। ट्रेन में मेरी बर्थ के सामने और ऊपर वाली बर्थ में तीन लड़कियां थीं। तीनों से मेरा परिचय हुआ और बातचीत शुरू हो गई। लम्बा रास्ता था, हमें साथ-साथ समय गुज़ारना था। हम चारो में मित्राता हो गई। वे तीनों उम्र में मुझसे छोटी थीं। कॉलेज में ही ‘कैम्पस सिलेक्शन’ में एक बहुराष्ट्रीय इलेक्ट्रॉनिक कम्पनी द्वारा चुन ली गई थीं। वे रहने वाली अलग-अलग शहरों की थीं लेकिन राजस्थान के कोटा शहर में कोचिंग के दौरान एक ही छात्रावास में एक साथ रहने के कारण वे आपस में सहेलियां बन चुकी थीं।

‘आप लोगों के साथ और कौन है?’ मेरा आशय उनके अभिभावक से था।

‘कोई नहीं, बस, हम तीनों हैं!’

‘पहले भी बैंगलोर जा चुकी हैं?’

‘नहीं! पहली बार जा रहे हैं।’

‘अच्छा, वहां कोई रिश्तेदार होगा!’मैंने पूछा। मुझे लगा कि बैंगलोर में इनका कोई न कोई ऐसा रिश्तेदार तो होगा ही जो वहां पहुंचते ही इन्हें अपने संरक्षण में ले लेगा।

‘नहीं, वहां हमारा कोई रिश्तेदार नहीं है।’ उन्होंने मुझे चैंका दिया था।

‘फिर डर नहीं लग रहा है, वहां जाते हुए?’ मैंने पूछा।

‘नहीं हम तीनों साथ हैं न, फेस कर लेंगे सारी दिक्कतें।’ तीनों में से एक ने पूरे आत्मविश्वास के साथ कहा।

मैं उन तीनों का चेहरा ताकती रह गई। अटूट आत्मविश्वास था उनके चेहरे पर।  मुझे लगा कि ये लड़कियां ‘सरवाईव’ कर लेंगी। ये साईबर दौर की साहसी लड़कियां हैं। लेकिन इनके माता-पिता उन्होंने कैसे जाने दिया अकेले इन्हें, अनजान शहर, अनजान लोग, अनजान कंपनी जहां इन्हें काम करना है। तीनों को पांच-पांच लाख का पैकेज़ मिला था। उनके हिसाब ये यह बहुत कम था लेकिन शुरुआत और अनुभव हासिल करने के हिसाब से उनके लिए बुरा नहीं था।

ये पूंजीवादी दौर की कंपनियां ऐसे ही तो युवाओं की अदम्य शक्ति को निचोड़ती रहती हैं और अपना उल्लू सीधा करती रहती हैं।

सेमिनार में अन्य प्रदेशों से कई लोग आए थे। उन्हीं में एक सज्जन एक शाम दार्शनिक हो कर कहने लगे कि ‘आजकल की लड़कियां भ्रष्ट हो चली हैं। स्किनटाईट जींस और टॉप पहन कर, लड़कों के साथ घूमती रहती हैं, अपने माता-पिता की प्रतिष्ठा का तो उन्हें विचार भी नहीं आता है।’

‘आपकी बेटी कहां है आजकल?’ मुझे याद आया कि उन्होंने बताया था कि उनके दो बच्चे हैं, एक बेटा और एक बेटी। बेटा अमरीका में बस चुका है और बेटी पुणे में किसी निजी कम्पनी में काम कर रही है। उसकी कम्पनी शीघ्र ही उसे विदेश भेजने वाली है।

‘पुणे में है वह।’

‘उसके साथ कौन है? फिलहाल तो अकेली है...उसकी मां दो-चार दिन साथ रह कर लौट आईं।’

‘अगर अकेली होने पर उसे किसी विपरीत परिस्थितियों से गुज़रना पड़े तो आपके विचार से उसे आत्महत्या कर लेनी चाहिए या उस परिस्थिति से बचने के लिए जो भी संभव हो वह करना चाहिए।’

‘आत्महत्या क्यों? जि़न्दगी बार-बार नहीं मिलती है।’ वह तनिक हकबकाए।

‘हां यही तो बात है! आजकल अच्छा-खासा कमाने वाले माता-पिता बिना किसी आर्थिक मजबूरी के अपनी लड़कियों को पैसे कमाने के लिए देश-दुनिया के कोने में तो भेज देते हैं और फिर वे वहां की विषम परिस्थितियों से किस तरह जूझती हैं, यह तो वही जानती हैं। उन्हें दोष देने से कोई लाभ नहीं है।’ फिर मैंने उन तीनों लड़कियों के बारे में उन्हें बताया जो मुझे बैंगलोर आते समय ट्रेन में मिली थीं।

वे निरुत्तर हो गए।

दरअसल हम हर क़दम पर दोहरेपन को जीते हैं। अपना लाभ हमें वैधानिक लगता है, अपनी सफलता हमें न्यायोचित लगती है और अपना जीवन हमें सामाजिक लगता है। इसके विपरीत दूसरे का लाभ, दूसरे की सफलता और दूसरे का जीवन दोषपूर्ण दिखाई देता है।

समाज के इसी दोहरेपन के कारण हमें बार-बार घर बदलने पड़ रहे थे। लोगों को स्वयं से अधिक हमसे सरोकार था।

नए घर में अपना सामान जमाने के बाद हमने अपने कुछ मित्रों को रात्रि-भोजन पर आमंत्रित किया। वे हमारे साझा मित्र थे और हमारी जीवन शैली के हिमायती भी। उनमें से एक था शिविर। कुछ विचित्र-सा नाम लेकिन इंसान बहुत अच्छा। बहुत हंसमुख।

‘कभी रितिक को छोड़ कर मेरे पास आने का मन करे तो चली आना...सिर आंखों पर बिठाऊंगा।’ शिविर हंस कर मुझसे कहता। रितिक के सामने ही। उसके मन में मैल नहीं था। बस, उसे मजाक करना पसंद था। रितिक भी जानता था और मैं भी। ‘मैं तो इसी दिन की प्रतीक्षा कर रहा हूं। कम से कम दूसरी तो रख सकूंगा।’ रितिक उसके मजाक में साथ देता। मैं भी हंस देती। फिर भी मन के किसी कोने में ‘रख सकूंगा’ शब्दद्वय फांस की तरह चुभ जाते। मन करता कि उसी समय रितिक से पूछूं कि क्या तुमने मुझे ‘रखा’ है? क्या मैं तुम्हारी ‘रखैल’ हूं? किसी औरत को रखने का अर्थ भी जानते हो? क्या तुम्हें पता है कि ‘रखैल’ शब्द ‘रक्षित’ से बना है। रक्षिता यानी जिसकी रक्षा की गई हो.....क्या रितिक मेरी रक्षा कर सकता है, चुप रह जाती यह सोच कर कि हंसी-खुशी का माहौल बिगड़ जाएगा। दिव्या भी हमारी साझा मित्रा है। वह भी हमारी पार्टियों में खुल कर शामिल होती। हम मिलकर खाना पकाते। कुछ पका-पकाया बाजार से भी ले आते। फिर देर तक गप्पे मारते और खाते रहते। बारह, एक, दो....समय का कुछ पता ही नहीं चलता। हमारा नया मकान एक कॉलोनी में था। हमारा मकान मालिक वहां नहीं रहता था। हम स्वयं को स्वतंत्र अनुभव कर सकते थे। कुछ हद तक।

‘बर्थ डे पार्टी थी?’ हमारे नए मकान में हमारी पहली पार्टी के बाद अगली सुबह हमारी पड़ोसन ने मुझसे पूछा था।

‘नहीं, वैसे ही। हमने अपने कुछ मित्रों से वादा किया था डिनर देने का।’ मैंने अटकते हुए कहा। मुझे आशा नहीं थी कि यहां भी पूछताछ शुरू हो जाएगी। खैर, जिज्ञासा मानवीय प्रकृति है.....और दूसरों के मामले में टांग अड़ाना तो और भी ज्यादा ....यह सोच कर मैंने अपनी पड़ोसन की बात को गहराई से नहीं लिया।

‘आपके हस्बैंड किस दफ्तर में हैं?’ उसने मुझसे पूछा था। उत्तर देते हुए मैंने रितिक के दफ्तर का अता-पता तो बता दिया था किन्तु ‘वह मेरा हस्बैंड नहीं है’ नहीं कह सकी। वह पहली बार था कि मैंने हिचक महसूस की थी। उस दिन मैं अपने आपको दोषी मानती रही कि मैं सच को स्वीकार क्यों नहीं कर सकी मैं उस दिन रितिक  से नजरें नहीं मिला पा रही थी। वैसे यही कोई सप्ताह भर बाद मैंने स्वयं को दोष देना बंद कर दिया। क्योंकि मुझे पता चल गया था कि जो हिचक मैंने महसूस की भी, वह रितिक भी महसूस कर रहा था।

एक दिन मैंने रितिक से आग्रह किया कि चल कर सिविक सेंटर में चाट खाई जाए। जबलपुर में सिविक सेंटर नाम की जगह गोलाकार जगह है जहां तरह-तरह की दूकानें हैं। वहां पर ठेलों में बिकने वाले स्वादिष्ट चाट-समोसों का खान-पान प्रेमियों में अपना खास स्थान है।‘

मेरा चलना जरूरी है?’ रितिक ने पूछा था।

‘हां, चलो न!’ मैंने मनुहार किया था।

‘ये क्या पत्नियों वाली स्टाईल में बोल रही हो, पहले तो तुम अकेली भी चली जाती थीं।’ रितिक ने मुझे ताना मारा था। फिर राजी हो गए था, साथ चलने के लिए।

मुझे गंजीपुरा भी जाना था। कुछ रुमाल और कुछ अंतःवस्त्र लेने थे। गंजीपुरा मूलतः महिला-सामग्रियों का ही बाज़ार है। मैंने सोचा था कि रितिक को किताबों की दूकान पर छोड़ कर मैं गंजीपुरा की गली में घुस जाऊंगी और जल्दी से सामान लेकर वापस आ जाऊंगी। फिर हम सिविक सेंटर चलेंगे। मगर रितिक का ताना सुन कर मैंने गंजीपुरा जाने का इरादा रद्द कर दिया।

हम सीधे सिविक सेंटर पहुंचे थे। हम वहां एक दूकान पर चाट-समोसे खा ही रहे थे कि रितिक का एक सहकर्मी अपनी पत्नी और नन्हीं बच्ची के साथ वहां आ टपका था। वह अपनी पत्नी को चाट खिलाने लाया था।

‘अरे वाह! आज तो भाभी जी भी साथ हैं! चलिए यहां मुलाकात हो गई वरना ये महाशय तो आपसे कभी मिलवाते ही नहीं!’ रितिक के उस सहकर्मी ने बिना झिझक मुझे संबोधित करते हुए था।

‘अब तो मिल लिए।’कहते समय रितिक के चेहरे पर सामान्य मुस्कुराहट थी। मैंने पाया कि न तो रितिक ने मुझे ‘भाभी जी’ संबोधित किए जाने पर आपत्ति की और न ही स्पष्ट किया कि ये मेरी पत्नी नहीं है। ठीक वही झिझक जो मैंने हमारी पड़ोसन के पूछने पर महसूस की थी।

सिविक सेंटर से लौटते समय मैं यही सोचती रही कि हम जो जीवन जी रहे हैं? उसके बारे में अपने मुंह से, अपनी आवाज में स्वीकार करने से झिझकने क्यों लगे हैं? कहां खोती जा रही है हमारी दृढ़ता?

‘कितनी प्यारी बच्ची है शर्मा की!’ रितिक ने अपने सहकर्मी की बेटी की तारीफ की थी। उस पल मेरे मन में विचार आया था कि क्या रितिक भी पिता बनना चाहता है?

‘आज से परिवार बढ़ाने के बारे में कोशिश शुरू की जाए क्या?’ संकोच त्याग कर मैंने रितिक को छेड़ा था।

‘कैसा परिवार? हमने तो तय किया हुआ है न कि हम बच्चे पैदा नहीं करेंगे!’ रितिक ने मुझे याद दिलाया था।

‘तय किया था, लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि कभी नहीं करेंगे! जब हम साथ-साथ रह रहे हैं....जस्ट लाईक मैरिड कपल....तो हम बच्चे पैदा क्यों नहीं कर सकते?’ मैंने पूछा था।

‘ठीक है, यदि तुम्हें आपत्ति न हो तो हम बच्चे पैदा कर सकते हैं।’ रितिक ने कहा था।

‘मुझे भला क्यों आपत्ति होगी? हर औरत जीवन साथी और बच्चे चाहती है।’ मैंने हैरत भर कर पूछा था।

‘जीवन साथी नहीं, पति। हर औरत पति चाहती है...जिससे वह बच्चे पैदा कर सके और अपने बच्चों को उसका नाम दे सके।’ रितिक ने कहा था। रितिक के स्वर में कड़वाहट थी। शायद वह अपने सहकर्मी की सुन्दर गुडि़या-सी बेटी देख कर विचलित हो गया था। रितिक को क्या पता कि मैं अपनी महिला सहकर्मियों के मुंह से उनके बच्चों की चर्चा सुन-सुन कर न जाने कितनी बार विचलित हुई हूं। हर बार मेरे मन में विचार आया है कि यदि हम साथ-साथ रह रहे हैं, शारीरिक संबंध भी नियमित रूप से स्थापित करते हैं तो फिर बच्चे पैदा करने के बारे में क्यों नहीं सोचते हैं,  ऐसे पलों में मुझे अपनी हिन्दी प्राध्यापिका लता पांडे की याद आ जाती। लता पांडे ने कवि रसखान की श्रृंगारिक अभिव्यक्ति में डॉक्टरेट की उपाधि हासिल की थी। उनकी थीसिस उनके मार्गदर्शक चतुर्वेदी जी ने ‘डिक्टेट’ की थी। लता पांडे की योग्यता औसत थी किन्तु महत्वाकांक्षा उच्च थी। वे विश्वविद्यालय में प्राध्यापक बनना चाहती थीं, सो बन गईं। चतुर्वेदी जी एक अदद प्रेयसी चाहते थे जो उन्हें लता पांडे के रूप में मिल गई। मियां-बीवी राजी तो क्या करेगा काजी चतुर्वेदी जी और लता पांडे देर रात तक साथ रहते और फिर चतुर्वेदी जी अपने घर लौट जाया करते। चतुर्वेदी जी चतुर थे। वे प्रेमिका का प्रेमरस भी ले रहे थे और अपने परिवार से भी जुड़े थे। दो नावों में सवार, फिर भी सुरक्षित। पुरुष जो थे। इसके विपरीत लता पांडे से उनकी अपेक्षा थी कि वह मात्र उनके प्रति समर्पिता रहें। इधर-उधर ताके-झाकें भी नहीं। वे समर्पिता ही निकलीं। कुछ वर्षों बाद दोनों में अलगाव हो गया। कारण इतना ही था कि चतुर्वेदी जी को एक नई छात्रा भा गई थी। वे उससे मिलने का अड्डे के रूप में लता पांडे का घर इस्तेमाल करना चाहते थे। लता पांडे ने प्रतिवाद किया। परिणामस्वरूप दोनों के संबंध टूट गए। मामला कुछ-कुछ मेरे पापा जैसा था किन्तु अन्तर यही था कि चतुर्वेदी जी अपनी पत्नी से और उनकी पत्नी उनसे निभाती रहीं। दोनों में अलगाव नहीं हुआ। जहां तक लता पांडे का प्रश्न है तो लोग उनके लिए भी यही कहते रहे कि ‘लता जी का क्या! चतुर्वेदी जी नहीं तो कोई और....तू नहीं और सही, और नहीं, और सही’। स्त्रियों के लिए ये उक्ति बड़ी सहजता से दे दी जाती है जबकि स्त्रियों के लिए प्रेम का पात्र बार-बार बदलना संभव नहीं होता है। देह-पात्र बदल सकते हैं, नेह-पात्र नहीं।

इस घटना के बाद चतुर्वेदी जी तो अपनी नई प्रेमिका और अपने पुराने परिवार में डूब गए लेकिन लता पांडे एकदम अकेली पड़ गईं। यदि वे विवाहित, किसी बच्चे की मां बनने के बाद परितक्त्या होतीं तो शायद वे अपने बच्चे के सहारे जी लेतीं। लेकिन वे चतुर्वेदी जी की विधिवत कुछ भी नहीं थीं। उन्होंने गर्भपात तो कई बार कराया किन्तु बच्चे को जन्म एक बार भी नहीं दे सकी थीं। किसी की प्रेयसी बन कर उसके साथ जीवन व्यतीत करने का साहस उनमें था लेकिन अविवाहिता मां बनने का साहस नहीं था। चतुर्वेदी जी भी उन्हें यौन-सुख देते हुए समस्त कानाफूसी झेलते रहे लेकिन मातृत्व का सुख देने का साहस नहीं जुटा सके। उनके अपने बेटे-बेटियां थीं। इसलिए उन्हें कभी कोई कमी नहीं खली। जबकि लता पांडे अपनी इस कमी के पक्ष में कमर कस कर खड़ी न हो सकीं। वे चतुर्वेदी जी से अलग होने के बाद घोर अवसाद की शिकार हो गईं।

Publisher: नई दिल्ली सामयिक प्रकाशन 2012
Description: 208पृ. 22 सेमी (सजिल्द).
ISBN: 9788171382538.
मूल्य : Rs.300/-

लता पांडे की याद आते ही मुझे घबराहट होने लगती है। क्या मैं भी इसी भविष्य की ओर बढ़ रही हूं? या फिर मुझमें साहस है कि मैं रितिक से मातृत्व का अपना अधिकार पा सकूं..........मैं स्वयं से प्रश्न करने लगती। फिर लगता कि सिर्फ अपने भविष्य को सुरक्षित बनाने के उद्देश्य से एक बच्चे को जन्म देना और उसे अविवाहिता मां की संतान के रूप में इस समाज रूपी जंगल में समाज के ठेकेदारों रूपी खूंखार पशुओं के बीच जीने को विवश करना क्या उचित होगा? मुझे पता नहीं कि रितिक ने इस तरह सोचा था या नहो, लेकिन मैंने कई बार ये सब सोचा है। जब कभी मुझे लगता कि हम विवाह के बिना साथ रहने योग्य मानसिकता में तो आते जा रहे हैं लेकिन साथ रहते हुए बच्चे पैदा करने की मानसिकता अभी कोसों दूर है, तो मैं भ्रमित होने लगती कि हम सामाजिक प्रगति के अभी किस आयाम में हैं, ठीक वैसे ही जैसे कोई जीना चाहता हो लेकिन सांस लेने से डरता हो।


होमशॉप 18 मू० 246/-
मैंने कहीं पढ़ा था कि फ्रांसीसी लेखिका सीमोन द बोउवार ने औरत की स्वतंत्रता की खोज में अपना सारा जीवन बिता दिया। वह अपने प्रेमी के साथ रही। उसने अपने प्रेमी ज्यां पाल सार्त्र का विवाह प्रस्ताव ठुकराया और फिर भी साथ रही। वह दूसरे पुरुष की ओर भी आकर्षित हुई, उसने दूसरे पुरुष से प्रेम भी किया, फिर भी सार्त्र के साथ रही। क्या मैं ऐसा कर सकती हूं? नहीं! रितिक सहन नहीं कर सकेगा। बोउवार ने ठीक कहा था कि औरत को यदि स्वतंत्रता चाहिए तो उसे पुरुष की रुष्टता को अनदेखा करना ही होगा। मेरे लिए कठिन रहा है ऐसा कर पाना। भले ही मैंने रितिक के साथ विवाह करने की आकांक्षा नहीं पाली। हमारे भारतीय परिवेश में, हमारे मन-मस्तिष्क में परम्पराएं इस तरह ठूंस-ठूंस कर भर दी जाती हैं कि उनमें भले-बुरे को छांटने की कला हम भूल चुके होते हैं। यहां बंद दरवाजों के पीछे बनने वाले प्रतिकूल रिश्ते मान्य होते हैं, खुली सड़क पर बनने वाले अनुकूल रिश्ते नहीं।



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