समय के सीने पर नैतिकता -प्रेम भारद्वाज

हम सोचते बहुत हैं मगर महसूस बहुत कम करते हैं।  - चार्ली चैप्लिन

(एक नहीं हुई गोष्ठी की संक्षिप्त रपट। वक्ताओं के चेहरे नहीं थे, उन्होंने मुखौटा पहन रखा था। इसलिए उन्हें नया नाम दिया गया, लेकिन उनकी आवाज ही पहचान है।)

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संचालक : इस ‘काल भवन’ में मौजूद और नामौजूद लोगों का स्वागत है। अमूमन हम दुनिया, समाज, राजनीति, देश, ग्रह-नक्षत्रों की बातें करने के आदी रहे हैं। घर उपेक्षित रह जाता है। अगले दो घंटे हम घर को समझने की कोशिश करेंगे जो हकीकत में वैसा नहीं है, जैसा हम समझते रहे हैं। घर का मतलब वह ‘समय’ जिसमें हम रहते हैं। अलग-अलग, अपने-अपने कमरों में। छोटा कमरा, बड़ा कमरा। कमरे सीलन भरे, हवादार, घुटनदार, वातानुकूलित। तरह-तरह के कमरे। किस्म-किस्म के लोग। जाहिर है उनके ख्यालात जुदा, कलेवर और तेवर भी। यह घर शाश्वत है। उसमें बसर करने वाले क्षणभंगुर। कुछ लोग सुविधा के लिए उसे ‘सराय’ या ‘मुसाफिरखाना’ कह सकते हैं, मगर मुझे इनमें अलगाव का बोध होता है। घर में अपनेपन का। भले ही वह एक तयशुदा वक्त के लिए ही क्यों न हो। इससे पहले कि मैं प्रथम वक्ता को बुलाऊं, चूंकि इस घर में मैं खुद भी रहता हूं लिहाजा कुछ बातें मेरे अपने घर यानी इस समय के बारे में अर्ज करने की इजाजत चाहता हूं।

एक समय में रहते हुए भी हम अलग-अलग समय में जीने को अभिशप्त हैं। मिशेल फूको जिस समय को मनोरोगी और विक्षिप्त मानते हैं, मुझे भी कभी उसका चेहरा नहीं दिखाई पड़ता। चेहरा होगा, मगर मैं उसे देख नहीं पाता तो यह मेरी दृष्टि की हद है। मैं उसे जानता हूं। मगर नहीं जानता। अपने समय में प्रवेश करने का रास्ता खुद के भीतर से होकर ही जाता है। लेकिन सवाल है कि जिस समय और जीवन को मैं जी रहा हूं, क्या वास्तव में वह मेरा ही जीवन और समय है या बच्चन के शब्दों में, ‘समय मुझको नष्ट करता/ मैं समय को बर्बाद करता।’ क्या मामला एक दूसरे को नष्ट और बर्बाद करने का है अथवा सब कुछ को गहरे महसूस करने का भी है। शमशेर ने इसे समझा था, ‘मेरी पीठ को खुरचते/ समय के बारीक तार।’ यह समय है क्या? यह प्रश्न फुंफकार मारता है। ‘शायद’ की गुफा में वह फुंफकार धीरे-धीरे मद्धम और शांत हो जाती है। ‘शायद’ यह विपर्यय का समय है और विचलन का युग है। यह स्वार्थी, भोगवादी और लंपट समय है जहां हम खुश और व्यथित एक साथ हैं। मंगलेश डबराल भी इस सवाल के साथ चिंताग्रस्त हैं, ‘क्या यह ऐसा समय है जब मनुष्य की निजी नैतिकता एक सार्वकालिक मानवीय राजनीति का लगभग पर्याय बनती जा रही है?’

दरअसल, टाइम कैप्सूल में फंसे हम जीते कम, जूझते ज्यादा हैं। भय से घबराकर भोग करते हैं। और भोगकर, भय से भर जाते हैं। एक अनजाना भय हमारी नसों में रक्त के साथ निरंतर प्रवाहित होता रहता है, जो दिखता तो नहीं मगर रहता है हमेशा ही हमारे भीतर। हम दीवार पर टंगे ठाकुर प्रसाद, भगवान, खुदा, जीसस, रमणीक दृश्यों वाले या विजय माल्या के मॉडलों का कोई उत्तेजक कैलेंडर भर हैं। पन्ने पलटते जाते हैं, समय बीतता जाता है... एक दिन हमारी उपयोगिता खत्म हो जाती है। तब हमें दीवार से हटाकर फेंक दिया जाता है। कैलेंडर बदल जाता है। दीवार यथावत रहती है। समय दीवार है। हम उसमें टंगे कैलेंडर। न दीवार के साथ चिपके रहने के बावजूद कैलेंडर दीवार को समझ पाता है। न हम समय में रहते हुए भी समय को। दीवार और कैलेंडर के बीच नैतिकता वह तस्वीर है जो कैलेंडर में तिथियों के ऊपर रहती है और उसे हम दीवार या घर में होना भी मान लेते हैं। नैतिकता और अच्छा-बुरा, बहुत कुछ इस पर निर्भर करता है कि वह दीवार कहां की है, कब की है, उसमें टंगा कैलेंडर किसका है। फिर भी सवाल तो बनता ही है कि शर्लिन-सनी की तस्वीर अनैतिक और धर्म की पोशाक में राधा-कृष्ण का विवाहेतर प्रेम नैतिक ही नहीं, पूज्यनीय क्यों हो जाता है?

एक ही समय में अनगिनत आवाजें। असंख्य चेहरे। कोलाज में तब्दील हो गए समय में मुकम्मल कुछ भी नहीं। ‘होना’ कम है, ‘होने’ का भ्रम अधिक। असली की छाती पर बैठ नकली। दिल को अपनी चालाकियों के तीर से आर-पार करता दिमाग। समय और सत्ता की युगलबंदी से उभरे इस नए राग को बहुत गौर से सुनता है... तमाम तरह की ध्वनियों, आरोहों-अवरोहों के बीच प्रेम की ध्वनि को सुनने की कोशिश करता हूं जो दब गई है एक कमजोर की चीख से। ठीक उसी वक्त रघुवीर सहाय की कविता पंक्ति याद आती है, ‘एक और ही युग होगा/जिसमें ताकत ही ताकत होगी/चीख न होगी।’ शक्ति शोषण के लिबास में है। मालूम होता है सत्ता के आगे समय ने घुटने टेक दिए हैं... इसलिए चीखें तो लगातार जारी हैं। मगर वे किसी को सुनाई नहीं दे रहीं... हम उसे सुनना नहीं चाहते... सुनने की बजाए हर कोई कुछ न कुछ ‘बताना’ चाहता है।

नैतिकता हर युग में अपनी केंचुल बदलती रही है। नीत्शे ने ‘लिजलिजी भावुकता से भरी ईसाईयत और उसकी नैतिकता’ को चुनौती दी थी। उसने नैतिकता की तमाम प्रचलित अवधारणाओं को खारिज करते हुए खुद को अनैतिक घोषित किया था। वह मानता था कि मनुष्य जीवन की सार्थकता नैतिक और अनैतिक के परे जाने की सामर्थ्य अर्जित करने में है।
इस भटके हुए समय में नैतिकता एक अर्द्धविक्षिप्त वृद्ध है जिसकी कोई नहीं सुनता। लोग उसे पत्थर मारते हैं। चोटें देते हैं। लहूलुहान करते हैं। मगर बूढ़े की अपनी जिद है कि यह समय, यह दुनिया वैसी नहीं, ऐसी क्यों है?

‘ऐसी’ और ‘वैसी’ दुनिया के फंदे में फंसी नैतिकता और समय के साथ उसके नाभिनाल रिश्ते को आने वाले वक्ता परिभाषित करेंगे। उनके अपने विचार होंगे। यहां अपने विचारों को रखने की पूरी आजादी है चाहे वे किसी भी रंग-ढंग के क्यों न हों? मैं सबसे पहले कलावंद जी को आमंत्रित करता हूं।

कलावंद : सुकरात ने अपने समय को ‘पतन का युग’ कहा था। मैं भी अपने समय को गरिमाहीन मानता हूं। समय अपने स्वभाव में सृजन-विरोधी होता है। हर अच्छी रचना अपने गलीज समय का विद्रोह है, अगर नहीं है तो उसे होना चाहिए। असल में यह स्वांग रचकर खुद को महान बनाने और सफल होने का समय है। आज भी कोई इंद्र अपनी तपस्या को सफल बनाने के लिए किसी दधीचि की अस्थियां पाना चाहता है। वह दधीचि की खुद हत्या नहीं करता। लेकिन उनकी हत्या हो जाती है। उनकी हत्या न कर उनसे मृत्यु का दान मांग लिया जाता है। दधीचि मारे जाते हैं, उनकी अस्थियां मिल जाती हैं। तपस्या (सत्ता) सफल। इंद्र हत्या करके भी हत्यारे होने से बच जाते हैं। यह सिलसिला आज भी जारी है। मस्जिद ढहा दी जाती है राम के नाम पर, सिखों का कत्लेआम होता है भावनाओं के नाम पर, दंगों में हजारों लोगों की हत्या होती है, हम जानते हैं हत्यारा हुक्मरान ही है। लेकिन सत्ता के सुरक्षा कवच की बदौलत वह हत्यारा होने से बच जाता है। होंगे समय के दामन में संवेदनशीलता के तिल बुरी नजर से बचाने के लिए। मगर मुझे तो वह हर दौर में संहारक ही नजर आता है जो अपने खिलाफ चीत्कारने वालों को मिटा देता है, कभी संहार से तो कभी स्वांग से। मैं मानता हूं कि प्रेम से नैतिक दुनिया में कोई भी चीज नहीं। प्रेम और सेक्स दोनों अलग चीजें हैं। सेक्स घटिया शब्द है। इसकी जगह देह शब्द होना चाहिए। अनैतिक तो जीवन में कुछ भी नहीं होता। समाज और धर्म दोनों फ्रॉड हैं। मैं समाज के साथ-साथ धर्म और राज्यसत्ता को सिरे से खारिज करता हूं।

संचालक : आपने देखा, कलावंद जी ने किस तरह नैतिकता के परखच्चे उड़ा दिए। दरअसल कलावंद जी जीवन में किसी भी बंधन को नहीं मानते। बंधन कहीं न कहीं मनुष्य की स्वतंत्रता को (अराजकता को नहीं) बाधित करते हैं। दास्तोएवस्की ने कहा था, ‘उन्नीसवीं सदी का आदमी नैतिक रूप से चरित्रहीन होने के लिए अभिशप्त होगा।’ वह आदमी आज इक्कीसवीं सदी में किस हाल में है। क्या हम चरम अनैतिक समय में जी रहे हैं। ‘समरथ को नाही दोष गोसाई’ में क्या तुलसीदास दोष को ‘अनैतिकता’ का पयार्य मान रहे थे। इसी बात को एअन रेंड के लिखित फिल्म ‘फाउंटेन हेड’ का एक पात्र कहता है, ‘असाधारण प्रतिभा पर नैतिकता के सामान्य नियम लागू नहीं होते।’ 


खैर अगली वक्ता प्रार्थना किरण एक प्रतिभाशाली युवा पत्रकार-लेखिका हैं। वे बताएंगी उनके समय में नैतिकता कहां है, है भी या नहीं। खैर अब बात को आगे बढ़ाने के लिए मैं रघुवीर चौधरी को बुलाता हूं जो एक मीडिया चैनल के हेड हैं। समय की गजालत को देखना है तो हम मीडिया को देख सकते हैं।

रघुवीर चौधरी : जो दिखता है, वह बिकता है। जुमला वर्तमान समय का एक सच है। अब मीडिया पूंजी, बाजार और मुनाफे के गणित से चलता है। हम मुनाफे के सहारा में संवेदना के पोखर और सरोकार की झील ढूंढ़ने निकले हैं तो यह हमारी गलती है, हालांकि इसे मूर्खता कहना चाहिए। इस देश के सबसे बड़े मीडिया घराने के मालिक कह चुके हैं, ‘अगर मुनाफे का नब्बे फीसदी हिस्सा विज्ञापन से आता है तो मतलब साफ है कि आप विज्ञापन के धंधे में हैं।’ पत्रकारिता अब मिशन नहीं, धंधा है। रोजी-रोटी और मुनाफा कमाने का जरिया है। खबर उत्पाद है, मनोरंजन भी। ऐसा नहीं है कि मीडिया बदल गया है, हुआ यह है कि मीडिया का अब चरित्र बदल गया है, इसे हमें स्वीकार कर लेना चाहिए।

संचालक : चरित्र मीडिया का ही नहीं, समय और समाज का भी बदला है। समय कम है। इसलिए आगे के वक्ताओं से निवेदन है कि वे संक्षेप में अपने विचारों को सिर्फ सूत्र वाक्य में रखें। अगले वक्ता हैं इस देश के सबसे बड़े धर्मगुरु श्याम सारस्वत।

श्याम सारस्वत : काल तो अनंत है उसे कौन जान और समझ पाया है। समझना तो हमें खुद ही होगा। समझाने का काम गुरु करते हैं, लेकिन अब लोगों में आस्था कम हो रही है। मंदिरों में भीड़ बढ़ रही हैं मगर आस्था की बजाए लोभ और लालच बढ़ रहा है। गुरु, ईश्वर और धर्म के विरुद्ध बोलना तो दूर कुछ सोचना भी अनैतिक और पाप है।

संचालक : विज्ञान के लिए प्रमाण ही महत्वपूर्ण है, बाकी बेमानी। यह संगोष्ठी एक वैज्ञानिक की राय के बगैर अधूरी रहेगी। हमारे अगले वक्ता वैज्ञानिक दुलाराम वाल्मीकि हैं जो तमाम काबिलियत के बावजूद भारतीय और दलित होने की वजह से नोबेल के लिए नाकाबिल मान लिए गए।

दुलाराम वाल्मीकि : इस देश में दलित के लिए सम्मान के साथ जीना एक असंभव की चाह है, फिर वैज्ञानिक बनना अथवा कोई सत्ता हासिल करना मंगल ग्रह को जेब में डालने जैसा है। मैं नहीं मानता कि विज्ञान से नैतिक और अनैतिक का कोई लेना-देना नहीं है। विज्ञान की खोजों फार्मूलों का सीधा वास्ता बेशक नैतिकता से नहीं है, मगर है। गैलिलियो की खोज नैतिक थी जिसे उस जमाने में अनैतिक मानकर उसे सजा दी गई। परमाणु बम का अविष्कार अनैतिक था या अमेरिका का वह उन्माद जिसने जापान के हिरोशिमा और नागासाकी को नेस्तनाबूद कर लाखों लोगों की जानें लीं। एके-47 की ईजाद अनैतिक है या इसके जरिए लाशों का ढेर बिछाना। इसी देश के महान गणितज्ञ वशिष्ठ नारायण सिंह का राष्ट्रप्रेम अनैतिक है या इस राष्ट्र का वह माहौल जिसमें वे पागल हो जाते हैं। आज भी वे अपने गांव में कागज पर फार्मूला गढ़ते रहते हैं। विज्ञान की नई खोजों क्लोन और सेरोगेट मदर ने नैतिकता को कटघरे में खड़ा कर दिया है। एक अधेड़ औरत अपने दामाद के वीर्य को धारण कर जब बच्चे को जन्म देती है, तब भारत में नैतिकता अपनी परिभाषा से बाहर आने के लिए छटपटाती है।

संचालक : और अब बच्चा सिंह।

बच्चा सिंह : यह देश बुद्ध और वाल्मीकि का है। यहां डाकू वाल्मीकि बन रामायण रचता है और युवराज गौतम निर्वाण के बाद बौद्ध भिक्षु बन जाता है। फिर मेरे लेखक बनने पर लोगों को क्यों मिर्ची लग रही है। इसे अनैतिक क्यों माना जा रहा है। लोग मुझे अपराधी कहते हैं। पहले मुझे राजनीति में आने से रोका गया और अब लेखक बनने पर सवाल खड़ा किया जा रहा है कि इस किताब का मूल लेखक कौन है?

एक औरत दर्शक दीर्घा से : यह दर्द तो हम औरतों का भी है कि हम औरतों के लेखन को पुरुष-सत्ता की मानसिकता से ग्रस्त लेखक शक की नजर से देखते हैं।

संचालक : इससे पहले कि यह गोष्ठी अराजकता की जद में चली जाए। मैं आखिरी वक्ता के रूप में आमंत्रित करता हूं उन्हें जो राजेश जोशी की कविता के ‘इत्यादि’ हैं, रघुवीर सहाय के ‘रामदास’ हैं, उदय प्रकाश की कहानी के ‘टेपचू’ हैं, अमरकांत की कहानी ‘जिदंगी और जोंक’ के कलुआ हैं। करुणा, उपेक्षा और आक्रोश को मिला दिया जाए तो उस रसायन से तैयार है इनका चेहरा। इनका कोई नाम नहीं है, हो भी नहीं सकता... उन्होंने इतना पढ़ा कि पागल हो 
गए... इतना पिछड़ गए कि अंधेरा हो गए... अब आगे उनकी उखड़ी, तीखी, बेतरतीब बातें... समझने में थोड़ा श्रम लग सकता है... मगर इनकी बातों में जमाने की तल्ख सच्चाई है।

इत्यादि : शायद मेरा भी ‘मैं’ है... और जो है उसमें ‘मैं’ तलाश रहा हूं। अभी तक जो बातें यहां हुई हैं, वही समय-समग्र नहीं है... हालांकि समग्रता का भाव एक भ्रम के अलावा कुछ भी नहीं। वातानुकूलित सभाकक्षों में बैठकर जो दिखता है, उसके अलावा ‘है’ का दायरा बहुत बड़ा है, मसलन भूख है, गरीबी है, अभाव है, शोषण है, नस्लवाद है, भ्रष्टाचार है, मक्कारी है, कला है। इरोम शर्मिला है, मेधा पाटेकर है। वियतनाम, इराक, अफगानिस्तान, गाजापट्टी, दक्षिण अफ्रीका, सूडान है। इसके बाद भी निर्भया है, निठारी है, जेसिका लाल है। अमेरिकी दादागीरी, कश्मीर की पीर, नरेंद्र मोदी की बर्बरता है। मैं भूखा हूं और कमजोर भी। मैं समय के हाशिए पर क्यों धकेल दिया गया हूं... और यहां से भी मुझे मिटाने की साजिशें क्यों जारी हैं, नहीं समझ पाता। मेरे लिए नैतिकता का मतलब एक गोल रोटी, कटोरी भर दाल, चुटकी भर नमक है। मैं आदमी नहीं वर्तमान समय का ‘अकाल’ हूं। कबीर हूं जो अपने घर को जलाने का सनक भरा साहस रखता हूं। वर्तनी के नियमों और व्याकरण के सहारे सच नहीं बोला जाता। अलबत्ता उसके लिए जान को जोखिम में डालने का दुस्साहस चाहिए। पागलपन भी। मैं समझ नहीं पाता कि अगर कोई गरीब सोने की पाई हुई चेन लौटाता है तो यह उसकी नैतिकता है या मूर्खता। मेरे हिस्से के समय को किसी ने अपहरण कर लिया है, मुझे उसका चेहरा साफ नजर नहीं आता। मुझे मेरे हिस्से का समय चाहिए... क्या मेरी कोई मदद कर सकता है।

मौजूदा समय ही क्या, यह पूरा देश ही मुझे अपहरणकर्ता नजर आता है... इस देश में जो हो रहा है वह समझ नहीं पा रहा हूं। इसलिए मिसफिट हूं, मैं नहीं समझ पा रहा हूं कि कलाएं अपने चरम पर जाकर अश्लील क्यों हो जा रही हैं? अंतरिक्ष की नामालूम गली में ‘प्रेम’ किसे ढूंढ़ रहा है? अनाज के बदले गुलाब और हथियारों के जखीरे या कंक्रीट के जंगल उगाने के वास्ते जमीनें क्यों खरीदी जा रही हैं। हमें इंसान से रोबोट या कठपुतलियों में कौन तब्दील कर रहा है... वह अदृश्य शक्ति कौन है जो हमें हांक रही है... क्यों हर नगर, कस्बे और चौराहे पर हत्यारे को आदर देती अभिनंदन सभाएं हो रही हैं...। कंगन के लिए हाथ काटे जा रहे हैं, दर्शन के लिए आंखें निकाल ली जा रही हैं... यहां ‘है’ बहुत भयावह है... वह कौन है जो अंधेरे के बदन को भी लगातार छील रहा है... वॉन गॉग कहा करते थे, ‘दुनिया में काम करने के लिए आदमी को अपने भीतर ही मरना पड़ता है। आदमी इस दुनिया में सिर्फ खुश होने के लिए नहीं आया है... वह पूरी मानवता के लिए महान चीजें बनाने के लिए आया है।’ मुझे तो सूरज के ताप से बचकर चांद को निहारना भी अनैतिक लगता है।

संचालक : जरूरी नहीं कि हर बात किसी निष्कर्ष पर पहुंचे। जीवन का भी अर्थ कहीं पहुंचने में नहीं, चलते रहने और उसे जीने में है। मौजूदा समय में ज्यादा लोग रोटी जुटाने के लिए नहीं, बल्कि सुविधाओं का ढेर खड़ा करने और सहसा धूमकेतु की तरह मशहूर हो जाने के लिए तिकता की लक्ष्मण रेखा लांघ रहे हैं। ग्लैमर का गिलास थामकर भीड़ के समक्ष हर कोई अपने दंभ को छलकाने की खातिर आतुर है। मशहूर होने के क्रम में मानवीयता लहूलुहान है। बावजूद इसके मैं मानता हूं कि नैतिकता एक आवरण है, मुखौटा शायद सही शब्द है। नैतिकता का कोई चरम बिंदु नहीं होता और वह अंतिम मूल्य भी नहीं है। हमारे पतन की वजह अनैतिकता से ज्यादा संवेदनहीनता है। एक संवेदनशील व्यक्ति अमूमन अनैतिक नहीं हो सकता, मगर इसके भी अपवाद हैं। अनैतिक तो मर्यादा पुरुषोत्तम राम भी हुए जब उन्होंने छिपकर छल से बालि को मारा। सीता की अग्नि परीक्षा ली, गर्भवती अवस्था में उन्हें घर से निकाला। पूरी तरह से नैतिक तो कृष्ण को भी नहीं ठहराया जा सकता जिन्होंने महाभारत रचा, फिर एक बड़े जनसंहार को मान्यता देने के लिए ‘गीता’ का प्रवचन दिया जो उनकी राजनीति का ही एक हिस्सा है। ‘गीता’ में सच से ज्यादा, कृष्ण की राजनीति है, हिंसा को जायज ठहराने का एक उदात्त तर्क। अंत में यही कहना चाहूंगा कि कोई भी अच्छी चीज पूरी तरह से अच्छी नहीं होती हैं, न बुरी चीज पूरी तरह से बुरी। दोनों जगह एक दूसरे की मौजूदगी की संभावना हमेशा बनी रहती है, यही बात नैतिकता पर भी लागू होती है। साहिर एक गंभीर बात बेहद सहज ढंग से कह गए हैं, ‘दुनिया की निगाहों में अच्छा क्या है, बुरा क्या/ यह बोझ अगर दिल से उतर जाए तो अच्छा...।’

'पाखी' फ़रवरी २०१४ से साभार
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