बुधवार, मार्च 12, 2014

चौं रे चम्पू, "सान्निध्य बनाम सहभागिता" —अशोक चक्रधर | Choun re Champoo - Ashok Chakradhar


चौं रे चम्पू 

सान्निध्य बनाम सहभागिता 

—अशोक चक्रधर

—चौं रे चम्पू! उड़ौ ई फिर रह्यौ ऐ? पिछले हफ्ता कहां-कहां डोलि आयौ?

—चचा, इस सप्ताह मुम्बई, रांची, जमशेदपुर, कोलकाता और गुवाहाटी गया। कल ही लौटा हूं। अब फिर से मुम्बई जाना है।

—ऐसौ का है गयौ कै घर में टिकै ई नायं? 

—चचा, मैं प्रायः कहता हूं कि कविसम्मेलन में जाने वाले कवियों के लिए ये फसल-कटाई के दिन हैं। आंधी के आम इसी दौरान टपकते हैं। एक-एक दिन के चार-चार निमंत्रण हैं। कहां जाओ, कहां मना करो, बड़ी दुविधा रहती है। ऊपर से लिखाई-पढ़ाई के काम भी रहते हैं। फ्लाइट में रहूं या रेल में, लगा रहता हूं अपने कम्प्यूटर पर लेखन के खेल में। होली के दौरान लोग रंगारंग-कार्यक्रम करते हैं, उत्सवधर्मिता रहती है। ये हमारे देश और पूरे भारतीय महाद्वीप का ही जलवा है कि कविता सुनने के लिए हज़ारों की संख्या में लोग एकत्रित होते हैं। मैं जाता रहता हूं। सिर्फ़ इसलिए नहीं कि पैसा मिलता है, बल्कि इसलिए भी कि सुनने वालों से निगाहें मिलती हैं। इधर, कविसम्मेलनों में फिर से जाना पसन्द करने लगा हूं।

—तौ बन्द चौं कियौ जानौ?

—बन्द नहीं, कम किया था। संस्थान और अकादमी के कार्यों में इतना व्यस्त रहता था कि आयोजकों से क्षमा मांगनी पड़ती थी। दिल्ली की हिन्दी अकादमी का उपाध्यक्ष रहकर मैंने सैकड़ों कार्यक्रमों को आयोजित करने-कराने में अपनी सकर्मक भूमिका निभाई। इतने कार्यक्रम हुए कि अख़बार में अपना नाम ‘सान्निध्य’ में देखकर अकुलाहट होने लगी थी। मैंने सचिव महोदय से अनुरोध किया कि मेरे नाम से पहले ‘सान्निध्य’ न छापा करें। फ़कत सान्निध्य-सुख पाने के लिए तो नहीं आता हूं। आपके साथ योजनाओं के बनाने, कार्यक्रमों को आयोजित कराने, आपके नाटकों, आपकी फिल्मों में अपना योगदान देने में लगा ही रहता हूं, इसलिए ‘सान्निध्य’ नहीं, ‘सहभागिता’ लिखा करिए। मेरी बात चल गई। निमंत्रण-पत्रों और विज्ञापनों मे वे ‘सहभागिता’ लिखवाने लगे। तीन-चार बार तो छपा, लेकिन मैंने फिर से निमंत्रण-पत्र में ‘सान्निध्य’ छपा देखा। मैंने सचिव महोदय से पूछा, ऐसा क्यों करने लगे? सचिव महोदय भी संवेदनशील लेखक हैं, उन्होंने कोई स्पष्ट उत्तर नहीं दिया, कहने लगे आप स्वयं समझ जाइए। मैंने कहा, मैं समझ गया।

—तू का समझौ हमैंऊ समझाय दै।

—चचा, मैं यह समझा कि दिल्ली सरकार की छः अकादमियां हैं, हिन्दी, उर्दू, संस्कृत, पंजाबी, सिंधी और भोजपुरी। इन सभी में उपाध्यक्षों का नाम सान्निध्य के रूप में ही छपता है। मुझे नहीं मालूम कि उनकी कितनी सहभागिता रही अथवा रहती होगी। उनसे यही उम्मीद की जाती है कि वे कार्यक्रमों में दीप-प्रज्जवलन करने, पुष्प गुच्छ लेने, प्रारम्भ में दो शब्द बोलने और कलाकारों के मनोबल-वर्धन के लिए शोभा-वर्धक बनकर कर आएं। मैं कोई दखलंदाजी तो नहीं करता था सचिवों के कामों में, लेकिन नाटक हों या साहित्य-संगोष्ठी, शास्त्रीय संगीत के कार्यक्रम हों या लोकवृन्द प्रस्तुतियां, लोकनृत्य हों या लोकनाट्य, अकादमी के लिए फिल्म-श्रृंखला का कार्य हो या मल्टी-मीडिया प्रस्तुतियां, लगा ही रहता था। पैसा किसी कार्य के लिए लेता नहीं था। लेता क्या, मिलता ही नहीं था। अकादमी ने एक सहायक दिया, वह इन कार्यक्रमों के सुचारु समायोजन के लिए सक्रिय रहता था। जितने कार्यक्रम हुए उनमें सिर्फ़ दो शब्द नहीं बोलता था। दो शब्द के नाम पर विषय प्रवर्तन से लेकर अंत में रोचक समीक्षा, अपने अंदाज़ में किया करता था। पुनः ‘सान्निध्य’ लिखे जाने ने यह संदेश दिया कि आप तो दीप जलाओ, पुष्पगुच्छ पाओ पर सहभागिता न बढ़ाओ। फिलहाल तो उस आई-गई सरकार के कारण मैंने त्याग-पत्र दे ही दिया। अब अच्छा रहेगा।

—अब अच्छौ चौं रहैगौ?

—अगर हिन्दी अकादमी वाले मुझे पहले की तरह कवि-लेखक के रूप में बुलाएंगे तो अब पहले की तरह ही पारिश्रमिक भी देंगे। पहले सिर्फ़ दो-ढाई हज़ार रुपए मिलते थे, मेरे कार्यकाल में सबका पारिश्रमिक बढ़ा है तो अब मुझे भी ज़्यादा मिलने लगेगा। मैं अपनी सहभागिता बन्द नहीं करूंगा। 

—और संस्थान कौ का भयौ?

—अरे, क्या मैंने आपको बताया नहीं? फरवरी में मेरा कार्यकाल पूरा हो रहा था। इन पदों के लिए मैंने न तो मानव संसाधन विकास मंत्री से कहा था, न दिल्ली की मुख्यमंत्री को कोई आवेदन दिया था। उन्होंने मेरा मनोनयन किया, मैंने स्वीकार किया। पद पर पुनः बने रहने की मेरी कामना संस्थान के अकर्मण्य रवैये के कारण समाप्त हो गई। वहां एक विज़न ट्वैंटी-ट्वैंटी देकर आया हूं। मुझे पूरी उम्मीद है कि नए उपाध्यक्ष डॉ. वाई. लक्ष्मी प्रसाद उस दिशा में, और अपने दृष्टिकोण के हिसाब से, कामकाज को आगे बढ़ाएंगे। मित्र हैं, आत्मीयता है उनसे, उम्मीदें हैं। बहरहाल मैं फिर से एक आज़ाद परिन्दा हूं। फेसबुक पर मेरे पेज को लाइक करने वाले निरंतर बढ़ रहे हैं। उनकी बढ़ती संख्या देखकर एक बच्चे की तरह ख़ुश होता हूं। आज एक लाख पांच हज़ार से ज़्यादा हैं। अपनी फ़ोटोग्राफ़ी के शौक को पूरा करता हूं और खींचे गए छाया-चित्र से जुड़ी हुई कवितानुमा पंक्तियां जोड़ता रहता हूं। आनन्द में कोई कमी नहीं है। तुमने बगीची में टेसू भिगो दिए होंगे, जिस दिन ठंडाई बनाओगे, उस दिन किसी कविसम्मेलन में नहीं जाऊंगा।  तुम्हारी बहूरानी का जन्म-दिन सत्रह को होली वाले दिन ही है, उस दिन रख लो। और अगले दिन भी क्यों जाऊंगा कहीं! भंग-भवानी कहां जाने देगी?

—भंग मिलायबौ बन्द कद्दियौ लल्ला! ठंडाई में मन की हुरियाई की हरियाली कौ उल्लास घोलौ जायगौ। सत्रह कू अइयौ जरूल!

अशोक चक्रधर
जे - 116, सरिता विहार, नई दिल्ली - 110076


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