मंगलवार, अप्रैल 22, 2014

अशोक चक्रधर - बी.एल.कपूर अस्पताल से Ashok Chakradhar from B L Kapoor Hospital

चौं रे चम्पू 


— अशोक चक्रधर


— चौं रे चम्पू! इत्ती बार मिलायौ, फोन चौं नाय उठावै?

— बेहोशी की हालत में कैसे उठाता चचा? मेरा ऑपरेशन चल रहा था। साल भर पहले साइकिल भिड़ंत के बाद घुटने की जो हड्डी तुड़ा ली थी, उसको डॉ. यश गुलाटी ने बड़े जतन से ऑपरेशन करके, तार बांधकर जोड़ दिया था। कुछ महीने तकलीफ़ में रहा, फिर चल निकला। फ़िज़ियोथैरेपी रंग लाई, कुछ तैराकी ने पैर को सक्रिय किया और कुछ नियमित टहलने से पैर ठीक हो गया। जनवरी में बेटा एक नई गाड़ी दिला गया। बहुत दिनों से नहीं चलाई नहीं थी, नई गाड़ी ने  स्वयं चलाने की ललक बढ़ा दी। बढ़िया चलती है। लेकिन दिल्ली की भीड़ भरी सड़कों पर जो दौड़ाई और अधिकांश वक्त क्लच पर जो पांव टिकाए रखा, उसने ये जलवा दिखाया कि जो पैर स्वस्थ महसूस करने लगा था, दर्दायमान हो उठा। डॉक्टर गुलाटी को दिखाया, एक्स-रे कराया तो पाया कि पटेला हड्डी पर लिपटे अन्दर के तार दो तीन जगह से टूट चुके हैं। यानी, अब इन्हें निकलवाना होगा। मैं भी चाहता था कि शरीर के अन्दर कोई विजातीय तत्व पड़ा है तो काहे को पड़ा रहे? डॉ. गुलाटी ने डाले थे, उन्हीं से निकलवाने थे। वे अपोलो छोड़ कर बीएलके अस्पताल आ गए तो इस वक़्त मैं भी बोल रहा हूं बी.एल. कपूर अस्पताल से। ओटी में चार-पांच डॉक्टर थे। सबके सब कविता-प्रेमी। मेरे अचानक एनैस्थीसित होने तक कवि-गोष्ठी जारी थी। बेहोशी और रिकवरी रूम से थोड़ी देर पहले ही निकल कर कक्ष में आया हूं। फोन खोला तो आपके मिस्ड कॉल देखे। सो मिला लिया और सुना दी रामकहानी।

— अबाज भर्राई भई ऐ तेरी। जादा मती बोल। कौन ऐं तेरे संग?
तार-पुरुष

— बागेश्री जी हैं, स्नेहा-डेविड हैं और राजीव जी हैं।

— निकर गए सिगरे तार?

— दो सेंटीमीटर का एक टुकड़ा रह गया है। रह गया तो रहा गया। आगे कष्ट देगा तो देखेंगे। बहुत से लोगों के शरीर में तो मोटी-मोटी रॉड्स पड़ी रहती हैं। धीरे-धीरे शांतिपूर्ण सहअस्तित्व कायम हो जाता है। अभी भी आधी सी बेहोशी है, आधा जाग रहा हूं। पता नहीं कहां-कहां के कैसे-कैसे सपने देख रहा था।

— कछू याद ऐं तोय?

— कहते हो जादा मती बोल अब ख़ुद ही बुलवा रहे हो। हां जो ताजा देखे हैं, वे याद हैं। मैं एवरेस्ट की चोटी पर ध्वजारोहण करना चाहता था। मुझसे थोड़ी ही दूरी पर एक पर्वतारोही दल था। अचानक बहुत तेज़ तूफ़ान आया। लोग बर्फ में उड़ने लगे। पूरा का पूरा दल पैराशूट्स से लैस हो गया। लेकिन पैराशूट्स मेड इन चाइना थे। फ़ट गए। फट गए तो सब फट-फट गिरने लगे। कुछ बर्फ़ में दब गए। झण्डा मैंने चोटी पर नहीं गाड़ा, जहां मैं खड़ा था वहीं गाड़ दिया और जुट गया उन्हें बचाने। सपने में पता नहीं मेरे अन्दर कौन सी ताकत थी कि तूफान मेरा कोई अहित नहीं कर पा रहा था और मैं उन्हें बचा रहा था। बहुत सारे लोग बचाए। फिर मैंने वहां बर्फ में ही कक्षा ली उनकी। पूरी तैयारी के साथ क्यों नहीं आते हो? विपदा-प्रबंधन पर मेरा भाषण चल रहा था। पता नहीं कहां से एक ब्लैक-बोर्ड आ गया जिसे बर्फ़ में टिकाने में कोई दिक़्क़त नहीं आई। मेरे अंदर भूतनाथ रिटर्न्स वाली ताकतें आ गईं थी। दिव्य-धवल कक्षा काफ़ी देर चली।

— सब छोरा ए कै छोरी?

— दोनों ही थे। पर मैंने ध्यान नहीं दिया कि कितने छात्र हैं कितनी छात्रा। विद्यार्थी तो विद्यार्थी हैं, उनमें लिंगभेद क्या करना? बहरहाल हैप्पी एंडिंग सपना था। अवचेतन में एक मुक्ति का सा अहसास था। दिल के तार थोड़े ही टूटे थे, जो परेशानी होती। ये तो घुटने के अन्दर के फालतू के तार थे। टूट गए, तो निकाल दिए गए। बात ये है चचा कि दिल के तार मजबूत रहें तो अच्छे सपने आते हैं। परेशानी तब होती है, जब दिल के तार टूटते हैं। शुभचिंतक सदा की तरह मेरे प्रति सजग रहते हैं, कष्ट नाम की चीज होने नहीं देते। मित्रों की शुभकामना से, सभी आत्मीयों के शुभचिंतन से पूर्ण होश में आ गया हूं। जल्दी चलता-फिरता दिखाई दूं और ग़मों को चलता-फिरता करूं, तमन्ना यही है।

Ashok Chakradhar from B L Kapoor Hospital

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