बुधवार, अप्रैल 09, 2014

किसके पास नहीं हैं द्रोणाचार्य —अशोक चक्रधर | Ashok Chakradhar on Suhash Joshi

चौं रे चम्पू

किसके पास नहीं हैं द्रोणाचार्य

— अशोक चक्रधर


— चौं रे चम्पू! उदैपुर ते सूधौ ई मुंबई चलौ गयौका?


द्रोणाचार्य ने एकलव्य को नहीं बनाया, एकलव्य ने बनाया था द्रोणाचार्य को। उसके पास तो बस एक कल्पना थी द्रोणाचार्य की।
— नहीं चचा, एक दिन के लिए दिल्ली रुका था। ये मुंबई भी अपनी गति से चलने वाली नगरी है। काम आते हैं तो बुलावे आते हैं, तत्काल चले आओ। चले आए। काम भी किए जाएंगे, पर कल शाम एक शानदार व्यक्ति से मुलाकात हुई।

— सानदार कूं सानदार ई मिल्यौ करैं हैं।

— मुझे अपनी तारीफ़ नहीं सुननी चचा! मुझे मिले थे, सुहास जोशी। मुम्बई आता हूं तो जुहू स्थित पृथ्वी थिएटर जाना बहुत अच्छा लगता है। ये जगह नाट्यकर्मियों के लिए ही नहीं, कला प्रेमियों और शास्त्रीय सौंदर्याभिरुचियां रखने वालों के लिए भी बड़े सुकून की जगह है। यहां की प्रकाश-व्यवस्था,अच्छा खाना, बैठने का साफ़सुथरा सलीका लुभाता है। यहां आने वाले लोग नामीगिरामी भी होते है, नवोदित भी। कोई हाय तौबा नहीं, सब धीमी आवाज़ में बतियाते हैं। ग्लैमर को वहां कोई परेशानी नहीं होती। क्रिएटिविटी यहां ग्लैमर की रक्षा करती है।रचनात्मक क्षमता रखने वालों के बीच अंतर्संवादहोते हैं। एक बरगद का पेड़ है जिसके तले अनुभवों का लेना-देना होता है। सुहास जोशी उसी पेड़ के नीचे बैठकर अठारह साल से बांसुरी बजा रहे हैं। जब भी यहां आता हूं, मेरा सौभाग्य है कि हर बार मैं उन्हें वहां देखता हूं। कल उनसे पहली बार बात करने का मन हुआ।

— तेरे बारे में पतौ ई उनैं कै तू कबी ऐ?

— नहीं चचा, उन्हें मेरे बारे में कुछ भी नहीं पता था। कुछ बताया भी नहीं। उन्होंने जानना भी नहीं चाहा। अपनी दुनिया में मग्न रहने वाला एक भव्य सा व्यक्तित्व। मूलत: आर्किटैक्ट हैं। लम्बी धवल दाढ़ी। खल्वाट मस्तक। मोटे फ्रेम का चश्मा। आईपैड पर तानपुरे और तबले की संगत। मेरे एक पुराने मित्र ने बताया कि वहां से कुछ लेते या वहां का कुछ खाते नहीं देखा गया उन्हें। शाम को आते हैं, रात को लौटते हैं। कोई बड़ा स्पीकर नहीं लगाते। न लोग उनके बांसुरी बादन पर तालियां बजाते हैं। एक मधुर मद्धम सी बांसुरी की गूंज अब पृथ्वी थिएटर का हिस्सा बन चुकी है। जिस दिन वे नही आते,पृथ्वी थिएटर को बुरा लगता है।

— तेरी का बात भई उन्ते?

— उन्होंने बताया कि पेड़ के नीचे का यही ठिकाना अपना लगता है। मैंने पूछा कि इस पेड़ में कोई ख़ूबी ज़रूर है जो आपको बुलाता रहता है। वे बोले, इस पूरी जगह में ही ख़ूबी है। बैठने के बाद पेड़ तो मुझे दिखता ही नहीं है। पेड़ मुझे देखता रहता है। स्कूल टाइम से थियेटर किया करता था। काफ़ी समय मैंने सोचा कि प्रोफेशन करना है या नाटक करना है। नाटक से पेट नहीं पलता, प्रोफ़ेशन ज़रूरी है। मैंने पूछा कि बांसुरीवादन की तरफ़ झुकाव कैसे हुआ, वे बोले, एक दिन सोलह-सत्रह घंटे काम करने के बाद दिमाग एकदम से खिसक गया कि ये मैं क्या कर रहा हूं! अपना सारा समय प्रोफेशन और फैमिली को दे रहा हूं, अपने लिए कोई समय नहीं। पेन्सिल और स्केल रख दिए एक तरफ़। म्यूजिक सुनने का शौक था, सोचा बांसुरी सीखेंगे। यूजर फ्रेंड्ली वाद्य है। बांसुरी को बगल के थैले में डालकर कहीं भी ले जाओ। मैंने पूछा किसने सिखाई? जवाब देने के स्थान पर उन्होंने मेरे ऊपर ही एक सवाल दागा।

— का सबाल दागौ?

— महाभारत का कौन सा चरित्र सबसे ज़्यादा प्रभावित करता है? मैंने ज़्यादा दिमाग यह सोचकर नहीं लगाया कि उनके पास कोई निश्चित उत्तर निश्चित रूप से होगा, कह दिया, कृष्ण। वे हंसे, फंस गए न? आउट ऑफ़ द बॉक्स सोचा ही नहीं। कृष्ण! सब लोग यही जवाब देते हैं। मुझे एकलव्य अच्छा लगता है। उसने मुझे, कैसे सीखना है, ये सिखाया है। उसने अपना मार्ग स्वयं बनाया था। द्रोणाचार्य ने एकलव्य को नहीं बनाया, एकलव्य ने बनाया था द्रोणाचार्य को। उसके पास तो बस एक कल्पना थी द्रोणाचार्य की। असली द्रोणाचार्य से कुछ लेना-देना नहीं था उसका। अधिकांश कलाकार एकलव्य हैं और… किसके पास नहीं हैं द्रोणाचार्य! फ़िल्मी गीतों से सीखता हूं, सिर्फ़ बांसुरी वादकों से नहीं, अन्य वादकों और गायकों से सीखता हूं। बांसुरी की तानों में ख़ुद को खोजता हूं। मैंने कहा, अपनी खोज को रोकिए मत सुहास जी, उठाइए बांसुरी।

— फिर?

— फिर क्या? हमारी बातचीत बंद हो गई, वे आंख मूंद कर बांसुरी बजाने लगे।

—अशोक चक्रधर

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