कहानी - आल इज नॉट वेल - हसन जमाल | Hindi Kahani 'All is not well' by Hasan Jamal

आल इज नॉट वेल

हसन जमाल 


हसन जमाल
संपादक ‘शेष’
पता: पन्ना निवास, लोहारपुरा,
जोधपुर-342002 (राजस्‍थान)
मो० : 098 29 31 4018
.....वक्त तो बदला है, लेकिन सलीम भाई को लगता है, मुल्क का एक टुकड़ा जो अलग हो गया, उसका खामियाजा वे अभी तब भुगत रहे हैं। ये और बात है कि ये फांक, ये दुभांत न सरकार को नजर आती है, न अवाम को। ये जुमला वे कितनी ही बार सुन चुके हैं कि- यहां फिर भी ठीक है वहां होते तो क्या हाल होता? सलीम भाई कहते- ‘वहां हम होते ही क्यूं? क्या ये हमारा वतन नहीं है? पीढि़यां खप गईं इस जमीन में लीडरों की लालची सियासत ने हमें अपनी ही जमीन पर गैर महफूज कर दिया।’
सलीम भाई को आप नहीं जानते। वे जिस शहर में पिछली छह दहाइयों से रहते चले आ रहे हैं, वह भी नहीं जानता! यहां तक कि उनकी अपनी गली के लोग भी। दुनिया में बहुत लोग होते हैं, जो होते तो हैं, पर उन्हें कोई नहीं जानता, पर इससे उसके दुःख-दर्द, गम, महरूमियां और तकलीफें कम तो नहीं हो जातीं।

          सलीम भाई की तकलीफ क्या है? ये साफ तौर पर बताना जरा मुश्किल है इसलिए जब भी वे अपने दर्द को जबान देने की कोशिश करते हैं, तो उनका मुंह बंद कर दिया जाता है- सलीम भाई। आल इज वेल। आप तो नाहक फिक्र करते हो, थोड़ा बहुत तो सब जगह चलता है, हमें ये देखना चाहिए कि ज्यादातर लोग कैसे हैं?
 सलीम भाई कहते हैं कि ज्यादातर लोगों की ब्रेन मेपिंग की जाए, तो कमोबेश सभी इस ख्याल के निकलेंगे कि ये लोग हमसे अलग हैं, गंदे हैं, बेशऊर हैं, लड़ाकू हैं, न खुद चैन से बैठते हैं, न दूसरों को बैठने देते हैं, ये सरासर हमारे यहां बोझ हैं और इनकी तादाद रोज-ब-रोज बढ़ती जा रही है अगर यही रफ्तार रही, तो एक दिन फिर अपने लिए अलग जमीन की मांग करेंगे, इन लोगों ने सारी दुनिया में दहशत फैला रखी है।

          ऐसा नहीं है कि सलीम भाई के मिलने-जुलने वाले जाहिल, कम तालीमयाफता या एक खास सोच रखने वाले लोग हैं। उनमें ज्यादातर वेल एजुकेटेड हैं और कई तो वामपंथी। मगर सलीम भाई के दर्द को महसूस कर पाना या उनकी समस्याओं को सही मायनों में समझ पाना उनके बूते की बात नहीं। इनसान जिस माहौल में जीता है, उस माहौल से बाहर क्या हो रहा है, वह उस की जानकारी से अछूता रह जाता है। दरहकीकत एक ही शहर में रहते हुए लोगों के समूह अलग-अलग टापुओं में रहते हैं कहने को दुनिया ग्लोबल विलेज है देखा जाए, तो हर शहर में कई-कई विलेज हैं। सलीम भाई ने जब से होश संभाला, तब से यही देखा कि आल इज नाट वेल। कदम-कदम पर उन्हें ये महसूस हुआ कि वे दूसरों से अलग हैं, मदरसे में तो नहीं, मगर स्कूल में उन्हें ये सब देखना व भुगतना पड़ा। उनके साथ पढ़ने वाले दौड़ते हुए प्याऊ में जाते और किसी बाल्टी या मटके में लोटा डाल के पानी भरते ओर गटागट पीने लगते और वे टुकुर-टुकुर देखते रहते, अरे भई। मुझे भी पीना है तब किसी का ध्यान उनकी तरफ जाता और वह बहुत ऊंचाई से पानी गिराता और सलीम भाई ओक से पानी पीते और कोशिश करते कि जल्दी-जल्दी पी लें और कहीं पिलाने वाला भाग न जाए। इस चक्कर में कई बार पानी नाक के अंदर घुस जाता। जब रेसिस में दो-चार छात्र मिलकर कुछ खा-पी रहे होते, तो सलीम भाई को उनका हिस्सा अलग कागज में दे दिया जाता। अव्वल तो कोई उन्हें अपने घर ले जाता ही नहीं था। कभी जाना पड़ जाता, तो उनके लिए शीशे का गिलास लाया जाता, क्योंकि उन्हें मालूम था कि ‘ये लोग’ मुंह लगाके पीते हैं और गोश्त भी खाते हैं। ये वह दिन थे जब देश में पहले चुनाव हो रहे थे। दलितों के साथ ही नहीं, मुसलमानों के साथ भी छुआछूत आम बात थी। सलीम भाई को याद है कि जब वे लड़कपन में सार्वजनिक नल पर पानी लेने जाते थे, तब मटका उठाते ही उसके बाद वाली साड़ी या लंहगेवाली कोई औरत या लड़की मिट्टी से रगड़-रगड़ कर टोंटी को धोती ओर फिर अपने बर्तन में पानी भरती। हरिजनों का तो और भी बुरा हाल था। वे दीवार पर खाली मटके रखकर घिघियाते रहते- ‘बाबूजी म्हारे को भी पानी भरना है।’ कभी उनकी सुनवाई होती, कभी नहीं होती। तब से अब तक नालियों में बहुत पानी बह चुका है। अब तो घर-घर में नल लग चुके हैं। होटल, रेस्टोरेंट, बाजार, दफ्तर मजाल है कि कोई उनके साथ हिकारत से पेश आए। कानून का चाबुक सामने लटका हुआ नजर आता है, जबान फिसली नहीं कि गए बारह के भाव।

          वक्त तो बदला है, लेकिन सलीम भाई को लगता है, मुल्क का एक टुकड़ा जो अलग हो गया, उसका खामियाजा वे अभी तब भुगत रहे हैं। ये और बात है कि ये फांक, ये दुभांत न सरकार को नजर आती है, न अवाम को। ये जुमला वे कितनी ही बार सुन चुके हैं कि- यहां फिर भी ठीक है वहां होते तो क्या हाल होता? सलीम भाई कहते- ‘वहां हम होते ही क्यूं? क्या ये हमारा वतन नहीं है? पीढि़यां खप गईं इस जमीन में लीडरों की लालची सियासत ने हमें अपनी ही जमीन पर गैर महफूज कर दिया।’

          कोई और बात करो मियां, वर्ना बात बढ़ जाएगी, फौरन ही कोई टोकता और पतली गली से निकल जाता, विषयांतर, संवेदनशील मस्अले को मत उठाओ, वर्ना बात दूर तक चली जाएगी। इसीलिए तो कहता हूं कि भाई। आल इज नाट वेल। और सलीम भाई के दर्द को सुनने वाले हँसी में उड़ा देते सलीम भाई कुछ कहना व समझाना चाहते, मगर वह सब कुछ उनके दिल में ही रह जाता।

          अब तो सलीम भाई रिटायरमेंट के करीब हैं। उनकी जब नौकरी शुरू हुई थी, तो दफ्तर में भी उन्होंने स्कूल का माहौल देखा था। वे दूसरों की तरह मटके में लोटा डालकर पानी नहीं पी सकते थे। उनके लिए अलग शीशे का गिलास था, उसी मे पीना पड़ता। पीने के बाद अपनी अलमारी में रख देते, ताकि गफलत में दूसरों के हाथ न लगे। वे दलित नहीं थे, मलेच्छ तो थे ही। ये मांस-मछली खाने वाले लोग लोटे-गिलास को मुंह लगाकर पानी पीते हैं, इसलिए इनके साथ ज्यादा घालमेल अच्छा नहीं मांस-मछली की बात पर सलीम भाई अड़ जाते अरे भाई। मांस-मछली तो कुछ शाकाहारियों को छोड़कर सभी खाते हैं, उनसे तो परहेज नहीं, हमीं से क्यूं? इस क्यूं का जवाब परहेज करने वालों के पास नहीं होता था ज्यादा बाजपुर्स करने पर रटा-रटाया जवाब दोहराया जाता कि मुसलमान गंदे होते हैं।

          सलीम भाई देखते थे जब कोई टोपी, दाढ़ी या तहमद वाला अपने किसी काम से उनके दफ्तर में आता था, तो अकसर लोग उनको नजरअंदाज कर देते थे। जब वे आजिजी करने लगते, तो बाबुआना बहानों से उन्हें टरकाने की कोशिश करते थे और मामूली-मामूली कामों के लिए भी कई-कई चक्कर लगवाते थे। ऐसे वक्तों में सलीम भाई की सिफारिश ही अकसर काम आती थी। उन लोगों की बहानेबाजी से कुढकर सलीम भाई उनसे उलझ पड़ते, पर उनको अपने रवैये पर न तो शर्मिंदगी होती और न अपने बहानों को गलत तसव्वुर करते। उल्टा सलीम भाई पर बिगड़ते कि मियां अपने काम से काम रखो, हमसे मत उलझो। सलीम भाई सब्र का घूंट पीकर रह जाते वे कर भी क्या सकते थे? 1947 के बाद दिलों में जो फर्क आया, वह बावजूद दस्तूरे-हिंद की गारंटी के अपनी जगह कायम था, बल्कि जड़ें जमा चुका था। खूनी रथ-यात्रा के बाद तो जैसे हर दिल में जहर भर गया था। इनका वश नहीं चलता, वर्ना इन चौदह-पंद्रह करोड़ गैरों को उधर ही धकेल दें या दरियाबुर्द कर दें। मुल्क के टुकडे करवा दिए, अब काहे को हमारी छाती पर मूंग दल रहे हैं। प्रशासन हो, पुलिस हो, अस्पताल हो, स्कूल-कालेज हों, सभी जगह दुभांत की फांक साफ नजर आने लगी थी। ये एक लावा था, जो अंदर ही अंदर पक रहा था और अकसर दंगे-फसाद की शक्ल में फूट निकलता था। जुर्म कोई करे, गिरफ्तार वे ही होंगे जिनका हाली-वली कोई नहीं।
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          मुल्क की तमाम जेलें उन लोगों से भरी पड़ी हैं जिनकी ठीक तरह पैरवी करने वाला कोई नहीं। उनमें से तो अकसर बेकुसुर होते हैं और पुलिस उनको आसान शिकार समझकर अपनी खाल बचाने के लिए झूठे मुकद्दमों में जेलों में ठूंस देती है। सैंकड़ों नौजवानों की जिंदगी पुलिस की दरिंदगी की वजह से तबाह व बरबाद हो जाती है। उनसे नाकर्दा जुर्म को कबूलवाने के लिए पुलिस किस हद तक टार्चर करती होगी, उसकी खबर कभी मीडिया में नहीं आती, क्योंकि वहां भी ऐसे ही लोग बैठे हैं। इसके बावजूद कहा जाता है कि सब कुछ ठीक-ठाक है। ज्यादा कुरेदो, तो पड़ोसी मुल्कों की ज्यादतियां बखानने लगते हैं। आप कह सकते हैं कि ऐसा सलीम भाई की इकतरफा सोच के कारण हो गया है। जुल्मो-सितम और नाइंसाफियां जात-पात, धर्म-संप्रदाय नहीं देखतीं, एक सिस्टम जो मध्य युग से, बल्कि अंग्रेजों के जमाने से चला आ रहा है, वह हजार एतराजों व सुधारों के बावजूद दायम व कायम है।

          सलीम भाई की बेचैनी की एक और वजह भी थी। वे उर्दू के अख़बार पढ़ने का शौक रखते हैं। उर्दू के अखबार वे खबरें देते हैं, जो हिंदी, अंग्रेजी, या दूसरी इलाकाई जबानें नहीं दे पाती हैं या देना नहीं चाहती हैं। एक खा़मोश सेंसरशिप अल्पसंख्यकों की समस्याओं पर लागू है। ये और बात है कि उर्दू अखबारात बाज औकात मुसलमानों के जज्बात को भड़काने का भी काम करती हैं जिस तरह दक्षिणपंथी मीडिया करता है। इस इंतिहापसंदी और अफवाही खबरों से आग इधर भी लगती है और उधर भी। ऐसे में अमनपंसद आम इनसान कहां जाए और किस पर भरोसा करें? उम्र बढ़ने के साथ सलीम भाई के दिलो-दिमाग पर मुस्लिम मुखालिफ माहौल से बुरा असर पड़ता जा रहा था। वे बड़ी तेजी से दिमागी मरीज बनते जा रहे थे। वे ये बखूबी जानते थे कि उनके हाथ में कुछ नहीं है। आन की आन में हालात किस कदर बदल जाएंगे, कोई नहीं जान सकता। सिर्फ जाती तौर पर फिक्रमंद होने से सूरत नहीं बदलती है। इनसान को ही बदलते हालात के मुताबिक खुद को ढालना पड़ता है।

          आप जानते हैं, जब किसी शख्स का जेहन किसी शै से मुतास्सिर होता है, तो वह किसी बहलावे से नहीं बहलता है। इसीलिए सलीम भाई हर वक्त शक व शुब्हों में घिरे रहते। अकसर वे खुदा का शुक्र अदा करते कि उनके खानदान में कोई ऐसा मस्अला पैदा नहीं हुआ जिसकी वजह से वे पुलिस के हत्थे चढ़ते और सुबूत के तौर पर अपना जाती तज्रिबा बयान करते। सलीम भाई का एक मस्अला ये भी था कि जिस बात की वे शंका करने लगते या खैरियत के लिए खुदा का शुक्र अदा करते, तो वे किसी न किसी परेशानी में गिरफ्तार हो जाते। अगर अचानक उनके ख्याल में क्रब्रिस्तान आ जाता, तो उन्हें अगले दो-चार रोज में जरूर कब्रिस्तान जाना पड़ता। अस्पताल का ध्यान आता, तो किसी न किसी को देखने के लिए अस्पताल के चक्कर लगाने पड़ते। गोया उनका ख़्याल ही उन्हें भटकाने लगा। इसे इल्हाम तो नहीं कह सकते कि वे पैगंबरों से मंसूब है, पर उनके स्वभाव में कुछ ऐसा था कि उन्हें होने वाले वाकिए का ख्याल अचानक जेहन में आ जाता चाहे वह एक्सीडेंट ही क्यों न हो। वे बुरा सोचने से अकसर बचना चाहते, पर ख्याल तो ख्याल है इस पर इनसान का बस कहां? उनका ये सोचना ही मुसीबत का बाइस बन गया कि वे ऐसे अनुभवों से नहीं गुजरे जिनमें पुलिस एक खास सोच से मुआमले को निबटाती है जिसमें अमूमन मुसलमानों व कमजोरों के साथ अकसर अन्याय होता है।

          रशीद के मुआमले में ये भी नहीं कह सकते कि सीआईडी ने उसे जानूबूझकर फंसाया। कानून तो कानून है, नियमों का पालन तो करना ही चाहिए। आप पूछेंगे, रशीद कौन? रशीद सलीम भाई का भानजा था, जो पाकिस्तान से अपनी मां के साथ आया था। सलीम भाई की अपनी हैसियत तो मामूली थी, लेकिन उनका भानजा करोड़पति घराने का था। हैदराबाद में बहनोई का बड़ा कारोबार था। वे सियासत में भी दखल रखते थे। बहन-बहनोई ने शुरू मुहाजिरी में गरीबी के दिन काटे थे लेकिन उनकी औलाद बड़ी हुई, तब तक अमीरी उनकी चौखट तक आ चुकी थी। अमीर और रुतबे वाले खानदान के बच्चों में जो लापरवाही, खिलंदड़ापन और दौलत की खुमारी होती है, वही रशीद में थी। तफरीह के लिए निकले, तो ये न सोचा कि हर शहर में पहुंच व रवानगी का इंद्राज कराना निहायत जरूरी है और सिर्फ उन्ही मकामों पर जा सकते हैं, जहां का वीजा मिला है। रशीद साहब ने अहमदाबाद के लिए एंट्री करवाई। कुछ दिन वहां रहकर मुंबई पहुंच गए। भारत में आए हैं, तो कराचीनुमा मुंबई की सैर जरूरी ठहरी। अहमदाबाद से मुंबई की रवानगी करवाई नहीं, और पहुंच गए सीधे मुंबई से मामू के शहर। उनको मालूम नहीं था कि ये उनका मुल्क नहीं है, जहां उनकी अमीरी और सिफारिशें आड़े वक्तों में काम आती हैं। यहां एक बार गलती से या धोखे से चिडि़या जाल में फंसी नहीं कि उसके आजाद उड़ने के ख्वाब फुर्र हो जाते हैं। पांचवें दशक में जिन लीडराने-वतन ने अपनी गोटियां खेली थीं, उसका खम्याजा बेगुनाह, बेकुसूर और मासूम नागरिकों को भुगताना ही था। हां, अगर आप अमेरिका से आते, तो आपको सर आंखों पे बैठाते। वहां से दहशतगर्द भी आ जाएं, तो उन्हें कोई नहीं पूछता और पड़ोसी मुल्कों के शरीफ शहरी भी आ जाएं, तो जेल के कैदियों की तरह उनकी हाजिरी होती है।

          सलीम भाई की निगाह में रशीद की ये हरकत महज लौंडापन थी, मगर पासपोर्ट अधिनियम के तहत संगीन जुर्म। अगर आपके तार दहशतगर्द तंजीम से जुड़े हों और आप कोई संगीन वारदात करने वाले हों, तो आपको कोई नहीं बचा सकता। फिर कानून अपना काम करेगा और हमारा कानून चिउंटियों की चाल चलता है हमें किसी की परेशानियों, बेवकूफियों, जज्बात ओर इज्जत-आबरू से क्या लेना-देना? आ जाओ पिंजरे में।
 रशीद मशकूक दहशतगर्द ठहरा और सलीम भाई बरसों से जिन आशंकाओं को पाल रहे थे, वे उनकी अपनी जिंदगी में अंधड़ बनकर आ गईं। बी.पी. शुगर और दिल की मरीज रशीद की मां पर बार-बार बेहोशी के दौरे पड़ने लगे। होश में आती, तो हाय-तौबा करने लगती-अब मैं वहां क्या मुंह दिखाऊंगी? बरसों बाद भाई से मिलने मायके गई थी और बेटे को गंवा आई। हाय अल्लाह। मैं क्या करूं? तीन दिन बचे हैं, ये मुए छोड़ते क्यूं नहीं मेरे बेटे को?

          रशीद की मां की भोली पुकार सीआईडी अफसरों को सुनाई कहां पड़नी थी। पूछताछ का लंबा सिलसिला चल निकला। सलीम भाई दफ्तर से छुट्टियां लेकर रोज कचहरी परिसर जाने लगे। बहन की हालत देखी न जाती थी और रशीद इस तरह बेफिक्र नजर आ रहा था, जैसे कुछ हुआ ही न हो। हालांकि टार्चर के निशान उसके चेहरे पर नुमायां थे। सलीम भाई जान चुके थे कि परिंदा जाल में फंस चुका है। वे पूरी ताकत लगा देंगे, नामी वकील करेंगे और रशीद को खैरियत से रवाना कर देंगे। मगर ये उनकी खाम ख्याली साबित हुई, उन्होंने बहन का वीजा बढ़वाना चाहा, लेकिन वीजा नहीं बढ़ा। बहन रोती-बिसूरती अपने मुल्क सिधार गईं। सलीम मियां साइकिक तो पहले ही थे अब उनके जेहन ने काम करना बंद कर दिया। रशीद सलाखों के पीछे पहुंच चुका था और खुद सलीम भाई? खैरियत मानते, खुदा का शुक्र अदा करते-करते आठवें दिन धर लिए गए उनका जुर्म?... दहशतगर्द को पनाह देना कोई छोटा जुर्म है कानून की निगाह में? वे कुर्सियों, मेजों के बीच धूल भरे फर्श पर बेजबान जानवर की तरह बैठे हुए थे कि उनका एक परिचित अपने किसी रिश्तेदार की आमद दर्ज करवाने आया था। सलीम भाई को ऐसी हालत में देखकर पूछ बैठा, ‘सलीम भाई, यहां कहां? यूं कैसे?’
 सलीम भाई टुकुर-टुकुर परिचित को देखते रहे। जरा देर बाद रुंधे गले से बोले, ‘मुलजिम हूं भाई, मेहमान को घर में ठहराने की सजा मिल रही है। ये अपना वतन है साहिब। हजारों बेगुनाहों का खून बहाने वाले की यहां वाहवाही और ताजपोशी होती है और अपने खून को घर में ठहराने वाले को जेलें मिलती हैं।’

          परिचित कुछ बोलता, उससे पेश्तर पास खड़े, खैनी मलते हुए एक हेड कांस्टेबल ने घुड़का, ‘मियां। ज्यादा न उड़ो। यहां हो इब्तिदा है, आगे-आगे देखिए, होता है क्या? हमारे यहां सूखे-गीले सभी को जलना पड़ता है, बेकसूर हो तो छूट जाओगे।’

          ‘और जो हम पे गुज़रेगी।’ सलीम भाई ने कहना चाहा, मगर लफ्ज होंठों पर आकर रह गए. बकौल हेड कांस्टेबल, ये वाकई इब्तिदा थी। आगे की कहानी पाठकों पर छोड़ी जाती है कि वे खुद समझदार हैं। अलबत्ता इतना बताना जरूरी है कि सलीम भाई अब बाकाइदा ‘केस’ बन चुके थे अब उनकी एक टांग जेल में रहती थी, दूसरी मेंटल हास्पीटल में और दोनों पांव अदालत के कठघरे में। वे फूट-फूटकर रोने लगते थे। तब उन्हें कहीं से आवाज सुनाई देती थी या कान बजने लगते थे ‘इब्तिदाएं इश्क है रोता है क्या...।’

          वे चौंककर सर उठाते तो सामने रशीद को खड़ा पाते शार्मिंदा-शार्मिंदा- ‘सारी मामूं। मेरी वजह से...।’ और वे भानजे के सीने पर सर पटकने लगते।

(लेखक सुपरिचित कथाकार और ‘शेष’ पत्रिका के संपादक हैं) साभार 'बहुवचन' अप्रैल-जून 2014

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