सोमवार, जून 30, 2014

प्रोफेसर भी प्रायः अपनी सत्ता का प्रशासन में लोप कर देते हैं - अपूर्वानंद | Design and Study - Apoorvanand

डिजाईन और शिक्षा - अपूर्वानंद

दिल्ली विश्वविद्यालय के नए कार्यक्रम के साथ गड़बड़ यह हुई कि उसने बाज़ार की फौरी ज़रूरत को पूरा करने वाले कर्मी तैयार करने का काम जो प्रक्रिया कर सकती है, यानी रोजगारोन्मुखी प्रशिक्षण (वोकेशनल शिक्षा) , उसका घालमेल साधारण स्नातक कार्यक्रम के साथ कर दिया।

दिल्ली विश्वविद्यालय के हाल के पाठ्यक्रम संबंधी विवाद और उसकी परिणति से कई ऐसे प्रश्न उठ खड़े हुए हैं जिन पर अकादमिक संसार और समाज को गंभीर विचार-विमर्श करने की आवश्यकता है। इनमें सबसे पहला प्रश्न है: किसी भी विषय के बारे में समझ बनाने या किसी निर्णय तक पहुँचने की उचित प्रक्रिया क्या है? तीन वर्षीय पाठ्यक्रम की जगह चार वर्षीय पाठ्यक्रम क्यों लाना चाहिए? कैसे मालूम हुआ कि तीन वर्षीय पाठ्यक्रम अब प्रासंगिक नहीं रह गया है? देश के बाहर के विश्वविद्यालयों में कहीं भी इसके लिए स्वाभाविक तौर एक व्यापक और प्रतिनिधि सर्वेक्षण कराया जाता। लेकिन ऐसा करना इस विश्वविद्यालय ने आवश्यक नहीं समझा। यह सिर्फ इसी संस्था की समस्या हो ऐसा नहीं। अपने समर्थन में दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति ने योजना आयोग के बारहवीं योजना के दस्तावेज का सहारा लिया जिसने सिर्फ एक पैराग्राफ में भारत की स्नातक स्नातक शिक्षा की न्यूनता को दूर करने के उपाय के रूप में चार वर्षीय स्नातक कार्यक्रम का प्रस्ताव किया है। योजना आयोग जैसी संस्था ने भी इस नतीजे पर पहुँचने के लिए किसी सर्वेक्षण या अध्ययन की ज़रूरत महसूस नहीं की। पूछने पर बताया गया कि इस विषय पर आयोजित चर्चा में शामिल देश के सभी वरिष्ठ शिक्षाविदों की यही राय थी। अगर सयाने कोई बात कह रहे हैं तो ठीक ही होगी, मान कर इसे योजना आयोग के सुझाव के तौर पर शामिल कर लिया गया। इस राय पर प्रश्न उठाने का मतलब सयानों की अक्ल और इरादे पर शक करना नहीं तो और क्या है!

       जब फैसलों का आधार किसी का सयानापन और उसका नेक इरादा हो जाए तो उस पर बहस मुश्किल हो जाती है। सामान्य जन को छोड़ दें, राजनीतिक वर्ग से लेकर बौद्धिक वर्ग तक के सोचने का तरीका यही था। हमें कहा गया कि आखिर आपकी विद्वत परिषद् ने यह निर्णय लिया है जिसमें सौ से ऊपर विद्वान्, वे भी वरिष्ठ,मौजूद थे! सच यह है कि दुर्भाग्य से उन्होंने भी यह प्रश्न नहीं किया। पूछने पर उन्होंने कहा कि कुलपति अगर यह प्रस्ताव दे रहे हैं तो ज़रूर उन्होंने कुछ सोचा होगा। क्या हमें उन्हें अवसर नहीं देना चाहिए? वे किसी कमी का निदान खोजने और उसकी चिकित्सा के अकादेमिक तरीके या पद्धति का, (जिसका पालन करने का आग्रह वे अपने शोधार्थियों से करते हैं, वरना उनकी ‘थीसिस’ संदिग्ध हो जाएगी) इस्तेमाल इतने बड़े निर्णय के लिए करने को तैयार न थे। 

       किसी नतीजे तक पहुँचने का पहले सुझाया गया रास्ता चूँकि कुछ लंबा, बुद्धि और श्रम साध्य है, नहीं लिया गया। कारण यह बताया गया कि बीमारी इतनी दु: साध्य हो चुकी है कि इलाज में देर नहीं की जा सकती। यह सब कुछ उस परिसर में हो रहा था जिसका काम ही बुद्धि और विचार को हड़बड़ी से बचाना है। हम मानते हैं कि सबसे कठिन लेकिन सबसे आवश्यक काम, या हमारी पूरी शिक्षा का सार सही उत्तर खोजने के पहले सही प्रश्न की तलाश है। सिर्फ यही नहीं प्रश्न को भी सही तरीके से पूछे जाने की कला भी हम सीखते हैं। दूसरों का प्रश्न हमारा हो , ज़रूरी नहीं। अगर बाज़ार अस्थिर हो गया है, उत्पादन के तरीके तेजी से बदल रहे हैं, एक कंपनी आज एक धंधा करती है और कल दूसरा क्यों कि पहला मुनाफे के लिहाज से पहला अप्रासंगिक हो गया जान पड़ता है, या टेक्नॉलोजी बदल गई हो सकती है, तो अपनी आवश्यकता के लिए उपयुक्त कर्मी की समस्या उनकी है। इसका उत्तर अगर विश्वविद्यालय अपनी सामान्य स्नातक शिक्षा में खोजने लगेगा तो वह अपना चरित्र और विशिष्ट उद्देश्य भी भूल गया है, मानना होगा। 

दिल्ली विश्वविद्यालय के नए कार्यक्रम के साथ गड़बड़ यह हुई कि उसने बाज़ार की फौरी ज़रूरत को पूरा करने वाले कर्मी तैयार करने का काम जो प्रक्रिया कर सकती है, यानी रोजगारोन्मुखी प्रशिक्षण (वोकेशनल शिक्षा) , उसका घालमेल साधारण स्नातक कार्यक्रम के साथ कर दिया। अपने आप में इस प्रशिक्षण की ज़रूरत है और इसे उच्च शिक्षा के लिए हीन मान लिया जाए, इसकी जगह इसके लिए अलग से एक तार्किक और ठोस कार्यक्रम बनाने की आवश्यकता थी। ऐसा न करके इसे आधे अधूरे ढंग से किया गया। इस वजह से ही यह चार वर्षीय पाठ्यक्रम आधा तीतर आधा बटेर बन का रह गया। 

       पद्धति या प्रक्रिया को गौण मान लेने के बाद आसान हो जाता है कि हम किसी भी प्रस्ताव की एक पूरी संरचना के रूप में पड़ताल न करें। संरचना की उपेक्षा करने का कारण है किसी भी समस्या को टुकड़े-टुकड़े में देखने का अभ्यास और अन्य समस्या या प्रक्रिया से उसके रिश्ते को नज़रअंदाज करना। मसलन चारवर्षीय स्नातक पाठ्यक्रम एक छात्र के लिए स्नातक का पूरा कार्यक्रम है। लकिन हर अनुशासन, उदाहरणतः हिंदी या भौतिकी विभाग ने उसमें से सिर्फ अपने विषय के पाठ्यक्रम पर ध्यान दिया। चार वर्षीय शिक्षा कार्यक्रम के बाकी घटक तत्वों के साथ उनके विषय का क्या संबंध बन रहा है और उससे छात्र क्या हासिल कर पा रहा है ,यह उनके लिए विचारणीय ही न था। इसी वजह से विभागाध्यक्षों ने अपने सदस्यों के इस अनुरोध को ठुकरा दिया कि पाठ्यक्रम के पूरे ढाँचे पर चर्चा की जाए। इसी कारण वे यह भी आज तक नहीं समझ पाए हैं कि उन्होंने तो दो वर्ष के डिप्लोमा, तीन वर्ष के साधारण स्नातक और चार वर्ष के स्नातक(ऑनर्स) की अलग-अलग ज़रूरतों का ध्यान ही नहीं किया। संरचना या ढाँचे या डिजाइन के प्रति उपेक्षा का भाव हमारी सांस्कृतिक समस्या मालूम पड़ती है जिससे ज्ञान की रचना करने वाले भी बुरी तरह ग्रस्त हैं। 

       निर्णय के त्रुटिपूर्ण होने का के दूसरा स्रोत निर्णय करनेवालों के आचरण में छिपा है। किसी भी विश्वविद्यालय की विद्वत परिषद चंद चुने हुए प्रतिनिधियों के अलावा विभागाध्यक्षों, संकाध्यक्षों और नामित अध्यापकों से भरी होती है। ध्यान रहे कि विभागाध्यक्ष मात्र अध्यक्ष होने के कारण वहाँ है, अपनी किसी योग्यता के बल पर नहीं। इसका अर्थ है कि वह विभाग, या संकाय या संस्थान के सभी सदस्यों का प्रतिनिधि है। लेकिन वह उनके द्वारा चुना नहीं जाता,उसकी नियुक्ति कुलपति के प्रसाद पर निर्भर है। इसका फल यह होता है कि विद्वत परिषद की बैठक में वह अपने विभाग के प्रतिनिधि की जगह अपने नियोक्ता के वफादार की तरह आचरण करता है। कायदे से परिषद के विषयों पर उसे अपने सहकर्मियों से राय लेनी चाहिए और उसे ही परिषद् में पेश करना चाहिए। लेकिन ऐसा बिरले ही होता है। यह गलतफहमी सिर्फ उसे हो ऐसा नहीं, विश्वविद्यालय के पेशे में सबसे ऊपर की पायदान पर खड़े प्रोफेसर भी प्रायः अपनी सत्ता का प्रशासन में लोप कर देते हैं। उन्हें यह भ्रम होजाता है कि वे व्यवस्था के नियामक की भूमिका में आ गए हैं। 

अपनी स्वाधीनता और अपनी भूमिका की विशिष्टता के प्रति लापरवाही के कारण, किसी बुरे इरादे से या लोभवश नहीं,हम ऐसे निर्णयों के भागीदार बन बैठते हैं, निजी क्षणों में जिनके लिए जवाबदेही लेने में हमें संकोच होगा। उसी के साथ हर संस्था की भी अपनी विशिष्ट भूमिका का बोध बना रहना भी आवश्यक है। विश्वविद्यालय को समाज की हर माँग को पूरा करने के लिए बाध्य महसूस करने की ज़रूरत नहीं। कई बार उसका काम समाज को यह बताने का हो सकता है कि उसकी माँग गलत है। जिन वैज्ञानिकों ने परमाणु बम बनाने या रासायनिक हथियारों के लिए शोध का काम कबूल किया,उन्होंने ज्ञान-निर्माता की अपनी भूमिका के साथ छल किया। जब विश्वविद्यालय अपने प्राथमिक दायित्व को भूल जाते हैं, जो व्यक्ति की स्वायत्ता की घोषणा का है, तो वे अपनी स्वायत्ता खो बैठते हैं। यही दुर्घटना दिल्ली विश्वविद्यालय और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के साथ हुई। लेकिन यह होना एक दृष्टि से लाभकर है। दिल्ली विश्वविद्यालय या जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय का आभिजात्य का गर्व इस एक चोट से चकनाचूर हो गया है और वे बेचारे राज्य के विश्वविद्यालयों की पाँत में खड़े कर दिए गए हैं। अगर इससे वे सामूहिकता का दायित्वबोध हासिल कर सकें तो यही इस क्रूर प्रहसन की उपयोगी उपलब्धि होगी। 
29.06.2014 जनसत्ता में प्रकाशित

1 टिप्पणी:

  1. आधे तीतर आधे बटेरों से और आशा भी क्या की जा सकती है । क्या उच्च शिक्षा खुद में आधी आधी इसी तरह लटक नहीं गई है ?

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