शुक्रवार, जुलाई 18, 2014

आशिमा की कवितायेँ / Poems of Ashima


पंजा लड़ाने का शौक रखने वाली आशिमा आईआईएमसी से पढाई करने के बाद, महिलाओं से जुड़े मुद्दों पर स्वतन्त्र लेखन करती हैं। आशिमा नियमित रूप से दैनिक जागरण, नवभारत टाइम्स, जनसत्ता आदि अखबारों के लिए लिखती हैं।

ये उनकी पहली कवितायेँ हैं और इन्हें पढ़ने के बाद एकदम लगा कि आप भी इन्हें पढ़ें ... आशिमा! आप कवितायेँ लिखती रहें और आइन्दा बगैर पूछे मुझे भेज सकती हैं. 

 

खुशनसीब है तू आशी

खुशनसीब है तू आशी,
कि अब तक किसी ‘दरिंदे‘ ने
तेरी भी दोनों जांघों के बीच
मर्दानगी का झंडा गाड़ कर,
अपनी बहादुरी का एलान नहीं किया,

हैरत कर इस बात पर,
कि अब तक किसी ‘मर्द‘ ने,
तेरी भी छाती नोचकर,
अपनी मां को शर्मसार नहीं किया,

कि जितना तू एक लेख से कमाती है,
उतने में तो ये ही ‘प्राणी‘ हर दिन
हज़ारों औरतों को बेच खाता हैं,
या खाकर बेच देता हैं,

अक्षरों से बात करना
अब तक इतना भारी नहीं पड़ा कि
तेरे भी सर में कोई बंदूक से छेद कर दे।

इज़हार ए मुहब्बत के लिए भी आज़ाद है तू,
कोई तेरा गला काटने नहीं आया,
न तेरा न तेरे हमदम का,

महफूज है तू, तेरी कलम महफूज़ है,
महफूज़ है मगर, इसकी स्याही इतनी गाढ़ी क्यों नहीं?
कि तेरी बहनों के काम आ सकी।


खूंटे की रस्सी


बंद करो मेरे मरने पर दुखी होने का ढोंग,
मेरे मरे उधड़े शरीर को देखकर,
आंखें नम करने की फॉरमेलिटी मत करो,

कि मेरे गले में खूंटे की रस्सी तो,
हमेशा से ही बंधी थी,
जो तुम ही लोगों ने बांधी थी।
अपने सीमित दायरे में ही घूमती थी,
लाख आगे बढ़ने की कोशिश भी,
बेकार थी मेरी।

अपना भी पराया भी
मुझे जब चाहे झकझोरता
और चला जाता,
और मैं फिर उसी दायरे में,
बिलख तड़प, खीज कर रह जाती।

आज तो बस चंद लोगों ने आकर,
उस रस्सी को खूंटे से खोलकर,
पेड़ से बांध मुझे लटका दिया बस,
और मैं मर गई,
पहले तो सिर्फ जिंदा थी।

 

लड़के से हुई गलती


पड़ गया इंसानियत के चेहरे पर एसिड,
झुलस गया ज़िन्दगी का चेहरा,
बलात्कार हुआ मासूमियत का,
बिक गया बाज़ार में टके के भाव बचपन,
हत्या हुई कुछ सपनो की,
कमर टूटी बुलंद इरादों की,
गर्त में चला गया हौंसला,
आग लग गयी आगे बढ़ते क़दमों को,
उजड़ते इस जहाँ को देख पूछती है आशी
जनाब आखिर हो क्या रहा है??
महापुरुष जवाब देते हैं,
कहीं मामूली सी गलती हुई है किसी भोले लड़के से......


 

ख्वाबों की चाभी


रात को अपनी आँखों के दरवाज़े बंद करके,
अपने ख्वाबों की चाभी मेरे हाथो में देकर,
वो सो गया।
ये चाभी ज़िम्मेदारी थी या बोझ,
अब तक समझ नहीं आया,
अचानक उसके ख्वाब मेरी हक़ीक़त से टकराने लगे,
मेरी हकीकत ने उसके ख्वाबों को चुनौती दी,
मुकाबला अब तक जारी है।
फर्क सिर्फ इतना है कि मैं खुद से लड़ लड़ हार रही हूँ
और वो अब भी ख्वाबों भरी नींद सो रहा है,
और चाभी..... वो अब भी मेरे ही हाथ में है......


आशिमा 
ईमेल : blossomashima@gmail.com

2 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत शानदारे-मजबूत कविताएं

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  2. बहुत खूब एक दम नया तेवर शुभ कामना

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