जगजीत सिंह, एक बोछार था वो - गुलज़ार | "LYRICS OF A LEGACY JAGJIT SINGH” Dr Umesh Khot & Dr Sharmila Khot

          जगजीत

                एक बोछार था वो ... 

                                           गुलज़ार

                एक बोछार था वो शख्स,
                बिना बरसे किसी अब्र की सहमी सी नमी से
                                   जो भिगो देता था...
                एक बोछार ही था वो,
                जो कभी धूप की अफशां भर के
                दूर तक, सुनते हुए चेहरों पे छिड़क देता था
                नीम तारीक से हॉल में आंखें चमक उठती थीं

                सर हिलाता था कभी झूम के टहनी की तरह,
                लगता था झोंका हवा का था कोई छेड़ गया है
                गुन्गुनाता था तो खुलते हुए बादल की तरह
                मुस्कराहट में कई तरबों की झनकार छुपी थी
                गली क़ासिम से चली एक ग़ज़ल की झनकार था वो
                एक आवाज़ की बोछार था वो !!

                                                                               गुलज़ार

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"लिरिक्स ऑफ़ ए लिगेसी जगजीत सिंह"


डॉ उमेश खोट और डॉ शर्मिला खोट



“LYRICS OF A LEGACY JAGJIT SINGH”

Dr Umesh Khot & Dr Sharmila Khot
This is a unique book written by a husband and wife team, both medical doctors at the top of their profession in the UK. Their strong Indian roots and nearly twenty years of living and working abroad is reflected in the layout and systematic approach of this edition. Above all this book is a ‘labour of love’ and a tribute to the late Jagjit Singh.
Several well-known literary personalities, friends and colleagues of Jagjit Singh joined the authors in this journey. The book begins with a poem foreword by Gulzar and ends with an afterword by Aalok Shrivastav.
There are many facets to the book which includes not just 400 lyrics all sung and composed by Jagjit Singh but an academic attempt to classify each composition by the mood evoked in the listener using the ancient Indian theatre concept of  Rasa’s. The lyrics are presented in both Devanagari script and Phonetic English so that a singer unable to read Hindi can still attempt to sing Jagjit Singh’s compositions. The rules for this transliteration were developed by the authors supported by feedback from editors’ friends and family. Another unusual aspect of Lyrics of a Legacy Jagjit Singh is that it has three editors; Mr Haroon Ali Khan (India), Dr Ninad Thackare (UK) and Mr Sultan Arshad (Pakistan) all of whom edited different aspects presented in the book. 
This unique book offers a glimpse into the author’s personal memoirs as described through the influence of Jagjit Ji’s music. It also includes several memories and rare photographs shared with the authors by many Jagjit Singh followers and confidantes. Additionally the authors have included a 3000 worded lexicon/dictionary as a bonus feature.
This work would not have been possible without the blessings of Chitra Jagjit Singh and contributions from many individuals and support from the poets all of whom are duly acknowledged in this book.
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जगजीत सिंह की यादों का ख़ज़ाना कभी ख़त्म नहीं हो सकता. इस बार इस ख़ज़ाने से नया मोती निकल कर आया है. ब्रिटेन में डॉक्टरी के पेशे से जुड़े शीर्ष चिकित्सक खोट दंपती ने ग़ज़ल के सम्राट की गाई ग़ज़लों को एक किताब में सलीक़े से सजाया है. और उसे नाम दिया है -  "लिरिक्स ऑफ़ ए लिगेसी : जगजीत सिंह". इस अनूठी पुस्तक का ख़ूबसूरत ले-आउट, मज़बूत और अछूता कंटेंट पुस्तक को एक महत्वपूर्ण दस्तावेज़ बनाता है. करीब बीस साल विदेश में रह कर इस प्रोजेक्ट पर काम करने के अनुभव को दर्शाता है.  यह किताब दरअसल “लेबर ऑफ़ लव” है और हमारे जैसे करोड़ों जगजीत-प्रशंसकों की ओर से उन्हें दी गई श्रद्धांजलि है.

पुस्तक में कई प्रसिद्ध साहित्यिक हस्तियों, मित्र और जगजीत सिंह के सहयोगियों की ऐसी शब्द-यात्रा है जिन्हें जगजीत सिंह जैसी हस्ती के साथ रहने और साथ काम करने का सौभाग्य मिला. किताब की शुरुआत मशहूर शायर और फ़िल्मकार गुलजार की भूमिका के रूप में लिखी नज़्म से होती है और समापन नई पीढ़ी के जाने-माने शायर आलोक श्रीवास्तव की जगजीत सिंह के साथ जुड़ी यादों के साथ. दोनों को जगजीत ने गाया है और इन दोनों ने भी जगजीत सिंह को पूरी शिद्दत से याद किया है.

किताब अपने में कई पहलुओं को समेटे है इसमें न सिर्फ जगजीत सिंह के गाये और संगीतबद्ध किए 400 गीत और ग़ज़लें शामिल हैं बल्कि इसमें किए गए बारीक़ से बारीक़ प्रयोगों का भी हवाला दिया गया है. हर धुन को ‘रसों’ के अनुसार बांटा गया है. हिंदी पढ़ने में असमर्थ जगजीत प्रेमियों का ध्यान रखते हुए बोलों को देवनागरी और रोमन में भी दिया गया है. साथ ही जगजीत जी के चाहने वालों के लिए इसमें उनसे जुडी यादें और दुर्लभ तस्वीरें भी शामिल हैं. एक नायाब तोहफे की शक्ल में 3000 शब्दों का शब्दकोश भी इस किताब में शामिल किया गया है. इस पुस्तक को - खोट क्रिएशन्स, ग्रेट ब्रिटेन से प्रकाशित किया है. यह पुस्तक जल्द ही भारतीय पुस्तक-बाज़ार में उपलब्ध होगी लेकिन फ़िलहाल इसे ऑनलाइन ऑर्डर कर विशेष शुरुआती छूट के साथ मंगाया जा सकता है.

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अमर रहेगी जग'जीत' ने वाली आवाज़ 

आलोक श्रीवास्तव 


उन्हीं ने गाया था - '...मेरा गीत अमर कर दो।' किसे पता था कि इतनी जल्दी हमें कहना पड़ेगा - 'कहां तुम चले गए?'

ग़ज़ल गायिकी की एक मुक़द्दस किताब बंद हुई तो उससे सैकड़ों यादों में से एक सफ़्हा यूं ही खुल गया। बात थोड़ी पुरानी पुरानी हो गई है। लेकिन बात अगर तारीख़ बन जाए तो धुंधली कहाँ होती है। ठीक वैसे जैसे जगजीत सिंह की यादें कभी धुंधली नहीं होने वालीं। ठीक वैसे ही जैसे एक मखमली आवाज़ शून्य में खोकर भी हमेशा आसपास कहीं-न-कहीं सुनाई देती रहेगी।


जगजीत भाई US में थे, वहीं से फ़ोन किया - 'आलोक, कश्मीर पर नज़्म लिखो। हफ़्ते भर बाद श्रीनगर में शो है, गानी है।' मैंने कहा - 'मगर में तो कभी कश्मीर गया नहीं। हां, वहां के हालाते-हाज़िर ज़रूर ज़हन में हैं, उन पर कुछ लिखूं।?' 'नहीं कश्मीर की ख़ूबसूरती और वहां की ख़ुसूसियात पर लिखो, जिनकी वजह से कश्मीर धरती की जन्नत कहा जाता है। दो रोज़ बाद दिसंबर को इंडिया आ रहा हूं तब तक लिख कर रखना, सुनूंगा।' जगजीत सिंह, जिन्हें कब से 'भाई' कह रहा हूं अब याद नहीं। भाई का हुक्म था, तो ख़ुशी के मारे पांव ज़मीन पर नहीं पड़ रहे थे। मगर वही पांव कांप भी रहे थे कि इस भरोसे पर खरा उतर भी पाऊंगा या नहीं।? जगजीत भाई के साथ एलबम 'इंतेहा' एलबम को आए तब कुछ वक़्त ही बीता था। फ़िज़ा में मेरे लफ़्ज़ भाई की मखमली आवाज़ में गूंज रहे थे और दोस्त-अहबाब पास आकर गुनगुना रहे थे- 'मंज़िलें क्या हैं रास्ता क्या है / हौसला हो तो फ़ासला क्या है।'

सर्दी से ठिठुरती रात थी। दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट का मुशायरा था। डाइज़ शायरों से सजा था। रात के कोई ग्यारह बजे होंगे। मैं दावते-सुख़न के इंतज़ार में था कि तभी मोबाइल बज उठा। वादे के मुताबिक़ जगजीत भाई लाइन पर थे और मैं उस नज़्म की लाइनें याद करने लगा जो सुबह ही कहीं थीं। 'हां, सुनाओ, कहा कुछ.?' 'जी, मुखड़े की शक्ल में दो-चार मिसरे कहे हैं।' 'बस, दो-चार ही कह पाए... चलो सुनाओ।' मैंने डरते हुए अर्ज़ किया -

पहाड़ों के जिस्मों पे बर्फ़ों की चादर
चिनारों के पत्तों पे शबनम के बिस्तर
हसीं वादियों में महकती है केसर
कहीं झिलमिलाते हैं झीलों के ज़ेवर
है कश्मीर धरती पे जन्नत का मंज़र

''हां अच्छा है, इसे आगे बढ़ाओ।'' जो जगजीत भाई को क़रीब से जानते थे, वो ये मानते होंगे कि उनका इतना कह देना ही लाखों दानिशमंदों की दाद के बराबर होता था। 'जी, परसों संडे है, उसी दिन पूरी करके शाम तक नोट करा दूंगा।' उनके ज़हन में जैसे कोई क्लॉक चलता है, सोचा और बोले - 'अरे उसके दो रोज़ बाद ही तो गानी है, कम्पोज़ कब करूंगा। और जल्दी कहो।' मगर मैंने थोड़ा आग्रह किया तो मान गए। दो रोज़ बाद फ़ोन लगाया तो कार से किसी सफ़र में थे 'क्या हो गई नज़्म, नोट कराओ।' मैंने पढ़ना शुरू किया-

पहाड़ों के जिस्मों पे बर्फ़ों की चादर
चिनारों के पत्तों पे शबनम के बिस्तर
हसीं वादियों में महकती है केसर
कहीं झिलमिलाते हैं झीलों के ज़ेवर
है कश्मीर धरती पे जन्नत का मंज़र

यहां के बशर हैं फ़रिश्तों की मूरत
यहां की ज़ुबां है बड़ी ख़ूबसूरत
यहां की फ़िज़ा में घुली है मुहब्बत
यहां की हवाएं मुअत्तर-मुअत्तर
है कश्मीर धरती पे जन्नत का मंज़र

ये झीलों के सीनों से लिपटे शिकारे
ये वादी में हंसते हुए फूल सारे
यक़ीनों से आगे हसीं ये नज़ारे
फ़रिश्ते उतर आए जैसे ज़मीं पर
है कश्मीर धरती पे जन्नत का मंज़र

सुख़न सूफ़ियाना, हुनर का ख़ज़ाना
अज़ानों से भजनों का रिश्ता पुराना
ये पीरों फ़कीरों का है आसताना
यहां मुस्कुराती है क़ुदरत भी आकर
है कश्मीर धरती पे जन्नत का मंज़र

''अच्छी है, मगर क्या बस इतनी ही है।?'' मैंने कहा - ''जी, फ़िलहाल तो इतने ही मिसरे हुए हैं।'' ''चलो ठीक है। मिलते हैं।''

एक बर्फ़ीली शाम। 4 बजे श्रीनगर का एसकेआईसीसी ऑडिटोरियम ग़ज़ल के परस्तारों से खचाखच भरा, ग़ज़ल गायिकी के सरताज जगजीत सिंह का बेसब्री से इंतज़ार कर रहा था। कहीं सीटियां गूंज रहीं थीं तो कहीं कानों को मीठा लगने वाला शोर हिलोरे ले रहा था और ऑडिटोरियम की पहली सफ़ में बैठा मैं, जगजीत भाई की फ़ैन फ़ॉलॉइंग के इस ख़ूबसूरत नज़ारे का गवाह बन रहा था। जगजीत भाई स्टेज पर आए और ऑडिटोरियम तालियों और सीटियों की गूंज से भर गया और जब गुनगुनाना शुरू किया तो माहौल जैसे बेक़ाबू हो गया। एक के बाद एक क़िलों को फ़तह करता उनका फ़नकार हर उस दिल तक रसाई कर रहा था जहां सिर्फ़ और सिर्फ़ ख़ून ही गर्दिश कर सकता है। उनकी आवाज़ लहू बन कर नसों में दौड़ने लगी थी।

जग जीत ने वाले जगजीत भाई का ये अंदाज़ मैने पहले भी कई बार देखा था लेकिन उस रोज़ माहौल कुछ और ही था। उस रोज़ वो किसी दूसरे ही जग में थे। ये मंज़र तो बस वहां तक का है जहां तक उन्होंने 'कश्मीर नज़्म' पेश नहीं की थी। दिलों के जज़्बात और पहाड़ों की तहज़ीब बयां करती जो नज़्म उन्होंने लिखवा ली थी उसका मंज़र तो उनकी आवाज़ में बयां होना अभी बाक़ी था। मगर जुनूं को थकान कहां होती ? अपनी मशहूर नज़्म वो काग़ज़ की कश्ती, वो बारिश का पानी के पीछे जैसे ही उन्होंने - 'पहाड़ों के जिस्मों पे बर्फ़ों की चादर' बिछाई पूरा मंज़र ही बदल गया। हर मिसरे पर 'वंसमोर, वंसमोर' की आवाज़ ने जगजीत भाई को बमुश्किल तमाम आगे बढ़ने दिया। आलम ये रहा कि कुल सोलह-सत्रह मिसरों की ये नज़्म वो पंद्रह-बीस मिनट में पूरी कर पाए। दूसरे दिन सुबह श्रीनगर के सारे अख़बार जगजीत के जगाए जादू से भरे पड़े थे। अमर उजाला में 'ये कश्मीर क्या है, है जन्नत का मंज़र' की हेड लाइन के साथ ख़बर में लिखा था - ''पहाड़ों के जिस्मों पे बर्फ़ों की चादर / चिनारों के पत्तों पे शबनम के बिस्तर / हसीं वादियों में महकती है केसर / कहीं झिलमिलाते हैं झीलों के ज़ेवर / ये कश्मीर क्या है, है जन्नत का मंज़र.. आलोक श्रीवास्तव के इन बोलों को जब जगजीत सिंह का गला मिला तो SKICC ऑडिटोरियम का तापमान यकायक गरम हो गया। ये नज़्म की गर्मी थी और सुरों की तुर्शी। ऑडिटोरियम के बाहर का पारा माइनस में ज़रूर था मगर अंदर इतनी तालियां बजीं कि हाथ सुर्ख़ हो गए। स्टीरियो में कान लगाकर सुनने वाले घाटी के लोग और जगजीत सिंह बुधवार को यूं आमने-सामने हुए।''

बात थोड़ी पुरानी हो गई है। लेकिन बात अगर तारीख़ बन जाए तो धुंधली कहाँ होती है। ठीक वैसे जैसे जगजीत सिंह की यादें कभी धुंधली नहीं होने वालीं। ठीक वैसे ही जैसे एक मखमली आवाज़ शून्य में खोकर भी कहीं आसपास ही सुनाई देती रहेगी। आमीन।

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लेखक नोट - जगजीत सिंह के पसंदीदा शायरों में आलोक श्रीवास्तव इकलौते सबसे कम उम्र के शायर हैं. जब पहली बार जगजीत जी ने उनकी ग़ज़ल एलबम 'इंतेहा' में शामिल की और उसके वीडियो में उन्हें अपने साथ रखा, तब आलोक महज़ 35 साल के थे. हिंदी-पट्टी से आने वाले इस नौजवान शायर को जगजीत सिंह का भरपूर प्यार, प्रोत्साहन और मार्गदर्शन मिला. आलोक आज भी जगजीत जी को ही अपना mentor मानने हैं.



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1 comments :

  1. आज दिनांक १० अक्तूबर २०१५ को ग़ज़ल सम्राट आदरणीय जगजीत सिंह जी की चौथी पुण्य तिथि पर उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि - शत् शत् नमन !!
    ( 08 फरवरी 1941 - 10 अक्तूबर 2011 )
    - बेगराज खटाना दिल्ली।

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