अकेलापन - प्राण शर्मा [हिंदी कहानी] Akelapan - Pran Sharma [Hindi Kahani]

अकेलापन

प्राण शर्मा 

गोपाल दास सत्तर के हो गए थे। न पत्नी थी और न ही कोई संतान। शादी की होती तो संतान होती न। शादी उन्होंने इसलिए नहीं की क्योंकि शादी को वे जंजाल समझते थे। कौन पत्नी और बच्चों के मायाजाल में पड़े ? कौन उनकी रोज़-रोज़ की फरमाइशें और शिकायतें सुने ? उनसे दूर रहना ही अच्छा। अकेले रहने में सुख ही सुख है, न किसी की रोक और और न ही किसी की टोक। अपनी मर्जी से कहीं भी आओ-जाओ और कुछ भी खाओ-पीयो। उनके माँ-बाप कह-कह कर मर-खप गए लेकिन उन्होंने शादी नहीं की।
एक बार वे किसी साधू आश्रम में पहुँच गए थे, साधु बनने के लिए पर वहाँ चेलों की क्रीड़ाएँ देख कर भाग खड़े हुए थे। अकेले रहकर ही जीवन बिताना उन्होंने बेहतर समझा। 
अब अकेलापन गोपालदास को कचोटने लगा था। किसी साथी की कमी को वे महसूस करने लगे थे। सिगरेट, शराब या जुआ का कोई ऐब उन्हें होता तो शायद किसी साथी की ज़रुरत की चिंता वे नहीं करते। इस उम्र में शादी करना यारों की नज़र में उपहास बन जाता। सभी कहते - “ सत्तर की उम्र के बुड्ढे को शादी का शौक़ पैदा हो गया है। “

एक मित्र ने सुझाव दिया - “ कुत्ते को रखिये। उससे बढ़ कर और कोई सच्चा साथी आपको नहीं मिलेगा। “

गोपाल दास को मित्र का सुझाव पसंद आया। उनको एक और हमउम्र मित्र की बात याद आयी - “ भई, इस उम्र में कुत्ते के साथ अपने दिन सुख-शांति से बीत रहे हैं। सुबह-शाम उसके साथ पार्क में टहलने जाता हूँ, घर में भी उसके साथ खेलना-वेलना लगा रहता है, कभी गेंद के साथ और कभी दुलार-वुलार के साथ। रात को किसी चोर-वोर की चिंता नहीं। निडर हो कर सोता हूँ। 

गोपाल दास ने डेली मेल और टेलीग्राफ में विज्ञापन दे दिया - “ एक अच्छी नस्ल के कुत्ते की तलाश है। अच्छी कीमत दी जाएगी। “

अगले दिन ही गोपाल दास के घर एक अँगरेज़ आ पहुँचा। उसके साथ जर्मन शेफर्ड कुत्ता था। हेलो, हेलो कहने के बाद उसने बाहर खड़े-खड़े ही गोपाल दास से पूछा - “ क्या आपको ही कुत्ता खरीदना है ? “

“ आइये, आइये। अंदर आइये। “ गोपाल दास ने अभिवादन में कहा। 

“ नहीं, मुझे कहीं जाना है। क्या आपको ही कुत्ता खरीदना है ? “

“ जी। “ गोपाल दास ने “ हाँ “ में अपनी लम्बी गर्दन हिला दी। 

“ मैं ये कुत्ता बेचना चाहता हूँ। ये जर्मन शेफर्ड है आप जानते ही होंगे कि जर्मन शेफर्ड कुत्ता संसार भर में प्रसिद्ध है। हम अँगरेज़ तो इस नस्ल पर जान देते हैं। ये चीते जैसा तगड़ा तो होता ही है, रखवाली करने में भी किसी सुरक्षा कर्मी से कम नहीं होता। 

इसका कोई सानी नहीं है। यारों का यार है। खूब यारी निभाएगा आपसे ये। “

“ इसे बेच क्यों रहे हैं आप ? “

“ मैं कुछ ही दिनों के बाद इंग्लैंड छोड़ रहा हूँ, आस्ट्रेलिया बसने के लिए जा रहा हूँ। “

“ आप इसे अपने साथ क्यों नहीं ले जाते हैं ? “

“ वो क्या है दोस्त, हवाई जहाज में इसे ले जाना बहुत महँगा है। “

“ कितने में बेचेंगे ? “

“ एक सौ पच्चीस पौंड में। “

“ एक सौ पौंड चलेगा ? “

“ नहीं। एक सौ पच्चीस पौंड ही लूँगा, एक पैनी कम नहीं । सुना है, आप हिन्दुस्तानी हर चीज़ का मोल करते हैं। “

“ नहीं ऐसी बात नहीं है। आप एक सौ पच्चीस पौंड ही लेंगे ? “

“ जी। “

गोपाल दास मन ही मन उछल पड़े। चलो, एक सौ पच्चीस पौंड ही सही। इतनी रकम में जर्मन शेफर्ड कुत्ता भला कहाँ मिलता है ? कम से कम पाँच-छे सौ पौंड का तो होगा ही। झट खरीदना लेना चाहिए। 

गोपाल दास ने कुत्ता खरीद लिया। 

बेचने वाला “ शेफर्ड सोल्ड एस सीन “ की रसीद देकर भाग खड़ा हुआ। 

बड़ी मुश्किल से शेफर्ड घर के अंदर गया। 

गोपाल दास ने उसका नाम रखा - शेरू। 

चुपचाप सा बैठा शेरू गोपाल दास को बहुत भोला-भोला लग रहा था। वे बोले - काश, तुझसे मेरा सम्बन्ध सालों से ही होता। मेरे जीवन में रौनक कब से आ गई होती ! आज से तू मेरा शेरू है, शेरू। शेरू का मतलब जानता है ? अरे, पंजाब के गाँवों में हर पुत्तर माँ-बाप के लिए शेरू होता है यानि शेर जैसा निडर और तगड़ा-वगड़ा। अब तू ही मेरा रखवाला है। तेरे खाने-पीने में कोई कमी नहीं आने दूँगा। यहाँ की महारानी से बढ़ कर तेरा ख्याल रखूँगा। देख, मेरे घर में तेरे प्रवेश करने की खुशी में अभी सारी गली में चॉकलेट बँटवाता हूँ। 

गोपाल दास ने एक पड़ोसी से ढेर सारी चॉकलेट मँगवा कर गली के सभी घरों में बँटवा दी सब में खुशी की लहर दौड़ गई। सभी कह उठे - “ वाह, गोपाल दास ने शेफर्ड खरीदा है। बच्चे देखने के लिए लालायित हो उठे। सभी दौड़े-दौड़े आये। उससे मिलते ही सबने उसकी प्रशंसा में उछल-उछल कर गीत गाना शुरू कर दिया-

शेफर्ड, शेफर्ड 
तेरी जात निराली है 
सबका तू रखवाला है 
सबने देखा भाला है 
तुझ सा प्यारा कौन है 
तुझ सा न्यारा कौन है 
शेफर, शेफर्ड 

सभी खूब झूमे-नाचे। किसीने उसके सर को दुलार किया और किसी ने उसकी पीठ को। 

शेफर्ड को गुमसुम सा देख कर एक बच्चा पूछ बैठा - “ अंकल, ये चुप-चुप क्यों है ? “

१३ जून १९३७ को वजीराबाद में जन्में, श्री प्राण शर्मा ब्रिटेन मे बसे भारतीय मूल के हिंदी लेखक है। दिल्ली विश्वविद्यालय से एम ए बी एड प्राण शर्मा कॉवेन्टरी, ब्रिटेन में हिन्दी ग़ज़ल के उस्ताद शायर हैं। प्राण जी बहुत शिद्दत के साथ ब्रिटेन के ग़ज़ल लिखने वालों की ग़ज़लों को पढ़कर उन्हें दुरुस्त करने में सहायता करते हैं। कुछ लोगों का कहना है कि ब्रिटेन में पहली हिन्दी कहानी शायद प्राण जी ने ही लिखी थी।
देश-विदेश के कवि सम्मेलनों, मुशायरों तथा आकाशवाणी कार्यक्रमों में भाग ले चुके प्राण शर्मा जी  को उनके लेखन के लिये अनेक पुरस्कार प्राप्त हुए हैं और उनकी लेखनी आज भी बेहतरीन गज़लें कह रही है।


“ बेटे, ये अभी इस घर में नया-नया है। एक-दो दिनों में खुल जाएगा। “ 

जाते समय सभी एक स्वर में बोले - “ अब तो हम रोज़ ही इसके साथ खेलने के लिए आया करेंगे। अंकल, आप मना तो नहीं करेंगे न ? “

“ नहीं बेटो, मना क्यों करूँगा, रोज़ आया करो। जी भर कर खेला करो इससे। “

गर्मियों के दिन थे। उसी दिन गोपाल दास ने शेरू के लिए नरम-नरम रेशमी कपडे मँगवा लिए। मँहगे से मँहगा खाना उसके लिए खरीद लिया। 

सारी रात शेरू कू-कू करता रहा। गोपाल दास उससे मुखातिब हुए - “ मैं जानता हूँ, तू घड़ी-घड़ी कू-कू क्यों कर रहा है ? तुझसे मालिक का बिछोह सहन नहीं हो रहा है। तुझे एक बात बताता हूँ, मुझसे भी माँ-बाप का बिछोह सहन नहीं हुआ था। मैं कई दिनों तक रोता रहा था, नींद मेरी आँखों से गायब हो गई थी। आ तुझे मैं अपनी गोद में ले लेता हूँ। आराम से सो जा। मैं तेरा मालिक नहीं, साथी हूँ, साथी। सो जा मेरे शेरू, सो जा। सुबह तुझे नहलाऊँगा, धुलाऊँगा। अच्छे रेशमी कपड़े पहनाऊँगा। उम्दा भोजन खिलाऊँगा। तुझे रोज़ गार्डन में ले जाऊँगा, इधर-उधर घुमाऊँगा। हम दोनों ही फुटबॉल खेलेंगे। घर आने से पहले तुझे पिश्ते वाली आइस क्रीम खिलाऊँगा। ख़ूब मौज़मस्ती में हमारा दिन गुज़रेगा। “

सुबह हुई। 

गोपाल दास की सभी आशाओं पर पानी पड़ गया। शेरू के पाखाने में ख़ून था। देख कर वे घबरा उठे। झट उन्होंने मित्र को फोन किया - “ क्या कुत्ते को भी बवासीर होती है ? " जवाब में मित्र ने कहा - “ हाँ, कुत्ते भी बवासीर होती है। कल को फिर ख़ून आये तो पशु चिकित्सिक के पास ले जाइए। “

सारा दिन शेरू निढाल हो कर सोफे पर लेटा रहा। गोपाल दास उससे लाड-प्यार करते रहे। दोनों ने कुछ नहीं खाया-पीया। 

अगली सुबह शेरू के पाखाने में धारा प्रवाह ख़ून बहा। खून का रंग कुछ-कुछ काला था। गोपाल दास का कलेजा जैसे निकल गया। उन्होंने फौरन टैक्सी ली और शेरू को लेकर नगर के प्रसिद्ध पशु चिकित्सिक के पास पहुँच गए। पशु चिकिस्तिक शेफर्ड को देखते ही बोल पड़ा - “ये कुत्ता आपके पास कैसे ? ये तो ---------------- “

“ इसे मैंने खरीद लिया है, इसका मालिक आस्ट्रेलिया जा रहा है। “ 

“ धोखेबाज़। “

“ कौन ? “

“ वो जिसने आपको शेफर्ड बेचा है। “

“ क्या इसे गंभीर बीमारी है ? “

“ बहुत गंभीर। इसकी आँतों में कैंसर है। “

“ कैंसर ? “ गोपाल दास ने काँपते हुए पूछा। 

“ हाँ, कैंसर। कैंसर इसकी एक-एक आँत में फ़ैल चुका है। मैंने इसको पिछले सप्ताह ही देखा था। इसका बचना मुश्किल है अब। “

“ डाक्टर सॉब, इसका इलाज कीजिये, कुछ कीजिये। इसको बचाइये। एक आध दिन में ही ये मेरे जिगर का टुकड़ा बन गया है। 

जो खर्चा आएगा, मैं दूँगा। “

देखते ही देखते शेरू निढाल हो गया। 

“ डाक्टर सॉब ,मेरे शेरू बचाइये, किसी तरह बचाइये। इसके बिना मैं फिर अकेला हो जाऊँगा। “ 

शेरू को तुरंत ही ऐक्सिडेंट ऐंड एमर्जेन्सी डिपार्टमेंट में ले जाया गया। 

डॉक्टर की कोशिश के बावजूद शेरू को आँखें मूँदने में देर नहीं लगी। 

गोपाल दास को लगा कि उनके भाग्य में अकेलापन ही लिखा है। उनकी आँखों में आँसू ही आँसू थे।
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3 comments :

  1. मर्मस्पर्शी कहानी बहुत कुछ कह गयी अकेलेपन की दास्तां तो दूसरी तरफ़ स्वार्थपरता दोनो का बखूबी चित्रण किया है ।

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  2. भाई प्राण शर्मा की कहानी 'अकेलापन' मर्म स्पर्शी होने के साथ इस भयानक सत्य को भी उजागर करती है कि कब, कौन, कैसे साधारण सा दिखने वाला चेहरा किसी निर्दोष को स्तब्ध कर दे...

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  3. प्राण जी, बहुत ही उल्लेखनीय और मार्मिक कहानी है. बधाई.

    रूपसिंह चन्देल

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