रविवार, अगस्त 03, 2014

"वह निर्छद्म हंसी" डॉ. तेज सिंह को रूपसिंह चन्देल की श्रद्धाजंलि | Roop Singh Chandel paying tribute to Dr. Tej Singh

श्रद्धाजंलि

वह निर्छद्म हंसी

रूपसिंह चन्देल


कुछ लेखक डॉ. सिंह से इस बात से भी खफा थे कि वह उनके आत्मकथा लेखन का विरोध करते थे. डॉ. तेज सिंह का कहना था कि आत्मकथा लिखने से पहले रचनाकारों को उन विधाओं पर जमकर सार्थक लेखन करना चाहिए, जिनमें वह अपनी रचनात्मक क्षमता का उपयोग कर सकते हैं.
ठीक से याद नहीं कि बात १९९६ की थी या १९९७ की, लेकिन महीना अक्टूबर का था. मेरे शक्तिनगर वाले मकान में कहानी-कविता गोष्ठी का आयोजन था. गोष्ठी की अध्यक्षता डॉ. रत्नलाल शर्मा को करनी थी.  डॉ. शर्मा के साथ मध्य वय के सांवले, लंबे, चेहरे पर गंगा-जमुनी बालों वाली दाढ़ी और दाढ़ी में मुस्कराते चेहरे वाले एक सज्जन आए थे.  डॉ. शर्मा ने उनका परिचय देते हुए कहा था, “ये डॉ. तेज सिंह हैं...दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रोफेसर.”  डॉ. तेज सिंह से वह मेरी पहली मुलाकात थी.  उनसे मेरी दूसरी मुलाकात  एक माह बाद  दिल्ली विश्वविद्यालय में रिसर्च फ्लोर के ऊपर छत पर डॉ. शर्मा के साथ ही हुई थी. उसके पश्चात हमारी मुलाकातों का सिलसिला प्रारंभ हो गया था.


डॉ. तेज सिंह  दलित लेखक संघ के संस्थापक सदस्यों में से थे. वह उसके दूसरे अध्यक्ष थे और दो सत्रों तक उसके अध्यक्ष रहे थे. उससे पहले वे  जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे थे. जनवादी लेखक संघ से संबन्ध तोड़ने के पश्चात उनका ठहरा लेखन प्रारंभ हो गया था. यद्यपि उनकी आलोचना का क्षेत्र कहानियां था, लेकिन उनका अध्ययन  केवल कहानियों तक ही सीमित नहीं था---वह व्यापक था. साहित्य से लेकर इतिहास, दर्शन, राजनीति तथा अन्य विषयों पर वह अपनी अलग और बेबाक राय रखते थे. वह मार्क्सवाद से प्रभावित थे और मार्क्सवाद का भी उन्होंने गहन अध्ययन किया था. लेकिन दलित संदर्भ में वह भारतीय मार्क्सवादियों के कटु आलोचक थे. उनका मानना था कि भारतीय मार्क्सवादियों ने दलित समस्या को सही प्रकार समझा ही नहीं. 
१२, मार्च, १९९९ को गांधी शांति प्रतिष्ठान में मेरे उपन्यास ’पाथर टीला’ पर एक विचार गोष्ठी का आयोजन उसके प्रकाशक महेश भारद्वाज ने किया गया था. कार्यक्रम की अध्यक्षता हंस के सम्पादक राजेन्द्र यादव ने की थी. अतः उस आयोजन के पश्चात राजेन्द्र जी से मेरी निकटता बढ़ गयी थी.  माह में एक या दो बार तेज सिंह के साथ मैं  हंस कार्यालय जाने लगा था. हममें से जो भी पहले राजेन्द्र जी के पास पहुंचता राजेन्द्र जी उससे  पूछते, “आग कहां है?” या “धुंआ आज कहां?” मुझे वह आग कहते और तेज सिंह को धुंआ. हम दोनों ने कभी राजेन्द्र जी से यह नहीं पूछा कि उन्होंने हमारे नामकरण किस आधार पर किए थे. वैसे भी राजेन्द्र जी का स्वभाव था कि जिनके प्रति प्रेम अनुभव करते उनके कुछ न कुछ नाम रख देते थे. राजेन्द्र यादव के यहां से हम प्रायः कनॉट प्लेस स्थित कॉफी होम जाते, जहां अन्य मित्रो को बुला लिया करते थे. वर्षों तक हम दोनों राजेन्द्र यादव की जन्मदिन की पार्टियों में शामिल होते रहे थे. यह वह दौर था जब डॉ. तेज सिंह जमकर लिख रहे थे. ’दलित लेखक संघ’ की  अपनी अध्यक्षता के दौरान उन्होंने दो सफल वार्षिक अधिवेशन किए तथा उसके बैनर तले अन्य अनेक कार्यक्रम भी आयोजित किए. दलित साहित्य के संदर्भ में ’स्वानुभूति’ और ’सहानुभूति’ की चर्चा सबसे पहले उन्होंने ही की थी. उनका कथन था कि दलित लेखकों से इतर लिखा गया साहित्य ’सहानुभूति’ का साहित्य है. यद्यपि मैं उनसे इत्तेफ़ाक नहीं रखता था. लेकिन वह एक उदार हृदय आलोचक थे और हर व्यक्ति की वैचारिक स्वतंत्रता का सम्मान करते थे.  वह कुछ बड़ा और सार्थक करना चाहते थे. बहुत जद्दोजहद के बाद उन्होंने पत्रिका निकालने का निर्णय किया. परिणामतः ’अपेक्षा’ अस्तित्व में आयी.

’अपेक्षा’ प्रारंभ करने के बाद तेज सिंह की व्यस्तता ही नहीं बढ़ी मित्रता का दायरा भी बढ़ा. हिन्दी लेखकों के साथ मराठी, तमिल और तेलगू लेखकों में उनकी पहचान बनी. ’अपेक्षा’ के सम्पादकीय लिखने में वह बहुत अधिक श्रम करते थे. पत्रिका हिन्दी क्षेत्र में तो उनके नाम का पर्याय बनी ही महाराष्ट्र के दलित लेखकों में भी विशेष रूप से चर्चित थी. इसे ’अपेक्षा’  का करिश्मा ही कहना उचित होगा कि उन्हें सेमिनारों में आदरपूर्वक बुलाया जाने लगा था. कल तक जो व्यक्ति अंधेरे में लुप्त था वह अचानक साहित्याकाश में चमकने लगा तो कुछ लोगों को ईर्ष्या होना स्वाभाविक था. एक हिन्दी लेखक ने ’वर्तमान साहित्य’ में उनके विरुद्ध आग उगलता आलेख लिखा.  वह उनसे इसलिए चिढ़ा हुआ था क्योंकि उन्होंने उसके कई बार के आग्रह के बावजूद उसके उपन्यास की समीक्षा नहीं लिखी थी. वह कृतघ्न लेखक यह भूल गया था कि डॉ. तेज सिंह की प्रेरणा से उनके एक छात्र ने उसके उपन्यास पर दिल्ली विश्वविद्यालय से एम.फिल किया था.  ’वर्तमान साहित्य’ के उस आलेख को पढ़कर मैंने उन्हें उस आलेख का माकूल उत्तर देने की सलाह दी. उन्होंने कहा, “मेरा उत्तर न देना ही उसके लिए सबसे बड़ा उत्तर होगा. मेरे विरुद्ध उसने जो लिखा वह कितना असत्य है यह सभी जानते हैं….मैं क्यों उत्तर दूं?” उन्होंने आगे कहा था, “चन्देल जी, आप देखते रहें---इससे इस लेखक का मनोबल बढ़ेगा और यह इससे भी बड़ी गलती करेगा और अपनी गलती का खामियाजा भुगतेगा.” और एक दिन उनकी बात सही सिद्ध हुई थी. 

लेकिन बात वहीं नहीं थमी थी. ’वर्तमान साहित्य’ के अगले अंक में एक अन्य दलित लेखक ने तेज सिंह को टार्गेट किया था, लेकिन इन अभियानों से वह बिल्कुल ही विचलित न थे.  वास्तव में डॉ. तेज सिंह जितना विनम्र थे उतना ही स्पष्टवादी, निर्भीक और सही कहने और सुनने वाले व्यक्ति थे. ’अपेक्षा’ में जहां वह स्वयं तर्कसंगत, विचारणीय और गंभीर आलेख लिख रहे थे और इस बात की परवाह किए बिना लिख रहे थे कि उनके आलेखों से कौन प्रसन्न होगा और कौन नाखुश, वहीं वह अन्य रचनाकारों को भी उसी प्रकार लिखने के लिए प्रेरित करते थे. लेकिन ईशकुमार गंगानिया जैसे कुछ लेखकों को छोड़  अन्य लेखक सीखने के बजाए उनसे ईर्ष्या-द्वेष करने लगे  और यह ईर्ष्या-द्वेष इस कदर बढ़ा कि उन्हें अहंकारी और दंभी तक कहा जाने लगा. मेरा मानना है कि वह न केवल एक प्रखर आलोचक थे, बल्कि दलित लेखकों के बीच वही एक मात्र गंभीर और अध्ययनशील आलोचक थे. उनका विरोध एक दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति थी.

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एक दिन डॉ. तेज सिंह का फोन आया कि अमुक शनिवार को डॉ. नामवर सिंह का साक्षात्कार करने चलना है. मैं उनके किसी भी प्रस्ताव को अपरिहार्य स्थिति में ही मना करता था. मैं तैयार था. संभवतः वह २३ नवंबर,२००२ की बात है.  मैं, डॉ. तेज सिंह और ईशकुमार गंगानिया डॉ. नामवर जी के यहां गए. शाम का वक्त था. ईशकुमार गंगानिया ने दलित साहित्य के संदर्भ में ’अपेक्षा’ के लिए नामवर जी से लंबी बातचीत की थी. जब हम डॉ. नामवर जी के यहां से बाहर निकले रात ने काली चादर ओढ़ ली थी और आसमान से कोहरा नीचे उतर रहा था. उस वर्ष नवंबर २० के बाद ही घनघोर कोहरा प्रारंभ हो गया था. ड्राइव करते हुए मैं आंखें फाड़कर सड़क पर देख रहा था, लेकिन तमाम सतर्कता के बावजूद आश्रम के बाद मैं रास्ता भटक गया और रिंग रोड पर सीधे जाने के बजाए नोएडा जाने वाले टोल पुल पर चढ़ गया. तेज दौड़ते वाहन और घना कोहरा----तेज सिंह मेरे साथ बैठे थे और गंगानिया जी पीछे. गाड़ी पीछे मोड़ना खतरनाक था. कुछ दिन पहले ऎसा करते हुए एक कार भयानकरूप से दुर्घटनाग्रस्त हो चुकी  थी. अब नोएडा से ही मुड़ने का एक मात्र विकल्प था. हम धीमी गति से चलने लगे. टोल पर पहुंचकर हमने वहां अफरा-तफरी का माहौल देखा. एक बैरियर इस प्रकार ऊपर उठा हुआ था कि मैं गाड़ी मोड़कर दूसरी ओर जा सकता था. मैंने समय नष्ट न करते हुए तुरंत गाड़ी मोड़ी और राहत की सांस ली थी. 

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वर्ष याद नहीं, एक दिन डॉ. तेज सिंह ने मुझे ’अपेक्षा’  के लिए राजेन्द्र जी का साक्षात्कार कर देने के लिए कहा. उन्होंने विषय भी निर्धारित कर दिया—“बातचीत केवल दलित साहित्य और दलित विषयक होगी.” मैंने राजेन्द्र जी से समय लिया और एक रविवार अपरान्ह हम ’हिन्दुस्तान टाइम्स अपार्टमेण्ट्स’ के राजेन्द्र जी के मकान में उपस्थित थे. लगभग दो घण्टे तक बातचीत होती रही थी. 

तेज सिंह के बोलने की गति बहुत तेज थी. प्रायः राजेन्द्र जी  उनकी आधी बातें ही समझ पाते थे. तेजसिंह के सामने ही उन्होंने मुझसे कई बार पूछा, “तुम समझ लेते हो इनकी बातें?” मैं केवल मुस्करा  देता.  कभी-कभी मैं भी परेशान हो जाया करता था. 

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कुछ लेखक डॉ. सिंह से इस बात से भी खफा थे कि वह उनके आत्मकथा लेखन का विरोध करते थे. डॉ. तेज सिंह का कहना था कि आत्मकथा लिखने से पहले रचनाकारों को उन विधाओं पर जमकर सार्थक लेखन करना चाहिए, जिनमें वह अपनी रचनात्मक क्षमता का उपयोग कर सकते हैं. उनका यह भी मानना था कि एक आत्मकथा कई उपन्यासों को जन्म दे सकती है. इसके अतिरिक्त वह आत्मकथाओं के सतहीपन को लेकर भी परेशान रहते थे और उनकी आलोचना का यही मुख्य कारण था. लेकिन उनकी नेक सलाह को मानना तो दूर लोग उनके विरुद्ध हो गए थे. उनका विरोध एक और कारण से भी होने लगा था. ’अपेक्षा’ निकालने के कुछ दिनों पश्चात ही उन्होंने दलित लेखकों के साहित्य को लेकर एक नई अवधारणा प्रस्तुत की थी. वह मानने लगे थे कि ’दलित साहित्य’ के बजाए उसे आम्बेदकरवादी साहित्य माना जाए उसी प्रकार जैसे गांधीवादी साहित्य या मार्क्सवादी साहित्य. अपने तर्क के समर्थन में उन्होंने लंबे-लंबे आलेख लिखे और अपने मित्रो से लिखवाए भी. उनके वे आलेख पुस्तकों  के रूप में प्रकाशित हुए. जितना ही वह अपने विचार को दृढ़ता के साथ प्रस्तुत कर रहे थे उतना ही उनके विरोधियों की संख्या बढ़ती जा रही थी. लोग ’दलित साहित्य’ से बाहर निकलने को तैयार नहीं थे. 

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डॉ. तेज सिंह ने अनेक पुस्तकें लिखीं, जिनमें प्रमुख हैं –’नागार्जुन का कथा-साहित्य’, ’राष्ट्रीय आन्दोलन और हिन्दी उपन्यास’, ’आज का दलित साहित्य’, ’उत्तरशती की कहानी’, ’दलित समाज और संस्कृति’,  ’प्रेमचन्द और रंगभूमि: एक विवाद-एक संवाद’, ’अंबेडकरवादी विचारधारा और समाज’, ’अंबेडकरवादी साहित्य का समाजशास्त्र’, ’अंबेडकरवादी कहानी: रचना और दृष्टि’ (सम्पादन), ’अंबेडकरवादी स्त्री चिंतन’ (सम्पादन). इन पुस्तकों के अतिरिक्त उनकी अनेक पुस्तकें प्रकाशनीधीन हैं और अन्य अनेक का उन्होंने सम्पादन किया था. 

डॉ. तेज सिंह इस बात से बेहद आहत रहते थे कि दलित साहित्यकार खेमो में बट गए थे और वे खेमे जातिवादी आधार पर बन गए थे. इसे वे साहित्य की प्रगति में एक बड़ी बाधा के रूप में देखते थे. वे  दिन-रात साहित्य के विषय में ---उसके विकास के विषय में ही सोचते थे. वह सस्ती लोकप्रियता के पीछे दौड़ने के विरुद्ध थे और दलित लेखकों को अधिकाधिक अध्ययनशील होने के लिए प्रेरित करते रहते थे.  अपने विरोधियों को लेकर उनके मन में कोई कटुता थी ऎसा मैंने कभी अनुभव नहीं किया. वह साफ-सुथरे और निर्छद्म व्यक्ति थे.  जब भी मिलते हंसकर ---बल्कि दूर से ही हंसते हुए तेज कदमों से चलकर निकट आते और हाथ मिलाते…”और कैसे हैं?” यह उनका पहला वाक्य होता था. और यह सभी के साथ था. 

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संपर्क
रूपसिंह चन्देल
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दिल्ली-११० ०९४
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E-mail: rupchandel@gmail.com, roopchandel@gmail.com
१ जुलाई,१४ को मैं कनॉट प्लेस जा रहा था. अचानक मन में आया कि डॉक्टर साहब को पूछ लूं, यदि तैयार हो गए तो मिलना हो जाएगा. मैंने लगभग दस बजे उन्हें मोबाइल पर फोन किया. वह मेट्रो में थे और विश्वविद्यालय जा रहे थे. मैंने अपना प्रस्ताव बताया. उन्होंने पूछा, “और कौन आ रहा है?” मैंने कहा, “सुभाष नीरव”. एक क्षण की चुप्पी के बाद कुछ सोचकर बोले, “पत्नी घर में अकेली हैं---आप तो जानते ही हैं कि उनका स्वास्थ्य सही नहीं….विश्वविद्यालय से सीधे घर जाउंगा. किसी और दिन रख लेंगे.” उनके साथ वह मेरा अंतिम संवाद था. 

१५ जुलाई को रात दस बजे फेसबुक से पता चला कि अपरान्ह तीन बजे डॉ. तेज सिंह का निधन हो गया था. मैं हत्प्रभ था अपने इस मित्र के असामयिक निधन के उस समाचार से. जानकारी जुटाई तो पता चला कि अंत्येष्टि १६ सुबह  साढ़े नौ बजे होगी.  मैंने सुभाष नीरव और अरविन्द कुमार सिंह को बताया. हम तीनों  ठीक साढ़े नौ बजे जब अंत्येष्टि स्थल पहुंचे, चिता जल रही थी. गंगानिया जी ने बताया वे लोग नौ बजे वहां पहुंच गए थे. चूंकि डॉक्टर साहब की मृत्यु १५ जुलाई को दोपहर तीन बजे हुई थी, अतः उनके पार्थिव शरीर को लोगों के दर्शनार्थ  रखना उचित नहीं समझा गया था. शास्त्रोक्त परम्पराओं के वह विरोधी थे इसलिए उसमें भी समय नष्ट नहीं किया गया था. 

१३ जुलाई,१९४६ को जन्में अपने इस अभिन्न मित्र को खोने का जितना दुख मुझे है उतना ही दुख मुझे इस बात का है कि मैं समय से न पहुंच पाने के कारण उनके अंतिम दर्शन नहीं कर पाया. रात उनकी मृत्यु के समाचार से मैं रात भर जागता रहा था और उनकी उस निर्छद्म हंसी के विषय में ही सोचता रहा था कि अब वह हंसी सदा के लिए हमारे बीच से विलुप्त हो गयी है----फिर सोचा था कि पार्थिव रूप से वह हमारे बीच भले ही नहीं हैं लेकिन उनका लेखन तब तक जीवित रहेगा जब तक साहित्य में अंबेडकरवादी साहित्य रहेगा.

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