कमल किशोर गोयनका : मत-भिन्नता के बावजूद - प्रदीप पन्त | Kamal Kishore Goenka - Pradeep Pant


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कमल किशोर गोयनका : मत-भिन्नता के बावजूद

प्रदीप पन्त


 आज एक अजीब अराजक समय है। खासतौर पर बुद्धिजीवी वर्ग में परस्पर वैमनस्य बढ़ता जा रहा है। जो हमारा दोस्त नहीं है, उसे हम अपना दुश्मन मान बैठते हैं। लेकिन आज भी ऐसे कुछ लोग मिल जाते हैं जो राग-द्वेष, वैमनस्य, वैचारिक मतभेदों और स्वभाव की भिन्नता को दूसरे के प्रति आदर भाव और मैत्राी के रास्ते में आड़े नहीं आने देते। बीते 31 जुलाई 2013 को नई दिल्ली के ऐवान-ए-ग़ालिब के मंच का दृश्य याद आ रहा है। ‘हंस’ का वार्षिक स्थापना दिवस समारोह था और मंच पर राजेन्द्र यादव के साथ गोविन्दाचार्य बैठे थे। वैचारिक स्तर पर कहाँ राजेन्द्र यादव और कहाँ गोविन्दाचार्य। राजेन्द्र यादव ‘हंस’ के अपने संपादकीय लेखों में राष्ट्रीय ंस्वयंसेवक संघ के खिलाफ अक्सर आक्रामक ढंग से लिखते रहे हैं, जबकि गोविन्दाचार्य के लिए संघ ही सब कुछ रहा है। अपने भाषण में गोविन्दाचार्य ने न केवल राजेन्द्र यादव के प्रति सम्मान भाव व्यक्त किया, बल्कि उन्होंने यह भी खुलासा किया कि छात्रा जीवन में जिस अध्यापक को उन्होंने सही मायने में अपना गुरु माना था, वे घनघोर कम्युनिस्ट थे और आजीवन कम्युनिस्ट रहे। इसी तरह आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के दो प्रिय शिष्यों डॉ. नामवर सिंह और
आचार्य विष्णुकान्त शास्त्राी में कितनी घनिष्ट मैत्राी रही है, यह सब जानते हैं, हालांकि डॉ. नामवर सिंह युवावस्था से ही कम्युनिस्ट थे, पार्टी के कार्ड होल्डर थे, पार्टी के टिकट पर लोकसभा का चुनाव भी लड़े थे और अपने तमाम अंतर्विरोधों के बावजूद आज भी कम्युनिस्ट तो हैं ही, जबकि आचार्य शास्त्राी युवावस्था में ही संघ में शामिल हो गए थे संघ की राजनीतिक शाखा भारतीय जनता पार्टी से राज्य सभा में पहुँचे और बाद में केन्द्र की भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार ने उन्हें राज्यपाल भी बताया। निर्मल वर्मा कई वर्षों तक भले ही कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य रहे, किन्तु बाद में उनका साम्यवाद या कम्युनिज्म से मोहभंग हो गया, बल्कि वे साम्यवाद विरोधी ही हो गए। इसके बावजूद घोषित कम्युनिस्ट भीष्म साहनी से उनकी जो अटूट मैत्राी थी, वह अंत तक बनी रही। स्वभाव में भिन्नता होते हुए भी घनिष्ठ मैत्राी के उदाहरण कमलेश्वर और मोहन राकेश हैं। कमलेश्वर यार बाश थे, हरेक से खुल कर मिलते थे, लेकिन मोहन राकेश का जहाँ तक सम्बन्ध है, कमलेश्वर के ही शब्दों में वे ‘नकचढ़े’ थे, पर दोनों के बीच दोस्ती में राकेश का नकचढ़ापन कभी आड़े नहीं आया।

 इसी पृष्ठभूमि में डॉ. कमल किशोर गोयनका के साथ अपने सम्बन्धों को लेकर अक्सर सोचता हूँ। करीब पैंतालीस वर्षों से दिल्ली में रह रहा हूँ। गोयनका कब से दिल्ली में हैं, पता नहीं, लेकिन हैं, वह भी दिल्ली में बहुत पहले से। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से उनकी निकटता ही नहीं रही है, वह संघ के कट्टर समर्थक भी है। शायद संघ परिवार के अन्य संगठनों और भाजपा से भी उनकी काफी निकटता हो। और मैं? संघ का विरोधी, संघ परिवार का विरोधी, भाजपा को नापंसद करने वाला। कुछ-कुछ वामपंथी हूँ, काफी हद तक जवाहर लाल नेहरू की नीतियों का समर्थक और गाँधी के प्रति मेरे मन में गहरा आदर भाव है। ऐसी स्थिति में कम से कम आज के अराजक, राग-द्वेष और वैमनस्य वाले दौर में डॉगोय नका से मेरे सम्बन्ध होने ही नहीं चाहिए, लेकिन बिना लाग-लपेट के कहना चाहूँगा कि सम्बन्ध हैं, अच्छी-खासी दोस्ती भी है उनके साथ। कई वामपंथी मित्रा इससे चकित होंगे। हो सकता है कि संघ-समर्थक लेखक उन्हें भी सलाह दे कि संघ विरोधी इस व्यक्ति से तुम्हारी दोस्ती का क्या मतलब! लेकिन मुझे लगता है कि अपनी राजनीतिक विचारधारा पर टिके रह कर भी डॉ. गोयनका ऐसी सलाह को न तो कभी तरजीह देंगे और न उसकी परवाह करेंगे। परवाह करनी होती तो वह ‘समयान्तर’ में लेख क्यों लिखते। हालाँकि उनका जो लेख ‘समयान्तर’ में प्रकाशित हुआ था, वह दिल्ली विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग की अनियमितताओं पर था, एक ऐसे समय में जबकि हिन्दी विभाग पर वामपंथियों का कब्जा था, काफी हद तक अब भी है और ‘समयान्तर’ के सम्पादक पंकज बिष्ट स्वयं वामपंथी हैं। इसका मतलब यह हुआ कि गोयनका संघ-समर्थक या संघ के पक्षधर होते हुए भी मूलतः लोकतांत्रिक हैं। इसीलिए उन्होंने ‘समयान्तर’ में लेख भेजा। इसी भांति पंकज बिष्ट भी मूलतः लोकतांत्रिक सिद्ध होते हैं, जिन्होंने लेख प्रकाशित किया। इस प्रकरण में मैं कहीं नहीं हूँ, लेकिन मैं लोकतांत्रिक व्यक्तियों की इज्जत करता हूँ।

 डॉ. कमल किशोर गोयनका की इज्जत करने का एक अन्य प्रमुख कारण है, प्रेमचन्द पर उनका शोधपूर्ण कार्य खास तौर पर प्रेमचन्द विश्वकोश। उन्होंने प्रेमचन्द के कृतित्व और व्यक्तित्व के परिचित पक्षों को तो रेखांकित किया ही है, उनके कृतित्व और व्यक्तित्व के बहुतेरे अपरिचित पक्षों को भी सामने ले कर आए। जैसे कि प्रेमचन्द की अप्राप्य कहानियों तथा अन्य रचनाओं को सामने लाना, उनके रचना-संसार को कालक्रमानुसार प्रस्तुत करना, उनकी चित्रात्मक जीवनी से पाठकों को परिचित कराना। अन्य शोधपूर्ण कार्य आदि। हाल में प्रेमचन्द की समस्त कहानियों को भी उन्होंने साहित्य अकादमी के लिए कई खण्डों में प्रस्तुत किया है। यह सब तो ठीक। इन पर किसी आपत्ति की गुंजाइश भी नहीं है। थोड़ा-थोड़ा विवाद भी हो सकता है तो ऐसी बातों पर कि कौन कहानी पहले उर्दू में आई, फिर हिन्दी में या कौन कहानी हिन्दी में पहले आई, उर्दू में बाद में। ऐसे ही कुछ अन्य छुटपुट विवाद भी संभव हैं, लेकिन जहाँ कहीं गोयनका ने प्रेमचन्द के व्यक्तित्व के उन पक्षों को छुआ या प्रस्तुत किया जिनकी जानबूझ कर या अनजाने में अनदेखी कर दी गई थी, वहीं गोयनका पर हमले होने लगे। रामविलास शर्मा, शिव कुमार मिश्र, नामवर सिंह, सुधीश पचौरी, विश्वंभरनाथ, उपाध्याय, कुंवरपाल सिंह, वेणुगोपाल जैसे प्रगतिशीलों और जनवादियों ने विरोध की मुहिम चलाई। संक्षेप में विरोध के मुख्य मुद्दे रहे हैं--प्रेमचन्द की गरीबी को लेकर गोयनका ने प्रेमचन्द को बदनाम किया, बेटी की शादी में दहेज देने की बात को उछाल कर गोयनका ने समाज सुधारक प्रेमचन्द की मूर्ति पर हमला किया, उन्होंने प्रेमचन्द के संघर्ष पर कुठाराघात करके उन्हें हिन्दुत्वपूर्ण भारतीयता से जोड़कर उनकी प्रगतिशील छवि को नष्ट करना चाहा। इसके अलावा यह भी अरोप लगाया गया है कि गोयनका ने प्रेमचन्द को हिन्दू या हिन्दुत्ववादी बनाने की कोशिश की है।

 यहाँ यह भी स्पष्ट कर दूँ कि स्वयं मैंने भी एक लेख में डॉ. गोयनका की आलोचना की है। लेकिन इसके साथ ही मेरा यह भी मानना है कि यदि कोई व्यक्ति किसी बड़ी शख्सियत पर शोध करता है तो कई तरह के दस्तावेज़ उसके हाथों में आ सकते हैं। इन्हें पाठकों के सामने रख देना ही शोधकर्ता की नैतिकता होती है। यहाँ काम गोयनका ने किया है। तय पाठकों को ही करना होता है कि इन दस्तावेज़ों को किस रूप में लें? यह भी कि क्या ऐसे दस्तावेज़ उस शख़्सियत के बुनियादी कार्य पर प्रतिकूल असर डालते हैं? गाँधी और नेहरू को लेकर समय-समय पर तरह-तरह के दस्तावेज़ सामने आते रहे हैं, लेकिन इनसे स्वाधीनता-संघर्ष में उनके योगदान पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता। प्रेमचन्द के संदर्भ बुनियादी कार्य है, उनका कथा संसार, जहाँ अपनी ढेरांे रचनाओं में वह वंचित-पीड़ितों, दबे-कुचले, लोगों, उस ज़माने में अछूत कहलाने वालों के पक्ष में खड़े नज़र आते हैं। प्रमाण के तौर ‘बलिदान’ ‘लालफीता’ ‘मुक्ति मार्ग’, ‘घासवाली’, ‘सद्गति’, ‘आगा-पीछा’, ‘मूठ’, ‘दूध के दाम’, ‘जुरमाना’, ‘लांछन’, ‘शुद्रा’, ‘लोकमत का सम्मान’, ‘कजरी’, आदि अनेक कहानियों की चर्चा की जा सकती है। अपने ऐसे ही कथा-संसार, उपन्यासों आदि के कारण प्रेमचन्द अप्रतिम रचनाकार माने जाते हैं। ऐसे में प्रेमचन्द में व्यक्ति के रूप में कुछ कमजोरियाँ नज़र आती हैं, उनमंे कुछ अंतर्विरोध दिखाई पड़ते हैं तो यह कोई महत्वपूर्ण बात नहीं है। उदाहरण के लिए, मेरा मानना है कि अधिकांश भारतीय समाज में लड़की के विवाह में दहेज देना पिता की मजबूरी होती है, इसलिए प्रेमचन्द ने भी दहेज दिया तो क्या गुनाह किया। और यदि यह गुनाह है भी तो, स्वयं गायेनका भी मानते होंगे कि इससे प्रेम चन्द के ‘उपन्यास-सम्राट’ अथवा ‘कथा-सम्राट’ होने पर कोई फर्क नहीं पड़ता।

 साथ ही हमें नहीं भूल जाना चाहिए कुछ पंक्तियों पहले जिन लेखकों-आलोचकों की चर्चा की गई है, स्वयं उन्होंने अपने कई प्रगतिशील और जनवादी साथियों पर प्रतिकूल टिप्पणियाँ की हैं। ‘हिन्दुस्तान’ के अपने स्तंभ में सुधीश पचौरी ने इशारों-इशारों में अनेक प्रगतिशील लेखकों का माखौल उड़ाया है। कहानी-उपन्यासों में अश्लीलता के मुद्दे पर यशपाल के विरूद्ध रामविलास शर्मा खम ठोककर खड़े रहे हैं, जबकि यशपाल की रचनाओं में, सच तो यह है कि नारी-देह को उघाड़ने के वर्णन-विवरण प्रसंगवश आए हैं, न कि रचना की वैचारिकता और कथा वस्तु के ताने-बाने में समग्रतः। जैसा कि पहले कह चुका हूँ, मैं स्वयं संघ परिवार का विरोधी हूँ लेकिन क्या मैं प्रेमचन्द पर गोयनका के कार्य को विरोध के इसी नजरिये से देखूँ? यह संभव नहीं है। लगता है कि प्रेमचन्द पर गोयनका के महत्वपूर्ण कार्य से बहुत से प्रगतिशील और जनवादी इसीलिए ईर्ष्या करते हैं कि गोयनका संघ-परिवार से जुड़े रहे हैं, जब ये प्रगतिशील और जनवादी मित्रा प्रेमचन्द पर मात्रा अपना अधिकार समझते हैं। थोड़ी देर के लिए मान लीजिये कि यदि गोयनका संघ परिवार से सम्बद्ध नहीं होते तो? तब भी क्या उनके विरूद्ध ऐसा ही नकारात्मक रुख अपनाया जाता?

 एक बात और, हमारे जनवादी प्रगतिशील मित्रों ने प्रेमचन्द पर गोयनका के वर्षों के महत्वपूर्ण कार्य की प्रायः साहित्येतर मुद्दे उठाकर उपेक्षा करने की जो कोशिश की है, वह एक ओर शोध कार्य के लिए धातक सिद्ध हुई है, दूसरी ओर उससे गोयनका भी प्रगतिशीलों और जनवादियों के जाने-अनजाने अधिकाधिक विरोधी होते चले गए हैं। या फिर यह भी कहा जा सकता है कि छात्रा-जीवन से ही अपनी मार्क्सवाद विरोधी विचारधारा के चलते वह प्रगतिशीलों और कालान्तर में जनवादियों के विरोधी होते चले गए हैं। इसी चक्कर में वे कभी-कभी तथ्यात्मक गलती भी कर जाते हैं एक उदाहरण ‘जनसत्ता’ के 25 अगस्त 2013 के अंक में उनके सौजन्य से प्रेमचन्द का एक लेख ‘पूंजीवाद’ से भंयकर है साम्यवाद’ शीर्षक से छपा है। इसके साथ गोयनका की एक टिप्पणी भी प्रकाशित हुई है जिससे पता चलता है कि इस लेख का मूल शीर्षक ‘राज्यवाद और साम्राज्यवाद’ था जो गोरखपुर की पत्रिका ‘स्वदेश’ में 18 मार्च 1928 को छपा था। 01 सितम्बर 2013 के ‘जनसत्ता’ अंक में सम्पादक की ओर से यह स्वीकार किया गया है कि प्रेमचन्द के लेख का शीर्षक गलत चला गया। एक गलती प्रेमचन्द के एक पत्रा की तिथि को लेकर भी हुई है। दोनों गलतियों के लिए संपादक ने खेद प्रकट किया। कहना न होगा कि लेख मूलतः राज्यवाद और सम्राज्यवाद पर ही है, पर प्रेमचन्द लेख में कुछ पंक्तियाँ साम्यवाद पर भी लिखी हैं, जो इस प्रकार हैं-‘‘एक समय था जब साम्यवाद निर्बल राष्ट्रों को आशा से अधिक आंदोलित कर देता था। सारे संसार मंे जब प्रजावाद की प्रधानता हो जाएगी, फिर दुख या पराधीनता या सामाजिक विषमता का कहीं नाम भी न रहेगा। साम्यवाद से ऐसी ही लम्बी चौड़ी आशाएँ बांधी गई थीं, मगर अनुभव यह हो रहा है कि साम्यवाद केवल पूंजीपतियों पर मजूरों की विजय का आंदोलन है, न्याय के अन्याय पर, सत्य के मिथ्या पर, विजय पाने का नाम नहीं। यह सारी विषमता, सारा अन्याय, सारी स्वार्थपरता जो पूँजीवाद के नाम से प्रसिद्ध है, साम्यवाद के रूप में अणु मात्रा भी कम नहीं होगी, बल्कि उससे और भी भयंकर हो जाने की संभावना है।’’ सम्पूर्ण लेख में साम्यवाद बनाम पूंजीवाद और और साम्यवाद के भविष्य आदि पर केवल उतनी ही टिप्पणी है। इस टिप्पणी के संदर्भ में अब जरा कमल किशोर गोयनका की टिप्पणी देखिये--‘‘ध्यान रहे, प्रेमचन्द ने यह लेख सन् 1928 में लिखा था, जब उनका चिंतन प्रौढ़ता तक पहुंच चुका था और साम्यवादी सरकारों के गुणा-व-गुणों के समाचार अखबारों में आने लगे थे।’’

 कहना न होगा कि प्रेमचन्द ने इस लेख में और जोर देकर कहना चाहूँगा कि हाँ इस लेख में जो टिप्पणी की है, उसमें इशारा रूस की बोल्शेविक क्रान्ति की ओर है। साम्यवाद की तब तक पहली विजय रूस में ही हुई थी, लेकिन यह पूंजीपतियों पर मजूरों की विजय नहीं थीं, क्योंकि रूस में जब साम्यवादी क्रान्ति हुई तब वहाँ पूंजीपतियों का नहीं बल्कि जार का शासन था यानी सामंती शासन। अतः कम से कम इस लेख से तो यही जाहिर होता है कि प्रेमचन्द की साम्यवाद की समझ कमजोर थी, जबकि अपनी टिप्पणी में गोयनका कहते हैं कि 1928 तक प्रेमचन्द का ‘चिंतन प्रौढ़ता तक पहुँच चुका था।’ जैसे प्रगतिशील और जनवादी अतिउत्साह में गोयनका के विरोध में कई बार बेवजह गलती करते हैं, उसी भांति गोयनका साम्यवाद के विरोध के उत्साह में प्रेमचन्द के सीमित ज्ञान को प्रौढ़ता तक पहुँचा हुआ चिंतन घोषित करने की तथ्यात्मक गलती कर देते हैं। कम से कम उपरोक्त लेख के संदर्भ में तो ऐसी गलती हुई ही है। लेकिन इस गलती के बावजूद एक दिलचस्प तथ्य यह हाथ लगता है कि गोयनका ने न केवल प्रेमचन्द पर अत्यन्त महत्वपूर्ण कार्य किया है, बल्कि वह यशपाल पर भी कुछ महत्वपूर्ण कार्य करना चाहते थे। उनके द्वारा संपादित एक पुस्तक है-‘‘यशपाल: कुछ संस्मरण’’।

 इस पुस्तक में यशपाल पर विभिन्न लेखकों, मित्रों, परिचितों और कुछ विरोधियों के संस्मरणात्मक लेख हैं। साथ ही डॉ. गोयनका ने पुस्तक में लगभग चार पृष्ठों की ‘भूमिका’ भी लिखी है, जिसके कुछ अंश यहाँ उद्धृत करना आवश्यक प्रतीत हो रहा है। यथा-‘‘यशपाल का कथा साहित्य आज जिस उत्सुकता और गंभीरता से पढ़ा जाता है, भविष्य में भी वह कम होने वाला नहीं है। यशपाल के जीवन काल में और उनके देहावसान के पश्चात तथा आने वाले समय में उनके पाठकों के मन में यह जिज्ञासा बराबर बनी रहेगी कि एक युवा क्रान्तिकारी किस प्रकार इतना यशस्वी रचनाकार बन सका?’’ कुछ पंक्तियों बाद गोयनका लिखते हैं-‘‘मैंने जब-जब यशपाल के जीवन और उनके साहित्य को निकटता से देखने की चेष्टा की है, तब-तब मुझे उनका जीवन साहित्य से कम महत्वपूर्ण नहीं लगा है।’’ उन्हें अफसोस है कि यशपाल ने आत्मकथा नहीं लिखी। इसी क्रम में वह कहते हैं-‘‘यशपाल के जीवन में जितना संघर्ष, उतार-चढ़ाव, सफलता-असफलता तथा मानवीय जीवन के जितने विविध रंग हैं, उतने हिन्दी के अन्य रचनाकारों में प्रायः कम ही मिलेंगे। वास्तव में उनकी जीवनी एक ऐसे मनुष्य का जीवन प्रस्तुत कर सकती है जो मानवीय जीवन की अधिकांश विशेषताओं के साथ जीता हुआ सफलता की ऊँचाइयों तक पहुँचता है।’’ वह लिखते हैं-‘‘यशपाल को मैं ‘दिव्य पुरुष’ की संज्ञा नहीं दूँगा, मैं तो उन्हें ऐसा पूर्ण ‘पुरुष’ मानता हूँ जो अपनी सफलताओं-क्षमताओं के साथ कमजोरियों को लेकर महान बनता है।’’ उपन्यास ‘दिव्या’ और ‘झूठा सच’ के अत्यन्त प्रशंसक गोयनका की इच्छा थी कि वह यशपाल की जीवनी लिखें किन्तु ‘प्रेमचन्द विश्वकोश’ के लेखन में अपनी व्यस्तता के चलते नहीं लिख सके और बाद में यशपाल का निधन ही हो गया।

 यहाँ ‘यशपाल’: कुछ संस्मरण’ की ‘भूमिका’ उपरोक्त अंश यह बताने के उद्देश्य से लिए गए हैं कि यदि हम गोयनका के आगे से संघ का ठप्पा हटा दें तो क्या यह ‘भूमिका’ किसी तटस्थ व्यक्ति द्वारा लिखी नहीं प्रतीत होती? यह प्रश्न इसलिए कि यद्यपि किसी लेखक, और लेखक ही क्या किसी भी व्यक्ति, के राजनीतिक सोच का अपना महत्व होता है, लेकिन उसे हर कदम पर उसके राजनीतिक सोच के नजरिये से नहीं देखा जाना चाहिए। सब जानते हैं कि अज्ञेय घोर कम्युनिस्ट विरोधी थे, तब भी जब उन्होंने ‘सप्तकों’ का संपादन किया। इसके बावजूद घोषित कम्युनिस्ट रामविलास शर्मा, नेमिचन्द्र जैन, मुक्तिबोध, शमशेर आदि ने ‘सप्तकों’ के लिए उन्हें अपनी कविताएँ दीं। निश्चित रूप से इसका एक कारण यह भी रहा होगा कि ये कवि, वैचारिक मतभेदों के बावजूद अपने समकालीन अज्ञेय को महत्वपूर्ण लेखक तो मानते ही रहे होंगे। हमारे वैचारिक मतभेद हो सकते हैं और स्वयं मैंने इस लेख में यत्रा-तत्रा मत-भिन्नता व्यक्त की है लेकिन मैं दृढ़ता के साथ मानता हूँ कि प्रेमचन्द पर वर्षों तक मन लगा कर और अथक परिश्रम के साथ अत्यन्त महत्वपूर्ण कार्य करने के लिए हम डॉ. कमल किशोर गोयनका की उपेक्षा नहीं कर सकते। उनके अन्य लेखन को छोड़ दिया जाए तो यह अकेला कार्य ही साहित्य की दुनिया में उनका बहुत बड़ा और अत्यन्त उपयोगी योगदान है। काश, उन्हें यशपाल पर भी इसी प्रकार कार्य करने का मौका मिला होता। 

 प्रदीप पन्त
सी 2/31-ईस्ट ऑफ कैलाश
 नई दिल्ली-110065 मो.: 09968204810
लेख साभार लमही जुलाई सितम्बर 2014
Kamal Kishore Goenka Vice Chairman Kendriya Hindi Sansthan


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