विवाद ? उत्तर की प्रियंका पूर्वोत्तर की `मेरी कॉम’ - रवीन्द्र त्रिपाठी | An Unwanted Controversy ? Mary Kom Vs Priyanka Chopra or North-East Vs North - Ravindra Tripathi

विवाद ? उत्तर की प्रियंका - पूर्वोत्तर की `मेरी कॉम’ 

An Unwanted Controversy ? 

Mary Kom Vs Priyanka Chopra 

or 

North-East Vs North 

रवीन्द्र त्रिपाठी Ravindra Tripathi


ये मानना कि उत्तर-पूर्व के लोंगों के साथ रंगभेद की वजह से इस फिल्म की नायिका के रूप में प्रियंका चोपड़ा का चयन किया गया, बहुत दूर की कौड़ी होगी -रवीन्द्र त्रिपाठी

बतौर निर्देशक ओमंग कुमार की पहली ही फिल्म `मेरी क़ॉम’ ने कुछ ऐसी बहसें पैदा कर दी हैं जिनके सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक के साथ साथ सौंदर्यपरक आशय है। ये एक फिल्म की सफलता ही कही जाएगी। मनोरंजक कही जानेवाली कम हिंदी फिल्में  समाज में इस तरह की बहसें पैदा कर पाती हैं।

ऐसी अ-लगाव भावना के वजह से मेरी क़ॉम  जैसी सफल कही जानेवाली फिल्म को बहस या विवाद का मुद्दा बनाया जा रहा है तो कोई आश्चर्य की बात नहीं। हालांकि इस  दौरान इस तथ्य को भुलाया जा रहा है कि फिल्में, खासकर मनोरंजन प्रधान फिल्में, एक व्यावसायिक उपक्रम होती हैं और उनको एक बड़ा से बड़ा दर्शक वर्ग चाहिए - रवीन्द्र त्रिपाठी


बहस का मुख्य मुद्दा ये है कि आखिर मणिपुर की एक महिला बॉक्सर पर बनी इस फिल्म में बतौर हीरोइन किसी स्थानीय कलाकार का चयन क्यों नहीं हुआ? यानी प्रियंका चोपड़ा का चयन क्यों हुआ? खुद मेरी क़ॉम   ने भी कहा है कि इस फिल्म में हीरोइन के रूप में अगर उत्तर पूर्व की कोई महिला कलाकार होती तो अच्छा होता है। हालांकि प्रियंका चोपड़ा से उनको निजी आपत्ति नहीं है। और उनके बयान से भी साफ है कि वे जानती हैं कि फिल्म निर्माण तो मुख्य रूप से पैसा कमाने का माध्यम है और अगर इस फिल्म में कोई स्थानीय या उत्तर-पूर्व की कोई कलाकार होती तो फिल्म अच्छा धंधा नहीं कर पाती। लेकिन उत्तर-पूर्व के कुछ संस्कृतिकर्मी और बुद्धिजीवी न सिर्फ ये पूछ रहे हैं कि आखिर स्थानीय और मंगोल मूल की किसी अभिनेत्री को इस भूमिका के लिए क्यों नहीं चुना गया बल्कि उनका ये भी आरोप है कि प्रियंका चोपड़ा का इस भूमिका के लिए चयन एक तरह के रंगभेद है। वहां के एक सामाजिक कार्यकर्ता ने तो उन अभिनेत्रियों की सूची भी पेश की है जो इस भूमिका को निभा सकती थीं या हैं। बाकी भारत में इस बहस की गूंज धीमी है लेकिन उत्तर पूर्व में तेज है। एक टिप्पनीकार ने तो ये पूछा है कि आखिर जब `गांधी’ फिल्म में महात्मा गांधी की भूमिका के लिए बेन किंग्स्ले जैसे अर्ध-गुजराती को चुना  गया (किंग्स्ले के पिता केन्या में जन्मे के थे)। गुजराती मूल के इसमाइली मुसलिम थे और चौदह साल की उम्र मे इंग्लैंड चले गए थे) तो फिर मेरी क़ॉम  की भूमिका के लिए किसी ऐसी अभिनेत्री का चयन क्यों नहीं किया गया जो किसी स्तर पर मंगोल-जाति से जुड़ी हो या कम से कम उत्तर पूर्व की तो हो। इसी से जुड़ा आऱोप है कि जिसे भारतीय खूबसबरती के रूप में पेश किया जाता है या प्रचारित किया जाता है, उसमें मंगोल-चेहरे की मौजूदगी नहीं है। यानी आर्य या द्रविड़ चेहरे तो भारतीय खूबसूरती के दायरे में आ जाते हैं लेकिन मंगोल-चेहरे नहीं। यानी एक फिल्मी कहानी राजनैतिक रंग भी ले रही है और इसका संबंध भारतीय-सौंदर्य़बोध से जुड़ गया है। वैसे सौंदर्य़बोध या खूबसूरती भी राजनैतिक मुद्दा बन जाता है।

इस बात को झुठलाना मुश्किल होगा कि अगर प्रियंका चोपड़ा मुख्य भूमिका में न होतीं या उनकी जगह कोई अल्पज्ञात उत्तर पूर्व की कलाकार होती तो न तो मेरी क़ॉम   फिल्म को इतनी शोहरत मिलती न एमसी मेरी क़ॉम  खिलाड़ी को - रवीन्द्र त्रिपाठी


मेरी कॉम (18 सितम्बर, इंफाल प्रेट्र), ‘‘मैं उनसे जल्द संपर्क करूंगी और उनसे अपनी एकाडमी की ब्रांड एंबैसडर बनने को कहूंगी.’’ उन्होंने कहा
कि पिछले हफ्ते रिलीज हुई फिल्म ने बॉक्सिंग को प्रसिद्धि दिलाने का काम किया है और अब वह भारत के अन्य शहरों में भी अपनी बॉक्सिंग एकाडमी की शाखाएं खोलना चाहती हैं."  

 आइए, जरा इस मामले का विश्लेषण करें। ये तो अलग से कहने की जरूरत नहीं कि मेरी क़ॉम पर इस तरह की बहस के पीछे उत्तर-पूर्व या मणिपुर के लोगों के भीतर सही-गलत वजहों से फैला `अ-लगाव’ (एलिनिएशन) है। विशेष सशस्त्र बल अधिनियम , जिसके खिलाफ इरोम-शर्मिला का संघर्ष चला, ने भी इस `अ-लगाव भावना’ (जो अलगाव- भावना से अलग चीज है) को विशेष बल प्रदान किया है। ये आकस्मिक नहीं है की मणिपुर में हिंदी फिल्में प्रदर्शित नहीं होतीं और इसी वजह से मेरी क़ॉम  फिल्म भी वहां अभी तक रिलीज नहीं हो सकी है। शायद होगी भी नहीं। ऐसी अ-लगाव भावना के वजह से मेरी क़ॉम  जैसी सफल कही जानेवाली फिल्म को बहस या विवाद का मुद्दा बनाया जा रहा है तो कोई आश्चर्य की बात नहीं। हालांकि इस  दौरान इस तथ्य को भुलाया जा रहा है कि फिल्में, खासकर मनोरंजन प्रधान फिल्में, एक व्यावसायिक उपक्रम होती हैं और उनको एक बड़ा से बड़ा दर्शक वर्ग चाहिए। प्रियंका चोपड़ा ( या बॉलीवुड की दूसरी स्थापित हीरोइन) इस फिल्म की नायिका नहीं होती तो क्या ये फिल्म उस तरह चलती? ये मानना कि उत्तर-पूर्व के लोंगों के साथ रंगभेद की वजह से इस फिल्म की नायिका के रूप में प्रियंका चोपड़ा का चयन किया गया, बहुत दूर की कौड़ी होगी। आखिर `बैंडिट क्वीन’ में मुख्य भूमिका के लिए सीमा विश्वास का चयन किया गया था और वे मूल रूप से असमिया हैं। अगर उत्तर भारत की फूलन देवी (जिनके जीवन पर `बैंडिट क्वीन’ बनी थी) की भूमिका एक असमिया मूल की अभिनेत्री निभा सकती है तो किसी उत्तर-पूर्व की खिलाड़ी पर बनी फिल्म में उत्तर भारत की अभिनेत्री क्यों नहीं निभा सकती?

अगर सरकारी प्रयास से दूरदर्शन  में ऐसे कार्यक्रम आएं जो बहुसांस्कृतिक हों तो इस पूर्वग्रह युक्त सौंदर्य़प्रतिमान को तोड़ा जा सकता है और उत्तर पूर्व या मणिपुर से भी ऐसी हीरोइनें आ सकतीं हैं जिनको पूरा भारत देखे और जिनको बॉलीवुड के निर्माता और निर्देशक अपनी फिल्मों में मुख्य भूमिका दें - रवीन्द्र त्रिपाठी 

ये ठीक है कि स्थानीय अस्मिताएं या बंधी बंधाई धारणाएं (स्टीरियोटाइप) अपनी मौजूदगी या अपने प्रतिनिधित्व को लेकर सजग रहती हैं। मुझे याद है कि  कई साल पहले जब रंगकर्मी प्रसन्ना के निर्देशन में `लाल घास पर नीले घोड़े’ का मंचन हुआ था तो  उसमें लेनिन की भूमिका आज के चर्चित फिल्म अभिनेता इरफान खान ने निभाई थी। सब जानते हैं कि लेनिन गंजे थे और इरफान ने इस नाटक में काम करने लिए अपने बाल नहीं मुडवाए। नाटक के दौरान उनके सिर पर पूरे बाल थे और लेनिन की भूमिका को प्रामाणिक बनाने  लिए उनका नाटक में संवाद था। वे अपनी एक उंगली को पहले सिर पर ले जाते थे और दाहिनी कनपटी पर और कहते हैं- `लेनिन यहां (यानी सिर) नहीं यहां (यानी दिमाग) थे’। हालांकि कुछ लेनिनवादियों को पूरे बाल वाले इरफान में लेनिन की छवि नहीं दिखी थी लेकिन सब जानते हैं कि लाल घास पर नीले घोड़े का वो यादगार प्रदर्शन था। इसी तरह मेरी क़ॉम  फिल्म में नायिका कहां की हो, ये विवादास्पद बनाया जा सकता है लेकिन इस बात को झुठलाना मुश्किल होगा कि अगर प्रियंका चोपड़ा मुख्य भूमिका में न होतीं या उनकी जगह कोई अल्पज्ञात उत्तर पूर्व की कलाकार होती तो न तो मेरी क़ॉम   फिल्म को इतनी शोहरत मिलती न एमसी मेरी क़ॉम  खिलाड़ी को।
छपते-छपते
Northeast close to my heart: Priyanka Times of India | Sep 16, 2014 "I didn't have any preconceived perception of the region. Every place has its pros and cons. The northeast's culture is rich and beautiful. It will remain close to my heart forever. We should be able to inspire aspiring and talented sportspersons from here and give them a platform. Mary has proven what the people of the region can achieve," said Priyanka Chopra. 
पर इसी से जुड़ा समानांतर पहले ये भी है जब भारतीय सौंदर्य के प्रतिमान की बात होती है तो उसमें मंगोल-चेहरे के अवयव नहीं होते। इसका कारण कई सौंदर्य़बोध संबंधी धारणाएं हैं जिन्हें भारतीय मूर्तिकला या साहित्य ने  पैदा किए हैं। कालिदास के `तन्वी श्यामा शिखरिदशना’ या सूरदास के `अद्भुत एक अनुपम बाग’  जैसे पदों ने नारी सौंदर्य को बखानने के लिए जो उपमाएं गढ़ीं हैं उसमें मंगोल तत्व नहीं है। इसलिए आश्चर्य नहीं कि मंगोल-चेहरे न हमारी फिल्मों में है न सौंदर्यउद्योग में। अगर हैं भीं तो बहुत कम- जैसे लिन लैशराम, जो मणिपुर हैं और जो आरोप के लहजे में  कह चुकी हैं भारतीय सौंदर्य उद्योग में उनको भारतीय नहीं बल्कि एशियाई कहा जाता है। इसलिए जरूरत इस बात की है भारतीय सौंदर्य़बोध के इस व्याकरण को तोड़ा जाए और खूबसूरती के उन प्रतिमानों को बदला जाए तो उत्तर और दक्षिण भारत को समेटती है। अगर सरकारी प्रयास से दूरदर्शन  में ऐसे कार्यक्रम आएं जो बहुसांस्कृतिक हों तो इस पूर्वग्रह युक्त सौंदर्य़प्रतिमान को तोड़ा जा सकता है और उत्तर पूर्व या मणिपुर से भी ऐसी हीरोइनें आ सकतीं हैं जिनको पूरा भारत देखे और जिनको बॉलीवुड के निर्माता और निर्देशक अपनी फिल्मों में मुख्य भूमिका दें। क्या अच्छा हो कि उत्तर भारत के किसी व्यक्तित्व पर जीवनीपरक फिल्म बने और उसमें मुख्य किरदार मणिपुर का कोई कलाकार करे। अ-लगाव चाहे जिस वजह से हो उसे खत्म करना भी जरूरी है और बेहतर होगा कि उसे सकारात्मक प्रयास के खत्म किया जाए।

रवीन्द्र त्रिपाठी वरिष्ठ पत्रकार, फिल्म-कला-रंगमंच-साहित्य समीक्षक, व्यंग्यकार और वृत्तचित्र निर्माता हैं... आप ईमेल  tripathi.ravindra@gmail.com मोबाईल 09873196343 पर उनसे संपर्क कर सकते हैं।

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