गुरुवार, सितंबर 04, 2014

इस स्त्री-विरोधी संपादकीय को स्त्रियां न पढ़ें - प्रेम भारद्वाज | Ediotrial - Prem Bhardwaj

मैं चांद पर हूं... मगर कब तक
(आजादी और अजाब में फंसी चालीस पार औरतों के बारे में...)
प्रेम भारद्वाज

"खड़ी किसी को लुभा रही थी
चालिस के ऊपर की औरत 
खड़ी-खड़ी खिलखिला रही थी
चालिस के ऊपर की औरत
खड़ी अगर होती वह थक कर 
चालिस के ऊपर की औरत
तो वह मुझको सुंदर लगती 
चालिस के ऊपर की औरत
ऐसे दया जगाती थी वह 
चालिस के ऊपर की औरत
वैसे काम जगाती शायद
चालिस के ऊपर की औरत"
[ लुभाना/रघुवीर सहाय ]


चेतावनी : सूचित किया जाता है कि 11000 वोल्ट की तर्ज पर लिखे गए इस स्त्री-विरोधी संपादकीय को स्त्रियां न पढ़ें। इस चेतावनी को नजरअंदाज कर अगर फिर भी वे इसे पढ़ने की जिद करती हैं तो उन्हें कोई भी गैरमामूली झटका लग सकता है, जिसकी जिम्मेदार वे खुद होंगीे, इन पंक्तियों का लेखक नहीं।


 वह अकेला था नहीं। अचानक अकेले कर दिया गया। उसने प्यार किया और अपराधी करार दिया गया। उस पर इल्जाम है कि उसने भावनात्मक अत्याचार किया। दुराग्रह किया। दबाव बनाया। बलात्कारी नहीं कहा गया, गनीमत है।
राम सजीवन की प्रेमकथा (पार्ट-टू) : अपने तमाम बौद्धिक उत्कर्ष के बावजूद राम सजीवन फिर प्रेम की घाटियों में गिरे। फिर से प्यार में धोखा मिला। दिल टूटा। दर्द बेहिसाब-बेसबब मिला। आंखें समंदर हुईं। दिन वीरान। रातें श्मशान। पागलपन के हालात। खुशी और राहत के तमाम विकल्प-जतन बेअसर होने पर खुदकुशी की कगार पर खड़े दुनिया को अलविदा करने से पहले अंतिम बार उस औरत के बारे में सोचा जो चालीस पार है, जिसके प्यार में...। यह जाने बगैर कि चालीस पार औरतें अपनी जहनियत और जटिलता को खुद भी नहीं समझतीं। चक्रव्यूह कहना मुनासिब इसलिए नहीं होगा कि ये औरतें चक्रव्यूह रच रही हैं या खुद ही उसमें फंसी हैं। यह अंत में ही शायद साफ हो सके। आगे राम सजीवन की यातना और उसके आक्रोश को शब्द भर दिए गए हैं। 

चालीस पार औरतें। चांद और सूरज के बीच का कोई मध्यबिंदु। एक साथ जीने और मरने का खतरनाक द्वंद्व। बकौल शैलेंद्र वाया ‘गाइड’, ‘जीने की तमन्ना है, मरने का इरादा है...।’ चालीस पार औरतें मतलब अनबुझी वह चिनगारी जिसमें आग अभी बाकी है जिससे वह जमाने को ‘स्वाहा’ करने की कूवत रखती हैं। दूर तक फैले रेगिस्तान में एक घना सायादार दरख्त। जेल को रंगमहल मान लेने की जिद। उसमें नाचने की चाहत। सूरज की धधक के बीच चांद को हथेली पर ठहरा लेने का खूबसूरत ख्वाब। रात खत्म होने, सुबह का सूरज निकलने से ठीक पहले थोड़ी और नींद ले लेने की खुमारी। नींद में सपना देखने की मासूम आरजू। सपने को जमीन पर उतारने की गोपनीय जिद।

उम्र का वह मोड़ जहां अभी संभावनाएं समाप्त नहीं हुई हैं। थोड़ी-थोड़ी बहुत-सी चीजें बची हुई हैं। थोड़ी जिम्मेदारी, थोड़ी जवानी, थोड़ी सुंदरता, थोड़ी जिंदगी... थोड़ा समय, थोड़ी इच्छाएं। शादी के बाद अकाल मृत्यु को पाया ‘प्रेम’ मगर बहुत बचा है। उसे एक बार फिर से ‘जी’ भर जी लेने की इच्छा बहुत बची है। अब खुद के लिए जीने और कुछ रचने का सपना बचा है। पति अपने काम में मसरूफ। बच्चे बड़े हो गए। शादी के बाद अब थोड़ी फुर्सत मिली है। खुद के बारे में सोचने की मोहलत। जवानी या किशोर उम्र की चाहतें जो शादी की कब्र में दफन-सी हो गई थीं, वे अब कब्र से बाहर आना चाहती हैं।

बंदिशों के बंद पिटारे से निकल आए सपनों के सर्प। समय की बीन पर नृत्य करते सपने। नैतिकता के खौफ के बीच नाच। दुश्वार और खुशवार का दोराहा। दायित्वों के बोझ तले दबे बेजान दांपत्य की कैद से बाहर निकलने की छटपटाहट।

सब तो नहीं, मगर कई चालीस पार औरतें घर में खड़ी आंगन या खिड़की से चांद देखती हैं। चांद को पाने का ख्वाब पालती हैं। वे प्यार करती हैं, मगर घर बचाती हैं। प्रेमी के साथ जीती हैं, लेकिन पति के साथ सोती हैं। अगर प्रेमी नहीं भी हुआ तो उसकी कल्पना होती है। उनका प्रेम भी प्रेम जैसा नहीं है। डेढ़-दो दशकों के दांपत्य ने उनके पति के साथ संबंधों में तकरार नहीं भी तो ऊब की एक दरार पैदा कर दी है। एक स्पेस। उसी में फंस गया राम सजीवन। उसने प्यार को प्यार समझा। सच को सच। नहीं समझ पाया कि वह फिलर है। टाइम पास है। सिनेमा का मध्यांतर है जहां मौज-मस्ती के साथ पाॅपकाॅर्न खा लेने भर का ही वक्त है। पूरा जीवन तो क्या एक फिल्म भर का भी साथ नहीं है। राम सजीवन की कहानी मध्यांतर बनकर रह गई। जयप्रकाश चौकसे सही फरमाते हैं, ‘मध्यांतर हमारे सामूहिक अवचेतन का काल है। संपूर्णता हमारा अभीष्ट नहीं। आधा-अधूरापन हमारी इच्छाएं हैं। हम तो सच को भी उसकी संपूर्णता में नहीं स्वीकारते। हम जीवन की फिल्म में भी मौज-मजे के मध्यांतर खोजते रहते हैं। हमारे मनोरंजन में भूख और भूख से मनोरंजन शामिल है। हमें सच में नहीं उसके तमाशे में रुचि है, हम अंततः तमाशबीन हैं।’ 

राम सजीवन को लगा उसकी हैसियत मध्यांतर में खाए जाने वाले पाॅपकाॅर्न से ज्यादा नहीं है। उसके साथ छल हुआ। उसका दिल दिमाग में अटका। दिमाग एक बहता हुआ नासूर बन गया। ऐसे हालात में वह निरंतर असमान्य होता गया, विक्षिप्तता की दशा में पहुंच गया। अकेले तो सफर भी लंबा हो जाता है। वह अकेला था नहीं। अचानक अकेले कर दिया गया। उसने प्यार किया और अपराधी करार दिया गया। उस पर इल्जाम है कि उसने भावनात्मक अत्याचार किया। दुराग्रह किया। दबाव बनाया। बलात्कारी नहीं कहा गया, गनीमत है। 

राम सजीवन को लगता है कि मृत्यु, ईश्वर, प्रेम से भी जटिल है स्त्री। मौत से ज्यादा तकलीफदेह होता है प्रेम में छला जाना। दिल का टूटना। वह नहीं जानता था कि क्यों चालीस पार औरतें प्रेम करती हैं, लेकिन पीड़ा से दूर रहती हैं। प्रेम उनके लिए मजा है, मस्ती है। हंसी है। खुशी है। टाइमपास है। उनके लिए उस समय उन्हें उस अटेंशन को पाना है जो उनके पतियों से अब नहीं मिल पाती। वे प्रेम में कोई भी प्रश्न भी पसंद नहीं करतीं। किसी भी तरह की बंदिशें उन्हें नाकाबिले-बर्दाश्त हैं और प्यार के बहाने परवाह चाहिए, प्रस्थान चाहिए और वह सब कुछ चाहिए जो पति के उबाऊ साथ में नहीं मिल पाया है अब तक।

वे प्रेम से भरी हैं। यकीन न हो तो ‘फेसबुक’ देख लीजिए जो उनके लिए किसी दरीचे के खुलने जैसा है। वे खुद को अभिव्यक्त कर रही हैं। हर स्त्री प्रेम से भरी है। वह प्रेम कविता रच रही है। हर शब्द में प्रेम जन्म रहा है। उस प्रेम की एक-एक बूंद के प्यासे यानी रिंद भी हैं जो उनकी हर अदा, हर शब्द पर ‘वाह’ करते हैं, आह भरते हैं। कविता उनके लिए जीवन से ज्यादा मनबहलाव है। शौक है। स्वांतः सुखाए, तुलसी रघुनाथा...। ‘लाइक’ की तादाद शब्दों की गहराई से नहीं, औरत की खूबसूरती से बढ़ती है। लाइक, कमेंट और फाॅलोअर्स की संख्या से औरतों का रुतबा तय होता है। उनका दर्प परवान चढ़ता है। वे प्रेम करके, कविता लिखकर अजाब से आजादी की ओर बढ़ती हैं। उन्होंने थोड़े को ज्यादा मान लिया है। छूट को आजादी। यहां रिक्वेस्ट और ब्लाॅक के बीच का फासला बहुत कम है। फ्रेंड को अनफ्रेंड करने की वजह मामूली। फेस है, लेकिन वह फेक है। अजीब-सा घालमेल। गजब का तिलिस्म। कुछ समझ में नहीं आता। उनकी पहली अनिवार्य शर्त यही है कि कोई भी सवाल नहीं करेगा। सवाल उनको असहज कर देता है। वे कोई भी जिद करें। उसे मनवा लें। मगर आपका कोई मामूली-सा आग्रह भी दुराग्रह है। उनके भीतर कोई भी भाव स्थाई नहीं है। वे संचारी भावों में जीती हैं। जब जैसा भाव जागेगा। वैसा आपको मिलेगा। उनकी सल्तनत बनना होगा। उन्हें आका मान उनके हर फरमान पर सिजदा ही नहीं, फिदा होना भी पड़ेगा आपको। आपको जिबह तक कर दिया जाएगा, लेकिन रोने की मनाही है। कहा जाएगा, तुम्हें दुःख झेलने का सही अंदाज सीखना होगा। मेरा प्रेम चाहिए तो मुझे बर्दाश्त करो। 

राम सजीवन के लिए प्रेम करते हुए प्रेमिका से अलग होना मरने के बराबर है। औरत के लिए किसी नंबर को डिलीट करने जैसा सहज और आसान। जिससे भी परेशानी या असहजता हुई, डिलीट मार दिया। आॅप्शन की दुनिया में आखिरी और सही आॅप्शन कोई नहीं है। राम सजीवन को ‘तीसरी कसम’ का हीरामन याद आता है। फिल्म का अंतिम दृश्य। बैलों को मारते हुए अपने भीतर की खीझ निकालता हुआ हीरामन, ‘पीछे पलटकर क्या देखते हो। खाओ कसम कि आज के बाद अपनी गाड़ी से किसी जनानी को नहीं ढोओगे’, हीरामन की तीसरी कसम। फिल्म यहीं खत्म हो जाती है। नहीं मालूम हीरामन आगे के जीवन में अपनी इस कसम को निभा पाया या नहीं... क्या पता उसने कसम तोड़ दी हो... क्या मालूम चौथी-पांचवी कसमें भी खानी पड़ी हों। कसमें हीरामन ही खाते हैं, हीराबाई नहीं। शराब में डूबकर देवदास ही मरते हैं, पारो नहीं... कैस से पागल मजनूं ही बनतेे हैं, लैला नहीं।

राम सजीवन दुःख और आक्रोश से भरे यही सब सोच रहे हैं, जो शायद सही नहीं है और जिसे वह भी समझ रहे हैं। लेकिन संताप विवेक का अपहरण कर लेता है। राम सजीवन चूंकि खुद एक पीडि़त थे, इसलिए निष्पक्ष ढंग से औरतों को नहीं समझ पाए। उन्हें शोेपनहावर याद आए जो औरतों को तमाम बुराइयों की जड़ मानते थेे या जो कहते थे स्त्रियां बहुत चालाक होती हैं। वह श्लोक, ‘त्रिया चरित्रं पुरुषस्य भाग्यम/देवो न जानति कुतो मनुष्यः।’ तुलसी की चौपाई जिसमें उन्हें तारण का अधिकारी माना गया। बुद्ध की मनाही कि स्त्रियों के आने से धर्म बहुत जल्द नष्ट हो जाएगा। भावावेग में राम सजीवन से औरतों को समझने में चूक हो गई। उन्होंने उन्हें देखकर जानने की कोशिश की। यही गलती है, औरत को जानना है तो उनके भीतर उतरकर खुद औरत बनकर कुछ देर रुकिए तभी समझा जा सकेगा उन्हें। 

स्त्री का बयान : हम चांद हैं। चांद पर हैं। चांद पर बने रहना चाहती हैं। लेकिन कुछ अंतरिक्ष यात्री चांद की खूबसूरती को खत्म कर देते हैं। हमें भी ख्वाब देखने का पूरा हक है। लेकिन मर्दों की बनिस्बत एक औरत का ख्वाब कांच जैसा नाजुक होता है जो अक्सर ही टूट जाता है। लेकिन उसे कांच सरीखा पारदर्शी तो बिलकुल ही नहीं होना चाहिए। हार भी ऊब देती है। हम अपनी हजारों सालों की हार से ऊब गई हैं। उन्मुक्त गगन के हम पक्षियों को इतने वक्त तक सोने-चांदी-लोहे के पिंजड़ों में रखा गया कि हम उड़ना ही भूल गए। हम इतने पिछड़ गए कि अब सबसे आगे निकल जाने के लिए हम कुछ हद तक निर्मम भी हो गई हैं। इस निर्ममता के दोषी हम नहीं, समय-समाज है। लोग हमें जीना नहीं, पाना चाहते हैं। जिसने भी हमें पाने की जिद की उसने खो दिया। आप तर्क दे सकते हैं, पाना कोई अपराध तो नहीं है। लेकिन हमें हमेशा ही जागीर समझा गया। रियाया माना गया। देवी बताकर दासी का दर्जा दिया गया। हमें कभी दांव पर लगाया गया तो कभी अपनी छवि की खातिर देशनिकाला दे दिया गया। हमने इतने निर्वासन झेले हैं कि ‘निर्वासन’ के पयार्य हो गई हैं। इतने जुल्मो-सितम सहे हैं। आंसू बहाए हैं कि अब हम किसी भी सूरत में रोना नहीं चाहते। हमसे इतने सवाल किए गए कि हर सवाल का चाबुक हमारे बदन से वस्त्र हटा देता है। किसी भी सवाल पर हमें अपने नंगेपन का शर्मनाक एहसास होने लगता है। हमारा पति (मालिक) कभी भी प्रेमी नहीं हो सकता। प्रेम नहीं दे सकता। सुविधा की पलंग पर हमें सुख देकर उसके बाद सब कुछ हर लेता है। प्रेमी के पति होते ही प्रेम खत्म। हमें प्रेम के पल चुराने पड़ते हैं।

हमारे सामने सामाजिक-सांस्कृतिक दबाव इतने गहरे हैं, नैतिकता की बंदिशें इतनी मजबूत हैं कि उनसे लड़ते-लड़ते हम रहस्यमयी हो जाती हैं। हम जटिल इसलिए मान ली गई हैं कि हम झूठ बोलती हैं। झूठ इसलिए बोलती हैं कि सच मर्दों को बर्दाश्त नहीं होगा। अगर औरत सब कुछ सच ही बोलने लगे तो दुनिया के सारे मर्द मारे शर्म के समंदर में डूब जाएंगे या हिंसा का ऐसा दावानल दहकेगा जिसमें सब कुछ भस्म हो जाएगा। झूठ हमारी सुरक्षा भी करता है। हम जादू नहीं जानतीं। पुरुष के भीतर इच्छा जगाती भर हैं। हम संजीवनी सरीखी स्त्रियां हैं, मुर्दों को भी जिंदा कर देती हैं। हमें जन्म देना आता है। दो बूंद वीर्य को अपने भीतर जब्त कर, नौ महीने तक यातना सहकर उसे इंसानी शक्ल सिर्फ हम ही दे सकती हैं।

...और अंत में : राम सजीवन का दर्द अपनी जगह है। स्त्री के बयान की भी अहमियत है। दोनों ही सच हैं। सच हो सकते हैं। लेकिन मुझे इन दोनों की फांक में कुछ चीजें दिखाई दे रही हैं। चालीस पार औरतें सिर्फ औरतें ही नहीं हैं जो व्यर्थताबोध सेे कदम भर पहले खड़ी भारी अकुलाहट में हैं। वे तो एक प्रतीक भर हैं। हमारा पूरा निम्न मध्यवर्गीय समाज चालीस पार औरत है जो अपने सामर्थ्य की सीमा, बंदिशों की हदबंदी के बावजूद निर्मम ढंग से महत्वाकांक्षी हो गया है। वह अपनी हर खुशी हासिल कर लेना चाहता है, लेकिन कोई भी जोखिम लेने को तैयार नहीं है। सपने को सच करना चाहता है, लेकिन सुविधाओं के आंगन से बाहर निकलने की असुविधा झेलने को तैयार नहीं। सच तो यह है कि हम सब चालीस पार औरतें हैं जो अपनी मौजूदा ऊब से बाहर निकलने का कोई न कोई रास्ता ढूंढ़ते हैं, दौलत-शोहरत और मोहब्बत के जरिए। हममें से अधिकतर ये तीनों ही चीजें चाहते हैं। हम यथार्थ के साथ सोते हुए हमेशा फैंटसी को जीते हैं। जो है वह हमें तहेदिल से नहीं, विकल्पहीनता के साथ मंजूर है। लेकिन चालीस पार औरत इरोम शार्मिला भी है जो प्रेम करती है, कविता लिखती है, लेकिन जिसका जीना देश और सामाज के लिए है। वह स्वार्थ-परिधि जिसे बाहर निकल गई है। उसने जान लिया है कि खुद के बारे में सोचना मौजूदा समय में अश्लील होना है। लेकिन इसका क्या किया जाए कि अश्लील को अश्लील कहना वर्तमान समय में सबसे बड़ी अश्लीलता है। अश्लीलता को सामाजिक मान्यता मिल रही है। सामाजिक मान्यता वाले हाशिए पर हैं। फर्क सनी लियोनी, पूनम पांडेय, शर्लिन चोपड़ा के बरअक्स इरोम, मेधा, अरुणा राॅय, सोनी सौरी, सीमा आजाद के रूप में समझा जा सकता है। परिवार से बड़ा प्रेम।

प्रेम से बड़ी जिंदगी की जद्दोजहद। लेकिन प्रेम की परिधि वही नहीं है जिसमें राम सजीवन या चालीस पार औरतें फंसी हुई हैं। प्रेम पथ पर चलते हुए सिर्फ सुख-सुविधा की ही आकांक्षा प्रेम की हत्या कर उसे एक ऐसे बेजान जिस्म में ढाल देना है जिस पर स्वार्थ का खूबसूरत कफन चमकता बहुत है। उस पर नकली हंसी-खुशी के कुछ फूल भी बिखरे रहते हैं। लेकिन कफन और फूल जिस्म के मुर्दापन को कहां ढंक पाते हैं। बकौल जाॅन एलिया सिर्फ जिंदा रहे तो मर जाएंगे। मुक्तिबोध ने भी सलाह दी थी, मरना होगा, मरते रहने का करते रहना होगा प्रयास। जीवन को जीता तो वही है जो हर पल मरता है, बाकी तो बस जिंदा भर हैं? हमारी शुभकामनाएं राम सजीवन के साथ हैं जिनके लिए किसी को जीना ही उसे प्रेम करना है और प्रेम करते हुए जीना हर पल मरना है। चार्ली चैप्लिन की उस बात को याद करते हुए, ‘मेरा दर्द किसी की हंसी का कारण हो सकता है। लेकिन मेरी हंसी-खुशी को किसी के दर्द का कारण कभी नहीं होना चाहिए।’ 

आखिर में फिर से रघुवीर सहाय की कहानी ‘चालीस के बाद प्रेम’ की पंक्तियां, ‘वह समझ रहे थे कि उन्होंने उसके साथ क्या किया है और यह भी जान रहे थे कि वह नहीं समझ सकती कि खुद उनके साथ क्या हुआ है! एकाएक वह अपनी असहायता से छटपटा उठे। हालांकि उनके दिल में प्यार-ही-प्यार था, मगर बिल्ली को किसी तरह यह बताने का तरीका वह नहीं जानते थे। चालीस बरस तक वह हर बार एक मौका और मांग चुके हैं, मगर आज फिर मांग रहे हैं।


'पाखी' सितंबर-2014 अंक का संपादकीय 

1 टिप्पणी:

  1. एक सार्थक संपादकीय जो स्त्री विमर्श से परे आम इंसानी सोच को इंगित करता है राम सजीवन के माध्यम से तो दूसरी तरफ़ समाजिक इकाई की दुर्दशा जिसे स्त्री और पुरुष बना विवेचित करने की कोशिश की है मगर लगता है सब सिर्फ़ स्त्री तक ही सीमित रह जायेंगे या फिर चालीस साला तक ही उससे इतर संपादक ने कहना क्या चाहा है संपादकीय में वो गौण हो जाएगा क्योंकि आज हमारी सोच सिर्फ़ एक शब्द या वाक्य तक ज्यादा सीमित हो गयी है बजाय मूल तत्व की ओर देखने के । यदि मूल तत्व देखा जाए तो स्त्री या उसकी उम्र पर ध्यान ही नहीं जायेगा बल्कि हाशिये पर खडे मध्यम और निम्न वर्ग का प्रतिनिधित्व करता दिखाई देगा संपादकीय । वरना लिखने को और जवाब देने को वो भी स्त्री की तरफ़ से इतना ही काफ़ी होता यदि ये महज स्त्री विमर्श को ध्यान में रखकर ही लिखा गया होता कि

    उम्र के विभाजन और तुम्हारी कुंठित सोच
    ****************************************
    स्त्रियां नहीं होतीं हैं
    चालीस , पचास या अस्सी साला
    और न ही होती हैं सोलह साला
    यौवन धन से भरपूर
    हो सकती हैं किशोरी या तरुणी
    प्रेयसी या आकाश विहारिणी
    हर खरखराती नज़र में
    गिद्ध दृष्टि वहाँ नहीं ढूँढती
    यौवनोचित्त आकर्षण
    वहाँ होती हैं बस एक स्त्री
    और स्खलन तक होता है एक पुरुष
    प्रदेश हों घाटियाँ या तराई
    वो बेशक उगा लें
    अपनी उमंगों की फ़सल
    मगर नहीं ढूँढती
    कभी मुफ़ीद जगह
    क्योंकि जानती हैं
    बंजरता में भी
    उष्णता और नमी के स्रोत खोजना
    इसलिये
    मुकम्मल होने को उन्हें
    नहीं होती जरूरत उम्र के विभाजन की
    स्त्री , हर उम्र में होती है मुकम्मल
    अपने स्त्रीत्व के साथ
    भीग सकती है
    कल- कल करते प्रपातों में
    उम्र के किसी भी दौर में
    उम्र की मोहताज नहीं होतीं
    उसकी स्त्रियोचित
    सहज सुलभ आकांक्षाएं
    देह निर्झर नहीं सूखा करता
    किसी भी दौर में
    लेकिन अतृप्त इच्छाओं कामनाओं की
    पोटली भर नहीं है उसका अस्तित्व
    कदम्ब के पेड ही नहीं होते
    आश्रय स्थल या पींग भरने के हिंडोले
    स्वप्न हिंडोलों से परे
    हकीकत की शाखाओं पर डालकर
    अपनी चाहतों के झूले
    झूल लेती हैं बिना प्रियतम के भी
    खुद से मोहब्बत करके
    फिर वो सोलहवाँ सावन हो या पचहत्तरवाँ
    पलाश सुलगाने की कला में माहिर होती हैं
    उम्र के हर दौर में
    मत खोजना उसे
    झुर्रियों की दरारों में
    मत छूना उसकी देहयष्टि से परे
    उसकी भावनाओं के हरम को
    भस्मीभूत करने को काफी है
    उम्र के तिरोहित बीज ही
    तुम्हारी सोच के कबूतरों से परे है
    स्त्री की उड़ान के स्तम्भ
    जी हाँ ……… कदमबोसी को करके दरकिनार
    स्त्री बनी है खुद मुख़्तार
    अपनी ज़िन्दगी के प्रत्येक क्षण में
    फिर उम्र के फरेबों में कौन पड़े
    अब कैसे विभाग करोगे
    जहाँ ऊँट किसी भी करवट बैठे
    स्त्री से इतर स्त्री होती ही नहीं
    फिर कैसे संभव है
    सोलह , चालीस या पचास में विभाजन कर
    उसके अस्तित्व से उसे खोजना
    ये उम्र के विभाजन तुम्हारी कुंठित सोच के पर्याय भर हैं ………ओ पुरुष !!!

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