हृषीकेश सुलभ - कहानी: 'अगिन जो लागी नीर में' | Hindi Kahani: Hrishikesh Sulabh

हृषीकेश सुलभ की हर कहानी का अपना आकाश होता है.... विस्मय करती बात होती है कि इन आकाशों को हृषीकेश सुलभ आपस में मिलने नहीं देते। उनके किस्से, पात्रों और कहानी, भाषा और कहानीपन, पाठक और कहानीकार सब को एक डोर से बांधे रहते हैं ..... इस डोर का सूत उनकी कलम लगातार पैदा किये जा रही है, और हमें-आपको उनसे बांधे रख रही है। हृषीकेषजी से बात हुई तो पता लगा कि इनदिनों अपने उपन्यास को लिखने में व्यस्त हैं जो जल्द ही पूरा होने वाला है ... उपन्यास अंश 'शब्दांकन' को देने का वादा करते हुए ये कहानी आप के लिए भेजी है ।

आनन्द उठाइए, पढ़िए  ''अगिन जो लागी नीर में''

भरत  तिवारी

अगिन जो लागी नीर में

हृषीकेष सुलभ

अख़बार में सुवंती की फोटो तो सबने देखी, पर ख़बर ठीक से सब नहीं पढ़ पाए। फोटो ही ऐसा विस्फोटक था कि ख़बर का एक-एक हर्फ़ पढ़ने का धीरज नहीं रह पाया किसी के पास। केवल जगत कानू ही थे ख़बरों के रसिया, जो पूरी ख़बर पढ सके और कारी के बथान से उठकर बाज़ार पहुँचे।


सूचना- विस्फोट ठीक ग्यारह बजे हुआ। ........ग्यारह बजे दिन में।

गाँव के पूरबी छोर पर कारी भेडि़हर का बथान था। सूचना की आस लगाए रोज़ की तरह यहीं बैठे थे जगत कानू। वही इस सूचना-विस्फोट के पहले शिकार बने। जगत कानू के परखचे उड़ गए। वह ख़बरों के रसिया थे। रोज़ ख़बरों से उनकी मुठभेड़ होती। वह ख़बरों को सम्भालना, चुभलाना और उनका स्वाद लेना जानते थे। पर ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था कि उनकी बोलती बंद हो जाए। जगत कानू सिर्फ़ इतना भर चीख़ पाए .......‘‘गजब रे छौंड़ी.......गजब!’’

कारी का बथान, बस कहने भर के लिए बथान था। वह सम्पन्न किसान थे। एक बड़ा दालान, दो कोठरियाँ और एक ओसारा। सामने चार-पाँच कट्ठे का सहन। सहन में नीम और कटहल और आम के पेड़। कुआँ था। कुआँ में पानी निकालने के लिए ढेंकुली लगी थी। इस पूरे जवार में यही एक कुआँ था जिस पर अब ढेंकुली बची थी। कतारबद्ध पाँच नादोंवाला चबूतरा था। चारा मशीन, भेड़ की उन, हल-हेंगा, रस्सी-पगहा, खटिया-चैकी, खाद-बीज, माल-मवेशी, बैठकबाज-गप्पी और कारी और कारी का जवान बेटा रामलगन - सब अँटे-गँसे थे इस बथान में। कारी-बहू दिन का कलेवा लेकर आती और बाप-बेटे को खिलाकर काम-धाम निबटाती हुई शाम तक वापस घर लौटती। रात में रामलगन खाना खाने घर जाता और बाप के लिए खाना साथ लिये लौटता। कभी-कभार नहीं भी लौटता। तबीयत दब होने के बहाने रुक जाता। फिर कारी-बहू पति का खाना लेकर बथान आती और रात गुज़ारकर भोरे-भिनसारे मुँह-अँधरे लौटती। पहले, जब बेटे का ब्याह नहीं हुआ था, कारी की तबीयत दब होती थी। तब रात में रामलगन घर की अगोरवाही करने चला जाता और कारी-बहू कारी को खिलाने, कारी की सेवा-टहल करने बथान आ जाती। बेटे के ब्याह के बाद यह क्रम उलट गया। कारी के बदले रामलगन की तबीयत दब रहने लगी। कारी बहुत कम घर जाते। साल में दो-चार बार। 

चैत का महीना था। नीम और आम की फुनगियों पर बौर और कटहल के तने में फल लटके थे। कटहल में चोंच मारनेवाले पंछियों का आना-जाना लगा हुआ था। दिन उझंख होने लगे थे। सुबह की सिहरन से दिन में बहनेवाली पछिया हवा का कोई रिश्ता नहीं था। रबी फ़सल की कटनी लगभग पूरी हो चुकी थी। जहाँ-तहाँ बस पिछात फ़सल ही इस पछिया हवा का इंतज़ार करती हुई खेत में खड़ी थी। रबी से पहले ख़रीफ़ ने धोखा दिया था। धान के बीज ही नकली निकल गए। अधिकतर लोग ठगे गए। फसल की बाढ़ और हरियाली तो ऐसी ज़बरदस्त थी कि आँखें जुड़ा जातीं, पर जब धान के गाभ से बालियाँ नहीं निकलीं, तब पता चला कि धरती की कोख पर डाका पड़ गया है। पर इस बार रबी ने मन का मलाल मिटा दिया था।
सूचना-विस्फोट होते ही बथान की आबोहवा बदल गई। रामलगन दालान में बैठा सतुआ की पिट्ठी निगल रहा था। उसकी महतारी दिन का कलेवा लेकर पहुँची थी। बेटे के सामने बैठी उसे पिट्ठी निगलते हुए देखकर तृप्त हो रही थी। विस्फोट से पैदा हुई जगत कानू की अचरज-ध्वनि इतनी दमदार थी कि रामलगन के कंठ में पिट्ठी अटक गई। कारी बहू झपटती हुई उठी और उसने बेटे की पीठ पर एक धौल जमा दी। पिट्ठी नीचे सरक गई। उसने बेटे की ओर पानी से भरा लोटा बढ़ाया, पर रामलगन को फु़र्सत कहाँ! वह कूदा। ओसारे की दीवार से पीठ टिकाए चैकी पर आँखें मिचमिचाते जैसे-तैसे बैठे थे जगत कानू। रामलगन ने झपट्टा मारकर सूचना पर अपना अधिकार जमाया।

वह भी चीख़ा, ‘‘......आहि रे बाप!’’

कारी कुएँ से पानी भर रहे थे। हाथ-मुँह धोकर सतुआ खाने जाने ही वाले थे कि बेटे की गगनभेदी चीख़ से उन्हें काठ मार गया। हाथ से रस्सी छूटी और ढेंकुली कुएँ में गड़ाप हो गई। कुएँ के थिर जल में हिलोरें उठीं। इस सूचना-विस्फोट ने पृथ्वी के ऊपर ही नहीं अतल में भी हलचल मचा दी थी। कारी बेटे का उछल-उछलकर काग़ज़ निहारना देख रहे थे। लिख लोढ़ा, पढ़ पत्थर थे कारी। इस मनहूस काग़ज़ को लेकर हमेशा शंकित रहते थे। वह इसे झंडा पुकारते। इस काग़ज़ के चलते जगत कानू से बतकुच्चन रोज़ का शगल था। जगत कानू का झंडा-प्रेम ही उन्हें जगत की जि़न्दगी की बरबादी का मूल कारण लगता। बेटे को झंडा-वाचन करते देखकर अक्सर चिढ़ते और कहते - ‘‘जगतवा का चेला मत बनो.......झंडा में अझुराओगे तो खेती-बारी बिला जाएगी।’’

जि़ला मुख्यालय सीवान से छपरा जाने के लिए दो सड़कें निकलतीं। एक दुरौंधा होते हुए छपरा जाती और दूसरी हसनपुरा होते हुए। एक सड़क दुरौंधा और हसनपुरा को आपस में जोड़ती थी। यह कच्ची सड़क थी। बरसात में जल और पाँक से आप्लावित और चैत-वैषाख में धूल उड़ाती।  इन्हीं सड़कों के सहारे दैनिक अख़बारों के संस्करण सुबह-सुबह सायकिल पर सवार होकर सीवान से निकलते, दुरौंधा और हसनपुरा होते हुए पूरब और पश्चिम दोनों दिशाओं से हरपुर गाँव में घुसते और साँझ तक हंसों की तरह तैरते रहते। कभी इस हाथ, तो कभी उस हाथ। ऐसा नहीं कि गाँव सिर्फ़ इन अख़बारों के भरोसे था। अरब के कमासुतों के घर डिश टीवी अपने जलवे दिखा रहा था। पर असली संकट बिजली का आना था। बिजली कभी-कभार ही आती थी। बैट्री ख़र्च कर समाचार देखना सम्भव नहीं था। लोग सास-बहू के तमाशों के लिए बैट्री बचाकर रखते। हाँ, अगर कोई ख़ास ख़बर अख़बारों से पता चल जाए, तो फुद्दन मियाँ ज़रूर टेलिविजन खोल देते। उनके दालान में भीड़ जुट जाती। पर इन दिनों फुद्दन दिन-ओ-दुनिया से ग़ाफि़ल जी रहे थे। उनके छोटे बेटे मेराज की नई-नवेली दुल्हन ने टेलिविजन दालान से उठवाकर भीतर मँगवा लिया था। पढ़ी-लिखी बहुरिया के रूतबे के आगे फुद्दन मिमियाते रह गए थे। बड़े बेटे मजीद ने पहली बार अरब से लौटते हुए दिल्ली में ख़रीदा था। मजीद बहू ने कभी ऐसी दबंगई नहीं दिखाई। पर इस मेरजवा की बीवी ने तो आते ही......।

गाँव में सूचना-विस्फोट कई जगह हुए, .....थोड़ी-थोड़ी देर के अंतर पर। विस्फोटों के बाद सारा गर्द-ओ गुबार बाज़ार की ओर चला आ रहा था। हरपुर बाज़ार में चहल-पहल बढ़ गई थी। बाज़ार गाँव के बीच में हृदय-स्थल की तरह था। सुबरन साह की चाय की दुकान, हदीस मियाँ की कपड़े की दुकान, किसुनदेव की पान-गुमटी के सामने अख़बार के मुखपृष्ठ पर माथा झुकाए भिनभिनाती हुई मक्खियों की तरह लोग टूट रहे थे। अख़बार के पहले पन्ने पर हेल्थ सेन्टर वाली मैडम माधुरी देवी की बेटी सुवंतिया की फोटो छपी थी। साफ लाँगट-उघार फोटो। पतली चोली और कछिया पहने। फोटो के नीचे छपा था - मिस पटना: सुवंती स्नेहा।

‘‘नाम बदल लीहिस का जी?.......सनेहा का होता है भाई?‘‘ भीड़ में गँसा अपना सिर बाहर निकालते हुए फुद्दन मियाँ ने जिज्ञासा प्रकट की।

‘‘सनेह करनेवाली।.....मोहब्बत बूझते हैं चच्चा?......सबसे मोहब्बत करनेवाली।‘‘ बाबू रामधियान सिंह के  इकलौते कुलदीपक पप्पू सिंह ने अपने ज्ञान का पिटारा खोला।

फुद्दन समझ गए कि अगर उन्होंने तत्काल मेंड़ पर माटी नहीं फेंका तो सब तहस-नहस हो जाएगा। बरसात का पानी है पपुआ। मुँहतोड़ जवाब देने में अगर चूक हुई तो सुवंतिया की सगरी लीला बिसर जाएगी और पपुआ सरे बाज़ार कोई नया तमाशा उनके लिलार पर साट देगा।  फुद्दन ने टिहकारी भरी - ‘‘ तब तो बड़ा बुरा हुआ बाबू।......अब तो तुम्हारे संगतिया की भैंस बिना पानी के डूब गई।‘‘

‘‘मतलब?‘‘ पप्पू फुँफकार उठे।

‘‘मतलब तो साफ़ है बाबू कि जब सबसे मोहब्बत करेगी तो टुन्नी मिसिर बिना हल्दी-मंडप के ही रँडुवा हो जाएँगें।‘‘

बतकही की हवा अपनी दिशा बदल रही थी।  इस दिशा बदलती बतकही की हवा की आहट पाकर सुबरन साह चैकन्ने हो गए। अनिष्ट घटने की आशंका से पहले तो उनका मन काँपा। पर अक्सर ऐसे हालतों से जूझना उनके पेशे की लाचारी थी। बिना बात के बतकुच्चन...... फिर गरमा-गरमी और उसके बाद रे-तो और समापन में लप्पड़-थप्पड़ की सम्भावना हमेशा बनी रहती थी। सुबरन यह मानकर दुकानदारी करते कि रस में मक्खी-मधुमक्खी और हड्डा-बिरनी तो गिरेंगे ही। हालात सम्भालने के लिए वह अलग-अलग अवसरों पर अलग-अलग अस्त्रों का उपयोग करते। सुबरन बोले - ‘‘ बंद कीजिए रामायन बाँचना। दीजिए, चूल्हा सुलगाना है।‘‘

‘‘हे मरदे, आज के पेपर से आज चूल्हा जलेगा?‘‘ मंगल मिसिर अभी तक सुवंतिया की फोटो का दर्शन नहीं कर सके थे।

‘‘कौन वेद-पुरान में लिखा है कि आज के पेपर से आज का चूल्हा नहीं जलेगा?......आप लोग लोकसभा विसरजन कीजिए।.....बराए मेहरबानी बेंच खाली कीजिए। बेंच का कील-कब्जा ढीला हो गया पर एक गिलास चाय-पानी का औडर नहीं‘‘

‘‘चार स्पेशल......एक कलछुल भी पानी नहीं।‘‘ मौक़े की नज़ाकत भाँपकर पप्पू सिंह ने चाय का आर्डर दिया। बोले, - ‘‘......और मंगल बाबा के लिए मलाई के साथ चीनी बढ़ा के .....और एक ठो डंडा बिस्कुट भी...।‘‘

‘‘नकली दाँत से डंडा बिस्कुट टूटेगा?‘‘ भीड़ से किसी ने नगीना जड़ा और अगिया-वैताल हो गए मंगल बाबा। गरजे - ‘‘सरऊ! खिलाओ अपनी नानी को.....हरपुर से रजानीपुर तक ढोल-ताशा पीटवाते हुए तुम्हारे बाप की बारात लेकर गए थे। बेटी की विदाई के बदले अपने डोली पर चढ़ने के लिए बेचैन थी तुम्हारी नानी। ..........सरऊ, तुम्हारे पैसे की चाह को हम मूत बूझते हैं।‘‘

मंगल मिसिर अपनी लकुटी भाँजते हुए नाचने लगे। सुवंतिया की फोटो देखने की लालसा पर पानी फेर दिया लौन्डों-लपाड़ों ने। पप्पू को गरियाते लौट गए मंगल मिसिर। मंगल मिसिर के चिड़चिड़ेपन, क्रोध और गालियों की ख्याति पूरे जवार में थी। वह जब अपने घर से बाज़ार के लिए निकलते सारा गाँव स्पन्दित हो उठता। बस एक चुहल भर की देर होती। गाँव का कोई नवतुरिया एक बोल और मंगल मिसिर उससे अपने रिश्ते का घ्यान रखते हुए उसकी दादी-नानी की ऐसी-तैसी करते। गालियों की परवाह किए बग़ैर लोग मज़े लेते। औरतें भी चुहल करने में चूकती नहीं थीं। सब अवसर की ताक में रहते।

‘‘फुद्दन चा, अपना टीवी चालू कीजिए। सब दिखा रहा होगा। का अख़बार में मूड़ी गोते हुए हैं!‘‘ पप्पू सिंह के कलेजे में टुन्नी वाली बात चुभ गई थी। वह फुद्दन मियाँ को बिना लपेटे सरकने नहीं देना चाहते थे। पप्पू का मानना था कि मंगल बाबा के परलोक सिधारने के बाद फुद्दन ही होंगे गाँव के मनोरंजन-पुरुष। लाख उकसाते रहे पप्पू, पर फुद्दन मियाँ बज्र बहिर की तरह अनसुनी करते रहे। उनकी रुचि अभी पप्पू में नहीं, सुवंतिया की रसचर्चा में थी। वह अपने मन का स्वाद बिगाड़ना नहीं चाहते थे। 

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पप्पू सिंह और टुन्नी मिसिर जिगरी यार थे। लँगोटिया यारी थी। टुन्नी और सुवंती की प्रणय-लीला में पप्पू सहचर थे। खेत-खलिहान,...... राह-घाट,......रात-बिरात,.... दिन-दोपहर; हर स्थान और हर घड़ी वह रक्षा-कवच की तरह टुन्नी और सुवंती के मिलन-यज्ञ की रक्षा में तत्पर रहे थे। टुन्नी भावुक कि़स्म के प्रेमी थे और पप्पू हर हाल में साथ निभाने वाले दोस्त। टुन्नी अपनी सुवंती के लिए कुछ भी त्यागने और कुछ भी बनने को उत्सुक थे, तो पप्पू अपने दोस्त के लिए किसी से भी रार ठानने और लोहा लेने के लिए। टुन्नी कवि-हृदय थे और पप्पू योद्धा। प्रेम में जब-जब संकट-काल आया टुन्नी मिसिर भर-भर आँख लोर लिये बिसूरे और पप्पू सिंह ने धीरज के साथ मोर्चाबन्दी की और राह निकालने के प्रयास किए। टुन्नी मिसिर के पिता पंडित माधवबिहारी मिसिर व्यास थे। रामचरितमानस और भागवत की कथा बाँचते। पप्पू सिंह के पिता रामधियान सिंह गाँव-जवार के मुक़दमों की पैरवी के अनुभवी खिलाड़ी थे। जि़ला कचहरी के नामी-गिरामी वकीलों-मुख़्तारों में उनकी पैठ थी।

टुनिया-पपुआ की जोड़ी गाँव-जवार में प्रसिद्ध थी। दोनों ने यह प्रसिद्धि सुवंती के कारण अर्जित की थी। जब तक मामला गाँव के हाईस्कूल का था, बात गाँव में थी। पर जब सीवान के इस्लामिया कालेज में दाखि़ला हुआ, बात पूरे जवार में फैल गई। रामघियान सिंह चाहते थे कि उनके दुलरुवा अब घर-गृहस्थी देखें और उनका राज-पाट सम्भालें, पर पप्पू सिंह इसके लिए तैयार नहीं थे। रामधियान सिंह ने पारम्परिक हथियार का उपयोग करते हुए बेटे का विवाह तय कर दिया। पप्पू पहले तो बहुत छटपटाए और अन्न-जल त्यागने का नाटक किया। बाप से आँखें मिलाने या ज़ुबान लड़ाने की औकात थी नहीं, सो एक घुड़की में राह पकड़ लिया। कारी के बथान पर  जगत कानू से गाँजा का चिलम लहकाने के प्रशिक्षण के दौरान पकड़े गए और बिना मुक़ाबला किए चित हो गए। रामधियान सिंह बोले - ‘‘चलो बबुआ,.......तुम्हारी सज़ा पहले ही हम मुकर्रर कर दिए हैं। अगर गाँव-जवार में बात पसर गई कि गँजेड़ी हो, तो कौनो राजपूत बेटी न देगा। औरत कीन-बेसाह कर हाड़े हरदी चढ़वाना पड़ेगा। अब बेहुरमती बन्द करो.....चलो।‘‘

पप्पू सिंह बाप के जूतों की ताब से परिचित थे, सो बिना हील-हुज्जत सिर झुकाए चल दिए। रामधियान सिंह ने जगत को लहकती आँखों का निशाना बनाया और बोले - ‘‘ जगतवा, तुमसे तो हम बाद में निपटेंगे। .......साले, चुप्पा-हत्यारा माफिक मूड़ी गोत के बैठे-बैठे हमारे घर में आग लगा रहा है.......... अपना खेती-बारी तो सब चिलम में लहका दिया और अब......।‘‘ कारी की ओर मुख़ातिब हुए। कारी अपनी जाति के पंचायत के सरगना थे। भेडि़हरों का गाँव ही नहीं पूरे जवार में बड़ा संगठन था। वह कारी की ताक़त और बदले हुए समय का मिज़ाज जानते थे, सो अपेक्षाकृत नरम आवाज़ में बोले - ‘‘का हो कारी भाई,.......मरदे! तुमहूँ आँख मूँद के बैठे रहते हो? .....‘‘ और कारी के जवाब की प्रतीक्षा किए बिना चले गए।

पप्पू सिंह टाटा सूमो पर सवार होकर गए और तिलौथा के मुखिया रामपूजन सिंह की बेटी ब्युटी सिंह को व्याहकर ले आए। साथ में हीरो होन्डा भी आया। टुन्नी मिसिर चलाकर ले आए थे।

पप्पू सिंह के विवाह के बाद टुन्नी मिसिर के विवाह की क़वायद शुरु हुई, पर पंडित माधवबिहारी मिसिर ने ग्रहों-नक्षत्रों का हवाला देते हुए इस प्रसंग पर विराम लगा दिया। टुन्नी की कुंडली में  तीन सालों के लिए योग नहीं बन रहा था। बाल-बाल बचे टुन्नी मिसिर। इस चर्चा पर विराम लगने तक सुवंती ने बिना किसी को बताए गौरी पूजन किया। व्रत-उपवास किया। जब यह तय हो गया कि टुन्नी के विवाह का प्रसंग स्थगित हो गया तब सुवंती ने चैन की साँस ली। इस बीच फुद्दन मियाँ की बड़ी पतोहू उसका सहारा बनी रही। वह उम्र में लगभग पन्द्रह साल बड़ी और काफ़ी अनुभवी थी। अपने मायके में अपना प्रेमी छोड़कर ससुराल आई थी। हर संकट में वह सुवंती को अपने अनुभवों की पिटारी से नुस्ख़े निकालकर सलाह देती।

टुन्नी, पप्पू और सुवंती ने साथ-साथ मैट्रिक पास किया था। पप्पू जैसे-तैसे फलाँग गए थे। टुन्नी फर्स्ट डिविज़न से निकले थे और सुवंती विज्ञान के विषयों में जैसे-तैसे, पर आर्ट के विषयों में अच्छे नम्बरों से पास हुई थी। न चाहते हुए भी पप्पू सिंह के पिता को उनका नाम काॅलेज में लिखवाना पड़ा क्योंकि दहेज़ में अच्छी रकम के लिए यह आवश्यक था। टुन्नी की पढ़ाई में रुचि और तेजतस्विता ने उनके पिता को विवश किया कि अपने आर्थिक संकटों की अनदेखी करके वह बेटे का नाम काॅलेज में दर्ज़ कराएँ। तीनों में केवल सुवंती की आगे की पढ़ाई तय थी। गाँव के उजड़ चुके हेल्थ सेन्टर की मिडवाइफ़ श्रीमती माधुरी देवी हर हाल में अपनी बेटी को शिक्षित बनाने के लिए उत्सुक थीं। वह चाहती थीं कि उनकी बेटी डाॅक्टर बने।

माधुरी देवी जब इस गाँव के नवस्थापित हेल्थ सेन्टर में अपनी नवजात बेटी के साथ मिडवाइफ़ के रूप में नौकरी ज्वाइन करने आईं, तब उन्होंने सोचा भी नहीं था कि वह यहीं की होकर रह जाएँगी। माधुरी देवी के आने के कुछ ही महीनों बाद बंगालिन नर्स झरना सरकार ने सीवान के जि़ला अस्पताल में अपना तबादला करवा लिया था। उन्होंने ही माधुरी देवी की बेटी का नामकरण किया था - सुवंती। जाते-जाते सलाह देती गईं कि जितनी जल्दी हो सके यहाँ से तबादला करवा लो और डाॅ. पीसी से बच के रहना। डाॅ. पीसी यानी डाॅ. प्रकाश चन्द्र सिन्हा। डाॅ. पीसी पटना में रहते थे। सप्ताह में एक दिन आते। सुबह पटना से चलते और दोपहर तक गाँव में प्रकट होते। हेल्थ सेन्टर पहुँचने से पहले रामबरन यादव मुखिया के द्वार पर हाजि़री लगाते और भोजन करते। दूसरे दिन की सुबह पटना वापस चले जाते। एवज़ में हेल्थ सेन्टर की दवा बेचकर मुखिया का हिस्सा सौंपते। शुरु-शुरु में डाॅ. पीसी जिस दिन सेन्टर पर रहते माधुरी देवी थरथर काँपतीं। जब रोब-दाब से बात नहीं बनी लार टपकाते हुए हें-हें करने लगे डाॅ. पीसी। एक दिन प्रणय निवेदन करते हुए उन्होंने माधुरी से कहा - ‘‘ देवीजी, जब से आप सेन्टर ज्वाइन की हैं, पटना में मन ही नहीं लगता। यहाँ रहने का कोई इंतज़ाम ही नहीं है। होता तो हफ़्ता-दस दिन पर पटना जाते। ........अगर आप कहें तो आपके घर ही डेरा डाल दें.....।’’

‘‘हमारा घर धर्मशाला नहीं है और न तो प्लेटफार्म है।’’ माधुरी देवी अपनी थरथराहट पर विजय पा चुकी थीं। टके-सा जवाब दे तमक कर उठीं माधुरी और दनदनाती हुई बाहर निकल गईं। बस भरम टूटने भर की देर थी। 

डाॅ. पीसी ने तेज़ आवाज़ में कहा - ‘‘कल सीविल सर्जन साहेब आ रहे हैं। पहला काम तुम्हारा सस्पेंशन करवाएँगे।’’

 अपनी धमकी की प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा करते डाॅ. पीसी के मुँह पर ब्रह्मास्त्र गिरा, तो वह अचकचा उठे। उनकी धमकी सुनते ही माधुरी देवी लौटीं और उन्होंने दरवाज़े के पास से ही चप्पल फेंक कर उन्हें ध्वस्त कर दिया। डा. पीसी कुछ समझें-बूझें कि रणचण्डी का रूप धारण किए माधुरी उनके सामने थीं। उनकी ज़ुल्फ़ें माधुरी की बायीं मुट्ठी में थीं। दायें हाथ से लगातार चप्पलें बरसाती माधुरी का अजस्र नाद गूँज रहा था। देखते-देखते भीड़ लग गई। बड़ी मुश्किलों से लोगों ने माधुरी देवी पर नियंत्रण क़ायम किया। डाॅ. पीसी बिना रुके उसी साँझ पटना के लिए रवाना हो गए। माधुरी फुँफकारती हुई अपने घर गईं।

 उनका घर ढहते हुए एक विशाल मकान की दो साबुत बची कोठरियों और आँगन वाला घर था। यह घर कायस्थ टोले में था। हरपुर के कायस्थों के सारे परिवार शहरों में बस चुके थे। खेती-बारी बिक चुकी थी। बस ढह चुके मकानों की डीह या कुछ ढहते हुए मकान बचे थे। ऐसे ही एक मकान में माधुरी देवी का आशियाना था। अपनी बिरादरी की औरत जानकर सीवान जा बसे वकील त्रिभुवन लाल ने उन्हें मुफ़्त में रहने की अनुमति दे दी थी। बाहर की औरत थी, सो मकान कब्ज़ा होने का ख़तरा नहीं था और दूसरा यह लालच कि आदमी का वास रहेगा तो जितना बचा है उसकी देखरेख और साफ़-सफ़ाई होती रहेगी।

डाॅ. पीसी बहुत दिनों तक नहीं लौटे। जब लौटे, तबादले और रिलीविंग का आदेश लिये। डाॅ. पीसी को हरपुर गाँव के हेल्थ सेन्टर के पहले और अन्तिम डाॅक्टर होने का गौरव प्राप्त हुआ। उनके जाने के बाद कोई नहीं आया। इस घटना पर हरपुर में मिलीजुली प्रतिक्रिया हुई। इस घटना से पहले माधुरी देवी को लेकर होनेवाली तमाम चर्चाओं का रूप बदल गया और इन चर्चाओं के पक्ष-विपक्ष भी बदल गए। माधुरी के पति को लेकर अर्से तक गाँव के पास कोई ठोस सूचना नहीं थी। कुछ लोग उन्हें सधवा का ढोंग करनवाली विधवा बताते, पर साज-सिंगार में कोई कमी न पाकर कुछ लोग इससे सहमत नहीं थे। कुछ तलाकशुदा बताते, तो कुछ ख़राब चाल-चलन के चलते घर से निष्काषित.......। पर इस घटना ने यह तो साबित कर दिया कि माधुरी देवी हवा-मिठाई का गोला नहीं हैं कि जो चाहे मुँह में दाब ले। गाँव की औरतों के बीच उनका मान और भरोसा बढ़ गया। करुणा और हुनर का मणिकांचन संयोग पहले से ही था और अब यह साहस सोने में सुहागा साबित हुआ। गाँव को माधुरी देवी के हवाले कर सरकार भी चादर तानकर सो गई। हेल्थ सेन्टर की दीवारों से रेत भरभराने लगी।  बिना नींव की दीवारें  हिलीं, तो छत गिरी। फिर खिड़कियों-दरवाज़ों का काठ सड़ा और लोग माघ के पाले में फूँक-ताप गए। सिविल सर्जन साहब के आॅफिस सेे माधुरी देवी को वेतन मिलना बंद हो गया। सिविल सर्जन के अनुसार यह सेन्टर ‘मृत घोशित’ हो चुका था क्योंकि, डब्ल्यु. एच. ओ. की जिस योजना में यह सेन्टर खुला था, वह बन्द हो चुकी थी। पर माधुरी देवी ने हरपुर नहीं छोड़ा। हरपुर ही नहीं आसपास के गाँवों की विवाहिताओं के प्रसव और क्वाँरियों के गर्भपात का दायित्व उनके कंधों पर आ पड़ा था। वह अपना दायित्व सम्भालने में प्राणपण से जुट गईं। देखते-देखते माधुरी देवी हरपुर में ‘प्रभुजी तुम चन्दन हम पानी’ की तरह घुल-मिल गईं। उन्होंने एक दिन सीवान जाकर मरणासन्न वकील त्रिभुवन लाल के पाँव पकड़कर करुण-क्रन्दन किया। आँचल पसार बोलीं - ‘‘बेसहारा मानकर आश्रय दिए........अब बेटी मानकर बसा दीजिए।’’ जि़न्दगी भर कचहरी में मुव्वकिलों का रक्त पीकर अतृप्त रहनेवाले वकील साहब ने पच्चीस हज़ार रुपए में ज़मीन के काग़ज़ पर हस्ताक्षर कर, मृत्यु से पहले एक बेसहारा को बसाने के पुण्य से अपनी आत्मा को तृप्त किया। हरपुर की स्थायी नागरिकता ने माधुरी देवी की सामाजिक हैसियत को ताक़तवर बनाया। काँख में दाबे अपनी जिस नवजात बेटी को लेकर वह सालों पहले इस गाँव में आई थीं, आज उसकी जवानी, ख़ूबसूरती और हुनर से पूरे जवार में अँजोर हो रहा था।

सुवंती और टुन्नी मिसिर के प्रणय का बीज कारी के बथान में ही अंकुरित हुआ था। लोअर प्राइमरी स्कूल, मिडिल स्कूल और हाई स्कूल - तीनों के रास्ते कारी के बथान से होकर ही गुज़रते थे। स्कूल आते-जाते बच्चों का हुजूम कारी के बथान पर डेरा डालता। कारी ख़ुद ढेंकुल से पानी खींच-खींच कर बच्चों की तृशा बुझाते। बथान के पीछे था इमली का विशाल पेड़ और थीं करजीरी की जंगली झाडि़याँ। लोअर स्कूल में शिक्षारम्भ के समय यहीं इमली की फलियाँ देकर टुन्नी मिसिर ने सुवंती को अपनी सखी चुना था। और बदले में सुवंती ने करजीरी के लाल-काले दानों की माला टुन्नी मिसिर को दी थी। बड़ी मुश्किलों , पर बड़ी जतन से यह माला तैयार हुई थी। वह करजीरी के पके दाने चुनकर घर ले गई। माँ के सिलाई बाक्स से सूई-धागा चुराया। अपनी अँगुलियों को लहूलुहान कर माला गूँथा। रामलगन ने भी टुन्नी, पप्पू और सुवंती के साथ स्कूल जाना शुरु किया था, पर यह सिलसिला जल्दी ही टूट गया। एक तो भेड़ों की चरवाही से उन्हें अवकाश नहीं मिलता था और दूसरे रामलगन पढ़-लिख कर अपनी जि़न्दगी को साँसत में नहीं डालना चाहते थे। बस किसी तरह काग़ज़ बाँचना सीखकर उन्होंने अपनी शिक्षा पर विराम लगा दिया। टुन्नी, सुवंती और पप्पू स्कूल आते-जाते रहे। रामलगन भीतरवाली कोठरी में सुवंती और टुन्नी को आश्रय देते और बाहर पप्पू के साथ बैठकर गपियाते। पप्पू उन्हें सिनेमा के कि़स्से सुनाते। रामलगन मन ही मन सोचते कि सुवंतिया अगर सिनेमा में चली जाए तो धूम मचा देगी। देखते-देखते हरपुर गाँव का नाम हो जाएगा। पहिन-ओढ़ कर जब नाचेगी, गरदा उड़ जाएगा। ........फिर उनके मन में सवाल उठते, तब टुन्नी का क्या होगा? रामलगन पप्पू से डरते थे, पर टुन्नी मिसिर से प्यार करते थे।

सीवान के इस्लामिया काॅलेज में दाखि़ला लेने के बाद तीनों ने हरपुर से अठारह किलोमीटर की यात्रा शुरु की। काॅलेज में दाखि़ला लेनेवाले गाँव के सारे लड़के अपनी सायकिलों से हसनपुरा तक की कच्ची राह तय करते। सायकिल हसनपुरा बाज़ार में परिचितों के यहाँ टिकाते और बस पर सवार हो शेष बारह किलोमीटर की यात्रा पूरी करते। केवल पप्पू सिंह और टुन्नी मिसिर हीरो होन्डा पर सवार हो काॅलेज जाते। गाँव से काॅलेज के लिए निकलने वाले विद्यार्थियों के झुंड में सुवंती अकेली लड़की थी। वह सायकिल से हसनपुरा पहुँचती तो थी पर अक्सरहाँ उसकी बस छूट जाती और पप्पू सिंह की सवारी का उपयोग करना पड़ता। तीनों एक साथ सिवान आते-जाते। ऐसा भी होता कि पप्पू किसी काम के बहाने हसनपुरा ही रुक जाते और उनकी मोटरसायकिल ले टुन्नी और सुवंती ज्ञानार्जन के लिए निकलते। आने-जाने और पठन-पाठन की इस प्रक्रिया में प्रचूर मात्रा में ख़बरों का उत्पादन होता। ये ख़बरें सहपाठियों के माध्यम से गाँव-जवार में फैलतीं। लोग इन ख़बरों को चुभलाते, रस चूसते और अपने काम में लगे रहते। इससे न तो गाँव के पर्यावरण पर कोई ख़ास असर पड़ता और न ही सुवंती और टुन्नी पर। पप्पू तो उस प्रेरक रसायन की तरह थे जो स्वयं नहीं बदलता पर अन्य रसायनों को क्रियाशील कर देता है। उनके पिता रामधियान सिंह आश्वस्त थे कि विवाहित पूत कितना खिलवाड़ करेगा! माधुरी देवी दम साधकर सब सुनतीं। वह अपने जीवन में आनेवाले किसी शुभ क्षण की धीरज के साथ प्रतीक्षा कर रही थीं। पंडित माधवबिहारी मिसिर के कानों तक बात पहुँचती। वह दोनों हाथ जोड़कर प्रभु का स्मरण करते हुए अपनी सारी चिंताएँ उन्हें सौंपकर बुदबुदा उठते -‘‘मो सम दीन न दीन हित तुम्ह समान रघुवीर। अस बिसारि रघुबंस मनि हरहु बिषम भव पीर।‘‘

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इन्टरमीडिएट का परीक्षाफल आया। पप्पू सिंह लटक गए। सुवंती मध्यम मार्ग से निकली। टुन्नी मिसिर अच्छे नम्बरों से पास हुए। लोगों को उम्मीद नहीं थी कि इस बार उन्हें अच्छे नम्बर आएँगे। फुद्दन अक्सर पप्पू सिंह की अनुपस्थिति में सुबरन साह की दुकान पर या किशुनदेव की पान की गुमटी के सामने अपनी पेशबीनी का डंका बजाते हुए कहते - ‘‘अबकी सुवंतिया के जाल में अझुराकर डूबेंगे बबुआ। गाँठ बान्ह के धर लो हमरी बात! .....बाप रात-रात भर जागकर, जजमनिका से पाई-पाई अरज कर ख़र्चा जुटा रहे हैं और बबुआ मंजनूगिरी कर रहे हैं।‘‘

पप्पू सिंह को अपने फेल होने का ग़म नहीं था। उन्हें अपने यार के पास होने की ख़ुशी थी। वह फुद्दन को खोजते रहे, पर फुद्दन लोप हो गए। फुद्दन जानते थे, पपुआ छोड़ेगा नहीं। बीच बाज़ार में कुबोल बोलेगा और लुंगी खोल देगा।

माधुरी देवी बेटी को साथ लेकर पटना गईं। वह हर क़ीमत पर अपने सपने को साकार होता देखना चाह रही थीं। लाख ना-नुकर किया सुवंती ने, पर वह मानी नहीं। उनकी आँखों के सामने बार-बार एप्रिन पहने, गले में स्टेथस्कोप लटकाए सुवंती का चेहरा झिलमिल करने लगता। मेडिकल प्रवेश परीक्षा की तैयारी करवाने वाले इंस्टिट्यूट में सुवंती का दाखि़ला हुआ। वहीं, पास में ही एक गर्ल्स हास्टल में सुवंती के रहने की व्यवस्था हुई।

सुवंती के पटना में स्थापित होने के महीने भर बाद टुन्नी मिसिर उर्फ त्रिपुरारी मिश्र पटना पहुँचे। सात दिनों के उपवास के बाद जब उनकी आवाज़ डूबने लगी, उनकी माता ने दोनों मुट्ठियों से अपना कलेजा कूट-कूट कर पंडित माधवबिहारी मिसिर को कोसना शुरु किया। पंडितजी की भई गति साँप छछूँदर की वाली स्थिति थी। न उगल पा रहे थे और न ही निगला जा रहा था। एक ओर पुश्तैनी ज़मीन का अंतिम टुकड़ा था, तो दूसरी ओर जवान बेटा। हालाँकि टुन्नी बबुआ का चाल-चलन भाँपकर वह आश्वस्त थे कि भविष्य में नैराष्य ही उनके हाथ लगेगा। बबुआ अगर पढ़-लिख कर कुछ बन भी गए, तो उनके काम नहीं आनेवाले। मरने के बाद मुखाग्नि दे दें, यही बहुत है।...... उनका मन उन पुस्तकों की कथाओं, दोहों-चैपाइयों और देवी-देवताओं में भटकता रहा, जिन्हें बाँचकर अब तक वह जीविका चलाते रहे थे। उन्हें कहीं सहारा नहीं मिला। उनके ओठ काँपे,...... ‘होई सोई जे राम रचि राखा‘ और उन्होंने उच्छवास भरते हुए निर्णय लिया। कलेजा कड़ा करके ज़मीन के इकलौते टुकड़े को कारी भेडि़हर के नाम रजिस्ट्री कर आये। यह सौदा रामलगन के माध्यम से सम्पन्न हुआ। कारी पचास से ऊपर चढ़ने को तैयार नहीं थे। जानते थे कि यही अवसर है जब पंडितजी को दाबा जा सकता है, सो वह दाबने के चक्कर में थे। पर रामलगन ने बाप को समझाया कि अगर पंडितजी मुखिया रामबरन यादव या रामधियान सिंह के पाले में चले गए तो उपजाऊ ज़मीन हाथ से खिसक जाएगी। मामला सत्तर में तय हुआ। पंडित माधवबिहारी मिसिर ने टुन्नी को सत्तर हज़ार देकर विदा किया। टुन्नी मिसिर अपनी माता का आशीश लेकर पप्पू सिंह के साथ विदा हुए। पहले तय हुआ था कि पप्पू दुरौंधा स्टेशन तक मोटासायकिल से पहुँचाएँगे और टुन्नी इंटरसिटी एक्सप्रेस पर सवार होकर पटना के लिए प्रस्थान करेंगे। पर बाद में कार्यक्रम में फेर-बदल हुआ। तय हुआ कि पप्पू पटना जाकर टुन्नी को सेटल् करने के बाद गाँव लौटेंगे।

टुन्नी पटना पहुँचे। इंजिनीयरिंग परीक्षा की तैयारी के लिए कोचिंग इंस्टिट्यूट में दाखि़ला लिया और पहलवान लाॅज में सेटल् हो गए। पप्पू ने अपने दोस्त को मोबाइल फ़ोन उपहार में दिया और सुवंती से सम्पर्क करवाने के बाद अपनी पत्नी श्रीमती ब्युटी सिंह के लिए नाइट-गाउन ख़रीदकर वापस लौटे।

वर्ष बीता। इस बीते हुए वर्ष में बहुत कुछ हुआ। कई उलट-फेर हुए। बहुत सारी बातें एक-दूसरे में उलझती-सुलझती रहीं। टुन्नी मिसिर अपना भोजन स्वयं पकाते थे। हालाँकि इसके लिए वह अपनी पढ़ाई के बहुमूल्य समय की बलि देते। पर दूसरा कोई उपाय नहीं था। मेस का भोजन महँगा ही नहीं बेस्वाद भी था। वह बीच-बीच में गाँव जाते। उनकी माता जजमनिका से प्राप्त अन्न बटोरकर रखतीं। महीने भर का राशन लेकर लौटते। कोचिंग इंस्टिट्यूट का पहला महीना तो तौर-तरीक़ा और शहर को ही समझने-बूझने में सरक गया। पहले की पढ़ाई और इस पढ़ाई में बहुत फ़र्क़ था। अँग्रेज़ी पिशाच की तरह सता रही थी। इसके अलावा और भी समस्याएँ थीं, जिनसे जूझने में समय निकल जाता था। जब कि़ताब-काॅपी खोलते, सुवंती की सूरत आँखों के सामने नाचने लगती।

शुरु में तो पप्पू सिंह हाल-समाचार लेने-देने दो-तीन बार पटना आए, पर उनका आना-जाना भी लगभग बन्द हो गया। उनकी निजी व्यस्तता बढ़ गई थी।  श्रीमती ब्युटी सिंह को बेटी हुई तो, तो पिता रामधियान सिंह ने पप्पू को बुलाकर कहा - ‘‘बबुआ, अब तो चेतो। पढ़ना-लिखना तो जो भाग्य में लिखा था, सो कर लिये । हम तो पहले से तैयार बैठे थे कि तुम फेल होकर गाँव-जवार और नातेदारी-रिश्तेदारी में मेरी नाक कटावाओगे। ....... अब बदलो अपना रास्ता,....... एक बेटी के बाप हुए। आज के जमाने में बेटी के जिस बाप की गाँठ ढीली होती है, उसकी पगड़ी उतरते देर नहीं लगती। समझे?..... दू-चार पइसा कमाने का जुगाड़ करो। अपने साला सब को देखो, ठेकेदारी में पूरे जवार में कोई मुकाबला नहीं है। नोट की ढेरी लगा दिया है सब। ...... हम तुमको साँझ-सवेरे नहीं टोकेंगे। एक बार बोल दिए........सम्भल जाओ बबुआ.......।‘‘

रामधियान सिंह के इस प्रवचन के बाद बिना समय गँवाए पप्पू सिंह चेत गए। अपने सालों के साथ मिलकर काम शुरु किया। बस मोबाइल फ़ोन सहारा था। टुन्नी मिस काॅल मारते और पप्पू इधर से काॅल करते। 

अपनी इच्छा के विपरीत सुवंती मेडिकल प्रवेश-परीक्षा की तैयारी में जुटी थी। शुरुआती दिनों में ही वह समझ गई कि यह उसके वश का नहीं और उसने मन ही मन यह निर्णय लिया कि वह माधुरी देवी की लालसाओं की बलि नहीं चढ़ेगी। इस निर्णय के बावजूद उसे परीक्षा की तैयारी और परीक्षा देने का नाटक करना था, सो वह सफलता के साथ करती रही। उसके मन की उथल-पुथल को न तो माधुरी देवी भाँप सकीं और न ही टुन्नी मिसिर। पटना आकर भी टुन्नी मिसिर अपने गाँव हरपुर की परिधि में ही घिरे हुए थे जबकि, सुवंती ने जस का तस धर दीनी चदरिया की तरह हरपुर की माया को उतार फेंका था। वह पुनर्नवा हो चुकी थी। हरपुर को उसने अपने भीतर उतना ही जीवित रखा था कि वह बाधा न बने। हरपुर में उसकी माँ माधुरी देवी थीं, इसलिए हरपुर था। हरपुर में उसका बचपन था, इसलिए हरपुर था। शेष को उसने सहेजकर किसी अदृष्य पिटारी में बन्द कर दिया था। वह अपने नए जीवन के द्वार की साँकल बजा रही थी। अदृष्य पिटारी में बन्द शेष में टुन्नी प्रमुख थे। उसने धीरे-धीरे टुन्नी से अपने रिश्ते को गड्ड-मड्ड किया। पहले पढ़ाई का बहाना बनाकर टुन्नी मिसिर के मिस काॅल का जवाब देना बन्द किया। टुन्नी मिस काॅल से काॅल पर पहुँचे, तो दो-चार घंटी के बाद मोबाइल आॅफ होने लगा। एसएमएस के जवाब भी नदारद। टुन्नी हाॅस्टल आते, तो गार्ड सुवंती की अनुपस्थिति की सूचना देता। मुँह विसूरते जब वह अपने लाॅज पहुँचते, सुवंती का काॅल आता। सुवंती के हाॅस्टल और टुन्नी के लाॅज में काफ़ी दूरी थी। दोनों शहर के दो छोरों पर थे। अपनी तैयारी छोड़कर टुन्नी सुवंती के अबूझ व्यवहार में उलझे रहते। टुन्नी को इसकी भनक तक नहीं लगी कि सुवंती कौन सी लीला रच रही है! मोबाइल पर टुन्नी का दुखड़ा सुन-सुन कर उकता चुके पप्पू सिंह एक बार सुवंती से मिलने पटना पहुँचे। सुवंती ने मामला ही पलट दिया। बोली - ‘‘ पढ़ना-लिखना त्याग कर चैबीसों घन्टे मेरे पीछे घूमेंगे, तो दोनों में से कोई भी हरपुर में मुँह दिखाने लायक़ नहीं बचेगा। तुम तो समझदार हो, समझो.......। यहाँ आए हैं, तो कुछ न कुछ बनना ही होगा। बाप से जबरन खेत बेचवाकर पैसा लेकर पटना में मटरगश्ती करने आए हों, तो बात अलग है।‘‘

    सुवंती की बात में दम था, सो पप्पू की बोलती बन्द हो गई। उन्होंने अपने यार टुन्नी मिसिर की लानत-मलामत की और अपनी नवजात बेटी के लिए खिलौने और ब्युटी सिंह के लिए सौन्दर्य-प्रसाधन ख़रीदकर उल्टे पाँव भागे।

इस बीच हरपुर में किसी को कानों-कान ख़बर नहीं लगी और सुवंती ने भोजपुरी गानों के दो विडियो अलबम में अभिनय किया। वह एक नाटक का रिहर्सल करने भी गई थी, पर वहाँ उसका मन नहीं लगा और सप्ताह भर बाद ही उसने जाना बंद कर दिया। सुवंती ने मेडिकल प्रवेश परीक्षा के इस तैयारी-काल का अपनी नई दुनिया में प्रवेश के तैयारी-काल के रूप में उपयोग किया। अपने लिए नई-नई सोहबतें अर्जित करती हुई सुवंती परीक्षा के नाटक में शामिल हुई। उधर सुवंती के इश्क में लगभग ख़ब्तुल हवास हो चुके टुन्नी मिसिर उर्फ़ त्रिपुरारी मिश्र ने भी परीक्षा दी। परिणाम आशानुरूप ही आए। दोनों का नाम प्रतीक्षा-सूची में भी ढूँढ़े नहीं मिला।

परीक्षा-फल की सूचना गाँव पहुँची तो भाँति-भाँति के विचार और बोल-कुबोल सामने आए। टुन्नी की माताजी ने अपने स्वभाव के अनुरूप अपना कलेजा कूट-कूट कर विलाप किया और पानी पी-पीकर सुवंतिया को कोसा। माधुरी देवी का नाम ले-लेकर अपनी कर्कश जिह्वा से गालियों के अग्निवाण चलाती रहीं - ‘‘ हमरे बबुआ की जिनगी बरबाद कर दी कसबिनिया......अपने तो रंडी-पतुरिया है ही, बेटी को भी बना दी।......‘‘

पप्पू मौन हो गये। एक तो ठेकेदारी के धंधे का तनाव और दूसरे पिता के व्यंग्य-वाणों का भय। बस एकांत में पत्नी ब्युटी सिंह से इतना ही कहा -‘‘टुनिया तो हमरी नाक कटवा दिया।......पगलेट है.....कहीं फँसरी लगा कर जान मत दे दे। सोचते हैं पटना हो आएँ एक बार.....।‘‘

राम लगन भी टुन्नी की असफलता से दुखी और स्वभावतः चुप थे। फुद्दन मियाँ और जगत कानू सहित सारा गाँव टुन्नी और सुवंती की असफलता, चरित्र और भविष्य के विष्लेषण में लगा हुआ था।  
टुन्नी कुछ सम्भले। गाँव लौट नहीं सकते थे। उन्होंने ट्यूशन पढ़ाना शुरु किया और ओपन् यूनिवर्सिटी में बीसीए में दाखि़ला लिया। माधुरी देवी पटना पहुँचीं। सुवंती ने दो-टूक शब्दों में माधुरी देवी को सूचित किया कि डाॅक्टर बनने में उसकी ज़रा भी रुचि नहीं और अब वह मेडिकल में दाखि़ले के लिए कोई तैयारी नहीं करने जा रही। उसने भविष्य की अपनी योजना को उजागर किया। बताया कि वह फैशन टेकनोलाॅजी के कोर्स में दाखि़ला लेगी। माधुरी देवी की बेटी उनके सपनों के मलबे पर खड़ी थी। बेटी का सिंहनाद सुनने के बाद  उन्होंने सिर झुका लिया। सुवंती की बात मान लेने के सिवा उनके पास कोई राह नहीं बची थी। सुवंती उनकी पकड़ से बाहर जा चुकी थी। वह जिस सुवंती के लिए अपनी जि़न्दगी के तमाम हाहाकारों से जूझती रही थीं, उसे खोने का भय उनकी रीढ़ में घुसकर उन्हें कँपकँपा रहा था। हाल ही में खुले फैशन टेकनोलाॅजी के एक निजी संस्थान में एक मोटी रकम देकर उन्होंने सुवंती का नाम लिखवा दिया और अपनी देह घसीटते हुए हरपुर लौटीं।

अब हरपुर की आबोहवा उन्हें रास नहीं आ रही थी। वृक्ष से गिरे पत्ते की मानिन्द जि़न्दगी की तेज़ आँधी में जब वह बेसहारा भटक रही थीं, इसी हरपुर ने उन्हें ठौर-ठिकाना और जीने का साहस दिया था। पर अब यही हरपुर उन्हें अपने नखों-दाँतों से नोचने के लिए पिशाच की तरह नाच रहा था। रात को भयावह सपने आते। जिन स्मृतियों पर वह सालों पहले मिट्टी डाल चुकी थीं, वे सपनों में कौंधतीं। ...... बेटी जनमने के बाद सास-श्वसुर की गालियाँ और पति के घृणा भरे व्यंग्य-वाण। ...... कुछ ही महीने बाद पति के दूसरे विवाह की तैयारी और उन्हें घर से निकालने के लिए ससुराल में रची गई दुरभिसंधियाँ, ....... बात-बेबात मारपीट और बेटी को नून चटाकर मार डालने के प्रयास। ....... बड़ी मुश्किलों से वह अपनी और बेटी की जान बचाकर भागी थीं। उनकी विधवा माँ मुंगेर के जि़ला अस्पताल में नर्स थीं। माँ का साथ भी भाग्य में नहीं लिखा था, सो वह बिना किसी बीमारी के एक रात स्वर्ग सिधार गईं। सहानुभूति के आधार पर माधुरी देवी को मिडवाइफ़ की नौकरी मिली और मुंगेर से कोसों दूर सीवान के इस गाँव में पोस्टिंग हुई। ..........माधुरी देवी सुवंती के भविष्य और अपनी शेष जि़न्दगी के बारे में कुछ भी नहीं सोच पा रही थीं। अंततः उन्होंने सब कुछ समय और भाग्य के हवाले कर दिया, जैसे कोई अपने को विवश होकर नदी की धारा के हवाले कर दे।
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हरपुर कुछ दिनों तक सुवंती और टुन्नी के भविष्य को लेकर चिंतित रहा और फिर सहज भाव से अपने-आप में मगन हो गया। पप्पू सिंह की उदासीनता की इसमें बहुत बड़ी भूमिका थी। हालाँकि पप्पू भीतर ही भीतर टुन्नी मिसिर के वर्तमान को लेकर दुखी और भविष्य को लेकर चिंतित थे। पर वह अपना दुःख और अपनी चिंता सार्वजनिक रूप से प्रकट नहीं करते थे। कभी-कभार अपने शयन-कक्ष में पत्नी ब्युटी सिंह के सामने ज़रूर अपना मन खोलते। ब्युटी बिना किसी टीका-टिप्पणी के उनकी बातें सुन लेतीं और निःशब्द प्रतिक्रिया देती हुई कभी उनकी हथेली अपनी हथेलियों में भर लेतीं या अपनी हथेली से उनका सिर सहला देतीं, या अपनी बड़ी-बड़ी आँखों में नेह भरकर उन्हें निहारतीं।

टुन्नी मिसिर ने बीसीए में दाखिला तो ले लिया था, पर पढ़ नहीं पा रहे थे। एक तो बिना किसी सहारे के पटना में रहने और पढ़ाई के ख़र्च का जुगाड़ और दूसरे सुवंती की दी हुई चोट। अधर में लटक कर रह गई थी उनकी जि़न्दगी। सारी-सारी रात जागते। लगता, किसी ने कलेजा छीलकर नून मल दिया हो। आँधी-बयार की तरह सुवंती के साथ बीते दिनों की यादें उड़ती हुई आतीं और उनके दिमाग़ में भर जातीं। न इस करवट नींद आती न उस करवट। न सोया जाता और न बैठ ही पाते। कई बार तो बुक्का फाड़कर रोना-बिलखना चाहते, पर मुँह से आवाज़ ही नहीं निकलती। हाँ, आँखों से लोर ज़रूर बहता। जब आँखें बहतीं, थोड़ा सुकून मिलता।

सुवंती का जीवन व्यस्त हो चला था। पल-छिन की फु़र्सत नहीं थी। सुबह से शाम तक भाग-दौड़। फै़शन की पढ़ाई और फै़शन की दुनिया के अंदाज़ ही अलग थे। उसे अपने को नख से शिख तक बदलना पड़ा था। वैसे दाखि़ला लेने के पहले ही उसने अपने को बदलना शुरु कर दिया था और पटना आते ही इसके लिए अपने को मानसिक रूप से तैयार करने लगी थी। और उसकी इसी तैयारी के पहले शिकार बने थे उसके बालसखा और प्रेमी टुन्नी मिसिर।

फैशन की पढ़ाई ने सुवंती की तृशा जगा दी थी। इस तृषा ने सुवंती का कायांतरण शुरु किया। वह रोज़ सुबह-शाम जिम जाती। नियंत्रित खानपान और रहन-सहन के नये सलीके। अपनी देह के अंग-अंग पर वह नज़र रखती। पाँवों-बाँहों का सुडौलपन,......छाती के उभारों का कसाव,......कूल्हों के कटाव और चेहरे की आभा सहेजती-सँवारती सुवंती ने अपनी माँ माधुरी देवी तक को बिसार दिया था। बेहद औपचारिक अंदाज़ में मोबाइल पर कुशलता की सूचना देने-लेने  और पैसे की माँग के सिवा और कोई संवाद माँ-बेटी के बीच नहीं होता था। उसे भरोसा था कि मिस पटना का आयरन गेट तोड़ने के बाद सब सामान्य हो जाएगा। और माधुरी देवी अपने सपनों के जिन खण्डहरों में उदास बैठी थीं, सुवंती उन्हें उन खण्डहरों से बाहर निकाल लेगी और अपने सपनों की चकाचैंध से एक दिन उनकी जि़न्दगी में चमक भर देगी। इसके बाद के रास्ते अपने-आप खुलेंगे। अब पटना बहुत छोटा और पिछड़ा हुआ शहर नहीं रहा। कोई न कोई प्रायोजक मिल ही जाएगा। बस यह आयरन गेट तो पहले टूटे! फिर आरम्भ होगा पटना से बाहर का सफ़र। मुम्बई का सफ़र। मिस पटना से फेमिना मिस इंडिया का सफ़र। ............और देखते-देखते सुवंती ने,......हरपुर गाँव के विलुप्त हो चुके हेल्थ सेन्टर की मिडवाइफ़ माधुरी देवी की बेटी सुवंतिया ने मिस पटना का आयरन गेट तोड़ दिया था। भारतीय नृत्य कला मंदिर के विशाल प्रेक्षागृह में मंच पर तीस सुन्दरियों को पछाड़ती हुई वह जब अंतिम दौर में ब्रा और पैंटी में दो अन्य सुन्दरियों के साथ मंच पर आई दर्शकों की साँसें थम गईं। दसों दिशाएँ आकुल होकर झाँक रही थीं। उनचासों पवन ठिठके हुए थे। देवलोक के करोड़ों देवी-देवता सुवंती की देह से झरते सौन्दर्य से अपनी आँखों की तृषा बुझा रहे थे। प्रश्नोत्तर का दौर आरम्भ हुआ। निर्णायक मंडल की सदस्य और मुम्बई में अपना यौवन खो चुकी एक फिल्मी अभिनेत्री ने अँग्रेज़ी में पूछा - ‘‘ इस समय इस प्रतियोगिता के अंतिम दौर में मंच पर खड़ी होकर आप क्या सोच रही हैं?‘‘

दर्शकों की निगाहें सुवंती पर टिकी थीं। हल्की मुस्कान बिखेरते हुए वह बोली - ‘‘ मैं अपनी माँ और अपने गाँव हरपुर को याद कर रही हूँ क्योंकि मैं अपनी माँ के सपनों को पूरा करना चाहती हूँ और अपने गाँव को पूरी दुनिया में मशहूर करना चाहती हूँ।‘‘

पूरा प्रेक्षागृह तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा। ऐसी तुमुल-ध्वनि पहले  कभी न सुनी गई थी। सुवंती के नाम की घोषणा हुई। भारत की पूर्व विश्व सुन्दरियों के अंदाज़ में उसने आश्चर्य प्रकट करते हुए हर्ष के आँसू बहाए। मिस पटना का ताज पहन धक्का-मुक्की करते प्रेस फोटोग्राफ़रों को पोज़ दिया।

उसने माधुरी देवी को बीस हज़ार रुपयों के साथ पटना बुलाया था। माधुरी देवी पटना जाने के लिए हरपुर से निकलीं पर पटना नहीं पहुँच सकीं। हरपुर का हेल्थ सेन्टर जिस समय बन्द हुआ, प्रदेश के कई जि़लों के गाँवों में इस परियोजना के हेल्थ सेन्टर बन्द हुए। उसी समय कर्मचारियों ने सरकार के खि़लाफ़ मुक़दमा किया था, जो कछुए की चाल से सरकते हुए हाई कोर्ट पहुँचा। कुछ महीने के बकाया वेतन और मुआवज़े की राशि के भुगतान का सरकार को आदेश मिला। इसी पैसे के भुगतान के चक्कर में माधुरी देवी जि़ला स्वास्थ्य अधिकारी और ट्रेज़री का चक्कर काटती रह गईं और पटना नहीं पहुँचीं। अक्सर वह सीवान जातीं तो शाम तक लौट आतीं, पर अगर रात में रुकना होता तो स्व. त्रिभुवन लाल के घर रात गुज़ारतीं। उनकी बहुओं से अपनापा था। वे भी उन्हें ननद का प्यार-सम्मान देतीं। माधुरी देवी को सीवान में ही अख़बार के मुखपृष्ठ पर बेटी की अर्द्धनग्न तस्वीर देखने को मिली। वह बिना किसी से कुछ बोले-बतियाए बाहर निकलीं। कुछ देर सड़कों पर ऐसे ही भटकती रहीं। कल ही ट्रेज़री में काग़ज़ पहुँच चुका था और आज पैसे के भुगतान की सम्भावना थी। दस बजते ही वह ट्रेज़री पहुँचीं। दोपहर तक पैसा उनके बैंक अकाउन्ट में चला गया, जिसे उन्होंने सुवंती के अकाउन्ट में ट्रांसफर किया। वह धीमी गति से चलते हुए उस चैराहे तक पहुँचीं, जहाँ पहली बार हरपुर जाने के लिए गोद में सुवंती को लिये वह रिक्शा पर बैठी थीं। वह सोच नहीं पा रही थीं कि कहाँ जाएँ! त्रिभुवन लाल के घर,........पटना,.......हरपुर,.......या कचहरी के उस पार बहती दाहा नदी के पेट में?


❒ ❒ ❒ ❒

अख़बार में सुवंती की फोटो तो सबने देखी, पर ख़बर ठीक से सब नहीं पढ़ पाए। फोटो ही ऐसा विस्फोटक था कि ख़बर का एक-एक हर्फ़ पढ़ने का धीरज नहीं रह पाया किसी के पास। केवल जगत कानू ही थे ख़बरों के रसिया, जो पूरी ख़बर पढ सके और कारी के बथान से उठकर बाज़ार पहुँचे। उनकी उम्मीद के अनुसार ही वहाँ असर पड़ा था और अफ़रा-तफ़री मची हुई थी। पर जाने क्यों यह ख़बर उन्हें पहले जितनी मसालेदार लगी थी, अब ठीक इसके विपरीत उन्हें उदास कर रही थी। वह बाज़ार की रसचर्चा में डूबे बिना घर की ओर चले। घर लौटते हुए जगत अपने सुपुत्र कौशल कुमार से टकरा गए, जो ख़बर से अभिभूत हरपुर की सड़कों-गलियों में बौराए फिर रहा था।

ढीठ बेटे ने बाप से पूछा - ‘‘बाबू, अख़बार देखे?‘‘

बेटे की ढीठाई पर पहले तो जगत अचकचाए, फिर सम्भलते हुए उसे घूरने लगे। 

अपने पिता की प्रतिक्रिया भाँपने में असफल मैट्रिक के परीक्षार्थी छात्र कौशल कुमार की ज़ुल्फ़ें जगत की मुठ्ठी में थीं। दाँत पीसते हुए जगत बोले - ‘‘तुम पढ़ो सरऊ अखबार......देखो......आँख चियार कर फोटो देखो खाली......पढ़ो मत। ..... भरी सभा में लाँगट-उघार खड़ी है पर अपनी महतारी को नहीं भूली....गाँव को नहीं भूली। ..... और तुम सरऊ जीयते-जिनगी बाप को फूँक-ताप जाने को तैयार हो।‘‘

कौशल कुमार ब-मुश्किल जान छुड़ाकर भागा और अपने संगी-साथियों के साथ पुनः अख़बार वाचन किया। यह वाचन फुद्दन मियाँ की नयकी बहू यानी मेराज बहू के सामने हुआ और उसकी देख-रेख में हुआ। मेराज, पप्पू सिंह और टुन्नी मिसिर के हमउम्र थे। यह ठीक उनके बाद की पीढ़ी थी, जो अपनी इस इंटर पास भाभी को अपना आदर्श मानती थी। मेराज बहू सात महीने पहले व्याह कर छपरा से हरपुर आई थी। आते ही उसकी धूम मच गई थी। उसने सबसे पहले दालान से टीवी उठवाकर बुढ़ऊ फुद्दन को चारों खाने चित किया था। घर के भीतर गाँव के देवरों को पनाह देकर फुद्दन की बीवी के आतंक और पर्दादारी पर कील ठोका था। सुवंती की पथ-प्रदर्शक अपनी जेठानी को घर की आर्थिक सत्ता पर काबिज़ करवाकर वह उनकी दुलारी और मुँहलग्गू बन गई थी।

मेराज बहू यानी नयकी भाभी ने आनन-फ़ानन टीवी खोलकर न्यूज़ चैनल लगाया। प्रादेशिक चैनलों पर सुवंती की धूम मची थी। निर्णायकों को दिया गया सुवंती का जवाब बार-बार हर चैनल की मुख्य ख़बर बन रहा था। सुवंती का जवाब और उसकी उपलब्धि का यशोगान हरपुर की युवा होती इस पीढ़ी  के कानों-आँखों से होता हुआ उनकी आत्मा और रगों में  बहते लहू तक पहुँचा। वहीं, फुद्दन मियाँ के आँगन में विचार-विमर्ष हुआ,......योजना बनी। नयकी भौजी ने सुझाव दिया कि इस क़ामयाबी का जश्न सारे गाँव में मनाया जाना चाहिए। ब-हैसियत सदर फुद्दन की बड़ी बहू को इस बातचीत में शामिल किया गया। कनिष्ठ सदस्य के रूप में फुद्दन के बड़े पोते बारह वर्षीय पिंकू भी कम उत्साहित नहीं थे।

बड़ी बी यानी पिंकू की अम्मी के सुझाव पर यह दल पप्पू सिंह से मिलने पहुँचा। पप्पू सिंह सीवान निकलने वाले थे कि अख़बारों ने गाँव में प्रवेश किया था और वह सुबरन साह की दुकान पर इस सूचना विस्फोट में उलझ गए थे। बाज़ार के गर्द-ओ-गुबार से बाहर निकल अब वह मोटर सायकिल स्टार्ट करने ही जा रहे थे कि कौशल कुमार सहित दर्ज़न भर नवतुरियों के गिरोह ने उन्हें घेर लिया। उनके आग्रह पर पप्पू भीड़ से अलग गए। नई पीढ़ी ने जब उन्हें योजना सुनाई, वह चकित रह गए। उन्होंने अपने को कोसा कि वह ऐसा कुछ क्यों नहीं सोच-समझ सके! उन्हें यह भी लगा कि वह एक पीढ़ी पीछे खिसक गए हैं और कमान नई पीढ़ी ने सम्भाल ली है। उन्हें बड़ी बी यानी पिंकू की अम्मा और नयकी भाभी यानी उनके दोस्त मेराज की बहू का संदेश भी दिया गया। पिंकू ने कहा - ‘‘ अम्मा कहिन हैं कि चच्चा से कहना.......अऊर चच्ची भी कहिन हैं......।‘‘

पप्पू सिंह ने सीवान जाने का कार्यक्रम स्थगित किया और अख़बार और चर्चा-कुचर्चा में उलझे लोगों के बीच फिर से उपस्थित हुए। गाँव की नई पीढ़ी का प्रस्ताव सबके सामने रखा। सबसे पहले फुद्दन बमके - ‘‘पप्पू बाबू, अब तुमको कौनो काम नहीं बचा है का? ठेकेदारी छोड़ के लहेंड़ागिरी मत करो गाँव में। रामधियान भाई की.........।‘‘

‘‘ ए फुद्दन चा....!‘‘ पप्पू ने बात काटते हुए कहा - ‘‘ तुम्हारा पोता पिंकुआ का परपोजल है। अऊर बड़की भाभी...... नयकी भाभी दोनो जनी का एपरूभल है।....समझे?‘‘

फुद्दन की हवा ख़राब करने के लिए इतना ही काफ़ी था। बिना किसी हील-हुज्जत के वह सरक लिए। चर्चा की दिशा बदल गई। उसी शाम पप्पू ने सुवंती को फ़ोन किया। उसे बधाई दी। गाँव के प्रसन्न होने और उसके स्वागत समारोह की योजना की सूचना दी। सुवंती से कहा कि - ‘‘कब आ रही हो बता दो ताकि उस दिन कार्यक्रम रखा जा सके।‘‘

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माधुरी देवी न तो न पटना गईं और न सीवान में रुकीं। दाहा नदी में इतना जल ही नहीं था कि उसके पेट में समा जाएँ। बरसात के दिन होते तो शायद ऐसा कुछ सोचतीं और सम्भव हो पाता, सो वह हरपुर लौट आईं। 

गाँव में हलचल थी। मतैक्य नहीं होने के बावजूद आयोजन की रूपरेखा बन चुकी थी। नई पीढ़ी का जोश उफ़ान पर था। पप्पू सिंह ने कमान सम्भाल ली थी। फुद्दन आयोजन के विरुद्ध अंतःसलिला नदी की तरह प्रवाहित हो रहे थे। ऊपर से सहज और चुप, पर भीतर ही भीतर उन्होंने प्रवल वेग से सारे गाँव-जवार में अभियान छेड़ रखा था। उनके लिए यह केवल सुवंती या पप्पू का प्रतिकार नहीं था बल्कि इसी बहाने वह अपनी दोनों बहुओं के विरुद्ध भी मुक़ाबले में डटे थे। हालाँकि उनकी गतिविधियों की सूचना पप्पू तक निर्वाध पहुँच रही थी। इन सूचनाओं में पर्याप्त विस्तार कर पप्पू इन्हें पिंकुआ के माध्यम से उसकी अम्मी और चच्ची तक पहुँचवा रहे थे। फुद्दन भी सतर्क थे। उन्होंने अपनी बेगम से साफ़-साफ़ कह दिया था - ‘‘अपने हाथों से पकाकर दोगी तो खाएँगे। इन कसबिनों पर भरोसा नहीं है मुझे। हरामजादियों का कोई ठिकाना नहीं। खाने में माहुर मिलाकर दे सकती हैं। मजीद और मेराज लौटें अरब से तो इस बार दो टूक फ़ैसला होगा। या तो ये हरामजादियाँ अपना चाल-चलन सुधारें या हमहीं अलग हो जाएँगें। ‘‘

सुवंती के आने की तिथि तय हो चुकी थी। तैयारियाँ ज़ोरों पर थीं। सीवान के जि़ला कलक्टर ने आने की हामी भर दी थी। जोगी पीर के सामने के मैदान में दुधही पोखर के पास मंच और पंडाल बन रहा था। सुबरन साह भी वहाँ चाय की दुकान लगाने की तैयारी में थे। सबके लिए अलग-अलग काम थे। मंगल मिसिर के दोनों पोतों  के जिम्मे भोज की तैयारियाँ थीं और टुन्नी मिसिर के चचेरे भाई पर सांस्कृतिक कार्यक्रम का भार था। नवतुरियों के उत्साह ने पप्पू सिंह की पीढ़ी को प्रेरित ही नहीं अपने दायित्वबोध के प्रति जागरुक कर दिया था। समीउल्लाह ख़ान ने जि़ले के अधिकारियों और नेताओं को जुटाने का बीड़ा उठाया था। इस आयोजन से जगत कानू की कई उम्मीदें जगी थीं। उन्हें लग रहा था कि गाँव में बहती यह नयेपन की बयार यहाँ के नौजवानों के भीतर उत्साह भरेगी और साथ ही सुवंतिया के मातृप्रेम का असर भी पड़ेगा। आयोजन के लिए धन की मुख्य व्यवस्था का जिम्मा आयोजन के सूत्रधार पप्पू सिंह पर था। पप्पू कुशलता के साथ लगे हुए थे और निर्धारित बजट से ज़्यादा संग्रह कर चुके थे। रामलगन कोषाध्यक्ष थे।  वह पप्पू सिंह के निकटतम सहयोगी थे। कारी को पहले तो लगा कि यज्ञ हो रहा है और साधु-संतों का जमावड़ा होगा, पर भेद खुलते ही उन्होंने जगत कानू को कोसना शुरु किया। खेती-बारी और माल-मवेशी का सारा जिम्मा बाप के माथ पर छोड़कर रामलगन आयोजन में व्यस्त थे। चिरई की तरह बथान पर आते और फुर्र हो जाते।
   
सुवंती को लाने के लिए स्कार्पियो लेकर पटना जाने का सबसे आकर्षक काम किसे मिलेगा इसको लेकर आपस में काफ़ी स्पर्धा थी। पर पप्पू ने यह जिम्मा कौशल कुमार को सौंपा। कार्यक्रम से पहले वाली रात कौशल कुमार स्कार्पियो पर सवार हो पटना रवाना हुए। भड़-भड़ करते जेनरेटर की घ्वनि और धुआँ से रोशनी का युद्ध जारी था। उस विशाल पीपल वृक्ष की डालों-पत्तों पर, जिस पर जोगी पीर का वास था, और दुधही के पोखर के शीतल और थिर जल-सतह पर आग की लपटों की तरह नाच रही थी रोशनी। पप्पू सिंह ने लड्डू और गाँजा की पुडि़या चढ़ाकर जोगी पीर से कार्यक्रम की सफलता के लिए आशीश माँगा। लड्डू नवतुरिया कार्यकर्ताओं बँटा और मंगल बाबा के साथ जगत कानू ने गाँजे की चिलम लहका कर जोगी पीर की पूजा का विधान पूरा किया। चिलम टानकर जब मंगल मिसिर टंच हुए, जगत ने इसरार किया - ‘‘ बाबा, एक ठो हो जाए.....कंठ खोलकर.......एकदम अइसा टाँसिए कि हरपुर हिल जाए।‘‘

मंगल मिसिर ने तान भरी - ‘‘अगिन जो लागी नीर में पाँक जारिया झारि।.....किसिम-किसिम के पंडित रह गए करत विचार।‘‘

सुवंती के साथ पटना से टीवी वालों और अख़बार वालों के भी आने की सूचना थी। यह भी पता चला कि भोजपुरी फिल्मों का कोई हीरो आ रहा है। पप्पू ने बताया - ‘‘अभी नाम नहीं आउट करेंगे। सुवंती ने मना किया है।.....नाम आउट होने से लाॅ एण्ड आर्डर का प्राब्लम हो सकता है।‘‘

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हरपुर, हरपुर नहीं इन्द्रपुर लग रहा था। हरपुर भूल चुका था कि पिछले तीन सालों में वह दो बार सूखा झेल चुका है। खेतों की दरारों और खलिहान के सूनेपन की पीड़ा ढोने के लिए अब हरपुर तैयार नहीं था। हरपुर यह भी भूल चुका था कि पिछले बरस दो सालों के बाद अच्छी वर्षा हुई और धान के खेतों में हरियाली उमड़ी, पर बालियों में दाने नहीं आए क्योंकि नये कि़स्म के बीज नकली निकले। जो दो-चार पैसे मुठ्ठी में बंद थे उन्हें खेती में लुटाकर लोग भौंचक थे। पर अब हरपुर ऐसा कुछ भी याद नहीं रखना चाहता था जिससे इस जश्न का स्वाद बिगड़े। पिछले चुनाव के बाद साल भर तक चले हत्याओं के सिलसिले और दंगे की आशंका से थरथर काँपनेवाले हरपुर ने भय की चादर उतारकर फेंक दी थी।

आयोजन के दिन टुन्नी मिसिर  उर्फ़ त्रिपुरारी मिश्र दुरौंधा स्टेशन पर मौर्य एक्सप्रेस से उतरे। प्रेम की महान परम्पराओं का सम्मान करते हुए उन्होंने भठ्ठी में जाकर पहली बार पाउच-पान किया और सिगनल से आगे जाकर रेलवे लाइन पर वैशाली एक्सप्रेस के इंतज़ार में पसर गए। बड़ी देर तक पसरे रहे। वैशाली एक्सप्रेस का अता-पता नहीं था। प्रतीक्षा करते-करते ऊबकर वह उठे और पटरियों के किनारे बेहया की झाडि़यों में फा़रिग होने बैठ गए। बैठे ही थे कि धड़धड़ाती हुई वैशाली एक्सप्रेस गुज़र गई और उन्होंने इसे इश्वर का आदेश मानकर हर हाल में जीवित रहने का संकल्प लिया। 

सुवंती ने पप्पू को मोबाइल पर बताया था कि वह अपने पिता के साथ आ रही है। वह अपनी माँ को बिछुड़ गए पति का उपहार देना चाहती है। माधुरी देवी जब किसी क़ीमत पर आयोजन में शामिल होने के लिए तैयार नहीं हुईं, पप्पू ने यह रामवाण सूचना उन्हें दे दी। उसे भरोसा था कि वह इस सूचना की अनदेखी नहीं कर सकेंगी।

जिस समय स्कार्पियो पर सवार सुवंती स्नेहा हरपुर पहुँची, अपनी कोठरी में बन्द माधुरी देवी अपनी माँग का सिन्दूर पोंछ रही थीं और अपने हाथों की चूडि़याँ तोड़ रही थीं। 

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कथादेश जनवरी 2012  में प्रकाशित


हृषीकेष सुलभ

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