प्रेम या जंग - कारोली किसफलूदी (अनु. : प्रेमचंद गांधी) A Short Story on 'Battle of Mohács' by Károly Kisfaludy (Translation: Prem Chand Gandhi)

प्रेम या जंग

कारोली किसफलूदी

अनुवाद : प्रेमचंद गांधी 

उन दिनों हमारी रेजीमेन्ट ने इटली में लेक कोमो के पास पड़ाव डाला हुआ था। यहां हमारी मुलाकात फ्रांसीसी फौज से होनी थी और मेरा मेजर दोस्त पूरे इलाके की खाक छानता घूम रहा था। यहां हमारा वक्त बड़े आराम से कट रहा था। हमारे मेजर को छोड़कर बाकी सारे फौजी इटली की औरतों के साथ मस्ती में डूबे थे। कई लोग जवानी की मौज-मस्ती और इश्क के बजाय शादी में यकीन रखते हैं, हमारा मेजर भी इसी कोटि का बंदा था। वह हमारे यहां आते ही एक लड़की के पे्रमजाल में फंस गया था और जब हम यहां की औरतों के साथ मस्ती में डूबे होते, बेचारा मेजर उस लड़की के घर की खिड़की को ताकता रहता था।

वे दोनों पूरी तरह प्रेम-रंग में रंग गए थे। हमारे मेजर ने इस प्रेम के बारे में लड़की के घरवालों से कोई बात नहीं की थी। वैसे भी यह वक्त शादी जैसी बातचीत के लिए ठीक नहीं था। एक यायावर फौजी और वह भी विदेशी, हो सकता है लड़की के घरवाले कतई राजी न होते। हमने मेजर को सुझाया कि जो भी वह कर सकता है करे, ताकि यह प्रेम कथा परवान चढ़ सके। वह करता भी और यकीनन कामयाब होता, अगर लड़की ने अपने पारिवारिक संस्कारों का पालन न किया होता क्योंकि वह एक भी दिन मेजर से अकेली मिलने नहीं आई और पादरी के पास जाकर राय-मशविरा करने का तो सवाल ही नहीं था।

यह पूरी तरह निराश प्रेम प्रसंग था। लड़की के घरवालों ने मेजर के बारे में पता चलने पर उसे सिरे से खारिज कर दिया था। निराश मेजर अवसाद में डूबता जा रहा था। वह हमारी महफिलों से दूर रहता था।  वह ज्यादातर एक बूढ़ी औरत की निगरानी में हवेली में ही रहता था। उसने कभी भी अपनी महबूबा का अकेले में हाथ नहीं थामा था। उससे बस गिनी-चुनी दो-चार बातें ही कर सका था, वह भी नाच के दौरान। और दरअसल ये बातें भी उस वक्त हुई थीं, जब बुढिय़ा का ध्यान लड़की की इज्जत से ज्य़ादा जरूरी कामों में बंटा हुआ था।

महीनों इस प्रेमकथा का कोई मतलब नहीं निकल सका। अन्तत: बुजुर्गवारों के कान खड़े हुए। जब लड़की के सिर पर प्रेम का भूत चढ़कर बोल रहा होता है तो ऐसे में घरवाले उपयुक्त वर की तलाश शुरू करने से बेहतर उपाय नहीं कर सकते। सो वर खोजा गया। लड़की को सूचना दी गई और आज्ञाकारी-कुलशीला लड़की ने रोते-धोते उसे स्वीकार कर लिया। उसके रोने-धोने और कमरे में बंद होने से कोई फर्क नहीं पड़ा, अलबत्ता शादी की तैयारियां तेज होती गईं। लड़की के मन में मेजर के प्रति प्यार की भावना जोर मारती जा रही थी। वह प्रेम की पीड़ा में आंसू बहाते हुए दुआ करती कि उसकी प्रेमकथा सफल हो। हे ईश्वर! अगर लड़कियां मां-बाप का कहना न मानें तो इस दुनिया का क्या हो?

शादी की घोषणा को कुछ दिन ही बीते थे कि एक प्रीतिभोज तय कर दिया गया। लड़की बेचारी खुलकर बगावत नहीं कर सकती थी, बस अपने मन में वह अपने भावी पति को लेकर नफरत भरती जा रही थी और मेजर के लिए प्यार। एक दिन उसने अपनी एक विश्वस्त नौकरानी के हाथों मेजर को एक प्रेमपत्र या कहें, संदेश पहुंचाया। लिखा था कि शादी से ठीक एक दिन पहले की रात मेरे कमरे पर आ जाना। खत में साफ-साफ लिखा था, 'सब कुछ ठीक-ठाक है, यह इशारा करने के लिए मैं खिड़की पर एक सफेद रुमाल बांध दूंगी। तुम खिड़की से चढ़कर भीतर आ जाना। मेरी निराशा मुझे यह करने को मजबूर कर रही है। मेरे संस्कारों ने पहले मुझे यह सब करने से रोका था। सिर्फ तुम और सिर्फ तुम ही हो, जिसे मैं खुद को सौंपना चाहती हूं।‘

वह दिन भी आ गया। सूरज अभी भी चमक रहा था। सूर्यास्त के बाद हमारी रेजीमेन्ट के लिए एक दूत संदेश लेकर आया। हमें तुरन्त जिनेवा के लिए रवाना होने का आदेश था।

उस दिन, उस पल जब एक ख्वाब हकीकत में बदलने वाला था, एक अधूरी आस पूरी होने जा रही थी, उस रात में जब खुशियों का एक दरीचा खुलने वाला था, अचानक अंधकार छा गया। लड़की ने मेजर को जो जिम्मा सौंपा था, वह जिम्मा अब मेजर को एक अलग ही मोर्चे पर संभालना था जहां चुम्बनों और प्यार के अलावा सब कुछ निछावर करना था।
लेकिन तुरन्त ही क्यों? अगली सुबह या आधी के रात के बाद क्यों नहीं? क्या दुश्मन से लड़-भिड़ कर उसे या खुद को मार डालना बहुत ज़रूरी है? क्या इसे कुछ देर रोका नहीं जा सकता? क्या रेजीमेन्ट की रवानगी को किसी भी बहाने से थोड़ी देर के लिए नहीं उलझा सकते? क्या दूत देरी से नहीं आ सकता? क्या दुश्मन की गश्त और खराब रास्ते के कारण उसे देर नहीं हो सकती? उसे वक्त पर न पहुंचने के लिए कौन दोष देता?
मेजर की आत्मा में उथल-पुथल मची थी। उसका फौजी कर्तव्य प्यार पर भारी पड़ रहा था। उसे ख्याल आया, जरा-सी देर से उसके कई फौजी मारे जा सकते हैं। लड़ाई में कई तरह के नुकसान हो सकते हैं। जवान! आगे बढ़ो और आदेश का पालन करो। आगे बढऩे के अलावा अब कोई रास्ता नहीं है।
मेजर ने तुरन्त रवानगी के आदेश जारी किए। आसमान में पहला तारा दिखते ही रेजीमेन्ट अपने कर्तव्य-पथ पर चल पड़ी। घोड़ों पर सवार फौजी कस्बे से गुजर रहे थे। मेजर ने देखा लड़की के घर में उल्लास छाया हुआ है। उसने बिगुल शान्त करवा दिए। मेजर को डर था कि कहीं इससे माहौल में खलल ना पड़े। एक ख्याल यह भी आया कि महबूबा को इंतजार का दर्द सहने तक माहौल का लुत्फ उठाने दिया जाए। हवेली के बगल से गुजरते हुए मेजर ने देखा, लड़की के कमरे की खिड़की पर सफेद रुमाल बंधा था। हवा बंद थी और निर्जीव रुमाल गर्मी में एक नाउम्मीदी की तरह टंगा हुआ था। 

प्रेम चंद गांधी

जयपुर में 26 मार्च, 1967 को जन्‍म। दो कविता संग्रह ‘इस सिंफनी में’ और ‘चांद के आईने में’ के अलावा एक निबंध संग्रह ‘संस्‍कृति का समकाल’ प्रकाशित। समसामयिक और कला, संस्‍कृति के सवालों पर निरंतर लेखन। कई नियमित स्‍तंभ लिखे। सभी पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित। कविता के लिए लक्ष्‍मण प्रसाद मण्‍डलोई और राजेंद्र बोहरा सम्‍मान। अनुवाद, सिनेमा और सभी कलाओं में गहरी रूचि। कुछ नाटक भी लिखे। टीवी और सिनेमा के लिए भी काम किया। दो बार पाकिस्‍तान की सांस्‍कृतिक यात्रा।
संपर्क : 220, रामा हैरिटेज, सेंट्रल स्‍पाइन, विद्याधर नगर, जयपुर 302 023
मोबाइल: 09829190626
ईमेल: prempoet@gmail.com

रेजीमेन्ट सोए हुए कस्बे को पीछे छोड़ चुपचाप निकल गई। पहाड़ी पर आकर मेजर ने कस्बे को पीछे घूमकर देखा। गर्म हवा से सफेद रुमाल हिल रहा था और ऐसा लगता था जैसे अलविदा कह रहा हो। जैसे वह इस दर्दनाक वियोग को देख आहें भर रहा हो। मेजर ने कहा, 'जवानों, जल्दी करो, जल्दी।‘

पूरे वातावरण में सिर्फ घोड़ों की टापें गूंज रही थीं। धीरे-धीरे दुश्मन नजदीक आ रहा था और कस्बा पीछे छूट रहा था।

मेजर ने जंग के मोर्चे पर अपना कर्तव्य बखूबी निभाया। अगर वह आधा घंटा भी देरी कर देता तो हमारी लेफ्ट विंग चारों तरफ दुश्मन से घिर जाती और भयंकर तबाही होती। यह एक जुनून भरा मिलन था, जैसे दो जवां दिल अरसे से मिलने को आतुर हों। मेजर को अपने लोगों की जीत का तोहफा मिला लेकिन अपनी जान के बदले। वह रणभूमि में एक शहीद की मौत मरा। उसने अपने सम्मान की रक्षा की। जब मेजर को दफनाने के लिए कस्बे में लाया गया तो देखा रुमाल अभी भी हवा में हिल रहा था और हमने एक-दूसरे से कहा, 'यहां, एक चमत्कार से एक लड़की भी बदनाम होने से बच गई।‘


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