कहानी: यहाँ कमलनी खिलती है - मृदुला गर्ग | Mridula Garg's Hindi Kahani

हिन्दी की वरिष्ठ यशस्वी कहानीकार मृदुला गर्ग जी के जन्मदिवस 25 अक्टूबर के अवसर पर उनको अनंत बधाई के साथ आप शब्दांकन पाठकों के लिए उनकी नयी कहानी ... 
मृदुलाजी की आँखों में कुछ कष्ट है हम सबकी दुआएं उनके साथ है वो यथाशीघ्र स्वस्थ्य हों...

समस्त शब्दांकनगण की तरफ से भरत तिवारी

Yahan Kamalni Khilti Hai - Mridula Garg (Hindi Kahani)

कहानी: यहाँ कमलनी खिलती है - मृदुला गर्ग 


वीराने में दो औरतें मौन बैठी थीं। पास-पास नहीं, दूर; अलग, दो छोरों पर असम्पृक्त। एक नज़र देख कर ही पता चल जाता था कि उनका आपस में कोई सम्बन्ध न था; वे देश के दो ध्रुवों पर वास करने वाली औरते थीं। 

एक औरत सूती सफ़ेद साड़ी में लिपटी थी। पूरी की पूरी सफ़ेद; रंग के नाम पर न छापा, न किनारा, न पल्लू। साड़ी थी एकदम कोरी धवल पर अहसास, उजाले का नहीं, बेरंग होने का जगाती थी। मैली-कुचैली या फिड्डी-धूसर नहीं थी। मोटी-झोटी भी नहीं, महीन बेहतरीन बुनी-कती थी जैसी मध्यवर्ग की उम्रदराज़ शहरी औरतें आमतौर पर पहनती हैं। हाँ, थी मुसी-तुसी। जैसे पहनी नहीं बदन पर लपेटी भर हो। बेख़याली में आदतन खुँसी पटलियाँ, कन्धे पर फिंका पल्लू और साड़ी के साथ ख़ुद को भूल चुकी औरत। बदन पर कोई ज़ेवर न था, न चेहरे पर तनिक-सा प्रसाधन, माथे पर बिन्दी तक नहीं। वीराने में बने एक मझोले अहाते के भीतर बैठी थी वह। चारों तरफ़ से खुला, बिला दरोदीवार, गाँव के चौपाल जैसा, खपरैल से ढका गोल अहाता। 

मृदुला गर्ग (जन्म:२५ अक्टूबर, १९३८) कोलकाता में जन्मी, हिंदी की सबसे लोकप्रिय लेखिकाओं में से एक हैं। उपन्यास, कहानी संग्रह, नाटक तथा निबंध संग्रह सब मिलाकर उन्होंने २० से अधिक पुस्तकों की रचना की है। १९६० में अर्थशास्त्र में स्नातकोत्तर उपाधि लेने के बाद उन्होंने ३ साल तक दिल्ली विश्वविद्यालय में अध्यापन भी किया है। उनके उपन्यासों को अपने कथानक की विविधता और नयेपन के कारण समालोचकों की बड़ी स्वीकृति और सराहना मिली। उनके उपन्यास और कहानियों का अनेक हिंदी भाषाओं तथा जर्मन, चेक, जापानी और अँग्रेजी में अनुवाद हुआ है। वे स्तंभकार रही हैं, पर्यावरण के प्रति सजगता प्रकट करती रही हैं तथा महिलाओं तथा बच्चों के हित में समाज सेवा के काम करती रही हैं। उनका उपन्यास 'चितकोबरा' नारी-पुरुष के संबंधों में शरीर को मन के समांतर खड़ा करने और इस पर एक नारीवाद या पुरुष-प्रधानता विरोधी दृष्टिकोण रखने के लिए काफी चर्चित और विवादास्पद रहा था। उन्होंने इंडिया टुडे के हिन्दी संस्करण में लगभग तीन साल तक कटाक्ष नामक स्तंभ लिखा है जो अपने तीखे व्यंग्य के कारण खूब चर्चा में रहा। वे संयुक्त राज्य अमेरिका के कोलंबिया विश्वविद्यालय में १९९० में आयोजित एक सम्मेलन में हिंदी साहित्य में महिलाओं के प्रति भेदभाव विषय पर व्याख्यान भी दे चुकी हैं। उन्हें हिंदी अकादमी द्वारा १९८८ में साहित्यकार सम्मान, उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा साहित्य भूषण सम्मान, २००३ में सूरीनाम में आयोजित विश्व हिन्दी सम्मेलन में आजीवन साहित्य सेवा सम्मान, २००४ में कठगुलाब के लिए व्यास सम्मान तथा २००३ में कठगुलाब के लिए ही ज्ञानपीठ का वाग्देवी पुरस्कार, वर्ष 2013 का साहित्य अकादमी पुरस्कार हिन्दी उनकी कृति 'मिलजुल मन' उपन्यास के लिए प्रदान किया गया है। उसके हिस्से की धूप उपन्यास को १९७५ में तथा जादू का कालीन को १९९३ में मध्य प्रदेश सरकार द्वारा पुरस्कृत किया गया है। उनके छह उपन्यास- उसके हिस्से की धूप, वंशज, चित्तकोबरा, अनित्या, मैं और मैं तथा कठगुलाब, ग्यारह कहानी संग्रह- कितनी कैदें, टुकड़ा टुकड़ा आदमी, डैफ़ोडिल जल रहे हैं, ग्लेशियर से, उर्फ सैम, शहर के नाम, चर्चित कहानियाँ, समागम, मेरे देश की मिट्टी अहा, संगति विसंगति, जूते का जोड़ गोभी का तोड़, चार नाटक- एक और अजनबी, जादू का कालीन, तीन कैदें और सामदाम दंड भेद, दो निबंध संग्रह- निबंध संग्रह- रंग ढंग तथा चुकते नहीं सवाल, एक यात्रा संस्मरण- कुछ अटके कुछ भटके तथा एक व्यंग्य संग्रह- कर लेंगे सब हज़म प्रकाशित हुए हैं।

दरअसल, वीराना वीरान था भी और नहीं भी। दो बीघा ज़मीन का टुकड़ा, दो फुट ऊँची चाहरदीवारी से घिरा था। दीवार इंसान की बनाई हुई थी, इसलिए उसे वीराने का हिस्सा नहीं माना जा सकता था। पर उसकी गढ़न स्त्री की साड़ी जैसी बेरंग-बेतरतीब थी; यूँ कि उसका होना-न होना बेमानी था। वह बस थी;पेड़-पत्तों से महरूम, उस खारी धरती की निर्जन सारहीनता को बाँध, कम करने के बजाय बढ़ा रही थी। उस ज़मीन को घेरते वक़्त, घेरने वाले का इरादा, उसे आबाद करने का नहीं था। दिल की वीरानी को हरदम रौंदते यादों के काफ़िले को जीते-जीते, बाक़ी की ज़िन्दगी जीने की कूवत पैदा करने के लिए, जिस एकान्त की ज़रूरत होती है, उसी को निजी बनाने की कोशिश थी। कभी कभी सुकून पाने को वीराने में ही ठौर बनाना पड़ता है; वैसा ही ठौर था वह मझोला छाजन।
      
पर अचरज, इंसानों को बसाने का जज़्बा भले न रहा हो, फूलते-फलते पेड़ लगाने का इरादा ज़रूर था। इरादा कि उम्मीद! ज़िद या दीवानगी! जो था, कारगर न हुआ। धरती में खार की पहुँच इतनी गहरी थी और निकास के अभाव में, बरसात के ठहरे पानी की मियाद इतनी लम्बी कि पेड़ों का उगना, मुश्किल ही नहीं, क़रीब-क़रीब नामुमकिन था। कुछ झाऊं और कीकर ज़रूर उग आते थे जब-तब। पर जब और तब के बीच का फ़ासला इतना कम होता कि पता न चलता, कब थे कब नहीं। उगते, हरसाते, ललचाते और मुक्ति पा जाते। जब पहले-पहल, पहला झाऊं उगा तो बड़ी पुख्तगी के साथ इरादा, उम्मीद बना कि बस अब वह भरे भले नहीं पर जंगली पेड़ वहाँ हरे ज़रूर होंगे। और उसके एकाध साल बाद, ज़मीन ममतामयी हुई तो फलदार पेड़ भी उग सकेंगे। झाऊं के बाद कीकर उगे तो उम्मीद भी उमगती चली गई, अंकुर से पौध बनती। सरदी पड़ने पर कीकर पीले पड़ कर सूख गये; झाऊं भी गिनती के दस-बीस बचे। तब भी उम्मीद ने दम न तोड़ा। लगा इस बरस पाला ज़्यादा पड़ गया, अगली बार सब ठीक हो जाएगा। जब अगले बरस भी सिलसिला वही रहा तो धीरे-धीरे, जंगली पौधों के पेड़ बनने से पहले गलने-सूखने के साथ, उम्मीद क्या, ज़िद तक दम तोड़ गई।
   
दूसरी औरत छाजन के बाहर, चहारदीवारी के भीतर बैठी थी, हैंड पम्प के पास। फिड्डी, पेबन्द लगी कुर्ती और ढ़ीली सलवार पहने थी। अर्सा पहले जब नया जोड़ा बना था तो रंग ठीक क्या रहा होगा, कहा नहीं जा सकता था। और जो हो, सफ़ेद वह कभी नहीं था। मैला कुचैला या बेतरतीब फिंका हुआ अब भी नहीं। दुरुस्त न सही चुस्त ज़रूर था, देह पर सुशोभित। सीधी तनी थी उसकी मेहनतकश देह, उतनी ही जितनी पहली की दुखी-झुकी-लुकी। ज़ाहिर था वह निम्न से निम्नतर वर्ग  की औरत थी। गाँव की वह औरत, जो दूसरों के खेतों पर फ़ी रोज़ मज़दूरी करके एक दिन की रोज़ी-रोटी का जुगाड़ करती है पर ख़ुदकाश्त ज़मीन न होने पर भी रहती किसान है। ज़मीन से जुड़ाव में; अपनी भाव-भंगिमा में। वह इस ऊसर धरती के साथ पली-बढ़ी थी। उसे उपजाऊ से खार होते देखा था। कोई नहर बनाई थी सरकार ने। पर पानी के निकास का सही बन्दोबस्त न होने पर ख़ार इधर के खेतों की तरफ़ दौड़ा था और हरियल धरती को कल्लर बना कर छोड़ा था।आदमक़द पेड़ उगाने की न उस ने कभी उम्मीद की, न किसी और ने ज़िद। उसने आस लगाई तो बस कमतर श्रेणी का धान उगाने वाले खेतिहरों की फसल की बुवाई-कटाई की,जो कमोबेश पूरी होती रही, दो-एक सालों के फासले पर। जब सूखा पड़ता और फसल सिरे से गायब हो जाती तो सरकार राहत के लिए जहाँ सड़क-पुल बनाती, वहीं मजूरी करने चली जाती। जिस दिन मजूरी नहीं,उस दिन कमाई नहीं;रोटी नहीं। बिला काम-धाम, आराम से बैठने की उसे आदत न थी। सोने और जागने के बीच सिर्फ़ काम का फ़ासला जानती थी, इसलिए चन्द मिनट बेकार क्या बैठी, आप से आप आँखें मुंद गईं। इतनी गहरी सोई कि ओढ़नी बदन से हट, सिर पर टिकी रह गई। निस्पंद बैठे हुए भी उसकी देह ज़िन्दगी की थिरकन का भास देती रही। साँस का आना-जाना, छाती का उठना-गिरना,मानों उसकी रूहानियत के परचम हों। 

कल उसने दूनी मज़दूरी करके, घरवाले और बच्चे के लिए कुछ रोटी-प्याज़ बचा रखा था कि आज काम पर न जा, यहाँ बैठ पाये। ऐसा भाग कम होता था कि एक दिन में दो दिनों के गुज़ारे लायक़ अन्न जुट जाए। सबकुछ बरखा भरोसे जो था। सचमुच पिछ्ले दो बरस बड़भागी बीते थे। पिछले बरस भी बरखा इतनी हो गई थी कि धान की फसल ठीक-ठाक हो और उसे कटाई का काम मिलता रहे। और इस बरस...इस बरस तो यूँ टूट कर बरसा था सावन कि बिला खेत-ज़मीन, हरिया लिया था जिया। तभी न कल दूनी मज़दूरी का जुगाड़ हुआ और आज यहाँ बैठने आ पाई। जानती थी पहली औरत आज आएगी;पिछले दो बरसों से आ रही थी।    

मुंदने से पहले उसकी आँखें दीवार के परली तरफ़ टिकी थीं। दीवार की बाँध में बँध कर, उधर की निचली ज़मीन के गड्डों-खड्डों पर, उमग-घुमग कर बरसा पानी जो ठहरा, तो भरा-पूरा पोखर बन लिया। और उसमें खिल आये कमलनी के अनगिन फूल। जहाँ तक वह जानती थी; और इस इलाके के बारे में शायद ही कुछ था जो वह नहीं जानती थी; तो इस बरस से पहले, किसी बरस यहाँ कमलनी नहीं खिली थी।

हे मैया अजब माया है थारी! इस बरस कमलनी भी यों खिली ज्यों बरसा पानी; अटाटूट। देवी पारवती का चमत्कार नहीं तो क्या कहे इसे? वह जाने थी भली भांत, पारवती के कहे पर ही खिली थी कमलनी यूँ घटाटोप। कहा होगा शिवजी से कि प्राणप्यारे खिला दो, छोरी खातिर उसकी नाईं कमलनी। बाबा शंकर मना करते तो कैसे;सूरत छोरी की ज्यों पारवती की परछाई। दिप-दिप मुख पर देवी जोगी मुस्कान लिये खत्म हुई थी; पल भर को जो छोरे का हाथ अपने हाथ से छूटने दिया हो।जैसे ही गाड़ी ट्रेक्टर से टकराई, सोने से छोरा-छोरी मिट्टी हो गये। यह औरत, जो दो बरस से यहाँ आया करे है; जने क्या सोच बंजर को आड़ दे, बीज छींटा करे है, छोरे की माँ है। 

सफ़ेद झुकी औरत की आँखें उसकी देह की तरह बेजान नहीं थीं। जब-तब उनमें यादों का बरसाती अँधड़ सरगोशियाँ कर उठता। कभी काली आँधी की किरकिर धूल तो कभी साँवले मेह की झिलमिल टपकन। प्यार से पगे पल की याद कुलांच भरती कि विरह से सना उपरांत लपक कर उसे दबोच लेता।  

वह उन्हें पूरा नहीं खोलती थी, न इधर-उधर ताकने की इजाज़त देती थी। निगाहें यूँ नीचे झुकी रहतीं जैसे अपने दुख पर शर्मिन्दा हों। पर इधर-उधर न देखने की कोशिश जितनी करे, प्रकृति को पूरी तरह पछाड़ कहाँ पाती थी? गाहे बगाहे नज़र फिसल ही जाती, यहाँ-वहाँ। उसकी दूसरी कोशिश भी नाकाम रहती।बोझिल अधखुली आँखों को पूरी तरह मूँद, यह उम्मीद करने की, कि इस वीराने में यादों के भंवर में डूब, नींद आ जाएगी। एकाध दफ़ा यह तो हुआ कि भंवर से दो-एक खुशनुमा लम्हे ज़ेहन में उभरे और बरबस ओंठों पर हल्की मुस्कराहट तिर गई। पर ज़्यादा देर टिकी नहीं ...अनचाहे-मनचाहे उगे झाऊं-कीकर की तरह समाधिस्थ हो गई। बची रही चीखती-चीरती एक आवृत्ति...पहले गुज़री इस तिथि की...

कभी ऐसा भी हुआ कि अधखुली आँखों से उसने उम्मीद के इस वीराने को फल-फूल से लदा देख लिया। बेर, कैर, करौंदों से ही नहीं,जामुन और आम के झुरमुट से हरियाया। पर भ्रम रहा भ्रम ही; दीवानगी में भी वह जाने रही कि वह दीवानगी थी, असलियत या सच्चाई नहीं। उन ज़बरन मुंदी,अधमुंदी आँखों में जब नींद कभी न आई तो सपने कैसे आते? नहीं आये इसी से दीवानगी को दीवानगी जाने रही और वीराने को वीराना।  

अब भी, हमेशा की तरह, उसने ज़बरन आँखें मूँदी तो छलावे-सी मायावी, नामालूम-सी खुशबू ने पलकों पर दस्तक दी।कहाँ से आई खुशबू? क्या आँख लग गई, सपना आ बैठा उसके रूमाल का रूप ले, भीगी पलकों पर? आँखें औचक खुलीं तो इधर-उधर भटक भी लीं।

उसने देखा... ज़मीन को घेरे जो दो फुटी दीवार खड़ी थी, उसके दूसरी तरफ़ बाहर पानी ही पानी था। इतना पानी! हाँ होता है, देख चुकी है न दो बार। बरसात होने पर, उम्मीद का यह वीरान बगीचा, पानी से भरा उथला नाला बन, ख़ुद अपने पेड़ पौधों को निगल जाता है। पर यह मौत का साया फेंकता पानी नहीं, कुछ और है। इसमें तो बेशुमार कमलनी खिली हैं! दर्जनों, बीसियों, सैंकड़ों की तादाद में। वह चौंक कर खड़ी हो गई। कमलनी! यहाँ, जहाँ कभी कुछ खिलता नहीं। समझी! आखिरकार उसे नींद आ ही गई और यह सलोना सपना दिखला गई।

मन्त्र मुग्ध वह उठी और यन्त्र-बिद्ध क़दमों से दीवार के पास पहुँच गई। कमलनी बदस्तूर खिली रही; मन के तिलिस्मी पेड़ों की तरह बिलाई नहीं।उस पार जाने के लिए वह दीवार में, हैंड पम्प के पास बनी, फाँक की तरफ़ बढ़ी तो वहाँ एक स्त्री मूर्ति देख, स्तब्ध-अवसन्न रह गई। कहाँ से आई यह प्रतिमा, उसने तो लगवाई नहीं, करुणा से ओतप्रोत देव-मूर्ति...तब...कौन लगा गया...किसने तराशी ऐसी दिलकश...उसकी साँस रुक गई... मूर्ति की छाती उठती-गिरती साँस से हिल रही थी। यह तो... ज़िन्दगी की हलचल से लबालब, बादामी आँखें पूरी खोल सपनों में खोई... उसकी बहू थी? ज़िन्दा? 
पर उसे तो उसने ख़ुद अपने हाथों...

सिर में घुमेर उठी और वह चक्कर खा वहीं उसके बराबर में ढह गई। पसीने से तरबतर बदन से चिपकी साड़ी का पल्लू कन्धों से लरज़, दूसरी औरत की ओढ़नी की तरह ज़मीन पर बिछ गया। वह बेख़बर उठंगी पड़ी रही। उस औरत ने करुण वात्सल्य से भीगी दृष्टि उस पर डाली पर अपनी जगह से हिली नहीं; सहारा दे उसे उठाया नहीं।

सिर हाथों में थाम, उसने ख़ुद को सम्भाला और अपनी उसी झुकी, दुखी, जीवन से हताश, मुक्ति की तलाश में दिग्भ्रमित मुद्रा में बैठ गई। निगाह बरबस ऊपर उठी तो दूसरी औरत की स्निग्ध नज़र से जा टकराई।

नज़र के साथ चेहरा आँखों की राह ज़ेहन में पहुँचा तो हाहाकार करते दिल ने समझा,वह नितान्त अजनबी औरत थी। निश्चल रह कर भी, अपनी साँसों के स्पंदन से उस निष्कम्प सन्नाटे को आबाद कर रही थी। खुली बादामी आँखों, उसी मंज़र को ताक रही थी, जिसे सपना जान, मोहपाश में बँधी, वह फिर-फिर देखने की पगलाई ख्वाहिश लिये, चली आई थी। उनकी सांझा नज़रों के सामने हर तरफ़ कमलनीं ही कमलनीं थीं।

दोनों पास-पास मौन बैठी, एक दिशा में ताक रही थीं। पहली औरत अपने से बेख़बर थी और दूसरी से भी; पर दूसरी, पहली से पूरी तरह ख़बरदार थी। स्नेहिल, ममता में रची-पगी दृष्टि, जब-तब उस पर डाल, वापस कमलनी के घटाटोप की तरफ़ मोड़ लेती।

कितना वक़्त गुज़राः कुछ पल, चन्द लम्हे, एक घन्टा, एक पहर; कौन हिसाब रखता। बेख़याली में गुम पहली औरत भला क्या क़यास लगाती, कितने बरस बीते वहाँ? लगा, रेत की मानिन्द हाथों से फिसली पूरी ज़िन्दगी बीत ली। याद आया, यहाँ साँप के एक जोड़े ने बसेरा किया था। केंचुल छोड़ एक दिन सरक लिये। फिर नहीं लौटे। मोर-मोरनी भी भटक आये थे एक बार, जब बरसात से पहले, कुछ पेड़ उम्मीद बन उगे थे। वे भी चले गये न लौटने के लिए। वही बार-बार लौट आती है यहाँ। कब हुआ था वह सब? क्या पिछले साल ही? अब कहाँ थे वे? यहीं कहीं थे आस पास या गये? सब गये; सब के सब? 

दूसरी बेख़बर नहीं थी। आश्वस्त थी कि दिन ढलने में अभी वक़्त था। साँझ उतरने पर, जब कमलनी पँखुड़ियाँ समेटना शुरु करेगी, तभी घर पलट पाएगी, सोच कर ही वीराने में पाँव रखा था। उसे पता था, छोरे की माँ छोरे की पुन्न तिथि पर साँझ घिरने पर ही वहाँ से पलटती थी। कमलनी कल फिर खिलेगी; सूरज उगने के साथ। पर पारवती अपने शिव को साथ ले जो गई सो गई। दो बरस बाद ये सौगात भेजी माँ के लिए; ढेरोढेर कमलनी के फूल। यहीं से पानी ले जाती थीं गाँव भर की औरतें। इस बरस हर ज़बान पर यही नाम था; जहाँ कमलनी खिलती है।

बरसात बाद के अगहन महीने की दुपहरी का तेज़ ताप, जिसमें हरिण भी काले पड़ जाते हैं, मद्धिम पड़ना शुरु हुआ तो दमकती-चमकती कमलनीं, स्त्री की आर्द्र दृष्टि की तरह सौम्य दीखने लगीं। उसने अचकचा कर ऊपर आसमान की तरफ़ देखा; हाँ, सूरज चलाचली की ओर बढ़ रहा था। उसने ओढ़नी सिर से खींच, पूरा बदन ढका और असमंजस भरी निगाह से पास बैठी औरत को निहारा। निहोरा अब भी था उसमें पर हल्की दुविधा का भास लिये।
थिर मूरत में हरकत हुई तो पहली औरत मायाजाल से निकल ठोस ज़मीन पर आ गिरी। पर कमलनीं... वे तो अब भी खिली थीं। कुछ सिमटी-सकुचाई ज़रूर थीं, नई दुल्हिन की तरह। पर थीं सब की सब वहीं; मगन मन पानी के ऊपर तैरतीं। नहीं, मायावी नहीं था वह लोक जिसमें विचर, वह अभी-अभी लौटी थी। कमलनी थीं, वाक़ई थीं।

बेध्यानी टूटी तो जो पहले नहीं सूझा था, अब सोच बैठी। कौन थी वह औरत; यहाँ क्यों बैठी थी? हैंड पम्प से पानी लेने आई होगी। इस ख़ारे इलाके का पानी भी ख़ारा था; कुओं का ही नहीं, गहरे खुदे नल कूप का भी। वह खुदवा कर देख चुकी थी। मीठा पानी सिर्फ़ सरकार की कृपा से मिलता था। उसकी ज़मीन पर था मीठे पानी का एक हैंड पम्प। उसी ने कह-सुन कर लगवाया था।सुबह सकारे गाँव की औरतें उससे पानी भरने आती थीं। पर इतनी देर रुक-ठहर कोई बैठती न थी। भागती-दौड़ती आईं, पानी भरते-भरते आपस में दो बोल बोले और चल दीं। कभी वह नज़र आ गई तो शर्मीली-सी दुआ सलाम उससे भी कर ली,बस।

उठने-उठने को होती दूसरी औरत बैठी थी अब तक।पर उसके बदन की कसमसाहट पहली को उठने पर आमादा कर रही थी। क्या वे किसी काम के सिलसिले में आपस में टकराई थीं? याद आया, एक बार, एक स्वयंसेवी संस्था से दो औरतें यहाँ आई थीं; गाँव की औरतों को क्या-कुछ बतलाने। बड़ी मुश्किल से औरतों को इकट्ठा किया था पर बात आगे बढ़ी न थी। कैसे बढ़ती? औरतें चाहती थीं रोज़गार और वे देती थीं, मात्र सलाह। तो...उसने क्या किया? कुछ नहीं। सोचा भी नहीं कि कुछ कर सकती थी।  
फिर एक बार...अरे पिछ्ले बरस ही तो, धान की थोड़ी-सी फ़सल भी हुई थी इस ज़मीन पर; कुछ औरतें काट ले गई थीं। उनमें रही होगी यह भी। पर...आज...एक बरस बाद... इतनी देर से यहाँ क्यों बैठी है? कौन है यह, क्यों है?
कौन हो सकती है? ग़रीब घर की किसान औरत, और क्या।पर... आँखों से झरती कण-कण अनुकम्पा; सीधी-तनी-कृश देह से तरंगित वत्सल राग? पेबन्द लगी फिड्डी पोशाक में दिपदिप करती देवी-सी आकृति... उसकी बहू...नहीं पार्वती है यह साक्षात! वही...वही...और कोई नहीं...  

कुछ पल गुज़रे...एक पहर और बीता...

सूरज अवसान की तरफ़ बढ़ा, कमलनीं सकुचाईं, मायाजाल तिड़कता चला गया। इतना कि तमाम संकोच-झिझक के बावजूद, सपनलोक से बेवफ़ाई कर, वह ज़मीनी सवाल कर बैठी।
"कुछ चाहिए?"
"ना,"उसने कहा,"सोचा, इकली कैसे बैठोगी।"
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