ग़ज़ल के लिए मीटर के अनुशासन की ज़रूरत होती है - देवी नागरानी | Sudha Om Dhingra's Conversation with Devi Nangrani

 Sudha Om Dhingra's Conversation with Devi Nangrani

ग़ज़ल अब हमारी तहज़ीब की आबरू बन गई है - देवी नागरानी

दर्द नहीं दामन में जिनके ख़ाक वो जीते ख़ाक वो मरते - देवी नागरानी
देवी नागरानी से मुझे अंजना संधीर ने विश्व हिन्दी सम्मलेन (न्यूयार्क) में मिलवाया था। मुलाक़ात कुछ क्षणों की थी। बस इतना याद रहा कि ठहरा हुआ सुन्दर व्यक्तित्व है। समय अपने पृष्ठ पलटता रहा और मैं उन्हें पढ़ने में व्यस्त रही। एक दिन अचानक देवी जी का फ़ोन आया कि आप मेरे शहर से होते हुए कहीं जा रही हैं और एक रात रुकेंगी। बस रचनाकारों को क्या चाहिए..... रचनाकार का सान्निध्य मिलते ही महफ़िल जम गई। पहली बार आपकी सुरीली आवाज़ और ग़ज़ल कहने के अंदाज़ से परिचित हुई। आप न्यूजर्सी में रहती हैं और मैं नॉर्थ कैरोलाईना में। अगले साल फिर मिलना हुआ और कवि गोष्ठी का होना स्वाभाविक था। सिन्धी और हिन्दी की चर्चित ग़ज़लकार देवी नागरानी को क़रीब से पहचानने और समझने का अवसर मिला। आपके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएँ, आप की ग़ज़लें अंतरजाल पर बिखरी हुई हैं। उन्हें तो पढ़ती रहती हूँ पर इस अनौपचारिक साथ ने आपके व्यक्तित्त्व और कृतित्व के कई पहलुओं को उजागर किया  - सुधा ओम ढींगरा 

Devi Nangrani, Sudha Om Dhingra, Pravasi, interview, writeup, सुधा ओम ढींगरा, देवी नागरानी

सुधा ओम ढींगरा : 

कुछ क्षण तो ऐसे होंगे, जिन्होंने आप को ग़ज़लकार बनाया?

देवी नागरानी : 

सुधा जी, यह सवाल ऐसा है जिसका हर जवाब मुझे आज तक सवाल ही लगता आया है, शायद क़लम निरंतर गतिशील होकर अपनी दिशा स्वयं तलाशती है। वजह हो यह ज़रूरी नहीं। ग़ज़ल लिखने का मेरा पहला प्रयास सन 2003 से शुरू हुआ। एक जुनून था, जो सैलाब बनकर मुझे अपने साथ बहाता रहा। मुझे ग़ज़ल लिखने का प्रोत्साहन सिन्धी समाज के वरिष्ठ ग़ज़लकार श्री प्रभु छुगानी ‘वफ़ा’ जी से मिला। क़दम-दर-क़दम उनकी रहनुमाई पाकर मैं ग़ज़ल की बारीकियों को, विधा की ज़रूरतों को, सबसे अहम कायदे ग्रहण करती रही।

सुधा ओम ढींगरा : 

देवी जी, सिन्धी की आप स्थापित लेखिका हैं, सिन्धी लेखन में आप कब आईं ? ग़ज़ल की तरफ़ आकर्षित होने के कारण? 

देवी नागरानी : 

सुधाजी, आपने इस सवाल के माध्यम से मुझे मेरे अतीत के उस मोड़ पर लाकर छोड़ा है, जहाँ मैंने आज तक कभी मुड़कर नहीं देखा। सन 2001 में जाने किस सनक के तहत मैंने अपनी मातृ-भाषा सिन्धी सीखी, जिसमें कठिन परिश्रम की माँग थी। यह एक साधना थी, पर मैंने निष्ठा के साथ उस पथ पर अपने क़दम टिकाए रखे। कुछ छोटे-बड़े आलेख लिखे, जो ‘हिन्दीवासी ’ राष्ट्रीय एवं अन्तरराष्ट्रीय पत्रिका में छपते रहे। फिर कुछ कहानियाँ लिखीं और खलील जिब्रान और रूमी की कविताएँ अंग्रेज़ी से सिन्धी भाषा में अनुवाद की, जो मेरी एक नई पहचान सिन्धी साहित्यकारों और पाठकों में करती रहीं। जब भाषा का बीज फलीभूत होता है तो सामने अनावृत आसमान ही होता है, और कुछ नहीं !!

यह ज़िंदगी भी बड़े अजीब ढंग से हमसे अपना हर पृष्ठ पढ़वाती है। सिन्धी अदब की दुनियाँ में जब पहला क़दम रखा, ग़ज़ल की तकनीक सीखी और आज भी उसी पाठशाला की शागिर्द बनी निरंतर सिन्धी और हिन्दी ग़ज़ल लिखने का प्रयास कर रही हूँ। और 2004 में मेरा पहला सिन्धी ग़ज़ल संग्रह “ग़म में भीनी ख़ुशी” मंज़रे-आम पर आया। 

ग़ज़ल की ओर आकर्षित होने का कोई ठोस कारण तो नहीं, पर इसके लिखने में मुझे बहुत आज़ादी मिलती, सोचने की, उड़ने की, किसी भी दिशा में विचरण करने की। कोई बंधन नहीं, एक विचार को दो मिसरों में समावेश करना, कभी सरल तो कभी बहुत कठिन लगता रहा, पर नव निर्माण की लालसा से, उसका रूप और शिल्प, उसकी रचनात्मकता और कलात्मकता एक नए भाव-बोध के धरातल पर स्थापित होती रही, जिसने मेरे अंदर एक चेतना और जागरूकता पैदा कर दी। शायद यही वह कारण हो !! 

सुधा ओम ढींगरा : 

अच्छा यह बताएँ कि उर्दू ग़ज़ल को आप हिन्दी ग़ज़ल से कितना भिन्न पाती हैं ?

देवी नागरानी : 

हिन्दी और उर्दू का बड़ा गहरा संबंध है। समकालीन हिन्दी और उर्दू ग़ज़ल को अलग करके नहीं देखा जा सकता। हिन्दी ग़ज़ल कहने वाले कवि, उर्दू की शब्दावली को भी अब एक लय-ताल के साथ उर्दू ग़ज़ल के रंग और खुशुबू के साथ बख़ूबी समावेश कर रहे हैं। दोनों भाषाओं में सांप्रदायिकता की मिली-जुली रंग-ओ-ख़ुशबू पायी जाती है, और दोनों धाराओं का समान स्त्रोत है। यहाँ तक कि हिन्दी और उर्दू की तुलना दो आँखों से की जाती है, जो दोनों की सुंदरता में निखार लाती हैं।

उर्दू के ग़ज़लकार फ़ारसी, अरबी व तुर्की के अल्फ़ाज बहुत ज़्यादा इस्तेमाल करते है, जिनको आम आदमी पूरी तरह समझ नहीं पाता। इसी बात को मद्धे-नज़र रखते हुए आजकल संग्रहों में, पत्रिकाओं में और ब्लोगस पर भी ग़ज़ल के अंत में उन कठिन शब्दों के शब्दार्थ दिये जाते है। हिन्दी में ऐसा नहीं है, बोलचाल की भाषा में सरलता और सहजता से अपनी बात प्रत्यक्ष रखी जा सकती है, अनिवार्य शर्त यह है कि बहर में वह नियमों का पालन कर रही हो... ! ग़ज़ल अब हमारी तहज़ीब की आबरू बन गई है ।

सुधा ओम ढींगरा : 

ग़ज़ल के लिए मीटर के अनुशासन की ज़रूरत होती है । वह अनुशासन ही ग़ज़लकार को कुशल बनाता है। आप इसके बारे में क्या सोचती हैं ?

देवी नागरानी : 

आप ग़ज़ल के महत्त्वपूर्ण अनुशासन की डगर पर मुझे ले आई हैं, जो इस विधा का मूल आधार है। ग़ज़ल कहने के लिये हमें कुशल शिल्पी बनना होता है ताकि हम शब्दों को तराश कर उन्हें मूर्त रूप दे सकें, उनकी जड़ता में अर्थपूर्ण प्राणों का संचार कर सकें, तथा ग़ज़ल के प्रत्येक शेर की दो पंक्तियों (मिसरों) में अपने भावों, उद्गारों, अनुभूतियों, अनुभवों को अभिव्यक्त कर सकें। ग़ज़ल की बाहरी संरचना में छंद-काफ़िया-रदीफ़ का महत्त्वपूर्ण योगदान हैं। रचना का सही छंदोबद्ध होना ज़रूरी होता है, साथ में छंद-बहर की विशिष्ट लय का निर्वाह भी आवश्यक है। 

यह एक कला है जिसके लिए हमें शुरूआती पड़ावों में हर क़दम पर एक गुरु की ज़रूरत होती है, जो ग़ज़ल के अदब-आदाब से वाक़िफ़ कराता है, तब जाकर हम में वह सलीका, वह शऊर, वह सलाहियत, वह योग्यता एवं क्षमता उत्पन्न होती है- और ऐसे कलात्मक शेर सृजित करने में समर्थ होते हैं। सच तो यह है कि कथ्य और शिल्प समंजस्य/ मिश्रण से ही एक सही ग़ज़ल का निर्माण होता है। 

जैसे कि मैं पहले बता चुकी हूँ कि मुझे ग़ज़ल सीखने के दौरान मार्गदर्शन मिला सिन्धी समाज के वरिष्ठ शायर श्री प्रभु वफ़ा जी से ; जिन्होंने इस नई विधा के बीज मेरे ज़ेहन में भर दिये, और वे इस क़दर अंकुरित हुए कि मैं शिद्दत से इस राह पर वेग के साथ चलती रही।

यह मेरी खुशनसीबी है, जब 2006 में मैं न्यूजर्सी से मुंबई आई तो मेरा परिचय एक दस्तावेज़ी हैसियत श्री आर॰ पी॰ शर्मा ‘महर्षि’ ग़ज़ल संसार के जाने माने छंद-शास्त्र के हस्ताक्षर से हुआ। उन्होंने ग़ज़ल के बाहरी और आंतरिक स्वरूप, काफ़िया या रदीफ़, कथ्य एवं शिल्प तथा ग़ज़ल की अन्य बारीकियों की विस्तार से चर्चा करते हुए मेरी राह को रौशन किया। इसमें किंचित मात्र दो राय नहीं की गुरु ऊसर (बंजर ज़मीन) को उर्वरा बनाने में सक्षम होते हैं। 


सुधा ओम ढींगरा : 

आपकी ग़ज़लों का मूल स्वर क्या है तथा उसमें आप ने किन जीवन मूल्यों को अधिक महत्त्व दिया है ? 

देवी नागरानी : 

ग़ज़लकारों ने जीवन के हर रस पर क़लम चलाई है, जिसमें नौ रस समोहित रहते हैं.......
श्रृंगार, हास्य, करुण, वीभत्स, वीर, अद्भुत
त्यों रौद्र, फिर भयानक है नवम शांत रस 

लेकिन सूफ़ी शायरी में एक सकारात्मक भाव प्रतीक बन जाता है, रात के अंधेरे जब घने होते हैं तो उनको चीरकर रौशनी निकलती है, जहाँ आकर अंधेरा रोशनी के साथ यूं घुल-मिल जाता है, जैसे दूध में पानी, जैसे परमात्मा में आत्मा का लीन होना। यह एक सकारात्मक दृष्टिकोण है।

पर अब जीवन की जटिलताओं से प्रेरित हो कर ग़ज़लें कई विषयों पर लिखी जाने लगी हैं। आज की ग़ज़ल विभिन्न जीवन आयामों को प्रतिबिम्बित करती है, राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, संस्कृतिक, धार्मिक पक्षों को ग़ज़ल के शेरों में अभिव्यक्त किया जाता है, यहाँ तक कि समकालीन ग़ज़ल ने नारी विमर्श, दलित विमर्श, आर्थिक विमर्श, और जाने कितने ही ऐसे विमर्श और हैं......!!

मैंने अपनी संघर्षमय ज़िन्दगी की संकीर्ण सुरंगों से गुज़रते-गुज़रते कई बार ज़ख़्मी हुई, पर एक अटूट विश्वास मन में रहा, जो कभी अंधेरी राहों पर भी डगमगाने न पाया। शायद यह मेरी आस्था है, कि मेरे भीतर कोई मुझसा बैठा है जो मुझसे बतियाता है, जिसके साथ मैं खुद को, अपने हर उस दर्द को बाँट लेती हूँ, जो बिना उसकी रज़ा से कभी मुझे छू तक नहीं पाता। वही मेरी हर चोट को मरहम लगाता है, मेरी आँख के हर आँसू को अपने आँचल से सोख देता है... !!

यह एक अनुभूति है, उसकी निवाज़िश है, जो मेरी हर कठिनाई को आसानियों में बदल देती है। यह एहसास मुझे हर उस दौर से गुज़र जाने के बाद होता है, जब मैं पीछे मुड़कर देखती हूँ तो लगता है गोया दुःख ही जीवन में सुख के परिचायक होकर हमारे साथ-साथ हमसफ़र बनकर चलते हैं। बरसों पहले प्रदीप जिलवाने की एक कविता का अंश पढ़ते लगा था और आज भी लगता है -“दुःख, हमारे जीवन का एक हिस्सा है, देह के ज़रूरी अंग सा। मेरे घर का एक ही रास्ता है, मगर दुःख न जाने किन-किन रस्तों से चला आता है दरवाज़े तक।'' यह कविता हमसे बतियाती है, सहजता से मगर दृढ़ता से मानुषी के पक्ष में खड़ी हुई है।

दुनिया का कोई किस्सा ऐसा नहीं है जो सुना-सुनाया नहीं लगता, पुराना होने के बावजूद भी वही दर्द का भाव दोहराने पर अपना-सा लगता है। और दिल की धड़कन उस दर्द में शामिल होकर हिलोरे खाती है ।

फैज़ का यह शेर भी दुःख में ऐसे ही सुख के एहसास को दर्शा रहा है.... !
और भी दुःख हैं ज़माने में मुहब्बत के सिवा
राहतें और भी है वस्ल की राहत के सिवा

मैंने भी जाने किस पल, सोच की उसी दिशा में लिखा है.....!
दर्द नहीं दामन में जिनके 
ख़ाक वो जीते ख़ाक वो मरते। 
जाने क्यों लिखे है मेरे जज़्बे फिर से !!

जीवन एक संघर्ष है, हर इंसान को अपने हिस्से कि लड़ाई लड़नी पड़ती है।

मैंने देवी जी को रोका नहीं, लगा वर्षों से भीतर पड़ा दर्द शब्दों में अपनी पीड़ा उड़ेल रहा है .....आप कहती गईं और मैं सुनती रही .....

ऐसा क्यों होता है कि यह दस्ताने-दर्द अक्सर औरत के दामन में पनाह पाता है? वहीं पनपता है और खिले हुए ज़ख्मों की ख़ुशबू अपने आस-पास फैलाता हुआ, ज़िन्दगी की बहार के पश्चात खिज़ाओं के थपेड़ों से थक हार कर दम तोड़ देता है। यहीं पर ज़िन्दगी का जलता हुआ चराग़ बुझ जाता है। दिल के तहखानों में सन्नाटा भर जाता है। उस सन्नाटे भरी सुरंग में रचनाकार के मन में एक सोच का उजाला जन्म लेता है, जहाँ वह अपने आप से जूझता हुआ उस रेशम के कीड़े की तरह जो रेशमी तानों-बानों की बुनावट में खुद को क़ैद कर लेता है। वहीं से एक नया जीवन संचार करता है। बहुत खोने और पाने के बीच का सफ़र तय करते हुए वह मन ही मन खुद से जुड़ने लगता है। इस नए सफ़र में अपने अहसासों की अभिव्यक्ति के माध्यम से वह अपने जीवन की सच्चाइयों के आलम से फिर नए सिरे से जुड़ने लगता है। यहीं आकर आप-बीती, जग-बीती बन जाती है और जिसे पढ़ते ही कभी आंखें नम हो जाती है तो कहीं लबों के पोर मुस्करा उठते हैं ।

मैंने इसी दर्द और बेचैनी से दोस्ती कर ली ...........और मुझे उस हर मत में अक़ीदत है, जो मुझे बाहर और अंदर से जोड़ता है, मुझे परेशान रात में राहत की नींद सुलाता है, मेरे सामने अनदेखे नक्शे-पा ज़ाहिर कर जाता है...जिनपर चलकर आज मैं ज़िंदगी का एक लंबा सफर तय कर आने के पश्चात जब पीछे मुड़कर देखती हूँ तो यूं लगता है मैंने जितना खोया है, उससे कहीं ज़्यादा पाया है...

एक अज़ीम शायर का यह शेर है कि....
हमने इस इश्क़ में क्या खोया है क्या सीखा है
जुज़ तेरे और को समझाऊँ तो समझा न सकूँ।
(जुज़=अध्याय, बाब, अलावा, अतिरिक्त)

सुधा ओम ढींगरा : 

हिन्दी साहित्य में ग़ज़ल का भविष्य क्या है? आप की राय जानना चाहती हूँ क्योंकि ग़ज़ल अभी हिन्दी साहित्य में अपनी दिशा ढूँढ रही है ।

देवी नागरानी : 

बहुत ही उज्ज्वल ! शायरी की विशाल सड़क को अपनी रफ़्तार से तय करते हुए ग़ज़ल अपनी दशा और दिशा खुद ढूँढ निकालने में सक्षम हुई है। आज बहुत कुछ ग़ज़ल और ग़ज़लकारों के बारे में लिखा जा रहा है, जिसमें शामिल है आजकल के दौर के सामाजिक राजनैतिक और आर्थिक सरोकार। हर दिशा और दशा को लेकर गद्य और पद्य में लिखा जा रहा है, और सही दिशा में ही लिखा जा रहा है। आज के दौर में स्त्री विमर्श, दलित विमर्श, आदिवासी विमर्श, भ्रूण हत्या जैसी समस्याओं पर लेखन खुद अपना परिचायक बन गया है। ग़ज़ल भी विविध रंगों में अपनी उड़ान भर रही है। (it is on a Highway)

सुधा ओम ढींगरा : 

आप अनुवाद करती हैं, समीक्षा भी लिखती हैं, कभी-कभी लघुकथा भी लिख लेती हैं । कौन सी विधा आपको सबसे अच्छी लगती है ?

देवी नागरानी : 

सुधाजी सच कहूँ तो, मुझे ग़ज़ल बहुत प्रिय है, वह मुझे स्पेस देती है, सोचने का, लिखने का, और किसी भी विषय पर, जिस दिशा में भी सोच ले जाए, बस मनचाहे बहर में दो मिसरे लिख लेना कुछ आसान सा लगता है। कोई कड़ी नहीं टूटती, किसी सोच की धारा में रुकावट नहीं आती ।

शायरी हो या लेखन की कोई भी विधा क्यों न हो, यह हर एक व्यक्ति की अपनी रचनाधर्मिता है, जो वह अपने स्वतंत्र विचारों को खुले दिल से लिखता है, बिना किसी दबाव के, और इसीलिए वह शायद कहीं न कहीं अपनी आप-बीती के बिम्ब भी अपने अंदर के धँसे हुए कोनों से निकाल लाता है। यह उसकी रचना और उसके नए व्यक्तित्त्व का निर्माण भी। और खुद किया हुआ हर नव निर्माण आकर्षित करता है। इसके लिए ‘भीतर और बाहर’ की परस्पारिक अंतक्रिया की सही, समझ और परख भी विवेक और दृष्टि दोनों को विकसित करती है, और शायर को अपने निजी दायरे से निकालकर व्यापक इंसानी सरोकारों से जोड़ती है, उसके अतीत, वर्तमान और भविष्य की संकलित चेतना को जागृत करती है। फ़िक्र क्या, बहर क्या, क्या ग़ज़ल, गीत क्या ।
 मैं तो शब्दों के मोती सजाती रही….. स्वयंरचित ।

सुधा ओम ढींगरा : 

क्या अंतरजाल हिन्दी साहित्य के प्रचार -प्रसार में सहायक हो सकता है ? यह इसलिए पूछा है कि आप चिट्ठा जगत में भी सक्रिय हैं ?

देवी नागरानी : 

यक़ीनन है और होता रहेगा। हाँ अंतर्जाल के कारण वैश्वीकरण आया है, हिन्दी के लेखक कम्प्यूटर का प्रयोग करने में सक्षम हो गए है, अपनी रचनाएँ अंतर्जाल पर लिख भेजते हैं और अपनी टिप्पणियाँ भी प्रस्तुत करते है। एक तरह से हिन्दी भाषा को भी बढ़ावा मिला है, कि लोग अपनी राष्ट्रीय भाषा में देश-विदेश के किसी भी कोने में बैठे, अपनी बात पहुँचा सकते हैं। इस प्रकार विश्व हिन्दी साहित्य को एक सांझा मंच मिल गया है। जिसमें बहुत सी वेब पत्रिकाओं, अंतरजाल पत्रिकाओं का बहुत बड़ा योगदान है। अपने- अपने ब्लॉग बनाकर भाषा को और समृद्ध किया गया है इसमें कोई दो राय नहीं। 

सुधा ओम ढींगरा : 

अमेरिका आपकी सृजनात्मक प्रक्रिया में कितना सहायक सिद्ध हुआ ?

देवी नागरानी : 

मानव-मन अपनी गति से चल रहा है और भाषा का तरल प्रवाह पाठक के मन को मुक्ति नहीं दे पा रहा है। यह सच है कि हिमालय की हर चट्टान से गंगा नहीं निकलती लेकिन क़लम की तेज़ धार से लेखक के मन की व्यथा एक उर्वरा बन कर बहती है। फिर भी विदेश के माहौल के अनुरूप सृजनात्मक प्रवाह, मानव-मन को टटोलकर, उसके भीतर की उथल-पुथल को अपनी शैली, शिल्प, भाषा के तेवरों में ढालकर अभिव्यक्त करने की माहिरता पा लेता है, जहाँ उसकी सृजनात्मक, कलात्मक अनुभूतियाँ संभावनाओं की नयी दिशाएँ उजगार करती हैं। विदेशों में रहते लोग मन से फिर भी भारतीय हैं, अपने देश की मिट्टी से जुड़े रहते हैं। शायद यही एक भारतीयता का जज़बा है, जो देश की भाषा, भारतीय संस्कृति, हिन्दी और भाषाई साहित्य से ख़ुद भी जुड़े रहते हैं ।

हालांकि अमरीका के जीवन में लेखक को कई विपरीत दशाएँ और दिशाएँ मिलतीं है; जिन्हें चुनौती पूर्ण रूप में स्वीकारना ही पड़ता है। अमेरिका की जीवन शैली अलग है; रहने का ढंग, ओढ़ने का ढंग, बिछाने का ढंग अलग है। वह एक ज़रूरत है, जो बदलाव चाहती है, और उसी माहौल की सभ्यता को अपने कार्यक्षेत्र में अपनाना भी तो उसी ज़रूरत का अंग है। और इसी माहौल का सदुपयोग करते हुए नव निर्माण की राहों पर मैंने भी अपने सिन्धी और हिन्दी साहित्य के अनेक अंशों का सृजन न्यूजर्सी में किया है।

सुधा ओम ढींगरा : 

आप वर्ष का आधा समय भारत में और आधा समय अमेरिका में रहती हैं । दोनों देशों के साहित्यकारों की साहित्य सृजना में आप क्या अन्तर पाती हैं ?

देवी नागरानी : 

यह सच है कि अब मैं अपनी पारिवारिक जवाबदारियों से काफ़ी हद तक मुक्त होकर खुद को आज़ाद पा रही हूँ। पारिवारिक संबंध के साथ-साथ लेखक का एक रिश्ता अपने अंदर के रचनाकार के साथ भी स्थापित होता है, जो उससे समय भी माँगता है, और साथ भी। पिछले चार सालों से मैं भी नियमित सर्दियों में भारत में रहती हूँ। 

एक बात ज़रूर है, यहाँ भारत में आकर मुझे एक साहित्यिक माहौल मिलता है, साहित्यकारों से मिलने का, ख़यालों के आदान-प्रदान का अवसर मिलता है, जो सोच को एक अलग दिशा और स्फूर्ति देता है। यहाँ लिखते समय संदर्भ के लिए, मनचाहे विषय पर साहित्य सुविधा से उपलब्ध हो जाता है। विषयानुसार प्रिंट में भी मन चाहे विषय पर साहित्य उपलब्ध हो जाता है, जो लेखन कार्य में एक सुविधाजनक कड़ी साबित होती है।

दोनों देशों के साहित्यकारों में कुछ अंतर ज़रूर पाया जाता है, पर यह हमारे जीवन शैली और परिस्थितियों की उपज ही है, जो हमारे मनोभावों पर हावी होती हैं।

जहाँ मानवीय मूल्यों की बात है सभी देशों का साहित्य एक-सा होता है। सामाजिक मूल्यों वाली रचनाएँ यहाँ भी और वहाँ भी लिखी जा रही हैं। फ़र्क यह होता है कि लेखक जहाँ कहीं भी रहता है, अपने परिवेश, अपने आस-पास के माहौल के संदर्भों को अपने लेखन की विषय-वस्तु बना लेता है। 

जहाँ तक भारत और विदेश के साहित्यकारों की साहित्य सृजन में अंतर का सवाल आता है, मैं इतना ज़रूर कहूँगी कि हम जिस परिवेश में रहते हैं, जो अपने आस-पास देखते हैं, महसूस करते हैं, भोगते हैं, जीते हैं, उन्हीं अहसासों के तानों-बानों को अपनी रचनाओं में बुनते हैं, उड़ेधते हैं, अपनी रचना में साकार करते हैं। और वैसे भी कोई क़लमकार या कलाकार अपनी कलाकृति से दूर तो नहीं होता ! जो अपने भीतर ज़ब्त करते हैं उसे ही तो अपनी रचनाओं की ख़ला में खाली कर देते हैं। इसी एवज़ शरत बाबू ने जब कवि रविंद्रनाथ टैगोरे से अपनी जीवनी लिखने को कहा तो उन्हें यह उत्तर मिला "अपनी आत्मा कथा लिखकर मैं लोगों का बोझ नहीं बढ़ाना चाहता। जो मुझे जानना चाहता वह मुझे मेरी रचनाओं में देख सकता है। क्या मैं वहाँ नहीं हूँ? जो उनके लिए एक पुस्तक और बढ़ाऊँ ।”

अंत में अक़बर इलाहाबादी के इस शेर के साथ शुभकामनाएँ...
दुनिया में हूँ, दुनिया का तलबगार नहीं हूँ /बाज़ार से गुज़रा हूँ, ख़रीदार नहीं हूँ  ........... इसी कामना के साथ कि देवी जी, जब अमेरिका में हों तो हमारे पास आएँ और हम गोष्ठी के साथ-साथ आपसे और गहरी साहित्यिक बातचीत कर सकें .......
Share on Google +
    Facebook Commment
    Blogger Comment

0 comments :

Post a Comment

osr5366