'हैदर का प्रतिपक्ष' ! कहानी: बस... दो चम्मच औरत - मधु कांकरिया | Hindi Kahani By Madhu Kankaria

Hindi Kahani By Madhu Kankaria
बस... दो चम्मच औरत

क्या कश्मीर में फौजी को हिंदू बनकर रहने में भी खतरा है?
           क्या मेजर ने जानबूझकर उसे नहीं बताते हुए भी सब कुछ बता डाला?
               या मजाक किया उससे?

आतंकवाद की पृष्ठ भूमि पर मधु कांकरिया का एक उपन्यास है 'सूखते  चिनार'. 'हैदर' फिल्म में  जिस प्रकार भारतीय सेना का इकहरा अमानवीय  चेहरा दिखाया गया  है, उसे रचनाकार सम्पूर्ण सत्य नहीं मानता है। मधु कांकरिया जी के कई जानने वाले सेना में हैं और वो कहती हैं कि कश्मीर  की  सच्चाई बहुत जटिल है, कश्मीर के एक प्रतिशत सत्य को 'हैदर' फिल्म में प्रतिनिधि सत्य दिखाया गया है जो आर्मी का मनोबल तोड़ने वाला है और इसीलिए यह कहानी ''बस... दो चम्मच औरत'', 
आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतज़ार रहेगा



Madhu Kankaria
जन्म   23rd March, 1957
शिक्षा :M.A. (Eco),Diploma (Computer Science)

उपन्यास 
• खुले गगन के लाल सितारे
• सलाम आखरी
• पत्ता खोर
• सेज पर संस्कृत  
• सूखते चिनार
कहानी संग्रह
• बीतते हुए
• और अंत में ईसु
• चिड़िया ऐसे मरती है
• भरी दोपहरी के अँधेरे (प्रतिनिधि कहानिया)
• दस प्रतिनिधि कहानियां
• युद्ध और बुद्ध
सामाजिक विमर्श 
• अपनी धरती अपने लोग
• यात्रा वृतांत : बादलों में बारूद
सम्मान 
• कथा क्रम पुरस्कार 2008
• हेमचन्द्र स्मृति साहित्य सम्मान -2009
• समाज गौरव सम्मान -2009 (अखिल भारतीय मारवारी युवा मंच द्वारा)
• विजय वर्मा कथा सम्मान  2012
अनुवाद
• सूखते चिनार का तेलगु में अनुवाद
• Telefilm - रहना नहीं देश विराना है, प्रसार भारती
• पोलिथिन  में पृथ्वी कहानी पर फिल्म निर्माणाधीन
सम्पर्क :
H-602,Green Wood Complex, Near Chakala Bus Stop,
Anderi Kurla Rd, Andheri (East),
Mumbai-400093.
Mobile:-09167735950.
e-mail: madhu.kankaria07@gmail.com

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जिंदगी के प्रति वह इतना ठंडा हो चुका था कि कोई लहर उसे जिंदगी की ओर वापस लौटा भी नहीं सकती थी। अरसे तक वह हाड़-मांस का जीवड़ा नहीं वरन् एक गहरी ठंडी उच्छवास ही था। ऐसे में भला कोई सोच भी कैसे सकता था कि इस चट्टान के नीचे भी इतनी जलतरंगें हैं। यह तो भला हुआ उस डायरी का जो न जाने कैसे खुली रह गई थी, जिसे जाने किन घायल और असावधान क्षणों में लिखने वाले ने कुछ टीपने के लिए अपने गुप्त तहखाने से बाहर निकाला और फिर चूक गया अपनी असह्य यातना के चलते... या कौन जाने उसी ने सचमुच उसे खुला छोड़ दिया हो अपने न होने के विरुद्ध अपने होने के प्रतिपक्ष में। 

बहरहाल... इस डायरी को पढ़ा उसकी भौजी ने। इसे पढ़ उसकी भौंहें उठीं, मुंह खुला का खुला रह गया। उसकी आत्मा में अजीब किस्म की खलबली मची। जिंदगी और देवर के प्रति उसकी राय बदली। जिंदगी ने पहली बार उसे अपने करीब खिसकाया और हर संभावनाओं की एक नई बारहखड़ी पढ़ाई। 

पर अफसोस तब तक सचमुच देर बहुत हो चुकी थी। इतना भर भी समय नहीं बचा था उसके पास कि जिंदगी की इस नई समझ को जिंदगी पर उतारा जाए। शायद इसी विरोधाभास और टकराव का नाम ही है जिंदगी, उसने सोचा और एक नजर फिर फेंकी अपने सोए हुए देवर पर। 
कई बार उसे लगता जैसे यह पौने छह फीट का देवर नहीं, रिश्तेनुमा डोरियों की एक खूबसूरत झालर है जिसमें सारे रिश्ते गड्डमड्ड हो गए हैं। उसे याद आया, शादी के तुरंत बाद कैसे देवर एक खलनायक बन गए थे - उसके और नए-नवेले दूल्हे मियां के बीच। सुहागरात को भी नहीं बख्शा था मरजाने ने। वक्त की धूल हटी कि यादें चमकीं। हंस पड़ी वह-कैसे बिस्तर के नीचे बिछा दिए पापड़ ही पापड़। जैसे ही बैठी वह कि चर्र-चर्र। झेंप गई वह बुरी तरह से, चारों तरफ गर्दन घुमाई, किसी ने सुन तो न ली वह चर्र-चर्र, उसे लगा जैसे उसके बैठने में ही है कोई खोट। थोड़ी देर बाद ही घुसे मेजर! फौजी अंदाज में जैसे ही लेटे कि फिर चर्र-चर्र। रेशमी भावनाओं का झीना सा पर्दा बनते-बनते बिखर गया। झुंझलाकर सारे पापड़ नीचे फेंके उसने और जैसे ही करीब सरकने को हुए मेजर कि चीख उठा अलार्म। उफ! सारी रात धड़कता रहा उसका नन्हा सा कलेजा, फिर कोई खुराफात न आ धमके दोनों के बीच। 

सुबह जब नटखट देवर ने ठुमकते हुए आंख नचाई और भौंह मटकाते हुए पूछा... कैसी बीती रात? पापड़ तो खूब खाए होंगे, अलार्म का संगीत भी खूब सुना होगा। तब जाकर समझी वह कि यह सारी कारस्तानी मेजर के दोस्तों की नहीं, देवर की ही थी। 

वक्त के सबसे खूबसूरत परिंदे उड़ने लगे एक-एक कर! खुमारी भरे मयूरपंखी दिनों ने डाल दिया उसकी गोद में गोल-मटोल गुदगुदे नितिन को। स्रष्टा होने की गर्वभरी अनुभूति के साथ मेजर मनोहर सिंह राठौर ने जी भर निहारा भी न था नितिन को कि नई पोस्टिंग आ गई। और पोस्टिंग भी कहां- 14 राष्ट्रीय राइफल्स में, कश्मीर के सबसे संवेदनशील इलाके कंगन में। भारत सरकार की सबसे खतरनाक पोस्टिंग। पूरे घर को जैसे सांप सूंघ गया। अबीरी शाम देखते-देखते गहरी काली रात में तबदील हो गई। सारा घर हंसते-हंसते एकाएक खामोश हो गया। चलते-चलते ठिठक गया। पर मेजर हंसता रहा, समझाता रहा देवर को, उसको-जानती हो, अपन राजस्थान के हैं, जहां की तो रीति ही है कि हर परिवार अपने सबसे बड़े बेटे को सेना में भरती करवाता है, देश रक्षा के लिए। बात-बात में मेजर देवर के कान में फूंक मार गया था - जानते हो भाई, मैंने जानबूझकर राष्ट्रीय राइफल्स में पोस्टिंग मांगी क्योंकि अभी मेरी सबसे अधिक जरूरत कश्मीर में ही है। मैं उन सिरफिरे आतंकवादियों को बता देना चाहता हूं कि भारतीय समाज की पहचान प्रेम है, घृणा नहीं। वे चाहकर भी इसे छिन्न-भिन्न नहीं कर पाएंगे। 

मेजर के भीतर कुछ जोरों से धड़क रहा था जिसकी झलक भर पा सका था देवर उस दिन। मेजर का सर्वथा नया रूप। सेल्यूट किया उसने बड़े भाई को। नई शादी! नवेली दुल्हन और नवनीत सा बेटा, पर कुछ भी बांध नहीं पाया... कर्तव्य की ऐसी पुकार! देश सेवा का ऐसा जज्बा! जिंदाबाद भाई! माई ब्रदर, माई हीरो!! 

जाते वक्त मां की आंखें भर आईं। जाने कैसा तो कुविचार मन में आया-क्या फिर देख पाऊंगी लाड़ले को। जहां हर नुक्कड़ पर आतंकवादी, हर मस्जिद में बम-बारूद, हर मस्तिष्क में घृणा, क्या बच पाएगा उसकी आंखों का नूर? झड़-झड़ आंखों से ताका उसने बेटे की तरफ। बेटे ने मां को गले लगाते हुए धीमे से कहा-मां तुम तो मुझे जन्नत में भेज रही हो तो रो रही हो, सोचो भगतसिंह की मां ने तो उसे फांसी पर भेज दिया तो भी नहीं रोई। 

मां आसमान से गिरी -यह क्या कह गया बेटा? 

भगतसिंह की मां से क्यों की उसकी तुलना? पहली बार रीढ़ की हड्डी में कुछ रेंगा। पहली बार कांपा उसकी भावनाओं का संसार। मन ही मन मन्नत मांगी जब तक सकुशल न लौट आए लाड़ला, मिठाई नहीं खाऊंगी। 

पर यथार्थ उतना भी बदरंग और दहशत भरा न था। शुरुआती दिन जरूर सहमे-सहमे से गुजरे, पर जेवर बने देवर उसे पल भर के लिए भी अकेला नहीं छोड़ते! पहला फोन आते-आते आया, पर इस बीच देवर ने नन्हे को कंधे पर लादे-लादे उसे पूरा अजमेर घुमा डाला- यह सोने की नसिया, यह अढ़ाई दिन का झोंपड़ा, यह पुष्कर, यह दौलतबाग! यह दरगाह! 

नई-नई जगहों को देखने की उत्तेजना में ध्यान बटा रहा। पंद्रह दिन गुजर गए कि एक शाम चिड़िया चहकी, आसमान गुलजार हुआ। मेजर का फोन घनघनाया और उसे खुशियों के नए देश में ले गया। मीठा तो यूं भी था, उस पर कश्मीर की आबोहवा और झड़-झड़ झड़ती सुंदरता ने उसे और भी मीठा और कविता बना दिया था। हू-ब-हू याद हैं उसे वे संवाद- 

“सलाम वालेकुम।“ (यह क्या! मेजर उर्दू बोलने लगा!) 

चौंक गई थी वह। सलाम वालेकुम के जवाब में उसने नन्हे नितिन के मुंह के आगे स्पीकर लगा दिया-बोल पापा। वह बोला-फूं-फां। मेजर भावुक हो गया, पाजी फूं-फां बोलता है। पापा नहीं बोलता। सिखा दे उसे पापा बोलना। एक दफा सुन लूं। 

उसका कलेजा मुंह को आ गया। क्यों कहा एक दफा सुन लूं? छूटते ही पूछा उसने-क्या खतरा बहुत ज्यादा है? मुझे बहुत डर लग रहा है। 

कैसा खतरा? और डर! डर को गिलि गिलि छू कर। यहां खतरा नहीं लाडो, यहां तो सिर्फ हुस्न है, हुस्न ही हुस्न। 

“खा मेरी सौगंध!” 

“अरे मेरी झेलम, तेरी सौगंध! यहां जान का खतरा नहीं, दिल जाने का खतरा अलबत्ता है। यह तो धूल-माटी का नहीं, महकते फूलों, हुस्नवालियों, बर्फीली चांदनी और दूध रंगे पानियों का देश है प्यारी। देख-देख यहां की हूरों को हिवड़ा हिलोर लेता रहे पर क्या करूं आर्मी ने पंख कतर दिए हैं हमारे। आर्मी कहती है-दूर से देखो इन परियों को पर प्यार नहीं करो।” 

मेजर फिर मेजर हो गया। वह फिर वह हो गई। मेजर हंसा। फिर वह हंसी। फिर दोनों साथ-साथ हंसे। 

“पर यह चप-चप की आवाज कैसी आ रही है?” 

“अरे मेरी चिनार, कहवा (कश्मीरी चाय केसर से बनी हुई) पी रहा हूं। 

“”यहां की दो चीजों का मुरीद हूं, एक कहवा, दूसरी यहां की फड़कती चांदनियां।” 

“यह फड़कती चांदनियां क्या?” 

“यहां की खूबसूरत बलाएं। हरामजादियां हैं तो चांदनी, पर बरसती हैं शोलों की तरह जिस्म पर।” 

“तुम फौजी क्या बिना गाली के बात नहीं कर सकते?” 

“क्या करूं, बिना प्रेम के फौजी गाली नहीं दे तो क्या दे। तू तो है नहीं दिल बहलाने को, इनसे यारी कर लूं सो फौज की इजाजत नहीं। मत मान, मैं तो सिर्फ हकीकत बता रहा हूं। हम तो जरूरत पड़ने पर बोल तो लें, पर जवानों को तो उसकी भी इजाजत नहीं। कई केस ऐसे हो गए कि मिलिटेंट के इशारे पर छोकरी हंसी, फौजी फंसा फिर अकेले में बुलाया और फौजी के दो टुकड़े। यह भी हुआ कि सेना को बदनाम करने के लिए पाकिस्तान लड़की को आगे कर देता है। अकेले में लड़की ने खुद अपने कपड़े फाड़ दिए और फौजी को बलात्कार के मामले में फंसा दिया। मेरी भोली लाडो, दुनिया को समझ। प्रेम इतना आसान नहीं, अच्छा सलाम ले, मेजर मोहम्मद हसन का... ” 

वह फिर आसमान से गिरी। 

“क्या कहा? मेजर मोहम्मद हसन! यह कौन?” 

“”यह मैं हूं... मेरा नाम है मोहम्मद हसन।” 

“क्या कह रहे हो!” 

“भोली लाडो, फोन पर इतना समझाना ठीक नहीं, भाई से पूछ लेना। उसे सब पता है। और तू भी जब आएगी ना यहां, थोड़े हालात और सुधरने दे, इंशाअल्लाह, तेरे को भी बुलवा लेंगे, पर तू भी यहां मिसेज मेजर मनोहर राठौर नहीं वरन् मेजर हसन की बेगम कहलाएगी। अभी से ही आदत डाल ले बेगम दिखने और सुनने की। जब तेरे को आर्मी कैंप से बाहर पहलगाम, सोनमर्ग दिखाने ले जाऊंगा न तो साड़ी-बिंदी में नहीं, सलवार-कुर्ता में सिर पर आंचल देकर एकदम मुसल्ली बनाकर ले जाऊंगा। मैं भी जब आर्मी कैंप से बाहर लोगों से मिलने-जुलने निकलता हूं तो लंबा कुर्ता और पायजामे के ऊपर फिरन डाल लेता हूं... जिससे कश्मीरी दिखूं।” 

“क्या-क्या?” मेजर की बातों ने फिर चक्कर में डाल दिया उसे। 

क्या कश्मीर में फौजी को हिंदू बनकर रहने में भी खतरा है? क्या मेजर ने जानबूझकर उसे नहीं बताते हुए भी सब कुछ बता डाला? या मजाक किया उससे? 

फिर बहुत दिनों तक मेजर का कोई भी फोन नहीं आया। इधर से भी लाइन नहीं लगी तो वह चिंता के मारे पीली पड़ती रही। जब-जब अखबार में, पत्रिका में, टी-वी- में कश्मीर से संबंधित कुछ भी निकलता, कोई एनकाउंटर या कोई बम विस्फोट, कोई प्रदर्शन या घेराव-तो वह आंधी में उड़ते पत्तों सी थरथरा जाती। एक दिन उसकी परेशानी देख देवर ने ही उसे समझाया-भौजी, घबराने की कोई बात नहीं है। भाई जी को सुरक्षित रखने के लिए आर्मी ने ही उन्हें मुस्लिम नाम दे रखा है। 

“पर फोन क्यों नहीं आ रहा?” 

“भाई जी की जिस इलाके में पोस्टिंग है, वह पहाड़ी इलाका है। इस कारण वहां नेटवर्क कई बार काम नहीं करता है। हां, संवेदनशील इलाका तो नो डाऊट वह है। हमेशा हिंसा, नफरत और आतंक से लथपथ। चूंकि यहां अशिक्षा और गरीबी दोनों ही बहुत हैं इसलिए यह इलाका आतंकवाद के लिए बहुत उर्वर इलाका है। गढ़ है यह आतंकवाद का, यहां हवा में हमेशा अनकहा ‘हरामी हिंदुस्तानी’ गूंजता रहता है। अब भाई जी ठहरे अपनी अल्फा कंपनी के कंपनी कमांडर, इस कारण उन्हें अपने इलाके कंगन के चप्पे-चप्पे की खबर रखनी पड़ती है। गांव में कुल कितने घर। हर घर में कितने युवा। कौन क्या करता है, कौन नया आया। किन घरों में आतंकवादी निकले। कितने अभी एक्टिव हैं, कितने मारे गए, कितने फरार हैं। कौन मिलने आता है इन घरों में। कहां-कहां जाते हैं ये, कौन गांव के असरदार लोग हैं, अब सोचो, इनके बीच पानी में मछली की तरह यदि घुल-मिलकर रहना है तो यह तो मुस्लिम बनकर ही संभव है न। इसीलिए भाई जी ने न केवल बकरा दाढ़ी रख रखी है वरन् कामचलाऊ उर्दू भी सीख ली है। देखतीं नहीं, नए बने मुल्ले की तरह ज्यादा ही प्याज खाने लगे हैं भाई जी। हर तीन शब्द के बाद इंशाअल्लाह, माशाअल्लाह कहने लगे हैं।” 

“तब तो सचमुच आपके भाई जी के जीवन को बहुत खतरा है। क्योंकि यह भेद तो कभी भी खुल सकता है कि भाई जी हिंदू हैं।” 

भीगे-भीगे से शब्द टूटते तारे की तरह गिरे उसके मुंह से-”नहीं, खतरा नहीं। यह उनको चकमा देने की सियासी चालें हैं। उनका बनकर उनके गढ़ में रहते हुए उन्हें खोदना... कहते हुए देवर हंस दिया था।” 

उसके हर उफनते दुःख, तनाव और आवेग पर ठंडे पानी के छींटे थे देवर। 

हर फटे और हर तिड़कन के रफू थे देवर। वही देवर। उसी देवर की डायरी का प्रथम पृष्ठ फिर पढ़ा उसने, भाई आज शहीद हुए। दो मुट्ठी राख हुए। 

लौट गए जन्नत में जैसे लौट जाते हैं बादल समुंदर में। जैसे लौट जाता है बीज पेड़ में। 

निःशब्द। 

अब समझ पाया हूं, क्यों अंतिम-पोस्टिंग पर जाने से पहले भाई के मुंह से निकल गया था-कल हो न हो। 

तब बुरी तरह धड़का था मेरा दिल। भाई को घेर-घारकर पूछा था मैंने ऐसा क्यों कहा तुमने? मेरी आंखों से मोटे-मोटे आंसुओं को देख दुखी हुआ, विरक्त भी। कड़ी नजरों से मेरी ओर देखते हुए कहा था भाई ने- Soldier I am born, solider I shall die. (सैनिक हूं, सैनिक की तरह जन्मा और सैनिक की तरह मरूंगा)। 

दर्द की एक लहर उठी और निचोड़ गई उसे। अतीत के दर्दीले कांटों में फिर उलझ गई वह। आगे पढ़ा नहीं गया उससे। आंखें डबडबा गईं। 

डायरी बंद की उसने। 

समय और दूरी धुंधला गए। स्मृतियों के चमकीले टुकड़े फैल गए चहुंओर। बीनने लगी वह। 

13 दिसंबर, 1989 का वह वाकया जब आतंकवादियों ने नहीं वरन् इसी देश की सरकार ने आने वाले समय की सबसे उदास और खूनी पटकथा इस देश के माथे पर लिख दी थी। तब कश्मीर आज जैसा कश्मीर नहीं था। महकते-मचलते कश्मीर में तब हवाएं खुलकर बहती थीं। चप्पे-चप्पे पर बुलेट जैकेट पहने, सीने को तीन इंच आगे बढ़ाए जवान तैनात नहीं थे। उन्हीं दिनों जे.के.एल.एफ. के कुछ टपोरीनुमा कच्चे आतंकवादी तत्कालीन गृहमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद की जवान पुत्री डॉ. रूबिया की रिहाई के बदले अपने पांच खूंखार आतंकवादियों को रिहा करने की मांग कर रहे थे। कश्मीर की घाटी में होने वाला यह पहला अपहरण था और खुद कश्मीर की अवाम इस प्रकार एक जवान लड़की के अपहरण के पक्ष में नहीं थी। चौतरफा इसकी निंदा भी होने लगी थी। और इसकी संभावना लगभग नगण्य थी कि उग्रवादी उसे सचमुच कोई नुकसान पहुंचाने की हिम्मत करंगे क्योंकि उग्रवादियों पर सचमुच दबाव बना हुआ था कि इस अपहरण से निकलने का कोई इज्जतदार तरीका निकाला जाए। सुरक्षा सलाहकारों ने, भारतीय आर्मी ने, यहां तक कि स्थानीय पुलिस ने भी भारत सरकार को भरोसा दिलाया कि वे उग्रवादियों की शर्त न मानें क्योंकि एक बार भी यदि वे उग्रवादियों के आगे झुक गए तो आने वाले समय में उग्रवाद कितना फलेगा-फूलेगा, इसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था। 

लेकिन सुरक्षा सलाहकारों, भारतीय आर्मी और पुलिसकर्मी सभी को ठेंगा दिखाते हुए उग्रवादियों की शर्त के आगे नकारा सरकार झुक गई। एक के बदले पांच खूंखार आतंकवादियों को रिहा कर उनके मनोबल को आसमान पर पहुंचा दिया गया। 

और उसके बाद तो फिजा ही बदल गई। खबर जंगल की आग की तरह फैली कि हिंदुस्तान की महान् सरकार हार गई और छोकरे जीत गए। श्रीनगर की आबादी सड़कों पर जश्न मनाने उतर आई। देखते ही देखते शांत समुंदर में बवंडर पैदा हो गया। कश्मीर की दीवारें आजादी की मांग में रंग गईं। हरा झंडा फहराते हजारों नए मुजाहिदीन पैदा हो गए। मजहबी रंगत और मसीहाई जोश में उन्होंने दीवारों पर कुरान की आयतें लिखीं-वाकातिलुल-मुश्रीकीना-काफातन- कमाउकातियुनाकुम काफा वा लागू अनाल्लाहा या अल मुलकीन (तुम्हारे ऊपर जो घुसपैठ करे उसका जमकर मुकाबला करो। याद रखो अल्लाह उनका साथ देते हैं जो अपना साथ देते हैं)। आतंकवाद अब सचमुच लहरों पर सवार था। अवाम को आजादी कंधे पर बैठे कबूतर सी लगने लगी थी। आतंकवादियों की एक आवाज पर हजारों की तादाद में लोग सड़कों पर उतर आए थे जिसमें बच्चे, बूढ़े, औरतें और यहां तक कि पुलिस वाले भी थे। वे अब खुलेआम सड़कों पर खुली नफरत फैला रहे थे और नारे उछाल रह थे-हिंदुस्तानी कुत्ते वापस जाओ, अल्लाह हो अकबर। कश्मीर की मंडी-रावलपिंडी। 

और ऐसे ही उबलते-उफनते खूनी दिनों में जब कश्मीरी पंडितों और आर्मी के जवानों और अफसरों के लिए कश्मीर कत्लगाह बना हुआ था, मेजर ने पोस्टिंग मांगी राष्ट्रीय राइफल्स में। 

मेजर की इच्छा का सम्मान हुआ। उन्हें 14 राष्ट्रीय राइफल्स के अंतर्गत चीड़ वनों और पहाड़ी चश्मों से घिरे कंगन गांव में अल्फा कंपनी का कमांडर बना दिया गया। मेजर ने आते ही मोर्चा लिया, हुलिया बदला, बोली बदली और अपने इलाके के चप्पे-चप्पे की जानकारी में जुट गया। फौजियों का मनोबल बढ़ाने के लिए उसने उन्हें एक मंत्र दिया-लड़ाई दिमाग से लड़ो और अवाम का मन जीतो। इस कश्मीरी मन को जीतने के लिए उसने कई नई योजनाएं शुरू करवाईं, सुदूर गांवों में किशोरों के लिए स्कूल खुलवाए, उनको मुफ्त में दवाई और चिकित्सा उपलब्ध कराने के लिए मोबाइल एम्बुलेंस चलवाईं। कम दामों में चीजें उपलब्ध करवाईं और बच्चों के बीच उपहार बंटवाने शुरू किए। 

इन योजनाओं का असर हो रहा था। मेजर कामयाब हो रहा था। कंगन के लोगो का मन जीत रहा था। लोग उसके साथ जुड़ने लगे थे और आतंकवादियों ने गुप्त ठिकानों की खबर भी दे रहे थे। दो साल की अवधि में मेजर ने कई सफल कोर्डनिंग और कोमि्ंबग ऑपरेशन को भी अंजाम दिए। ऐसे ही एक और ऑपरेशन को अंजाम देने जा रहे थे मेजर कि एक जबर्दस्त धोखा हुआ ... 

उस दिन सुबह से ही फोन नहीं लग रहा था मेजर का। मन जरा सा डरा था उसका क्योंकि देवर ने बताया था... जब भी एनकाउंटर होता है, बी.एस.एन.एल. के सारे कनेक्शन ऑफ कर दिए जाते हैं... क्या कोई एनकाउंटर? मुठभेड़? भगवान न करे। पर रात को अचानक फोन बजा। मेजर था। वही दिल्लगी! वही जीवंतता! 

“अरे बेगम, सुंदरता और खतरे का तो चोली-दामन का साथ है। जब अकेली रानी पद्मावती ने ही इतना खतरा पैदा कर दिया तो इतना बड़ा यह सूबा... हजारों नीलपरियां यहां! बस अब हालात सुधरने वाले हैं, खतरा तो थोड़ा बढ़ेगा क्योंकि तेरे आने से कश्मीर में एक सुंदरी और बढ़ जाएगी। फिर भी तुम्हें बुला लेंगे। इनशाल्लाह वह दिन जल्दी ही आएगा जब तू यहां झेलम-सी इतराएगी। अच्छा बोए-बोए!” 

“यह बोए-बोए क्या?” 

“इसका मतलब है बाई-बाई। कश्मीर आना है तो थोड़ी कश्मीरी जुबान भी सीख ले। वैसे मैं भी पूरी तरह कहां सीख पाया... कल जानती है यहां की एक फड़कती चांदनी ने मुझ पर कागज का एक फूल फेंका, जब मैंने उसे खोला तो देखा इसमें लिखा था-रोशनवालों मैं न दिलबरो/पोशन बहार आए यूरकेरो (यहां फूलों में बहार आई है आ जा)।” 

“तो चला जा, तेरा दिल बहल जाएगा, मुझे क्यों जलाता है!” 

“अरे दिल बचेगा तो न बहलेगा मेरी सोनपरी! ये सब चालें भी हो सकती हैं हमें फंसाने की।” 

बस वही आखिरी संवाद। फिर मेजर नहीं बोला। टी.वी. बोला। मेजर नहीं आया। मेजर का समाचार आया। तिरंगे में लिपटा मेजर का शव आया। नहीं शव नहीं, शव तो साबुत होता है, बस शरीर के कुछ अंग आए, चेहरा आया, कटे-कटे कटपीस में शरीर के कुछ हिस्से आए, जिसकी झलक भर ने देवर को खामोश कर डाला। जो कभी देहाती ठहाकों की तरह बेफिक्र था, वह हंसना तक भूल गया। वह घना अंधेरा भरता गया उसकी आत्मा में कि फिर रोशनी का कतरा तक नसीब नहीं हुआ उसे। नितिन बड़ा होता गया। बढ़ता गया। देवर मरता गया। मरते-मरते जीता गया अपने से कहीं ज्यादा नितिन के जीवन से। पिता से अधिक पिता बना वह... पर सूखता गया भीतर ही भीतर, जैसे सूखता है फूल... निःशब्द। 

काली उदास स्मृतियां। जीवन-आस्था के परखच्चे उड़ाने वाली ऐसी स्मृतियां जो समय के साथ कभी धुंधली नहीं पड़तीं क्योंकि वे लिखी नहीं जातीं, तेज धार वाले चाकू से कलेजे पर कुरेदी जाती हैं। 

कमांडिंग ऑफिसर कर्नल पांडे के शब्द आज भी सुन्न कर देते हैं उसकी आत्मा, देह, मन... सबको। जीवन इतना सस्ता? इतना अर्थहीन? क्या कुछ भी नहीं हमारे हाथ? क्यों जीते हैं हम? किसलिए?

पर जीना पड़ा उसे। क्योंकि नितिन था, देवर थे और थीं सासू मां। यदि नहीं जीती वह तो कैसे बताती नितिन को कि कैसे वीरतापूर्वक लड़ते हुए शहीद हुए थे उसके पापा। वे नहीं मरते, यदि एक गलत सूचना के चलते धोखे से घेर नहीं लिए जाते। कमांडिंग ऑफिसर कर्नल पांडे को खबर मिली थी कि ब्रेवो पहाड़ पर एक मिलिटेंट नीचे उतरने की तैयारी में है। कर्नल पांडे ने मेजर राठौर और चार्ली कंपनी के कंपनी कमांडर कैप्टन बलवीर सिंह के साथ छह जवानों को ‘जय बजरंगबली’ के उद्घोष के साथ पुलिस कन्वॉय में रवाना कर दिया था कि एक हरामी के लिए काफी हैं हमारे आठ जवान। तब भारतीय आर्मी के पास आज जैसे जीवन रक्षक इक्विपमेंट कहां थे। न तो आज जैसी HHTI (एक कीमती कैमरा जो अंधेरे में कई किलोमीटर दूर तक देख सकता है) और न ही-PNVG (अंधेरी रात में तीन किलोमीटर दूर तक देखने वाला चश्मा)। जैसे ही रेंगते हुए वे घेराबंदी के लिए ब्रेवो पहाड़ के करीब पहुंचे, वे खुद ही घेर लिए गए। एक की जगह बारह मिलिटेंट। अत्याधुनिक हथियारों से लैस। अक्टूबर-नवंबर में मकई के खेत बढ़ जाते हैं, उसी के पीछे छिपकर बैठै थे हरामजादे। कमीनों ने धर लिया हमारे आठों जवानों को। सलाद की तरह सबको काट-काट डाला और फिर बोरे में भरकर आर्मी हेड क्वार्टर कुपवाड़ा से थोड़ी दूर पर फेंक गए। 

बोलते-बोलते कर्नल की आंखें छलछला गई थीं। एकटक देख रहे थे वे शहीदों की याद में बने तिकोने रणजीत सिंह पार्क के भीतर चमचमाती नाम पट्टिकाओं को, जिसमें एक साथ आठ शहीदों के नाम और जुड़ने वाले थे। 

भीतर फिर हूक उठी। उमड़ने-घुमड़ने लगा कुछ। जिंदगी भी जब छीनने पर उतारू होती है तो फिर छीनती ही चली जाती है। पहले मेजर, फिर सासू मां और अब देवर भी। क्या करे वह? कैसे बचाए जीवित कामनाओं के साथ मरते देवर को। डायरी फिर उसके खयालों के साथ हो ली-लगा, जैसे डायरी को नहीं देवर को छू रही है वह पहली बार। उसके पास तो फिर भी मेजर की यादों की कुछ रातें थीं, थोड़ी सी ही सही, जिंदगी की धूप थी-नितिन था जो आज तक रोशन कर रहा था उसे, पर देवर... वे तो बेचारे गीली लकड़ी की तरह धुआं ही पीते रहे ताजिंदगी-न तो जी पाए और न ही मर पाए। काश! वह कुछ पूछ पाती, खोद पाती, साफ कर पाती उनकी जमीन। पर ऐसी नाजुक हालत में क्या तो वह पूछे और क्या कुछ खोदे!! 

आज ग्लानि ने जीना हराम कर रखा है उसका। कितनी आसानी से सोच लिया था उसने कि उसके महान् देवर ने अपनी प्यास को ही पी डाला है... कि रिश्ता ही नहीं रहा उसकी प्यास का औरत नाम के पानी से। कैसे भूल गई वह कि वक्त धीरे-धीरे सारे जख्मों को मलहम-पट्टी कर सुखा डालता है। फिर रिसते घाव नहीं बस चिह्न रह जाते हैं। सूखी नदियां फिर पानी से लबालब हो जाती हैं। रस फिर-फिर लौट आता है। 

आज जीवन शेष में देवर की डायरी पढ़ देवर के प्रति सम्मान और बढ़ गया है उसका। 

यही है जीवन सत्य! 

उफ! कैसे किया होगा देवर ने उन तूफानी वासनाओं का मुकाबला! कैसे इंच-इंच मारा होगा खुद को! 
उफ! कितना कठिन है मनुष्य होना! 

आंखों के आगे फिर लहरा गया डायरी का वह पृष्ठ - औरत? मैं नहीं जानता क्या होती है वह? कैसी होती है? कैसा सुख देती है? मैं तो भाई के लिए ही जीता और मरता रहा। एक बार मैंने भाई से कहा था, अभी तो आपकी नई-नई शादी हुई है, आपने राष्ट्रीय राइफल्स में पोस्टिंग क्यों ली? मेरे जांबाज भाई ने जवाब दिया-”लक्ष्य पूर्ति के पहले मैं सो नहीं सकता। क्या नील आर्मस्ट्रांग चांद पर पांव धरने के पूर्व सोया था? क्या एडीसन बल्ब बनाने के पूर्व सोया था?य” वाह मेरे भाई! बस मैंने भी सोच लिया कि इस भाई जैसे राम का अधूरा काम तो अब यह लक्ष्मण ही पूरा करेगा। नितिन को भाई जैसा मेजर जब तक नहीं बना दूंगा मैं सोऊंगा नहीं। इसीलिए औरत को मैंने अपने से दूर रखा। पर वही औरत आज लहकती लपक बन मुझे लील रही है। दिन-रात मेरे दिलो-दिमाग पर सवार रहती है और जाने कितने अदृश्य हाथों और कितने हॉर्स पॉवर की ताकत के साथ मुझे खींचती है अपनी ओर ... मुझे भोगो, मुझे जानो हे ब्रह्मचारी! उफ! यह फीकी चाय मुझसे अब और नहीं गटकी जाती, मुझे मिठास चाहिए अधिक नहीं... बस दो चम्मच। 

शहीद मेजर नहीं शहीद देवर हुआ, वह बुदबुदाई। हलके बल्ब की कंपकंपाती पीली रोशनी में मृत्यु के करीब पहुंच चुके देवर का चेहरा पीला और मलीन पड़ चुका था। चद्दर के कोने को दबाया उसने और पलंग के पास ही बैठकर जूस निकालने लगी देवर के लिए। उस नीली डायरी के पन्ने फिर खुले-नींद की दवा लेता रहता हूं, इसीलिए नहीं कि नींद आ जाए वरन् इसलिए कि मेरे खयाल ख्वाब न बनें और स्वप्न मुझे परेशान न करें। वासना का चमगादड़ फड़-फड़ न करे। जाने कौन शैतानी सत्ता काबिज हो गई है मुझ पर कि चारों ओर मुझे औरत ही औरत दिखाई देती है। मन शांत करने के लिए ‘ओऽम्’ उच्चारित करता हूं पर जाने कैसे ‘ओऽम्’ औरत बन जाता है। थम्स अप की बोतल की बनावट क्या औरत जैसी है? मैं ग्रेसफुली प्रौढ़ होना चाहता था पर मन इतना चंचल क्यों हो उठा? डर के मारे टी.वी. नहीं खोलता कि उसके प्रणय दृश्य कहीं मेरा जीना हराम न कर दें। मन की जाने किन अदृश्य परतों के बीच औरत का भूत दबा बैठा था जिसने मौका पाकर अब मुझे निगल लिया है। क्यों चाहता हूं मैं कि औरत में उतर जाऊं... गुजर जाऊं एक बार उस तूफान से। बन जाऊं औरत-औरत में उतरकर, जैसे कोई पानी नदी में उतरकर बन जाता है नदी। 

कुछ खाली स्पेस और दो दिन बाद की तारीख में फिर लिखा था देवर ने - क्या यही है मेरा असली मैं? अपने अस्तित्व को परिभाषित करने वाले लमहे क्या ऐसी ही चरम परिस्थितियों से निकलते हैं? क्या भाई की शहादत के समय जो समर्पित मैं था, वह मिथ्या था? 

नहीं, वह मिथ्या नहीं था। सत्य था, संपूर्ण सत्य-वह बुदबुदाई और डायरी को उलटी रख फिर अपने खयालों के साथ हो ली। याद आया एक जलजला मध्ययुग का। नायिका परेशान है पति की बेरुखी से। भीतर ही भीतर आतंकित भी। पति क्यों नाखुश है? घर में काम करने वाली मालिन से मनुहार करती है वह - हे मालिन, मेरे राजा को खुश कर दे, तुझे चांदी के कड़े दूंगी। धोबिन की गुजारिश करती है वह - ऐ धोबन, मेरे मुरझाए राजा के लिए हवा बन उसे तरोताजा कर दे, तुझे चांदी की हंसिया दूंगी। पर वह किससे करे गुजारिश? न धोबन, न मालिन। क्या देवर की होगी कोई पुरानी साथिन या कि प्रेमिका? पर यौवन में पांव टिका भी न था देवर का कि जिम्मेदारियों के बुढ़ापे ने धर दबोचा। न सुरा न सुंदरी, न पान न पराग। बस नितिन और भौजी के नाम ही लिख दी सारी जिंदगी। 

उफ! कैसे कुचला होगा यौवन की उमंगों को? वह फिर बुदबुदाई-शहादत मेजर ने नहीं देवर ने दी। और जाने किस झोंक में उसने देवर की अलमारी और पुराने बक्से छान मारे, पर हाथ कुछ नहीं लगा। 

शाम देवर की मेडिकल रिपोर्ट आई कि काली रात और गहरा गई। मरे मन पर कफन चढ़ गया। अब ये भी चले उस पार। सुबह जब देवर ने अपने सारे सेविंग सर्टिफिकेट्स और एफ.डी. उसे थमाए तो रोक नहीं पाई वह खुद को। सिसक पड़ी-मरने के बाद का भी इंतजाम कर गए। भर-भर आंखों देखा उसने देवर को - देवर हैं लेकिन नहीं, ऊपर से सब ठीक-ठाक, पर भीतर ही भीतर जानलेवा बीमारी खोखला कर रही है देवर को। कौन कहेगा कि इसकी बॉडी के भीतर रक्तपात हो रहा है। नसें अंदर ही अंदर टूट रही हैं और व्हाइट सेल बुरी तरह कम होते जा रहे हैं। उसने देवर के सिर पर हाथ फेरा, मौत का अहसास हर जगह भरा हुआ था। 

दूसरे दिन देवर को स्पंज करने के लिए किशन जब गर्म पानी लेकर आया तो वह भी देखती रही दूर खड़ी। जाने भीतर क्या उमड़ा कि उसने दाएं पैर के अंगूठे को बाएं पैर के अंगूठे पर रखा। दोनों हाथों की उंगलियों को एक-दूसरे से गुत्थम-गुत्था कर जकड़ा और भीतर से साहस बटोरते हुए किशन से कहा-लाओ मुझे दो, मैं करूंगी स्पंज। 

उसने देवर के बदन की सड़क को चमकाया। उसके माथे और पैरों को गीले गमछे से पोंछा। देवर ने सिर हिलाकर मना किया तो बरज दिया उसे-मैं क्या गैर हूं? देवर शायद इतने ढीले, अशक्त और बेबस हो गए थे कि उनमें प्रतिवाद करने की क्षमता तक नहीं बची थी। लेकिन उसने देखा था, अनदेखते हुए देखा था कि जब वह देवर के घुटनों के ऊपर स्पंज कर रही थी तो देवर के माथे पर सिलवटें उभरी थीं और उनका चेहरा झारखंड की माटी सा लाल हो गया था। तब पहली बार उसे अहसास हुआ कि वह देवर के पास नहीं वरन् आती हुई मृत्यु के पास बैठी हुई है, किसी पवित्र मृत्यु के पास। 

विचारों के प्रवाह में फिर बहने लगी वह-कैसा जटिल यह मानव मन! कितना रहस्यमय! हम एक साथ जाने कितनी दुनियाओं में जीते हैं। कब कौन सी दुनिया पिछली दुनिया पर हावी हो जाए। कौन सोच सकता था कि कल तक विवेकानंद था, आज आठों पहर उसके आगे खजुराहो की मूर्तियां नाचती हैं। कश्मीर की कब्रों को सब देख रहे हैं पर हमारे घरों में जो जिंदा कब्रें हैं कौन देखता है उनकी तरफ। देख सकता है? उफ! कश्मीर नहीं होता तो देवर ऐसे कब्रिस्तान नहीं होते... सोचते-सोचते जाने भीतर क्या उमड़ा कि उसने देवर का माथा चूम लिया। यूं लगा जैसे उसने देवर का माथा नहीं वरन् उसकी आत्मा को चूम लिया है। 

आंखों के आगे फिर खुल गई डायरी - क्या यही है मेरा प्राकृतिक और सांस्कृतिक सत्य? शायद हां, क्योंकि आज समझ पाया हूं कि जीवन का वह जादुई अनुभव अस्तित्व रक्षा में कितना सहायक होता है। मैं विचलित अपनी आने वाली मृत्यु से नहीं वरन् सहसा उछल पड़ी वासना की इस लहर से हूं। मैं समुद्र के पास गया। मैं नदी के पास गया। लहर, बादल-हवा, फूल... मैं सबके पास गया कि स्त्री को भूल जाऊं पर मैंने विस्मित होकर देखा, लहर, बादल, हवा... सब स्त्री के ही विस्तार थे। उसी के अलग-अलग रूप। कितना चाहता था कि मैं न कर्म में न निष्कर्ष में, न आसक्ति में न विरक्ति में, धरती के सारे गुरुत्वाकर्षणों से दूर, स्वयं को स्थगित रखते हुए संपूर्ण खामोशी के साथ, परम शांति से अनंत में विलीन हो जाऊं पर मैं ऐसा नहीं कर पाऊंगा, मैं शांति के साथ मर नहीं पाऊंगा क्योंकि अतृप्त कामनाओं के साथ हुई मृत्यु मुक्ति नहीं देती, सिर्फ देह का अंत करती है। जीवन रहते कामनाओं से मुक्ति ही मृत्यु का असली अर्थ खोलती है। मृत्यु की ओर बढ़ते गेटे के आखिरी शब्द थे - लाइट, मोर लाइट (रोशनी, थोड़ी और रोशनी) पर कितने दुःख और ग्लानि की बात है कि मेरे आखिरी शब्द होंगे - औरत! थोड़ी औरत! 

“नहीं, हर्गिज नहीं।” 

“हलकी सी कंपकंपी महसूसी उसने। उसकी उंगलियों में अजीब सी सिहरन हुई। उसे लगा जैसे उसके हाथ सुन्न हो रहे हैं। उसने आखें मूंद लीं जैसे मरते हुए देवर का... मौत का स्वाद अपने भीतर भर रही हो। कांपते-ठिठुरते शब्द उसके होंठों से गिरे... नहीं, ऐसा नहीं होगा। तुम भी उसी प्रकार चरम शांति से मृत्यु को छू पाओगे जैसे गेटे ने छुआ था मृत्यु को। मैं करूंगी तुम्हारी सहायता। 
उसकी नजर खिड़की से झांकते चांद पर गई। वह पिघल रहा था, बूंद-बूंद। उसकी नजर फिसलती हुई ड्रेसिंग टेबल पर जड़े दर्पण पर अटकी... गौर से देखा उसने खुद को, पिछले छब्बीस सालों में शायद पहली बार देखा था खुद को इतने गौर से। उसके चेहरे पर उदास हंसी बिखर गई, वह अभी भी कामचलाऊ थी। जवान थी। 
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