पाखी का टॉक ऑन टेबल - मुख्यधारा के आप बमुश्किल पांच सौ पाठकों के लिए | Pakhi's Talk on Table with Kumar Vishwas

फेसबुक पर 'पाखी' के इस 'टॉक ऑन टेबल' पर बहसें चलती देख कर भी इसे पढ़ने की इच्छा नहीं थी। फिर देखा कि बहसों का रूप तल्ख़ होता जा रहा है - भीतर के पाठक के ना मानने के बावजूद इसलिए पढ़ना पड़ा क्योंकि लगा - शब्दांकन-पाठक भी इन बातों को देख-पढ़ रहे होंगे, और शब्दांकन-लेखक भी। इस 'टॉक ऑन टेबल' को शब्दांकन पर प्रकाशित करने का तो कभी ख़याल तक नहीं आया था, लेकिन पढ़ते वक़्त बीच-बीच में आयी कुछेक बातों ने परेशान किया, लगा कि गलत हैं फिर लगा कि आपके सामने रख ही दूं 'टॉक ऑन टेबल' और उनमे से एक-दो बातें जिनको लेकर संशय है - सही गलत का! आप चाहें तो पहले 'टॉक ऑन टेबल' पढ़ लें और उसके बाद इन बातों को ..................लेकिन जवाब दीजियेगा  - 

  * मैंने मंगलेश डबराल का कविता-संग्रह ‘पहाड़ पर लालटेन’ पढ़ा। मैं उससे बिलकुल भी प्रभावित नहीं हुआ। हो सकता है कि वह इतना महान हो कि मेरी समझ में न आया हो, मुझ जैसे मूर्ख के। मैंने जब पी.एच.डी. कर ली और पढ़ाने लगा, तब भी वह मेरी ज्यादा समझ में नहीं आया। 

  * जब मैं बी.ए. फर्स्ट इयर में था। वह एक्सीडेंटल था। मैं मंच पर जाना नहीं चाहता था, क्योंकि मुझे मंचीय कवियों से काफी वितृष्णा थी। 

  * ...उस लिफाफे में पचास-पचास रुपए के दो नोट थे। मैंने उनसे कहा कि इसे रख लीजिए यह बहुत ज्यादा है, किराया तो केवल चार रुपए है। वह बोले कि यह तुम्हारे कविता पढ़ने का सम्मान है, पुरस्कार है। मेरे बहुत मना करने पर भी वह माने नहीं। मैंने अंततः उस लिफाफे को बड़े दुखी मन से रख लिया। मैंने उस महीने छह कवि-सम्मेलन पढ़े और मेरी जेब में लगभग 17-18 सौ रुपए थे। कई बड़े कवि-सम्मेलनों में न्यूनतम पेमेंट ही पांच सौ रुपए थी। उस समय कॉलेज लेक्चरर की तनख्वाह थी 18 सौ रुपए और मेरी जेब में थे 17 सौ।

   * मैंने विश्वविद्यालयों और इंजीनियरिंग के छात्रों के बीच में उस हिंदी को पुनर्जीवित किया जो उनके बीच से बहिष्कृत हो गई थी। 

   * यह चिंता का विषय होना चाहिए कि वह आपके ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी विजेता साहित्यकारों का लिखा कुछ क्यों नहीं खरीदता। वह राजकमल प्रकाशन से छपी उन किताबों को जिन्हें आप आपस में बांट लेते हैं, क्यों नहीं खरीदता। 

    *मैंने कविता लिखी है और मैं कवि हूं। मैं कविता लेकर जनता के बीच जाता हूं, वह उसे पसंद करती है। आपके यहां लोग कैसे छपते हैं, किस जुगाड़बाजी में छपते हैं, मैं सब जानता हूं। 

      * प्रेम भारद्वाज:आपने कविता को पेशा बनाया? 

      कुमार विश्वास: यह आपकी गलतफहमी है। और यह कहीं न कहीं लेखकीय जीवन से उपजी आपकी आर्थिक असुरक्षा का पराजय-घोष है। 

     * अगर मैं अमेठी जाकर सिर्फ नॉमिनेशन भर कर वापस आ जाता तो भी 25 हजार वोट मिल जाते। 

    * मैं जिन लोग के बीच कविता पढ़ता हूं, उनका हिंदी साहित्य से दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं होता। आप हिंदी के किसी कवि से कहिए कि अपनी एक कविता भी चार हजार लोगों के बीच सुनाकर दिखाए। मैं अपने श्रोताओं को एंटरटेनमेंट से पोएट्री की तरफ ले जाता हूं। आपने तो हिंदी पांच सौ प्रतियां छापने वाली पत्रिकाओं तक निपटा कर रख दी है। अतुकांत कविता के नाम पर जो अनाचार फैला उससे हिंदी का पाठक ही अब कहां बचा? 

  * अटल बिहारी वाजपेयी यूं एक औसत से कवि हैं, लेकिन उनके एक गीत की ये बहुत अच्छी पंक्तियां हैं

  * मैंने हिंदी की इस तथाकथित मुख्यधारा जिसके पास धारा है ही नहीं, बस स्वयं में मुख्य है। जिसके पीछे पांच सौ पाठक भी नहीं हैं। छोटे-छोटे दुराग्रहों और राग-द्वेष में फंसे हुए ‘कविता-समय’ की नौटंकी करने वाले। दारू पीकर साहित्यिक आयोजनों में ड्रामा करने वाले। दूसरों की दुकान से इनकी दुकान छोटी है या कहें गुमटी जिससे बैठकर ये शोरूम को गालियां दे रहे हैं। 

  * मंचीय कवियों को कम से कम यह मुगालता तो नहीं है इन तथाकाथित मुख्यधारा के परम कवियों की तरह की वे ही कवि हैं। वे जानते हैं कि वे तिजारती हैं, दूकान पर बैठे हांका लगाकर माल बेच रहे हैं। आपकी गरज हो तो खरीदिए वर्ना मत खरीदिए। 


Kumar Vishwas' Talk on Table' with Pakhi's Prem Bhardwaj, Abhishek Srivastava, Apprva Joshi,  Amit Kumar,  Aakash Nagar, Harinath Kumar, Avnish Mishra, Avinash Mishra

मैं... मेरा... मुझे... 

मेरा काम है खुद को गाना

टॉक ऑन टेबल


लोकप्रियता का नया प्रतिमान गढ़ने वाले कुमार विश्वास का गीत ‘कोई दीवाना कहता है, कोई पागल समझता है ...’ उनकी सिगनेचर ट्यून है। वह उसी मंच के कवि हैं जहां निराला, बच्चन, दिनकर, गोपाल सिंह नेपाली ने अपनी कविताओं से लोकप्रियता का एक ऐसा विस्तृत आसमान रचा जिसमें स्तरीयता के बादल थे और वे जमकर बरसते भी थे। उसके बाद आसमान से बादल रूठ गए। आसमान अब भी है। जिसके सबसे तेज चमकते सितारे हैं कुमार विश्वास, जो युवा दिलों पर किसी फिल्म स्टार की तरह राज करते हैं। मंच पर अपने खास कहन से उन्होंने अपने तमाम समकालीन कवियों को बहुत पीछे छोड़ दिया है। उन्होंने ‘पॉप कल्चर’ का नया मुहावरा गढ़ा है। कविता करने के साथ-साथ वह राजनीति की रपटीली राह पर भी चले। अपनी टिप्पणियों के चलते उन्हें फूल और शूल दोनों मिले। यहां प्रस्तुत है उनसे साहित्य, समाज और सियासत की कुछ खास बातें:

प्रेम भारद्वाज: अपनी साहित्यिक यात्रा के बारे में कुछ बताइए?

कुमार विश्वास: सत्तर के दशक में छोटे कस्बों की जो संरचना होती थी, वह अर्थवादी व्यवहार पर बहुत कम निर्भर थी। मेरे पिता पिलखुआ जैसे एक छोटे कस्बे में प्राध्यापक थे। वहां समृद्धि के अनेक स्तर होने के बावजूद भी ज्ञान की, प्रतिभा की और आपकी शुचिता की मान्यता बहुत थी। गुरुजी अगर साइकिल पर भी चलते थे तब भी गुरुजी ही थे। मेरे पिताजी ने तीन पीढ़ियों को पढ़ाया, उनकी प्रतिभा का स्वीकार सार्वभौम था। मैंने पहली बात जो अपने घर में सीखी वह यह थी कि आपकी सामाजिक और बौद्धिक स्वीकार्यता के लिए आपका धनी होना आवश्यक नहीं है। आपकी व्यक्तिगत तेजोमयता, आपका ज्ञान, आपकी शब्द-संपदा, उपनिषद्-परंपरा आपको कितनी कंठस्थ है- ये बातें महत्व रखती थीं। मेरे पिता ने कभी ट्यूशन नहीं पढ़ाया, केवल क्लासें लीं। उनके बहुत से विद्यार्थी ऐसे होते थे जो घर पर आते थे। ऐसे में पिताजी किसी विद्यार्थी को ‘पंचवटी’ पढ़ा रहे हैं, उसकी भाव-संपदा मेरी समझ में नहीं आ रही है, लेकिन उसके शब्दों का जो रख-रखाव है, वह छठी-सातवीं के मुझ जैसे विद्यार्थी को इतना सम्मोहित कर रहा है कि मुझे भी कविता कंठस्थ हो रही है, ‘चारुचंद्र की चंचल किरणें खेल रही थीं जल थल में ...’ दिनकर की ‘रश्मिरथी’, अज्ञेय की कविताएं भी इसी प्रक्रिया में मुझे याद हो गईं। मुझे फिजिक्स, केमेस्ट्री और मैथ्स से ज्यादा रस साहित्य पढ़ने में आता था।

थोड़ा बड़े होने पर मोहम्मद रफी के गाने सुनना, गुरुदत्त की फिल्में देखना शुरू हुआ। मध्यवर्गीय परिवारों में परिवार में सबसे छोटे के प्रति एक तिरस्कार भाव होता है। वह मेरे प्रति भी था। हमारी कस्बाई संरचनाओं में प्रायः ऐसा होता है कि अगर आप छोटे हैं तो आपको डांटने का अधिकार केवल आपके पिता का नहीं, सबका होता है। आपको थप्पड़ मारने का अधिकार केवल आपके बड़े भाई का नहीं है, आपके भाई के साथ पढ़ने वाले सारे बड़े भाइयों का होता है। इस तरह से देखें तो ज्यादा स्नेह हम पर लाया नहीं गया। हमने बचपन में कभी गाना भी नहीं गाया, कभी गुनगुनाते नजर आ जाते तो पिताजी कहते कि गाकर पैसा कमाना है क्या? घर में केवल एक बुश का रेडियो था जो दिन में दो वक्त खुलता था। सुबह मेरी मां जब काम कर रही होती थी तब उस पर ब्रजभारती के गाने और सोम ठाकुर की कविताएं आती थीं और दूसरी बार देर शाम को जब देवकीनंदन पांडेय समाचार पढ़ते थे। मुझमें राजनीतिक चेतना उस समय आने लगी थी, जयप्रकाश नारायण को मैंने बहुत पास से सुना, चंद्रशेखर जी को बहुत पास से सुना। मुझे पूर्वांचल के शब्द उच्चारण की भिन्नता का पता चला कि वे पैसा नहीं पईसा बोलते हैं, उन्नीस सौ नहीं उन्नईस सौ बोलते हैं, मुझे यह शुरू-शुरू में बहुत अजीब लगा। मैंने इस दौर में अब्दुल्ला इमाम बुखारी वगैरह को 77’
के मंच पर देखा। तब मैं सात साल का रहा हूंगा, लेकिन मुझे सब कुछ याद है। मुझे उस पहले राजनीतिक आंदोलन की याद है जिसमें हलधर का झंडा खरीदा जा रहा था, पार्टी बांट नहीं रही थी, क्योंकि पार्टी गरीब थी। मैने मां से कहा मुझे हलधर झंडा लेकर जाना है। तब मेरी मां ने मुझे अठन्नी दी थी, लेकिन मुझे सिल्क का झंडा चाहिए था जो दो रुपए का था। जैसे-तैसे झंडे की व्यवस्था हुई। यह राजनीतिक चेतना की समझ की बात है। इस समझ ने अब काम दिया।

प्रेम भारद्वाज: लिखा पहली बार कब आपने?

कुमार विश्वास: मैं नवीं कक्षा में था। जब मेरी बड़ी बहन एक कविता प्रतियोगिता में भाग ले रही थी, वह पढ़ती थी बारहवीं कक्षा में। उस प्रतियोगिता में किसी समस्यापूर्ति पर कविता लिखनी थी। एक समस्या पर 16 लाइनें लिखनी थीं। वह कोशिश कर रही थी, लेकिन लिख नहीं पा रही थी। मैंने एक पूरी कविता कागज पर लिख दी, और कहा कि पापा को मत बताना। इस तरह मेरी पहली राइटिंग घोस्ट राइटिंग थी। मेरे घर के आस-पास संघ के अनुयायियों का काफी जमावड़ा था, शाखाएं लगती थीं। उनका ही भाषा-संस्कार शुरू में मुझे आकृष्ट करता था। यह मेरी पहली कविता में दिखता है, ‘सीमाओं के आमंत्रण पर उठते सारे हाथ रहेंगे/ भारत मां के वरद पुत्र हम साथ रहे हैं साथ रहेंगे।’ उस जमाने में मेरे पिताजी का जो अपना पुस्तकालय था, उसे मैंने लगभग पूरा पढ़ा। मध्यवर्गीय अभाव की वजह से गर्मियों की छुट्टी में हम कहीं जा नहीं सकते थे। क्योंकि जो पिताजी का पक्ष था, वह थोड़ा गरीब था और जो मां का पक्ष था वह बहुत अमीर था। उनकी अमीरी में अहमन्यता भी बहुत थी।

अभिषेक श्रीवास्तव: आपकी मां कहां से हैं?

कुमार विश्वास: बुलंदशहर। मैं उस परिवार का नाम नहीं लेना चाहता, दे आर वन ऑफ बिगेस्ट कॉरपोरेट्स ऑफ दिस कंट्री। देश के पहले दस-बारह बड़े अमीरों में आज उनका नाम है। उन दिनों वे ग्रो करना शुरू कर चुके थे। मेरी मां उनके यहां जाने से और जाने पर रुकने से बचती थी। तो मैं छुट्टियों में लाइब्रेरियों से किताबें आकार के हिसाब से इश्यू कराता था, मतलब ज्यादा पृष्ठों वाली मोटी किताबें। जैसे विमल मित्र और शरतचंद्र के सारे उपन्यास।

प्रेम भारद्वाज: आपके पिता ने आपको नहीं बताया कि कौन-सी किताबें पढ़ो?

कुमार विश्वास: सत्तर के दशक में मध्यवर्गीय परिवारों में पिता-पुत्र-संवाद उतना था नहीं। वहां आदेश का भाव होता था। मैंने अपने पिता को काफी हार्दिक कष्ट भी दिया, जब मैंने बी.ए. में दाखिला लिया। मेरी उनसे बोल-चाल भी बहुत वक्त तक बंद रही। वैसे हमारे यहां ‘धर्मयुग’, ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ और ‘कादंबिनी’ जैसी पत्रिकाएं नियमित आती थीं और बहुत सलीके और क्रमबद्ध ढंग से रखी जाती थीं। वे पत्रिकाएं बेची नहीं जाती थीं, अखबार ही बेचे जाते थे। मुझे उस दौर की कुछ चीजें बहुत अच्छी तरह याद हैं जैसे जब दिनकर जी का निधन हुआ तब दैनिक हिंदुस्तान के कॉर्नर पर एक समाचार छपा, ‘हिंदी का सूर्य डूब गया’ मुझे यह हेंडिंग आज तक याद है, इसलिए क्योंकि मेरी साहित्य में दिलचस्पी थी। इस दरमियान मुझे जो जहां से मिलता गया, मैं पढ़ता गया। लानजाइनस को पढ़ा। स्कल्पचर पर ई.डब्ल्यू. हॉवेल की किताब मिल गई, तो उसे पढ़ लिया। इस तरह मुझे समझ में आ गया कि पारसी स्कल्पचर क्या है, हिंदुस्तानी क्या है, मुगलों ने इसमें क्या जोड़ा। यानी जो हाथ आया पढ़ लिया।

अभिषेक श्रीवास्तव: मुख्यधारा से कुछ पढ़ने को नहीं मिला आपको?

कुमार विश्वास: पता नहीं आपकी वाली ‘मुख्यधारा’ कौन-सी है। वैसे मैंने बहुत हिंदी कवियों को पढ़ा। जैसे मैंने मंगलेश डबराल का कविता-संग्रह ‘पहाड़ पर लालटेन’ पढ़ा। मैं उससे बिलकुल भी प्रभावित नहीं हुआ। हो सकता है कि वह इतना महान हो कि मेरी समझ में न आया हो, मुझ जैसे मूर्ख के। मैंने जब पी.एच.डी. कर ली और पढ़ाने लगा, तब भी वह मेरी ज्यादा समझ में नहीं आया।

अवनीश मिश्र: हो सकता है जिस ढंग से कविता लिखी जा रही हो वह आपको पसंद न हो, लेकिन जो विषय और घटनाएं उनमें थीं, उन पर क्या कहेंगे।

कुमार विश्वास: समकालीन समय से संवाद मेरी कविताओं में भी है, लेकिन मेरी छवि गीतकार की बन गई। मैं मूलतः प्रेम का कवि हूं।

प्रेम भारद्वाज: आप पहली बार कब गए मंच पर?

कुमार विश्वास: जब मैं बी.ए. फर्स्ट इयर में था। वह एक्सीडेंटल था। मैं मंच पर जाना नहीं चाहता था, क्योंकि मुझे मंचीय कवियों से काफी वितृष्णा थी। उनके किस्से मैं पिताजी के माध्यम से सुन चुका था। इनमें कई बड़े गीतकार भी थे। मेरे पिताजी उस दौर में कवि-सम्मेलनों के नियमित अध्यक्ष हुआ करते थे। वह हिंदी विभाग के अध्यक्ष और उस शहर में हिंदी के नाम पर इकलौते आदमी थे। नीरज जी, देवराज दिनेश, भवानी बाबू इन्हें मैंने सामने बैठकर सुना, जब मैं चौथी-पांचवीं में था। मेरे पिता का काम केवल मंच पर बैठे रहना और अंत में संबोधित करना था। मेरे पिताजी मंच के बड़े नामों से नाराज थे, मंच पर फ्रलास्क में चलती हुई शराब, चुटकले ...। ये सब मंच पर उस समय शुरू हो चुका था।

प्रेम भारद्वाज: जिन चीजों से आपके पिताजी नाराज थे, वे सारी चीजें आपने कीं?

कुमार विश्वास: कम से कम इनमें से कोई काम तो नहीं ही किया। खैर, मैं पहली बार मंच पर कब गया, इसके बारे में बता रहा था। तो मैं हापुड़ गया हुआ था किसी काम से। मैं खाली आदमी था, इसलिए मेरे कहीं आने-जाने पर कोई रोक-टोक नहीं थी। मां को मैं बताकर जाता था। बता देता था कि अपने एक दोस्त राजीव के पास रहूंगा। राजीव के एक परिचित एक बड़ा कवि-सम्मेलन हापुड़ में आयोजित करवाते थे। यह कवि-सम्मेलन पारंपरिक जैन समाज का कवि-सम्मेलन था। उसमें उस वक्त के हिंदी कवि-सम्मेलन के नौ स्टार कवि आए हुए थे। निर्मल हाथरसी, अशोक चक्रधर, सुरेंद्र शर्मा, संतोष आनंद ... ये सब। वहां राजनीति चल रही थी कि पहले कौन पढ़ेगा। माहौल खराब हो रहा होगा, तब कौन पढ़ेगा। मेरे दोस्त ने अपने रिश्तेदार को बताया कि मैं भी कविताएं लिखता हूं, उन्होंने कहा कि फिर तुम भी पढ़ो कविताएं, तुम्हारी भी सुनेंगे। मैंने बहुत मना किया। लेकिन मुझे जाना ही पड़ा। संचालन जो सज्जन कर रहे थे उन्होंने कहा कि हमारे बीच एक नया कवि है, उन्होंने मेरा नाम तक गलत बोला। लेकिन मैंने कविता पढ़ी। तब तक धर्मवीर भारती के बहुत सारे गीत मैंने पढ़े थे, ‘कनुप्रियश’ पढ़ी थी। मैंने जो कुछ सुनाया वह इस अध्ययन से ही प्रभावित था। जो भी था मेरे पढ़ने के बाद हंगामा मच गया, वाह-वाह हो उठी।

प्रेम भारद्वाज: क्या बोल थे उस गीत के?

कुमार विश्वास: ‘मुझसे सुनो खूब गजलें, मधुर गीत/ मुझसे मेरा मात्र परिचय न पूछो/ कि तपती दुपहरी में छत पर अकेली/ जो तुमको बुलाता था वो गीत हूं मैं/ मुंह ढांपकर नर्म तकिये के भीतर/ जो तुमको रुलाता था वो गीत हूं मैं/ तुम्हारे ही पीछे जो कॉलेज से घर तक/ जो हर रोज जाता था वो गीत हूं मैं ...’ यह एक प्रेम-गीत था, हालांकि तब तक प्रेम मैंने किया नहीं था और न ही मैंने तब तक गीतों को कविताओं की तुलना में गंभीरता से लिया था।

प्रेम भारद्वाज: तब तक आप समझदार थे।

कुमार विश्वास: मुझे लगता था कविता महत्वपूर्ण है। यह तो मैं सामान्य रूप से उनमें लय भर देता था, क्योंकि तब तक विचारों के आवेग के पीछे लय नहीं चल रही थी, आज मैं कह सकता हूं कि मैं हिंदी की उस गीत-पंरपरा का आदमी हूं जहां गीत की लय कवि के हिसाब से चलती है, कवि गीत की लय के हिसाब से नहीं चलता। खैर, जब मैं गीत पढ़कर उस कवि-सम्मेलन से लौट आया तो चाचा जी ने मुझे एक लिफाफा दिया। मैंने उनसे कहा कि यह क्या है। वह बोले कि यह तुम्हारा किराया है। हम छात्र थे तब हमारा किराया लगता ही नहीं था। उस लिफाफे में पचास-पचास रुपए के दो नोट थे। मैंने उनसे कहा कि इसे रख लीजिए यह बहुत ज्यादा है, किराया तो केवल चार रुपए है। वह बोले कि यह तुम्हारे कविता पढ़ने का सम्मान है, पुरस्कार है। मेरे बहुत मना करने पर भी वह माने नहीं। मैंने अंततः उस लिफाफे को बड़े दुखी मन से रख लिया। मैंने उस महीने छह कवि-सम्मेलन पढ़े और मेरी जेब में लगभग 17-18 सौ रुपए थे। कई बड़े कवि-सम्मेलनों में न्यूनतम पेमेंट ही पांच सौ रुपए थी। उस समय कॉलेज लेक्चरर की तनख्वाह थी 18 सौ रुपए और मेरी जेब में थे 17 सौ। मुझे बोध हुआ कि अगर मुझे अपनी इच्छित रचनाधर्मिता के साथ, शब्द के साथ अपने घर और समाज में जीना है तो मुझे अपने वांछित काम के साथ-साथ इस कविता को भी अपनाना होगा, यह जीने के लिए जरूरी है। लेकिन फिर भी यह कहूंगा कि मैंने आज तक बाजार की कविता नहीं की, बल्कि कविता का बाजार खड़ा किया। मैं हिंदी की मुख्यधारा का फरेब भी समझ चुका था। एक कविता भेजिए, फिर वह छपेगी और फिर अधिकांश पत्र-पत्रिकाएं एक पैसा तक नहीं देतीं। और उस पर अहंकार यह कि आपको छाप तो रहे हैं, यही बड़ी बात है। और छापते ये किन मापदंडों पर थे, यह मुझे पता चल चुका था। वह ‘चटियाबाजी’, पूर्वी उत्तर प्रदेश का शब्द है यह, इस चिरकुट-मंडली को मैं समझ चुका था। इसका मुहावरा क्या है, कौन लोग इसमें हैं। इसकी राजनीति क्या है।

प्रेम भारद्वाज: चटियाबाजी मंचीय कविता में नहीं है।

कुमार विश्वास: वह है, लेकिन वह धंधे के लिए है, आज भी है। लेकिन मैं तो उससे बाहर आ गया हूं। मैंने खुद को इतना समर्थ बनाया कि बाहर आ सका इससे। मैं उनकी सड़क पर नहीं चला, अपना अलग हाइवे बनाया। शायद इसलिए आज मैं इस जगह हूं।

प्रेम भारद्वाज: आपने अपनी चटिया अलग बिछा ली।

कुमार विश्वास: जी, मेरी चटिया अलग है। जिस पर मैं अकेला हूं।

अभिषेक श्रीवास्तव: उस वक्त जिस चटिया-मंडली की बात आप कर रहे हैं, कौन लोग थे उसमें?

कुमार विश्वास: मैं ऐसे लोगों के नाम लेकर उन्हें प्रासंगिक बनाना नहीं चाहता।

अभिषेक श्रीवास्तव: आप शायद कहना चाह रहे हैं कि साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं में छपने वाले चटियाबाज थे।

कुमार विश्वास: मैं यह नहीं कह रहा हूं। मैं गंभीर सिंह पालनी का नाम लूंगा, आप शायद उन्हें जानते भी नहीं, आप शायद कात्यायनी को भी नहीं जानते। एकांत श्रीवास्तव, स्वप्निल श्रीवास्तव, बद्रीनारायण, बोधिसत्व, मानबहादुर सिंह आदि ये सब मेरे बड़े आदरणीय कवि थे।

अभिषेक श्रीवास्तव: आपने आगे कभी इनके विकास पर निगाह नहीं रखी।

कुमार विश्वास: मैंने थोड़ी निगाह रखी इन पर, लेकिन आगे बहुत गंभीर विषय ये मेरे लिए कभी न बन पाए। एक बात और कह दूं यहां, अटल बिहारी वाजपेयी यूं एक औसत से कवि हैं, लेकिन उनके एक गीत की ये बहुत अच्छी पंक्तियां हैं: ‘टूटे मन से कोई खड़ा नहीं होता / छोटेपन से कोई बड़ा नहीं होता’

मैंने हिंदी की इस तथाकथित मुख्यधारा जिसके पास धारा है ही नहीं, बस स्वयं में मुख्य है। जिसके पीछे पांच सौ पाठक भी नहीं हैं। छोटे-छोटे दुराग्रहों और राग-द्वेष में फंसे हुए ‘कविता-समय’ की नौटंकी करने वाले। दारू पीकर साहित्यिक आयोजनों में ड्रामा करने वाले। दूसरों की दुकान से इनकी दुकान छोटी है या कहें गुमटी जिससे बैठकर ये शोरूम को गालियां दे रहे हैं।

अवनीश मिश्र: अभी अपने कहा कि आपने लानजाइनस को पढ़ा। लेकिन यह तो आपके मिजाज मे मेल नहीं खाता।

अभिषेक श्रीवास्तव: यह भी कहा कि आप बगैर प्रेम किए प्रेम कविताएं लिख रहे थे।

कुमार विश्वास: आपको को मेरे मिजाज का क्या पता? ऐसा नहीं है, केवल मेरी पहली प्रेम कविता ही बगैर प्रेम किए हुए लिखी गई थी। इसके बाद मुझे बी.ए. फर्स्ट इयर में प्यार हो गया था। जिससे मुझे प्रेम हुआ वह बहुत सौम्य और संस्कारी कन्या थी। और मैं बड़ा मशहूर था उस छोटे से संकुल में। मजाज का एक शे’र है, ‘तुम जो बन सकती हो हर महफिल की फिरदौसे-नजर/ मुझको ये दावा कि हर महफिल पर छा सकता हूं मैं’ ...तो यह एक डेडली कॉम्बीनेशन था। वह उस इलाके की सबसे खूबसूरत लड़की थी- तीन-चार कॉलेजों की, और मैं सबसे चर्चित और बहुआयामी लड़का था। इस प्रेम में यह तय हुआ कि हम सामान्य और दुनियावी प्रेमियों की तरह एक दूसरे को खत नहीं लिखेंगे, एक दूसरे से मिलेंगे नहीं। उसने मुझे एक बड़ा रचनात्मक सुझाव दिया कि तुम्हें जब मेरी याद आए तो तुम कविता लिखना। उस जमाने की मेरी जितनी कविताएं हैं, वे बेसिकली उसके नाम लिखे गए खत हैं, उस तक पहुंचने की चेष्टाएं हैं। बाद में जॉन एलिया का मैंने एक शे’र सुना:

‘यूं तो अपने कासिदाने-दिल के पास/ जाने किस-किस के लिए पैगाम हैं

जो लिखे जाते रहे औरों के नाम/ मेरे वो खत भी तुम्हारे नाम हैं’


मैंने कालांतर में जो कविताएं लिखीं, उनमें से भी बहुत सी उसे संबोधित हैं:

‘जिन नजरों ने रोग लगाया गजलें कहने का आज तलक उनको नजराना चलता रहता है’ मेरे कहने का आशय यह है कि मुझे अपने समय के बहुत सारे आंदोलनों और घटनाओं ने प्रभावित किया, लेकिन मैंने उन घटनाओं पर कविता नहीं लिखी। मुझे इस सिलसिले में बद्रीनारायण की कविता ‘प्रेमपत्र’ बहुत अच्छी लगी।

प्रेम भारद्वाज: बद्रीनारायण की कविता में विचार भी बहुत है।

अविनाश मिश्र: जिस कविता की आप बात कर रहे हैं, उसमें ही है।

कुमार विश्वास: लेकिन मैंने तो उसमें प्रेम ही रिसीव किया, वही मुझ तक पहुंचा।

अभिषेक श्रीवास्तव: जिस पर लिफाफा आता है, वही आपके मतलब का है।

कुमार विश्वास: बात प्राथमिकता की है। चुटकुलेबाजों को मुझसे चार गुना ज्यादा लिफाफा मिलता था। मैंने देखा कि वे कैसे मुझसे बड़े हो गए, हवाई जहाज से चलने लगे। लेकिन मैंने तो गीत-कविताएं ही लिखीं।

अवनीश मिश्र: आप कविता को पेशे के रूप में लेते हैं?

प्रेम भारद्वाज: यहीं एक महत्वपूर्ण बात यह है कि अच्छे कवि बहुत हैं, मंचीय कवि बहुत हैं, अच्छा गाने वाले बहुत हैं, आपकी आवाज भी बहुत अच्छी है, लेकिन मुझे लगता है कि आपने इस सबके साथ एक फ्रयूजन पैदा किया गीत और चुटकुलेबाजी का फ्रयूजन।

कुमार विश्वास: आप आगे के सवाल पर पहले आ जाते हैं। लेकिन फिर भी मैं बताता हूं कि मैंने चुटकुलों से ही नहीं बल्कि भाषा से भी काम लिया है। तात्कालिक परिहास और वाक्पटुता से काम लिया। स्मृति से काम लिया। चुटकुलेबाजों के पास स्मृति की ताकत नहीं थी। वे गालिब और दाग को नहीं सुना सकते। हिंदी के मुख्यधारा के कवियों के बारे में कहूं तो उनमें अधिकांश बातें तो करते हैं विदेशी कवियों की, लेकिन वे अपनी सामाजिक जिंदगी और अपनी कविता के बीच चूहेदानी के चूहे की तरह फंसे हुए हैं। यह बेचैनी उनके व्यक्तित्व में है। इसे कभी वे सिगरेट से बुझा रहे होते हैं, कभी शराब से, कभी फेसबुक की निंदाओं से, तो कभी किसी और चीज से। उनके व्यक्तित्व और रचनाधर्मिता के बीच एक भयानक गैप है। मंचीय कवियों को कम से कम यह मुगालता तो नहीं है इन तथाकाथित मुख्यधारा के परम कवियों की तरह की वे ही कवि हैं। वे जानते हैं कि वे तिजारती हैं, दूकान पर बैठे हांका लगाकर माल बेच रहे हैं। आपकी गरज हो तो खरीदिए वर्ना मत खरीदिए। बाकी उनकी रचनाधार्मिकता उनके साथ।

अभिषेक श्रीवास्तव: आपको उस समय की कुछ प्रासंगिक घटनाएं याद है जो समाज में घट रही थीं, 1987-88 में कुछ ऐसा हुआ हो जिसने दिल्ली-गाजियाबाद के इलाके को हिलाकर रख दिया।

कुमार विश्वास: मंदिर-आंदोलन की याद है मुझे। चौरासी के सिख-दंगों की याद है। दक्षिणपंथी शक्तियों के उभार की भी याद है।

अभिषेक श्रीवास्तव: ‘वर्तमान साहित्य’ से संपर्क था न उस दौर में आपका?

कुमार विश्वास: थोड़ा बहुत था, बहुत लंबे समय तक नहीं।

अभिषेक श्रीवास्तव: इसका मतलब हाशिमपुरा की घटना आपको याद नहीं है।

कुमार विश्वास: याद है। लेकिन जब आप एकांगी ढंग से सोचते हैं, तो बहुत सारी घटनाएं आपको अप्रासंगिक लगती हैं।

अभिषेक श्रीवास्तव: ये घटनाएं आपके लिए उस वक्त अप्रासंगिक थीं?

कुमार विश्वास: मेरी इन घटनाओं पर क्या राय होनी चाहिए, यह मेरे लिए प्रासंगिक था। वैसे भी प्रासंगिकता निजी विषय है।

अभिषेक श्रीवास्तव: जो घटना आपकी कविता को प्रभावित करेगी आप उसी पर राय देंगे?

कुमार विश्वास: यह आपकी ग्राहता पर निर्भर है कि आप किन घटनाओं को महत्वपूर्ण मान रहे हैं।

प्रेम भारद्वाज: सफदर हाशमी वाली घटना भी आपको याद नहीं?

कुमार विश्वास: याद है।

प्रेम भारद्वाज: याद दिलाने पर आ रही है याद।

कुमार विश्वास: मेरी स्मृति में यह उस तरह नहीं है कि मैं इसके लिए बाहर निकला होऊं।

प्रेम भारद्वाज: आपने उसे रिसीव नहीं किया।

कुमार विश्वास: मेरे पास छनी हुई सूचनाएं आती थीं। इसलिए इन घटनाओं पर मेरी ठीक राय बन नहीं पाती थी। कांग्रेस के प्रति अरुचि थी बचपन से ही मेरे भीतर। लेकिन मैं यह भी कहूंगा कि आपका बचपन बहुत सारी चीजें निर्धारित करता हैं। किसी हिंदू बच्चे के सपने में मोहम्मद साहब नहीं आते और किसी भी मुसलमान बच्चे के सपने में राम-कृष्ण नहीं आते। ये ईश्वर हैं तो इन्हें तो कहीं भी चले जाना चाहिए।

अभिषेक श्रीवास्तव: सारे हिंदू बच्चों के सपनों में राम और कृष्ण आते हैं, ऐसा तो नहीं है।

कुमार विश्वास: हां, लेकिन मोहम्मद साहब तो बिलकुल नहीं आते। जबकि ईश्वरीय अवतार तो वह भी हैं।

अभिषेक श्रीवास्तव: सारे मुसलमान बच्चों के सपने में मोहम्मद साहब आते हैं?

कुमार विश्वास: मैं यह भी नहीं कह रहा हूं।

अभिषेक श्रीवास्तव: तब इस पर बात करने की जरूरत क्या है।

कुमार विश्वास: जरूरत इसलिए है क्योंकि मैं यह कहना चाहता हूं कि हमारे सपनों तक पर हमारे अतीत, हमारे बचपन का साया है। हमारा वर्तमान हमारे अतीत का प्रतिफल है। हमारी छोटी-छोटी कुंठाओं और उनसे मुक्ति का प्रतिफल है। मैंने इस पर काफी अध्ययन किया। मेरे जीवन के लिए जिस-जिस में अस्वीकार का भाव रहा है, उसे स्वीकार के भाव में बदलने के लिए मेरा आउटफील्ड बहुत फास्ट है, जो कि नहीं होना चाहिए, क्योंकि यह अधैर्य का परिचायक है। यह अधैर्य कहां से आया, यह आया मेरे बचपन और युवावस्था में झेले गए तिरस्कार भाव से। अपना आत्म-विश्लेषण करना बहुत आवश्यक है। मैं गर्म खाना नहीं खाता, क्योंकि मैंने देखा कि मेरे पिता को गर्म खाना खाने की आदत है और इसके लिए मेरी मां जून की गर्मी में भी दोपहर बारह बजे गर्म खाना बनाती थी। मां के पसीना बहता रहता और मेरे पिता को गर्म रोटियां जाती रहतीं। मेरे दिमाग में तभी यह गहरे घुस गया कि एक व्यक्ति की सुविधा दूसरे के लिए इतनी भीषण असुविधा नहीं बननी चाहिए। आज मैं जब चाहूं तब गर्म खाना खा सकता हूं। लेकिन मुझसे खाया ही नहीं जाता। मैं आज अपने अतीत का गुलाम हूं। तो मैं वही कह रहा हूं कि मुझ तक छनकर जो सूचनाएं आईं उनमें दक्षिणपंथी प्रभाव बहुत ज्यादा था। मेरे चारों तरफ यही लोग थे। लेकिन मैं ‘हंस’ भी पढ़ रहा था, तो एक दूसरी चेतना भी समानांतर सक्रिय थी।

अभिषेक श्रीवास्तव: आपने सूचनाओं के लिए कोई फिल्टर नहीं लगा रखा था।

कुमार विश्वास: मैंने नहीं लगा रखा था, लेकिन कहीं और लगा हुआ हो, तो मैं क्या कर सकता हूं।

अभिषेक श्रीवास्तव: नरेंद्र मोदी ने कहा कि ‘युद्ध और बुद्ध’ तो आपने उस पर एक कविता सुना दी।

कुमार विश्वास: तब नहीं, बहुत पहले सुनाई। मोदी जी ने वही मंच से सुनकर कहा होगा शायद।

अभिषेक श्रीवास्तव: मतलब मोदी जी को आपको क्रेडिट देना चाहिए।

कुमार विश्वास: कोई भी उठा सकता है, मैं इतने वर्षों से इसे कवि-सम्मेलनों के संचालन में पढ़ रहा हूं।

अभिषेक श्रीवास्तव: आपने सबसे पहले इस कविता को कब सुनाया, न्यूज 24 पर सुनाने से पहले?

कुमार विश्वास: अभी यह याद नहीं।

अभिषेक श्रीवास्तव: कोई भी व्यक्ति जो जरा-सा भी राजनीतिक रूप से जागरूक होगा, उसका ध्यान आपकी कविता सुनकर तुरंत मोदी जी के बयान की ओर जाएगा। आपने इसे पहले लिखा, इसका कुछ तो प्रमाण होगा।

कुमार विश्वास: मैं कोई प्रमाण क्यों दूंगा। नरेंद्र मोदी या कोई भी प्रधानमंत्री एक कवि के कालखंड में बहुत अप्रासंगिक है। आपको क्या आज पता है कि वर्ड्सवर्थ या कीट्स के टाइम पर प्रधानमंत्री कौन था? विदेश मंत्रालय कौन देख रहा था?

अभिषेक श्रीवास्तव: यह साहित्य भीतर की भी बात है। जैसे आपको भी नहीं पता कि जिस समय की अभी आपने बात की उसी समय में मंगलेश डबराल, वीरेन डंगवाल, असद जैदी, राजेश जोशी कविता लिख रहे थे।

कुमार विश्वास: मैं इन्हें पढ़ रहा था, लेकिन मैं इनके नाम क्यों लूं? मैं बहुतों का नाम नहीं लेना चाहता। मुझे बहुतों ने प्रभावित किया है। लेकिन एक नाम मैं जरूर लूंगा। तब तक वह न भगवान हुए थे, न ओशो - वह थे श्री रजनीश। उनसे मैं अपनी चेतना के बचपन में बहुत प्रभावित हुआ और उनके ही चक्कर में मैं कृष्णमूर्ति तक भी गया। थोरो तक गया- एमर्सन के गुरु। अलग-अलग तरीके से दरवाजे खुले। कुछ मेरी भी सीमाएं थीं- समय और स्वास्थ्य की। मैं एक कमजोर-सा बच्चा था।

आकाश नागर: आपके प्रेरणास्त्रोत कौन हैं?

कुमार विश्वास: यह बहुत अजीब-सा सवाल है, क्योंकि ऐसा कुछ नहीं होता। ऐसा करना अपने गठन के शेष अवयवों के प्रति अस्वीकार होगा।

प्रेम भारद्वाज: ‘कोई दीवाना कहता है ...’ गीत आपने कब लिखा?

कुमार विश्वास: मैं यह बताऊंगा, लेकिन उससे पहले ‘पाखी’ के पाठकों के जरिए यह सबको बता दूं कि कुमार विश्वास की सबसे ब्रांडेड कविता, ‘कोई दीवाना कहता है, कोई पागल समझता है ...’ के तुक नहीं मिलते हैं।

प्रेम भारद्वाज: यह अशुद्ध है, पता है।

कुमार विश्वास: मैं बताता हूं उसकी अशुद्धि भी। वह यह कि उसकी तुक नहीं मिलती है और उसको सबने पढ़ा है। लेकिन उर्दू व्याकरण से हिंदी में वह शुद्ध है।

अभिषेक श्रीवास्तव: शुरू में आप किस नाम से लिखते थे?

कुमार विश्वास: शुरुआत में कई जगहों पर लेख वगैरह छपे कुमार विश्वास शर्मा के नाम से। यही मेरा पूरा नाम था। यह बड़ा अजीब-सा था। मैंने सोचा कोई उपनाम रखते हैं- विश्वास विश्वासी, विश्वास नीरव टाइप। लेकिन मेरी बहन ने कहा कि ये नाम बड़े चीप लग रहे हैं। उसने कहा कि तुम कुछ मत करो बस शर्मा हटा लो। इस तरह मैं विश्वास कुमार और फिर कुमार विश्वास हो गया। मेरी पहली लंबी अतुकांत कविता दैनिक प्रभात में कुमार विश्वास नाम से ही छपी। वह समकालीन कवियों से प्रभावित कविता थी, ‘जब भी मैं गाना चाहता हूं एक प्रेमगीत ...’

अविनाश मिश्र: यह कविता कौन-से समकालीन कवियों से प्रभावित थी?

कुमार विश्वास: बहुत सारे कवि थे।

अविनाश मिश्र: नाम तो बता दीजिए।



कुमार विश्वास: इस वक्त तक मैं ‘वर्तमान साहित्य’ के दफ्तर जाने लगा था। मैं वहां अनियमित सहायक के रूप में काम करता था। मैं फर्जी नामों से इस पत्रिका के संपादक को पत्र भी लिखा करता था। उस दौर में नई कहानी पर कुछ विवाद भी चल रहा था, शैलेश मटियानी और नामवर सिंह के बीच। मैंने जो पत्र लिखे वे एंटी नामवर सिंह थे। लिखे क्या लिखवाए गए। मैं बी.ए. फर्स्ट इयर का छात्र था। उस दौर में मैंने कुछ अनुवाद भी पढ़े- रुजेविज और ब्रेख्त बगैरह के।

प्रेम भारद्वाज: आपने बताया नहीं कि आपको उस दौर में कौन प्रभावित करता था?

कुमार विश्वास: थे तो बहुत, लेकिन मुझे उस दौर की पत्रिकाओं में प्रकाशित होने वाले तीन-चार कवि बहुत प्रभावित कर रहे थे। इनमें से एक ज्ञानेंद्रपति थे। उनमें जो कैशोर्य भावनाओं का विरेचन था, वह मुझे आकर्षित करता था, ‘चेतना पारिक कैसी हो’ में उनकी लयात्मकता भी बेहद प्रभावी थी। मुझे मानबहादुर सिंह और आबित सुरती भी बहुत अच्छे लगते थे। गंभीर सिंह पालनी एक अल्पख्यात कवि रहे, उनकी भी ‘नदी’ शीर्षक कविताओं का मेरी चेतना पर असर है। मेरे साथ प्रकाशित होने वालों में स्वप्निल श्रीवास्तव, कात्यायनी, एकांत श्रीवास्तव, बद्रीनारायण। बद्रीनारायण तो हमारे स्टार थे। मैं उस दौर की सारी पत्रिकाओं में छपा- ‘नया साहित्य’, ‘कंचनलता’, ‘मधुमति’। इनमें मेरी अतुकांत कविताएं छपीं।

अविनाश मिश्र: ‘हंस’ में नहीं छपे?

कुमार विश्वास: नहीं ‘हंस’ में नहीं, लेकिन ‘हंस’ मैंने एक अद्भुत प्रयोग किया। मैंने उसमें एक कहानी भेजी। उस दौर में रचना की स्वीकृति-अस्वीकृति का पत्र स्वयं राजेंद्र यादव ही भेजते थे। अर्चना वर्मा के पत्र तो बहुत बाद में आना शुरू हुए। राजेंद्र जी का पत्र आया कि यह कहानी अस्वीकृत है, ‘हंस’ के योग्य नहीं है। इसके बाद मुझे बदमाशी सूझी। मैंने उस कहानी को अपने साथ पढ़ने वाली एक सीनियर खूबसूरत दोस्त के नाम से उसके फोटो के साथ भेजा। कहानी स्वीकृत हो गई। पता नहीं कि वह कहानी छपी या नहीं छपी। लेकिन मेरा दिल इससे टूट गया। इसके बाद मैं सांध्यकालीन गोष्ठियों में बहुत बैठा। हमारे तथाकथित बड़े साहित्यकारों को जिनका नाम लेकर मैं उन्हें रेखांकित नहीं करना चाहता, उनका महत्व नहीं बढ़ाना चाहता। मैंने देखा कि हिंदी साहित्य की तथाकथित मुख्यधारा में बने रहने की जद्दोजहद में बड़े लोगों का छोटापन कितना ज्यादा उजागर होता है। मैं लानजाइनस पढ़कर गया था, मैं तो यह मानता था कि आप बड़े मनुष्य हुए बिना बड़े कवि-कलाकार नहीं हो सकते।

मैं अपने बारे में सोचता हूं कि मैं और बहुत लिख सकता था, पढ़ सकता था, अगर मैंने स्वयं को व्यावसायिक रूप से सफल न बनाया होता। मैं अक्सर अपनी पत्नी से बात करते हुए कहता हूं कि मैं एक औसत कवि के रूप में ही याद किया जाऊंगा। वह जो मैं अपने अंदर से निकाल सकता था, इसलिए नहीं निकाल पाया, क्योंकि मेरे असुरक्षित बचपन और युवावस्था ने आर्थिक सुरक्षा का जो महत्व मुझे समझाया, उससे जूझने के चक्कर में मैंने अपने लिखने-पढ़ने की असल जद्दोजहद को दरकिनार किया। लेकिन अभी मैं बाकी हूं और शायद उसी से निकलूं।

अभिषेक श्रीवास्तव: लेकिन अभी तो आपने कहा कि बिना धनी हुए आदमी बड़ा बन सकता है, ऐसा आपको बचपन में ही सिखाया गया।

कुमार विश्वास: वह बचपन में सीखा, लेकिन जब धीरे-धीरे बड़ा हुआ तब पता चला कि सौ रुपए भी कैसे कमाए जाते हैं। आर्थिक असुरक्षा क्या होती है। मुझे पता चला कि समाज के लिए सफलता सिर्फ आर्थिक आधार पर तय होती हैं, इससे नहीं कि आपको नोबेल मिला या ज्ञानपीठ। आप कैसी कोठी में रहते हैं, कितनी महंगी घड़ी पहनते हैं, सफलता का मापदंड यह है। मैं जब दिल्ली आया, मैंने देखा कि कैसे-कैसे लोग साहित्यकार और कवि बन गए। वर्ष 2000 आते-आते मुझे लगा कि मुझे कवि-सम्मेलन के इस मुहावरे के पार जाना है। इसलिए ही पत्र-पत्रिकाओं की कविता में भी मैं बहुत दूर तक नहीं गया।

प्रेम भारद्वाज: आपने कविता को पेशा बनाया?

कुमार विश्वास: यह आपकी गलतफहमी है। और यह कहीं न कहीं लेखकीय जीवन से उपजी आपकी आर्थिक असुरक्षा का पराजय-घोष है। मैं रिच प्रोफेसर्स में रहा हूं। अगर मुझे कविता को बेचना ही होता तो ‘बिग बॉस’ में जाकर सात करोड़ में नहीं बेचता। रचनाधर्मिता को सार्वजनिक करने के लिए जो भी स्पेस बने हुए हैं, मैंने उन्हें खारिज नहीं करता। बहुत सारे हिंदी के बड़े नामों को कथ्य से नहीं व्यक्ति से दिक्कत है। दलित पर कहानी आप लिखेंगे, लेकिन दलित कहीं पिटेगा तो उसे बचाने आगे नहीं आएंगे। स्त्री-विमर्श की कहानी लिखेंगे, लेकिन 21 साल की लड़की के साथ बलात्कार होगा, तो इसके विरोध में चौक पर लाठियां खाने नहीं जाएंगे। मैं भी प्रेम पर कविताएं लिख रहा था, प्रेमिका की आंखों और जुल्फों पर लिख रहा था, लेकिन मुझे जब लगा कि मेरे सामाजिक सरोकार कुछ और होने चाहिए, मैंने मोर्चा लिया। दामिनी के न्याय के लिए जब कड़कड़ाती सर्दी में मैंने विजय चौक पर पुलिस की लाठियां खाईं तो उस दिन का मेरा स्त्री-विमर्श पूरा हो गया।

अभिषेक श्रीवास्तव: आप वैचारिक रूप से कुछ देर में परिपक्व हुए?

कुमार विश्वास: केवल शाब्दिक जुगाली अगर परिपक्वता है तो हां। परिपक्वता का अपना-अपना मानक होता है। धर्मवीर भारती 55 वर्ष की उम्र में परिपक्व हुए और ‘अंधा युग’ लिखा, इससे पहले तो होंठों के पाटल ही चूमते रहे।

अवनीश मिश्र: वह संपादक भी थे न?

कुमार विश्वास: मैं भी संचालक था न।

अवनीश मिश्र: क्या आप अपने आपको कवि मानते हैं?

प्रेम भारद्वाज: इस सवाल को मैं थोड़ा बदलकर पूछता हूं कि आपको क्या माना जाए- एक शिक्षक, एक कवि, एक सेलेब्रिटी, एक राजनेता या एक हास्य कलाकार?

कुमार विश्वास: मैं इसके जवाब में कबीर का एक दोहा पढ़ना चाहूंगा, ‘हद तजै सो औलिया, बेहद तजै सो पीर/ हद बेहद दोनों तजै, ताको कहे फकीर।’ मैंने कभी अपने-आपको किसी दायरे में नहीं बांधा।

प्रेम भारद्वाज: नहीं ऐसा नहीं है, आप चीजों को अपनी सुविधानुसार करते हैं।

कुमार विश्वास: मैंने अपने-आपको कभी किसी ब्रेकेट में नहीं रखा। इस गुण ने ही मुझे अलग-अलग लोगों और क्षेत्रों से जोड़ा। मुझे आज भी पता नहीं है कि कल मैं क्या करूंगा, हो सकता है शायद मैं फिल्में करूं या और कुछ, अभी कह नहीं सकता।

प्रेम भारद्वाज: फिर भी आप सबसे ज्यादा स्वयं को क्या मानते हैं?

कुमार विश्वास: मैं अपने आपको स्वयं से प्रतिबद्ध एक आदमी मानता हूं, जो अपनी चीजों की दुनिया में है। उसकी जो समझ में आता है, वह करता है। मेरा काम है खुद को गाना।

प्रेम भारद्वाज: यह एक डिप्लोमेटिक जवाब है।

अवनीश मिश्र: आपकी बातें बता रही हैं कि आप सेल्फ ऑब्सेस्ड हैं।

प्रेम भारद्वाज: अन्ना-आंदोलन से पहले आपकी सामाजिक सक्रियता क्या थी।

कुमार विश्वास: मैंने विश्वविद्यालयों और इंजीनियरिंग के छात्रों के बीच में उस हिंदी को पुनर्जीवित किया जो उनके बीच से बहिष्कृत हो गई थी।

अवनीश मिश्र: यह काम तो हिंदी फिल्मों और उसके गीतों ने भी किया।

कुमार विश्वास: बिलकुल उनका योगदान है। आनंद बख्शी का योगदान हिंदी के कई बड़े साहित्यकारों से ज्यादा है। एक नवीं पास आदमी का योगदान उनसे कहीं ज्यादा है इस हिंदी समाज में जिन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार मिले हैं। भाषा मुहावरों से प्रांजल होती है, आनंद बख्शी ने करीब सौ मुहावरे दिए, ‘मार दिया जाए कि छोड़ दिया जाए/ बोल तेरे साथ क्या सलूक किया जाए ...’ नीरज जी ने मुहावरा दिया, ‘ए भाई जरा देख के चलो ...’

अविनाश मिश्र: ये मुहावरे तो समाज में पहले से ही थे। रचनाकारों ने समाज से लिए।

कुमार विश्वास: हो सकता है पहले से हों।

अविनाश मिश्र: तब आप यही बोलिए न।

कुमार विश्वास: ‘कारवां गुजर गया/ गुबार देखते रहे ...’

अविनाश मिश्र: यह उर्दू शायरी से आया है।

कुमार विश्वास: हो सकता है।

अविनाश मिश्र: फिर नीरज कहां से मौलिक हो गए।

कुमार विश्वास: इस तरह स्वीपिंग रिमार्क मत दीजिए कि नीरज कहां से मौलिक हो गए। पूरी तीन-तीन पीढ़ियां जिन्हें कंठ दें, वे आपके लिए तुच्छ होंगे!

प्रेम भारद्वाज: मुहावरा मुक्तिबोध ने दिया, ‘पार्टनर तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है?’

कुमार विश्वास: मानता हूं, लेकिन इसे कितने लोग जानते हैं? बाहर निकलकर पांच सौ लोगों में सर्वे कराइए। अगर पांच सौ भी बता दें कि ‘पार्टनर तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है’ किसने कहा, तो मैं मान जाऊंगा।

प्रेम भारद्वाज: किन पांच सौ लोगों की बात कर रहे हैं आप?

कुमार विश्वास: उन्हीं की जिन्हें आप ‘लोक’ मानने को तैयार नहीं। जो आपकी ज्ञान-गंगा से बहिष्कृत हैं और जिनकी ठेकेदारी आपने स्वयं ले रखी है।

प्रेम भारद्वाज: आप ‘विशद’ शब्द का बहुत प्रयोग करते हैं, इस शब्द का अर्थ ‘आपका लोक’ जानता है। आप ‘विपुल’ शब्द का मंच से बहुत प्रयोग करते हैं, कितने लोग इसका अर्थ जानते हैं।

अभिषेक श्रीवास्तव: आपकी बातों से लग रहा है कि उसी चीज का अर्थ है जिसे ज्यादा से ज्यादा लोग समझें।

कुमार विश्वास: मेरा यह मतलब नहीं है। मैं यह कहना चाहता हूं कि कला विशेष वर्ग के लिए नहीं होती है। ‘पद्मावत’ मेरे गांव में आज भी जिंदा है। तुलसीदास और कबीर आज भी गाए जाते हैं। मुक्तिबोध का नाम कोई नहीं लेता। कला का अर्थ उसकी उत्तरजीविता भी है। मुझे यह बताइए कि छायावाद के बाद हिंदी में जितने कवि पैदा हुए वह जनता में आज कहां हैं? रेलवे स्टेशन पर जब आज एक हिंदी का आदमी उपन्यास खरीदता है, तो वह आज भी प्रेमचंद को या अनुवाद का शरतचंद्र क्यों खरीदता है, यह चिंता का विषय होना चाहिए कि वह आपके ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी विजेता साहित्यकारों का लिखा कुछ क्यों नहीं खरीदता। वह राजकमल प्रकाशन से छपी उन किताबों को जिन्हें आप आपस में बांट लेते हैं, क्यों नहीं खरीदता।

अभिषेक श्रीवास्तव: आपके हिसाब से हिंदी में आखिरी कवि कौन था?

कुमार विश्वास: दिनकर और दुष्यंत के बाद कोई ऐसा नहीं आया जिसकी इतनी लोक स्वीकृति हो।

अवनीश मिश्र: आप भाषा का कार्य क्या मानते हैं?

कुमार विश्वास: संवेदना का विस्तार करना।

अभिषेक श्रीवास्तव: जिस संवेदना और प्रेम की बात आप कर रहे हैं क्या उसके लिए आप विचार को जरूरी नहीं मानते।

कुमार विश्वास: प्रेम सबसे ज्यादा वैचारिक है। प्रेम मनुष्यता का सबसे निष्कलुष और मौलिक विचार है।

अभिषेक श्रीवास्तव: आप जो करते हैं उसमें विचार कहां हैं, मौलिकता कहां है?

कुमार विश्वास: जो सत्य है उसमें मौलिकता एक भ्रम है। कहन और तरीका ही मौलिक होता है। प्रेम हो चुका है, गाया जा चुका है, वही स्त्री, वही पुरुष है, वही मां, वही पिता, वही भाई, वही बहन है, देश, मजदूर, किसान, भूख, गरीबी सब हो चुका है। बस गाया हर बार अलग-अलग तरीके से जा रहा है।

अभिषेक श्रीवास्तव: आप कहना चाह रहे हैं कि समाज स्थिर है, कहन मौलिक?

कुमार विश्वास: नहीं, मैं यह नहीं कह रहा हूं। आप शायद ऐसा समझना चाह रहे हैं।

अभिषेक श्रीवास्तव: अगर समाज डायनेमिक है और कहन बदल रही है, तो दिमाग में कुछ विचार तो होंगे न?

कुमार विश्वास: मैं योजना आयोग का अध्यक्ष नहीं, कवि हूं। इसलिए इसका कोटा-परमिट कैसे तय करूं?

अभिषेक श्रीवास्तव: क्या कवि की कोई जिम्मेदारी नहीं होती?

कुमार विश्वास: मैं अपनी जिम्मेदारियां समझता हूं। मैं निरा शब्दखोर ज्ञानचंद नहीं, कर्मचंद भी हूं।

आकाश नागर: आपकी कविता में किसानों का दर्द क्यों नहीं झलकता?

कुमार विश्वास: आपका दुर्भाग्य है कि आपने मेरी किसानों वाली कविता नहीं सुनी। किसान-आंदोलन से पहले ही मैं लिख चुका हूं, ‘कभी मत खेत छोड़ना ...’ मेरे पास तो इस विषय से जुड़ी ‘मुआवजा’ नाम की एक कहानी भी है, जिस पर मैं एक फिल्म बनाऊंगा। किसानों के लिए सड़क पर लड़ना, स्कॉच ठकोसते हुए गाल बजाने से बेहतर है।

आकाश नागर: आप अपनी कविता सुनाते हुए चौधरियों का मजाक उड़ाते हैं।

कुमार विश्वास: अगर ऐसा होता तो मैं चौधरियों का सबसे फेवरेट पोएट क्यों होता। मैं देशी बात करता हूं। आप कविता और संवाद का अंतर नहीं समझते और ‘पाखी’ कार्यालय में बैठे हैं। आश्चर्य है!

प्रेम भारद्वाज: आप ढाई घंटे में ढाई गीत सुनाते हैं, बाकी चुटकुले। आपको कवि माना जाए या चुटकुलेबाज?

कुमार विश्वास: मैं जिन लोग के बीच कविता पढ़ता हूं, उनका हिंदी साहित्य से दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं होता। आप हिंदी के किसी कवि से कहिए कि अपनी एक कविता भी चार हजार लोगों के बीच सुनाकर दिखाए। मैं अपने श्रोताओं को एंटरटेनमेंट से पोएट्री की तरफ ले जाता हूं। आपने तो हिंदी पांच सौ प्रतियां छापने वाली पत्रिकाओं तक निपटा कर रख दी है। अतुकांत कविता के नाम पर जो अनाचार फैला उससे हिंदी का पाठक ही अब कहां बचा?

अभिषेक श्रीवास्तव: आपको नागार्जुन, गोरख पांडेय याद नहीं आ रहे हैं?

प्रेम भारद्वाज: गोपाल सिंह नेपाली भी।

कुमार विश्वास: मुझे ये कवि आपसे ज्यादा याद हैं। निराला ने कहा मुक्त छंद में कविता लिख लीजिए। हमारे कई प्रतिभाशून्य कवियों ने समझा छंद मुक्त लिख लीजिए। आज उस तरह की हिंदी कविता के अधिकांश कवियों के पास पांच पाठक भी नहीं हैं- संपादक, टाइपिस्ट, प्रूफरीडर और कवि- मैं पूछता हूं पांचवां पाठक कहां है आपकी कविता का? आप अपनी खुद ही समीक्षा लिख लोगे, खुद ही निंदा कर लोगे, खुद ही प्रशंसा कर लोगे, खुद ही पुरस्कारों की समिति में हो जाओगे, खुद ही पुरस्कार ले लोगे। पाठक और लोक जाए भाड़ में।

अभिषेक श्रीवास्तव: मेरी यहां एक जिज्ञासा यह है कि दुनिया में सबसे ज्यादा जिस चीज को पढ़ा जाता है, वह पॉर्न है। दुनिया में सबसे ज्यादा जिस चीज को देखा जाता है, वह पॉर्न है। भारत में आपके जितने चाहने वाले हैं, सुनने वाले हैं, उनसे कहीं ज्यादा रेपिस्ट मानसिकता के लोग होंगे। ऐसे और उदाहारण भी दिए जा सकते हैं। कहने का मतलब यह है कि आपकी फैन फॉलोइंग से ज्यादा संख्या ऐसे लोगों की हो सकती है जिनके कृत्य सामान्य मानवता के खिलाफ हैं।

कुमार विश्वास: हनी सिंह की मुझसे ज्यादा फैन फॉलोइंग है।

अभिषेक श्रीवास्तव: उसे अभी हम बीच में नहीं ला रहे हैं। अभी आपके कंपटीटर्स को हम बीच में क्यों लाएं। मैं यह कहना चाह रहा हूं कि क्या श्रेष्ठता संख्या से तय होगी?

कुमार विश्वास: यह कुतर्क है। और आप जैसों की निजी कुंठा है।

अभिषेक श्रीवास्तव: यह तर्क है, कुंठा नहीं।

कुमार विश्वास: हिंदी कविता की तुलना आप पॉर्न से कर रहे हैं।

अभिषेक श्रीवास्तव: मैं संख्या की तुलना कर रहा हूं।

कुमार विश्वास: आप साइकिल और हवाई जहाज की तुलना कर रहे हैं। मेरी कविता में छंद दोष हो तो आप बताइए। दरअसल, आपका छोटापन कुछ बड़ा देखना नहीं चाहता।

अभिषेक श्रीवास्तव: छंद कविता की कोई बुनियादी समस्या नहीं है।

कुमार विश्वास: समस्या आपकी यह है कि आप समाज की मुख्य श्रोता/पाठक धारा से अस्वीकृत लोगों का समूह हैं। और इस पर आपको यह भी लगता है कि आप जो कह रहे हैं, वह अंतिम है।

प्रेम भारद्वाज: यह आरोप तो आप पर भी लग सकता है।

कुमार विश्वास: मैंने कविता लिखी है और मैं कवि हूं। मैं कविता लेकर जनता के बीच जाता हूं, वह उसे पसंद करती है। आपके यहां लोग कैसे छपते हैं, किस जुगाड़बाजी में छपते हैं, मैं सब जानता हूं।

अभिषेक श्रीवास्तव: आप जिन लोगों की आलोचना कर रहे हैं। कम से कम ये लोग अपनी कविताओं को कॉर्पोरेट क्राइम्स की बड़ी कंपनी प्रॉक्टर एन गैम्बेल से प्रायोजित तो नहीं करवाते हैं।

कुमार विश्वास: मैंने प्रायोजित नहीं करवाया, उन्होंने शो करवाया मैं चला गया। हिंदी लेखक भ्रष्टाचार पर कविता लिखते हैं और भ्रष्टाचारियों की नौकरी करते हैं, उनसे तो कोई कुछ नहीं कहता। वे पूंजीपतियों की, शोषकों की सरकारों में नौकरी करते हैं। मल्टीनेशनल के उत्पाद प्रयोग करते हैं। फेसबुक पर सर्जनारत महिलाओं से वर्जित संवाद करते हैं और ज्ञान, शुचिता, मौलिकता बघारते हैं।

अभिषेक श्रीवास्तव: वे क्या करते हैं, यह छोड़िए। आपके पास कोई विवेक है?

कुमार विश्वास: कॉर्पोरेट क्या इस देश का महत्वपूर्ण नागरिक नहीं है। अशोक वाजपेयी ने जीवन भर भ्रष्टाचारियों के नीचे काम किया है। मैंने पैसे लिए और कविता पढ़ी। कोई गुनाह नहीं किया। और वह भी उन समूहों के सार्वजनिक समारोहों मे। ‘पाखी’ और ‘हंस’ में जिनके विज्ञापन छपते हैं, उनका चरित्र प्रमाणपत्र आपने देखा है कभी?

अभिषेक श्रीवास्तव: मैं यहां यह सवाल इसलिए उठा रहा हूं क्योंकि आपकी वेबसाइट के नीचे प्रॉक्टर एन गैम्बेल का लोगो बना हुआ है। मैं यह जानना चाहता हूं कि क्या कोई भी कंपनी जो आपको पैसे देगी, चाहे वह भले ही दुनिया की सबसे बड़ी हत्यारी कंपनी हो, आप उसके लिए कविता पढ़ेंगे?

कुमार विश्वास: भारत में विधिक रूप से व्यापार कर रही कोई भी कंपनी जो कोई ऐसा प्रोडक्ट नहीं बनाती जो मेरी चेतना और शुचिता और दृष्टि के विरुद्ध हो, तो मैं उसके लिए कविता पढूंगा। सार्वजनिक जीवन में, संवैधानिक रूप से कार्यरत हर निकाय मेरा है।

अभिषेक श्रीवास्तव: आपकी दृष्टि कैसे तय होती है।

कुमार विश्वास: मेरी खुद की दृष्टि है, मेरी मर्जी होगी जाऊंगा, नहीं होगी नहीं जाऊंगा। मेरी दृष्टि विवेकशील है।

अविनाश मिश्र: पूरे संसार की आधुनिक कविता में छंद कहां बचा हुआ है?

कुमार विश्वास: छंद नहीं बचेगा तो सांस ही रुक जाएगी। सारे बड़े कवियों ने छंदबद्ध कविता लिखी है। हृदय पर, अपनी धमनियों पर हाथ रखकर देखिए वहां लय है। लय भंग हुई कि पहुंचे डॉक्टर के पास।

अभिषेक श्रीवास्तव: इस बीच आपने कौन-सा कविता-संग्रह पढ़ा?

कुमार विश्वास: मैंने नहीं पढ़ा, बहुत दिनों से। कविताएं पत्रिकाओं में पढ़ता ही रहता हूं।

अभिषेक श्रीवास्तव: आखिरी बार किस कविता ने आपको प्रभावित किया?

कुमार विश्वास: कइयों ने किया, मैं कोई नाम नहीं लेना चाहूंगा।

प्रेम भारद्वाज: इससे यह संदेश जा रहा है कि आपने शायद बहुत दिनों से नया कुछ भी नहीं पढ़ा है।

कुमार विश्वास: बिलकुल यह संदेश जाने दीजिए। इससे मेरा कोई नुकसान नहीं होगा। मेरी निजताएं आपके लिए विषय होंगी, मेरे लिए मेरी हैं।

अभिषेक श्रीवास्तव: आपको यह लगता है कि सारे सवालों के जवाब आप खुद हैं।

कुमार विश्वास: मैं क्यों किसी को कोई ऐसा जवाब दूं जिससे केवल उनका अभीष्ट हो।

अभिषेक श्रीवास्तव: हम लोग आपको एक लेखक मानकर बात कर रहे हैं।

कुमार विश्वास: यह आपकी दिक्कत है कि न चाहते हुए भी आपको ऐसा करना पड़ रहा है। आपकी रुचि हिंदी के विस्तार में मेरे अंकिचन प्रयास की कार्यपद्धति जानने की अपेक्षा, मुझे निरर्थक सिद्ध करने का अधिकार है। मुझे आपके इन ‘स्थानीय फतवों’ से कोई खास सरोकार नहीं।

गुंजन कुमार: आपने अभी कहा कि कांग्रेस के प्रति अरुचि का भाव बचपन से ही आप में था, और अन्ना का आंदोलन भी भ्रष्टाचार और कांग्रेस सरकार के खिलाफ था। आम आदमी पार्टी का जन्म भी भ्रष्टाचार और कांग्रेस सरकार के खिलाफ हुआ। इसके बावजूद दिल्ली में आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस के समर्थन से सरकार बनाई। क्यों?

कुमार विश्वास: पहली बात अन्ना आंदोलन कांग्रेस के खिलाफ नहीं था। वह भ्रष्टाचार के खिलाफ था। हमने भ्रष्ट मंत्रियों, नेताओं की सूची जारी की थी। उसमें बीजेपी के मुख्यमंत्री भी थे। दूसरी बात, सड़क पर चलता हुआ सामान्य आदमी यदि बोले कि आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस के समर्थन से सरकार बनाई थी तो समझ में आता है लेकिन एक पत्रकार जब यह सवाल करता है तो हम कहेंगे कि उसे राजनीतिक समझ नहीं है।

गुंजन कुमार: आप तर्क गढ़ रहे हैं कि आपने कांग्रेस के समर्थन से सरकार नहीं बनाई?

कुमार विश्वास: जिसे थोड़ी-सी भी राजनीतिक समझ है और लोकतांत्रिक व्यवस्था को जानता है, उसे पता होगा कि आम आदमी पार्टी ने दिल्ली में कांग्रेस के समर्थन से सरकार नहीं बनाई थी। दिल्ली में हमारी अल्पमत की सरकार बनी थी। हमने अपने पत्र में, जिसे मैंने ही ड्राफ्रट किया था, साफ-साफ लिखा था कि हमने बीजेपी और कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष को चिट्ठी लिखी है। हम अल्पमत में हैं। इसलिए सरकार नहीं बना सकते। लेकिन दिल्ली के विकास के लिए हमने दिल्ली वालों से 17 बिंदुओं पर समर्थन मांगा था। हम उन्हीं 17 बिंदुओं के साथ सदन में जाएंगे। जिसका इन 17 बिंदुओं में विश्वास है, वह सदन में हमारे साथ आ जाए, यदि इन पर कोई साथ नहीं देगा, हम बाहर आ जाएंगे। हमने तब अल्पमत की हुंकार के साथ दिल्ली में सरकार बनाई थी।

अपूर्व जोशी: आम चुनाव के बाद आप लोग एक और चिट्ठी लेकर उपराज्यपाल के पास गए। उसमें आग्रह था कि आप थोड़ा रुक जाएं। हम सरकार बनाने का प्रयास कर रहे हैं। वह चिट्ठी लीक हो गई तो फिर आप डिफेंस में आ गए। जब आप पहले कह चुके थे कि दिल्ली में सरकार बनाने की गुंजाइश खत्म हो चुकी है तो फिर आपने कैसे सरकार बनाने को लेकर उपराज्यपाल को चिट्ठी लिखी?

कुमार विश्वास: वह भी एक अल्पमत की सरकार बनाने की पुनः प्रक्रिया थी। यदि उपराज्यपाल इस पर सहमत होते तो फिर से अल्पमत की सरकार बनती। हालांकि मैं व्यक्तिगत तौर पर पार्टी में इससे असहमत था। मैं फिर से दिल्ली में पार्टी की सरकार बनाने के पक्ष में नहीं था। लोकसभा चुनाव तक एक अफवाह फैलाई गई कि ‘भाग गए, भाग गए’, तब पार्टी में इसे एड्रेस कैसे किया जाए, इस पर चर्चा हुई। फिर यह तय किया गया कि यदि उपराज्यपाल हमें 28 विधायकों के साथ सरकार बनाने का मौका दें तो हम अल्पमत की सरकार बनाएंगे।

अपूर्व जोशी: आपको किस आधार पर सरकार बनाने का मौका देते? कांग्रेस ने तो साफतौर पर कह दिया था कि किसी भी परिस्थिति में आपको समर्थन नहीं देंगे?

कुमार विश्वास: यह बात तो वे सदन में आकर कहें कि हम लोकपाल बिल पास नहीं करने देंगे।

अपूर्व जोशी: तब तो आपको भाजपा का विरोध नहीं करना चाहिए। वह तो सदन में संख्या बल के आधार पर आपसे बड़ी पार्टी भी है। आप भी सदन में आकर कहिएगा कि नहीं भाई यह भ्रष्ट हैं, हम इसे समर्थन नहीं देंगे। कांग्रेस भी भाजपा को भ्रष्ट पार्टी कहकर समर्थन नहीं देगी। सरकार अपने आप गिर जाएगी?

कुमार विश्वास: नहीं, वह हमारे एजेंडे पर नहीं है। हम तो अपना एजेंडा लागू करेंगे। हमने 17 वादों में से 15 पूरे कर दिए। दो और बचे हैं। सरकार बनी तो उन्हें भी पूरा कर देंगे।

अपूर्व जोशी: आपके एजेंडे पर उपराज्यपाल क्यों चलें? यदि वह आपके एजेंडे पर चलें तो बहुत अच्छे हैं। लेकिन अल्पमत की सरकार बनाने के लिए बीजेपी को आमंत्रित करते हैं तो वे मोदी के एजेंट हो गए?

कुमार विश्वास: क्योंकि इसी भारतीय जनता पार्टी ने लोकसभा चुनाव के पूर्व कहा था कि हम दिल्ली में सरकार नहीं बनाएंगे।

अपूर्व जोशी: आप बीजेपी के कहे पर क्यों जा रहे हैं? आप अपनी बात पर रहे न। यानी आम आदमी पार्टी जो कहे वहीं ईमानदारी और सब बेईमान?

कुमार विश्वास: वह इसलिए कि हमने पहले भी अल्पमत की सरकार बनाई थी। एक बार फिर अल्पमत की सरकार बनाना चाहते थे।

गुंजन कुमार: तो इसके लिए गुप्त पत्र ही क्यों? आम आदमी पार्टी तो जो करती है, खुलेआम करती है?

कुमार विश्वास: वह सिर्फ इसलिए कि हमें दूसरे पार्टी वालों ने भगोड़ा घोषित कर दिया था।

अपूर्व जोशी: आपको नहीं लगता कि आम आदमी पार्टी के नेतागण अति महत्वाकांक्षी हो गए थे, इसलिए दिल्ली वालों को धोखा दिया।

कुमार विश्वास: हो सकता है। मुझे लगता है और पार्टी के राजनीति विश्लेषकों को भी लगता है कि अरविंद केजरीवाल को सत्ता नहीं छोड़नी चाहिए थी। बाहर शोर मचता रहता, वह आराम से कुर्सी पर बैठे रहते।

प्रेम भारद्वाज: आपने क्यों सलाह नहीं दी?

कुमार विश्वास: हमने सलाह दी थी। तब अरविंद ने कहा कि हमें लोग क्या कहेंगे? लोकपाल बनाने गए थे। बनाया नहीं। तब मैंने कहा कि जब लोग पूछे तो कह देना भाजपा-कांग्रेस वालों ने समर्थन नहीं दिया। सरकार चलाओ। सुशासन दो। लोग तुम्हारे शासन से खुश हैं।

अपूर्व जोशी: आप अभी जो भी कहें, लेकिन आम चुनाव की घोषणा होते ही आपके हर कदम से लग रहा था कि सरकार गिराने के लिए आप आतुर हैं, चाहे वह अतिसंवेदनशील स्थान पर धरना-प्रदर्शन हो या लोकपाल। आपके कानून मंत्री सोमनाथ भारती दिल्ली पुलिस के एक अधिकारी को रेड डालने का दबाव डाल रहे थे, जबकि पुलिस के पास वारंट नहीं था। वह अधिकारी कितना भी भ्रष्ट रहा हो, लेकिन सबके सामने कानून मंत्री उस अधिकारी को गैरकानूनी काम करने का दबाव डाल रहे थे।

कुमार विश्वास: दिल्ली पुलिस के जिस एसीपी के पास वहां के स्थानीय लोगों ने 76 आवेदन दिए थे, उसे वारंट लेने की जरूरत नहीं हुई। दूसरी बात, आपको पूरी घटना की जानकारी नहीं है। कानून मंत्री ने एसीपी को कभी नहीं कहा कि आप घर में घुसो। वहां सरेआम गुंडागर्दी हो रही थी। वह सड़क पर गुंडों को पकड़ने को कह रहे थे। मेरा स्पष्ट कहना है कि गैरकानूनी काम नहीं करना चाहिए। चाहे वह सोमनाथ भारती हो चाहे कोई और हो।

आकाश नागर: आपके विधायक विनोद कुमार बिन्नी ने लोकसभा का टिकट मांगा था तब पार्टी ने कहा था कि किसी विधायक को टिकट नहीं दिया जाएगा। फिर भी आपने अपने विधायकों (राखी बिड़ला, अरविंद केजरीवाल) को टिकट दिया। यह दोहरी नीति क्यों?

कुमार विश्वास: राजनीति स्थिति और परिस्थिति के अनुरूप बदलती है। जिस समय बिन्नी ने टिकट मांगा था, तब पार्टी ने निर्णय किया था कि किसी विधायक को लोकसभा चुनाव नहीं लड़ाया जाएगा। लेकिन जब आम चुनाव की घोषणा हुई, तब पार्टी ने अरविंद और राखी को चुनाव लड़ाने का निर्णय लिया।

आकाश नागर: यानी आम आदमी पार्टी समय-समय पर अपना स्टैंड बदलती रहती है?

कुमार विश्वास: किसी पार्टी का स्टैंड वर्तमान परिस्थिति के मुताबिक ही होता है। आज कोई घटना होगी तो पार्टी मीटिंग कर अपना स्टैंड साफ करती है। आज हम कोई आंदोलन नहीं कर रहे। यदि आज कुछ होता है और उसमें आंदोलन करना जरूरी होता तो हम आंदोलन करेंगे। फिर आप कहेंगे कि आपने तो कहा था कि कोई आंदोलन नहीं करेंगे। फिर धरना-प्रदर्शन क्यों कर रहे हैं? राजनीति दैनिक क्रिया वस्तु है।

आकाश नागर: आम आदमी पार्टी हर बात पर सर्वे करती है। जनता से मिली राय पर चलती है। लेकिन त्यागपत्र देने के मुद्दे पर जब आप लोग उपराज्यपाल से मिले तो कोई सर्वे नहीं करवाया। क्यों?

कुमार विश्वास: हां, जब पार्टी ने सरकार से इस्तीफा दिया तो कोई सर्वे नहीं करवाया। सर्वे करने के बाद ही सरकार को इस्तीफा देना चाहिए था। यह हमारी गलती है। इसमें दिक्कत क्या है? इसे अरविंद केजरीवाल ने भी गलती मानी है। हमने जब सरकार छोड़ी तो दस दिन तक जनता के बीच जाना चाहिए था और जनता की राय पूछनी चाहिए थी यदि जनता कहती कि लोकपाल बिल गया एक तरफ, आप सरकार चलाओ तो अरविंद को सरकार चलानी चाहिए थी।

प्रेम भारद्वाज: आपको नहीं लगता कि आम आदमी पार्टी या पार्टी की सरकार वन मैन इंडस्ट्री हो गई थी? अरविंद जो चाहते थे, वह फैसला लेते थे?

कुमार विश्वास: मैं ऐसा नहीं मानता।

अवनीश मिश्र: कांग्रेस पार्टी जनता से जितने सालों तक जुड़ी रही, उससे कम दिनों तक ही आपकी सरकार चल पाई?

कुमार विश्वास: आज आम आदमी पार्टी की सरकार बने या न बने क्या फर्क पड़ता है हमें। आम आदमी पार्टी, कांग्रेस, भाजपा से हमें कोई फर्क नहीं पड़ता। इस देश की प्राइम समस्या को संबोधित करना मेरा उद्देश्य था। आज आप किसी समस्या को उठाएं तो मैं आपके साथ चल दूंगा। आम आदमी पार्टी बनने से पहले भी मैं किसी को वोट देता था। उसके पहले भी तो देश चलता था। आगे भी देश चलेगा।

आकाश नागर: अमेठी में हार की वजह क्या रही।

कुमार विश्वास: दिल्ली विधानसभा चुनाव के नतीजे के बाद पार्टी की तरफ से जंतर-मंतर पर धन्यवाद रैली के दौरान मनीष सिसौदिया ने अनायास अमेठी से चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया। मैं तो पार्टी में ही नहीं आना चाहता था। मैंने विधानसभा का चुनाव तक नहीं लड़ा। राखी बिड़ला की जीत में मेरा बड़ा योगदान रहा। उसकी जीत के लिए मैंने दिन-रात एक कर दिया। मैंने कहा था कि मैं पार्टी के बाहर ही रह कर अच्छे काम का समर्थन और बुरे काम की आलोचना करूंगा। लेकिन पार्टी के लोग कहने लगे कि आप केवल बड़ी-बड़ी बातें कर रहे हैं। वह चुनाव लड़ने का दबाव डालने लगे। तब मुझे इस राष्ट्रीय बोझ के विरुद्ध लड़ना चाहिए। अगर मैं अमेठी जाकर सिर्फ नॉमिनेशन भर कर वापस आ जाता तो भी 25 हजार वोट मिल जाते।

आकाश नागर: आपने भ्रष्टाचार को देशव्यापी मुद्दा बनाया। दिल्ली की सत्ता छोड़ने के बाद आपने देश भर में चुनाव लड़ा। फिर क्या वजह रही कि आपके सिर्फ चार सांसद चुनकर आए?

कुमार विश्वास: हमारे चारों सांसद पंजाब से जीतकर आए हैं। पंजाब में हमारी जीत का कारण रहा कि वहां दोनों सरकारें, केंद्र की कांग्रेस सरकार और पंजाब की भाजपा-अकाली गठबंधन सरकार से लोग परेशान थे। वहां हमारा प्रत्याशी चयन भी सही रहा।

गुंजन कुमार: तो क्या अन्य जगहों पर प्रत्याशी का चयन सही नहीं हुआ?

कुमार विश्वास: सभी प्रत्याशी सही चुने गए। जिन्होंने 75 हजार वोट पाए वह भी सही था। जो जीत गए, वे भी सही हैं। जिन्होंने एक लाख वोट पाए या पांच लाख या फिर कुछ हजार वोट ही क्यों हों, सभी प्रत्याशी सही थे।

गुंजन कुमार: ‘दि संडे पोस्ट’ ने आम चुनाव से एक माह पूर्व उत्तराखंड में एक सर्वे करवाया था। उसमें वहां आम आदमी पार्टी को भाजपा-कांग्रेस के विकल्प के रूप में लोग मान रहे थे। आज स्थिति उलट है। क्यों?

कुमार विश्वास: मैंने अमेठी से चुनाव लड़ा। चार महीने बहुत मेहनत की। इसके बावजूद हार गया। लेकिन मुझे इसकी कोई लज्जा नहीं है। लोगों ने राहुल को वोट दिया, वह जीत गए। मुझे लज्जा तब आती, जब मैंने अपने उद्योगपति मित्रों का पैसा पानी की तरह बहाया होता। शराब बंटवाई होता। दाढ़ी वाले मुल्लाओं को लेकर घूमता रहता। अपने नाम के आगे पंडित लगाकर जाति कार्ड खेलता। मैंने ऐसा कुछ नहीं किया। फिर भी लोगों ने मुझे कम वोट दिए। जहां तक उत्तराखंड में पार्टी की स्थिति की बात है तो मैं कहूंगा कि जो आप कह रहे हैं वह सही है तो पार्टी को इस पर चिंतन करना होगा।

अभिषेक श्रीवास्तव: आपने मुल्लाओं को लेकर नहीं घूमने या जाति आधारित राजनीति नहीं करने की सलाह अरविंद को नहीं दी थी?

कुमार विश्वास: मेरी उनसे कोई बात नहीं हुई थी। उनकी पहली रैली में सभी धर्मों के लोगों ने भाषण दिए या कार्यक्रम किए। इससे बात बराबर हो गई।

अभिषेक श्रीवास्तव: बनारस में उनकी रैली में मुस्लिम की ओर से शहर के मुफ़्ती थे। मुफ़्ती के समकक्ष हिंदू धर्म का कोई गुरु नहीं था?

कुमार विश्वास: काशी विद्यापीठ के छात्रें ने वेद पाठ किया। इसे आप नहीं मानते। उस रैली में सभी धर्म के लोगों का समर्थन भ्रष्टाचार के खिलाफ था, अरविंद ने यही संदेश दिया था।

अभिषेक श्रीवास्तव: हाल में आपने नरेंद्र मोदी की प्रशंसा की। इसके पीछे की क्या रणनीति है?

कुमार विश्वास: दरअसल, देश के तथाकाथित राजनीतिक विश्लेषकों को सकारात्मक राजनीति का अनुभव नहीं है। कुछ दिनों पहले मुलायम सिंह यादव से किसी ने पूछा था कि आप मोदी सरकार को सौ में से कितने नंबर देंगे? तो उन्होंने जवाब दिया जीरो तब फिर उनसे अगला सवाल पूछा गया कि उत्तर प्रदेश की अखिलेश सरकार को आप कितना नंबर देंगे? तो उन्होंने जवाब दिया, सौ में सौ। तो क्या मैं ऐसा हो जाऊं। मेरे अंदर एक भावुक आदमी है। मैं एक चेतना-संपन्न व्यक्ति हूं। मैं सही-गलत का आकलन कर सकता हूं। इसलिए सही को सही और गलत को गलत कहता हूं।

प्रेम भारद्वाज: तो आप मोदी के अब तक के कार्यकाल को सौ में से कितने नबंर देंगे?

कुमार विश्वास: मैं नंबर नहीं दूंगा। मैंने समय-समय पर उनके कामों पर टिप्पणी की है। मोदी जापान गए। मैंने उनकी प्रशंसा की। लेकिन चुमार में चीनी सेना की घुसपैठ हुई, वह शालीन बने रहे। मैंने फेसबुक पर तीखा प्रहार किया। मैं नंबर नहीं दूंगा। उनके कामों पर बोलूंगा।

प्रेम भारद्वाज: आप शिक्षक रहे हैं नंबर तो देने चाहिए?

कुमार विश्वास: नहीं दे सकता। हम अभी उनके अब तक के कार्यकाल की समीक्षा नहीं कर सकते। उन्हें 60 माह के लिए जनादेश मिला है। यह जनादेश न मैंने दिया है, न आपने दिया है। देश की जनता ने दिया है। पांच साल तक उन्हें सरकार चलाने दीजिए। नहीं तो यह जनादेश का अपमान होगा। उनके गलत कामों की मैं आलोचना करता रहूंगा।

अभिषेक श्रीवास्तव: उनको साठ माह का जनादेश दिलवाने में आपकी पार्टी की भूमिका रही है?

कुमार विश्वास: हमारी पार्टी का इसमें कोई योगदान नहीं है। आम आदमी पार्टी ने उनको जनादेश दिलाने में कोई भूमिका नहीं निभाई। जहां भी भ्रष्टाचार हुआ, हमने आंदोलन किया। मध्य प्रदेश में खनिज घोटाला हुआ। हमने आंदोलन किया। हमने सीबीआई जांच की मांग की, शिवराज सिंह चौहान को सीबीआई जांच करानी पड़ी।

अभिषेक श्रीवास्तव: मेरा यह कहना है कि आपने भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाया। उस समय केंद्र में कांग्रेसनीत सरकार थी। लोगों में सरकार यानी कांग्रेस के प्रति गुस्सा हुआ। हो सकता है आपकी इस पर समीक्षा अलग हो, लेकिन लोगों के उस गुस्से का नतीजा उल्टा हुआ। आपके बजाय भाजपा को जनादेश मिला?

कुमार विश्वास: हो जाए। हम क्या कर सकते हैं?

अभिषेक श्रीवास्तव: आपको भाजपा या कांग्रेस की सरकार आने से कोई फर्क नहीं पड़ता?

कुमार विश्वास: मैं राष्ट्रीयता-बोध से भरा हुआ आदमी हूं।

अभिषेक श्रीवास्तव: राष्ट्रवादी तो मोदी भी हैं?

कुमार विश्वास: वह हिंदू राष्ट्रवादी हैं। मैं राष्ट्रवादी हिंदू हूं। वह (मोदी) कहते हैं, मैं पहले हिंदू हूं, फिर राष्ट्रवादी हूं। मैं कुमार विश्वास कहता हूं कि मैं पहले राष्ट्रवादी हूं, तब हिंदू हूं।

अविनाश मिश्र: दोनों एक ही बातें हैं?

कुमार विश्वास: हिंदू राष्ट्रवादी और राष्ट्रवादी हिंदू दोनों बिलकुल एक नहीं हैं। आपके कहने से थोड़े कुछ होगा। मैं कह रहा हूं कि मैं पहले राष्ट्रवादी हूं। यदि आज देश की सामरिक सुरक्षा मेरे हिंदू होने से प्रभावित होगी तो मैं हिंदू धर्म छोड़ दूंगा। मैं बिना धर्म के रह सकता हूं। मेरे लिए देश पहले है।

अविनाश मिश्र: यानी आप कहीं टिके हुए नहीं हैं? आप जिधर की बयार बहते देखते हैं, उधर चल देते हैं?

कुमार विश्वास: इसमें टिकने की क्या बात है। इसमें अपनी समझ के प्रति प्रतिबद्धता है उलटे। पर आप प्रयास न करें, आपके लिए अलभ्य है। अभी मोदी की बयार बह रही है तो मुझे मोदी के साथ हो जाना चाहिए? मैंने लद्दाख में चीनी सेना की घुसपैठ पर मोदी की करनी और बोली में अंतर को ट्वीट कर उजागर किया। मैं इस मुद्दे पर मोदी के साथ खड़ा नहीं हूं। यह क्या है?

अभिषेक श्रीवास्तव: कुल-मिलाकर अब तक की सारी बातचीत का लब्बोलुआब यही निकला कि आप प्रेम के कवि हैं। इन दिनों दक्षिणपंथी ताकतें प्रेम को शिकार बनाने में लगी हुई हैं। दो धर्मों के लोगों के प्रेम पर पहरा लगाकर, इसे चुनावी मुद्दा भी बनाया जा रहा है। यह विषय आपके केंद्रीय विषय से ताल्लुक रखता है, इसलिए मैं जानना चाहता हूं कि क्या आपने इस पर कुछ लिखा है?

कुमार विश्वास: मैंने इस पर कोई कविता नहीं लिखी। लेकिन मैं यह कहना चाहूंगा कि ऐसे सवालों को एड्रेस ही नहीं करना चाहिए जिनकी कोई जमीन नहीं होती। एक उदाहरण के लिए महाराष्ट्र का 25 हजार प्रतियों के प्रसार वाला एक अखबार है ‘सामना’, जिसे शिवसेना के कॉडर के सिवाय और कोई नहीं पढ़ता। उसके जहरबुझे पन्नों पर हमारे न्यूज चैनल्स एक-एक घंटे का कार्यक्रम करते हैं। तो ज्यादा जहर किसने फैलाया? मैं जहर की वकालत नहीं करता बल्कि मैं ज्यादा प्रेम डालता हूं, समाज में नफरत खुद-ब-खुद डायल्यूट हो जाती है।

अभिषेक श्रीवास्तव: आप लंबी लकीर खींच रहे हैं?

कुमार विश्वास: मेरी एक कविता की पंक्तियां हैं, ‘हमने दुनिया में मोहब्बत का असर जिंदा किया है/ हमने दुश्मन को गले मिल-मिलकर शर्मिंदा किया है ...।’ मेरी एक कविता से एक टिप्पणी उड़ाकर मुसलमानों को मेरे खिलाफ भड़काया गया। उनकी जो प्रेस कॉन्फ्रेंस हो रही थी, मैं उसमें ही चला गया। मैंने कहा, जनाब मैंने एक चुटकुला सुनाया था, उसको भी संपादित कर दिया। सब सुनाते रहे हैं। यह अगर कोई अपराध है तो मैं आपसे माफी मांग लेता हूं। अगर आपको लगता कि मेरी हत्या से आपको आनंद मिलेगा तो मुझे मार दीजिएगा। लेकिन यह चुटकुला मुझसे पहले भी कई लोगों ने सुना रखा है, बल्कि सब कवियों ने कमोबेश सुनाया ही है। लेकिन चूंकि सुरेंद्र शर्मा हरियाणा साहित्य अकादमी के अध्यक्ष हैं, उन्होंने लालबत्ती ले रखी है, चूंकि अशोक चक्रधर हिंदी अकादमी, दिल्ली के अध्यक्ष हैं, लालबत्ती ले रखी है और कपिल सिब्बल की कविताओं का अंग्रेजी से हिंदी में छायानुवाद करते हैं, इसलिए उन पर कोई नहीं बोलेगा, लेकिन कुमार विश्वास लड़ाका है और भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ रहा है, उसके खिलाफ ये बोलेंगे।

अभिषेक श्रीवास्तव: हिंदी अकादमी के कार्यक्रमों में तो आप भी जाते हैं।

कुमार विश्वास: आज तक मैं हिंदी अकादमी के दफ्तर तक नहीं गया। कार्यक्रम की तो क्या।

अभिषेक श्रीवास्तव: उसके एक आयोजन के आमंत्रण-पत्र में आपका नाम था।

कुमार विश्वास: सान्निध्य होगा। हिंदी अकादमी के सचिव मेरे घर आए, कहा कि अध्यक्षता कर दो, मैंने कहा कि नहीं। बोले, दीप-प्रज्जवलन कर दो, मैंने कहा कि नहीं करूंगा। कहा, स्वागत भाषण दे दीजिए, मैंने कहा कि नहीं दूंगा। बोले आप कविता पढ़ दीजिए, मैंने कहा कि नहीं पढूंगा। बोले आप सुनने आ जाएं। मैंने कहा कि आ जाऊंगा। उन्होंने मेरा नाम कार्ड पर सान्निध्य में डाल दिया। हारुन युसुफ एमएलए का भी नाम था कार्ड पर। उनके नाम पर तो किसी को दश्त नहीं हुए? फिर भी मैं तो नहीं गया, क्योंकि फिर मुझे कविता पढ़नी ही पड़ती। क्योंकि जब 32 कवि खड़े होकर बीच-बीच में कहेंगे कि कुमार विश्वास बीच में बैठे हैं और जनता हल्ला मचाएगी तो मुझे कविता पढ़नी ही पड़ेगी।

अभिषेक श्रीवास्तव: आपकी रचना-प्रक्रिया क्या है?

कुमार विश्वास: मेरी रचना-प्रक्रिया संवेदना के स्फुल्लिंग से जुड़ी हुई है। जो सौभाग्य से आका-डमियों, छद्मश्रीयों और छपास की कुंठा के नीचे नहीं दबी है।


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