'और सिर्फ तितली' प्रदीप सौरभ के शीघ्र प्रकाश्य उपन्यास का अंश | Pradeep Saurabh ke Hindi Upanyas 'Aur Sirf Titli' ka Ansh

Pradeep Saurabh ke Hindi Upanyas 'Aur Sirf Titli' ka Ansh

सुधीश पचौरी...

प्रदीप सौरभ का  नया उपन्यास ‘और सिर्फ तितली’, पब्लिक स्कूली शिक्षा के भीतरी परतों को एक-एक कर खोलते हुए पब्लिक स्कूली शिक्षा जगत के अंदर की  खुशबू और सड़ांध को कुछ इस तरह पेश करता है कि आप पहली बार इस अनजाने अनकहे जगत के समक्ष खड़े हो जाते हैं और अपने आप से पूछने लगते हैं कि आखिर वे क्या कारण हैं जिनके चलते हमारी स्कूली शिक्षा और शिक्षण पद्धति अपनी सारी चमक-दमक और दावों के, इस कदर खोखली और संस्कार विहीन हो चली है?
छोटे-छोटे बच्चों की मासूमियत, उनकी जिज्ञासाएं, उनकी ज्ञान-पिपासा, उनका सोच-विचार, उनकी रचनात्मकता, उनका साहस उनकी प्रयोग-प्रियता किस तरह से कुंठित होती जाती है? किस तरह से सुयोग्य, अच्छे और गुणी अघ्यापक और अघ्यापिकाएं अपने संस्थान के प्रबंधन की दोहन एवं शोषणनीति के चलते उत्साह विहीन होते जाते हें। किस तरह से उनका शोषण किया जाता है. किस तरह वे आपसी मनमुटाव, टुच्ची  गुटबाजी भरी राजनीति के चलते अपने सपनों को चकनाचूर होते देख मनोरोगों तक के शिकार होते रहते हैं? और किस तरह  शिक्षा के इस महंगे तिलिस्म का कोई तोड नहीं है? और अगर कोई उसे तोड़ने की कोशिश करता है तो उसका क्या हश्र क्या होता है, इन्हीं तमाम पहलुओं पर यह उपन्यास दिलचस्प शैली में रौशनी डालता है ।
उपन्यास की खासियत यह है कि आप उसे एक ही सिटिंग में पढ़ते चले जा सकते हैं. यही प्रदीप सौरभ की कथा-कलम की विशेषता है। 
तमाम जद्दोजेहद के बाद भी उसे ब्‍वाय फ्रेंड नहीं मिल रहा था। और वह बेकाबू हो गई थी। अपनी इन्द्रियों पर उसका नियंत्रण रह-रह कर छूट जाता था। इस सबके बाद भी वह बच्‍चों के साथ अच्‍छा व्‍यवहार करती थी। तान्‍या मैम की क्‍लास के रितेश को वह बहुत प्‍यार करती थी। रितेश की उम्र सात साल होगी। शरीर से भरा-भरा था। मंद बु‍द्धि उसे नहीं कहा जा सकता था। थोड़ा ढीला ढाला जरूर था। हर चीज से बेरपवाह। हर बात पर देर से रिएक्‍ट करने वाला। पैसे वाले घर का लड़का था। उसे लेने और छोड़ने सोफर ड्रवेन ऑडी लेने आती थी। 

शीघ्र प्रकाश्य उपन्यास 'और सिर्फ तितली' का अंश

प्रदीप सौरभ


वह शायद तितली ही थी। तितली जैसी खूबसूरत। तितली की ही तरह उड़ती थी। कभी इधर फुदक कर बैठती तो कभी उधर। रंग-बिरंगी तितलियों जैसे ही उसके सपने रंग-बिरंगें थे। सपने थे कि उससे कई बार रूठे, लेकिन उसने तितली जैसी अपनी सोच नहीं बदली। तितली तो ऊंची उड़ान भर नहीं  सकती थी। लेकिन उसके सपनों में ऊंची उडा़ने आती थीं। उड़ने के लिए वह कई बार तितली से चील बन जाती थी। घोसले से अपना निवाला खींच लाने वाली शिकारी निगाहों के साथ। असल में वह चील बनना नहीं चाहती थी। वह तितली ही रहना चाहती थी। दमकते और महकते रंग-बिरंगे फूलों के बगीचों को ही अपना रैन बसेरा बनाना चाहती थी। ले‍किन उसे तितली नहीं रहने दिया गया और वह चील बन गई। दिलचस्‍प यह था कि उसने चील के गुणों को अपनाया दुर्गणों को नहीं। चील की तरह कभी उसने अपने भाई-बंधुओं को अपना निवाला नहीं बनाया। कई बार उसे इस बात पर असमंजस भी होता था कि आखिर वह चील है या कि तितली। इस द्वंद्व के बावजूद वह चील में तितली बनी रही। तितली। सिर्फ तितली।

     उस दिन की सुबह कुछ अजीब सी थी। सोफिया स्‍कूल की हवा में उदासी भी थी और खुशी का आलम भी। जनवरी के दिन थे। सूरज तो पूरब से निकला था। लेकिन कोहरे के बीच में उसकी चमक धुंधला सी गई थी। किरणें तो उससे फूटी थीं लेकिन बादलों को चीरने का उनमें शायद माद्दा नहीं था। घंटी बज चुकी थी। एसेम्‍बली के लिए बच्‍चे मैदान में एकत्रित हो गए थे। अधिकांश बच्‍चों ने अपने वजन से अधिक ऊनी कपडे़ पहन रखे थे। कुछेक बच्‍चों के पास ठंड से लड़ने वाले पर्याप्‍त स्‍वेटर और जैकेट नहीं थे। ऐसे बच्‍चों के गालों पर गुलाबी चमक साफ दिख रही थी। शायद ठंड से उनके गाल जल गए थे। वे दांत किटकिटाकर ठंड से लड़ने की अधूरी लडा़ई लड़ रहे थे। कहने को तो सोफिया स्‍कूल इंटरनेशनल स्‍कूल था। लेकिन गरीब बच्‍चों को यहां दलितों की ही तरह देखा जाता था। स्‍कूल में ये बच्‍चे कोढ़ में खाज की तरह थे। स्‍कूल मैनेजमेंट को गरीब बच्‍चों को लेना अनिवार्य था, क्‍योंकि वे सरकारी जमीनों में बने थे और तमाम अनाप-सनाप सुविधाएं लेते थे। लेकिन मैनेजमेंट गरीब कोटे से आने वाले छात्रों के साथ वह हर बदसलूकी करता था, जिससे वह अपनानित हों और खीज कर घर बैठ जाएं। कई बच्‍चे तो घर बैठ भी जाते थे। लेकिन कुछ बच्‍चे पूरी ढिठाई के साथ जमे रहते थे। वे यह मान लेते थे कि अच्‍छे स्‍कूल में पढ़ने के लिए यदि वे पैसे नहीं दे सकते हैं तो उन्‍हें अपमान से उसकी कीमत चुकानी ही होगी। ऐसे ही बच्‍चों में एक था उदय प्रकाश।

     बात छूट न जाए खुशी और उदासी की। असल में उस दिन बच्‍चों को अपने मन का ब्रेकफास्‍ट लाने की उनकी तान्‍या मैम ने छूट दी थी। वजह थी उनका क्‍लास में आखिरी दिन होना। स्‍कूल में घर से खाने-पीने का सामान लाने की मनाही थी। स्‍कूल में ही उन्‍हें कांटीनेंटल से लेकर देसी हर तरह का खाना-नाश्‍ता मिलता था। खाने के नाम पर मैनेजमेंट मोटी फीस वसूलता था। उस दिन सैंडविचेस, चिप्‍स, चाकलेट, केक्‍स, पास्‍ता वगैरह-वगैरह सब कुछ मेनू में था। सबकी अपनी-अपनी पसंद का। यहां बात जरूर बता देना चाहिए कि गरीब बच्‍चों के हिस्‍से स्‍कूल से मिलने वाले खाने का एक टुकडा़ भी नहीं आता था। वे अपनी रूखी-सूखी घर से लाते थे। बच्‍चों के लिए दुख की बात यह थी कि अब अगली क्‍लास में उनकी तान्‍या मैम उनके साथ नहीं रहेंगी। इसलिए बच्‍चों के चेहरों में एक अजब सी उदासी थी। पहली कक्षा के इतने छोटे बच्‍चे भी सामूहिक रूप से उदास हो सकते हैं किसी के लिए, यह यहां देखने की बात थी। उदासी और खुशी के बीच क्‍लास रूम में जबर्दस्‍त पार्टी हुई। सबने मिलकर खाया-पीया। नो लडा़ई-झगडा़। पार्टी के बाद सभी बच्‍चे स्‍कूल बस में बैठ कर स्‍पोर्ट कामप्‍लेक्‍स गए। वहां फोटो सेशन होना था। बस में सभी बच्‍चे तान्‍या मैम के साथ सीट साझा करना चाहते थे। लेकिन तान्‍या मैम तो अकेली थी सबके साथ बैठ नहीं सकती थीं। बच्‍चे आपस में तान्‍या मैम के साथ बैठने के लिए बस में गुत्‍थम-गुत्‍था हो गए। तभी तान्‍या मैम जोर से चीखीं- ' तुम सब इस तरह से करोगे तो मैं बस से उतर जाऊंगी और फोटो भी नहीं खिचवाऊंगी।'

     इस चीख के साथ ही बच्‍चे एक-एक करके अपनी सीटों में चुपचाप जा बैठे। तान्‍या मैम ने तय किया कि वह सारन्‍या के साथ बैठेंगी। सारन्‍या तान्‍या मैम पर अपना अधिकार समझती थी। तान्‍या की असल चेप थी सारन्‍या। जहां-जहां तान्‍या मैम वहां-वहां सारन्‍या। अपनी छोटी से छोटी बात वह तान्‍या मैम को बता देती थी। सारन्‍या देखने में भी बिल्‍कुल गुड़िया सी थी। तान्‍या मैम भी किसी गुड़िया से कम नहीं लगती थीं। छोटे कद की गोल-मटोल। खिला-खिला रंग। गालों में डिंपल। और काटन के रंग-बिरंगे एथनिक कपड़ों की शौकीन। टिच-विच रहने वाली। दिल्‍ली में यह उनके करियर की पहली नौकरी थी। उनकी उम्र कोई ज्‍यादा नहीं थी। स्‍कूल में सभी टीचर उन्‍हें बच्‍चा टीचर समझते थे। वजह थी कि अधिकांश टीचरों की उम्र चालीस के आसपास थी या फिर उससे ज्‍यादा। उपदेश देना तो उनका बनता था। कुछ अधेड़ टीचरें भी थीं, जो शायद टीचिंग को नौकरी से ज्‍यादा कुछ नहीं समझती थीं। कम उम्र की होने के चलते हर टीचर तान्‍या मैम को  उपदेश दे कर चलते बनता था। वैसे थी वह बेहद होशियार । मौके की नजाकत के चलते ही वह टीचरों के मुंह नहीं लगती थी। वह तर्कों के साथ पलटवार कर सकती थी, लेकिन नौकरी कच्‍ची होने के चलते वह ऐसा नहीं करती थी।  वैसे वह चाह ले तो किसी की भी ऐसी-तैसी करने में पूरी सक्षम थी। अतीत के कारनामे उनके बेहद हेरतंगेज और खतरनाक रहे हैं। उनके कारनामों पर आगे कहीं।

     सारन्‍या को किसी ने कभी चुप बैठे नहीं देखा था। चुलबुली। शैतानों की नानी। उस दिन वह तान्‍या मैम के पास बस चलने के बाद काफी देर तक चुप बैठी रही। मौका देख कर उसने तान्‍या मैम के गालों में हाथ फेरते हुए हवा में एक किस उछाल दिया। फिर धीरे से बोली- ' मैम आप गुस्‍सा न करो तो मैं एप्‍पल जूस पी लूं।'

     इतनी प्‍यारी रिक्‍वेस्‍ट के आगे तान्‍या मैम न ना कर सकीं। उन्‍होंने हां में अपना सिर हिला दिया। तान्‍या ने अपने बैग से एप्‍पल जूस निकाला और चोरी-चोरी शिप करने लगी। बस के दूसरी ओर सीट पर बैठी सुप्रिया गुलाटी को यह नागुजार लगा। वह अंदर से सुलग उठी। वैसे तो वह तत्‍कालिक प्रतिक्रिया दे सकती थी। लेकिन बात को मन में लेकर बैठ गई। ऐसे मामलों में वह किसी की परवाह नहीं करती थी। एक बार तो उसने स्‍कूल की एकेडमिक हेड इशीता पास्‍ता को पेपर वेट खींच कर मार दिया था। उस इशीता पास्‍ता को जिससे पूरा स्‍कूल थरथराता है। उनका गुनाह सिर्फ इतना था कि उन्‍होंने अपने आफिस में सुप्रिया के गाल प्‍यार से थपथपा दिए थे।

     बस स्‍पोर्टस कामप्‍लेक्‍स पहुंच चुकी थी। मैडम  तान्‍या सबसे पहले बस से नीचे उतरी और एक-एक कर बच्‍चों को उतारने लगीं। तभी सारन्‍या अपने नन्‍हें हाथों में अपना और मैडम का बैग लिए उतरी। तिरछी नजरों से उसने पहले मैडम को देखा। कुछ-कुछ तुतलाते हुए लाड़ से बोली- ' आप भी मैम कितनी भुलक्‍कड़ हो कि अपना बैग ही सीट पर छोड़ आईं। अगर मैं न होती तो बैग कोई चुरा लेता।' 

     इस पर तान्‍या मैम मुस्‍करा दीं और उसके नन्‍हे हाथों से उन्‍होंने बैग ले ‍लिया। सारन्‍या की इस अदा पर तान्‍या मैम को दुलार आ गया और उन्‍होंने उसे गोद में उठा लिया। सारन्‍या को मैम की गोद में देख कर सुप्रिया अंदर से भभक पड़ी। वह कुछ हरकत करती की उससे पहले सारे बच्‍चे फोटो सेशन के लिए कामप्‍लेक्‍स में बने एक स्‍टेज पर की ओर बढ़ गए। तान्‍या मैम ने लंबाई के हिसाब से बच्‍चों का जमाना शुरू किया, ताकि किसी बच्‍चे का फोटो में चेहरा न छिप जाए। सुप्रिया की लंबाई कुछ बच्‍चों से ज्‍यादा थी। नतीजतन उसे दूसरी पंक्ति में दाहिने ओर जगह मिली। उसने देखा कि मैम की चहेती सारन्‍या पहली पंक्ति में बीचों बीच खड़ी है। अब सुप्रिया के गुस्‍से की कोई सीमा नहीं रही। वैसे भी कोई कैसे सोचता है, क्‍या करता है, क्‍या बोलता है, वह इन सबसे बेपरवाह थी। वह क्‍लास में भी अकेले रहने वाली लड़की थी। दूसरे बच्‍चे उससे दूरी बना कर ही चलते थे। वह आवाज, सुंगध, स्‍पर्श, प्‍यार, घूरने आदि किसी बात पर रिएक्‍ट कर सकती थी। उसे दुनिया के हर शख्‍स से संवाद में मुश्किल होती थी। अपने माता-पिता से भी। उसकी अपनी दुनिया थी या फिर यूं कहा जा सकता है कि वह उसमें बचपन से जकडी़ हुई थी। असल में सुप्रिया आटिज्‍म नामक बीमारी से ग्रस्‍त थी। आटिज्‍म एक प्रकार का न्‍यूरो बिहैविरल डिसआर्डर है। इसके लक्षण तीन-चार साल की उम्र से दिखने लगते है। आसपास के बच्‍चे जब खेलकूद में लगे रहते थे, तो सुप्रिया अपनी दुनिया में खोई रहती थी। उसे खिलौनों से भी नफरत थी। उसने कीमती से कीमती खिलौनों को कबाड़ बना दिया था।

     सुप्रिया को असमाजिकता का दौरा पडा़। वह अपने से बाहर हो गई। पंक्ति को तोड़ते हुए वह सीधे फोटोग्राफर के पास पहुंची और उसके कैमरे की बेल्‍ट से लटक गई। वैसे तान्‍या मैम और बच्‍चे उसकी ऐसी हरकतों से वाकिफ थे, तो तमाशा को सबने तमाशा न समझा। तान्‍या मैम सारन्‍या की ही तरह सुप्रिया का भी बहुत ख्‍याल रखती थी। उन्‍होंने सुप्रिया को काबू करने की कोशिश की, लेकिन वह काबू नहीं हुई। अंतत: वह फोटो शूट में शामिल नहीं हुई। उसके बिना ही फोटो शूट हुआ। तान्‍या मैम को इस बात से बहुत दुख हुआ। वह स्‍कूल लौटते हुए बस से लेकर क्‍लास तक उसके साथ रहीं। उसे दुलारा-पुचकारा। वह तब जा कर शांत हुई, जब तान्‍या मैम ने सायोना के कैमरे उसे उसके साथ फोटो खिंचवाई।

     लंच ब्रेक की घंटी बज चुकी थी। पार्टी तो पहले ही हो चुकी थी, तो सबके पेट फुल थे। बच्‍चे अपने-अपने कैमरे से मैम के साथ फोटो खिंचवाने लगे। तभी उदय प्रकाश ने अपने टिफिन से केक का एक टुकडा़ निकाला। बीते कल उसका जन्‍मदिन था। वैसे तो हर बच्‍चे के जन्‍मदिन पर क्‍लास में हैप्‍पी बर्थडे मनाया जाता था। जिस बच्‍चे का जन्‍मदिन होता था, वह बच्‍चा अपने घर से सबके लिए कुछ न कुछ गिफट लाता था। और केक भी कटता था। लेकिन उदय प्रकाश के पिता के पास इतने पैसे नहीं थे कि वह क्‍लास की इस रस्‍म को पूरा कर सकते। वे एक सामान्‍य से चौकीदार की नौकरी करते थे और कल्‍लन साहब की कोठी के आउट हाउस मे रहते थे। कल्‍लन साहब नेक दिल इंसान थे। उन्‍हीं की बदौलत उदय प्रकाश को सोफिया इंटरनेशनल में एडमीशन मिल गया था। पिता तो पिता ठहरे। वे उदय प्रकाश का मन नहीं दुखाना चाहते थे। इसीलिए उन्‍होंने उदय प्रकाश का मन रखने के लिए अपने घर में ही एक छोटा सा केक कटवा दिया था, ताकि उसे दुख न हो। उसी केक का एक टुकड़ा वह अपनी गुरू मैम के लिए लाया था। शायद गुरू दक्षिणा के तौर पर। सहमे हुए उसने केक का टुकड़ा मैम की तरफ यह कहते हुए बढ़ाया- ' मैम इंकार मत करियेगा। बडे़ दिल से लाया हूं। कल मेरा जन्‍मदिन था। खाने से इंकार करेंगी तो मैं तो नाराज नहीं होऊंगा ये केक नाराज हो जायेगा।'

     तान्‍या मैम इमोशनल हो गईं उसकी इस बात पर। उन्‍होंने कहा- ' ये तो मैं खा ही लूंगी पर तुमने कल क्‍यों नहीं बताया कि तुम्‍हारा जन्‍मदिन था। हम सब मिलकर मनाते। चलो कोई बात नहीं आज हम से‍लीब्रेट करेंगे तुम्‍हारा जन्‍मदिन। बिलेटेड़ हैप्‍पी बर्थ डे।'    

     प्‍यार भरी फटकार उदय प्रकाश को सुनाने के बाद तान्‍या मैम ने कैंटीन से सैंड़विच और चाकलेट मंगवाए। और धूमधाम से उदय प्रकाश का जन्‍मदिन मनाया। जो बच्‍चे उदय प्रकाश को अपने से अलग मानते थे, उन्‍होंने भी उसे विश किया। असल में इस तरह के स्‍कूलों में नव कुबेर के बच्‍चे पढ़ते हैं। उनकी दुनिया अमीरी और गरीबी में बंटी होती है। उनके विकास की पहली अंतिम शर्त भेदभाव होती है। ऐसा उनके परिवार के लोग सिखाते हैं। ऐसी बात उन्‍हें सिखाई जाती है, जो उनके निश्‍छल मन में होती ही नहीं है। ये गंदा है वो गंदा है, यहां से चीजें शुरू होती है। तान्‍या मैम ने उनके मनों में उदय प्रकाश के प्रति हमदर्दी पैदा करके इस खाई को पाटने की कोशिश की। लेकिन वे जिस समाज में रहते हैं, क्‍या वे इस सबक को याद रख पायेंगे। याद रखने की कोशिश भी करें ये तो भी शायद ये ज्ञान की ऊंची इंटरनेशनल दुकानें उन्‍हें ऐसा न करने दें।  आखिर गंदा है पर धंधा जो ठहरा।

     अब विदाई का समय आ गया था। बच्‍चों को पता था कि उनका आज इस क्‍लास में आखिरी दिन है। तान्‍या मैम अब अगले क्‍लास में उन्‍हें नहीं मिलने वाली हैं। बच्‍चों की आंखें भर आईं थीं। नंदनी ने तान्‍या मैम को अपने हाथों से बनाया एक चित्र भेंट किया। उस चित्र में रंग बिरंगें फूल थे। उसमें एक तितली भी थी। उसमें लिखा था- ' आई लव यू तान्‍या मैम।'

     तान्‍या मैम भावुक हो उठीं। तभी पूजा मैम के साथ अपनी फोटो खिंचवाने में लग गई। पूजा ने नंदनी से कहा- 'आओ तुम्‍हारी भी मैम के साथ एक फोटो खींच देते हैं।' इस पर नंदनी इतराते हुए बोली- ' मैम की फोटो तो मेरे दिल में रहती है। तू ही फोटो खिचवा ले।'

     बच्‍चे तान्‍या मैम को घेर कर खडे़ हो गए। तभी अपनी आदत से विपरीत सुप्रिया तान्‍या मैम के पास आई और उनका कुर्ता पकड़ कर रोने लगी। तान्‍या मैम के भी आंसू छलक आए। दूर खडे़ जान, सैम, पिंकी और राइसा मैम से चिपक कर रोने लगे। इसी बीच सारन्‍या ने रोते हुए तान्‍या मैम से कहा- ' मैम आप मत रो। हम रोज आपसे मिलने आयेंगे।'

     आंखों में आंसू भरे तान्‍या मैम अपने अतीत में पहुंच गईं। उन्‍हें स्‍कूल में बिताए एक-एक दिन और एक घटना याद आने लगी। वह अतीत में डूबने उतराने लगीं।

     तान्‍या को याद आने लगा स्‍कूल का वह पहला दिन। गर्मी के दिन थे। सूरज आसमान के ठीक बीचों बीच स्थिर था और आग बरसा रहा था। हवा में भी काफी तपिश थी। आंधी तो नहीं कहेंगे, लेकिन तेज हवाएं चल रही थीं। स्‍कूल परिसर में लगे पेड़ हवा के झोकों के साथ डांस कर रहे थे। उनसे गिरे सूखे पत्‍ते पतंग की तरह इधर-उधर तैर रहे थे। गर्म हवा से बचने के लिए सिक्‍योरिटी गार्डों ने अपने चेहरों में गमछा बांध रखा था। आसानी से उनकी शक्‍लें नहीं दिख रही थीं। हिन्‍दी सिनेमा के डाकुओं की तरह ही उनकी वेशभूषा लग रही थी।

     तान्‍या मैम ने उस दिन गर्मी के मिजाज से ही अपने को ड्रेसप किया था। हल्‍के हरे रंग की चूडी़दार पजामी के साथ जोगिया रंग का राजस्‍थानी कुर्ता पहना था। कुर्ते के गले और बाहों में खूबसूरत हरी कढा़ई थी। चुन्‍नी भी पजामी के रंग की मैचिंग की थी। बाल करीने से बंधे थे। लेकिन तेज हवाओं के चलते बालों की एक लड़ी बार-बार उनके चेहरे पर आ कर गिर जाती थी। कंधों पर लेदर का एक खूबसूरत ब्रांडेड बैग था, जिसमें उनकी डिग्रिया वगैरह थीं। 

     दिल्‍ली के पॉश इलाके वसंत कुंज स्थित सोफिया इंटरनेशनल स्‍कूल की भव्‍य इमारत में जब वह घुसी थीं, तो सबसे पहले उन्‍हें एक टेरा कोटा का म्‍युरल दिखा था। उस म्‍युरल के ठीक बीचों बीच एक शख्‍स अपने दोनों हाथों को ऊपर उठाए आकाश की ओर देख रहा था। उसके साथ खड़े बच्‍चों का समूह भी उसी मुद्रा में दर्शाये गए थे। शायद सबके सब पूरे आसमान को अपना बनाना चाहते थे। म्‍युरल देख कर तान्‍या मैम को उसमें अपना अक्‍स नजर आया था। वह भी आकाश छूने की इच्‍छा रखती थी। जब तक उसके इंटरव्‍यू की बारी नहीं आई थी तब तक वह उस म्‍युरल को निहारती रही थी। तभी अचानक एक सिक्‍योरिटी गार्ड ने उन्‍हें आकर कहा- ' मैडम  आपका नम्‍बर आ गया है।' तब जाकर वह अपने में लौट पाई थीं।

     इंटरव्‍यू बोर्ड में स्‍कूल के मालिक अमित जैन, प्रिंसिपल सुमेधा कौल और ऐकेडमिक हेड इशीता पास्‍ता शामिल थे। सुमेधा कौल के बारे में टीचरों के बीच मशहूर था कि वह अमित जैन की करीबी हैं। उन्‍हें गंवई बोली में रखैल भी कहा जा सकता है। गाहे-बगाहे वे दोनों डेटिंग पर कभी शिमला तो कभी मसूरी जाते हैं। कहने वाले तो यह भी कहते हैं कि एक बार दोनों विदेश भी हो आए हैं। इशीता पास्‍ता स्‍कूल में एक ऐसी शख्सियत थीं, जिन्‍हें बेहद कड़क माना जाता था। यूं कह सकते हैं कि वे टीचिंग स्‍टाफ के लिए किसी टेरर से कम नहीं थीं। उन्‍हें किसी का हंसना-मुस्‍कुराना कबूल नहीं था। बात-बेबात पर वह किसी को भी झड़प देती थीं। उनके निजी जीवन के बारे में किसी को भी कुछ पता नहीं था। दबी जुबान में लोग चर्चा करते थे कि पास्‍ता डायवोर्सी है। उसने अपने फेसबुक स्‍टेटस में डायवोर्स लिख भी रखा था। लेकिन बाद में उन्‍होंने अपना फेसबुक एकाउन्‍ट बंद कर दिया था। पास्‍ता अधेड़ से कुछ कम उम्र की ही लगती थीं। शनिवार के दिन जींस और टॉप पहनती थीं। देखने में तो सुंदर थीं, लेकिन उनके माथे में एक क्रॉस का कट था, जो शायद बचपन में चोट लगने के कारण स्टिचिंग के बाद का निशान था। उनकी खूबसूरती में यह कट चांद में दाग जैसा था।

     इंटरव्‍यू के बाद तान्‍या मैम को वहीं रुकने को कहा गया। उन्‍हें लगा कि शायद उनकी नौकरी पक्‍की हो गई है। वरना और लोगों को तो रुकने के लिए नहीं कहा गया था। हुआ भी यही। एक जुलाई से उन्‍हें ज्‍वायन करने को कहा गया था।

     स्‍कूल में उनके दिन कट रहे थे। क्‍लास वन के बच्‍चे उनकी जिंदगी में घर कर गए थे। तभी उन्‍हें राइसा की याद आ गई। उस दिन राइसा क्‍लास में बहुत खुश थी। झूम-झूम कर वह अपने गले में मोती के ब्रेसलेट का अपने दोस्‍तों को दिखा रही थी। ब्रेसलेट उसकी मम्‍मी ने उसके लिए बनवाया था। जब वह तान्‍या मैम के पास अपना ब्रेसलेट दिखाने पहुंची तो उन्‍होंने आश्‍चर्यचकित भाव से पूछा- ' अरे बेटा ये क्‍या पहना है? ऐसा सुंदर ब्रेसलेट तो मैंने कभी देखा ही नहीं।'

     इस पर राइसा ने तनिक शर्माते हुए कहा था- ' मम्‍मी ने दिया है मैम। जब मैं मम्‍मी इतनी बडी़ हो जाऊंगी तो आपके लिए भी बनवा दूंगी।'

     ऐसी ही न जाने कितनी घटनाएं उनके दिमाग में उमड़-घुमड़ रही थीं। तभी उन्‍हें वह सुबह याद आई, जब मौसम थोडा़ सुहाना था। गुलाबी ठंड थी। नवम्‍बर का महीना रहा होगा। एसेम्‍बली ग्राउंड में हल्‍की-हल्‍की धूप थी। बच्‍चे मस्‍ती के मूड़ में दिख रहे थे। तान्‍या मैम ने तय किया कि आज बच्‍चों को स्‍वीडिश लड़की पेपी की कहानी सुनाएंगी। पेप्‍पी की कहानी बच्‍चों को बहुत पसंद आती थी। उसके ढेरों मजेदार किस्‍से थे। पेपी एक पावर गर्ल थी। उसके पापा शिप में कैप्‍टन थे। महीनों घर से बाहर रहते थे। वह अकेले घर में रहती थी। मुश्किल से मुश्किल समस्‍या का वह समाधान निकाल लेती थी। पेपी बडी़ चुलबुली और नटखट थी। वह दो पोनी टेल बांधती थी। स्‍कर्ट और कालर वाली शर्ट उसकी पसंदीदा ड्रेस थी। वह किसी से भी नहीं ड़रती थी। अपनी दुनिया में मस्‍त। तान्‍या मैम भी पेपी में अपना प्रतिरूप देखती थीं। वह भी किसी नही डरती थी। पेपी की तरह ही हर समस्‍या का वह भी समाधान निकाल लेती थीं। 

     पेपी का घर एक छोटे कस्‍बे में था। उसके घर का नाम विला विलेकुला था। उसका घर बहुत बड़ा था। घर की चाहरदिवारी के अंदर अनेक फल फूल के पेड़-पौधे थे। वह अपने दोस्‍तों को बताती थी कि  उसके पिता कैनीबल आईलैंड के किंग हैं। और वह वहां की प्रिंसेस। वह यह भी बताना नहीं भूलती थी कि उसके पिता जब आयेंगे तो उसे आईलैंड ले जाकर उसे प्रिंसेस का क्राउन पहनायेंगे। इतने बडे़ घर में वह अकेले रहती थी। कभी-कभी उसके दोस्‍त उसके घर खेलने आते थे।

     तान्‍या मैम ने तय किया कि वह बच्‍चों को कहानी एसेम्‍ब्ली मैदान में सुनाएंगी। वे बच्‍चों को लेकर पेड़ों के झुरमट के नीचे लेकर आ गईं। वहां चटाई बिछाकर उन्‍होंने बच्‍चों को बिठा दिया और खुद एक पेड़ के पीछे छिप गई और फिर लुका-छिपी करते हुए उन्‍होंने कभी गाकर तो कभी आवाज बदल कर कहानी सुनाई- ' एक थी पेपी। सुंदर और नटखट बच्‍ची। उसकी उम्र नौ साल की थी। उसके पिता एक आइलैंड के राजा थे। वहां वो शिप से जाती थी। एक बार जब वह शिप पर गई थी तो वहां से वह एक बंदर ले आई थी। उसके पिता ने शिप पर उसे एक गोल्‍ड बाक्‍स भी दिया था। उससे उसने लौटकर एक घोड़ा खरीदा था। अक्‍सर वह घोड़े की सवारी करती थी। पेपी, बंदर और घोड़ा एक साथ घर में रहते थे। पेपी बंदर को अपने कंधे पर बैठाकर घुमाती थी। बच्‍चे उसके घर में खेलने आते थे। वह अक्‍सर अपने दोस्‍तों से डींगें मारती थी। एक बार उसने अपने दोस्‍तों से कहा- ' हमारी जिंदगी में कोई दबाव नहीं है। जब तुम दूध पी रहे होते हो तो मैं कैंडी खा रही होती हूं। मैं अपनी मर्जी की मालिक हूं। मेरे ऊपर किसी का राज नहीं चलता है।'

     अक्‍सर पेपी खेलते हुए अपने दोस्‍तों के सामने ऐसी ही लंबी-लंबी छोड़ती थी। कुछ दिनों से बच्‍चे उसके घर खेलने नहीं आ रहे थे। छुट्टियों में अपनी नानी के घर गए थे। पेपी उन दिनों एकदम अकेली हो गई थी। एक दिन उसने देखा कि उसके घर के बाहर कुछ लोग घूम रहे हैं। वे देखने में कुछ ठीकठाक नहीं लग रहे थे। पेपी पता लगाती है तो उसे पता चलता है कि वे लोग उसके घर पर कब्‍जा करना चाहते हैं। इस जानकारी के बाद वह अपने घर की सीढ़ियों पर खेलने लगती है। तभी वे लोग उसके पास आते हैं। पूछते हैं- ' इस घर का मालिक कौन है? ' 

     पेपी आत्‍मविश्‍वास के साथ जवाब देती है- ' मैं ही इस घर की मालिकिन हूं।'  

     ' इतनी छोटी लड़की कैसे इस घर की मालकिन हो सकती है? ' -उनमें से एक आदमी आश्‍चर्य के साथ कहता है।

   ' मैं साइज में बेशक छोटी हूं, लेकिन मैं ही इस मकान की मा‍लकिन हूं।'-पेपी पूरे रौब के साथ जवाब देती है। 

     ' हम लोग इस मकान को खरीदना चाहते हैं।'-उनमें से एक दूसरा आदमी बोलता है। 

  ' लेकिन हमें न तो मकान को बेचने का शौक है और न ही जरूरत।'

     ' हम घर के लिए बहुत पैसे देंगे।'-अबकी तीसरा आदमी जो थोड़ा लंबे कद का था और सिर पर हैट और ओवरकोट पहने था बोला।

     ' घर को खरीदने के बारे में सपने में भी न सोचना। इसमें भूत रहते हैं।'-ड़राने के अंदाज में भौंहे चढ़ाते हुए पेपी बोली।

     ' ऐ छोटी लड़की हमें मत ड़रा। हमें भूत से कोई डर नहीं है।'-इस बार शांत से खडे़ पांचवे आदमी ने जवाब दिया।

     ' अगर ऐसी बात है तो एक रात को यहां रह कर देख लो।' -पेपी ने उन्‍हें चुनौती देते हुए कहा। वे इसके लिए तैयार हो जाते हैं।

   एक दिन पांचों लोग उसके घर रात बिताने आते हैं। पेपी ने उनको डराने का पूरा इंतजाम कर रखा था। जब वे कमरे में जाने लगे तो छत के एक कोने में छिपे बंदर ने उन पर लकड़ियों के टुकड़ों का गट्ठर गिरा दिया। उनमें से एक घने बालों वाले के सिर पर एक बड़ा लकड़ी का टुकड़ा गिरा। उसके बाद बंदर ने पत्‍थरों को फेंकना शुरू कर दिया। वहीं पेड़ के पीछे से पेपी और उसके घोडे़ ने अनेक तरह की ड़रावनी आवाजें निकालीं। पांच के पांचों डर गए। उन्‍हें विश्‍वास हो गया कि यहां भूत रहते हैं। और वे वहां से नौ दो ग्‍यारह हो गए। इस तरह पेपी ने अपना घर बचा लिया उनसे।'
प्रदीप सौरभ
निजी जीवन में खरी-खोटी हर खूबियों से लैस। मौन में तर्कों का पहाड़ लिये कब, कहां और कितना जिया, इसका हिसाब-किताब कभी नहीं रखा। बंधी-बंधाई लीक पर कभी नहीं चले। कानपुर में जन्मे लेकिन लंबा समय इलाहाबाद में गुजारा। वहीं विश्वविद्यालय से एमए किया। जनआंदोलनों में हिस्सा लिया। कई बार जेल गए। कई नौकरियां करते-छोड़ते दिल्ली पहुंच कर साप्ताहिक हिन्दुस्तान के संपादकीय विभाग से जुड़े। कलम से तनिक भी ऊबे तो कैमरे की आंख से बहुत कुछ देखा। कई बडे़ शहरों में फोटो प्रदर्शनी लगाई। मूड आया तो चित्रांकन भी किया। पत्रकारिता में पच्चीस वर्षों से अधिक समय पूर्वोत्तर सहित देश के कई राज्यों में गुजारा। गुजरात दंगों की रिपोर्टिंग के लिए पुरस्कृत हुए। देश का पहला बच्चों का हिन्दी का अखबार निकाला। पंजाब के आतंकवाद और बिहार के बंधुआ मजदूरों पर बनी फिल्मों के लिए शोध। 'बसेरा' टीवी धारावाहिक के मीडिया सलाहकार रहे। दक्षिण से लेकर उत्‍तर तक के कई विश्वविद्यालयों में 'उपन्‍यासों पर शोध। इनके हिस्से 'मुन्नी मोबाइल,' 'तीसरी ताली' और देश ‘भीतर देश’ उपन्‍यासों के अलावा कविता, बच्चों की कहानी और संपादित आलोचना की पांच पुस्तकें हैं। उपन्‍यास तीसरी ताली के लिए अंतरराष्‍ट्रीय इन्‍दू शर्मा कथा सम्‍मान से ब्रिटिश संसद में सम्‍मानित।

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     कहानी सुनते हुए कभी बच्‍चे डरते तो कभी हंसते तो कभी अपने मुंह हाथों से छिपा कर उंगलियों से टुकुर-टुकुर देखते। बच्‍चों को बड़ा मजा आया था। बच्‍चों का दिन तो बन आया था। तान्‍या मैम की पढ़ाई की ये अदा पूरे स्‍कूल में मशहूर थी। इन्‍हीं सब खूबियों के चलते उसे एक अच्‍छा टीचर माना जाता था। स्‍कूल के मालिक अमित जैन की नजर भी तान्‍या पर थी। नजर अच्‍छी थी या बुरी यहां कुछ नहीं कहा जा सकता है। 

     इसी दौरान एक और घटना तान्‍या मैम को याद आई। उस घटना ने पूरे स्‍कूल को स्‍तब्‍ध कर दिया था। तान्‍या मैम का दिल भी हिकारत से भर गया था। वह अंदर से बाहर तक हिल गईं थीं। कई रात उस घटना के चलते उन्‍हें नींद भी नहीं आई थी। हर बार वह यही सवाल अपने से करती थीं कि कोई टीचर आखिर ऐसा कैसे कर सकता है?  बात ऐसी नहीं थी कि उसे भुलाया जा सके। ये बात दीगर है कि मैनेजमेंट ने उसे भुला दिया था। भुलाने की वजह भी थी इशीता पास्‍ता से मिनी जोशी की करीबी। मिनी जोशी भी स्‍कूल में टीचर थी। वह क्‍लास सिक्‍स के बच्‍चों को पढ़ाती थी। उसकी हाइट चार फुट से भी एक दो इंच कम होगी। देखने में वह बदशक्‍ल न भी हो लेकिन खूबसूरती की श्रेणी में वह कहीं नहीं आती थी। उसमें आकर्षण नाम की कोई चीज नहीं थी। मोटे ग्‍लास का चश्‍मा उसके चेहरे को और बदसूरत बनाता था। पढ़ाई-लिखाई में तेज थी। उसका एकेडमिक करियर हमेशा अव्‍वल रहा था। उसने एमएड किया था। फर्स्‍ट क्‍लास में। तीस की उम्र पार कर रही थी। बचपन में भी उसके हम उम्र बच्‍चे उसके साथ खेलते नहीं थे, बल्कि लिलीपुट कह कर चिढ़ाते थे। उसके माता-पिता ने उसकी शादी के लिए लाख कोशिशें की, लेकिन बात नहीं बनी। 

     मिनी जोशी ने भी एकाध बार अपना पार्टनर खोजने की कोशिश की थी, किन्‍तु वह नाकाम रही। उसने स्‍कूल में ही जूनियर क्‍लर्क रमेश पंत से दोस्‍ती के लिए कई पींगें बढ़ाई। दोनों की दोस्‍ती साथ टिफिन खाने तक सीमित रही। मिनी उसके लिए रोज कुछ न कुछ स्‍पेशल लाती थी, ताकि वह उसके प्रति आकर्षित हो। एक आध पर अंजाने भाव से उसने रमेश को स्‍पर्श करने की कोशिश भी की। लेकिन रमेश ने मिनी में कोई रूचि नहीं दिखाई। अलबत्‍ता इन्‍हीं हरकतों के चलते उसने उसके साथ टिफिन करना बंद कर दिया।

     मिनी अंदर से बाहर तक खास मानसिक और शारीरिक पीड़ा के बीच जिंदगी जीती थी। शरीर की आग उसे रातों को सोने नहीं देती थी। हमेशा बेचैन रहती थी। इस सबका नतीजा यह था कि वह चिड़चिड़ी और प्रतिघाती हो गई थी। स्‍कूल के कई टीचर उसके प्रतिघात के शिकार हो चुके थे। इशीता पास्‍ता की खास चमची होने के कारण वह अपने सहयोगियों के खिलाफ साजिश आसानी से रच लेती थी। पास्‍ता को न जाने उसने कौन सा पाठ पढ़ा रखा था कि वह उसके खिलाफ कुछ सुनना ही पसंद नहीं करती थी। जब रमेश पंत ने उससे दूरी बनानी शुरू कर दी थी और दोनों चुप्‍पी के बीच से गुजर रहे थे, तब उसने उसके खिलाफ भी साजिश रच दी थी। भला हो सुप्रीटेंडेंट पाल साहब का कि उन्‍होंने उसे बचा लिया था। वरना उसकी तो नौकरी गई थी।

     तमाम जद्दोजेहद के बाद भी उसे ब्‍वाय फ्रेंड नहीं मिल रहा था। और वह बेकाबू हो गई थी। अपनी इन्द्रियों पर उसका नियंत्रण रह-रह कर छूट जाता था। इस सबके बाद भी वह बच्‍चों के साथ अच्‍छा व्‍यवहार करती थी। तान्‍या मैम की क्‍लास के रितेश को वह बहुत प्‍यार करती थी। रितेश की उम्र सात साल होगी। शरीर से भरा-भरा था। मंद बु‍द्धि उसे नहीं कहा जा सकता था। थोड़ा ढीला ढाला जरूर था। हर चीज से बेरपवाह। हर बात पर देर से रिएक्‍ट करने वाला। पैसे वाले घर का लड़का था। उसे लेने और छोड़ने सोफर ड्रवेन ऑडी लेने आती थी। 

     रितेश को अकेले देखते ही मिनी उसके पास आ जाती थी और उससे खेलने लगती थी। बस वाले बच्‍चे जब चले जाते थे, वह अपनी गाड़ी के इंतजार में क्‍लास में कई बार अकेले रह जाता था। क्‍लास में अकेला देखते ही मिनी क्‍लास में पहुंच जाती थी। यह बात तान्‍या मैम को अजीब लगती थी। एक दिन जब रितेश और मिनी क्‍लास में अकेले थे, तभी तान्‍या मैम वहां पहुंच गईं। वहां का दृश्‍य देख कर तान्‍या मैम स्‍तब्‍ध रह गई। काटो तो खून नहीं। रितेश डेस्‍क के ऊपर खडा था और मिनी उसके होंठों को बेसुध हो कर चूस रही थी। उसका एक हाथ उसके लिंग को आहिस्‍ता-आहिस्‍ता सोहरा रहा था। रितेश के हाव भाव से लग रहा था कि वह उसको सहयोग कर रहा है। लड़के और लड़की का होंठ चूसना रितेश के लिए कुछ भी आस्‍वाभाविक न था। एक बार राइसा और सैम को उसने क्‍लास में ऐसा करते देखा था। राइसा और सैम अगल-बगल बैठते थे। दोनों एक दूसरे को पसंद करते थे। ऐसे ही एक दिन जब इन दोनों को तान्‍या मैम ने किसिंग करते देखा था, तो दोनों को अलग करना मुश्किल हो गया था। मदद के लिए तान्‍या मैम को बगल वाली क्‍लास से पायल रोहतगी को बुलाना पड़ा था। अलग होने पर दोनों ने तान्‍या मैम पर थप्‍पड़ों की बौछार कर दी थी।

     रितेश और मिनी को उस स्थिति में देख कर तान्‍या मैम के मुंह से बोल नहीं निकल रहे थे। सचमुच वह किंकर्तव्‍यविमूढ़ हो गई थी। थोडी़ देर में उन्‍होंने अपने को संभालने की कोशिश की। कस कर उन्‍होंने अपने बाएं हाथ में दाएं हाथ से चिकोटी काटी। होश में आते ही वह आपे से बाहर हो गईं। लगभग चीखते हुए उन्‍होंने कहा- ' क्‍या हो रहा है ये मिनी? होश में आओ। ये क्‍या कर रही हो बच्‍चे के साथ? ' 

     खाली क्‍लास में तान्‍या मैम की आवाज जोर से गूंजी। मिनी अपने को संभालने लगी। वह कुछ बोलती उससे पहले तान्‍या मैम ने कहा- ' यू बास्‍टर्ड। टीचर के नाम पर कलंक। मैं तेरी शिकायत इशीता पास्‍ता से करूंगी। अब तू इस स्‍कूल में नहीं रहोगी। और भी वगैरह-वगैरह।'

     तान्‍या मैम जब तक चीखती रही मिनी चुप रही। उनके चुप होने के बाद उसने तान्‍या मैम से कहा- ' मैडम  ऐसी कोई बात नहीं है। आप बेवजह बात का बतंगड़ बना रही हैं। रितेश को ऐसा करना अच्‍छा लगता है, इसलिए मैं एक अच्‍छी टीचर की तरह उसे सुख देती हूं। इसमें आप को ऐतराज नहीं होना चाहिए।'

     इस पर तो तान्‍या मैम बमक पड़ीं- ' रितेश को अच्‍छा लगता है कि तुम अपनी प्‍यास इस अबोध बच्‍चे से बुझाती हो। इस बच्‍चे को इन सब बातों के बारे में क्‍या पता।'

     मिनी ने देखा कि तान्‍या मैम इस घटना को लाइटली नहीं ले रही हैं, तो उसने हाथ जोड़कर कहा- ' मैम यदि आपको बुरा लगता है ये तो मैं आज से नहीं करूंगी। वैसे तो हमारा स्‍कूल एक्‍सपीरिएन्‍सल लर्निंग के आधार पर चलता है। और यहां बच्‍चे क्‍या-क्‍या करते हैं आपको क्‍या पता। और तो और उसमें हम टीचरों के बच्‍चे भी शामिल हैं।'

     तान्‍या मैम को मिनी पर बहुत गुस्‍सा आया। वह अपना आपा छोड़ चुकी थीं। उन्‍होंने मिनी के हाथों से रितेश को आजाद कराया और अपनी गोद में ले लिया। रितेश को लेकर वह सीधे स्‍कूल के गेट पर गईं। इत्‍तेफाक यह था कि वह जैसे ही गेट पर पहुंची तो रितेश की गाडी आ चुकी थीं। उन्‍होंने रितेश को ड्राइवर को सौंप दिया। उन्‍होंने रितेश को भी शक की निगाह से देख कर उसकी जांच पड़ताल की कि कहीं ये भी तो रितेश के साथ ऐसी वैसी हरकत तो नहीं करता है। उन्‍हें जब इत्मिनान हो गया तो उन्‍होंने ड्राइवर को जाने दिया। इसके बाद वह सीधे इशीता पास्‍ता के चेम्‍बर में पहुंची। तान्‍या मैम ने पूरा वाक्‍या उन्‍हें सुना दिया। इस पर इशिता ने बड़े ठंडे लहजे में तान्‍या मैम को समझाते हुए कहा- ' कूल हो जाओ तान्‍या। मैं देखती हूं कि आखिर मामला क्‍या है। और हां, इस बात को आपने किसी से शेयर नहीं करना है।'

     तान्‍या समझ गई कि इशीता पास्‍ता मिनी के खिलाफ कोई एक्‍शन लेने वाली नहीं है। आखिर वह उसकी चमची जो ठहरी। लेकिन इस घटना के बाद उसका दिल बहुत विचलित हुआ। उसे स्‍कूल की भव्‍य इमारत। हाईटेक क्‍लासेस काटने लगे। खान-पान की शौकीन तान्‍या मैम को अत्‍यंत हाईजनिक कैंटीन भी खराब लगने लगी। उसे हर आदमी स्‍कूल में संदिग्‍ध लगने लगा। अंतत: इशीता पास्‍ता ने पूरे मामले में मिट्टी डाल दी। मिनी जोशी का बाल बांका न हुआ। इस बात से तान्‍या मैम को बहुत दुख हुआ। उन्‍होंने एक बार सोचा कि मीडिया को बुला कर सारी बात का खुलासा कर दें। लेकिन वह ऐसा नहीं कर सकीं। एक तो उनकी पहली नौकरी थी और दूसरा दिल्‍ली छोड़ने का दबाव उनके परिवार का था। ऐसे में दिल्‍ली में रहने की लालच के चलते उन्‍होंने समझौता कर लिया।
     
(वाणी प्रकाशन से शीघ्र प्रकाशित)
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