कहानी : फत्ते भाई - अनवर सुहैल


कहानी : अनवर सुहैल

फत्ते भाई



चारों तरफ एक ही चर्चा। फत्ते भाई काफ़िर हो गए। उन्हें दुबारा कलमा पढ़कर इस्लाम में दाख़िल होना होगा। फत्ते भाई जात के साई थे। साई यानी फकीर बिरादरी। मुहर्रम की रंग-बिरंगी ताजिया और फत्ते भाई एक दूसरे का पर्याय थे। उन्होंने उमरिया, चंदिया, जबलपुर की देखा-देखी इस नगर में भी ताजिया की शुरूआत की। पहला ताजिया अनाकर्शक, बेडौल बना लेकिन इसी के साथ शुरू हुई थी, मुस्लिम समुदाय में एक सैद्धान्तिक लड़ाई। मुसलमानों के दो गुट थे। एक स्वयं को देवबंदी कहता और असल सुन्नी मुसलमान बतलाता था। दूसरा तबका बरेलवी कहलाता। ये भी स्वयं को असल सुन्नी मुसलमान कहते तथा देवबंदी लोगों को ‘वहाबी’ कहा करते थे। देवबंदी लोगों का सम्बंध इस्लाम के मूल-तत्वदर्शन, पैगम्बर की जीवन पद्धति का अनुकरण तथा तब्लीग जमात द्वारा धर्म-प्रचार से था। ये लोग इस्लाम की मूल अवधारणाओं में रत्ती भर भी फेरबदल नहीं चाहते थे। दूसरी तरफ बरेलवी लोग हुए, जहां इस्लामी दर्शन की एक नई व्याख्या की गई। जिसमें अल्लाह को पाने के लिए ‘सिलसिले’ का फलसफा आया। यानी औलिया-पीरों के मार्फत पैगम्बर तक पहुंचना और उसके बाद अल्लाह तक पहुंचना। इसका प्रभाव सूफीमत के रूप में नजर आया। कर्मकाण्ड बढ़े। मजार-खानकाहों की नातादाद वृद्धि र्हुइं। चमत्कारों पर लोगों की आस्था बढ़ी। फत्ते भाई बचपन से जुमा की नमाज और ईद-बकरीद की नमाज ही पढ़ा करते थे। कुछ समझदार हुए तो एक नमाज में और इजाफा कर लिया, वो थी ‘जनाजे की नमाज’। ये सभी नमाजे वे देवबंदी पेश इमामों के पीछे पढ़ा करते थे। चंदा, सदका, जकात वगैरा भी देवबंदियों की मस्जिद में दिया करते थे। जब ताजिया बना कर उसका प्रदर्शन कर चुके तब देवबंदी मस्जिद की कमेटी के सदर साहब का फतवा उन तक पहुंचा---’’इस्लाम में बुतपरस्ती हराम है। ताजिया बुत-परस्ती का एक रूप है।’’

अनवर सुहैल
संपादक 'संकेत'
कोल इंडिया लिमिटेड में वरिष्ठ प्रबंधक
उपन्यास : पहचान (राजकमल प्रकाशन)
कथा संग्रह : कुंजड कसाई ( समय प्रकाशन) और गहरी जड़ें (यथार्थ प्रकाशन)
कविता केन्द्रित लघुपत्रिका 'संकेत' के अब तक १४ अंक प्रकाशित
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फत्ते भाई के करीबी दोस्त अहबाब जबबार तांगेवाला, शरीफ भाई गैराज वाले, कब्रिस्तान का चौकीदार सुल्तान आदि ने इस फतवे का विरोध किय--’’ये सब वहाबियों की बातें हैं। बिहार, यूपी और पूरे हिन्दुस्तान में ताजिया निकलता है, मातम-मर्सिया होता है। ये तो दीन-मजहब का काम है फत्ते भाई!’’

शरीफ भाई ने नारा दिया--’’इस्लाम ज़िन्दा होता है हर इक कर्बला के बाद!’’

सुल्तान ने टुकड़ा जोड़ा--’’ये देवबंदी सब यजीद के रिश्तेदार होते हैं और हमारे नबी के नवासों के हत्यारे हैं।’’

फत्ते भाई को राहत मिली। फत्ते भाई अनपढ़ थे। इस्लामी इतिहास की उनकी उतनी ही जानकारी थी, जितनी मौलवी-वाइज बताया करते। मुहर्रम के बारे में इतना ही जानते थे कि एक खलनायक यजीद था। समर्थ दुष्ट शासक। उसने हजरत इमाम हसन और हुसैन समेत गिनती के ईमानवालों को प्यास-भूख से तड़पा-तड़पा कर तलवार के घाट उतारा था। यह अंतिम युद्ध कर्बला के मैदान में हुआ। दर्दनाक हादसा। उसी कर्बला की याद में, नगर के बाहर बैरियर के पास बड़ा सा तालाब है, उसे कर्बला का नाम दे दिया गया है। उसी तालाब में दसवीं मुहर्रम को ताजिया सिराई जाती है। फत्ते भाई के सहयोंगियों में शिया मुसलमान, टार्च मेकेनिक शब्बीर भाई और बलदेव पनवाड़ी भी थे। इन सभी का योगदान मिलता और ताजिया निर्माण का काम हर्शोल्लास से सम्पन्न होता। फत्ते भाई गांजा पीने के शौकीन थे। उनकी मित्र-मण्डली भी यह शौक किया करती किन्तु मुहर्रम के दस दिन वे लोग गांजा से परहेज करते। पुरानी ताजिया की लकड़ी का ढांचा साल भर सुरक्षित रखा जाता। मुहर्रम से पूर्व उस ढांचे को रिपेयर कर, उस पर कागज की नई परत चढ़ाई जाती। सलमा-सितारे, कांच और रंगबिरंगी चमकदार पन्नियों से ताजिया जब बन कर तैयार होता तो लोग ‘वाह!’ कर उठते। इस टीम को देखकर ऐसा प्रतीत होता जेसे मुहर्रम के दस दिनों के लिए ही ये लोग धरती पर आए हों। सारा नगर ढोल-ताशे की आवाज से गूंज ता। ‘‘तक्कड़ तक्कड़, तक्कड़ तक्कड़, धिम्मक तक्कड़, धिम्मक तक्कड़!’’

बच्चे-बूढ़े आ जुटते। ताशा-ढोल बजाने की होड़ लग जाती। ताशे चार-पांच और एक ढोल। भारी-भरकम ढोल। अमूमन तेल-ग्रीस के ड्रम को आधा काट कर उसके दोनों तरफ चमड़ा मढ़ कर ढोल बनाया जाता। इसे मजबूत जवान युवक गरदन पर टांग लेते । फिर छाती और पेट पर टिके ढोल को ‘मारतुल’ से मार-मार कर बजाया करते। ढम.....ढम। ताशे मिटटी के बने होते। इन्हें जमीन पर बैठकर या खड़े-खड़े गरदन से लटकाकर लकड़ी की पतली खपच्चियों से बजाया जाता। ‘‘तक्कड़  तक्कड़।’’

मुहर्रम के दिनों में ढोल-ताशा की आवाज सुन फत्ते भाई को जबलपुर, उमरिया में बीता अपना बचपन याद आ जाता। जब उनकी दादी मां ढोल-ताशे की गूंज का शाब्दिक जामा पहनाया करतीं --’’संयक सक्कर....संयक सक्कर...दूध मलिद्दा........दूध मलिद्दा।

    तक्कड़-तक्कड़,  तक्कड-तक्कड, धिम्मक तक्कड़..धिम्मक तक्कड़।’’

मुहर्रम की खास शीरनी दूध-मलीदा हुआ करती है। रोटी को चूरा करके उसमें शक्कर मिला कर मलीदा बनाया जाता। यह भी एक ऐसी परम्परा थी, जिसका हवाला इस्लामी इतिहास-कर्मकाण्ड में कहीं नहीं मिलता। चावल और चने की दाल का खिचड़ा भी बनता। नगर के बड़े-बड़े सेठ-महाजन और समर्थ मुस्लिम श्रद्धालु एक एक मन अनाज का खिचड़ा बनवा कर ताजिया के साथ घूमते मजमे में बंटवाया करते। जगह-जगह शर्बत बांटी जाती। आस-पास की कोयला खदानों में बसे मुस्लिम-गैरमुस्लिम लोग नगर में ताजिया-दर्शन को आते। लाठी भांजने वालों और तलवार बाजी के माहिर लोगों को अपनी कला के सार्वजनिक प्रदर्शन का अवसर मिलता। बेपर्दा औरतों-लड़कियों का रेला इस ताजिया के आगे-पीछे रहता। गैर मुस्लिम भी ताजिया का आदर करते। कई मारवाड़ी औरतें मन्नत की ताजिया बनवाया करतीं। अपने घरों के आगे रेवड़ी की फातिहा करवा कर प्रसाद ग्रहण करतीं। काले कपड़े में सजे फत्ते भाई, शीरनी को अपने हाथ में लेते। कुछ बुदबुदाते। उस पर फूंक मार कर शीरनी का थोड़ा हिस्सा ताजिया के नीचे बांधी गई चादर में डालते जाते। हजारों बार फातिहा पढ़ना पड़ता उन्हें। ताजिया पांच-दस कदम बाद रूक जाता। लोग शीरनी लेकर ठेलते-ठालते उन तक पहुंचने का उपक्रम किया करते। औरतें और बच्चे ताजिया के नीचे से पार होकर अपने आप को धन्य करते। मुहर्रम के हीरो हुआ करते थे फत्ते भाई। अंधेरा घिरने के पहले फत्ते भाई पर सवारी आने का लक्षण दिखने लगता। उनका सिर अपने आप हिलने लगता। ताजिया के सामने मातम करने वाले लड़के ताव में आते। फत्ते भाई का पैर कांपने लगता। जिस्म लहराने लगता। शब्बीर, जब्बार, जमालू, शरीफ, बलदेव इत्यादि समझ जाते। मर्सिया गाने वालों को अपना शानदार कलाम पढ़ने का हुक्म दिया जाता। ढोल-ताशों पर अनुभवी हाथ आ विराजते। माहौल सर्द हो जाता जब फत्ते भाई की पागलपन से लबरेज आवाज गूंजती--’’नाराए तकबीर!’’

लोग जोश के साथ जवाब देते--’’अल्लाहो अकबर!’’
उसके बाद शुरू होता खूंखार मातम। फत्ते भाई उंगलियों के बीच ‘ब्लेड’फंसा लेते। मर्सिया-ख़्वानी के साथ मातम शुरू होता। ‘‘या  ली  मौ ला’’

‘‘हैदर मौला’’

ठस नारे के साथ बायां-दायां हाथ छाती पर जोर-जोर से बजने लगता एक रिद्म के साथ। ‘‘याली मौला, हैदर मौला’’ छाती पर हथेलियों की मार बढ़ती जाती। फत्ते भाई रोते-कलपते मातम करते। ‘‘या हुस्सैन...या हुस्सैन!’’

ढोल-ताशा मातमियों का हौसला बढ़ाता।

    तक्कड़-तक्कड़,  तक्कड-तक्कड, धिम्मक तक्कड़..धिम्मक तक्कड़।’’

कई और लोग मातम करने कूद पड़ते। नगर का चौराहा मातम की गूंज से गमगीन हो जाता। मातम का दिल दहलाने वाला दौर परवाज चढ़ता। फत्ते भाई हाल की हालत में चीखते-’’या हसन’’ और छाती पर हाथ मारते। अन्य मातमी जवाब देते--’’या हुस्सैन!’’ और दूसरा हाथ छाती पर मारते। धीरे-धीरे ‘या हसन’ ‘या हुसैन’ की लय बढ़ती जाती और कुछ देर बाद छाती पर हाथ मारने की प्रक्रिया तीव्र हो जाती और लोगों को सुनाई देता --’’हस्सा-हुस्सै’ ‘हस्सा-हुस्सै’। फत्ते भाई पागल से हो जाते। उनकी आवाज फट जाती। उनकी छाती लहूलुहान हो जाती। कई छातियां खून से लाल हो जातीं। ताजिया के संग चलने वाली सैकड़ों औरतें-लड़कियां दहाड़ें मार-मार कर रोने लगतीं। वे भी मातम करतीं सारा माहौल गमगीन हो जाता। फत्ते भाई की आवाज अन्त कर बैठ जाती। वे मातम करते कुछ भी कहना चाहते तो एक अजीब सी आवाज के साथ हवा बाहर निकलती। मुहर्रम के बाद चालीसवां तक उनकी आवाज बेसुरी रहती।


फत्ते भाई काफिर हो गए।

एक ही चर्चा चारों तरफ।

उन्हें कलमा पढ़कर मुसलमान होना होगा और दुबारा निकाह पढ़ाना होगा। फत्ते भाई पेशे से रिक्शा-साईकिल मिस्त्री थे। चार-पांच साइकिलें और एक रिक्शा किराए पर चलता। नगरपालिका भवन के सामने एक गुमटी पर उनकी दुकान सजती। चेला-चपाटी न रखते। पंक्चर बनाने से लेकर रिपेयर का काम स्वयं करते। काम के वक्त पैजामा ऊपर खोंस कर उठा लिया करते। सुबह सात बजे घर से निकलते। झाड़ू निकाल कर पहले दुकान का कचड़ा बुहारते फिर किराए पर चलने वाली साइकिलें निकाल कर एक तरफ लाईन से खड़ा करते। सब साईकिलों की हवा चेक करते। साइकिल टनाटन रहे तो किराएदार टिके रहते हैं। सुबह से ही किराएदारों की आमद शुरू हो जाती। आठ आना प्रति घण्टा के हिसाब से साइकिल किराए पर जाती। इन साइकिलों से ही वह प्रतिदिन तीस-पैंतीस रूपिया कमा लेते। कुछ कमाई रिक्शा के किराए से आ जाती। साइकिल रिपेयर से भी कुछ मिल ही जाता था। गुमटी के अंदर लोहे की एक बाल्टी, पंक्चर चेक करने के लिए एक तसला, लकड़ी का एक बड़ा बक्सा जिसमें औजार भरा होता और कई ताखों पर छोटे-बड़े डिब्बे जिनमें नट-बोल्ट से लेकर छोटे-मोटे स्पेयर होते। हवा भरने के दो पम्प और चक्का सीधा करने का एक शिकंजा। सामने दीवार पर दो-तीन तस्वीरें मढ़ी हुई लगी होतीं। एक तस्वीर अजमेर शरीफ की, दूसरी बाबा ताजुद्दीन की, और तीसरी तस्वीर में एक ऐसी आकृति की थी जिसका जिस्म घोड़े का है और मुंह एक खूबसूरत औरत का। उसी के बगल में कुरान-शरीफ की आयतों वाली एक तस्वीर। फत्ते भाई सुबह-शाम इन तस्वीरों के पास अगरबत्ती अवश्य जलाया करते। गुमटी के बाहर रेल-लाईन का एक टुकड़ा पड़ा रहता। इसी टुकड़े पर रखकर वह रिपेयर के लिए हथौड़ा चलाते। विश्वकर्मा पूजा के दिन वह दुकान खोलते और विश्वकर्मा पूजा समिति की तरफ से दिया गया नारियल बगल के पनवाड़ी बलदेव से इसी लोहे के टुकड़े पर फोड़वाया करते। विश्वकर्मा पूजा के दिन वह कोई काम न करते। शाम को बीवी हमीदा के साथ सैर-सपाटा करते। बीवी हमीदा उनकी सच्ची शरीके-हयात थीं। वह भी बीवी हमीदा के पक्के शौहर थे। फत्ते भाई का वास्तविक नाम फतह मुहम्मद था, जिसे वह अब तक भूल चुके थे। उन्हें अल्लाह ने औलाद का सुख नहीं दिया था। शादी के पंद्रह सोलह साल बाद जब औलाद न हुई तो फत्ते भाई पीरी-मुरीदी, जड़ी-बूटी, वैद्य-हकीमी और टोना-टोटका सब करवा देखे। आज तक उनको औलाद नसीब न हुई । अब तो खैर से उम्मीद करना बेकार था लेकिन आस्थावान फत्ते भाई कभी नाउम्मीद न हुए। बीवी हमीदा को भी वे ढाढ़स बंधाया करते। फत्ते भाई महफिल-पसंद आदमी थे। समाज के निचले तबके में उनकी अच्छी रसूख थी। कोर्ट कचहरी में जमानत दिया करते और इस तरह बेकस-मजलूमों की मदद करते। सिनेमा-थियेटर के शौकीन भी थे। अधिकतर सेकण्ड-शो सिनेमा जाते। साथ में होतीं बीवी हमीदा। साइकिल पर पीछे बैठ जातीं। दुबली-पतली काया, सलवार-कुर्ता और दुपट्टा पहनतीं। निस्संतान बीवी हमीदा देखने सुनने में ठीक-ठाक थीं। उम्र का असर उन तक नहीं आया था। शरीफ भाई हों या जब्बार! फत्ते भाई को जब बीवी हमीदा के साथ सैर-सपाटे पर पाते तो टोकते जरूर’--’’लैला मजनूं की जोड़ी कहां चली?’’

हमीदा बीवी भी चुप न रहतीं-’’देखने वालों का कलेजा क्यों फट रहा है? अपनी जोरू को सात पर्दों में काहे छुपाए रखते हैं। घूमिए न आप लोग भी अपनी हूरों के संग, कौन मना करता है!’’

जमालू भाई अपनी दो मन की बीवी को याद कर आहें भरते--’’फत्ते भाई जैसी क़िस्मत हम बदनसीबों को कहां!’’
हमीदा बीवी जवानी में बहुत सुंदर थीं। पास ही के गांव में एक नाई खानदान में पैदा हुई थीं। नाई लोगों को ‘छत्तीसा’ भी कहा जाता है। ‘छत्तीसा’

माने छत्तीस कला के माहिर लोग। जाने कौन सी कला काम आई कि फत्ते भाई आज तक फतिंगे की तरह अपनी बीवी पर मरते हैं। फत्ते भाई की जिन्दगी ठीक-ठाक चल रही थी। न उनके ख़्वाब बड़े थे, न पांव..........चादर की नाप उन्हें अच्छी तरह मालूम थी।

बदरी-बरखा, पूस का जाड़ा। जाड़े की सर्द रात। फत्ते भाई लुंगी-बनियान में घर से बाहर निकले। नाली के किनारे पेशाब करने को बैठे। उन्हें ठण्ड लग गई। ठण्ड तो शाम ही से लग रही थी। बीती शाम उन्होंने बिलसपुरिहा बिही
(अमरूद) खाकर खूब पानी पिया था। पेशाब करके वह उठे तो शरीर कांप रहा था। कमजोरी सी लग रही थी। वापस आकर वह पुनरू सो गए। सुबह उनका बदन जलते तवे सा तप रहा था। ठण्ड से जिस्म कांप रहा था। बीवी हमीदा घबरा गई। तीन रजाईयां उनके ऊपर डाल दीं। कोई फर्क न पड़ा। फत्ते भाई का बदन कांपे जा रहा था। दांत बज रहे थे। वह कुछ बोल नहीं पा रहे थे। हमीदा बीवी की समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करें, क्या न करें। फत्ते भाई के मुंह से गर्म सांस निकल रही थी। लगा वह कुछ कहना चाह रहे हों। हमीदा बीवी अपना कान उनके मुंह के करीब ले र्गइं। लेकिन ये क्या.... फत्ते भाई का निचला जबड़ा र्बाइं तरफ लटक गया था। हमीदा बीवी चीख पड़ीं। बेबस फत्ते भाई की आंख से आंसू झर रहे थे। वे ठण्ड से अब भी कांप रहे थे। हमीदा बीवी उन्हें उसी हालत में छोड़ बाहर्र आइं। जाड़े की सुबह कुहरा छाया हुआ था। वे पड़ोसी बलदेव पनवाड़ी और शरीफ भाई के पास गई। दोनों तत्काल दौड़े चले आए। फत्ते भाई की हालत देख बलदेव साईकिल उठा साहनी डॉक्टर को इत्तला करने चला गया। डॉक्टर साहनी नगर के पुराने प्राईवेट डॉक्टर है। मरीज की हालत सुन चले आए। कुछ इंजेक्शन दी। दवा लिखी। फिर कहा कि मरीज को भरती करना होगा। बेहतर होगा कि इन्हें पास के कॉलरी के हॉस्पीटल में भर्ती करवाया जाए। वहां बेहतर इंतेजाम है। इन पर लकवा का अटैक है। दवा से ठीक भी हो सकते हैं। ढिलाई न की जाए। कॉलरी हॉस्पीटल के डॉक्टरों को वे फोन कर देंगे। दवा-इंजेक्शन के बाद फत्ते भाई की कंपकंपी कुछ कम हुई। इंजेक्शन का प्रभाव था या थकावट, फत्ते भाई को नींद आ गई। शरीफ भाई ऑटो-रिक्शा बुला लाए। हमीदा बीवी रोते-रोते बेहाल हुई जा रही थीं। बलदेव की घरवाली आ गई थी और उन्हें सांत्वना दे रही थी। उनके पास तीनेक हजार रूपए थे। शरीफ भाई और बलदेव पनवाड़ी ने धैर्य रखने को कहा। रूपए-पैसे की चिन्ता नहीं करने को कहा। हमीदा बीवी सिर्फ रो रही थीं। इसके बाद चला महंगी दवाओं का लम्बा इलाज। फत्ते भाई इस बीच भिलाई के डॉक्टरों को दिखा आए। इससे फायदा हुआ। जबड़ा जो एक तरफ लटक गया था, उसमें जान आई। बोलने-खाने में उन्हें अब भी परेशानी होती थी। सिानीय मस्जिद के हाफ़िज ने तावीज दिया था। फत्ते भाई की बांह पर तावीज बंधा रहता। अंग्रेजी दवा भी चालू थी। हमीदा बीवी ने ताजुद्दीन बावा के मजार में ‘चादर चढ़ाने’ की मन्नत मानी। ख़्वाजा गरीब नवाज को भी चादर चढ़ाने की मनौती मानी। स्थानीय शाह बाबा की मजार पर जाकर माथा टेक आई थीं। मुजावर बताशा बाबा को घर बुलाकर फत्ते भाई पर दम भी करवा दिया था। पता नहीं ये अंग्रेजी दवाओं का असर था या गंडा-तावीजों का प्रभाव......... फत्ते भाई का जबड़ा अपनी जगह में आने लगा था। फत्ते भाई दुकान खोलकर बैठने भी लगे थे। इस बीमारी में उनके कई हजार खतम हो चुके थे। बीमारी ठीक न हुई थी। कोई कहता दिल्ली चले जाओ, कोई सलाह देता मद्रास। फत्ते भाई सबकी सुनते, मन की करते। उन्हें तो सबसे ज्यादा चिन्ता मुहर्रम की सताती। यदि रोग यूं ही बना रहा तो ताजिया कैसे उठेगा। या गरीब-नवाज, या मुशकिल-कुशा!

फत्ते भाई पढ़े-लिखे न थे। हां लढ़े जरूर थे। दुनिया की ठोकरों ने उन्हें तैयार किया था। इल्म और मजहब के बारे में जिसने जो बताया, मान लेते। किसी दूसरे मजहब की बुराई कतई न करते। बलदेव पनवाड़ी उनका पड़ोसी, कुछ न कुछ नई सूचनाएं दिया करता। आजकल बाजार में कटनी के पास किसी चमत्कारी जगह का बहुत प्रचार हो रहा था। कहते हैं, वहां स्वयं बजरंग बली प्रकट हुए हैं। असाध्य रोग जैसे लकवा, टीबी, कैंसर, बवासीर, मधुमेह सब ठीक हो जाते हैं। बलदेव अपनी छोटी बहन को लेकर वहां गया था। लौटकर आया तो फत्ते भाई को हाल-चाल बताने लगा।--’’बजरंगबली की महिमा अपरम्पार है फत्ते भाई। लछमन जी को मूर्छा लगी थी तो मृत संजीवनी बूटी लेकर बजरंगबली ने दिया था। तब जाकर लछमनजी की मूर्छा टूटी थी। कटनी के बजरंगबली का प्रसाद किसी संजीवनी बूटी से कम नहीं। वहां प्रसाद में चढ़ाया गया नारियल संत-महात्मा अपने हाथों से रोगी को देते हैं। इसमें भभूत भी मिला होता है। जितना भी प्रसाद मिले, उसके चार हिस्से बनाने पड़ते हैं। चार दिन की चार खूराक। कैसा भी मर्ज़ हो। स...ब ठीक हो जाता है। हजारों लोग डेली वहां पहुंच रहे हैं। दिल्ली, बम्बई, कलकत्ता और भी जाने कहां-कहां से बेचारे, किस्मत के मारे वहां आते हैं। किसी को कैंसर है, किसी को लकवा, किसी को टीबी है तो किसी को शक्कर की बीमारी। फत्ते भाई ने उसे टोका--’तुम्हारी बहन अब कैसी है?’’

बलदेव पनवाड़ी ने बताया-’’उसके साथ तो चमत्कार ही हुआ। हम लोग तो निराश थे। लेकिन प्रसाद का पहला खूराक खाते ही उसके कमजोर हाथों में ताकत आ गई। पूजा की डलिया उसी हाथ में उठाए वह वापस लौटी। टांगों में भी कोई नई शक्ति को वह महसूस कर रही है। आज दूसरा खूराक खाई है। बजरंगबली की महिमा अपार! क्या बताएं फत्ते भाई, हम वहां मंगल के दिन पहुंचे तो भीड़ देखकर हौसला पस्त हो गया था। सोचा कि नम्बर शायद अब बुधवार को ही आएगा, किन्तु बजरंगबली की कृपा ऐसी हुई कि उसी दिन प्रसाद मिल गया।’’
फत्ते भाई आजकल बोलते कम और सुनते अधिक थे। जबड़े की शक्तिहीनता के कारण उन्हें तकलीफ होती थी। बलदेव तो अपनी बहन को लेकर दुनिया घूम चुका था। फत्ते भाई के साथ ख़्वाजा गरीब नवाज की मजार मे जाकर मन्नत भी मान आया था। सुनवाई हुई तो बजरंगबली के पास! शायद ख़्वाजा गरीब नवाज खुद फत्ते भाई को इसी बहाने कोई रास्ता दिखा रहे हों। आस्थावान, फत्ते भाई के लिए ये नया विचार आशाजनक लगा। पूछ बैठे--’’यार बलदेव भाई, हमारे वास्ते भी परसाद मंगवा दो न!’’

बलदेव ‘नहीं’ की मुद्रा में सिर हिलाने लगा--’’नहीं हो सकता फत्ते भाई!

वहां का प्रसाद बनिया की दुकान में बिकने वाला हल्दी-जीरा नहीं कि गए, पुड़िया बनवाई, पैसे दिए और चल दिए। वहां तो साथी पूरे देश से श्रद्धालु आते हैं। अमीर-गरीब सभी, नाना प्रकार के रोग पाले हुए लोग। सभी को हनुमान जी के सामने आरती में खड़ा होना पड़ता है। शीश झुका कर प्रसाद ग्रहण करना पड़ता है। जिसे मर्ज हो, वही प्रसाद पाए। और कोई दूसरा तरीका नहीं है। वहां आपको जाना ही होगा।’’

फत्ते भाई सारा दिन मथते रहे खुद को। एक मुसलमान का मंदिर में जाकर पूजा में शामिल होना, फिर प्रसाद पाना, उसे खाना...छिरू   छिरू! नहीं हो सकता।

वह मर भले जाएं, ऐसा गुनाह कभी न करेंगे। फिर विचार आता कि उनके हिन्दू भाई तो ताजिया हो या शाह बाबा की मजार या अजमेर शरीफ की यात्रा....सभी जगह बेहिचक शामिल होते हैं और पूरी अकीदत रखते हैं। उन्हें जनसंघियों का भाषण याद हो आया। उस दिन चैक में जनसंघी नेता भाषण दे रहे थे--- ‘‘हिन्दुस्तान में मुसलमान कहीं बाहर से नहीं आए हैं, बल्कि मुगलों के शासनकाल में इनके पूर्वजों ने अंधाधुंध धर्म परिवर्तन किया था। इसी प्रकार आज इसाई मिशनरियां सक्रिय हैं। मुसलमान हमारे छोटे भाई हैं।’’

उस दिन फत्ते भाई को गुस्सा हो आया था कि यदि हम छोटे भाई हुए तो हिन्दू सब बड़े भाई। यानी हमें हिन्दुओं से हमेशा दब के रहना होगा क्योंकि हम तो उनके छोटे भाई जो हुए। लगता है हुमायूं-अकबर का जमाना भूल गए हैं सब। लेकिन बाद में जब उनका क्रोध शांत हुआ तो उन्हें वास्तविक लगी थी जनसंघियों की बातें। हिन्दुस्तानी मुसलमानों में उच्च कुल वंश परम्परा का आधिपत्य था, जबकि छोटी जातियों के मुसलमान जो अमूमन रंग-रूप, कद-काठी में दलित हिन्दू भाई की तरह दीखते, अशराफों द्वारा हिकारत की निगाह से देखे जाते। स्वयं फत्ते भाई को साई कहकर लोग उनका मखौल उड़ाया की करते हैं। उनकी पत्नी हमीदा बीवी को ‘छत्तीसा’ करकर चिढ़ाया ही जाता है। उन्हें बस यही लग रहा था कि अल्लाह तआला खुद उन्हें रास्ता दिखा रहे हों। उनके दिलो-दिमाग में एक ही बात रह-रहकर उभर रही थी, कि बलदेव के साथ जाकर एक बार बजरंग बली को भी आजमा लिया जाए। बचपन में तो वे गणेश पूजा, दुर्गा पूजा, काली पूजा का प्रसाद बड़े शौक से खाया करते थे। रामलीलाएं भी बहुत देखा करते थे। आरती की थाल के लिए तब वे जेब में पांच-दस पैसा खुदरा जरूर रखा करते। आरती की थाल लेकर पुजारी आता तो दीपक की लौ की आंच से हथेली तर करके सिर पर फेर लेते। पैसा थाल पर छोड़ दिया करते। उनके अधिकांश दोस्त हिन्दू थे। भले ही बचपन में झगड़ा-लड़ाई होने पर वही दोस्त अन्य गालियों के अलावा ‘कटुआ’ और ‘पाकिस्तानी’ की गाली दिया करते हों, किन्तु बचपन का झगड़ा होता कित्ती देर के लिए था। बस यही इत्ती से देर के लिए ही तो...!

इस्लाम के एकेश्वरवाद की कट्टर दीक्षा से वह वंचित रहे। इस्लाम में चमत्कार की प्रमुखता नहीं, वे नहीं जानते थे। अल्लाह के प्यारे रसूल इस दुनिया में आए और बिना किसी जादू या चमत्कार दिखाए इस्लाम के संदेश को जन-जन तक पहुंचाया। वे तो यही जानते थे कि जिस तरह मजार खानकाहों में मन की मुुरादें पूरी हो जाती हैं, उसी तरह से चमत्कारिक सिलों में भी ऐसी शक्तियां होती हैं, जिनसे इंसान के दुख-दर्द दूर हो जाते हैं, भले ही वे सिल अन्य धर्मावलम्बियों के हों। अकसर अपने दोस्तों के बीच वे कहा करते---’’धर्म अलग हों तो क्या पहुंचना तो सबको एक ही जगह है।’’ फत्ते भाई बहुत भोले-भाले मुसलमान थे। शायद इसीलिए इंसानियत पर आस्था-विश्वास उनके कायम था। घर आए तो बीवी हमीदा उनकी चिन्ता का कारण जान परेशान हो उठीं। अपनी सीमित सूझ-बूझ के तहत उन्होंने भी फत्ते भाई को यही सलाह दी कि एक बार गुपचुप आजमा आने में हर्ज ही क्या है। सैयदानियां भी तो ज्योतिशियों, तांत्रिकों की गुपचुप मदद लिया करती हैं।


फत्ते भाई और बीवी हमीदा ने बलदेव भाई को घर बुलवा लिया। सिर्फ तीन लोग ही इस बात के जानकार थे। फत्ते भाई इलाज के लिए कटनी के पास स्थित बजरंगबली के चमत्कारिक सिल जा रहे हैं। कटनी छरू घण्टे का रास्ता है। सुबह शटल से निकले और बारह बजे तक कटनी पहुंच गए। किसी का कानो कान खबर भी न हो और प्रसाद भी पा लिया जाए। लेकिन होनी को कुछ और ही मंजूर था। चारों तरफ एक ही चर्चा। फत्ते भाई काफिर हुए। उन्हें दुबारा कलमा पढ़ कर इस्लाम में दाखिल होना होगा। फत्ते भाई ने बजरंगबली का प्रसाद ग्रहण किया था। अंग्रेजी दवाएं भी चल रही थीं।  उनका जबड़ा नार्मल हुआ जा रहा था। फत्ते भाई अपनी ठीक होती हालत से खुश थे लेकिन नगर में उठ रही चर्चा से भयभीत भी थे। शाम शरीफ भाई ने फत्ते भाई से जानना चाह कि नगर में आजकल जो चर्चा चल रही है क्या वह वाकई सच है?

फत्ते भाई सहम गए। जिससे डरते थे वही बात हो गई। हमीदा बीवी के कान में भी मस्जिद-मुहल्ला से उठने वाली आवाजें सुनाई देने लगी थीं। इसका अर्थ ये हुआ कि उनका कटनी जाकर बजरंगबली की पूजा-अराधना और प्रसाद-ग्रहण की खबर यहां पहुंच चुकी है। खुदा जाने, क्या होगा? या परवरदिगार.................या गौस-पाक! गुमटी बंद कर घर लौटना चाह रहे थे कि बरेलवी मस्जिद की अंजुमन कमेटी का कारिंदा सब्जीफरोश कल्लू मियां आ पहुंचा। उन्हें रोककर उसने फुसफुसाते हुए कहा--’’फत्ते भाई, कल बाद नमाज जुहर आप मदरसा आइएगा। वहां कमेटी आपसे कुछ सवाल-जवाब करेगी।’’

फत्ते भाई उस समय भौंचक-अवाक रह गए। दिल की धड़कनें बढ़ र्गइं। कान सांय-सांय करने लगा। जिस जबड़े के इलाज के लिए वे कटनी गए थे, वह जबड़ा पुनरू अशक्त हो लटक सा गया। कल्लू मियां पुनरू फुसफुसाए--’’का हो, बात सही है कि आप हिन्दुअन के भगवान की पूजा-पाठ किए रहौ?’’

फत्ते भाई उस नामाकूल से कुछ न बोले। उन्हें कुछ भी समझ न आ रहा था कि क्या करें, क्या न करें। बचपन में गलती पकड़े जाने पर अच्छा इलाज हुआ करता था। मार पड़ने पर जोर-जोर से रोने लगो तो मार कम पड़ती थी। लेकिन इस गलती के लिए अल्लाह-रसूल की बारगाह में दोशी, गुनहगार होने के अलावा कमेटी और बिरादरी में भी अपमानित होने का भय उन्हें शर्मसार किये जा रहा था। सिर्फ याद आ रही थीं हमीदा बीवी। वे बेहोश होने से पूर्व हमीदा बीवी के पास पहुंचना चाह रहे थे। हमीदा बीवी, उनका इश्क, उनकी शरीके-हयात, उनकी मरहूम अम्मा का अवतार, उनके जीवन का आधार!



मदरसा का सभागार।

बड़ा सा हाल। खराब मौसम के कारण अंदर बिजली जला दी गई थी। पूरे हाल में दरी बिछी थी। मुख्य द्वार के ठीक सामने वाली दीवार पर बीचों-बीच ‘मक्का-मदीना’ की एक बड़ी तस्वीर लगी थी। उसी तस्वीर के नीचे सफेद कपड़े, काली टोपी में कुछ सफेद दाढ़ीदार बुजुर्ग बैठे थे। उनके सामने लकड़ी की एक छोटी सी टेबिल थी जिस पर कागजात रखे थे। फत्ते भाई अपने साथ शरीफ भाई को भी ले आए थे। शरीफ भाई सदर जनाब मन्नान सिद्दीकी से गुफ्तगू कर रहे थे। फत्ते भाई ने हाल में उपस्थित मजमे पर उड़ती सी निगाह डाली। तमाम लोग परिचित थे। सभी के चेहरे पर एक प्रश्न-चिन्ह लटक रहा था। मंच पर बैठे थे जनाब सैयद मुस्तफा रजा साहब। उनके दाहिनी जानिब थे सेक्रेटरी जनाब “शेख सत्तार खां साहब और पेश-इमाम जनाब मुहम्मद शाहिद कादरी तथा सदर साहब के बाई जानिब बैठे थे कब्र में पांव लटकाए बुजुर्ग हकीम मन्जूरूल हक साहब।  ये ही लोग हैं जो आज फत्ते भाई की गुस्ताखी का फेसला करेंगे। फत्ते भाई ने अपने कमजोर दिल के बा-रफ्तार चलते रहने के लिए सारी कायनात के मालिक अल्लाह तआला को याद किया। फिर रसूले-खुदा को याद किया। फिर भी घबराहट जारी रही तब गौस-पाक, फिर गरीब-नवाज सभी को याद किया। घबराहट कम हुई तो मुकद्दमा के लिए मुंसिफों के सामने जा बैठे। दरी एकदम ठण्डी थी। हॉल की अंदरूनी फिजा सर्द थी। सेक्रेटरी जनाब सत्तार साहब जिनकी कपड़े की बड़ी दुकानें इस नगर में हैं, की आवाज गूंजी और सभा शांत हुई। --’’बिरादराने इस्लाम, अस्सलाम व अलैकुम!’’ सलाम का जवाब सुने बगैर उन्होंने बात जारी रखी। --’’फतह मुहम्मद वल्द बन्ने साई पर इल्जाम है कि ये अपने इलाज के लिए काफिरों के देवताओं की  पूजा-पाठ किए और वहां से पूरी अकीदत के साथ जो चढ़ाया गया प्रसाद मिला, उसे खाया और उस देवता-बुत के आगे सिर झुकाया। क्या फतह मुहम्मद वल्द बन्ने साई पर लगाए गए इल्जाम सही हैं? जवाब खुद फतह मुहम्मद दें।’’

फत्ते भाई को काटो तो खून नहीं। क्या कहते। गलती तो हो ही गई थी। उन्होंने कितना बड़ा गुंनाह किया था, उसका उन्हें अन्दाजा न था। फत्ते भाई खड़े हुए। कुछ समझ में न आ रहा था कि क्या सफाई दें कुछ बोलना चाहा तो तनाव के अतिरेक में चेहरा विकृत हुआ, जबड़ा पुनरू लटक गया। कण्ठ अवरूद्ध हो गया। बस फत्ते भाई को इतना याद है कि उन्होंने सिर हिलाकर तमाम इल्जामात को मंजूरी दे दी थी। सेक्रेटरी साहब चुप रहे। बहस की गुंजाईश खत्म हो गई थी। जुर्म कुबूल लिया गया था। उपस्थित जन-समूह बड़ी नफरत से फत्ते भाई को ताक रहा था और इशारा कर बातें बना रहा था। हॉल का माहौल एकबारगी गर्म हो गया। फत्ते भाई के पक्ष में कोई बोलने वाला न था। फत्ते भाई इस तरह बीच सभा में खड़े थे जैसे उन पर कत्ल या ज़िना का इल्जाम लगा हो। दुख हो या खुशी का मौका.............भीड़ का चरित्र एक तरह का होता है। ऐसा नहीं है कि इस महफिल में फत्ते भाई ही एक गुनहगार हों। रोजमर्रा की जरूरतों में फंसा हरेक शख़्स किसी न किसी गुनाह में मुब्तिला है, बस फर्क इतना है कि शिर्क यानी कुफ्र  का गुनाह सबसे बड़ा गुनाह होता है अर्थात गुनाहे-कबीरा। ऐसा गुनाह करने वाला काफिर हो जाता है और गुनाह से तौबा करने के बाद दुबारा इस्लाम कुबूल करता है। यह तो सभी जानते हैं कि इस्लाम में बुतपरस्ती की मनाही है और बुतपरस्त काफिर होता हैं। फत्ते भाई ने यकीनन बुतपरस्ती की थी लेकिन इस महफिल में ऐसे कितने लोग है जो जादू-टोना, भूत-प्रेत आदि में फंस जाने पर काफिरों के तौर-तरीकों से झड़वाते-फुुकवाते नहीं। मन में बसा भूत-प्रेत जब अपने आमिलों के काबू में नहीं आ पाता तब गैरों के दरवाजे पर चोरी छिपे जाकर झड़वाया तो सभी करते हैं। महफिल में बैठा कोई भी शख़्स  ये नहीं सोच पा रहा था कि आखिर वे कौन से हालात हैं जिनसे घबराकर ‘एक अल्लाह’ को सबसे बड़ा मानने वाले लोग अपने ईमान-यकीन से डिग जाते हैं। मजार-खानकाहों में मन्नत-मुरादें मांगने, रोन-गिड़गिड़ाने वाले जाहिल मुसलमान कब किधर का रूख करेंगे कौन जानता है। सेक्रेटरी सत्तार खां साहब जानते थे और न जनाब मन्नान सिद्दीकी साहब, जो यंग मुस्लिम कमेटी के आतिश बयान सदर थे। तभी बुजुर्ग जनाब हकीम मन्जूरूल हक साहब लरजते हुए उठ खड़े हुए। महफिल में खामोशी छा गई। बुजुर्गवार से खंखारकर बोलना शु रू किया--’’बिरादराने इस्लाम, गौरो-फ़िक्र के बाद कमेटी इस नतीजे पर पहुंची है कि फतह मुहम्मद वल्द बन्ने साई से कुुफ्र हुआ है। कुरआन और हदीस की रोशनी में ये गुनाहे-कबीरा है। कमेटी की राय है कि फतह मुहम्मद वल्द बन्ने साई, इस्लाम में दुबारा दाखिल हों। कल इन्शाअल्लाह, बाद नमाज जुमा, जामा मस्जिद में फतह मुहम्मद हाजिर होकर कलमा पढ़ें। दूसरी अहम बात ये है कि कुफ्र करने वाले का निकाह टूट जाता है, इसलिए उसे दुबारा निकाह भी पढ़वाना होगा। अस्सलाम व अलैकुम।’’

हकीम साहब बैठ गए।

महफिल खत्म हुई।

फत्ते भाई के कमजोर बेसुध जिस्म को शरीफ भाई जगाना चाह रहे थे।

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