एक संवादधर्मी क्रांतिकारी संत का जाना - प्रो. तुलसी राम को याद करते, गंगा सहाय मीणा

एक संवादधर्मी क्रांतिकारी संत का जाना
गंगा सहाय मीणा 

एक संवादधर्मी क्रांतिकारी संत का जाना - प्रो. तुलसी राम को याद करते, गंगा सहाय मीणा

प्रो. तुलसी राम का जाना एक दलित लेखक का जाना मात्र नहीं है, बल्कि यह बुद्ध और कबीर की परंपरा के उस क्रांतिकारी संत का जाना है जो अपने लेखन ही नहीं, जीवन में भी तमाम भौतिक परिस्थितियों के बावजूद ताउम्र अदम्‍य जिजीविषा के साथ समता और बंधुत्‍व पर आधारित एक बेहतर समाज बनाने के लिए संघर्ष करता रहा. यह बात सच है कि हिंदी समाज में उनको व्‍यापक पहचान उनकी आत्‍मकथा ‘मुर्दहिया’ (2010) और ‘मणिकर्णिका’ (2014) के माध्‍यम से मिली लेकिन इन आत्‍मकथाओं से इतर भी प्रो. तुलसी राम का एक विशाल व्‍यक्तित्‍व रहा है. वे देश के शीर्ष विश्‍वविद्यालयों –बीएचयू और जेएनयू- में अंतर्राष्‍ट्रीय राजनीति के छात्र और अध्‍यापक रहे. इस प्रक्रिया में उन्‍होंने भारतीय उपमहाद्वीप की समस्‍याओं को वैश्विक संदर्भों से जोड़कर देखा और मुक्ति की विचारधाराओं और संघर्षों की समीक्षा की. वे भारतीय समाज के बुनियादी सवालों पर सजग दृष्टि रखने वाले विद्वान थे. 

मैंने और मेरी पत्‍नी मीनाक्षी ने मिलकर पिछले दो-तीन वर्षों में उनके लगभग एक दर्जन साक्षात्‍कार किये जिनमें से अधिकांश विभिन्‍न प‍त्र-पत्रिकाओं में उनके लेख की शक्‍ल में प्रकाशित हुए. लोकसभा चुनाव 2014 से ठीक पहले उनका जनसत्‍ता में प्रकाशित लेख ‘मोदी और दलित’ भी हमने साक्षात्‍कार कर तैयार किया था. वह आलेख इतना पसंद किया गया कि आम आदमी पार्टी ने उसकी फोटोकॉपी दिल्‍ली और बनारस की जनता के बीच बांटी. हमने उनका आखिरी सा‍क्षात्‍कार 14 अक्‍टूबर 2014 को किया जो 26 अक्‍टूबर 2014 के ‘जनसत्‍ता रविवारी’ में प्रकाशित हुआ. 

14 अक्‍टूबर 2014 की शाम जब प्रो. तुलसी राम के दिए समय पर हम उनके घर उनका साक्षात्‍कार लेने के लिए पहुंचे तो पता चला कि 13 तारीख को हुई डायलसिस के दौरान दिए गए हिपारिन नामक एक इंजेक्‍शन की वजह से 12 को संपन्‍न हुए उनके ऑपरेशन के टांकों में से खून बहने लगा. 12 अक्‍टूबर को दाएं हाथ में फेस्‍तुला बनाने के लिए उनका एक मेजर ऑपरेशन हुआ. उल्‍लेखनीय है कि दोनों किडनी फेल होने की वजह से पिछले 6 वर्षों से उनका हर वैकल्पिक दिन, यानी एक दिन छोड़कर अगले दिन, डायलसिस होता था. डाइलिसिस के लिए बनाए गए पॉइंट को फेस्‍तुला कहा जाता है जो धमनी और शिरा को जोड़कर बनाया जाता है. शुरू के साढ़े पांच साल उनके बाएं हाथ में बने फेस्‍तुला से उनका डायलासिस हो रहा था. लगभग 8 महीने पहले वह फेस्‍तुला फेल हो गया. उसके बाद सीने में एक कामचलाऊ फेस्‍तुला बनाया गया जिसकी कार्यअवधि औसतन 6 महीने होती है. इस बीच उन्‍होंने अपने दाएं हाथ में भी फेस्‍तुला बनवाया लेकिन ऑपरेशन के कुछ समय बाद ही वह फेल हो गया. संकट की इस घड़ी में उन्‍हें एक वास्‍कुलर सर्जन का सहारा मिला जिन्‍होंने साढ़े तीन घंटे के ऑपरेशन के बाद 11 अक्‍टूबर को दाहिने हाथ में काफी चीर-फाड़ के बाद एक फेस्‍तुला बनाया. इसी फेस्‍तुला में लगातार खून बहना शुरू होने के कारण बड़ी क्रिटिकल स्थिति पैदा हो गई. निदान के तौर पर उन सर्जन ने फेस्‍तुला पॉइंट के पास इकट्ठे हो चुके लगभग ढाइ सौ ग्राम खून को निकाल दिया. तब जाकर कुछ राहत मिली. लेकिन इससे शरीर में खून की बहुत कमी हो गई. इन परिस्थितियों में भी उन्‍होंने अपनी सक्रियता को कम नहीं होने दिया. दिसंबर में उन्‍हें निमोनिया हो गया और उसके बाद वे लगातार कमजोर होते चले गए. लगातार डायलिसिस और इलाजों की प्रक्रिया से गुजरने के दौरान ही लगभग एक साल पहले उनके गले में कुछ तकलीफ हुई, जिसकी वजह से गले से पहले जैसी आवाज नहीं आ पाती थी. निमोनिया और बेहद कमजोरी के बीच उन्‍होंने गले का ऑपरेशन कराने का भी फैसला कर लिया था. मैंने अपने जीवन में इतनी भीषण स्‍वास्‍थ्‍य समस्‍याओं के बीच इतनी अदम्‍य जिजीविषा किसी और व्‍यक्ति में नहीं देखी. उनकी आत्‍मकथा के दोनों भागों के नामकरण से लेकर उनमें वर्णित जीवन को देखने पर लगता है मानो मृत्‍युबोध ही आदमी को जीना सिखाता है, उसके अंदर अदम्‍य जिजीविषा भरता है.

एक संवादधर्मी क्रांतिकारी संत का जाना - प्रो. तुलसी राम को याद करते, गंगा सहाय मीणा
प्रो. तुलसी राम संभवतः अकेले अंबेडकरवादी चिंतक रहे हैं जिनकी दलितों के साथ गैर-दलितों में भी व्‍यापक स्‍वीकार्यता रही. उनका जीवन और लेखन हमेशा संवादधर्मी रहा. इसी संवादधर्मिता का परिणाम है कि उनके यहां मार्क्‍सवाद और अंबेडकरवाद दो विरोधी नहीं, सहगामी विचारधाराएं हैं. वे बुद्ध, मार्क्‍स और अंबेडकर के विचारों के मेल से दलित मुक्ति के दर्शन के निर्माण के हिमायती थे. अपने जीवन और लेखन में जातिवाद और ब्राह्मणवाद के प्रखर आलोचक प्रो. तुलसी राम के संवादधर्मी व्‍यक्तित्‍व का ही परिणाम है कि गैर-दलित समाज में भी उनके प्रशंसकों की बहुत बड़ी संख्‍या है. वे गौतम बुद्ध के जीवन का उदाहरण देकर कहते थे कि क्रोध या आक्रोश से बड़ा मूल्‍य संवाद और शांति का है. इसी संवादधर्मिता की जरूरत के साथ वे दलित लेखन के हिमायती थे और कहते थे कि जब तक समाज में जातिवाद रहेगा, जातिवाद विरोधी लेखन की महत्‍ता और प्रासंगिकता बनी रहेगी. उनके लेखन की गहराई ने ही साहित्‍य ही नहीं, समाज-विज्ञानों के अध्‍येताओं को उनके साहित्यिक लेखन की ओर खींचा है.

प्रो. तुलसी राम के अंदर ज्ञान की अनंत गहराई के साथ कबीर सी फक्‍कड़ता भी देखी जा सकती है. जिन लोगों ने उनका घर देखा है, वे जानते हैं- कोई प्रोफेसरी अंदाज नहीं, पूरी तरह फकीराना जिंदगी. जीवन से लेखन तक कहीं कोई दिखावा या लाग-लपेट नहीं- बाहर-भीतर एक. और एकदम ‘जो घर फूंके आपनो, चले हमारे साथ’ वाला अंदाज. रूढियों और मिथकों का भंजन करना हो या भारत में बढ़ते फासीवाद के खतरे पर प्रहार करना हो, वे सीधे शब्‍दों में ताकतवर से ताकतवर सत्‍ता को चुनौती देते नजर आते हैं. इस प्रक्रिया में वे दलित राजनीति के फासीवादी ताकतों की गोद में जा बैठने की भी आलोचना करते हैं. संप्रदायवाद और जातिवाद की राजनीति करने वालों पर निशाना साधने के साथ उन्‍होंने हमेशा दलित राजनीति की सीमाओं के प्रति भी चेताया. उनका व्‍यक्तित्‍व एक जुझारू सामाजिक एवं बौद्धिक कार्यकर्ता का व्‍यक्तित्‍व रहा है. उन्‍होंने ‘अश्‍वघोष’ नामक प्रसिद्ध साहित्यिक पत्रिका का संपादन किया. अंतर्राष्‍ट्रीय राजनीति पर उन्‍होंने कई किताबें लिखी हैं, जिनमें ‘अंगोला का मुक्ति संघर्ष’, ‘सी. आई.ए.: राजनीतिक विध्वंस का अमरीकी हथियार’, ‘द हिस्ट्री ऑफ़ कम्युनिस्ट मूवमेंट इन ईरान’, ‘पर्सिया टू ईरान’ (वन स्टेप फारवर्ड टू स्टेप्स बैक) तथा ‘आइडियोलॉजी इन सोवियत-ईरान रिलेशन्स’ (लेनिन टू स्टालिन) आदि प्रमुख हैं. उनके ईरान संबंधी अध्‍ययन अध्‍येताओं के बीच बहुत लोकप्रिय हैं.

प्रो. तुलसी राम वैज्ञानिक चेतना के लेखक रहे हैं. वे अपने तमाम सृजनकर्म में जिस तरह से मिथकों को डीकोड करते हैं और उन्‍हें वैज्ञानिकता की कसौटी पर कसते हैं, वह अपने आप में अद्भुत है. साथ ही वे सामाजिक न्‍याय के प्रबल समर्थक भी रहे हैं. जब पदोन्‍नति में आरक्षण का सवाल आया तो प्रो. तुलसी राम पूरी प्रतिबद्धता के साथ इसके पक्ष में खड़े हुए. वे दलितवाद के अतिरेकों का विरोध करते थे लेकिन दलितों के साथ हुए ऐतिहासिक अन्‍याय पर खुलकर बोलते और लिखते थे. और इसीलिए वे सामाजिक न्‍याय के औजार के तौर पर शुरू हुई आरक्षण व्‍यवस्‍था के प्रबल समर्थक थे.

वे एक अच्छे लेखक ही नहीं, अच्‍छे व्‍यक्ति भी थे- उनके जीवन से जुड़े लोग इस बात के साक्षी हैं. उनके समकालीनों को उनके बनाए खाने का टेस्‍ट अब भी याद है जब वे पेरियार हॉस्‍टल में कई बार खुद पकाते थे और अपने दोस्‍तों को बड़े प्‍यार से खिलाते थे. वे जेएनयू की उस पीढ़ी के अध्‍यापक थे जिन्‍होंने जेएनयू को जेएनयू बनाया. जो चीजें जेएनयू को खास बनाती हैं, उनमें एक प्रमुख विशेषता है वहां की स्‍टूडेंट-टीचर रिलेशनशिप. अपने विद्यार्थियों के प्रति तुलसी राम जी का व्‍यवहार बेहद लोकतांत्रिक और सहयोगपूर्ण था. शायद यही वजह है कि उनके निधन पर सबसे ज्‍यादा शोकमग्‍न उनके विद्यार्थी ही हुए. उनकी अंतिम यात्रा और शोकसभाओं में कई विद्यार्थियों को मैंने फूट-फूटकर रोते देखा है.

प्रो. तुलसी राम बौद्ध धर्म-दर्शन के बहुत बड़े अध्‍येता थे. आप किसी भी समस्‍या पर उनसे बात कीजिए, वे आपको थेरीगाथाओं में ले जाकर उसका विश्‍लेष्‍ण करते हुए समाधान प्रस्‍तुत कर देंगे. बौद्ध दर्शन पर वे बड़ी संवेदनशीलता के साथ बात करते थे- पूरी तरह डूबकर. उनकी स्‍मृति कितनी तीक्ष्‍ण थी, इसका अंदाजा आप ‘मुर्दहिया’ पढ़ते हुए लगा सकते हैं. जब वे अपने जीवन के बारे में बताते थे तो लगता है मानो एक बिंदु पर जाकर उनका और बुद्ध का जीवन मिल गया हो, एकमेक हो गया हो. उनकी संवादधर्मिता, लोकतांत्रिक चिंतन और व्‍यवहार, वैज्ञानिक चेतना आदि तत्‍व संभवतः उनके जीवन और लेखन में बुद्ध के दर्शन को आत्‍मसात करने के क्रम में ही आए होंगे, गहरे हुए होंगे.

प्रो. तुलसी राम को अभी अपने जीवन के आखिरी 4 दशकों के बारे में लिखना था जिसनमें जेएनयू के जीवन के साथ सोवियत संघ और अंतर्राष्‍ट्रीय राजनीति के अध्‍ययन-अध्‍यापन के अनुभव आने थे. ‘जेएनयू मौसी’ नाम से लिखने की योजना बना चुके प्रो. तुलसी राम की आत्‍मकथा का यह तीसरा भाग ज्‍यादा वैचारिक और व्‍यापक होता. उन्‍होंने अपने लेखन के माध्‍यम से दलित साहित्‍य के उन आलोचकों का मुंह बंद कर दिया जो दलित लेखन के दर्शन और शिल्‍प पर सवाल उठाते थे. जातिवादी शोषण-तंत्र का पर्दाफाश करने वाली उन बारीक स्‍मृतियों में डूबे उस रोचक गद्य ने हिंदी साहित्‍य को नई भाषा दी है. जब तक समाज में संवादधर्मिता की जरूरत रहेगी, प्रो. तुलसी राम का जीवन और लेखन प्रासंगिक रहेगा और समता और बंधुत्‍व पर आधारित समाज की स्‍थापना के लिए आने वाली पीढि़यों का मार्ग प्रशस्‍त करता रहेगा. इस संवादधर्मी क्रांतिकारी संत को आखिरी सलाम.

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