पशु योनि के तोरण द्वार - विभूति नारायण राय

कबिरा हम सबकी कहैं 

पशु योनि के तोरण द्वार

विभूति नारायण राय

vibhuti narain rai's editorial of Vartman Sahitya January 2015 issue
यह समझना बड़ा दिलचस्प होगा कि इस घर वापसी का मतलब क्या है? जाति व्यवस्था की जकड़न में फंसा हिंदू समाज अपने बीच के ही अधिसंख्य को मनुष्य मानने से इनकार करता रहा है। ज्यादातर दलित, पिछड़े और आदिवासी मनुष्य के रूप में स्वीकृति पाने की छटपटाहट के चलते मुसलमान या ईसाई बने थे। अब यदि उनमें से कोई घर वापसी करना चाहे तो उसे कौन-सा दर्जा मिलेगा—मनुष्य का या फिर वह वापस उसी पशु योनि में जाएगा जिससे बचने के लिए उसने अपना घर छोड़ा था?
कौमों के इतिहास में कई बार ऐसे निर्णायक क्षण आते हैं जब यह कहा जा सकता है कि उसके बाद वे वही नहीं रह गर्इं जो उसके पहले थीं। जीवन में उथल-पुथल लाने वाले ये क्षण अपने समाजों को आत्मान्वेषण का अवसर देते हैं, कई बार अपनी गलतियों से सीख कर उसे संकट से उबरने का मौका भी देते हैं और बाज वक्त गलतियों से सबक लेने में चूक जाने वाले समाजों को हमने नष्ट होते हुए भी देखा है। 16 दिसंबर, 2014 ने पाकिस्तान को एक ऐसा ही अवसर दिया है। इस दिन सुबह-सुबह आर्मी पब्लिक स्कूल पेशावर के 137 बच्चों को तहरीके-तालिबान पाकिस्तान ने निर्ममता के साथ कत्ल कर दिया। इस नृशंस हत्याकांड से पूरा पाकिस्तान दहल उठा। किसी के लिए भी यह विश्वास करना कठिन था कि जिन तालिबानों को पाकिस्तानी राज्य और फौज ने पैदा किया और पाल-पोस कर बड़ा किया था वे ही अपने आकाओं के बच्चों को इतनी निर्ममता से कत्ल करेंगे। प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को पाकिस्तानी इस्टेबलिशमेंट की इस स्थापना को सार्वजनिक रूप से नकारना पड़ा कि तालिबानों में कुछ अच्छे तालिबान हैं और कुछ बुरे। इस घटना के बाद पाकिस्तान में कई तरह की बहसें चलीं पर जल्दी ही वे पुराने अंतर्विरोधों में खो गर्इं। जहां जनता का एक बड़ा हिस्सा तालिबानों के पक्ष में कोई भी तर्क सुनने के लिए तैयार नहीं था वहीं धार्मिक कठमुल्लों का प्रतिनिधित्व करने वाले कई तरह के बहाने तलाश रहे थे। मैंने बड़ी दिलचस्पी के साथ ये बहसें पढ़ीं और सुनीं। मेरा पहली बार अपालजिस्ट शब्द से परिचय हुआ। हिंदी में इसके लिए कोई सटीक शब्द न ढूंढ़ पाने के कारण मैं अपालजिस्ट ही लिख रहा हूँ। अपालजिस्ट वह व्यक्ति है जो आंख में उंगली डालकर सच दिखलाए जाने पर भी उससे इनकार करता है। जमाते-इस्लामी और जमाते-उलमा-ए-पाकिस्तान जैसी मजहबी पार्टियों को छोड़ भी दिया जाए तो भी पाकिस्तानी सिविल सोसाइटी और मुख्य धारा की राजनैतिक पार्टियों में भी ऐसे लोगों की कमी नहीं है जिन्हें अपालजिस्ट की श्रेणी में रखा जा सकता है। ये हर आतंकी हमले के पीछे अमरीकी, इस्रायली या भारतीय हाथ होने का ढोल पीटने लगते हैं और कई बार तो इनके और आतंकवादियों के बयानों से बड़ी दिलचस्प स्थिति पैदा हो जाती है। मसलन, लाहौर में वाघा सीमा के करीब 2 नवंबर, 2014 को एक आत्मघाती हमला हुआ जिसमें 50 से अधिक लोग मारे गए। पत्रकारिता, राजनीति या सिविल सोसाइटी में बैठे अपालजिस्टों ने फौरन यह शोर मचाना शुरू कर दिया कि इसे भारत या अमेरिका ने कराया है। आतंकी गुटों में भी इसका श्रेय लेने की होड़ लग गई और एक से अधिक आतंकी गुटों ने इसकी जिम्मेदारी ली। एक बड़े आतंकी गुट जमातुल अहरार, जो तहरीके-तालिबान पाकिस्तान का ही एक हिस्सा है, ने छुटभैयों को डपटते हुए चुप कराया और यह घोषित किया कि इतना बड़ा काम तो वही कर सकता है। इस दावे के पक्ष में उसने आत्मघाती हमलावर 25 वर्षीय हनीफुल्ला उर्फ हमजा का चित्र और उसका जीवनवृत्त अपने वेबसाइट पर पोस्ट भी कर दिया। स्वाभाविक था कि अपालजिस्ट दाएं-बाएं झांकने लगें। पेशावर हमले ने तो इस अपालजिस्ट तबके को भी निरुत्तर कर दिया। हर संकट में तालिबान के साथ खड़े इमरान खान जैसे व्यक्ति को कहना पड़ा कि अब इंतहा हो गई है और पूरे पाकिस्तानी समाज को मिल कर दहशतगर्दों के खिलाफ लड़ना चाहिए। पर टीवी. एंकर मुबस्सिर लुकमान, भूतपूर्व तानाशाह परवेज मुशर्रफ और आईएसआई के पूर्व निदेशक जनरल हमीद गुल सरीखे लोगों की अभी भी कमी नहीं है जो पेशावर घटना के पीछे भारतीय और अफगानी हाथ ढूंढ़ रहे हैं। इनमें लेफ्टिनेंट जनरल (रिटायर्ड) हमीद गुल वह व्यक्ति है जिसने तालिबानों को पाल-पोस कर बड़ा किया है। पेशावर की इस घटना को लेकर लोगों में गुस्सा इतना जबरदस्त था कि उन्होंने कुछ अकल्पनीय भी कर डाला। पाकिस्तानी सिविल सोसाइटी के लोग इस्लामाबाद की उस लाल मस्जिद पर चढ़ दौड़े जिसके खिलाफ बोलने की कुछ महीनों पहले कल्पना भी नहीं की जा सकती थी।

 हुआ कुछ ऐसे कि एक पाकिस्तानी चैनल ने लाल मस्जिद के इमाम मौलाना अब्दुल अजीज से पेशावर कांड पर उसकी प्रतिक्रिया पूछी तो न सिर्फ उसने तहरीके-तालिबान पाकिस्तान के हत्यारों की निंदा करने से मना कर दिया बल्कि वारदात में मारे गए मासूम बच्चों को भी शहीद मानने से इनकार कर दिया। इस पर सबसे पहले पाकिस्तान की सिविल सोसाइटी के सिर्फ दो-तीन सदस्यों ने लाल मस्जिद के सामने विरोध स्वरूप मोमबत्तियां जलार्इं और फेसबुक के माध्यम से लोगों को इसमें शरीक होने का न्योता दिया। आश्चर्यजनक रूप से दो-तीन दिनों में ही कई सौ लोगों की भीड़ वहां हर शाम इकट्ठी होने लगी और लाल मस्जिद वालों की उनके खिलाफ हिंसा करने की चेतावनी भी बेमानी हो गई। फलस्वरूप पाकिस्तानी हुक्मरानों को मौलाना अब्दुल अजीज के खिलाफ एफ.आई.आर. दर्ज करानी पड़ी। अब तक मौलाना अजीज की गिरफ़्तारी नहीं हुई है किंतु इस जन उभार का नतीजा यह हुआ कि एक दिन लाल मस्जिद का नायब इमाम अपने तालिबइल्मों के साथ आतंकवाद के खिलाफ सिविल सोसाइटी के आंदोलन में शरीक हुआ और वहां उसने बच्चों पर हमले की मजम्मत की। इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना के जो अच्छे-बुरे नतीजे निकले उनमें जहां एक तरफ शुरुआती दौर में धार्मिक कट्टरपंथियों के खिलाफ पाकिस्तानी समाज एकजुट दिखाई दिया, वहीं पर लोकतांत्रिक संस्थाएं कमजोर पड़ीं और सेना की राज्य के मामलात में पेशावर की घटना के बहाने दखलंदाजी बढ़ती हुई दिखी। अभी सब कुछ बहुत तरल अवस्था में है इसलिए आगे जाकर पाकिस्तानी राष्ट्र और समाज का क्या बनेगा, कह पाना मुश्किल है।

 हमें पेशावर के बहाने भारत में बढ़ रही कट्टरता पर भी कुछ देर रुक कर सोचना होगा। 2014 में देश में जो सरकार बनी है उसमें बहुत सारे अंतर्विरोध हैं। एक तरफ तो यह विकास का ऐजंडा साथ लेकर चलना चाहती है, दूसरी तरफ उसके अंदर ही ऐसे तत्वों की कमी नहीं है जो भारत को एक मध्ययुगीन समाज में तबदील करने का प्रयास कर रहे हैं। इतिहास और विज्ञान को लेकर इनकी दृष्टि न सिर्फ अविवेकी और पिछड़ी हुई है वरन उस वैज्ञानिक चेतना को नष्ट करने पर तुली है जो हमने पिछले सौ वर्षों में हासिल की है। पाठ्य-पुस्तकों के पुनर्लेखन की बात हो रही है। इसमें कोई बुराई नहीं है, समय के साथ हमारे ज्ञान क्षेत्र में जो वृद्धि होती है उसके आलोक में पाठ्य-पुस्तकों में समय समय पर कुछ-न-कुछ जोड़ा-घटाया जाना ही चाहिए पर, यह काम एक खास तरह की विद्वता और संवेदनशीलता की मांग करता है। पिछड़े दृष्टिकोण के अधकचरे विद्वान इतना महत्वपूर्ण दायित्व मिलने पर क्या कुछ कर गुजरेंगे इसकी कल्पना मात्र से ही सिहरन होती है। हाल में हिंदुत्व के खाने में बैठे कुछ तथाकथित इतिहासकारों ने अपनी इतिहास दृष्टि का परिचय देने वाले कुछ ऐसे बयान दिए हैं जिनसे मिथक और इतिहास की विभाजक रेखा ही गड्ड-मड्ड हो गई लगती है अचानक पूरे देश में ‘घर वापसी’ की बाढ़-सी आई हुई है।


यह समझना बड़ा दिलचस्प होगा कि इस घर वापसी का मतलब क्या है? जाति व्यवस्था की जकड़न में फंसा हिंदू समाज अपने बीच के ही अधिसंख्य को मनुष्य मानने से इनकार करता रहा है। ज्यादातर दलित, पिछड़े और आदिवासी मनुष्य के रूप में स्वीकृति पाने की छटपटाहट के चलते मुसलमान या ईसाई बने थे। अब यदि उनमें से कोई घर वापसी करना चाहे तो उसे कौन-सा दर्जा मिलेगा—मनुष्य का या फिर वह वापस उसी पशु योनि में जाएगा जिससे बचने के लिए उसने अपना घर छोड़ा था? विश्व हिंदू परिषद के एक वरिष्ठ पदाधिकारी के समक्ष मैंने यह प्रश्न रखा तो पहले वे थोड़ा अचकचाए फिर उन्होंने कहा कि वापसी उसी स्थान पर होगी जहां से वह व्यक्ति गया था। अब कोई उनसे पूछे कि एक बार नरक से निकल जाने के बाद कौन उसमें वापस आना चाहेगा? 4 जनवरी, 2015 के टाइम्स आॅफ इंडिया में 1981 में मीनाक्षीपुरम के 700 दलितों द्वारा इस्लाम कबूल किए जाने की घटना पर एक आलेख छपा है जिसमें सरदार मुहम्मद नाम के एक व्यक्ति का मार्मिक उल्लेख आपका ध्यान आकर्षित कर सकता है। जब तक वह दलित था उसे न तो पक्का मकान बनाने की इजाजत थी और न ही बसों में सीट पर बैठ कर यात्रा करने की। मुसलमान बनते ही उसने पक्का मकान बना लिया और अब सम्मानपूर्वक बस में सीट पर बैठ कर यात्रा भी कर सकता है। घर वापसी के पुरोधाओं को  उसके इस बयान पर ध्यान देना चाहिए कि बावजूद इसके कि धर्म परिवर्तन करने से आरक्षण में मिलने वाली सुविधाओं से वह और उसका परिवार वंचित हो गया है, नई हासिल हुई सामाजिक प्रतिष्ठा के कारण उसे मुसलमान बनने पर कोई अफसोस नहीं है। हम पाठ्य-पुस्तकों में लाख पढ़ाते रहें कि भारत में इस्लाम तलवार और पैसे के बल पर फैला, हकीकत वही है जो मीनाक्षीपुरम के धर्मांतरण की जांच करने वाले सरकारी आयोग के निष्कर्षों से निकली थी। हिंदुत्ववादी संगठनों के इस दुष्प्रचार पर कि इस धर्मांतरण के पीछे पेट्रोडॉलर का हाथ है, आयोग की स्पष्ट राय थी कि मीनाक्षीपुरम में धर्मांतरण मुख्य रूप से सामाजिक अन्यायों और भेदभाव के कारण हुआ है। जब तक जातियां हैं, तब तक यह भेदभाव और अन्याय है और तब तक घर वापसी केवल शोरशराबा भरा नाटक मात्र ही रहेगी। पेशावर से भारत यह सबक ले सकता है कि यदि राज्य कट्टरपंथियों को पाले पोसेगा और उन्हें प्रोत्साहन देगा तो एक दिन वे भस्मासुर की तरह उसके लिए ही खतरा बन जाएंगे।

 संकट के समय ही व्यक्ति की प्रतिबद्धता का पता चलता है। देश में सत्ता परिवर्तन होते ही हमारे तमाम धर्मनिरपेक्ष बुद्धिजीवियों को सांप सूंघ गया है। पिछली सरकार के दौरान बढ़- चढ़ कर सांप्रदायिकता के खिलाफ बोलने और लिखने वाले बहुत से सूरमा अब खामोश हैं। कुछ ने तो भगवा खेमे में दोस्ती के सूत्र भी तलाश लिए हैं। हाल ही में रायपुर में एक बड़ा अश्लील साहित्य उत्सव हुआ जिसमें हवाई टिकटों पर हिंदी के लेखक-लेखिकाओं को इकट्ठा किया गया था। वहां क्या कुछ हुआ इसकी फेसबुक और दूसरे सोशल मीडिया पर काफी लानत-मलामत की जा चुकी है, इसलिए उस पर और अधिक लिखना समय और स्थान की बरबादी होगी। मैं पाठकों का ध्यान सिर्फ उस जमावड़े की तरफ आकर्षित करना चाहता हूँ जो इस तमाशे में शरीक हुआ था। यह तो समझ में आता है कि इसमें कलावादी शिरकत कर रहे थे पर, कल तक जो दलित और स्त्री विमर्श का झंडा उठाए घूम रहे थे, उनकी भागीदारी पर क्या कहा जाय। जब तक दिल्ली में कांग्रेस सत्ता में थी और इनाम इकराम का भरोसा था उन्हें छत्तीसगढ़ में आदिवासियों पर जुल्म होता दिखता था पर अब लगता है कि उनके भी अच्छे दिन आ गए हैं। ‘वर्तमान साहित्य’ के इस अंक से हम एक महत्वपूर्ण कालम गोल मेज आरंभ कर रहें हैं जिसमें समय और समाज से जुड़े मुद्दों पर गंभीर समाजशास्त्री भाग लेंगे। यह हमारे इस प्रयास का हिस्सा है कि वर्तमान साहित्य सिर्फ साहित्य की पत्रिका बनकर न रह जाए बल्कि उसमें गंभीर सामाजिक मुद्दों पर भी बहसें हों और उनमें हर पक्ष को अपनी बात कहने का मौका मिले। इस अंक में गोल मेज में भाग लेने वाले उन परिस्थितियों का जायजा ले रहे हैं जिनके चलते पश्चिम बंगाल में लगातार चौंतीस वर्षों से कायम वाममोर्चा सरकार उखाड़ फेंकी गई और ऐसे हालात बन गए जिनमें भाजपा वहां पर एक बड़ी शक्ति बनकर उभरी है। वाममोर्चा का पराभव किसी ग्रीक ट्रेजेडी-सा लगता है। कुछ वर्ष पूर्व तक इतनी बड़ी पराजय की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। कैसे क्रांतिकारी भूमि सुधारों और सत्ता के निचले पायदानों तक लोकतंत्र लाने वाली पार्टी दलालों, हत्यारों और बूथ लुटेरों का संगठित गिरोह बन गई इसकी पड़ताल करना एक तकलीफदेह अनुभव है।

 2014 बीत गया और अपने साथ बहुत सारी खट्टी-मीठी यादें छोड़ गया है। काल ने इस वर्ष हमसे बहुत सारे असाधारण रचनाकर्मी छीन लिए। इस वर्ष दक्षिण अफ्रीका की नोबेल पुरस्कार प्राप्त लेखिका नदीन गार्डिमर, महान अभिनेता रिचर्ड एटनबरो, कालजई किस्सागो गैब्रील गार्सिया मार्खेज, जिंदादिल प्रगतिशील नाट्यकर्मी जोहरा सहगल, दिलचस्प कालम निगार खुशवंत सिंह, महान इतिहासकार विपिन चंद्र, मराठी कविता के सशक्त दलित हस्ताक्षर नामदेव धसाल, ज्ञानपीठ सम्मान प्राप्त हिंदी कथाकार अमरकांत, कन्नड़ के प्रसिद्ध उपन्यासकार यू.आर.अनंतमूर्ति, हिंदी कथाकार मधुकर सिंह, दलित एक्टिविस्ट और संपादक तेज सिंह, बांग्ला के क्रांतिकारी कवि नवारुण भट्टाचार्य, फक्कड़ चिंतक अशोक सेकसरिया और हिंदी कवि नंद चतुर्वेदी हमारा साथ छोड़ कर चले गए। वर्तमान साहित्य परिवार की तरफ से उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि। इसी वर्ष देश के असाधारण चुनाव हुए। कांग्रेस से अखिल भारतीय दल होने का दर्जा और सत्ता दोनों भाजपा ने छीन लिया। अच्छे दिनों का वादा करके आई सरकार को बने हुए छह महीनों से कुछ ही अधिक हुआ है, इसलिए उसके कामकाज पर अभी कुछ टिप्पणी करना उचित नहीं होगा। सिर्फ उसके एक बहुप्रचारित कार्यक्रम के बारे में पाठकों से अपने अनुभव साझा करना चाहता हूँ। दिल्ली की सर्दी से डर कर गोवा भाग आया हूँ और वहीं बैठकर यह संपादकीय लिख रहा हूँ। देशी-विदेशी पर्यटकों से भरे गोवा में प्रधानमंत्री मोदी के स्वच्छ भारत अभियान का कोई असर नहीं है। टूटी-फूटी सड़कें तथा फुटपाथ कूड़े और गंदगी से बजबजा रहे हैं, रास्तों तथा समुद्र तटों पर आवारा कुत्ते और गायें निर्द्वंद्व घूम रही हैं और देश के दूसरे हिस्सों की तरह जगह-जगह फैला पॉलीथिन का ढेर है। नई सरकार और नए साल दोनों को उर्दू का एक शेर समर्पित है।

 यकम जनवरी है नया साल है,
 दिसंबर में पूछेंगे क्या हाल है?
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