गुरुवार, फ़रवरी 05, 2015

कहानी: कसूर - मेहरीन जाफरी

कहानी

कसूर

मेहरीन जाफरी

कहानी: कसूर - मेहरीन जाफरी hindi kahani hindikahani by mehreen jafri

‘तुम मेरी पसंद हो और मरते दम तक रहोगी पर मां की पसंद का क्या करूं? उन्हें जींस पहनने वाली। सिर पर गागल्स चढ़ाए, हाथ में स्मार्टफोन लहराती हुई आज़ाद ख्याल लड़कियां फूटी आंख नहीं भातीं’। यार बात को समझने की कोशिश करो अगर उनकी पसंद की लड़की से शादी नहीं की तो जायदाद से बेदखल कर दिया जाऊगा। वे तो सलवार कमीज़ पहनने वाली सिर पर दुपट्टा रखने वाली, सीधी-सादी लड़कियों में ही अपनी भावी आदर्श बहू तलाशती हैं। मुझे शादी वहीं करनी होगी जहां वह चाहती हैं......!!! साहिल के किसी दूसरी लड़की से शादी करने के ये तर्क सुनकर वह कुछ देर तो अवाक रह गई फिर कुछ क्षण के बाद उसके चेहरे पर एक दर्दभरी तीखी मुस्कुराहट तैर गई। उसने बिना समय गवाएं टेबिल से अपना हैण्डबैग झपटकर उठाया और रेस्टोरेंट से बाहर निकल गई। अरे राहिला...... यार..... सुनो…. तो..... !!! साहिल पीछे से उसे पुकारता रहा पर उसने पलटकर नहीं देखा।

राहिला अपने बेडरूम में डबल-बेड पर औंधे मुंह लेटी आंसू बहा रही थी। कमरे के सन्नाटे में उसकी सिसकियां भी दीवार घड़ी की टिकटिक का साथ दे रही थीं। साहिल के साथ गुज़ारा लम्हा-लम्हा वह याद करती और मिनट-मिनट पर आंखों से दो-चार आंसू बहकर तकिए पर लुढ़क जाते। तकिया गीला हो चुका था, पर सिसकियां जारी थीं। राहिला को याद आ रहा था कि कैसे साहिल ने जीवनभर साथ निभाने की कसमें खाई थीं। उसे याद आ रहा था वह दिन जब उन दोनों के बीच नज़दीकियां कुछ इस क़दर बढ़ गई थीं कि दोनों ही खुद को तन और मन से एक दूसरे का होने से नहीं रोक पाए थे। हालांकि वह शादी से पहले संबंध बनाने को लेकर बहुत झिझक रही थी लेकिन साहिल ने ही उसको समझाया कि प्यार की कोई सीमा नहीं होती। यह भी कि ज़माना बहुत बदल गया है। दो प्यार करने वालों के लिए मन के साथ तन का मिलन कोई इशू नहीं रहा। यह भरोसा भी दिया कि उन्हें एक न एक दिन तो शादी करनी ही है।

राहिला को याद आ रहा था कि किस तरह वह साहिल की दलीलों पर कंनवेंस हो गई थी और उसने खुद को उसके हवाले कर दिया था। अचानक राहिला को खुद से नफरत होने लगी। वह मन ही मन अपने आप को कोसने लगी। ग़म के साथ उसका गुस्सा भी उबाल पर था। उसे यकीन ही नहीं हो रहा था कि कैसे वह साहिल के भोले-भाले चेहरे के पीछे छिपे खुदगर्ज़ और मौका परस्त शख्स को पहचान न सकी। राहिला अभी इन ख्यालों में गुम ही थी कि सामने पड़ा उसका मोबाईल घनघना उठा। काल साहिल की थी। राहिला का मन तो हुआ फोन कट कर दे पर हिम्मत करके रिसीव कर लिया। ‘राहिला यार देखो हम तो नए ज़माने के लोग हैं। पढ़ी-लिखी हो तुम। शादी जैसे इतने छोटे से इशू पर इतनी नाराज़गी। मैं शादी किसी भी लड़की से करू पर प्यार तो सिर्फ और सिर्फ तुमसे ही करता हू न? हम पहले की तरह मिलते रहेंगे। इस शादी से हमारे रिश्ते पर कोई असर नहीं पड़ेगा। राहिला.... राहिला...... तुम सुन रही हो न? साहिल की बातें सुनकर राहिला के दिल-दिमाग़ में आंधियां सी उठ रही थीं। उसने कोई जवाब नहीं दिया और फोन काट दिया। साथ ही साहिल को भी अपनी जि़ंदगी से हमेशा-हमेशा के लिए।


लखनऊ की मेहरीन जाफरी स्वतंत्र पत्रकार हैं। 2 सितंबर 1984 को जन्मीं मेहरीन जाफरी, महिला पीजी कालेज से अंग्रेजी साहित्य व समाजशास्त्र विषयों से स्नातक हैं व लखनऊ विश्वविद्यालय से ‘मीडिया लेखन‘ में पीजी डिप्लोमा किया है। लेख, फीचर, व कहानी लेखन में रूचि रखती हैं और हिंदी समाचारपत्र "हिन्दुस्तान" के लखनऊ संस्करण में बतौर संवाददाता 2007-2012 काम करती रही हैं।  
‘शीमा रिजवी वेलफेयर सोसायटी‘ की ओर से 'वुमन आफ सब्सटैंस अवार्ड-2011' से सम्मानित मेहरीन के लिखे फीचर व लेख पत्र-पत्रिकाओं में प्रकशित होते रहे हैं और 'घरेलू हिंसा' के खिलाफ लिखी उनकी पहली कहानी   'डोरबेल'  मासिक पत्रिका 'दस्तक टाइम्स' में  प्रकाशित हो चुकी है।

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आज असद के स्कूल में स्पोट्र्स-डे था। राहिला जल्दी-जल्दी तैयार हो रही थी ताकि टाइम से स्कूल पहंुच सके। सात साल का उसका बेटा असद रेस में भाग लेने वाला था। इतनी छोटी सी उम्र में पूरे मोहल्ले के बच्चों से रेस लगाता था वह। तेज़ भागने में चैंपियन था। राहिला ठीक आधे घंटे बाद असद के स्कूल में थी। बच्चे रेस के लिए ग्राउंड में तैयार खड़े थे। उनके बीच असद भी। स्पोट्र्स टीचर ने सीटी बजाई और सभी बच्चे पूरे दमखम से दौड़ पड़े। देखते ही देखते असद सबसे आगे निकल गया। वह रेस में प्रथम आया। दो घण्टे तक चले प्रोग्राम के बाद बारी थी पुरस्कार वितरण की.......। 

‘अब हमारे मुख्य अतिथि माननीय ‘मेयर‘ साहब प्रतियोगिताओं के विजेता बच्चों को मेडल देकर उनका उत्साहवर्धन करेंगे‘। कृपया मिस्टर ‘साहिल कुरैशी‘ साहब का तालियों से स्वागत कीजिए। राहिला के कानों में जैसे ही उद्घोषक की यह आवाज़ पड़ी, उसने चौंककर मंच की ओर देखा। मंचासीन लोगों के बीच वह बड़ी शान से बैठा मुस्कुरा रहा था। राहिला ने थोड़ी सी कोशिश के बाद उसे पहचान लिया क्योंकि पहले वह क्लीन शेव रहा करता था अब चेहरे पर फ्रेंच दाढ़ी थी। राहिला को कुछ पल के लिए होश नहीं रहा। वह 10 साल बाद एक बार फिर फ्लैश-बैक में थी। प्रोग्राम खत्म हो गया। असद मेडल ले आया। राहिला स्तब्ध खड़ी थी। असद के शाना हिलाने पर वह होश में आई। ‘अम्मी मैं इत्ती तेज भागा। मेडल भी लाया पर आज आपने मुझे किस्सी क्यों नहीं दी’? अं....हां। राहिला अभी भी बेदम थी। उसने बेपरवाही से असद का माथा चूमा और उसे साथ लेकर स्कूल की पार्किंग की ओर बढ़ गई। 

अब राहिला जल्द से जल्द वहां से भाग जाना चाहती थी। तेज़-तेज़ कदमों से बढ़ ही रही थी कि उसे किसी ने आवाज़ दी। बेहद जानी-पहचानी आवाज़ वही जिसे भविष्य में कभी न सुनने का फैसला उसने 10 साल पहले ही कर लिया था। राहिला ने पलटकर देखा। ये साहिल ही था। राहिला ने असद को थोड़ी देर स्कूल के मेनगेट पर इंतज़ार करने को कहा फिर साहिल की तरफ मुखातिब हुई। जी कहिए? ‘कितने सालों बाद देख रहा हूँ तुम्हें। बिल्कुल नहीं बदलीं, आज भी वैसी ही हो। बेहद खूबसूरत और दिलकश’। साहिल ने मुस्कुराते हुए कहा। ‘पर तुम बहुत बदसूरत नज़र आते हो अब! राहिला ने जवाब दिया। ‘हा हा हा। आई लाइक इट, मुझे तुमसे इसी जवाब की उम्मीद थी। तो शादी कर ली तुमने भी? इतनी आसानी से भुला दिया मुझे? कुछ बताओगी नहीं, पूछोगी नहीं’? हां सिर्फ एक बात अगर सचमुच सच बोलना चाहते हो तो! क्या वाकई मसला सिर्फ मेरे जींस पहनने और आज़ाद ख्याल होने का था? हम्ममम.....!!! साहिल ने राहिला का सवाल सुनकर गहरी सांस ली और फिर कहा-‘इतने सालों बाद मिल रही हो झूठ नहीं बोलूगा। दरअस्ल नहीं। न जींस का, न तुम्हारे आज़ाद ख्याल होने का और न ही मां की पसंद का। मेरे ही दिमाग़ में फितूर था कि जो लड़की शादी से पहले अपनी ‘वर्जिनिटी’-कौमार्य खो सकती है वह मेरे खानदान के लायक नहीं। राहिला कुछ देर के लिए जैसे सुन्न हो गई। फिर एक ही पल में उसमें इतनी ताक़त न जाने कहां से आ गई कि ज़ोरदार थप्पड़ साहिल के गाल पर जड़ दिया। मेयर साहब सकते में थे। चोर नज़रों से इधर-उधर देखा कि कोई देख तो नहीं रहा और गाल पर रुमाल रखकर, चुपचाप वहां से चले गए।

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