कहानी: बनाना रिपब्लिक (भाग-३) - शिवमूर्ति

कहानी

बनाना रिपब्लिक  (भाग-३) 

शिवमूर्ति

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सातवीं क्लास में सुलताना उसके बगल वाले टाट पर दरवाजे के पास बैठती थी। आते जाते वह उसकी समीज के अंदर झाँकने की कोशिश करता था। सुलताना को सब पता था। वह सावधान हो जाती थी। समीज को पीछे से थोड़ा नीचे खींच देती थी। फिर उसकी निराशा पर मुस्कराती थी।

आठवीं में पहुँचते-पहुँचते वह उसे रास्ते में देख कर गाने लगा था - सु-ल-ता-ना रे - ऽ - ऽ - ऽ

एक बार वह बाग से गुजर रही थी और वह कच्ची अमिया की लालच में गाना भूल गया था तो उसकी छोटी बहन घर तक ओरहन लेकर आ गई थी - आपा पूछती हैं, आज उनके नाम वाला गाना क्यों नहीं गाया?

आज वह सुलताना से क्या वादा कर सकता है? कहेगा - जिता दोगी तो तुम्हारी घोड़ी की नाँद पक्की करा दूँगा।

वापसी में बहुत खुश है जग्गू। कितनी खिली हुई है सुलताना। चाँद के गोले के बराबर है उसके चेहरे का गोला। उतना ही गोरा। चारों तरफ से हिजाब के घेरे में। जैसे अँधेरे में चाँद। अब भी हँसी में वही खनक है। दाँतों में वही चमक। कह रही थी - मतलब पड़ा तब सुलताना की याद आई? मतलबी कहीं के।

उसका मन कहता है, कहीं अकेले में बैठ कर देर तक सुलताना के बारे में अच्छी-अच्छी बातें सोचता रहे। सड़क पर छलाँग लगाते हुए चलने का मन कर रहा है।

ठाकुर ने दो दिन पहले 'टीचर्स' की बोतल पकड़ाते हुए कहा था - मुंशी को दे आना।

दरवाजे पर सन्नाटा है। चारों तरफ अँधेरा। ओसारे में लंबी खूँटी में टँगी लालटेन जल रही है जो थोड़ी-थोड़ी देर में भभकती है। जग्गू कुंडी खटकाता है।

मुंशियाइन निकल कर बताती हैं - अभी-अभी आए हैं। बैठो। भेजती हूँ।

वह पास पड़ी कुर्सी पर बैठ जाता है।

बेऔलाद हैं मुंशीजी। कहते हैं, कई बच्चे हुए लेकिन कोई जिंदा नहीं बचा। जग्गू को पता है, कचेहरी में बड़ा रुतबा है मुंशी का। सारी बहस और कानूनी प्वाइंट खुद तैयार करते हैं और जिरह वाली तारीख पर किसी बड़े वकील का वकालतनामा लगवा कर बहस करा देते हैं।

मुंशी जी तौलिया से हाथ पोछते हुए निकलते हैं। वह लपक कर पैर छूता है।

बस, बस। मुंशी जी आशीर्वाद देने मुद्रा में दोनों हाथ उठा देते हैं।

कैसा चल रहा है?

आपका आशीर्वाद लेने आया हूँ। वह व्हिस्की की बोतल कुर्ते की जेब से निकालकर तिपाई पर रखता है।

अरे, इसकी क्या जरूरत थी। डाक्टर ने मनाकर दिया है। अभी मुंशियाइन देखेंगी तो बिगड़ेंगी। कहने के साथ वे खुद बोतल उठाकर तिपाई के नीचे छुपा देते हैं।

बाजार वाली जमीन रेहन रख दिए?

आपको कैसे पता चला?

मेरी गवाही कराने लाए थे।

क्या करता। खर्च इतना बढ़ गया कि... मुंदर अथाह पैसा खर्च कर रहा है।

डेढ़ लाख में रखना दिखाया है?

हाँ।

पूरा पैसा मिल गया?

अभी तो ठकुराइन के पास पचास हजार ही थे। पचीस ठाकुर ने अपने भंडारे के लिए रख लिए, पचीस मुझे दिया है। बाकी बैंक से निकाल कर देंगी तो कंबल बाँटा जाएगा। बस यही डर लग रहा है कि हार गया तो कहाँ से पटाऊँगा?

हारोगे तो नहीं। लेकिन अगर तकदीर ही टेढ़ी हो जाय तो बेंच कर पटा देना। आठ लाख से कम न मिलेंगे।

बेंच कैसे सकते है, जब तक रेहन न छुड़ा लें?

बात तो सही है। मांस बाघ के मुँह में डाल चुके हो। लेकिन जरूरत पड़ेगी तो रास्ता निकाला जाएगा।

कैसे?

बेचने के पहले रेहन पटाना जरूरी है भी और नहीं भी।

कैसे?

पहले पटा सको तब तो ठीक ही है। नहीं तो बेंचकर पैसा अपने खाते में डालो। फिर निकाल कर रेहन पटाओ और खरीददार को मौके पर कब्जा दे दो।

रेहन रहते बेच सकते हैं?

रेहन माने कुछ नहीं। सरकार ने रेहन गैरकानूनी कर दिया है। यह तो आपसी समझ से चलता है। तुम उनका पैसा न लौटाओ तो वे तुम्हारी जमीन थोड़े हथिया सकते है।

ओ! जग्गू की आँखों के कोए फैल गए।

सच पूछो तो तुम्हें यह जमीन दोनों हालत में बेचनी होगी। पूछो क्यों?

जग्गू उनका मुँह ताकने लगा।

हार गए तब तो रेहन पटाने के लिए बेचना पड़ेगा। जीत गए तब भी बेचना होगा। वह इसलिए कि नाहरगढ़ का प्रधान बनने के बाद तुम्हें गड़ही के किनारे की उस झोपड़िया में रहना शोभा नहीं देगा। सड़क के किनारे ग्राम समाज की एकाध बीघा जमीन का बाप के नाम आवासीय पट्टा कराओ और बाजार की जमीन बेच कर पट्टे की जमीन पर आलीशान घर बनवाओ। जमीन बेच दोगे तो कोई यह भी नहीं कहेगा कि परधानी की लूट से बनवाया है और जितना चाहोगे इसमें परधानी की काली कमाई भी खप जाएगी।

बाप रे। थोड़ी देर तक तो जग्गू के मुँह से आवाज ही नहीं निकली। कितना कानून भरा है इस बुड्ढे की गंजी खोपड़ी में।

और सुनो, जमीन जब कहोगे, बिकवा दूँगा। मुहमाँगे दाम में।

जग्गू झुक कर दोनों हाथों से मुंशी के पैर पकड़ लेता है।

हमेशा आप की शरण में रहूँगा मुंशीजी। जिस तरह आप सबका भला सोचते हैं, सबको राह दिखाते है, वैसा कौन करता है आज के जमाने में।

बाहर भले मुंशीजी की बुद्धि और कानूनी ज्ञान की तूती बोलती हो लेकिन गाँव में तो दाँतों के बीच में जीभ की तरह ही रहना पड़ता है। सबसे मिलकर, बना कर चलना उनकी मजबूरी है। सबके भले के लिए एक दो प्वाइंट बताते रहते हैं तो गाँव देश में मान सम्मान मिलता है। अपना अपमान और तिरस्कार भी सही मौका आने तक कलेजे में दबा कर रखना पड़ता है।

मुंशीजी को ठाकुर के बाप का तीस पैंतीस साल पुराना गुस्से से फनफनाता चेहरा याद आ रहा है। चकबंदी के दौरान उनके घर के सामने की मतरूक जमीन पर कब्जे को लेकर हुए विवाद में लाल-लाल आँखें निकाल कर दाँत पीसते हुए चिल्लाया था - खबरदार जो इस जमीन पर कब्जे की सोचा। गोड़ काट कर हाथ पर रख देंगे। लाला लूली किस खेत की मूली?

वे आँखें और वे बोल मुंशी जी के कलेजे में नासूर बनकर गड़े हैं। - अब समझ में आएगा बेटा कि जब मूली अटकती है तो कितना कल्लाती है।

जब इतनी 'किरपा' है तो कोई ऐसी दाँव बताइए चाचा कि जीत पक्की हो जाय।

बैजनाथ बाबा से मिले कि नहीं?

वे तो पदारथ के खानदानी है। वे पदारथ के खिलाफ कैसे जाएँगे?

खुले आम नहीं जाएँगे लेकिन वोट तो ओंट में दिया जाता है। ...फौरन मिलो।

क्या कहूँगा?

कुछ कहने की जरूरत नहीं। जो मन में आए सो कहना। बस अकेले में मिलकर हाथ जोड़ लेना। ...पदारथ ने उनका आधा रास्ता घेर कर दालान की नींव डाल दिया है। उनका रास्ता घट कर तीन फीट की कोलिया बन गई है। जीप कार का आना जाना बंद। उनका खूँटा पदारथ के बेटे ने उखाड़ कर मँड़ार में फेंक दिया था। यह बात जीते जी बुड्ढे को नहीं भूलेगी। अभी तो ताजा घाव है। जाओ। अपने सत्रह-अठारह वोट पक्के कर लो।

घर जाते हुए जग्गू की खोपड़ी भाँय-भाँय कर रही है। कैसे-कैसे साँप, बिच्छू भरे हैं गाँव की खोह में। जब तक काट न लें, पता ही नहीं चल सकता।

बैजनाथ बाबा दिशा मैदान के लिए मुँह अँधेरे जंगल की ओर जाते हैं। फिर ताल पर आकर लोटा मटियाते है। जग्गू ताल के पास झरबेरी के झाड़ के पीछे मुँह अँधेरे ही आकर खड़ा हो गया है। जैसे ही बाबा मुँह का कुल्ला फेंक कर कान का जनेऊ उतारते हुए आगे बढ़ते हैं वह सामने आकर साष्टांग लेट जाता है - बरदान चाहिए बाबा।

कौन है रे? जगुआ? इतने भिनसारे?

जग्गू उठकर हाथ जोड़ता है - अपने कुल खानदान की तरफदारी तो दुनिया करती है बाबा लेकिन आदमी वह है जो न्याय का पक्ष ले। भीखम पितामह जैसे ब्रह्मचारी बलधारी के साथ क्या हुआ? अन्यायी का साथ देने के चलते छः महीने तक न जीने में रहे न मरने में। आप के भतीजे पदारथ भी इस गाँव के दुरजोधन हैं। उन्होंने गाँव वालों के साथ कम अन्याय नहीं किया है। उनका आदमी जीत गया तो फिर करेंगे। इसलिए अन्यायी का साथ मत दीजिए। इस बार मुझे जिताइए। मै तन-मन धन से आपके साथ रहूँगा। वह सिर झुका देता है।

तू तो बड़ा चतुर है रे। किसने भेजा मेरे पास?

गरज ने, बाबा। और कौन भेजेगा?

हा-हा-हा-हा, ठठाकर हँसे बाबा। खाँसी आ गई।

तू तो खलीफा हो गया रे। जा, मेरा आशीर्वाद तेरे साथ है।

जैसे-जैसे पोलिंग की तारीख नजदीक आ रही है, चुनाव का बुखार तेज हो रहा है। रबी की पहली सिंचाई हो गई। अब खेती में ज्यादा काम नहीं। गन्ना काट कर तौलाई सेंटर पर भेजने में जितना समय लगे। जानवरों का चारा पानी करके लोग 'कनविंस' करने और 'कनविंस' होने के लिए निकल पड़ते हैं। जिनके खूँटे पर कोई जानवर नहीं है वे तो परम स्वतंत्र हैं। जिस भंडारे पर पहुँचेंगे वहीं खाना, पीना, इफरात। अब रात ग्यारह-बारह से पहले शायद ही कोई घर वापस लौटे। इतने पर भी दावे के साथ कौन कह सकता कि किसका वोट किसके खाते में जाएगा।

अस्सी साल की बूढ़ी अंधी इतवारी लाठी से रास्ता टटोलते हुए चार पाँच दिन से भोर में ही आकर जग्गू के दरवाजे पर बैठ जाती है। उसका बेटा अपने मेहरारू लरिका के साथ परदेश रहता है। पिछले साल आया तो माँ से कह गया था कि हर महीने सौ रुपए भेजा करेगा। चार महीने तक पैसा मिला फिर बंद हो गया। इतवारी दो बार कोस भर दूर डाकखाने तक गई। दिन भर बैठी रही लेकिन पैसा नहीं मिला। उसे यकीन है कि बेटा पैसा भेजता है लेकिन चिट्ठीरसा देता नहीं, दबा लेता है। पदारथ से कहने पर वे हँसने लगते हैं। उसका कहना है कि जग्गू चाहे तो उसका वोट अभी ले ले लेकिन डाकखाने चल कर उसका पैसा दिला दे।

फुलझारी के दुआर पर सुबह शाम औरतों का मेला लगता है। किसी को बिधवा पेंशन चाहिए किसी को बुढ़ापा पेंशन। कमर में लाल चुनरी बाँधे फुलझरिया बायाँ हाथ कमर पर रख कर दाहिने हाथ को हवा में चमकाती है - पदारथ ने तेरह औरतों को बिधवा बनाया है। मरद आछत बिधवा! उन्हें फर्जी पेंशन दिला रहे हैं और तो और अपनी सगी पतोहू को बिधवा दिखा दिया है। कोई पूँछे भला कि बिधवा है तो गोद में चार महीने की बेटी किसकी है? जग्गू और मुंदर में इतनी हिम्मत है कि ठाकुर बाभन टोले की फर्जी बिधवाओं की पेंशन रोक सकें? जीतते ही मैं यह जाल बट्टा बंद कराऊँगी।

फुलझरिया का टेंपो देख कर ठाकुर और पदारथ दोनों की सिट्टी-पिट्टी गुम है।

जग्गू की बिरादरी के चार पाँच लड़के डमी बैलेट पेपर लेकर घर-घर घूम रहे हैं।

चाची। इस पर्चे में अपना चुनाव चिन्ह पहचानिए।

चाची कुछ देर तक ढूँढ़कर कुर्सी पर उँगली रखती हैं। लड़के हक्का-बक्का - यह थोड़े। यह तो मुंदर का निशान है। अपने जग्गू काका का निशान पहचानिए।

हमैं का पता? तुम बताओ।

ई देखौ घंटी। अब न भुलाइउ। ए भौजी तुम पहचानो।

भौजी हँसते शरमाते पर्चा देखती हैं - ई है घंटी।

हाँ भौजी, तुम तो पहचान लीं।

तो हम पास हो गए देवर? हँसती हैं। लड़के हँसते हैं।

मुसलमान टोले में मकबूल का बारह साल का लड़का और एक भतीजा घूम रहा है। जो भी मिले, बैलेट पेपर दिखाकर पूछते हैं - कहाँ है घंटी?

घंटी खोजना मुश्किल।

ए बबलू। ई जगुआ को हाथी काहे नहीं मिला? साफ-साफ दिखाई पड़ता।

हाथी इस इलेक्शन में नहीं मिलता खाला। हाथी बड़के इलेक्शन में लड़ता है। बड़की लड़ाई।

नाहीं रे। कंजूस है। पइसा नहीं खर्च किया होगा। देख, मुंदरवा कुर्सी रखि गवा है कि नाही। ऊ कुर्सी पाई गवा।

ए खाला। कुर्सिया पे बइठो मगर मोहरिया घंटिया पे लगावै का है। इहै बड़े मियाँ पास किए हैं।

बड़े मियाँ की नबाबी चल रही है क्या रे?

बाजार के दुलीचंद अगरवाले ने एक बार कहा था - अपने गाँव के बदलुआ की जमीन दिलाइए मुंशीजी। आपका कमीशन नहीं मारूँगा।

मुंशीजी जानते है कि यह जमीन मिल जाय तो उसके कोल्डस्टोरेज की लोकेशन सही हो जाएगी। गले में हड्डी की तरह फँसा है बदलुआ। दुलीचंद की कोठी पर देशी घी से तर सूजी का हलवा चाभते हुए आश्वस्त करते हैं मुंशीजी - अस्सी नहीं सिर्फ पचहत्तर फीट का दाम देना होगा आपको। पूछो कैसे? मैं समझाता हूँ। एक तरफ तीन फीट आपने दाब रखा है। दूसरी तरफ दो फीट दूसरे ने। मौके पर बची पचहत्तर फीट। इस पचहत्तर फीट का दाम बदलू के खाते में डालना होगा। जो तीन फीट पहले से आपके कब्जे में है उसका दाम मेरे खाते में जाएगा। पैमाइस कराने के बाद दूसरी साइड का जो दो फीट निकलेगा वह आपको फिरी में मिल जाएगा।

लंबाई कितनी है?

एक सौ दो फुट।

इतनी तो नहीं लगती।

हो सकता है पीछे वाले ने भी कुछ दबा लिया हो। मगर आपको जितना खतौनी में दर्ज है पूरा दिलाएँगे। यह देखिए... वे जेब से गोल-गोल मुड़ा हुआ ट्रेस्ड नक्शा निकाल कर खोलते हैं - पूरा ले आउट मेरी जेब में है। मूल जमीन बारह आने मालियत पर दो बिस्वा से डेढ़ डिसमल ज्यादा थी। सामूहिक कटौती के बाद चार आने मालियत पर बैठने से रकबा बना छः बिस्वा यानी 1361*6 = 8166 वर्ग फुट। चौड़ाई अस्सी है तो लंबाई कितनी होगी, खुद भाग देकर देख लीजिए।

रेट?

मेरा कमीशन दो परसेंट। रेट जो आमने सामने बैठ कर तय हो जाय।

रेट कायदे का लगवाइए तो सोचें। ...एक बात और। हरिजन की जमीन खरीदने पर तो रोक है। परमीशन का लफड़ा होगा।

जमीन पर रोक है न। आप मकान लिखवाइए।

जमीन को मकान कैसे लिखा लेंगें?

अरे भाई, खंडहर लिखाया जाएगा।

दुलीचंद मुंशी जी का मुँह ताकने लगा।

हाँ भाई। जो उसकी झोपड़ी है, समझो वह पुराने मकान का खंडहर हैं। आपने खंडहर की रजिस्ट्री कराई और कब्जा लेकर उसे जमींदोज कर दिया। मौके पर जमीन बची रह गई। जो चाहे आकर देख ले।

खारिज दाखिल हो जाएगा?

न भी हो तो क्या? उसके खाते में पैसा चला गया। बाप बेटे ने मौके पर कब्जा दे दिया। जमीन आपकी बाउंड्री के अंदर हो गई। खेल खत्म। ...आप भी अगरवाल साहब, दुनिया चरा कर बैठे हैं और हमसे पहाड़ा पूछ रहे हैं। अरे, परमीशन के लफड़े से डराया जाएगा तभी तो मन माफिक रेट पर मिलेगी।

पैसा हाथ में आ जाने से जग्गू के भंडारे की रौनक बढ़ गई है। चार-पाँच नचनिया रिश्तेदार आ गए हैं। खाने पीने के बाद नाच जमी है। औरतों बच्चों का मेला जुट आया है। अलाव में मोटी-मोटी लकड़ियाँ डाल दी गई हैं। आग की लाल-पीली लपटें घटती बढ़ती रोशनी का पैटर्न बना रही हैं। मृदंग की थाप और झाँझ की झैंयक-झैंयक। बीच में सिंघा बाजा की धू-तू, धू-तू। आधे दर्जन नर्तक नर्तकियों की दाएँ बाएँ हिलती कमर सिर के झूमने के साथ ताल मिला रही है। आज होश में रहने का क्या काम? नाचते-नाचते लेट जा रहे हैं। कुछ लेटे हुए उठने की नाकाम कोशिश कर रहे है। बदलू और उसका उससे भी बूढ़ा साला एक दूसरे से सिर जोड़े पंजे मिलाए नाचते-नाचते झुके जा रहे हैं -

कटै द्या गोस रोटी कटै द्या गोस रोटी

आवै द्या शराब कटै द्या गोस रोटी

(आती रहे शराब। कटती रहे गोश्त रोटी।)

कहिलौ महिलौ... हुड़ुक दहितवा...

कहिलौ महिलौ... हुड़ुक दहितवा...

बदलू को नशे में कमर मटकाता देख जग्गू की बूढ़ी माँ पोपले मुँह से हँस रही है।

पोलिंग के चंद दिन बचे हैं। गाँव का माहौल पूरी तरह गरम हो गया है। ठाकुर ने आज पूरी ठकुरइया को न्योता है। केवल बिरादरी भोज। गढ़ी का जंग लगा जर्जर फाटक बंद कर दिया गया। बीच में अलाव जलाया गया है। दोनों तरफ दो गैस बत्तियाँ। दो मेजों पर मीट और मुर्गे देग और चिखना। एक चौकी पर दारू का क्रेट और पानी की बाल्टी।

रामसिंह लपक-लपक कर सबके गिलास भर रहा है। हड्डियाँ कड़कड़ा रही हैं। गिलास टकरा रहे हैं। खोपड़ी सनक रही है। जबान बमक रही है। बात चलती है कहाँ से और पहुँच जाती है कहाँ?

...वाह बहादुर वाह... जमीन भी लिया परधानी भी लेंगे। बजावे बैठा ठन ठन गोपाल...

...सरकार बुजरी करती रहे वहाँ बैठकर रिजरवेशन। यहाँ उसकी इस्कीम में पलीता लगाने वाले हम लोग कम हैं क्यों?

...अच्छा बाबू भवानी बकस सिंह, आप तो पालिटिक्स पढ़ाते हैं, ऐसा नहीं हो सकता कि जीते कोई भी साला, उसे पकड़कर अपने नाम मुख्तारनामा लिखाओ... क्या कहते हैं उसे अंगरेजी में?

पावर आफ एटार्नी...

हाँ, वही। फिर ठाँस के परधानी करो।

...उससे अच्छा कि बेचीनामा लिखा लो। पकड़ बेटा एक लाख और लिख परधानी मेरे नाम। बस्ता मोहर रख कर फूट...

ठाकुर होकर बेची खरीदी क्यों करेंगे? दो लाठी मार कर छीन नहीं लेंगे?

आप लोगों पर ज्यादा चढ़ गई है। ऐसा कहीं हो सकता है?

क्यों नहीं हो सकता? क्या नहीं हो सकता? बुलाओ मुंशिया को। ससुरा साँझ से ही मुंशियाइन के लहँगे में घुस जाता है। बुढ़ापे में भी अलग नहीं सो सकता। बुलाओ। कायस्थ बुद्धी लगाकर कोई तरकीब निकाले।

लहँगे में घुसना कब का छूट गया लेकिन घुसने की कल्पना करके अधगंजे सर के सफेद बाल भी परपरा कर खड़े हो जाते हैं।

कैसा जमाना आ गया? एक डूबी हुई आवाज उभरती है - राजशाही के साथ ठकुरई भी चली गई।

फिर राजशाही आने वाली है बाबा। एक बहुत लंबी दाढ़ी वाले ज्योतिषी ने भविष्यवाणी किया है।

क्या-या-या...?

हाँ कलजुग के आखिरी चरन में एक दिन ऐसा आएगा जब एमपी, एमेले की सारी सीटों पर खूनी कतली लोगों का कब्जा हो जाएगा। तब सब मिल कर 'देसवा' का बँटवारा करेंगे। उस बँटवारे में हम लोगों को भी हिस्सा मिलेगा...

वाह बाबू झल्लर सिंह। 'बिलायती' की झोंक में कितनी ऊँची बात बोल गए। भवानी बकस सिंह की लड़खड़ाती आवाज अचरज में डूबी है - क्लेप्टोक्रेसी-ई-ई! क्लेप्टोक्रेसी-ई-ई-ई!

ए रमुआ... पुचुर-पुचुर दो-दो घूँट क्या डालता है बे... भर पूरा गिलास ऊपर तक... और डाल... और... बहता है तो बहने दे... तू डालता रह...

ठाकुर डर रहे हैं कि चंडूखाने की यह गप्प बाहर गई तो हुआ बंटाधार!

...अंय, बोटी खतम? प्याज भी? का बाबू दलगंजन सिंह, इसी सहूर से परधानी करोगे?

धात्त! नीम के पक्के चबूतरे से टकराकर गिलास के सौ टुकड़े हो जाते हैं।

पोलिंग से तीन दिन पहले पदारथ ने इंद्रजाल फेंका। चुनाव घोषित होने से कुछ दिन पहले तालाब का जीर्णोद्धार हुआ था। तीस पैंतीस लोगों की बीस बाइस दिन की मजदूरी बकाया है। पदारथ का कहना है कि 'हाजिरी' बना कर 'ऊपर' भेज दी गई है। पास होकर आती इसके पहले चुनाव घोषित हो गया इसलिए पेमेंट फँस गया। अगर नया प्रधान जीत गया तो पूरा पेमेंट कैंसिल करा सकता है। पेमेंट लेना है तो मेरे आदमी को जिताइए। जिताने पर पेमेंट की गांरटी है। हारने पर कोई गारंटी नहीं।

पदारथ के आदमी मजदूरों को अलग-अलग समझा रहे हैं - एक वोट की ही तो बात है। उसके चलते दो-ढाई हजार पानी में डालने से क्या फायदा? वोट का क्या अचार डालना है?

ऐन मौके पर तुरुप चाल। सुनकर ठाकुर घबराए। दोपहर से ही अपनी कोठरी की साँकल अंदर से बंद करके जाने कहाँ-कहाँ मोबाइल मिलाते रहे। अँधेरा होने पर बाहर निकले तो रामसिंह को बुलाकर कहा - ब्लाक आफिस जाकर जनार्दन बाबू से मिलो, अभी तुरंत। कहना, नाहरगढ़ के दलगंजन सिंह ने भेजा है। उन्हें यह लिफाफा दे देना। वे कुछ पेपर देंगे। उनकी पंद्रह बीस फोटो कापियों का सेट बनवाकर लाना है। आज ही चाहिए।

रात ग्यारह बजे शाल लपेटे, कान बाँधे नाक से पानी चुआते रामसिंह की मोटर साइकिल ट्यूबवेल घर की ओर मुड़ती है तो उसकी हेड लाइट में ठाकुर मंकी टोपी लगाए ओसारे की चारपाई पर बैठे इंतजार करते दिखाई पड़ते हैं।

रामसिंह ठंड से अकड़ी उँगलियों पर फूँक मारते हुए सफाई देता है - जनार्दन बाबू ने कागज बहुत देर से दिया। फिर शहर जाने, दुकान खुलवाने, जनरेटर चलवाने में बड़ा समय लग गया।

ठाकुर को कुछ सुनाई नहीं पड़ता। वे टार्च की रोशनी में देर तक पेपर पढ़ते हैं - गुड्ड। तुरुप का जवाब तुरुप का इक्का।

सबेरे ठाकुर खुद, रामसिंह, जग्गू और जग्गू के टोले के दो लड़के फोटोस्टेट कागजों का सेट लेकर गाँव भर में फैल गए। जग्गू ने एक सेट मकबूल के पास भेजवाया और ठाकुर से उसकी बात करा दी।

घंटे भर में पूरे गाँव को पता चल गया कि पक्की सड़क से मुसलमान टोले तक के करीब आधा किमी और हरिजन टोले के करीब ढाई तीन सौ मीटर लंबे कच्चे रास्ते पर कागजों में दो साल पहले ही खड़ंजा बन गया है।

लीजिए अपनी आँख से पढ़ लीजिए आप लोग। यही हैं भुगतान किए गए बिलों की फोटो कापियाँ। ...और मौके पर? एक भी ईंट लगी हो तो बताइए। चार लाख सत्तर हजार रुपए पूरे के पूरे हजम। लोग दस-बीस परसेंट खाते हैं। चग्घड़ विधायक भी विधायक निधि का पचास परसेंट से ज्यादा नहीं खा पाता। लेकिन आपका परधान सौ का सौ परसेंट हजम कर गया। अब आप लोग खुद फैसला करें...

परदेस रहने वाले वोटरों को कई उम्मीदवारों ने चिठ्ठी लिख कर बुलाया है। सबने लिखा था - आने जाने का खर्चा मेरे जिम्मे। सभी जानते हैं कि गुजरे गवाह और लौटे बराती का कोई पुछत्तर नहीं होता। गुजरा वोटर भी इसी श्रेणी में आता है। इसलिए पोलिंग के पहले वे अपना किराया-भाड़ा वसूल पाना चाहते हैं। किसी एक से नहीं। हर चिठ्ठी लिखने वाले से।

इतने लंबे जनसंपर्क से हर उम्मीदवार जान गया है कि वह कितने पानी में है। मुंदर ने तो अपनी ओर से पूछ कर, जिसने जो रकम बताई उसमें सौ रुपया जोड़ कर दे दिया। जग्गू से भी जिसने जितना बताया पा गया। लेकिन जिन्हें जीतने की कोई आशा नहीं है वे टाल मटोल कर रहे हैं। जो कुछ जेब में बचा रह जाय वही अच्छा।

पोलिंग से एक दिन पहले मुँह अँधेरे हल्ला मचा - फुलझरिया दल्लू के बेटे शंकर के साथ बँसवारी में पकड़ी गई।

दिशा मैदान का समय। सारा गाँव ही बाहर था। लोग दौड़े - क्या हुआ? क्या हुआ?

फुलझरिया ने कस कर एक तमाचा शंकरवा के गाल पर जड़ा और गाँव के पिचालियों को ललकारती अपनी राह चली गई। किसी की हिम्मत उसके सामने पड़ने की नहीं हुई। लेकिन भागते हुए शंकर को लोगों ने दौड़ा कर पकड़ लिया। लगे पिटाई करने।

पाँच सौ रुपए के बदले शंकर केवल इतना करने को तैयार हुआ था कि वह बँसवारी से लौटती फुलझारी बुआ के सामने पल भर के लिए खड़ा हो जाएगा। तभी पहले से 'सधे बधे' लोग दोनों को घेर कर हल्ला मचा देंगे।

पदारथ को यह जान कर बड़ी राहत मिली कि पिटने के बावजूद शंकर ने उनका नाम नहीं लिया। नहीं तो बड़ा अनर्थ हो जाता।

बड़ी छतीसी औरत निकली गुइयाँ। औरतों का झुंड दाँतों तले उँगली दबा रहा है।

कब से है यह आशनाई? किसी को भनक तक नहीं लगी।

कहाँ चालीस पैंतालीस की फुलझरिया, कहाँ बीस-बाईस का शंकरवा! दूने की चोट। माई रे!

इसीलिए मूसल जैसा मनसेधू छोड़ कर नैहर में डेरा डाले पड़ी है।

इस्कीम भले पदारथ ने बनाई लेकिन बदनामी फैलाने में ठाकुर के आदमी भी जुट गए हैं।

फुलझरिया के दोनों भतीजे लाठी लेकर शंकरवा को खोज रहे हैं।

पोलिंग पार्टी आ गई। बिना खिड़की दरवाजे वाले प्राइमरी स्कूल के खुरदरे फर्श पर प्लास्टिक की सीट बिछा कर सबने डेरा डाल दिया। घंटे भर के अंदर ठाकुर और पदारथ के घर से चाय, बिस्कुट और पकौड़ियाँ आ गईं। पीठासीन अफसर कहता है - नहीं, नहीं। चुनाव आयोग का सख्त निर्देश है। मतदान कर्मी किसी उम्मीदवार से खाने-पीने की कोई चीज नहीं ले सकते।

लेकिन साहब, हमारा भी तो कोई फर्ज बनता है। आप हमारे गाँव के मेहमान है। मेहमान भूखे रहेंगे क्या?

पार्टी में साल भर के बच्चे वाली एक सुंदर महिला भी है। बहुत उदास है। लाख जतन के बाद भी वह अपनी ड्यूटी नहीं कटवा सकी। सभी महिला को देख-देख कर बच्चे से प्यार जता रहे हैं। उसके पीने के लिए दूध आ गया है।

ए, टेंट उखाड़ो। बर्तन भाँड़े हटाओ। भंडारा खत्म। सेक्टर मजिस्ट्रेट राउंड पर आने वाले हैं। ...हिसाब किताब परसों होगा। पोलिंग के बाद। कहीं भागे जा रहे हैं क्या?

पीठासीन अधिकारी का 'सरनेम' नहीं पता लग रहा है। कैसे पटाया जाय? सात बजे के करीब ठाकुर और पदारथ के घर से पूड़ी सब्जी के टिफिन आ जाते हैं। रामसिंह पीठासीन अधिकारी के कान में धीरे से पूँछता है - साहब 'लालपरी' चलेगी?

रात दस बजे के बाद पदारथ की दालान से तीन लोगों की दो टोलियाँ निकलती हैं। पहली टोली के हाथ में छानबे चउवा के जनेऊ और दूसरी के हाथ में बानबे चउआ के। एक ब्राह्मण टोले में घुसती है दूसरी बनिया टोले में। युद्ध के अंतिम पहर में ब्रह्मास्त्र का प्रयोग। एक-एक घर के मुखिया को जगा कर जनेऊ अर्पण और गुहार - अब तक पदारथ ने जो भी सही गलत, स्याह सफेद किया उसे भूल जाइए। शिकवा शिकायत भूल जाइए। जोड़ा जनेऊ की इज्जत दाँव पर है। इसकी इज्जत बचाइए।

बनिया टोले में एक पद और - ब्राह्मणों की महिमा इस कलजुग में महाजनों के बल पर ही टिकी है आज तक। इस बार भी इसकी रक्षा कीजिए।

बादल हैं। रात से ठंडी हवा चल रही है। फिर भी सबेरे आठ बजे ही बूथ पर लंबी लाइन लग गई। जग्गू अपनी जोरू और मुंदर अपने बेटे के साथ सात बजे से ही एक-एक वोटर को घर से निकालने में लगा है।

अंदर सारे एजेंट चौकन्ने हैं। जरा सा संदेह होते ही चैलेंज करो। बाहर बच्चा-बच्चा सतर्क है - विरोधी पार्टी कोई फर्जी वोटिंग न करा दे। साथ ही अपने पक्ष में फर्जी वोटिंग के लीकप्रूफ तरीके खोजे जा रहे हैं। फर्जी वोटिंग सबेरे-सबेरे हो जाती है या शाम को सबके थक जाने के बाद।

औरतों का झुंड लाइन में लगा है। ज्यादातर घूँघट वाली दुलहिनें। एक एजेंट ने टाँका भिड़ा लिया है। वह कहता है - साहेब जरा जल्दी करा दीजिए। दुलहिन बलहिन हैं। घर पर छोटे बच्चे रो रहे होंगे।

इस झुंड में कुछ महिलाएँ घूँघट निकाल कर दूसरे के नाम पर वोट देने आई हैं। उन औरतों के बोलने से पहले एजेंट ही उनका नाम बता देता है। थोड़ी देर तक एजेंटों में काँव-काँव होती है फिर शांति छा जाती है।

महिला पोलिंग अफसर थोड़ा मेहरबान लगती है। वह भरसक ऐसी दुलहिनों की उँगली पर अमिट स्याही का निशान नहीं लगाएगी। लगाएगी भी तो जरा-मरा। दोपहर बाद जब साड़ी बदल कर अपने असली नाम से वोट देने आएगी तब लगाएगी।

गाँव की जो लड़कियाँ ससुराल में हैं, जो बहुएँ मायके में हैं, जो लोग परदेश में हैं, किसी का वोट छूटना नहीं चाहिए।

दूसरी पार्टी ने दूसरा रास्ता निकाला है। पर्ची बाँटने वाले टेंट से थोड़ा पहले गली के मोड़ पर एक किशोर अपने खास वोटरों की पहली उँगली पर गूलर का दूध पोत रहा है। इसी पर पोलिंग के समय स्याही लगेगी। गूलर के दूध के ऊपर लगाने पर अमिट स्याही 'अमिट' नहीं रह जाएगी। जरा सा रगड़ते ही दूध की परत के साथ निकल आएगी। अब यह उँगली दुबारा वोट देने के लिए 'रेडी' है।

वोटर लिस्ट से खाला का नाम ही गायब है। पीठासीन अधिकारी को अपना वोटर आई डी कार्ड दिखा कर देर तक चिरौरी की, फिर लड़ीं। वह बार-बार हाथ जोड़ता रहा। बूथ के बाहर घंटे भर तक अदृश्य को सरापने के बाद लाठी टेकती लौट गईं।

सफेद दाढ़ी मूँछ की खूटियों और सन जैसे सफेद बिखरे बालों वाले पहाड़ी बाबा झिलंगा खटिया पर बैठे धूप सेंकते मुँह में बचे आखिरी तीन लंबे पीले दाँत दिखाते रिरिया रहे हैं - ए भइया। कोई हम्मै भी लै चलो। हम भी दे आवें।

जग्गू सबेरे-सबेरे आया था। कह गया कि अभी ले चलेंगे। लेकिन लगता है भूल गया। बूढ़ा उधर से गुजरने वाले हर आदमी को टेर रहा है - ए भइया...

बूढ़े की पतोहू अंदर से निकलकर डाँटती है, 'एकदम्मै सठिया गए हैं क्या? कबर में पाँव लटकाए हैं और वोट देने के लिए मरे जा रहे हैं।

कंधे पर बैठकर वोट डालने जाने की 'इच्छा' खाली चली जाएगी क्या?

लड़ते झगड़ते चैलेंज करते एजेंटों ओर 'स्टान्च सपोर्टरों' के मुँह से तीन चार बजते-बजते फिचकुर निकल आया है। सारी चिक-चिक, झाँय-झाँय ठंडी। कहाँ तक जान देंगे? होने दो जो हो रहा है।

आखिरी वक्त में फिर कोलाहल। सील होते बैलेट बाक्स के मुँह पर सब अपनी अपनी सील लगाने को आतुर।

दोनों बक्सों को सँभालती पोलिंग पार्टी ट्रक पर लद गई। धुएँ का काला गुबार गाँव के मुँह पर मारता ट्रक गड़गडाता हुआ चल पड़ा।

खटिक टोले का गोलू साइकिल नचाते गाते हुए जा रहा है -

प्रजातंत्र को चोट दे गए।

मुर्दे आकर वोट दे गए।।

पहले तो लोग ध्यान नहीं देते। तुक्कड़ जोड़ता है। कवि सम्मेलनों में जाता है। कहीं सुन लिया होगा, गा रहा है। लेकिन फिर लोग चौकन्ने होते हैं। खुसर पुसर होती है। थोड़ी देर में बात फैलती है कि साल भर पहले दिवंगत हुई पदारथ की अम्मा वोट डाल गईं। मुसलमान टोले की तीन 'मरहूमाएँ' भी डाल गईं। गजब।

काउंटिंग आठ बजे से है।

पंद्रह बीस दिन से रात दिन दौड़ते-दौड़ते ठाकुर को हरारत आ गई है। ठंड से बचाव भी हो जाय और हनक भी बढ़ जाय इसलिए काउंटिंग में चलने के लिए बोलेरो बुक की गई है।

अगर शुभ समाचार रहा तो वापसी में चौराहे से जुलूस बना कर गाँव में प्रवेश का मंसूबा बनाया गया है। बहुत दिनों बाद गढ़ी में जश्न मनाने का मौका आने वाला है।

जग्गू ठाकुर के दरवाजे पर नहा धोकर पहुँचा तो बोलेरो आ गई थी लेकिन रामसिंह ने बताया - अभी तो बाबू साहेब उठे ही नहीं।

क्यों? दालान में जाकर खिड़की से झाँक कर देखा - रजाई से सिर ढँका है।

लम्मरदार। उसने पुकारा।

ठाकुर ने मुँह खोला। लेकिन जग्गू का चेहरा देख कर उनकी देह में सिहरन दौड़ गई। जूड़ी आएगी क्या?

मेरी तबियत ठीक नहीं है। वे कमजोर आवाज में कहते हैं - तुम रामसिंह के साथ चले जाओ।

रात के सपने ने उनकी आवाज में कंपन पैदा कर दिया है। सपना देखा कि जग्गू हाथी की नंगी पीठ पर बैठा उन्हीं की ओर आ रहा है। उसके हाथ में लंबा अंकुश है। उनको देख कर अट्टहास करता है - तुम्हीं को खोज रहा हूँ ठाकुर। और हाथी उनकी तरफ दौड़ा देता है। निचाट मैदान में वे अकेले भागे जा रहे हैं लेकिन पैर ही नहीं उठते। पीछे हाथी की चिग्घाड़। राम सिंह पहले ही भाग खड़ा हुआ।

उनकी धोती खुल गई है। धोती की लाँग लंबी होकर पूँछ की तरह घिसट रही है। पैरों में लिपट रही है।

जगने के बाद भी उनकी साँस देर तक धौंकनी की तरह चल रही थी। वे राम सिंह को इस बात के लिए डाँटने जा रहे थे कि वह उन्हें अकेला छोड़कर भागा क्यों? लेकिन समझ गए।

वे बोलेरो वापस कर देते हैं। राम सिंह जग्गू को लेकर मोटर साइकिल से चला जाता है। वे फिर लेट जाते हैं लेकिन सपने का असर डेढ़ दो घंटे में समाप्त होता है तो पछताने लगते हैं - चले जाना चाहिए था।

ग्यारह बजते-बजते बेचैनी बढ़ जाती है - काउंटिंग में भी बेईमानी हो सकती है। मौके पर जो पार्टी कमजोर होती है उसी के वोट सबसे ज्यादा 'इनवैलिड' होते हैं।

वे राम सिंह को फोन मिला कर सचेत करते हैं - इनवैलिड होने वाले अपने हर वोट पर हल्ला-गुल्ला करना और जब तक बैलेट पेपर फिर सील न हो जाय वहाँ से हटना नहीं।

फिर हर आधे घंटे बाद रामसिंह को फोन मिलाते हैं - क्या पोजीशन है?

दोपहर बीतते-बीतते उन्हें ठकुराइन पर तेज गुस्सा आता है - पता नहीं अंदर घुसी अकेले क्या सिंगार-पटार कर रही हैं। यह नहीं आकर थोड़ी देर पास बैठें।

चार बजे रामसिंह बताता है - फुलझरिया आठ वोट से आगे चल रही है। उनका जी धक् से हो जाता है। फिर बड़ी देर तक राम सिंह का फोन नहीं मिलता।

अँधेरा होते-होते रामसिंह बताता है - मुंदर पंद्रह वोट से आगे है।

बाप रे। उनकी धड़कन बढ़ जाती है - हार जाएँगे क्या? फिर पूछते हैं - मुस्लिम टोले के बक्से की गिनती हो गई?

नहीं, अब शुरू हुई है।

वे ठकुराइन को आवाज देते है - जरा एक गिलास और प्याज, दालमोठ दे जाओ।

रामसिंह का मोबाइल स्विच आफ आ रहा है। जग्गू का मोबाइल नंबर उन्होने फीड नहीं किया। किया होता तो भी अब मिलाने की हिम्मत नहीं है। लगता है, जो नहीं होना था वही हो गया। अच्छा किया जो जमीन कब्जे में कर लिया।

सात बजे के करीब जग्गू का फोन आता है - सात वोट से जीत गए, लम्मरदार।

अरे वाह! ...अब यह दूसरी तरह की धड़कन है - धाड़-धाड़...

वे मास्टराइन को गले लगाने के लिए दौड़कर आँगन में जाते हैं लेकिन उनके पास जमीन में बैठ कर कर महरिन की बेटी सब्जी काट रही है। उनके कदम थम जाते हैं। वहीं से बताते है - तुम्हारी विजय हो गई रानी। जरा नहाने के लिए पानी गरम करवाइए।

फिर लौट कर अपनी 'शेविंग किट' ढूँढ़ने लगते हैं।

जग्गू का फोन फिर आया - पदारथ चिल्ला रहे हैं कि बेईमानी हो गई। रिकाउंटिंग के लिए हाईकोर्ट तक जाएँगे।

सुप्रीम कोर्ट तक जाएँ। कौन रोकता है? पदा-पदा कर झिलंगा कर देंगे। उनकी भुजाएँ फड़कने लगी हैं - किस प्वाइंट पर कोर्ट जाएँगे सरऊ।

उनके चौंतीस वोट इनवैलिड हुए हैं अपने इक्कीस, चिल्ला रहे हैं कि फर्जी इनवैलिड करके हराया गया।

चिल्लाने दो। पाँच साल तक चिल्लाते रहें। तुम प्रमाण पत्र लेने के बाद ही हटना। और राम सिंह के मोबाइल का क्या हुआ?

उसकी बैटरी डिस्चार्ज हो गई।

वे कुछ और पूँछना चाहते थे कि... कट गया।

जीत का प्रमाण पत्र पकड़ते हुए जग्गू के हाथ काँप रहे हैं। वह छोटे से बेरंग कागज को सिर से लगाता है फिर ट्यूबलाइट के पास आकर पढ़ता है - प्रमाणित किया जाता है कि श्री जगत नारायण पुत्र श्री बदलू राम साकिन... नाहरगढ़...

जग्गू का विजय जुलूस पक्की सड़क से गाँव की ओर मुड़ा तो वे नहा धोकर प्रेस किया हुआ कुरता, धोती, जाकिट, मोजा ओर काला पंप शू पहन कर तैयार हो चुके थे। कंट्रोल में रहने की अंदर से मिल रही चेतावनी के तहत दो पेग के बाद गिलास तखत के नीचे रख चुके थे।

विजय जुलूस दरवाजे पर आए तो उन्हें खुद माला पहना कर जग्गू का स्वागत करना चाहिए।

अरे, वे ठकुराइन को आवाज देते हैं - भाई, राम सिंह तो है नहीं। किसे कहें। जरा सामने से दस-बारह गेंदे के फूल तोड़ कर एक माला बना दो, प्लीज।

जब से उन्हें 'प्लीज' की ताकत पता चली है, ठकुराइन से कोई अप्रिय कार्य कराने के लिए वे इसी का सहारा लेते हैं - प्ली-ई-ई-ज।

राजगढ़ स्टेट की राजकुमारी ठकुराइन शिवराज कुँवरि आँखें तरेर कर देखती है। यानी मैं माला गूँथूँगी? जगुआ के लिए?

गूँथना पड़ेगा रानी। ठाकुर आजिजी से कहते हैं - जमाने के साथ चलना पड़ेगा। समझो वह नहीं, मै जीता हूँ। असल में तो परधानी मुझे ही करनी है। वह ससुरा तो चिड़ी का गुलाम है।

ठाकुर उनके पास जाकर उनकी लंबी केश राशि पर हाथ फेरने लगते हैं - वह जीत का जुलूस लेकर तुम्हारे दरवाजे पर आ रहा है।

कंधे से पकड़ कर वे ठकुराइन को पलँग से नीचे उतारते हैं।

उन्हें राम सिंह पर गुस्सा आ रहा हैं जुलूस में शामिल होने के बजाय उसे सीधे घर आना चाहिए था। अभी आधा गाँव उनके दरवाजे पर बधाई देने जुटेगा। दो चार डिब्बे मिठाई मँगवा लेते। कुछ पान, बीड़ी, सिगरेट। दस-बीस कुर्सियाँ...

वे खुद गैसबत्ती जलाने लगते हैं।

कितनी देर कर रहे हैं ससुरे? वहीं नाचते रहेंगे कि आगे भी बढ़ेंगे?

...अरे, जुलूस तो लगता है सीधे जग्गू के घर की ओर मुड गया।

वे बेचैन हो जाते हैं। रात का सपना याद आ जाता है - हाथी की चिग्घाड़!

शिवराज कुँवरि हाथ में माला लिए उनसे एक कदम पीछे बगल में खड़ी हैं। वे उनकी ओर देखते हैं। उनका चेहरा भी झाँवा हो गया है। वे उनका हाथ पकड़ कर खींचते हुए कहती हैं - जाने दीजिए हरामजादे को। दोगला निकला। आप अंदर चलिए।

वे गुस्से में हाथ की माला सामने चौकी के नीचे फेंक देती हैं।

लेकिन थोड़े असमंजस के बाद तय करते हैं कि वे खुद जाएँगे। जाना ही होगा। एक लाख से ज्यादा 'इनवेस्ट' कर चुके हैं। बात बिगड़नी नहीं चाहिए।

चौकी के नीचे से माला निकाल कर वे कुर्ते की बगल वाली जेब में डालते हैं। मंकी टोपी उतार कर फेंकते हैं और कुबरी लेकर निकल पड़ते हैं।

गोले दग रहें हैं। छुरछुरिया छूट रही हैं। सरगबान आकाश में छेद कर रहे हैं। दो पेट्रोमेक्स की रोशनी नाचने वालों के लिए कम पड़ रही है।

जग्गू को बीच में करके हाथ की बोतल नचा नचा कर वही लड़के मटक रहे हैं जिनकी सूरत ठाकुर को पसंद नहीं। प्रचार के दौरान ये लड़के एक बार भी उनके दरवाजे पर नहीं आए।

लंगड़ और बिदेशी टोले के पुराने नचनिया हैं। इनकी टक्कर आज भी कोई नौजवान नहीं ले सकता। लंगड़ के सिर पर लाल अँगौछा डाल कर किसी ने घूँघट बना दिया है। एक पैर की भचक अलग समाँ बाँधती है। दोनों हाथ फेंक कर मटक-मटक कर गा रहे हैं - जग्गू जाँबाज ने जग जीत लिया, दइया रे...

नहीं - ई-ई... एक लड़का चीखता है - जग्गू नहीं, टाइगर। जीत गया भई जीत गया। जे एन टाइगर जीत गया।

ठाकुर बड़ी देर तक उपेक्षित से भीड़ के बाहर खड़े रह जाते हैं। कोई उनकी तरफ देख नहीं रहा। मन करता है कुबरी उठा कर सीधे जग्गू की खोपड़ी पर...

नहीं। गाली और गुस्सा दोनों उनके खानदानी दुश्मन रहे हैं। इन पर काबू पाना होगा। पिताजी कहते थे - जब सब साथ छोड़ जाते हैं तो धीरज साथ देता है।

वे भीड़ को चीरते हुए सीधे जग्गू के सामने आ जाते हैं। जेब से माला निकाल कर उसके गले में डालते हैं और उसे अपनी भुजाओं में भर लेते हैं। देर तक भरे रहते हैं। जकड़ से छूटते ही जग्गू अपने गले की माला निकाल कर ठाकुर के गले में डाल देता है।

बाजे की लय थोड़ी भंग होती है फिर तेज हो जाती है। एक लड़का लड्डू का डिब्बा उनकी ओर बढ़ाता है। वे एक लड्डू उठा कर मुँह में डाल लेते हैं। दूसरा लड़का उन्हें पानी का गिलास पकड़ाना चाहता है लेकिन वे टाल जाते हैं।

पानी नहीं पिएँगे? पीजिए।

ठाकुर अनसुना करके मुँह घुमा लेते हैं। लेकिन वह बदमाश फिर आगे आ जाता है। ठाकुर उसे घूरते हैं। हाथ से मना करते हैं।

जब आप हम लोगों के गिलास का पानी नहीं पी सकते, हम को अभी भी 'वही' समझते हैं तो हमारा आपका साथ कितने दिन निभेगा?

ठाकुर की भृकुटि पल भर के लिए टेढ़ी होती है फिर सामान्य हो जाती है। कहते हैं - पानी पीने से ही साथ पक्का होता हो तो कहो बाल्टी भर पी जाऊँ।

कहने के साथ वे लड़के के हाथ से गिलास लेकर गट-गट पी जाते हैं।

एक लड़का उन्हें नाचने के लिए लड़कों की गोल की ओर खींचता है। दूसरा उनके पंजे में पंजा फँसाकर दाएँ बाएँ हिलाते हुए कहता है - जरा कमरिया भी लचकाइए ठाकुर।

नाचते हुए लड़कों के बीच कुबरी वाला हाथ उठाकर वे मटकने-लचकने लगते हैं।

  बनाना रिपब्लिक (भाग-1)            बनाना रिपब्लिक (भाग-2)
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