झगड़ालू और कुलटा कही जातीं हैं जो सवाल पूछतीं हैं - प्रज्ञा पाण्डेय

संयुक्त, बड़े परिवारों में स्त्रियां अपने एकमात्र बहुमूल्य जीवन की आहुति दे देतीं हैं। मेरे पिता अक्सर कहा करते थे कि लड़की का ब्याह जितने ही ऊंचे घर में होता है उसके संकट उतने ही बड़े होते हैं...

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बोनसाई न होकर उसे हरा भरा जंगल होना होगा

 प्रज्ञा पाण्डेय

सभ्यता के प्रारंभिक दौर की स्त्री श्रेष्ठ थी। आडम्बरपूर्ण पूर्वाग्रहों से, आधिपत्यपूर्ण आक्रमणों से दूर अपने स्वाभाविक स्वरूप में, प्राकृतिक गुणों से लबरेज, देह के स्तर पर बलिष्ठ, नेतृत्व करने की क्षमता के साथ वह युद्ध करने में और शिकार करने में भी पुरुष की सहायक हुआ करती थी। महामानव राहुल सांकृत्यायन की मानें तो उसमें सबको साथ लेकर चलने की शक्ति थी, वह झुण्ड में आगे चलती थी, वह अपना साथी खुद चुनती थी। "वोल्गा से गंगा" में वे एक जगह लिखते हैं "पुरुष की भुजाएं भी, स्त्री की भुजाओं की तरह बलिष्ठ थीं" यानी स्त्री की भुजाएं तो बलिष्ठ थीं ही ……। यों तो संगठन करने की शक्ति देह-बल से नहीं मानसिक लचीलेपन से आती है तभी तो तमाम नियम कायदों के बंधनों में बंधी हुई भी स्त्री वर्तमान वैवाहिक व्यवस्था में जल्दी ही अपने नए घर में, जहाँ वह दुबारा रोपी जाती है वहां अपने लिए जगह बना पाने में कामयाब होती है बल्कि कुछ जगहों पर घर का निपुण संचालन भी करती है... यह अलग बात है कि वह अपना सब कुछ यानी अपने अस्तित्व को बचाने की जद्दोजहद में अपना सम्पूर्ण जीवन, अपनी रचनात्मकता और अपनी समस्त ऊर्जा होम करती है। 

स्त्री में नेतृत्व करने का आधार उसके विस्मृत आदिम गुण ही हैं। सदियों से वैधव्य, सतीत्व, बाँझपन, घर के परकोटे, पर्दादारी, शुचिता, वर्जनायें अशिक्षा और चरित्र के मारक चौखटों को झेलती हुई उसकी वह शक्ति कमजोर अवश्य पड़ गयी है और अपनी अस्मिता, अपने अधिकार और अपनी चेतना से अनजान वह कई तरह के समझौते भी करने लगी है फिर भी परिवार से मिले आत्महनन के संस्कारों से लड़ती स्त्री ने खुद को अपराजेय रखा है तो यह उसका जीवट है। 

संयुक्त, बड़े परिवारों में स्त्रियां अपने एकमात्र बहुमूल्य जीवन की आहुति दे देतीं हैं। मेरे पिता अक्सर कहा करते थे कि लड़की का ब्याह जितने ही ऊंचे घर में होता है उसके संकट उतने ही बड़े होते हैं। 

साहित्य, भाषा और शास्त्र भी स्त्री को देह बनाने में और उसे भरमाने में बड़ी भूमिका निभाते हैं। विश्व की लगभग हर भाषा के साहित्य में स्त्री सुकोमल, मधुर और कामिनी रूप में चित्रित की गयी है। उसकी मुष्टिग्राह्या कमर, उसके भारी नितम्ब जो उसे गजगामिनी बनाते हैं उसकी वल्लरी सी बाहें और दाड़िम के रंग के होंठ अनारदानों सी दन्तपंक्ति, मृग जैसे नयन, सुराही सी ग्रीवा और चाँद सा चेहरा। उसका सौंदर्य ही नहीं उसके श्रृंगार उसके वस्त्र -आभूषण में इतना सौंदर्य देखा गया कि उसका नखशिख वर्णन करने में जाने कितनी पोथियाँ भर गयीं। उम्र के अनुसार नायिकाओं के भी प्रकार बने। सोलह वर्ष से नीचे की स्त्री, सोलह वर्ष की स्त्री, उससे अधिक और फिर उससे अधिक उम्र की स्त्री। वह नगर वधू चुनी जाती रही उसके लिए कोठे बनाये गए। सवाल यह है कि प्रकृति की बनाई किस चीज़ में सौंदर्य नहीं है लेकिन स्त्री के अप्रतिम प्राकृतिक गुणों की जगह स्त्री के दैहिक सौंदर्य का बखान साहित्य और शास्त्रों के प्रति ही नहीं उसको रचने वालों के प्रति भी घोर संदेह पैदा करता है। इस तरह प्रकृति की रची स्त्री कहीं गायब हो गयी। 

प्रकृति की व्यवस्था में स्वच्छंदता की मनाही है। सामाजिक मूल्यों की सुरक्षा का पूरा दारोमदार स्त्री के कन्धों पर डालकर पुरुष उसके मूल्यों के निर्वहन के प्रति गैरजिम्मेदार होने की हद तक लापरवाह होता है। आज की स्थितियां, पुरुषसत्तात्मक स्वच्छंद व्यवस्था ने पैदा की हैं जिसका परिणाम है- दहेज़ हत्याएं, भ्रूण हत्याएं और बलात्कार। कारणों की पड़ताल में जाएँ बिना इन अपराधों के लिए स्त्री की दुश्मन स्त्री यह कहकर आज भी व्यवस्था रचने वालों को बरी करके दोष स्त्री के सिर मढ़ने की पुरजोर साजिश जारी है। स्त्री भी विनीत भाव से यह स्वीकार करती है और उपकृत महसूस करती है कि आज भी बहुत से पुरुष अच्छे हैं। ठीक है कि आज भी कुछ पुरुष अच्छे हैं पर क्या यह सामान्य स्थितियां हैं? वह इस बात से खुश होती है कि उसका भाई राखी और तीज में उसके लिए साड़ी लाया है। पिता की संपत्ति पर उसका कितना हक़ है यह सवाल कभी उसके मन उठता भी नहीं। विवाह के बाद पति के घर में वह स्वामिनी नहीं सेविका की तरह आती है। अधिकतर वे स्त्रियां ही झगड़ालू और कुलटा कही जातीं हैं जो सवाल पूछतीं हैं। मध्यम वर्ग में जहाँ परिवार सर्वोपरि है जहाँ स्त्रियां गौण हैंऔर पुरुष प्रधान स्त्रियों का बहुत बड़ा तबका ऐसा है जो पति का अनुगमन आँखें बंद कर करता है जिनका मानना है की पति का नाम लेने से सिन्दूर न लगाने से पति निर्जल व्रत न करने से पति की उम्र घटती है इसलिए वे ताजिंदगी पति का नाम नहीं लेतीं, वे पति को साथी नहीं परमेश्वर कहतीं हैं। ऐसे ही पारिवारिक वातावरण में समाज के भविष्य का पुरुष बड़ा होता है जो खुद को स्वयंभू और स्त्री को सामान और सेविका से अधिक नहीं मानता हैं। असल में स्त्री खुद को पूरी तरह से खो चुकी है। 

सच यह है कि स्त्री की गरिमा पुरुष बनने में नहीं है। स्त्री तो स्वयं ही अतुलनीय रूप से महत्वपूर्ण है परन्तु हालात बेहद विडम्बनापूर्ण हैं। गर्भाशय जो स्त्री होने की पहली पहचान है। गर्भधारण उसके लिए प्रकृति का एक वरदान है इसलिए स्वछंद और अधीर होना उसका स्वभाव ही नहीं है तब समझ में नहीं आता कि स्त्री के लिए वर्जनाओं का निर्धारण करने का कोई अधिकार पुरुष के पास कैसे हो सकता है। स्त्री के लिए जो वर्जित है उसे वह अच्छी तरह पहचानती है। यदि वह अपने अधिकारों का इस्तेमाल करने की आज़ादी पाये तो क्या पुरुष स्वयं ही अनुशासित नहीं हो जाएगा। पुरुष सत्तात्मक व्यस्था ने स्त्री के लिए वर्जनाओं का निर्धारण करने में भी दोनों पहलू अपने पक्ष में रखे हैं। एक ओर घरेलू स्त्री है और दूसरी ओर बाजारू स्त्री। क्या कोई स्त्री बाजारू होना चाहती है ? क्या उसे कोठों पर सुख मिलता है ? इसीलिए आज की स्त्री का एक नया चेहरा उभरने लगा है और वह है विद्रोहिणी स्त्री का जो इस समाज से नाराज़ होकर अकेली रहती है। विद्रोहिणी स्त्री की शुचिता को लेकर सवाल नहीं उठते तब स्त्री की शुचिता की जिम्मेदारी पुरुष क्यों लेता है। वह अपनी शुचिता की जिम्मेदारी क्यों नहीं लेता। स्त्री की शुचिता उसका अपना अधिकार है। स्त्री से शुचिता को लेकर सवाल करना स्त्री के अस्तित्व पर सवाल करना है। 

आज स्त्री बहुत सी दुविधाओं के बीच है। क्या गलत और क्या सही है इसका निर्णय करने में उसे बहुत सी परेशानियां उठानी पड़ती हैं। उसके पास अधिकार तो हैं लेकिन सामजिक मान्यताएं उसके साथ नहीं हैं। इस भौतिकता के युग में वह खुद को कमोडिटी होने से किस तरह बचाये। चेतना के स्तर पर यह जागृति अभी धुंधली है। बहुत मामलों में वह देह को इस्तेमाल करने लगी है लेकिन यह क्या उसको उसकी मंज़िल तक ले जायेगा। खुले कपडे पहनना कोई अपराध नहीं है लेकिन उसके पीछे उसकी मंशा क्या साफ़ है। क्या वह अपनी देह से इतनी मुक्त है। यदि नहीं तो देहप्रदर्शन को स्वयं अपना हथियार बना रही है जिसमें पीछे पहाड़ तो आगे खाई है। क्या कपड़ों से प्रगति आयेगी ?आदिवासी स्त्रियां जिनके स्तन खुले होते हैं और उनके कपडे घुटनों तक हटे होते हैं वे अश्लील नहीं लगतीं क्योंकि वे अपनी लड़ाई लड़ने में समर्थ हैं देह का इस्तेमाल उनकी नीयत में शामिल नहीं हैं। सच यह है कि प्रदर्शन की नीयत से पहने जाने वाले कपडे स्त्री को देह-रूप में ही प्रस्तुत करते हैं। उसे अपनी अस्मिता को पहचानना होगा। 

जब तक स्त्री अपने लिए आर्थिक आधार नहीं खड़ा करती, संगठित होकर अपनी लड़ाई नहीं लड़ती, अपने फैसले खुद नहीं करती तब तक सहजीवन में भी कोई सुख नहीं। पुरुष की मानसिकता ही नहीं स्त्री की मानसिकता भी बदले यह ज़रूरी है नहीं तो वह तो सप्तपदी और वैदिक रीति से ब्याह न करने भर तक ही अलग है। आज की स्त्री को आत्मरक्षा लिए मार्शल आर्ट की शिक्षा और स्वावलम्बी होना बहुत ज़रूरी है ताकि भाई ही नहीं पति भी गर्व से कह सके कि यह स्त्री मेरी बहन है, पत्नी है और यह अपनी रक्षा स्वयं करती है। ताकि स्त्री अपने आने वाली पीढ़ी को भी आत्मरक्षा के लिए दीक्षित कर सके। 

बोनसाई न होकर उसे हरा भरा जंगल होना होगा। 

आमीन

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