फ्रेंड रिक्वेस्ट / पिंजरा - गीता दूबे की दो छोटी कहानियाँ | Two short stories of Geeta Dubey


दो छोटी कहानियाँ 

गीता दूबे

मौजूदा हालात पर लिखी गयीं गीता दूबे की दो कहानियाँ 'फ्रेंड रिक्वेस्ट और पिंजरा, दोनों ही वर्तमान जीवनशैली को दिखती हैं... दोनों ही सच्चाई बयां करती हैं.

भरत तिवारी

फ्रेंड रिक्वेस्ट


जब से मिनी ने मुझे कंप्यूटर पर इंटरनेट खंगालना, सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर फ्रेंड्स बनाना, चैट करना सीखा दिया था मुझे कभी अकेलेपन का एहसास नहीं होता। घर के काम काज निपटाकर कमरे के कोने में कम्पयूटर लेकर बैठ जाती। घंटों इंटरनेट खंगालती, पुराने दोस्तों से चैट करती, पुराने दिनों को याद करती। हम सभी फ्रेंड्स बाईस सालों बाद इस अनोखी और दिलचस्प चीज के जरिये जुड़ गये थे। समय कैसे बीत जाता हमें पता ही नहीं चलता। कई-कई बार तो मेरे घर में होने का एहसास घर के छिपकली और चूहों को भी नहीं होता, वे खाली घर समझ खूब उत्पात मचाते। बस एक ही चीज मैं नापसंद करती थी, जब मिनी और ये मिलकर मेरी सोशल साइट्स खंगालकर मुझे छेड़ते तो मुझे बहुत बुरा लगता।

ममा मैं जा रही हूँ....... बॉय..... मिनी की आवाज मेरी कानों में पड़ी।

और हाँ ममा... आज फिर से मैं कुछ देर से घर लौटूंगी.... कोचिंग क्लासेस के बाद हम सभी फ्रेंड्स ‘हैंग आउट’ जायेंगे.... बॉय....

अरे मिनी ठीक है...लेकिन तुम्हारा इस तरह रोज घर इतनी रात में लौटना मुझे ठीक नहीं लगता....

मौजूदा हालात पर लिखी गयीं गीता दूबे की </span>दो कहानियाँ 'फ्रेंड रिक्वेस्ट और पिंजरा, दोनों ही वर्तमान जीवनशैली को दिखती हैं... दोनों ही सच्चाई बयां करती हैं.

गीता दूबे

पूर्व शिक्षिका, अब स्वतंत्र लेखन
18 अक्टूबर 1969
एम.एस.सी
रोटरी क्लब ऑफ जमशेदपुर फेमिना की सचिव (2014-15)
बहुभाषीय साहित्यिक संस्था सहयोग की सदस्य
दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर,हिन्दुस्तान, प्रभात-खबर, झारखण्ड-केशरी, पठार की खुशबू में लेख, कहानी एवं यात्रा- वृतांत प्रकाशित
संपर्क:
प्रेरणा क्लासेस, इनर सर्किल रोड
कांट्रेक्टर एरिया, बिष्टुपुर
जमशेदपुर-831001
झारखण्ड
ईमेल: geeta.dubey2@gmail.com
ममा आप भी न......बॉय...सी यू....

मिनी बॉय कहकर चली गई। जब से मिनी ग्यारहवीं में गई थी, घर से बाहर दोस्तों के साथ उसका समय ज्यादा बीतने लगा था। रात नौ- दस बजे तक घर लौटती, रोज दोस्तों के साथ उसकी पार्टियाँ होतीं। आय दिन टी.वी. में अखबारों में बलात्कार की घटनाएं पढ़कर, उसका इस तरह देर रात तक बाहर रहना, तंग कपड़े पहनना मुझे काफी चिंतित और परेशान किया करती लेकिन उसे इन सब चीजों से कोई फर्क नहीं पड़ता। हमारे समय में तो जींस और टी-शर्टस लड़कों की पोशाकें हुआ करती थी, हमारे लिए तो सलवार- कमीज और दुपट्टा ही था। शाम पांच बजे के बाद हम जरुरत पड़ने पर ही घर से बाहर निकलतीं और वो भी परिवार के किसी सदस्य के साथ। बस ऐसा ही था हमारा ज़माना, बुरा था या अच्छा था मैं नहीं जानती लेकिन ऐसा ही था।

मिनी के जाने के बाद मैं फिर अपना कम्पयूटर लेकर बैठ गई। इन दिनों मैं सोशल साइट्स पर एक अजीज फ्रेंड को तलाश रही थी जिसे मैंने बाईस सालों से नहीं देखा था। कहाँ है, कैसा है... लेकिन मैं उसे अपना फ्रेंड क्यों कह रही हूँ... हमारे समय में लड़के और लड़की दोस्त नहीं हुआ करते थे। हम एक-दूसरे को जानते थे, शायद पसंद भी करते थे, शाम के समय अपने –अपने घरों की छत से एक-दूसरे को देखा करते, कभी यदि वह मुझे गली में मिल जाता तो मैं तेज क़दमों से निकल जाती और फिर उसे मुड़-मुड़कर देखती रहती और वो भी मुझे देखता रहता। एक बार जब मोहल्ले की शादी में हम मिले थे उसने मेरा हाथ थाम कुछ कहना चाहा था लेकिन मैं हाथ छुड़ा भाग गई थी। हम अपनी सीमाएं जानते थे। हमारी जिन्दगी के अहम निर्णय माता-पिता ही लिया करते थे। माता- पिता का विरोध करना हम नहीं जानते थे, हमें उनपर पूरा भरोसा था। फिर मेरी शादी हो गई, मैंने अपनी एक छोटी सी दुनिया बसा ली और उसमें खुश थी। लोगों ने बताया उसकी भी शादी हो गई और वह विदेश चला गया। मैं उसका नाम लिख-लिख कर घंटो सर्च करती रहती लेकिन हर बार कई अनजान चेहरे ही स्क्रीन पर उभर आते। हर बार मायूसी ही हाथ लगती।

ममा.... मिनी ने मेरे पास आकर धीरे से कहा...

ममा... आज मैं और रोहित फिल्म देखने जायेंगे

मिनी... कभी घर में भी रहा करो...

ममा .. आज तो रोहित का बर्थ डे है ...मुझे जाना ही होगा... हम फिल्म देखेंगे फिर वो मुझे ट्रीट देगा...

क्यों तुम्हारे और फ्रेंड्स क्यों नहीं आ रहे हैं...

ममा आप भी... कितनी भोली हो... अरे रोहित मेरा बॉय फ्रेंड है तो मुझे ही फिल्म दिखायेगा न ममा... आप भी न ममा....

मिनी का इस तरह रोहित के साथ-अकेले घूमना-फिरना मुझे बिल्कुल अच्छा नहीं लगता, मुझे हर वक्त मिनी की चिंता खाए जाती, कहीं कुछ ऊंच-नीच हो गया तो.... लेकिन क्या करूँ आज के बच्चों पर पाबंदी भी तो नहीं लगा सकती पता नहीं कुछ कर बैठे? और फिर मना करने पर मुझे देहाती और न जाने क्या-क्या कह डालती, खैर मैं उसकी बातों का जरा भी बुरा नहीं मानती मैं जानती थी कि बच्ची है, जब बातें समझेगी तब ऐसा नहीं कहेगी।

रविवार का दिन था, हम सभी घर पर ही थे। मैंने देखा मिनी लैप-टॉप पर कुछ कर रही है, ये भी कम्पयूटर पर काम कर रहे हैं तो मैंने भी सोशल साइट्स पर उसे ढूँढने के लिए कम्पयूटर ऑन किया। एक फ्रेंड रिक्वेस्ट था, मैंने उसपर क्लिक किया, उस चेहरे को देखकर मेरी धडकनें तेज हो गई... यह वही था... पूरे बाईस सालों के लम्बे अरसे के बाद उसे देख रही थी.. इन बाईस सालों के लम्बे समय ने उसके चेहरे पर अपनी लकीरें खींच दी थीं... सर के कुछ बाल भी उड़ चुके थे....लेकिन वही आँखें...वही मुस्कुराहट... दो टीन-एज बच्चों का पिता बन गया था वह ... तो क्या वह भी अब तक मुझे भुला नहीं पाया.... मैं उसे तस्वीर में निहार रही थी... क्या करूँ.....,क्या करूँ.... फ्रेंड रिक्वेस्ट कन्फर्म करूँ या..... फिर यदि उसने वाल पर कुछ लिख दिया तो.... और मिनी और इन्होंने देख लिया तो.... कैसे नजरें मिलाऊँगी इनसे? कैसे समझाऊंगी कि हमारे बीच तो कुछ थी ही नहीं। तभी इनकी आवाज सुन मैं चौंक पड़ी -

अरे चाय-वाय मिलेगी.... आज मैं भी घर पर ही हूँ....कहकर ये मेरी तरफ आ रहे थे, इनको अपनी ओर आता देख मैंने डिलीट रिक्वेस्ट पर क्लिक कर दिया और किचन की और चल दी।


पिंजरा


पुश्तैनी मकान की दीवारें अब झड़ने लगीं थीं। कभी कहीं का छज्जा गिर जाता तो कभी किसी दीवार का प्लास्टर उखड जाता। पंखे में तेल डलवाने पर भी उसमें से आ रही चर-चर की आवाज में कोई कमी नहीं आती। सभी चीजों की मरम्मत करवाते- करवाते वह थक चुका था। बगान में लगे कटहल, आम, जामुन, बेल इतने फल देते कि उन्हें रखना और पड़ोसियों में बटवाना एक बड़ा काम हो जाता। पेड़ों की सरसराहट की आवाज उसे चैन से सोने नहीं देती। जब तक माँ, बाबूजी और चारों बहनें थीं, उसे वह मकान कभी बड़ा नहीं लगा। लेकिन अब तो परिवार के नाम पर वो उसकी पत्नी और एक उनका बेटा गोलू ही थे। वह अपने गोलू के लिए एक तोता खरीद लाया था जिसे उसने एक बहुत ही खूबसूरत पीतल के पिंजरे में रखा था और उस पिंजरे को बरामदे में लटका दिया था।

वह जब कभी किसी फ़्लैट में जाता तो वह उसकी तुलना अपने पुश्तैनी घर से करता। उसे लगता फ़्लैट की जिंदगी कितनी सुकून भरी होती है,छोटा और सुखी घर। फ़्लैट का दरवाजा बंद कर लो और सारी दुनिया से बेखबर अपनी दुनिया में खो जाओ। न पेड़ों की सरसराहट का शोर न पेड़ों के पत्ते को इकठ्ठा कर जलाने का झंझट और न ही वक्त बे वक्त किसी पड़ोसी के चले आने का डर। उसने मन ही मन तय कर लिया कि वह भी अब फ्लैट में ही रहेगा और अपना पुश्तैनी मकान छोड़ देगा। उसने ऐसा करने में जरा भी देर नहीं की।

लेकिन यह क्या! नया फ्लैट जिसे उसने बड़े शौक से शहर के सबसे पाश एरिया में खरीदा और सजाया था उसमें आते ही उसे बेचैनी होने लगी। सुबह-सुबह जहाँ सूर्य की किरणें खिड़की से झाँककर उसे जगातीं थीं, वहीँ यहाँ बंद ए. सी. के कमरों में रात और दिन का फर्क उसे पता ही नहीं चलता। पुश्तैनी घर में जहाँ वह बाहर बरामदे में खुली हवा के बीच सुबह की चाय के साथ अखबार पढ़ता, वहीँ फ्लैट के ड्राइंग रूम में ट्यूब लाइट की रोशनी में अखबार पढ़ते वक्त लगता जैसे उसकी जिंदगी से सुबह का उजाला कहीं गुम होता जा रहा है। उसकी बैचैनी बढ़ती जाती। फ्लैट के बाहर आते ही वह महसूस करता कि वह आजाद है लेकिन फ़्लैट में लौटते ही एक अजीब सी घुटन उसे घेर लेती। उसे यह समझते देर नहीं लगी कि उसने क्या खो दिया है।

वह फ्लैट बेच वापस अपने पुश्तैनी मकान में आ गया। आते ही उसने पीतल के पिंजरे से तोते को आजाद कर दिया। वह अब जान गया था कि पिंजरा चाहे जितना भी खूबसूरत हो उसमें सिर्फ और सिर्फ घुटन ही होती है।
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2 comments :

  1. बेहतरीन कहानियाँ। 'फ्रेंड रिक्वेस्ट' काफी पसंद आई। सोशल मीडिया साइट्स ने सचमुच काफी लोगों को जोड़ दिया है। सचमुच फ्लैट किसी पिंजरे से कम नहीं होता। जब मुंबई से अपने घर उत्तराखंड जाता हूँ तो एहसास होता है कि अपने घर और अपार्टमेंट में क्या फर्क होता है। कहानी काफी अच्छी लगीं। साधुवाद स्वीकार करें।

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