लरिकाई के प्रेम . . . – महेन्द्र प्रजापति | Mahendra Prajapati ki Lambi Hindi Kahani


लरिकाई के प्रेम . . . (लम्बी कहानी)

– महेन्द्र प्रजापति

महेन्द्र प्रजापति
त्रैमासिक पत्रिका ‘समसामयिक सृजन’ का पांच वर्षों से संपादन
पुस्तक संपादन – 1) हिन्दी सिनेमा : बिम्ब प्रतिबिम्ब 2) हिन्दी साहित्येतिहासलेखन की समस्याए 3) रामविलास शर्मा और उनका साहित्य
इसके अलावा अन्य पत्र–पत्रिकाओं में कविता, गज़ल, कहानी और लेख प्रकाशित
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1

“सोहना .... रे सोहना .... .अरे कहां हो भई? सुनते क्यूं नहीं . . कबसे चिल्लाए जा रही हूं। ”– वह आवाज देते हुए सोहन के घर में दाखिल हुई तो सबसे पहले बरामदे में देखा, फिर तीनों कमरों में। एक नजर पीछे के हाते में भी देख लिया पर सोहना का कहीं पता नहीं है। वह समझ गयी उपर के कमरे में बैठा किताबें चाट रहा होगा। वह खुद से ही बतियाने लगी– “ये सोहना भी न, जब देखों किताबों में घुसा रहता है। अकेले–अकेले न जाने कौन सा सास्तर बांचता है। मिलने दो बाबू को पूछूगीं आज– “तुम्हें किताबें ज्यादा प्यारी हैं कि हमारी दोस्ती”। आज फैसला हो के ही रहेगा। हम क्या उसकी कुछ नहीं लगती हैं। ” वह खुद से बड़बड़ाते हुए ऊपर के कमरे के पास पहुंची तो अपना सर पीट ली – “इ लो इहां तो ताला बंद है। ” लगता है शहर गया है। अफसोस करती हुई वह घर से बाहर निकल ही रही थी कि सोहन की मां टकरा गयीं। वह खेत से बरसीन का बोझा लिए घर के अंदर दाखिल होने ही वाली थी। उसे देख पूछ लिया – “का हुआ बबूनी काहें हॉफ डॉफ रहीं हैं। ”

“कुछ नै काकी उ हम सोहन को देखने आए थे , कुछ काम रहे। ”– वह अपनी सांसे संभालते हुए बोली। 

‘उ त भिनसहरे ही शहर गया है , बस आता ही होगा। कह रहा था कलक्टरी का फारम भरने जा रहा है। बैइठो। ठढी काहें हो। ” सोहन की मां ने बरसीन वहीं किनारे पटक दिया। वह हैंडपम्प से उनके लिए झट से एक लोटा पानी भर के पकड़ा दी। बोली– “लो काकी पहले मुंह धुलो, मालूम पड़ता है बहुत थक गयी हो। ” पानी का छीटा मुंह पे मारती हुई सोहन की मां बोली– “बस अब सोहन जल्दी से कलक्टर बन जाए तो हम भी उसकी शादी–बियाह करके फुरसत लें। घर में बहुरिया आवेगी तो दाना–पानी भी ठीक से मिलेगा। बुढ़ापे में चुल्हा चौका शोभा नहीं देता। ” वह कुछ देर खड़ी कुछ सोचती रही फिर बोली– “देखना काकी, तुम्हारा सोहन एक दिन बहुत बड़ा कलक्टर बनेगा। ” काकी के चेहरे पर लाली उतर आयी खुश होकर बोली–“देखो बेटा, किस्मत में का बदा है। हम तो अपनी सारी कमाई उसकी पढ़ाई लिखाई में लुटा दिए हैं। एक बित्ता जर जमीन न बना सके। ” उसने काकी को भरोसा देते हुए कहा– “तुम्हारी मेहनत तुम पर एक दिन सोना बनके बरसेगी काकी . . .देखना तुम . . .तुम्हारा सोहन एकदम हीरा है। ” सोहन की मां ने गर्व से कहा– “बिटबा त हमार हीरा बाय ही”
“अच्छा काकी हम चलते हैं, सोहन आए त कहना महाराज एक बार मिल ले . . .एक हफ्ता हो गया उनसे भेटाए हुए” ‘ठीक ह बबूनी’

वह घर से अभी बीस पच्चीस कदम पहुंची ही होगी कि सोहन आ गया। साईकल एक तरफ खड़ी कर हैंडपाईप पर पहुंच हाथ मुंह धुल ही रहा था कि मां ने बताया –“उ आयीं थी . . .खोज रही थीं तुम्हे। ” सोहन समझ गया कि ढे.लवा आयी होगी। पूछा – “का कह रही थी”

“ बस पूछ रही थी ...कुछ बतायीं नहीं, चाय पानी कर लो फिर जाए के मिल लेना”

“हम मिलकर आतें हैं। ”

“अरे अभिए तो आए हो थके हारे। बैठो, जाना आराम से”

“बस माई आया 5 मिनट में, तू चाय रख”

वह तेज कदमों से ढेलवा के घर की तरफ बढ़ रहा था। जानता था आज उसकी खैर नहीं है। दस बात सुनाएगी और मुंह फुलाएगी उपर से। वह उसके घर के पास पहुंचा तो बरामदे में कोई नहीं था। उसे याद आया कि आज तो उसके मामा–मामी उसके साथ ही शहर गए थे। मालूम होता है अभी आए नहीं। ‘ढ़ेलवा ...ढेलवा की आवाज करता हुआ वह उसके वह घर में दाखिल हुआ तो देखा वह चाय बनाने में मशगूल है। सोहन को देखते ही बोली– “आ गए महाराज ? मिल गयी फुरसत दुनियाभर से? ढेलवा अब आपको तभी याद आती है जब आप निठल्ले रहते हैं। ”

“निठल्ली तूं . . .दिन भर खाली बना बना कर खाने के आलावा अउर कौनों सहूर आता है तुमको . . .” –सोहन ने चुटकी ली तो वह आंखे दिखाकर उसका हाथ खींचते हुए बोली– “अच्छा अच्छा बैइठो हिंया . . .ढेर बोलोगे तो कुछ सुनोगे अभी . . .हम सोचे मामा–मामी शहर से आते ही होंगे तब तक हम उनके लिए चाय ही बना लेते हैं। ”

“आते ही माई ने कहा कि तुम खोजने आयी थी ...हम पानी भी नै पीए सीधे यहीं आए हैं भागे। ”

“हम गए तो थे, तुम मिले ही नहीं”

“कुछ जरूरी काम था ढेला . . .? ”

“पहले चाय पी लो बताते हैं फिर”

“ठीक है हम बाहर बैठे हैं वहीं आओं” सोहन आकर बरामदे में बैठ गया। बहुत समझदार था सोहन। जानता था कि कोई कुछ कहेगा नहीं। सबको भरोसा है उस पर, लेकिन अपनी इज्जत अपने हाथ में होती है। इधर वह 2 महीने से देख रहा है नदी पार के कुछ आवारा लड़के लगातार ढेलवा के घर के आस–पास मंडराते रहतें हैं। वह चाय लेकर आयी तो सोहन ने पूछा– “क्यूं खोज रही थी हमें ? बता ना अम्मा बता रही थी बहुत परेशान थी तुम ....। ”

“काम होवे तभिए खोजे तुम्हें हम। ”

“बिना काम के कौन खोजता है किसी को”

“ज्यादा बनो मत नहीं तो बताएंगे भी नहीं ...कह देती हूं। ’’

“अच्छा नाटक मत कर बता जल्दी . . .बहुत काम है अभी। ”

“बताते है पहले चाय पीयो”–वह सोहन को चाय का गिलास देकर उसके सामने एक अखबार फैला दी और बोली– “सोहन हमें इ कहानी पढ़ के सुना दो। ” सोहन ने अखबार को आश्चर्य से देखा। उसमें शूट–बूट पहने एक सुन्दर लड़के की तस्वीर बनी हुई थी और साथ में गुलाबी रंग की साड़ी पहने लड़के का हाथ पकड़े एक खूबसूरत युवती मुस्कुरा रही थी। सोहन ने पूछा– “तुम्हे कैसे पता इ कहानी है?” ढेलवा मुस्कुराई और मोटे अक्षरों में ‘कहानी’ लिखे पर हाथ रखते हुए बोली– “तुम्ही एक ठे पूरे गांव में ग्यानी नहीं हो हम भी तीन तक पढ़े हंै, समझे बाबू ...इतना तो जोड़कर हम भी पढ़ लेते हैं। इ देखों ‘क’, ‘ह’ में ‘आ’ मिलकर ‘हा’ और ‘न’ में ‘ई’ मिलकर ‘नी’। हो गया न पूरा ‘कहानी’

“तुम भी ग्यानी हो गयी हो”–सोहन ने मजे लिया तो मुस्कुराने लगी बोली– “पर इन भारी भारी अच्छर का मतलब हम नहीं समझ पाते सोहन ...तुम जल्दी से कहानी पढ़ो और मतलब भी बताना खाली भुल्लर पंडित की तरह कथा मत बांचना। ”

सोहन ने महसूस किया ढेलवा उस अखबार में बने लड़के की तस्वीर को मंत्रमुग्ध भाव से लगातार देखे जा रही थी। वह कहानी पढ़ ही रहा था कि ढेलवा बोली– “कितना सुन्दर है ना...एकदम हीरो ...आने दो मामी को कहूंगी मुझे भी ऐसा ही दुलहा चाहिए। एकदम शूट बूट पहनने वाला। दस लोग देखे तो कहे कि हां दुलहा है। ” सोहन ढेलवा की आखों में अपने लिए ऐसी चमक कभी नहीं देखा था। वह समझ गया कि ढेलवा के मन में अभी वह प्रेम का बीज अंकुरित नहीं कर पाया है। मन में आया आज कह दे पर कुछ बोल नहीं पाया। कहानी पूरी कर झटके से उठा और जाने लगा। 

“अरे सोहन तुमने तो चाय पी ही नहीं”

“माई रस्ता देख रही होगी ...पांच मिनट बोल कर आया था। एक घंटा हो गया। ”

“चुपचाप बैठो चाय पीके जाना . . .हां नई तो। एक तो मेहनत करके इनके लिए चाय बनाओ और इ पीएंगें नहीं। ”

ढेलवा ने जबरदस्ती बैठा लिया। उसके किसी जिद को टाल जाना सोहन ने जैसे सीखा नहीं था। बैचैनी से बैठकर चाय पीने लगा। 

2

सोहन बीस इक्कीस साल का गेहूंए रंग का गठे बदन का बहुत समझदार लड़का है। एकदम पढाकू। हर साल पूरे जिले में वही टॉप करता है। एम .ए .पहले साल की परीक्षा देकर अभी ही मुक्त हुआ है। बहुत सुलझा और साहसी। एकदम सधी सधाई बात करने वाला और खूब पढने लिखने वाला। किताबों की गंध से उसे दीवानगी है। इतनी सी उमर में इतिहास, भूगोल, समाजशास्त्र के साथ हिन्दी अंगे्रजी के व्याकरण और साहित्य काफी पढ़ चुका है। ढेलवा तो चिढ़ाती है उसे– “तुम इन्हीं किताबों से बियाह भी कर लेना और किताबें पैदा करते रहना। बच्चे होंगे तो तुम्हे परेशान करेंगे, पढ़ने नहीं देंगे। ” सोहन मुस्कुरा कर टाल जाता। जानता था बिना पढे. वह इस गांव की हालत सुधार नहीं सकता। एम .ए .के साथ ही वह सिविल की परीक्षा की तैयारी में जी जान से लगा हुआ है। सच्चाई तो यह है कि सोहन किसान का बेटा है। जीवन की छोटी छोटी चीजों के लिए उसने अपने माई बाबूजी को संघर्ष करते हुए देखा है। इस गांव की नीरीहता उसे अन्दर से कचोटती है। अभाव और तनाव में जीते फिर जिन्दगी से मुठभेड़ करते उसके गांव के लोग उसकी प्रेरणा के श्रोत थे। वह अपनी सारी चेतना पढ़ने लिखने में झोक देता था। इससे उलट ढेलवा पूरी तरह कल्पनाजीवी, चंचल और बातूनी लेकिन एकदम निश्छल और मासूम। दुनिया के दाव पेच नहीं जानती थी। तीन साल की थी जब उसके मामा मामी अपने साथ ले आए थे। सोहन की माई बताती है कि बहुत दवा दारू और कर्मकांड करने के बाद भी रमधन के कोई सन्तान नहीं हुई तो वह अपनी मेहरिया के जिद करने पर अपने बहन की लड़की ढेलवा को अपने यहां ले आए। ढेलवा अपने तीन बहनों में मझली थी। खूब गोरी चिट्टी। बडी. बडी. टुकुर टुकुर ताकती आंखों वाली ढेलवा को जो देखता बस देखता ही रह जाता। कोई विश्वास ही नहीं करता की वह इसी गांव की है। उसका नाम था – रंजना। सोहन उसे ढेलवा कहता। ढेलवा कहने के पीछे कथा यह है कि– बचपन में जब किसी से कुछ झगड़ा लडा.ई हो जाती तो वह जो भी ढेला ह्यईंट पत्थर के टुकड़े हृ पाती चलाकर मार देती। बस सोहन ने उसका नाम रख दिया– ढेलवा। लेकिन यह नाम बस सोहन ही ले सकता था और किसी की हिम्मत नहीं जो उसे ढेलवा बोल दे। नहीं तो उसकी खैर नहीं। मोहन महतो का बेटा रमेश एक बार उसे ढेलवा बोल दिया तो उसके घर में उसको गाली फजीहत करके आ गयी। बाद में सोहन से समझौता करवाया था। सोहन उसका सबसे पक्का साथी था। अपना सुख दुख वह उसी से कहती थी। कभी खाने में कुछ अच्छा बनाती तो सोहन के लिए ध्यान से रख देती। दोनों एक दूसरे की जरूरत बिना कहे समझ जाते थे। सोहन ढेलवा से कुछ 4–5 साल बड़ा होगा। उसने बहुत समझाया कि पढ़ ले लेकिन ढेलवा ने एक नहीं सुनी। बहुत खींच तान कर तीसरे दर्जे तक पढ़ पायी। कभी कभी सोहन इस बात को लेकर गुस्सा करता तो उसे और छेड़ देती– “तुम्ही बनो ग्यानी पंडी जी हम तो अइसे ही ठीक हैं। ” पर उसे अब महसूस होने लगा था कि सोहन सही कहता था। उसे पढ़ लेना चाहिए था। सोहन कहता–अभी भी समय है नाम लिखा लो . . .पढ़ने की कोई उमर नहीं होती तो वह टाल जाती कहती –“हां अब हम जाएंगे पढ़ने घोड़ी भर की तो हो गयी हूं। ” उसके इस हरकत पर सोहन खीज जाता कहता–“तुम रहोगी हमेशा ढेला ही . . .” ढेलवा कहां कम थी कहती –“आए बड़े सोहना ग्यानी”

3

एक दिन गांव में एक ऐसा व्यक्ति अवतरित हुआ जिसे सभी लोग टकटकी लगाए घूर रहे थे। तीस एकतीस साल का वह व्यक्ति शूट बूट धारण किए किसी दार्शनिक सा दिव्य पुरूष लग रहा था। बाद में पता चला नदी पार के बाबू साहब ने एक प्राईवेट स्कूल खोला है। उन्हीं के स्कूल में मास्टर बनकर आया है। बाबू साहब अपनी दबंगई और बदचलनी के लिए पूरे इलाके में जाने जाते हैं। इधर के कुछ वर्षों में उन्होंने महसूस किया कि जनता अब लाठी से नहीं डरती। मार खा लेती है, भूख सह लेती है पर अपने मत से तख्तो ताज पलट देती है। इसलिए वह आजकल भले मनुष्य होने का नाटक करने लगे हैं। अचानक जनता के प्रति उनका प्रेम बढ़ गया है। जिस जुबान से उन्होंने कभी बिना गाली बात नहीं की होगी, वही जुबान रिरियाती है। क्या करे सत्ता को मोह ही कुछ ऐसा होता है। सांसद बनने का स्वप्न दिल में हिलोरे ले रहा है। किसी ने उन्हें सलाह दी कि स्कूल खोलने से उनकी छवि पूरे इलाके में अच्छी बनेगी जिससे चुनाव में वोट भी खूब मिलेगा। बस क्या था छोटे छोटे कई प्राईवेट स्कूल खोलने का कार्य आरम्भ हो गया। वषों से गरीबों मजदूरों का मारा हुआ पैसा इस शुभकार्य में खूब काम आया और फिर उनका नेताओं से साठ गांठ भी कम नहीं था। स्कूल के लिए पैसा पास करवा लेना उनके बाएं हाथ का खेल ही तो था। यह जो चिन्तक इस गांव में अवतरित हुआ था उन्हीं का प्रचारक था। वह कभी शूटेड बूटेड होकर तो कभी कन्धे पर झोला लटकाए कुर्ते जीन्स में पूरे गांव में घूमता। वह प्रशासन के भ्रष्टाचार, गरीबी के कारण और शिक्षा के प्रभाव पर खूब बातें करता। उसकी बातों में मानवता और मनुष्य के अधिकार के पक्ष की बड़ी बड़ी सूक्तियां होतीं। सदियों से सताए, आधे पेट खाए गांव वाले उसकी बातों को कान टिकाए किसी प्रवचन की तरह सुनते रहते थे। उन्हें इस युवा से किसी बड़ी क्राति की उम्मीद जगने लगी थीं। दोपहर दो बजे स्कूल बन्द हो जाता तो वह पूरे गांव मे घू.म घूम कर शिक्षा और संविधान के महत्व बताता। स्त्री मुक्ति उसका प्रिय विषय था। अधिकतर समय वह स्त्री चेतना और अधिकारों पर लम्बा चौड़ा भाषण पेश करता। गांव की वह लडकियां जो चुल्हा फूकने के साथ अपनी इच्छाएं और उम्मीदों को भी फूंक दिया करती थी और रोटी बनाने के अलावा कुछ सीख नहीं पायी थीं। जिन्होंने दहलीज के बाहर कभी कदम नहीं रखा। वह आंख टिकाए उस ज्ञानी को देखती रहती थी। उसकी बातें सुनती रहतीं थी। उस ज्ञानी की नज़रे विशेष रूप से उनकी तरफ होती जिनकी उम्र 16 से 25 के बीच में होती थी। उन्हें वह स्त्री मुक्ति के पाठ सीखाता। उनके पास जाकर उनकें मटमैले हो चुके सौंदर्य में अपनी वाणी से चमक भर देता। पूरा गांव उसकी बातों में अपने मुक्ति की राह देखने लगा था। लड़कियो के बीच उसका आकर्षण गजब का था। कभी स्थिर तो कभी उत्तेजित होकर वह गांव की स्त्रियों को स्कूल भेजने की जिरह करता। ज्ञान की मुद्रा में कहता– “देवियों आपकी मुक्ति स्वतंत्र होने में है और आपकी स्वतंत्रता में आपकी देह ही बाधक हैं। उससे मुक्त होना सीखिए। स्त्रियों को हमारे समाज में हमेशा दबाया और सताया गया क्योंकि आरम्भ से ही उन्हें कमजोर समझा गया। एक पुरूष दस स्त्रियों के साथ रहे तो समाज कुछ नहीं कहता पर एक स्त्री दो लोगों से बात भी कर ले तो  उसे बदचलन कहते हैं। आप ही कहिए यह कैसा न्याय है। अपनी मानसिकता को बदलिए और खुद चुनाव किजिए की आपको किस पुरूष के साथ जीवन गुजारना है। हमेशा पुरूष समाज ही स्त्रियों को क्यूं छोड़े ? क्या यह अधिकार सिर्फ उसे ही है? स्त्रियां आजीवन मर्यादा और समाज के नाम पर थोप दिए गए व्यक्ति के साथ जीवन बिताने को विवश क्यों रहें? मेरा तो यही मानना है देवियां कि आप खुद फैसला लें कि आपको अपनी देह किसे सौपनी है। देह से मुक्ति ही आपकी सच्ची मुक्ति है वर्ना आपकी पहचान खो जाएगी। ” अपनी बातों की पुष्टि के लिए वह कई देशी विदेशी विद्वानो के तर्क भी देता जिससे उसके ज्ञान का पता चलता रहे। कुछ लड़कियों जो अभी किशोरवस्था में प्रवेश ही करने वाली थी वह इस ज्ञानी के मोहपाश में ऐसे उलझी कि उसे अपना सर्वस्व मान बैठीं। उन्हें वह किसी मसीहा सा लगता। लडकियां शर्मा लजा कर उसकी टिप्पणियों पर मुस्कुरा देतीं। वह आह्वान करता कि सभी लाग अपनी बेटियों बहनों को पढ़ने भेजें। वह अक्सर मौका देख ढेलवा के पास आ जाता कहता– “आप इतनी रूपवती हैं वस थोड़ी पढ़ लेती तो पूरे इलाके में आप जैसा कोई नहीं है। प्रकृति ने आपकी आखों पर बहुत मेहनत की है। इतनी सुन्दर आखें मैंने पहले नहीं देखी। ” ऐसी बातें वह गांव की अन्य लडकियों से भी करता पर अकेले में। ढेलवा उसके सम्मोहन में उलझ चुकी थी। उसके सपनो के सांचे में वह पूरी तरह फिट हो चुका था। उसका आकर्षण मास्टर की तरफ बढ़ता ही जा रहा था। मास्टर की बातें कुछ बुजुर्गों को खटकती भी थी पर कुछ कह नहीं पाते। कुछ दिन में ही वह पूरे गांव में चर्चित हो चुका था। अब तो दोपहर और रात का भोजन भी उसे गांव वालों से ही मिलने लगा। यौवनावस्था की दहलीज पर खड़ी लड़कियां उसके खाने पीने का विशेष ध्यान रखती थीं। वह उनके सपनों के राजकुमार सा प्रतीत होता था। गांव वालों के इस निमंत्रण को वह बहुत ही सभ्यता से उनका प्रेम और स्नेह कहकर स्वीकार कर लेता और इसी बहाने घर की लड़कियों का मनोविज्ञान भी समझने की कोशिश करता।  

4

सोहन को शहर गए दो महीने से अधिक का हो चुका था। ज्ञान के इस आतंक से अभी उसकी भेंट नहीं हो पायी थी। सोहन निश्चय कर चुका था कि चाहे जितनी मेहनत करनी पडे. इस बार सिविल की परीक्षा पास करनी है। अपने गांव की रेंगती जिन्दगी उसे चैन से सोने नहीं देती थी। वह समझ चुका था पढ़ाई लिखाई से इन्सान कुछ भी हासिल कर सकता है। गांव में बिजली की समस्या तो थी ही अखबार और पत्र– पत्रिकाओं का अकाल सा है। इसकी जरूरत के लिए उसे बार बार शहर जाना ही पड़ता था। फिर काम की किताबें भी नहीं मिल पाती थी। सो फैसला किया कि एक साथ शहर में टिक कर पढा.ई करेगा। गांव कम जाएगा। निम्न और पिछली जात के लोगों से भरे पड़े उसके गांव की आबादी लगभग तीन हजार है। पूरा गांव गरीबी और अभाव में जीने का आदी हो चुका है। सोहन को अपने इस गांव की लाचारी कचोटती है। शहर से पचास मील दूर इस गांव में बिजली के नाम पर बस पुराने हो चुके मुंह चिढ़ाते खम्भे हैं। रोशनी किसी घर तक नहीं पहुंच पायी है। शिक्षा के नाम पर मात्र पांचवी तक का एक सरकारी स्कूल है जिसमें बाहर अध्यापक और कुल तीस बच्चे हैं। अध्यापकों में भी कभी तीन–चार से अधिक नहीं आते। बस खानापूर्ति के लिए कक्षाएं लगायी जाती हैं। ककहरा के अलावा बच्चे गिनती और पहाड़ा से अधिक कुछ सीख नहीं पाते। वहीं नदी के उस पार सवर्णों के गांव में चौदह घंटे बिजली के साथ बारहवीं तक स्कूल की सुविधा भी है। स्वास्थ्य केन्द्र भी वहां से दो किलोमीटर की दूरी पर है। दिल्ली और लखनऊ से चली सारी योजनाएं नदी के इसी पार रह जाती। गांव के प्रधान भी इसी में कोई होता है जो पांच वर्ष में एक बार दिखता है। विकास की सारी योजना नदी के इस पार तक सीमित थी। सोहन जानता था सिर्फ उसका ही नहीं बल्कि भारत के हजारों गांव रोटी तक को वंचित हैं। उसका अख्तियार बस उसके गांव तक ही था। उसे रोटी, कपड़ा मकान के साथ रोजगार और शिक्षा से जोड़ने के लिए वह दिन रात मेहनत कर रहा था। अपने निर्दोष और नीरीह गांव वालों की दुर्दशा देखकर उसकी आंखे भर जाती। वह मन ही मन कसमें खाता कि एक दिन वह अपना गांव सबसे प्यारा गांव बना देगा। इस गांव और नदी के पार वाले गांव की दूरी दो किलोमीटर से अधिक नही होगी लेकिन जीवन जीने में जमीन और आसमान का फर्क महसूस किया जा सकता है। सोहन के गांव में कोई भी समस्या हो नदी पार करके वहां तक पहुंचना जरूरी होता था। छोटी सी छोटी समस्या के समाधान के लिए नदी के पार जाना जैसे इस गांव में पैदा होने वाले हर इन्सान के माथे पर अपने जन्म के साथ ही लिख दिया जाता है। कितने प्रधान और कितने ही प्रधानमंत्री आए पर इस गांव के अच्छे दिन कभी नहीं आए न कोई लहर इस गांव में शिक्षा और भूख को दिशा दे पायी। 

सोहन ने कई बार लोगों को समझाया कि लोग अपने बच्चों को हिम्मत करके पढ़ने भेजे लेकिन जहां रोटी मुश्किल से मिलती हो वहां स्कूल की फीस कहां से आए। फिर कॉपी किताब का खर्चा उन्हें पहाड़ लगता। नतीजन अधिकतर लड़के पन्द्रह सोलह वर्ष की आयु में ही दिल्ली बम्बई, कलकत्ता, लुधियाना और पंजाब जैसी जगहों पर कमाने धमाने चले जाते। न जाए तो खाएं क्या ? सच्चाई तो यह है कि गांव में कई ऐसे घर हैं जिनमें दोनों पहर चुल्हे भी नहीं जलते थे। जब पेट ही नहीं भरता तो दिमाग क्या खाक चलेगा। बीच में सरकार ने मिड डे मिल चलाया तो सारा राशन पानी गांव के प्रधान और अध्यापकों के पेट में पहुंच गया। सोहन ने तीन चार बार जिलाधिकारी से पत्र लिखकर शिकायत की तब कहीं जाकर स्कूल में कभी खिचड़ी तो कभी दाल चावल बनने शुरू हुए। इस योजना के चलते ही बच्चों की संख्या तीस से तीन सौ हो गयी। मास्टरों की गालियां और थप्पड़ खाकर बच्चों का पेट भरने लगा तो स्कूल उन्हें भाने लगा। जहां भूख बलवती हो वहां ज्ञान क्या काम करेगा। स्कूल के प्रिंसिपल ने इस खबर को अखबारों में पैसा देकर खूब चर्चित करवाया। सोहन को अपने गांव की इस सिसकती जिन्दगी पर बहुत तरस आता वह सोचने लगता–अजीब बिडम्बना है, हमारे प्रशासन के अधिकारी और अध्यापक यह भी नहीं समझते कि इस स्कूल में जिन लोगों की संख्या तीस से तीन सौ हुई है वह विद्यार्थियों की नहीं भूखों की है जिन्हे अक्षरो की ताकत नहीं भूख और प्यास की मजबूरी यहां तक खींच लाती है।  

5

दो महीने बाद कुछ दिन के लिए सोहन गांव लौटा तो उसकी माई ने सबसे पहले मास्टर की कथा सुनाई। सोहन खुश हुआ कि कोई तो आया जो लोगों में चेतना भर रहा है। पर माई ने जब उस मास्टर के चरित्र को लेकर शक किया तो सोहन किसी उलझन में फंस गया। उसी दिन शाम को वह ढेलवा के घर की तरफ जा ही रहा था कि देखा कुछ लोग किसी को घेरे खड़े हैं। सोहन समझ गया वही होगा जिसके बारे में माई ने बताया था। मास्टर के चेहरे की ताजगी और बात करने का सलीका किसी को भी मोह सकता था। सोहन भी प्रभावित हुआ। पर सोहन ने मनोविज्ञान का भी गहन अध्ययन किया था। मानव मन और उसकी भाषा से व्यक्ति के चरित्र का अंदाजा लगा लेने में माहिर था। उसने मास्टर की आंखों में तैरती वासना को साफ साफ महसूस कर लिया। वह ज्ञानी अपने प्रिय विषय ‘स्त्री मुक्ति’ पर धारा प्रवाह अपना वक्तव्य दिए जा रहा था। सोहन भी पास खड़ा होकर सब सुन रहा था। ढेलवा अपनी आखें गडा.ए बस उस मास्टर को टुकुर–टुकुर देखे जा रही थी। सोहन के अन्दर कुछ टुटने लगा। ढेलवा में उसकी जान बसती थी। उसकी जिन्दगी का एक मकसद वह भी। वह ढेलवा, जिसे वह तबसे चाहता है जबसे प्रेम का ठीक ठाक मतलब भी नहीं जानता था। वह बस उसे अच्छी लगती थी । इतनी अच्छी कि उसके लिए कुछ भी कर गुजर जाए पर ढेलवा कभी उसका प्यार समझ नहीं पायी। सच तो ये है कि सोहन ने कभी समझाया भी नहीं। बस जीभर चाहा। अचानक मास्टर की नजर उस पर गयी तो उसने दिव्य मुस्कान फेकते हुए पूछा– ‘बंधुवर आप कौन’

‘अरे इ तो हमारा सोहन है . . .शहर से कब आए सोहन? ” – ढेलवा ने सोहन की तरफ देखते हुए पूछा। 

“ शहर में क्या करते हैं आप” –मास्टर ने पूछा

“कलेक्टरी की पढाई कर रहा है सोहन” –फिर जवाब ढेलवा ने ही दिया। मास्टर मुस्कुरा कर बोला– “भई ये तो बहुत अच्छी बात है। ” फिर कुछ सोचने लगा। सभा खत्म कर दी गयी। कुछ लड़कियों कों छोडकर लगभग लोग अपने काम पर लौट गए। “आपको क्या लगता है, देह की मुक्ति में ही स्त्रियों की मुक्ति है ? ” –सोहन ने अचानक मास्टर से पूछा। उसे सोहन से ऐसे सवाल की उम्मीद नहीं थी। सम्भलते हुए बोला– “बिल्कुल . . वह इसीलिए वंचित है कि उनकी लैंगिकता उनके साथ जुड़ी हुई है। लोग डरते हैं कि बहन–बेटियां घर से बाहर निकलेंगी तो कहीं कुछ अनर्थ न हो जाए। उनके साथ इज्जत शब्द बुरी तरह से चिपका हुआ है और आप इतना तो जानते होंगे कि इज्जत हमारे समाज में किस कदर भयभीत करने वाली चीज है। ” सोहन समझ गया कि उसके दिमाग में क्या चल रहा है। माई ठीक कहती थी यह ठीक आदमी नहीं मालूम पड़ता। कुछ सोचकर सोहन ने फिर सवाल किया– “आपको नहीं लगता कि देह मुक्ति से अधिक उन्हें यह समझाया जाना चाहिए कि वह शिक्षित होकर पुरूषों के बराबर खड़ी हो सकती हैं फिर अपने जीवन के फैसले वह स्वयं लेने में सक्षम होंगी। ”मास्टर से अभी तक तर्क कुतर्क करने वाला इस गांव में कोई नहीं मिला था। सोहन की बातों से उसे अन्दाजा हो गया कि वह गलत आदमी से विमर्श कर रहा है। पर हार मानना भी उचित नहीं है, गांव वालों के सामने इज्जत पर आंच आयी तो अब तक का बना बनाया सब मिट्टी में मिल जाएगा। फिर वही दिव्य मुस्कान होठों पर सजाकर बोला–“बंधुवर आपकी बात ठीक है, पर उन्हें शिक्षा के लिए मानसिक रूप से तैयार करने में काफी समय लगेगा। इतना आसान नहीं है। उन्हें पहलें मानसिक गुलामी से मुक्त करना होगा। ” सोहन अच्छे से समझ गया कि मास्टर का लक्ष्य क्या है। वह तन्ज करते हुए बोला– “तो आप यह कहना चाहते हैं कि ‘देह मुक्ति’ की बात करके इन नादान लडकियों को अपने बिस्तर तक ले जाने में कम समय लगता है। ” मास्टर बिगड़ गया– “आप मेरे चरित्र पर प्रश्नचिन्ह लगा रहे हैं”

“अगर आप चरित्रवान है तो घबराते क्यूं है”

“ आप बात ही ऐसी कर रहे है”

“ मैं आप जैसे ऐसे कई लोगों को जानता हूं जो गांव की नादान और ना समझ लड़कियों को देहमुक्ति का स्वप्न दिखाकर उकसाते हैं। पहले तो स्वयं भोगते हैं फिर किसी कोठे पर बेच आते हैं। ”

“ बन्धुवर, लगता है आपको कोई बुरा अनुभव हुआ है। ”

“इन्सान दूसरों के अनुभवों से भी बहुत कुछ सीखता है। ”

दोनों की वार्तालाप ने महौल में तनाव पैदा कर दिया। मास्टर के प्रेम में आकंठ डुबी लड़कियों को पहली बार सोहन का व्यवहार बुरा लगा। मास्टर गुस्से में वहां से चला गया तो ढेलवा भी सोहन पर काफी नाराज हुई। सोहन उन्हें कैसे समझाता कि जिन्हें वह मसीहा समझ रहीं हैं वह व्यापारी है। जिस्म का, शिक्षा का और मासूम भावनाओं का भी।  

6

सोहन बस दो दिन के लिए ही आया था पर एक हफ्ता रूक गया। इसकी वजह ढेलवा थी। उसने महसूस किया कि वह कुछ बदल गयी है। उससे मिलने से कतराने भी लगी है। सोहन को शक हो गया कि जरूर मास्टर ने कुछ सिखाया होगा। कभी कभार ढेलवा मिलती भी तो मास्टर की ही बात करती। मास्टर की चर्चा आते ही ढेलवा का चेहरा खिल जाता। वह चंचल हो जाती। सोहन के अन्दर कुछ टूट जाता। मन उचट जाता। पर कहे भी तो किससे। इन्सान जब किसी के प्रेम में होता है तो निखर जाता है और ढेलवा निखर गयी थी। इतना कि कोई भी उसे अपना दिल दे बैठे। सोहन जानता था ढेलवा नासमझ है। भावुकता उसकी सबसे बड़ी कमजोरी है। वह जिस पे्रम में सर से पांव तक डूबी है, उसकी पहुंच मात्र देह तक ही है। आत्मा से इसका कोई संबंध नहीं है। वह छली जाएगी क्योंकि अभी उसे इस प्यार की परिणति का अन्दाजा बिल्कुल ही नहीं है। ढेलवा सोहन की जिन्दगी की सबसे बड़ी कमजोरी थी। उससे अलग उसका कोई सपना था ही नहीं। उसे बेहद चाहने के बाद भी कभी कह नहीं पाया। डरता था कहीं दोस्ती भी न टूट जाए। विश्वास था कि एक दिन ढेलवा खुद समझ जाएगी। इन्तजार था कि वह कुछ बन जाएगा तो माई को उसके घर उसका हाथ मांगने भेजेगा। माई का भी सपना था कि ढेलवा को बहू बनाएंगी। बेटे के मन की बात खूब समझती थीं पर उन्हें भी इन्तजार था सोहन के कलक्टर बनने का। इसलिए कभी किसी से चर्चा नहीं करतीं।   

7

टूटे मन से सोहन शहर वापस आ गया। पहली बार ऐसा हुआ था जब किताबों में अपना मन नहीं लगा पा रहा था वर्ना उसकी पढ़ाई को लेकर माई कभी कभी डांटती भी थी कि थोड़ा आराम भी किया कर। भुल्लर पंडित कहते हैं ढेर पढ़ने से आदमी बउरा जाता है। पर वह मानता ही नहीं था। जानता था छोटी जातियों को ज्ञान की परंपरा से रोकने के लिए ब्राह्मणों द्वारा ये बनाए हुए टोटके हैं। भला पढ़ने लिखने से कोई पागल होता है? बाबा अम्बेडकर तो पूरा जीवन पढ़ते रहे वे क्या बौरा गए थे? यह सब छोटी जातियों को पढ़ने से रोकने की एक चाल ही तो है। अगर पढ़ने से ऐसा होता तो नदी पार के ही लड़के डॉक्टर, इन्जीनियर क्यूं बनते। सरकारी नौकरी सिर्फ उन्हीं को क्यूं मिलती। घर का जरूरी काम न हो तो सोहन पढ़ते ही पाया जाता था। आज उसका मन गांव में ही अटका हुआ था। ढेलवा उसे कोई मासूम उन्मुक्त चिड़िया लगती और मास्टर शिकारी। सोहन जब भी उलझन में होता तब उसे बस ढेलवा की याद आती थी। ढेलवा कभी उसकी कोई परेशानी कम नहीं कर पायी लेकिन अपनी सारी चेतना लगाकर उसकी बात सुनती जरूर थी। सोहन की उलझन पता नहीं कम होती या नहीं पर वह ढेलवा को मन की बात कहकर खुश हो जाता। उसकी आंखों में चमक आ जाती। आज उसकी परेशानी की वजह ढेलवा ही थी तो अपना दुख कहने किसके पास जाए। उस रात वह फफक कर खूब रोया। इतना की आंखे सूज गयी। मन कुछ हल्का हुआ तो खुद को फिर से पढ़ने लिखने में लगा दिया। इस बीच उसको माई की बहुत याद आयी। माई का सपना था बेटा कलक्टर बने। उसने खुद से वादा किया बन कर दिखाएगा भी। 

8

इधर पूरे गांव में मास्टर की चर्चा चरम पर थी। गांव के भोले–भाले लोग उससे किसी बदलाव की उम्मीद करने लगे थे। वह भी उनकी निर्मल भावनाओं का भावुकता से दोहन करता। ऐसा व्यवहार करता कि बस वह इन्हीं लोगों के लिए अपना जीवन न्यौछावर कर देगा। वह कभी मुठ्ठियों को ताने तो कभी भावुकता में कहता– “ देवियों और सज्जनों मैं तो मात्र 6 महीने के लिए इस गांव में आया था पर आपका स्नेह और प्यार मुझे यहां से जाने नहीं दे रहा। ” लड़कियों की ओर देखते हुए कहता– “मैंने निश्चय कर लिया है कि अब मुझे अपना पूरा जीवन आपके लिए समर्पित करना है। मैं आपसे वादा करता हूं आपके अधिकारों को दिलवा कर रहूंगा। इस सड़ी गली व्यवस्था को उखाड़ फेंकना है। मैं समझ सकता हूं जिस गांव में बिजली, पानी, स्कूल और कोई अस्पताल तक न हो वहां का जीवन कितना कठिन होता है। मैं तो एक सामाजिक कार्यकत्र्ता हूं। समाज का विकास मेरी पहली प्राथमिकता है। ” मास्टर की गाढ़ी बातें गांव वालों को कितना समझ आती यह तो कहना मुश्किल है पर उसका असर लोगों पर जरूर होने लगा था। मौका मिलते ही वह बाबू साहब को भावी और कर्मठ सांसद घोषित करने की कोशिश करता। अप्रत्यक्ष रूप से उनका प्रचार प्रसार भी करता था। बाबू साहब ने उसे स्कूल में रखा ही था अगले चुनाव के प्रचार प्रसार के लिए। किसी भी हालत में अगले चुनाव में दिल्ली पहुंचना उनका दिवा स्वप्न था जिसे साकार करने के लिए मास्टर जैसे कुछ ज्ञानी गुंडो को अलग अलग जगहों पर नियुक्त कर रखा था। गांव के सताए भूखे लोगों को इनकी तनी मुठ्ठियों में अपना स्वर्णिम भविष्य दिखता था और लड़किया उसमें अपने सपनों के राजकुमार की कल्पना करती। 

9

पूरे तीन महीने बाद सोहन गांव लौटा तो माहौल बदला हुआ था। पूरा गांव मास्टर के दिखाए सपने में खोया हुआ था। गांव की लड़कियां और लड़के मास्टर के साथ घूम घूम कर बाबू साहब का प्रचार प्रसार करते। कभी कभी वह दो तीन के लिए कुछ लोगों को लेकर पास के दूसरे गांवों में जाकर भी प्रचार प्रसार करता। बाबू साहब भी मास्टर को अपना सबसे प्रिय कहते। लोगों को लगता बाबू साहब जीत गए तो मास्टर उनकी सारी परेशानियों को हल कर देगा। एक दिन रात को खाना खाते समय माई ने उसको बतााया कि गांव की कुछ लड़कियां रात को उसके कमरे पर भी जाती हैं तो सोहन भावशून्य हो गया। ढेलवा उसके जेहन में आकर खड़ी हो गयी। मां की बातों पर उसे पूरा विश्वास तब हो गया जब एक दिन उसने आठ बजे के करीब मास्टर के कमरे से रूपा को निकलते हुए देखा। सोहन का मन हुआ चिल्ला–चिल्ला कर सबको सब कुछ बता दे लेकिन कुछ कह नहीं सका। बस अन्दर ही अन्दर घुटता रहा। इस बीच कई बार वह ढेलवा से मिलना चाहा तो वह कतरा कर निकल जाती। सोहन समझ गया कि जरूर मास्टर ने मना किया होगा। ढेलवा का यह व्यवहार सोहन को अन्दर ही अन्दर सुलगा देता। रोने का मन हो जाता। इतना कमजोर प्रेमी भी नहीं था सोहन अगर जानता कि मास्टर अच्छा इन्सान है तो ढेलवा की खुशी के लिए अपनी खुशियों से समझौता कर मन को समझा लेता। अपनें अन्दर की भावना का दोहन कर लेता पर उसे पता था मास्टर कोई ठग है जिसने ढेलवा की मासूमियत को ठग लिया है। वह जानता था ढेलवा छली जाएगी इसलिए उसको आगाह करना चाहता था। पर ढेलवा मास्टर के प्रेम में थी और जब कोई किसी के प्रेम में हो ठगे जाने का डर कहां रह जाता है। एक दिन सुवह ही चार बजे घूमने निकला तो रास्ते में ढेलवा टकरा गयी। इतनी सुबह उसे देखकर सोहन सारा माजरा समझ गया। सोहन को देख ढेलवा के कदम रूक गए। कुछ देर दोनों कुछ बोल नहीं सके बस एक दूसरे को देखते रहे। – “ हमसे कोई गल्ती हो गई का ढेला ...जो बात भी नहीं करती हो। ”– सोहन ने आतुर होकर कहा तो ढेलवा ठिठक गयी। बोली– “नहीं तो ऐसा काहे सोचते हो। हम तो मिलना चाहते थे तुमसे”

“फिर मिली क्यूं नहीं”

“तुम दिखे ही नहीं”

“तो घर आ जाती”

“ कहो कैसे हो . . .कैसी चल रही है तुम्हारी कलक्टरी की पढ़ाई। ”

“ इतनी सुबह कहां से आ रही हो” – सोहन के इस सवाल पर ढेलवा की आखें चमकने लगी। वह उसके थोड़े पास आ गयी। बोली– “ सोहन हम बीरेश जी से मिल कर आ रहें है। ”

“बीरेश जी ...कौन है ये” – सोहन ने एक पल सोचा फिर समझ गया। मास्टर का ही नाम बीरेश होगा। 

“ उ मास्टर जी हैं न, उन्हीं से। ” – ढेलवा शर्माते हुए बोली। सोहन को लगा जैसे किसी ने जलती रेत में उसे फेक दिया हो। कुछ बोल ही नहीं पाया। ढेलवा चंचल हो रही थी पर सोहन किसी आंच पर पक रहा था। ढेलवा नें सन्नाटे को तोड़ा– “सोहन हम तुम्हें सब बताने वाले थे . . .पर तुम तो शहर जा बैठे ...जानते हो हमें तुम्हारी बहुत जरूरत है। ”

“अब मेरी कैसी जरूरत ढेला . . .”

“ सोहन मेरा एक छोटा सा काम कर दोगे.... ?

“मना किया है कभी ...कहो ?”

“तुम मेरे मामा मामी को समझाओ न कि उ मेरी शादी बीरेश जी से कर दें . . .” सोहन अजीब उलझन में पड़ गया। कैसी सजा है। अपनी अर्थी अपने ही कन्धों पर कोई कैसे लेकर ढो सकता है। व्याकुल होकर वह ढेलवा को समझाते हुए बोला– “ढेला माई कहती है वह मास्टर ठीक आदमी नहीं है, और भी कई लडकियां उसके कमरे पे जाती है। सिर्फ तुम ही नहीं”

“ सोहन बस करो . . .हम उन पर कोई इल्जाम बर्दास्त नहीं करेंगें”

“मैंने कल रात रूपा को खुद उसके कमरे से निकलते देखा था”

“तुम झूठ बोलते हो सोहन . . .जलते हों उनसे”

“ तुमसे झूठ नही बोलता हूं . . .अच्छी तरह जानती हो तुम। कहो, बोला है कभी ? और मैं उससे जलने लगा हूं यह भी तुम्हे उसी ने बताया होगा”

सोहन आज पहली बार ढेलवा पर गुस्सा हुआ था। ढेलवा ने समझाने की मुद्रा में कहा– “सोहन वह बहुत अच्छे हैं। तुम उनसे बस एक बार मिलकर देखो। मुझे बहुत प्यार करते हैं। कहते हैं मैं दुनिया की सबसे खूबसूरत लड़की हूं और बहुत समझदार भी। ” सोहन झुंझला गया। मन हुआ चला जाए और कभी उसका मुंह न देखे पर जानता था ढेलवा नासमझ है और भोली भी। सही गलत का फैसला करना नहीं जानती। भावुकता में लूटी जाएगी। पुनः समझाते हुए बोला– “ढेला मैं सच कहता हूं वो गलत आदमी है”

ढेलवा ने प्रतिवाद किया– “उनके साथ कुछ भी गलत नहीं लगता सोहन। ” ढेलवा की इस बात पर सोहन का मन बुरी तरह टूट गया। उसे समझने में देर नहीं लगी कि ढेलवा अब तक ठगी जा चुकी है। वह मास्टर के उतने ही करीब पहुंच चुकी है जितने करीब होने के लिए हमारी व्यवस्था ने शादी जैसी संस्था का निर्माण कर रखा है। जिस ढेलवा को वह नासमझ समझता था वह प्रेम में आतुर होकर इतनी बड़ी गलती कर बैठेगी सोहन को इसका अन्दाजा भी नहीं था। ढेलवा की आखें किसी विश्वास में चमक रही थी। सोहन अन्दर ही अन्दर सुलग रहा था शायद बुझ रहा था। 

“सोहन मैं उन्हें खुद को सौप चुकी हूं . . .उन्हीं की हो चुकी हूं। पूरी की पूरी। वो कहते हैं बस हम जल्दी ही शादी कर लेंगे” – ढेलवा ने फिर सन्नाटा तोड़ा। सोहन क्या बोलता बस सोच रहा था ढेलवा सच में समझदार हो गयी है। भारी मन से एक बार फिर समझाया– “ढेला शादी ब्याह कोई मजाक ठट्ठा नहीं है। जो भी फैसला लेना सोच समझकर लेना। प्रेम करना अलग बात है। जिन्दगी भर साथ निभाना अलग। तुम अब सच में बड़ी हो चुकी हो। गलत सही का फैसला करना तुम्हारे हाथ में है । हमारी कोई जरूरत हो कहना। ” ढेलवा उसके एकदम पास आ गयी। खुशी से खिल उठी थी वह बोली– “सोहन मैंने बहुत सोच समझ कर यह फैसला लिया है। उनकी आंखों में अपने लिए प्यार को महसूस किया है। जब उन्हें खुद को सौपती हूं तो उनके प्यार की पवित्रता मेरे देह में उतर जाती है। ” सोहन को लगा ही नहीं वह अपनी ढेलवा से बात कर रहा है। वह जिससे बात कर रहा है वह उसकी ढेलवा तो नहीं जो उसके साथ उसी के गांव में रहती। एकदम नासमझ और बेवकूफ। सोहन की जुबान जैसे हलक में अटक गयी। ढेलवा की बात के जवाब में बस इतना ही बोल पाया– “स्त्री मुक्ति की बात करते ही जिसके जेहन में सबसे पहले देह आती हो उसकी छुअन में पवित्रता कैसे हो सकती है। ” और तेज कदमों से घर की ओर बढ़ गया। घर पहुंचकर माई से लिपट कर खूब रोया। माई सब जानती थी। सीने से उसे देर चिपकायी रहीं। जानती थीं ढेलवा में सोहन की जान बसती है पर मजबूर थी। उसके साथ वह भी रोती रहीं। सोहन ने भारी मन से कहा– “माई ढेलवा तो एकदम पराई हो गई है रे .... .”

10

कुछ दिन बाद सोहन ने शहर जाने की जिद की तो उसकी माई ने रोक लिया। बोली– “कुछ दिन और रूक जाओ ...जाना आराम से। ” वह डरती थीं एक ही तो बेटा है कही कुछ कर धर लिया तो किससे सहारे जिएगी। कलक्टर बने सो न बने पर आंखों के सामने तो रहे। यह दुनिया का सबसे बड़ा सच है कि मां कितनी ही क्रांतिकारी हों उसकी सन्तान हमेशा उन्हें कमजोर ही दिखायी देती है। सोहन ऐसा भी कमजोर और भटकने वाला लड़का नहीं था। वह जानता था उसे कहां पहुंचना है और क्या करना है। बस आजकल गांव उसे काटने लगा है। मन कहीं लगता ही नहीं। माई भी घुम फिर उसी के पास रहती। किसी अनहोनी की आशंका उनके दिल के किसी कोने में दुबक कर बैठ गयी थी। माई के कई बार कहने पर वह कुछ दिन के लिए और रूक गया। मन को समझा कर फिर पढ़ने में जुट गया। इस बीच बाबूलाल मुंशी जी की याद उसे बहुत आ रही थी। बाबूलाल जी उसके स्कूल के मास्टर थे। हिन्दी और समाजशास्त्र उन्हीं से पढ़ा था। बाबूलाल पासी जाति के थे। गांव से बीस किलो मीटर पश्चिम के इन्टर कॉलेज में पढ़ाते थे। उर्जावान और प्रगतिशील विचारधारा के बाबूलाल जी सोहन के प्रेरणाशक्ति थे। उसकी हर तरह से सहायता भी करते थे। सोहन ही क्या प्रत्येक छात्र उनके लिए अपने बेटे जैसा था किसी को कोई भी जरूरत हो बाबूलाल जी कभी मना नहीं करते, बस उन्हें पता चल जाए लड़का पढ़ने लिखने वाला है। उन्हें सोहन से बहुत उम्मीद थी। अक्सर वह उसे अपने घर पर रोक लेते। दुनिया जहान की बातें करते। सोहन में उन्हें संभावनाएं दिखती थी। वह सोहन को समझाते थे कि हमें सदियों से वर्चस्ववदियों ने ज्ञान और संज्ञान की परंपरा से रोका है। हमें यह तस्वीर बदलनी होगी। हमें खुद अपने समाज के लोगों को जागरूक करना होगा। किसी भावना और भावुकता में अपना लक्ष्य नहीं भूलना है। हमारी सफलता हमारे समाज के हजारों लोगों की मानसिकता को बदल सकती है। बस हमें शिक्षा के महत्व को समझना होगा और अपने समाज के लोगों को समझाना भी होगा। लोगों को बताना होगा कि शिक्षा ही हमारी मुक्ति का एक मात्र विकल्प है। झुकना नहीं है और रूकना भी नहीं है। सोहन से बाते करते हुए बाबूलाल जी उत्साह से भर जाते। उसे समझाते। कहते– सोहन, समय बदल चुका। संविधान ने हमें हमारा अधिकार देना शुरू कर दिया है। हमें पूरी चेतना से उसे विकसित करना है। तुम सोचो कि जिन शहरों में हमारे बाप दादा कभी मजदूरी करने गए थे, अब हम उन्हीं शहरों में डॉक्टर, इंजीनियर, डीएम और प्रोफेसर बनने के लिए लौट रहे हैं। यही तो है साहित्य का जादुई यथार्थवाद। यह सब हमारे संविधान ने हमें दिया है। हमें उत्तेजना में नहीं सलीके से लड़ना होगा। अपने अधिकारों को पाना होगा और सदियों से सताए लोगों को जगना होगा। हमारी सफलता तभी सार्थक होगी जब हमारे लोगों को उससे फायदा होगा। मुशी जी सोहन की सफलता पर उल्लास से भर जाते। उसे समझाते हुए कहते– “सोहन हमें अपना अधिकार बहुत संघर्षों के बाद मिला है इसे किसी भावुकता में खोना नहीं है। कभी मन में किसी बात को लेकर कमजोरी महसूस हो तो अपने माई बाबूजी के उस चेहरे को याद करना जिसने तुम्हें यहां तक पहुंचानें में अपना खून पानी की तरह बहाया है। उनकी आंखों में झांककर अपने पूर्वजों के घायल इतिहास को देखना जिन्होंने एक मुठ्ठी चना और एक गिलास रस के लिए पूरे पूरे दिन जानवरों की तरह खटा है। बाबूलाल जी को याद कर सोहन फिर से अपनी पढ़ाई में जुट गया। मां को परेशान होते देख मुस्कुराते हुए बोला– “माई मेरे लिए सबसे पहले मेरा गांव है....ढेलवा मेरी किस्मत में नहीं होगी। तू अपना दिल छोटा मत कर तेरा सोहन एक दिन कलक्टर जरूर बनेना। ” कहकर माई से लिपट गया। माई की पथराई आंखे बहने लगी। 

11

एक सप्ताह बाद सोहन फिर से शहर जाने को तैयार हुआ तो माई ने इस बार रोका नहीं। उन्होंने महसूस कर लिया था कि सोहन ने अब खुद से समझौता कर लिया। उनके मन में ढेलवा के प्रति जो पे्रम था कम न हुआ जानती थीं उसमें ढेलवा की क्या गलती है। पे्रम तो किसी से भी हो सकता है। ढेलवा कभी भी मिलती तो वह उससे ऐसा ही व्यवहार करतीं जैसे सोहन और उसका इन्हें कुछ पता ही न हो। सोहन घर से निकलने ही वाला था कि गांव में हंगामा खड़ा हो गया। यह बात पूरे गांव में फैल गयी कि ढेलवा पेट से है। उसकी मामी ने बहुत डाटा फटकारा और कसम दिलाकर पूछा तो उसने सच सच बता दिया। उसके मामा का गुस्सा सातवें आसमान पर जा पहुंचा। उन्होंने ढेलवा के मामी को ही फटकारना शुरू किया– “मैं पहले ही कहता था यह मास्टर ठीक आदमी नहीं है तब तो तुमने माना ही नहीं था। अब भुगतो। अब तो पूरा टोला मोहल्ला मजे लेगा। ” आनन फानन में पंचायत बुलाई गई। नदी पार से सरपंच के साथ तीन लोगों का जमावड़ा हुआ। सोहन ने बहुत मना किया कि पंचायत और सभा बैठाने की कोई जरूरत नहीं है। किसी का सर–सामान नहीं खोया। चोरी नहीं हुई कि पंचायत बैठायी जाय। इसमें बेइज्जती के आलवा हाथ कुछ नहीं लगेगा। जिसे नहीं जानना है वह भी जानेगा। लोग बिना मतलब की बात बनाएंगे सो अलग से। उसे पता था यह बात अगर खुल गयी तो ढेलवा नदी पार के लौडो के आखों की किरकीरी बन जाएगी। ऐसी लड़कियों को वो लोग बदचलन से अधिक नहीं समझते। वह जानता था ढेलवा निर्दोष है बस प्यार में ठगी गयी है। सोहन के लाख समझाने पर भी पंचायत बैठी। पूरा गांव तमाशा देखने को तैयार था। सोहन अन्दर ही अन्दर किसी आग में जल रहा था। मास्टर साफ मुकर गया कि ढेलवा के साथ उसका कोई संबंध है ही नहीं। यह उसके चरित्र पर लांछन लगाया जा रहा है। गांव की अन्य लड़कियां जिन्हें मास्टर अलग अलग भोगकर अपने विश्वास में ले चुका था कि उन्हीं से विवाह करेगा, वह भी उसके पक्ष में खड़ी हो गयीं। ढेलवा आज खुश थी कि चलो बात खुल गयी अच्छा ही हुआ अब मास्टर उसे स्वीकार कर लेगा लेकिन, हवा का रूख किसी ओर बह रहा था। मास्टर बार बार यही कहता कि यह उस पर इल्जाम जानबूझ कर लगाया जा रहा है। अचानक ढेलवा मास्टर के पास आकर उसे झकझोरते हुए बोली– “बीरेश जी आप डरिए मत जो सच है बता दीजिए। मैं आपके साथ हूं। ” मास्टर ने ढेलवा की तरफ अजीब सी नज़र से देखा और उसे झिटकते हुए बोला– “ मैं तो आपका नाम तक नहीं जानता। आपका मेरा बस इतना ही परिचय है कि आप भी इस गांव की निवासी है। ” ढेलवा जिस विश्वास में आकंठ डूबी हुई थी वह पट्ट से टूट गया। तभी ढेलवा की मां चीखी– “यह मास्टर झूठ बोलता है ...यही जिन्दगी बर्बाद किया है हमरी बिटिया की। ” उसकी चीख सुन सरपंच नें उसे डांटते हुए कहा– “पहिले अपनी बिटिया को सम्भालों . . .का उसकी कौनो गल्ती नाय है . . .बच्ची है उ। ” ढेलवा के मामा–मामी की आंखे शर्म से झुक गयी। सरपंच साहब ने ऐसे बहुत मसले सुलझाए थे। वह समझ गए कि मास्टर की ही कारतूत है। गांव की इज्जत की बात थी। इसलिए फिर उसे समझाते हुए बोले– “बिटवा जवानी में ऐसी गल्ती हो जात है, सच सच बता दोगे तो बच जाओगे। ” मास्टर एक ना तो हजार ना । साफ साफ मुकर गया। कहने लगा– “चाहे जैसे पता कर लो चाहे जहां कसम खिला लो यह बच्चा मेरा नहीं है। ” सोहन का खून खौल उठा वह समझ गया कसम की बात कहकर वह गांव वालों को बरगलाना चाहता है। गांव वालों की आस्था भी कसम में इस तरह हैं कि वह मान भी जाएंगे। पर सोहन सच्चाई जानता था। कसमें मन का भ्रम होती हैं। उसने बात को पलटते हुए कहा– “अगर वह तुम्हारा बच्चा नहीं है तो तुम्हारा डीएनए टेस्ट करवा देते हैं। सच खुद सामने आ जाएगा। ” सभी ने सोहन की तरफ आश्चर्य से देखा। लोग जानने को इच्छुक हो उठे यह डीएनए भला क्या बला है। सरपंच के साथ आए एक व्यक्ति ने सोहन को अपने पास बुला लिया। वह जानते थे उसे। उसकी पढ़ाई लिखाई से बहुत खुश रहते थे। वह समझ गए सोहन जो कह रहा है सही ही कह रहा होगा चाहे लोग उसका मतलब भले ही न समझ रहे हों । सरपंच ने पूछा– “ इ का होत है सोहन बिटवा” सोहन ने समझाया विज्ञान ने ऐसी विधि ईजाद की है जिससे सिर्फ एक टेस्ट से पता चल जाएगा कि ढेलवा के पेट का बच्चा मास्टर का है कि नहीं” सरपंच ने शहर के किसी अपने परिचित डॉक्टर को तुरन्त फोन करके पता भी कर लिया कि सच में ऐसी कोई विधि है। डॉक्टर ने भी वही बताया। सरपंच ने भांप लिया कि सोहन की बात से मास्टर का चेहरा उतर गया है। वह अन्दर ही अन्दर भय से कांप रहा है। सरपंच साहब के अभिमान को ठेस लगी थी। आज तक किसी ने उनके सामने गलत बात नहीं कि और ई ससुर लौड़ा बकवास करता है। वह उसकी ओर गुस्से देखते हुए बोले– “अगर बात सच निकली तो एक्कौ हड्डी बचिहै नाए सोच लो . .बोटी बोटी काट डारब। ” तय हुआ कि कल सुबह मास्टर, सरपंच, ढेलवा के मामा और सोहन शहर जाएगे और मास्टर का चेकअप होगा। ढेलवा शून्य हो गयी। वह जिसे पे्रम समझ कर अपने अन्दर सींच रही रही थी वह जहर बनकर उसकी नसों में उतरने लगा। सोचने लगी सोहन सच कहता था वह नादान है और नासमझ भी। 

सुबह तड़के ही गांव में फिर शोर मचा। पता चला मास्टर गांव छोड़कर रात को ही भाग गया है। उसके कमरे की तलाशी ली गयी तो कुछ नशीली दवाओं के साथ ब्लू फिल्म की कुछ सीडी भी मिली। सोहन ने गौर से कमरे का जायजा लिया तो देखा बिस्तर के ठीक सामने दीवार में छोटा कैमरा भी लगा हुआ था। सोहन समझ गया मास्टर देह का व्यापारी था इसलिए स्त्री मुक्ति की बात करते हुए उसके जेहन में देह आती थी।

 12

रात के कोई 3 बजे होंगे। चांदनी रात सुबह होने का भ्रम पैदा कर रही थी। सोहन की आखों में जैसे किसी ने रेत भर दिया हो। आंखे बन्द करता तो चुभन होने लगती। मन उचट सा गया था। वह गांव से सौ कदम की दूरी पर बने शिव की विशाल मूर्ति के सामने आकर बैठ गया। शिव की लगभग पच्चीस फीट उचीं इस प्राचीन मूर्ति का निर्माण किसने किया किसी को ठीक से पता नहीं है। काले पत्थरों की बनी यह ध्यानस्त शिव की विशाल प्रतिमा खुले आसमान के नीचे थी। गांव वालों का मानना था कि इसी का प्रताप है कि इस गांव में आज तक कोई बड़ी विपदा नहीं आयी। सोहन कभी मंदिर नहीं गया, न पूजा पाठ में उसका मन लगता था लेकिन इस मूर्ति से उसका याराना था। जब भी पेरशान होता आकर इससे अपनी परेशानियां कह जाता। उसे अक्सर समाधान भी मिल जाता। दरअसल उसने कभी उसे ईश्वर की नजर से देखा ही नहीं हमेशा बस दोस्त समझता रहा। अपना साथी। मूर्ति से बीस कदम की दूरी पर एक विशाल तालाब भी शुरू होता जो लगभग पांच सौ मीटर लम्बा चौड़ा होगा। तालाब के पानी में टिमटिमाते तारों की छाया ने इस जगह को और मनोरम बना दिया था। ढेलवा के मामा–मामी की चिन्ता में ढेलवा के आगे की जिन्दगी और समाज था। वह यही सोचकर परेशान थे कि उसके मां बाप को वह क्या मुंह दिखाएंगे। ढेलवा की चिन्ता में अपने मां बाप से ज्यादा अपने मामा–मामी की इज्जत थी। सोचती थी क्या कहेंगे लोग कि पराई बिटिया को पाल पोस कर इतना बड़ा किया तो उसने पूरे गांव में उनकी नाक कटवा दी। वह जानती थी लोगों के आखों में चुभने लगी है। लोग न जाने किस नजर से देखेंगे। उसे खूब याद है जितई काका की छोटकी बहन बिजुरिया की क्या गलती थी, यही न कि उसने दूसरी बिरादरी में शादी कर ली थी। दो साल भी नहीं गुजरे थे कि उसका मरद किसी और के साथ भाग गया। पूरे गांव ने जैसे उसका जीना हराम कर दिया। कुछ लोग हमेशा इसी ताक में रहते कि कब मौका मिले की उसका भोग लगाएं। एक दिन भुल्लर पंडित का बेटा कुछ बोल दिया तो बिजुरिया ने वबाल खड़ा कर दिया। अपनी बेईज्जती से आहत भुल्लर ने उसके बारे में खूब उल्टी सीधी बाते फैलाई। लोगों से कहता इसका स्वाद बिगड़ गया। रोज मरद बदलती है। सबसे कहता– कई बार मेरे पास भी आयी थी, मैनें मना किया तो नाटक रच रही है। लोग भुल्लर के बेटे की बात मान भी लेते। आखिर तंग आकर एक दिन गांव ही छोड़कर चली गयी। जितई ने बहुत खोजा पर मिली नहीं। भुल्लर ने ही खबर फैलाई की किसी के साथ भाग गयी है। ढेलवा के आंखों के सामने बार बार उसके मामा मामी का शर्म से झुका चेहरा कौंध जाता। वह फफक कर रोने लगती। इधर सोहन की चिन्ता में सिर्फ और सिर्फ ढेलवा थी। आज बहुत दिन बाद आकर वह फिर से मूर्ति के सामने बैठ गया। मन न जाने कहां कहां कुलाचें भर रहा था। ऐसा पहली बार हुआ कि सोहन को कुछ सूझ नहीं रहा था। बस एकटक शिव की विशाल प्रतिमा पर नजरें गढ़ाए कुछ सोच रहा था। तभी तालाब में छपाक ...की तेज आवाज हुई तो वह हड़बड़ा कर उसी दिशा में दौड़ा। देखा कोई अपना हाथ पांव बांधे तालाब में कूद गया था। बिना सोचे समझे वह भी पानी में कूद गया। किसी तरह से खीच कर बाहर निकाला तो उसका चेहरा देख कर उसकी जान निकल गयी . . सोहन हैरान था– ढेलवा थी। सोहन को पता नहीं क्या सूझा खींच कर एक थप्पड़ मार दिया। ढेलवा कुछ बोल न सकी बस बेजार होकर रोने लगी। सोहन उसे गोद में उठाए लाकर मूर्ति के सामने बैठा दिया। दोनों के बीच गहरी चुप्पी ने घर कर लिया। 

“ऐसा क्यूं कर रही है पगली . . .” – सोहन ने चुप्पी तोड़ी। ढेलवा क्या कहती बस सिसकियां लेकर रोए जा रही थी। सोहन से रहा नहीं गया। अन्दर से डर गया। जानता था एकदम नाममझ है यह लड़की। कहीं कुछ कर धर बैठी तो फिर वह किसके लिए जिएगा। उसे समझाते हुए बोला– “खुद को मार लेने से तुम्हारें घर परिवार पर लगा कलंक नहीं मिट जाएगा ढेला समझी। ”

“मैं क्या करती मुझे तो यही सूझा”

“ तुम्हारी जिन्दगी इतनी सस्ती नहीं है ढेला कि यूं ही मर खप जाओ”

“फिर क्या करती”

“लड़ती”

“किससे”

“उससे, जिसने तुम्हे यह सब करने पर मजबूर किया है। ”

“मुझमें इतनी ताकत नहीं है सोहन . . .तुम सही कहते थे मैं कुछ नहीं जानती। नासमझ हूं। ”

“हो ही पगली वरना मरने क्यूं जाती . . .” सोहन के इस मजाक पर ढेलवा और फूट कर रो पड़ी। रोते हुए बोली– “तुम्हीं कहो सोहन इसके अलावा मेरे पास कोई और रास्ता था” सोहन ढेलवा के एकदम पास आ गया। इतना पास की उसकी उखड़ती सांसो की तेज आवाज को साफ साफ सुन सकता था। उसका हाथ अपने हाथों में ले लिया। भीगी हुई ढेलवा का सौन्दर्य फूटकर चांदनी रात को और उज्ज्वल कर रहा था। उसके एकदम पास आ गया। और बोला– “तुम्हें अब जीना ही होगा ढेला”

“किससे लिए लोगों के ताने सुनने के लिए . . .?”

“ नहीं ढेला”

“फिर”

“मेरे लिए”– सोहन ने यह वाक्य न जाने किस तरह से कहा कि, हिचकियां लेकर सिकसकती और छटपटाती ढेलवा एकदम से ठहर गयी। अजीब सी नजरों से सोहन को देखने लगी। सोचने लगी– कैसा दोस्ती है हमारी जिसे हर बार सोहन ही निभाता आया है। मैंने तो बस जरूरत पर याद किया। हमेशा शर्त रखी। पर सोहन ने वही किया जो वह कहती रही। कभी सवाल जवाब नहीं किया। फिर अचानक क्या सोची कि अपना हाथ छुड़ा ली बोली– “सोहन हम अपवित्र हो चुके हैं। अपने इस पाप का भागी तुम्हें नहीं बनने देगें . . .”

सोहन भी आज जिद पे आ गया था। मन की बात कह के रहेगा। फिर से उसका हाथ अपनें मजबूत हाथों में पकड़ लिया। ढेलवा नें कोई जबरदस्ती भी नहीं की। सोहन फिर से उसके पास हो गया बोला– “अगर गंगा उन्माद में आकर किसी नाले से टकरा जाए तो उसकी पवित्रता कम नहीं होती ढेला . . .” ढेलवा ने सोहन के परेशान चेहरे को देखा। उसे समझने की कोशिश करने लगी। कैसा इन्सान है सोहन। मैं लोगों की नजरों में बदचलन और आवारा बन चुकी हूं और एक यह है कि गंगा जैसा पवित्र समझने की भूल कर रहा है। ढेलवा ने महसूस किया कि वह सोहन के इतने करीब कभी नहीं आयी थी। यूं तो सैकडों बार दोनों लड़े होगें। एक दूसरे से लिपटे होंगे पर यह नजदीकी उससे कुछ तो अलग है। ढेलवा की आंखे उबल रही थी पर दिल सोहन के गर्म हाथों के रास्ते से आते नए रिश्ते को महसूस कर रहा था। यह पे्रम का पहला ऐसा दृश्य था जब दोनों एक दूसरे के आलम्बन थे। सोहन की आखों में एक याचना थी जिसे ढेलवा समझ तो रही थी पर एक अनजान सी अपवित्रता को अपने अन्दर महसूस कर रही थी। वह अपने इस अपवित्र दुख में सोहन को शामिल नहीं करना चाहती थी। कुछ सोच कर बोली– “सोहन हम कसम खाते हैं अब कभी मरने के बारे में सोचेगें भी नहीं पर हमें जाने दो। हम अकेले जी लेंगे। ” सोहन ने कातर होकर ढेलवा को देखा। आज पहली बार उसने उसके प्यार को महसूस किया है ऐसे कैसे जाने दे बोला– “ढेला तुम अकेली नहीं हो”

“ फिर कौन रहेगा मेरे साथ”

‘मैं”

“लोग तुम्हें भी जीने नहीं देंगे”

“मैं नहीं डरता किसी से . . .माई को समझा लूंगा”

“माई कुछ कहेगी नहीं तुम्हें”

“नहीं वह जानती है तू निर्दोष है । मास्टर ने छला है तुम्हें। माई तुम्हें बहुत चाहती भी है। आज ही कह रही थी ढेला से ब्याह कर लो नहीं तो वह पागली कहीं डूब मरेगी”

“हम जानते है सोहन तुम हमारा मन रखने को लिए बहला रहे हो हमें। माई भला मुझ अभागन को अपनी बहू क्यूं बनाने लगी ...”

“क्यूंकि वह जानती है कि प्यार करते हैं हम तुमसे। ” ढेलवा ने एक बार फिर सोहन के हाथों की गर्माहट से अपने अन्दर किसी चिर परिचित रिश्ते को आते हुए महसूस करने लगी। उसने महसूस किया सोहन की इस छुअन में छल नहीं है। ठगे जाने का डर भी नहीं पर अपना दुख अपने सोहन पर थोपना भी कहां का न्याय है। सोहन जिद कर चुका था आज ढेलवा को अपना बना लेना है। कुछ देर ढेलवा पता नहीं क्या क्या सोचती रही फिर अचानक बोली– “कबसे प्यार करते हो हमसे सोहन ...”

“जब तूं तीन साल की थी ...”– सोहन ने बताया तो ढेलवा को विश्वास नहीं हुआ। बोली– “फिर कभी बताया क्यूं नहीं हां ...”

“मैं न कहता था तू कुछ नहीं समझती है पागल है। ”

“ अच्छा ...आए बड़े समझदार बनने। मैं नासमझ थी तो तुम्हीं बता देते”

“कैसे बताता तू दोस्ती भी तोड़ देती तो कहां जाता मैं। तेरे अलावा और कोई साथी भी तो नहीं है मेरा”

“ मैं ऐसी भी बुरी नहीं हूं” – सोहन ने ढेलवा की आंखों में पहली बार अपने लिए इतना प्यार देखा था। मन हुआ ढेलवा को गले लगा ले पर शान्त रहा। उसकी चुप्पी तोड़ते हुए बोला– “तीन साल की थी तू जब तुम्हें अपना दिल दे बैठा था। ”

“और तुम कितने साल के थे”

“नौ साल का था तब। पहली बार तुम्हें गोद में उठाया था खेलाने के लिए। तू नयी नयी अपने मामा के घर आयी ही थी। तेल से लिपटी तेरी सलीके से बंधी चुटिया और काजल में लिपी पुती बड़ी बड़ी बतियाती तेरी ये आंखे। माथे पर लगा काजल का ठिगौना। तू कोई गुड़िया ही तो लग रही थी। बस सोच लिया व्याह करूग्ाां तो इसी नकचढ़ी से। ”

ढेलवा गौर से कान टिकाए सोहन की बाते सुन रही थी। उसके चेहरे के आते जाते हाव भाव को समझने की कोशिश कर रही थी। तभी सोहन बोला– “ ब्याह करेगी मुझसे ढेला . . .” “और बच्चा”

“उसे हम पालेंगे”

किसी ने पूछा किसका है, फिर ...?.”

“कह देंगे हमारा है। ” – सोहन ने पूरे विश्वास से कहा और बोला– लाओ बच्चे को तो अभी बता देते हैं। उसने पूरे अधिकार से अपना कान लाकर पेट के उभार पर टिका दिया और बोला– “भाई तुम जो भी हो लड़का या लड़की, ठीक से सुन लो, आज से तुम्हारे बाप का नाम ‘सोहन’ और माई का नाम ‘ढेला’ है . . कोई पूछे तो, तुम भी यही बताना। ढेलवा ने सोहन को डांटा– “बक् . . .ढेला नहीं, रंजना . . .मेरा असली नाम तो यही है न”। जिन्दगी से उबकर मरने आयी थी ढेलवा खिलखिलाकर हंस पड़ी। मछलियों का एक झुंड पानी की सतह पर आकर नृत्य करने लगा। शिव की ध्यानस्त मूर्ति की चमक अचानक बढ़ गयी। ऐसा लगा जैसे शिव वर्षों से इसी दृश्य को देखने के लिए तपस्या पर बैठे हुए थे। सोहन ने कहा– “तुझे तो याद भी नहीं होगा . . .एक बार जब हम जितई काका के बाग में राजा रानी का खेल खेल रहे थे। जिसमें तुम रानी बनी थी और मैं राजा। मैंने तुम्हें सच में सिन्दूर लगा दिया था। याद है, तेरी मामी ने कितना डराया धमकाया था तुझे, पर तूने मेरा नाम नहीं बताया था”

“इतना तो समझती थी। जानती थी तेरा नाम ली तो बाबू बहुत पिटेगो। तेरी माई तो हड्डी तोडती ही मामी गालियां सुनाती सो अलग। ” – ढेलवा को सहसा वह दृश्य याद हो आया। सोहन ने आश्चर्य से पूछा– “तुम्हे सच में याद है। ?”

“और क्या एक तुम्ही बडे. ग्यानी नहीं हो, समझे . . .तुम्हें खुद याद नहीं होगा कि उसी दिन शाम को तुमने जितई काका की दुकान से मुझे खूब सारी टॉफी और बिस्कुट दिलवाया था क्यूंकि, मैंने तुम्हें मार खाने से बचा लिया था” – सोहन तो यह भूल ही गया था। उसकी आखों में ढेलवा के लिए जैसे प्यार का समन्दर उमड़ पड़ा हैरान होकर बोला– “अरे हां . . . मैं तो यह सच में भूल ही गया था। ” इस बार ढेलवा ने सोहन का हाथ खुद अपनी हथेलियों में ले लिया और अपने बहुत पास खींच ली बोली–“तुम्हें तो बस किताबों की बातें याद रहती हैं . . तुम्हें तो यह भी याद नहीं होगा कि उस दिन के बाद हमारी दोस्ती कितनी पक्की हो गयी थी और यह भी याद नहीं होगा उसके कुछ दिन बाद जब मैं तीन दिन के लिए अपने माई से मिलने गयी थी तो तुम कितना रोए थे। ” ढेलवा सोहन से ऐसे लिपट गयी जैसी वर्षों से जिस चीज के लिए भटक रही थी वह अचानक आस पास ही मिल गयी हो पर अब वह उसे किसी भी कीमत पर खोना नहीं चाहती। सोहन जैसे जी उठा। ढेलवा की वही सूरत उसके आंखों में आकर गड़ गयी– “सरसो के तेल में सनी सलीके से बंधी चुटिया, काजल से लिपी पुती दोनों बतियाती बड़ी–बड़ी आखें और माथे पर लगा काजल का बड़ा सा ठिगौना। ” 

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1 comments :

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (26-04-2015) को "नासमझी के कारण ही किस्मत जाती फूट" (चर्चा अंक-1957) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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