ईश्वर करे कोई लेखक न बने - प्रेम भारद्वाज | Prem Bhardwaj's Editorial


लेखक बनना खुशी की बात नहीं...

प्रेम भारद्वाज 

‘भूत’ हूं मैं

‘‘ये महलों, ये तख्तों, ये ताजों की दुनिया
ये इंसां के दुश्मन समाजों की दुनिया
ये दौलत के भूखे रवाजों की दुनिया
ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है

हर एक जिस्म घायल, हर एक रूह प्यासी
निगाहों में उलझन, दिलों में उदासी
ये दुनिया है या आलम-ए-बदहवासी
ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है

जहां एक खिलौना है, इंसां की हस्ती
ये बस्ती है मुर्दापरस्तों की बस्ती
यहां पर तो जीवन से है मौत सस्ती 
ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है

जवानी भटकती है बदकार बनकर
जवां जिस्म सजते हैं बाजार बनकर
यहां प्यार होता है व्योपार बनकर
ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है’’

साहिर लुधियानवी

‘‘खराब साहित्य वास्तव में एक तरह का द्रोह और छल है।’’

जोसेपफ ब्रॉडस्की 



आप में से किसी ने अंजुम अर्शी, जमीर या मकदूम जालंधरी का नाम सुना है? बेशक इसका जवाब ‘नहीं’ में होगा। क्योंकि ये ‘भूतों’ के नाम हैं। अगर आपको यह लगता है कि मैं भूत-प्रेतों की दुनिया में ले जाने वाला हूं तो आपका अनुमान गलत है। लेकिन इसका यह मतलब कतई नहीं कि ‘भूत’ होते ही नहीं। ऊपर मैंने कुछ भूतों के नाम गिनाए थे। जब भूत होते ही नहीं तो उनका नामकरण कैसे मुमकिन है? आप उनके ‘होने’ पर सवालिया निशान लगा सकते है ? जबकि मैं तो कुछ से मिल चुका हूं और कुछ भूतों से अब भी मिलता-जुलता हूं जो अब खुद को भूत मानने से इंकार करते हैं। भूतों की अपनी दुनिया होती है। इस बार उसी दुनिया की बारे में। इससे पहले कि आप और अधिक देर तक उलझें मैं साफ कर दूं कि मैं लेखन में ‘भूत लेखक’ यानी घोस्ट राइटर की बात कर रहा हूं। घोस्ट राइटर मतलब वह जो किसी और के नाम से लिखता है, महज पैसों की खातिर। प्रथम पंक्ति में मैंने जिन घोस्ट राइटर्स के नाम लिए वे क्रमशः मनोज, राजवंश और कर्नल रंजीत के नाम से लिखते थे। ये तीन-चार दशक पहले लुगदी साहित्य के सरताज थे। घोस्ट राइटर की पीड़ा को समझने के लिए पिछले दिनों मुझे ई-मेल किए गए एक आत्मवक्तव्य से आप बावस्ता हो लें:

ईश्वर करे कोई लेखक न बने - प्रेम भारद्वाज | Prem Bhardwaj's Editorial

अनामदास: ये मेरा सही सहीं नाम नहीं है। ई-मेल आइडी भी फेक है। प्रोफाइल पिक्चर की जगह मैंने चार्ली चैप्लिन की तस्वीर लगाई है। शायद इसलिए कि जिंदगी में मैं भी चार्ली की तरह लोकप्रिय होना चाहता था। लेकिन मेरे सामर्थ्य की अपनी सीमाएं थीं। लोकप्रियता के वाजिब मायने समझे बिना मैंने शार्टकट अपनाया। शोहरत, दौलत के साथ-साथ मोहब्बत की तेजाबी तमन्ना ने मुझे उस खतरनाक रास्ते पर धकेल दिया। मुझे भरोसा था कि लिखकर मैं समय के सीने में सुराख कर दूंगा। किशोर उम्र में सपने ऐसे ही फौलादी होते हैं जो बाद में गुब्बारे साबित होते हैं। बेरहम वक्त की एक मामूली-सी सूई गुब्बारे में छेद कर उसे हवा से जमीन पर ला फेंकती है। न जाने क्यों मुझे गुमान हो गया कि लोकप्रिय होने का यही रास्ता मेरे लिए मुफीद है।

अपनी प्रतिभा की हदबंदी, पिता के खौफनाक इरादों के बीच मैंने इस देश का सबसे लोकप्रिय उपन्यासकार बनने का सुनहरा ख्वाब पाल लिया। मैंने यह भी रूमानी ख्वाब देखा कि मेरे लिखे पर पाठक नशे में मदहोश हो जाएंगे और भावुक लड़कियां राजेश खन्ना के फैंस की तरह खून से खत (यह 70-80 के दशक की बात है) लिखेंगी। लोकप्रिय होने की जिद और जल्दी ने मेरे भीतर जुनून भर दिया। बागी बना दिया। फौजी पिता से बगावत कर दिल्ली पहुंचा। लोकप्रिय लेखकों के प्रकाशकों ने मेरे तरुण जज्बे को देखते हुए पहले दस किताब घोस्ट राइटिंग करने की शर्त रखी, जिसे मैंने मान लिया। दूसरी कोई राह थी नहीं। मैंने लिखना शुरू कर दिया, एक-दो-तीन जो उस वक्त में ‘रिशी’ के नाम से प्रकाशित हुए।
यह ‘भूत’ की बात है। भूत लेखक की। अब आगे की कथा को मैं नहीं बता पाऊंगा। सबकी किस्मत वेद प्रकाश शर्मा की तरह नहीं होती जो दो दर्जन उपन्यासों की घोस्ट राइटिंग करने के बाद नाम और शोहरत के शिखर पर पहुंच जाते हैं। कुछ ऐसे भी हैं जिन्होंने घोस्ट राइटिंग से साहित्य की ओर छलांग लगा दी। आज की तारीख में वे प्रतिष्ठित लेखक हैं। वे किसी को नहीं बताते कि उनका ‘भूत’ क्या है, कि वे भूत थे। उनमें इतना भी साहस नहीं कि वे लुगदी को पढ़ने की बात भी स्वीकार कर सकें? अपने बुक शेल्फ से भी उन्होंने बहुत पहले उन किताबों को निकालकर कबाड़ी को बेच दिया। 

मैं ‘भूत’ हूं। भूत लेखक। भूत की पीड़ा से पाठक हमेशा दूर रहता है। अक्सर वह किताबों को पढ़ने का मजा लेते हुए, कभी सोच ही नहीं पाता कि जो वह हर्फ-दर-हर्फ पढ़ रहा है वो किसी भूत का लिखा हुआ है। ऐसा भूत जो डराता नहीं। खुद ही अपनी जिंदगी, अपने हालात, अपनी मृत इच्छाओं- महत्वाकांक्षाओं के मलबे पर बैठा बेहद डरा हुआ है। एक ऐसा भूत जो ‘नाम’ कमाने की चाह में ‘गुमनाम’ है। सूरज को छूने की कोशिश में चिराग भी मयस्सर नहीं। होकर भी नहीं हूं। न जमीं के लिए। न ही आसमान के वास्ते। क्यों हूं, इस सवाल का जवाब ढूंढ़ता हूं और अपने ही राख हुए सपनों से जल जाता हूं। भस्म हो जाता हूं। शब्दों की उंगली थामकर शोहरत के मुकाम को पाने की कोशिश में धीरे-धीरे सबने साथ छोड़ दिया। एक अंधेरे बंद कमरे में सपनों की कहानी रच रहा था। इस बात से बेखबर होकर कि समय ने करवट बदल ली है। मकान जर्जर हो ध्वस्त होने वाला है। सब यहां से निकलकर सुरक्षित स्थानों पर चले गए। मैंने कमरे को ही जमाना और जिंदगी को हद मान लिया तो इसमें किसकी क्या गलती?

ऐसा अक्सर लगता है कि मैं घोस्ट राइटर के समुच्चय में तब्दील हो गया हूं। तब मेरा दर्द कतरा से समंदर हो जाता है। अपना यह विस्तार मुझे इसलिए भी राहत दे जाता है कि व्यवस्था में कहीं कोई फांक है जहां घोस्ट राइटर फंसा है। घोस्ट राइटर हर उस जगह है जहां जिंदगी की जरूरत है। विषमता है। एक का नाम है। दूसरा गुमनाम है। जो गुमनाम है उसे नाम चाहिए। ‘नाम’ का रास्ता गुमनामी की पगडंडी से भी होकर गुजरता है। यकीन नहीं आता तो मुंबई की फिल्म नगरी के इतिहास और वर्तमान को जान-समझ लीजिए। जहां घोस्ट राइटिंग एक रवायत है। इस देश में सबसे ज्यादा भूत वहीं रहते हैं लेखन के क्षेत्र में स्ट्रगल करने वाले बहुत दिनों तक भूत ही बने रहते हैं। उनकी कहानियों पर ही फिल्में बनती हैं, लोग तालियां पीटते हैं। लेकिन उनको खुश होने का भी नहीं। किसी को बता भी नहीं सकते कि अमुक फिल्म के भूत लेखक वही हैं। सिनेमाहॉल में दर्शकों को तालियां पीटते देख वे अपने आंसू न बहा पाते हैं। न छिपा। उन्हें लगता है क्यों कोई दूसरा उनके हिस्से की जिंदगी जी रहा है। उनके हिस्से की खुशी किसी दूसरे को क्यों हासिल है? 

भूत-प्रेत भटकने के लिए अभिशप्त होते हैं। कोई अधूरी ख्वाहिश उन्हें भटकाती है। वे होते हैं , लेकिन उनके होने पर कोई विश्वास नहीं करता। कोई उन्हें देखता नहीं। उनके होने को प्रमाणित भी नहीं किया जा सकता। वे नहीं होकर भी होते हैं। होकर भी कहीं नहीं होते हैं। भूत कोई व्यक्ति नहीं। नाम नहीं। एक मजबूरी है। अभिशप्तता है। वर्तमान वक्त के पीपल से उल्टे लटके हममें से बहुत भूत ही हैं जो अपनी अधूरी ख्वाहिशों और मुफलिसी के फंदे में फंसे हैं। घोस्ट राइटर बनना बीच का रास्ता है जिस पर चलने से पाश ने मना किया था। जो मोहन राकेश, कमलेश्वर, धर्मवीर भारती, निर्मल वर्मा नहीं बन पाते वो कुशवाहा कांत, गुलशन नंदा, राजहंस, रानू बन जाते हैं। ये इसलिए भी और क्योंकि इनकी प्रतिमा कमतर होती है। बनने और होने के बीच मजबूरी का मानचित्र है जिसमें कोई भी देश अपना नहीं। नायिका बनने गईं लड़कियां बार डांसर बन जाती हैं। लोकप्रियता के दायरे को तोड़ते हुए लोग बाजारू या बाजार की परिधि में दाखिल हो जाते हैं। फिर भी ये कुछ तो खुशनसीब हैं, लेकिन उनका क्या जो ताउम्र लिखते रहे मगर गुलशन नंदा, रानू भी नहीं बन पाए। भूत ही रहे। प्रेतयोनि से मुक्ति नहीं मिल पाई।

अंत में कुशवाहा कांत के ‘पपीहरा’ उपन्यास की पहली पंक्ति, ‘ईश्वर करे कोई लेखक न बने।’ और अपने ही लिखे उपन्यास जो मेरा नहीं है, उसकी पंक्ति, ‘लेखक बनना खुशी की बात नहीं, वह अमूमन दर्दनाक ही होता है।’

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नाम की चाहत के एक गुमनाम, एक अनाम का पूरा मेल पढ़ने में बाद मैं सोच में पड़ गया। लोकप्रिय शब्द से जुड़ी बातें जेहन में कौंध रही हैं। लेकिन सबसे पहले निर्मल वर्मा की बात, ‘‘जिसे हम लोकप्रिय साहित्य कहते हैं , वह ऐसे ही लिखा जाता है। लोगों को यह अच्छा भी लगता है समझ में भी आता है, किंतु न तो इसमें अनुभव की सच्चाई प्रकट होती है, न स्थिति से जीवन में किसी सत्य की प्राप्ति हो पाती है। विकल्प इन दो अतियों के बीच में है। तथाकथित लोकप्रिय साहित्य और तथाकथित अहंग्रस्त एलीट साहित्य के बीच में। तीसरा रास्ता अर्थात् भाषा के साथ कम से कम समझौता करके लोगों तक अधिक से अधिक अनुभव संप्रेषित कर पाना। भाषा को सबसे अधिक संप्रेषित टी.वी. सीरियल्स या जासूसी उपन्यास करते हैं। भाषा की प्रामाणिकता की रक्षा और अनुभव की सच्चाई बताते हुए अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचने की कोशिश वह चुनौती है, जिसे एक सच्चा साहसी रचनाकार स्वीकारता है।

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साहित्य महज खाली समय की संगत नहीं है। रचना से विचार को छीनने का मजा नहीं लेना चाहिए। हत्या कभी भी कलात्मक नहीं हो सकती। इसलिए ही शायद वीरेन डंगवाल अपनी एक कविता में कहते हैं कि ‘वे लोग बहुत चालक हैं, वे हत्या को भी कला में बदल देते हैं।’ हत्या एक जीवन का अंत होती है। मनोरंजन के बहुत सारे साधनों में साहित्य को भी मान लेना मुनासिब नहीं। साहित्य एक मरहम है। रोशनी है। यह समाज को कितना बदलता है, ये बात मार्क्सवाद ने बहुत पहले ही बता दी हैं। लेकिन साहित्य मन को जरूर बदलता है। यह समय जब जीने की तमाम स्थितियों का अपहरण कर लेता है तो यह जीने का हौसला देता है। ऐसे लोगों की कमी नहीं जिन्हें महंगी दवाओं और बड़े डाक्टरों ने नहीं लोकप्रिय गजलों और पुराने फिल्मी गीतों ने बचाया है।
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लोकप्रिय लोक से जुड़ा है। लोक एक बड़ी चीज है। लोक मतलब पूरी दुनिया। समग्र। बड़ा रचनाकार वही है जो लोक को लेकर चलता है। जैसे तुलसी, कबीर, प्रेमचंद लेकर चले। जो सच्चे मायने में लोकप्रिय थे। भिखारी ठाकुर से लेकर नामदेव ढसाल, गिर्दा और गदर तक भी लोकप्रिय थे, जिनकी कला महज मनोरंजन तक सीमित नहीं थी। लेकिन कुछ लोगों ने लोक को पीछे छोड़ दिया। बचा ‘प्रिय’ तो वह पैसो की भेंट चढ़ गया। जब सिर्फ और सिर्फ पैसा ही प्रिय हो तो तब लोक का लोप हो जाना लाजिमी है। लोकप्रिय होने की लालसा ने बाजार खड़ा किया है। लोकप्रियता का मामला सबसे ज्यादा सिनेमा, क्रिकेट और सियासत से जुड़ा है। ये तीनों चीजें मास से जुड़ी हुई हैं। लोकप्रिय होना गलत नहीं, लेकिन महज मनोरंजन तक सिमट जाना लोकप्रियता का अपाहिज हो जाना है। 

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लोकप्रियता का साइड इफेक्ट भी होता है। वह बाजदफा संवेदना को लीलती है। भूवभूति ने कहा है, ‘राजा को लोकप्रिय होना चाहिए।’ राम ने अपनी लोकप्रियता बचाने के लिए पत्नी सीता को गर्भवती स्थिति में निष्कासित कर दिया। लोकप्रियता के कुछ टोटके भी होते हैं। सियासत में लोकप्रियता सत्ता दिलाती है। सत्ताएं भी किसिम-किसिम की। लोकप्रियता का नशा बहुत खतरनाक होता हैं। यह नशा कई बार रचनात्मकता का नाश भी कर देता है। लोकप्रियता सिर्फ बलिदान ही नहीं मांगती वह पाखंड भी मांगती है। अभिनय करवाती है। झूठ 

बुलवाती है। एक सीमा के बाद लोकप्रियता कैद भी बन जाती है। जिससे मुक्ति आदमी के लिए नामुमकिन-सी हो जाती है। जो बहुत लोकप्रिय हैं वे आजाद होकर भी बंदिशों में घिरे रहने को बाध्य हैं।

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हम सबके भीतर एक भूत है। वही लिखता है। हम तो कोई और होते हैं। हमारे भीतर का भूत कभी बाहर नहीं आता। वह बेचारा भला आदमी है। वह लिखता है। फिर कहीं चला जाता है। उसके लिखे पर हम यश पाते हैं। दौलत हासिल करते हैं। प्रतिष्ठा मिलती है। भूत को कुछ नहीं मिलता। हम कोई और होते हैं जो ताउम्र भूत के साथ नाइंसाफी करते हैं। अंत में ‘प्यासा’ फिल्म का आखिरी दृश्य: नायक विजय गुरुदत्त की शोकसभा पर फूल चढ़ाने गई भीड़ असली विजय को दूर धकेलकर आगे बढ़ती है...। उस समय साहिर का कालजयी गीत जीवन और कला की इस तल्ख सच्चाई को बयां करता है: 
‘‘ये दुनिया जहां आदमी कुछ नहीं है
वफा कुछ नहीं, दोस्ती कुछ नहीं है
यहां प्यार की कद्र ही कुछ नहीं है
ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है

जला दो इसे, पफूंक डालो ये दुनिया
मेरे सामने से हटा लो ये दुनिया
तुम्हारी है तुम ही संभालो ये दुनिया
ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है’’

'पाखी' अप्रैल-2015 में प्रकाशित 

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1 comments :

  1. bahut khub! umada!!-ye duniya agar mil bhee jaye to kya ho...!

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